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हरियाणा में सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जजों की पेंशन पर HC का बड़ा आदेश

चंडीगढ़  पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जज को मिलने वाली पेंशन एक सांविधानिक रूप से संरक्षित, निहित अधिकार है जिसे समायोजित या न्यूट्रलाइज नहीं किया जा सकता। अदालत ने हरियाणा सरकार के उस फैसले को रद्द कर दिया जिसमें लोकायुक्त के रूप में नियुक्त पूर्व जजों के वेतन से उनकी पेशन काटी जा रही थी। न्यायमूर्ति संदीप मौदगिल ने कहा कि हरियाणा लोकायुक्त अधिनियम, 2002 के तहत लोकायुक्त का वेतन वर्तमान हाईकोर्ट जज के समकक्ष तय है और इसमें पेंशन कटौती का कोई प्रावधान नहीं है। ऐसे में राज्य सरकार को अपने स्तर पर पेंशन काटने का कोई अधिकार नहीं था। अदालत ने इस कार्रवाई को असाविधानिक, भेदभावपूर्ण और विधिसम्मत आधार से रहित करार देते हुए सभी बकाया राशि 6 प्रतिशत व्याज सहित चार सप्ताह में जारी करने का निर्देश दिया। यह फैसला न्यायमूर्ति एनके सूद सहित अन्य पूर्व जजों की याचिका पर आया, जिन्होंने हरियाणा के लोकायुक्त के रूप में निर्धारितb पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया था। याचिकाकर्ताओं ने 18 अगस्त 2022 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके जरिए राज्य ने उन्हें हाईकोर्ट जज के समकक्ष पूरा वेतन देने से इन्कार करते हुए पेंशन काट ली थी। मामले की मूल कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए न्यायमूर्ति मौदगिल ने कहा, यह विवाद न तो न्यायसंगत का है और न ही प्रशासनिक विवेक का। यह सांविधानिक आदेश का प्रश्न है। जहां संविधान और संसदीय कानून प्रभावी ही वहां कार्यपालिका की व्याख्या टिक नहीं सकती। अदालत ने राज्य के दोहरे लाभ वाले तर्क को खारिज कर दिया।     

चाइनीज मांझे के खिलाफ हाई कोर्ट की कड़ी कार्रवाई, पतंगबाजी पर हो सकती है प्रतिबंध

इंदौर  चाइनीज मांझे को लेकर हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में सुनवाई हुई। प्रतिबंधित नायलॉन थ्रेड (चाइनीज मांझा) शुक्रवार को अदालत में वकीलों ने पेश कर दिया। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की कोर्ट ने मांझा हाथ में लिया। पेंसिल पर इस्तेमाल किया तो पेंसिल कट गई। जजेस ने कहा कि पेंसिल कितनी मजबूत होती है, वो इस मांझे से कट गई। इस पर रोक जरूरी है। कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी की, यदि आप लोग कुछ नहीं कर पा रहे हैं तो हमें पतंगबाजी पर ही रोक लगानी पड़ सकती है। मौतों से नाराज कोर्ट ने स्वत: लिया संज्ञान इंदौर में 30 नवंबर को 17 वर्षीय किशोर की मौत हो गई थी। 7 दिसंबर को एक व्यक्त का गला कट गया था। घटनाओं से नाराज कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेकर याचिका दायर की थी। 12 जनवरी को किशोर गुलशन के परिजन की ओर से इंटरविनर याचिका दायर की गई थी। घायलों के फोटो देख दहल गया दिल- कोर्ट सुनवाई की शुरुआत में ही कोर्ट ने कहा, मांझे के कारण एक्सीडेंट और इससे घायलों के फोटो देख दिल दहल जाता है। हमारे स्टाफ ने जानकारी दी है कि कई जगह चाइनीज मांझे का इस्तेमाल हुआ। साफ समझ आता है कि आदेश का पालन नहीं हो पा रहा। सभी जब्त स्टॉक को माना जाए खतरनाक प्लास्टिक – चोट या मृत्यु की स्थिति में पीडि़तों या उनके परिवारों को मुआवजे के लिए नीति। – साइबर सेल को सभी प्रमुख ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और बी2बी प्लेटफॉर्म को नोटिस देने का निर्देश दिया जा सकता है। -सुनिश्चित किया जाए कि नायलॉन मांझा (चाइनीज मांझा), मोनो-काइट या सिंथेटिक स्ट्रिंग के रूप में सूचीबद्ध कोई भी उत्पाद राज्य में डिलीवर न हो। – निर्माण, भंडारण, बिक्री या उपयोग के संबंध में कार्रवाई योग्य जानकारी देने पर नाम गुप्त रखते हुए संबंधित को इनाम दिया जा सकता है। – यह मांझा गैर-बायोडिग्रेडेबल है और खुले में जलाने पर जहरीला धुआं निकलता है। -सभी जब्त स्टॉकों को खतरनाक प्लास्टिक कचरा माना जाना चाहिए। मालखानों में अनिश्चितकाल तक संग्रहित नहीं किया जाना चाहिए। अधिकृत संयंत्रों में भेजा जा सकता है। -कोई भी ट्रांसपोर्टर, कुरियर सेवा या परिवहन एजेंसी जो प्रतिबंधित मांझे वाले कार्टन ले जाते पाई जाती है, उसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा। – ऐन मौके पर कदम उठाने के बजाय संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को काफी पहले से प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए। – अफसर चीनी नायलॉन धागे (मांझा) के निर्माण, बिक्री, भंडारण और उपयोग पर प्रतिबंध को सख्ती से लागू करना सुनिश्चित करें। – संबंधित अथॉरिटी यह जांच और निगरानी करे कि उक्त धागा बाजार में न बेचा जाए। – राज्य सरकारें प्रिंट और सोशल मीडिया के ज़रिए आम जनता को जागरूक करने के लिए सामाजिक जागरुकता अभियान चलाएं। ई-कॉमर्स साइट पर बिक रहा इंटरविनर करने वाले वकील धर्मेन्द्र गुर्जर और लखन सिंह पंवार कोर्ट के समक्ष मांझा रखते हुए बताया कि ये मांझा 14 तारीख को उनके घर की छत पर पतंग के जरिए आया था। न्यायमित्र वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक शरण ने कहा कि कई ई-कॉमर्स साइट पर उक्त मांझा उपलब्ध है। वहां से लोग ऑर्डर कर रहे हैं। कोर्ट ने अपने पुराने सभी अंतरिम फैसलों का सख्ती से पालन कराने निर्देश जारी किए। नीति बनाने को दिया डेढ़ महीने का समय अदालत ने मुख्य सचिव को आदेश दिया कि वे इससे जुड़े सभी विभागों से समन्वय कर चाइनीज मांझे की बिक्री पर रोक लगाने एक नीति बनाएं। अमल करवाएं। कोर्ट ने अंतरिम निर्देश जारी कर सरकार को डेढ़ महीने का समय दिया है। अगली सुनवाई 9 मार्च को होगी। केस- हाईनेक टी-शर्ट ने बचाई जान, होंठ कटा राजगढ़. छापीहेड़ा में शुक्रवार दोपहर बाइक सवार भारतसिंह राजपूत मांझे की चपेट में आ गया। उसके होंठ और चेहरा लहूलुहान हो गया। गनीमत रही कि युवक ने हाईनेक टीशर्ट पहन रखी थी, जिससे गला कटने से बच गया। युवक के होंठ पर पांच टांके लगे। सारस घायल, पंख पर मिले कट के निशान जबलपुर. मझौली थाना क्षेत्र में चाइनीज मांझे की चपेट में आने से सारस पक्षी घायल हो गया। वन अमले के अधिकारी उसे पशु चिकित्सालय ले गए। डॉक्टरों ने प्राथमिक उपचार कर पट्टी बांधी। बताया कि चाइनीज मांझे से पंख पर कट के निशान मिले हैं।

पानी का प्रदूषण: हाईकोर्ट ने कहा- नालों में सीवेज मिलना बंद हो, पॉल्युशन बोर्ड की रिपोर्ट में 99 मिलियन लीटर सीवेज का खुलासा

जबलपुर  मप्र हाईकोर्ट में मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने रिपोर्ट पेश करके चौंकाने वाला खुलासा किया है। बोर्ड का कहना है कि जबलपुर के नालों का पानी जहरीला है। इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस जहरीले पानी से पैदा की जा रहीं सब्जियां कैसी होंगी? इस रिपोर्ट पर चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने  गहरी चिंता जताई है। बेंच ने अपना विस्तृत अंतरिम आदेश सुनाते हुए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PCB) की रिपोर्ट का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही अगली सुनवाई 4 फरवरी को निर्धारित करके बेंच ने सरकार को स्टेटस रिपोर्ट पेश करने कहा है। जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने सरकार को कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रदूषण नियंत्रण मंडल के सुझावों पर तत्काल अमल किया जाए और इसकी रिपोर्ट पेश की जाए। मामले की अगली सुनवाई 2 फरवरी को तय की गई है। लॉ स्टूडेंट के पत्र को माना याचिका जबलपुर के एक लॉ स्टूडेंट समर्थ सिंह बघेल ने हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र भेजकर जबलपुर में नाले के पानी से सब्जियां पैदा किए जाने को चुनौती दी है। हाईकोर्ट इस पत्र की सुनवाई जनहित याचिका के रूप में कर रहा है। बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत मित्र के रूप में वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ सेठ और राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता विवेक शर्मा हाजिर हुए। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में गंभीर और चौंकाने वाले तथ्य पेश किए हैं। बोर्ड द्वारा 23 नवंबर 2025 को विभिन्न नालों, स्रोतों और खेतों से लिए गए पानी के नमूनों की जांच में साफ हुआ है कि यह पानी अत्यधिक दूषित है और इसमें बीओडी, टोटल कोलीफॉर्म व फीकल कोलीफॉर्म तय मानकों से कहीं अधिक पाए गए हैं। यह पानी न तो पीने योग्य है, न नहाने योग्य और न ही खेती के लिए सुरक्षित, इसके बावजूद इसका खुलेआम उपयोग हो रहा है। चेतावनी-गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा हो सकता है प्रदूषण नियंत्रण मंडल की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि नालों का यह दूषित पानी किसी भी स्थिति में वॉटर पाइप लाइन में मिल गया, तो इससे गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा हो सकता है। हाईकोर्ट ने रिपोर्ट की गंभीरता को देखते हुए सरकार को निर्देश दिए हैं कि घरों से निकलने वाले सीवेज को सीधे नालों में जाने से तत्काल रोका जाए और नाले के पानी के किसी भी तरह के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया जाए। जहरीले पानी से खेती पर प्रतिबंध की मांग अपनी रिपोर्ट में PCB ने कहा है कि यह पानी पूरी तरह अनट्रीटेड सीवेज है, जिसमें फीकल कोलीफॉर्म जैसे घातक तत्व मौजूद हैं। ये तत्व मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा हैं। ऐसे पानी से की जा रही खेती को तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए, विशेषकर वे खेत जो शासकीय भूमि पर अवैध कब्जे में हैं या नालों के गंदे पानी से सिंचाई कर रहे हैं। वापस घरों में पहुंच रहा जहरीला पानी PCB के अनुसार, जबलपुर शहर में प्रतिदिन लगभग 174 एमएलडी सीवेज उत्पन्न होता है, जबकि उपलब्ध 12 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स केवल 75.14 एमएलडी ही ट्रीट कर पा रहे हैं। वह भी कई बार आंशिक रूप से या रखरखाव के कारण बंद रहते हैं। नतीजतन, करीब 98.86 एमएलडी गंदा पानी रोज नालों और नदियों में जाकर वापस घरों में पहुंच रहा है। नवंबर में नालों से लिए थे सैंपल प्रदूषण बोर्ड की ओर से पैरवी कर रहे एडवोकेट सिद्धार्थ सेठ ने बताया कि हाईकोर्ट के निर्देश पर कृषि विभाग, स्वास्थ्य विभाग और प्रदूषण नियंत्रण मंडल की संयुक्त टीम ने 23 नवंबर 2025 को ओमती नाला, मोती नाला, खूनी नाला सहित अन्य प्रमुख नालों से पानी के सैंपल लेकर जांच की थी। जांच रिपोर्ट में पाया गया कि पानी में बीओडी, टोटल कॉलीफॉर्म और फीकल कॉलीफॉर्म की मात्रा निर्धारित मानकों से कहीं अधिक है। रिपोर्ट के अनुसार यह पानी पीने, नहाने, खेती या किसी भी अन्य उपयोग के लिए उपयुक्त नहीं है। नगर निगम पर लगा था 17.80 करोड़ का दंड मामले में यह भी सामने आया कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के निर्देश पर प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने जबलपुर नगर निगम पर 17.80 करोड़ रुपए का पर्यावरणीय दंड लगाया था। यह जुलाई 2020 से 31 मार्च 2025 के बीच घरों से सीधे नदियों और नालियों में सीवेज व प्रदूषित जल मिलाने के कारण लगाया गया था, लेकिन अब तक नगर निगम ने यह राशि जमा नहीं की है। दंड की वसूली की जिम्मेदारी जबलपुर जिला कलेक्टर की है, जिस पर हाईकोर्ट ने जवाब तलब किया है। 98.86 मिलियन लीटर दूषित पानी नालों में पहुंच रहा रिपोर्ट के अनुसार जबलपुर शहर में प्रतिदिन लगभग 174 मिलियन लीटर सीवेज उत्पन्न होता है। शहर में वर्तमान में 12 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट हैं, जिनमें से केवल 75.14 मिलियन लीटर सीवेज का ही उपचार हो पा रहा है। ये ट्रीटमेंट प्लांट भी पूरी क्षमता से कार्यरत नहीं हैं। परिणामस्वरूप करीब 98.86 मिलियन लीटर अनुपचारित और दूषित पानी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नालों में पहुंच रहा है। सरकार व नगर निगम को नोटिस जबलपुर शहर में नालियों से गुजर रहीं पाइपलाइनों पर सवाल उठाने वाली एक अन्य जनहित याचिका पर चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच ने राज्य सरकार व नगर निगम को नोटिस जारी किए हैं। डेमोक्रेटिक लॉयर्स फोरम के अध्यक्ष ओपी यादव की ओर से दाखिल याचिका में राहत चाही गई है कि इन्दौर के भगीरथपुरा जैसे हालात जबलपुर में न बनें, इसके लिए नगर निगम को जरूरी निर्देश दिए जाएं। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता रविन्द्र कुमार गुप्ता का पक्ष सुनने के बाद बेंच ने नोटिस जारी करने के निर्देश दिए।

कैदियों को मिल रही मोबाइल सुविधा पर हाई कोर्ट नाराज़, जेल व्यवस्था पर उठाए गंभीर सवाल

मुंबई बम्बई हाई कोर्ट की गोवा पीठ ने कहा कि यह बात अंतरात्मा को झकझोर देने वाली है कि उत्तरी गोवा के कोलवाले स्थित केंद्रीय जेल के भीतर मोबाइल चार्जिंग पॉइंट बनाए गए थे। जज श्रीराम वी. शिरसाट ने हाल में एक आदेश में जेल परिसर में मोबाइल फोन और प्रतिबंधित वस्तुओं की तस्करी का संज्ञान लिया। उन्होंने जेल अधिकारियों को मजबूत जैमर नेटवर्क स्थापित करने का निर्देश दिया। उच्च न्यायालय ने चंदू पाटिल के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए ये निर्देश दिए, जो एक बच्चे की हत्या के आरोप में जेल में है। आरोप है कि पाटिल ने जेल से पीड़ित परिवार को फोन करके अप्रत्यक्ष रूप से धमकी दी थी।   जज ने कहा, ‘जेल अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने के लिए कुछ त्वरित और व्यापक कड़े उपाय करने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।’ आदेश में जेल प्रशासन से 20 जनवरी, 2026 को जवाब मांगा गया है। आदेश में कहा गया, ‘यह बात स्पष्ट है कि चार्जिंग पॉइंट वहां थे, वे क्यों लगाए गए हैं।’ अदालत ने कहा कि उसके पास ऐसे ही कई मामले आए हैं जिनमें मादक पदार्थों के अलावा मोबाइल फोन भी जेल परिसर में तस्करी करके लाए गए थे। हालांकि, न्यायाधीश ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि जेल के अंदर पहले भी मोबाइल फोन मिलने के बावजूद, ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। अदालत ने दिए सख्त निर्देश न्यायाधीश ने कहा, ‘केवल एक कैदी के खिलाफ मोबाइल या प्रतिबंधित सामान रखने के आरोप में कार्रवाई करना कोई निर्णायक समाधान नहीं होगा, बल्कि मामले की तह तक जाना आवश्यक है।’ उच्च न्यायालय ने कहा कि वह इस धारणा पर आगे बढ़ रहा है कि जेल में सिग्नल जैमिंग सिस्टम स्थापित नहीं हैं। न्यायाधीश ने कहा कि अब समय आ गया है कि अधिकारी इस मुद्दे को गंभीरता से लें। अदालत ने कहा कि वह इस बात को समझने में असमर्थ है कि मोबाइल फोन इतनी आसानी से अंदर कैसे ले जाए जा सकते हैं, खासकर तब जब जेल अधिकारी नियमित रूप से निरीक्षण करते हैं। जांच और निगरानी पर उठे सवाल जज ने पूछा, ‘क्या यह निरीक्षण सतही और दिखावा है या प्रवेश द्वार पर जानबूझकर ढिलाई बरती जाती है ताकि मोबाइल फोन बिना किसी रुकावट के जेल परिसर के अंदर पहुंच सकें?’ अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि इस तरह की घटनाएं नियमित अंतराल पर हो रही हैं, इसलिए कुछ जवाबदेही तय की जानी चाहिए। इसने कहा, ‘कुछ कड़े कदम उठाना समय की मांग है।’ चंदू पाटिल का जिक्र करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि सिर्फ कारण बताओ नोटिस से काम नहीं चलेगा। न्यायालय ने कहा कि संबंधित तिथि और समय के कॉल डेटा रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और सेल टावर लोकेशन का पता लगाना जरूरी है। एससी के न्यायाधीश ने कहा, ‘इस तरह की गतिविधियों के लिए मामूली सजा से जेल के कैदियों का हौसला बढ़ता है। ’उच्च न्यायालय ने कहा कि जेल के उप अधीक्षक या अधीक्षक को यह सुनिश्चित करना होगा कि तत्काल मजबूत फोन जैमर या सेलुलर निरीक्षण प्रणाली स्थापित की जाए और इनका संचालन सख्ती से जेल परिसर तक ही सीमित रखा जाए ताकि आसपास के निवासियों पर इसका कोई प्रभाव न पड़े। इसने यह भी निर्देश दिया कि जांच बिंदुओं पर निरीक्षण मानदंडों का उल्लंघन करने वाले कर्मियों की जवाबदेही तय करने के लिए अतिरिक्त नियम बनाए जाएं।  

एमपी हाईकोर्ट ने दी टिप्पणी, न्याय के लिए शक्ति का इस्तेमाल होना चाहिए

जबलपुर आपसी समझौता का आवेदन निरस्त ट्रायल कोर्ट द्वारा निरस्त किए जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। हाईकोर्ट जस्टिस बी पी शर्मा की एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि कानून के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए। जिससे कोर्ट प्रोसेस का गलत इस्तेमाल नहीं किया जा सके और न्याय का मकसद पूरा हो सके। अपराधों की प्रकृति और गंभीरता से समाज पर पड़ने वाले गंभीर असर को देखते हुए अपील को खारिज किया जाता है। इंदौर निवासी ने लगाई थी याचिका इंदौर निवासी रोशन खातरकर की तरफ से दायर की गयी याचिका में कहा गया था कि भोपाल के मिसरोद थाने में शिकायतकर्ता शाहरुख खान ने उसके और सह अभियुक्त के खिलाफ पिस्टल की नोंक पर कार और मोबाइल लूटने की शिकायत दर्ज करवाई थी। दोनों पक्षों में पहले ही विवाद सुलझ गया है और उन्होंने धारा 320(2) के तहत ट्रायल कोर्ट ने आपसी समझौते के लिए आवेदन दिया था। ट्रायल कोर्ट ने अपराध कंपाउंडेबल नहीं होने के आधार पर आवेदन को खारिज कर दिया था। अंदरूनी शक्तियां हैं बड़ी एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि हाई कोर्ट की अंदरूनी शक्तियां बहुत बड़ी हैं। उनका मकसद न्याय का सही प्रशासन कायम रखना है। न्याय में होने वाली गलतियों को ठीक करना है। कोई अपराध कंपाउंडेबल नहीं है, इस आधार पर हाईकोर्ट अपनी शक्ति का इस्तेमाल करने से इनकार नहीं कर सकता है। शक्ति का इस्तेमाल उन मामलों में किया जा सकता है, जहां आरोपी के खिलाफ सजा दर्ज होने की कोई संभावना नहीं है और ट्रायल की पूरी प्रक्रिया बेकार साबित होने वाली है। शक्तियों का इस्तेमाल बहुत कम और सिर्फ उन मामलों में किया जाना चाहिए, जिसमें अभियोजन जारी रखना कानून प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल होगा। प्रकरण में दोनों पक्षों में आपस में लगे हुए प्लॉट के कारण सिविल विवाद की शुरुआत हुई थी। अपराध की प्रकृति और गंभीरता को देखते हुए याचिका को निरस्त किया जाता है।  

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: विदेश में हुए अपराध पर भी भारत में दर्ज होगी FIR

जबलपुर   विदेश में अपराध होने के बाद भारत में दर्ज की गई एफआईआर को निरस्त करने की मांग मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने खारिज कर दी. हाई कोर्ट जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने याचिका की सुनवाई करते हुए अपने आदेश में कहा "पुलिस एफआईआर दर्ज कर प्रारंभिक जांच कर रही है. प्रकरण में चार्जशीट दायर नहीं की गयी है. ट्रायल कोर्ट ने उस पर कोई संज्ञान नहीं लिया है तो ऐसी स्थिति में एफआईआर को निरस्त नहीं किया जा सकता." महिला के पति व सास-ससुर की याचिका खारिज जापान निवासी वैभव जैन तथा राजस्थान निवासी उनके पिता पुनीत व माता निकिता जैन की तरफ याचिका दायर की गयी थी. याचिका में कहा गया "वैभव का विवाह भोपाल निवासी महिला से जनवरी 2023 में जयपुर राजस्थान में हुआ था. वैभव तथा उसकी पत्नी जापान में नौकरी करते थे. विवाह के बाद वैभव अपने माता-पिता को जापान ले गया." आरोप है कि जापान में पत्नी अपने पति के माता-पिता के साथ विवाद करती थी. वह जापान छोड़कर भोपाल स्थित अपने मायके आकर रहने लगी. जापान से लौटकर महिला ने रिपोर्ट दर्ज कराई पत्नी ने पति व उसके माता-पिता के खिलाफ दहेज के लिए प्रताड़ित करने, मारपीट करने सहित अन्य आरोप लगाते हुए महिला थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई. याचिकाकर्ता की तरफ से तर्क दिया गया "अपराध विदेश में घटित हुआ है. इसलिए धारा 188 के तहत केन्द्र सरकार की अनुमति के बिना कोई जांच नहीं की जा सकती." महिला की तरफ से तर्क दिया गया "शुरुआती जांच में केन्द्र सरकार की मंजूरी आवश्यक नहीं है." केस प्रारंभिक स्टेज पर होने का तथ्य एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा "रिकॉर्ड के अनुसार पीड़ित का आरोप है कि अपराध जापान के साथ भारत में भी किया गया है. आरोपों के अनुसार भारत लौटने के बाद भी पति द्वारा उसे प्रताड़ित किया गया. पीड़िता की शिकायत पर अपराध सिर्फ दर्ज किया गया है. धारा 188 की मंजूरी संज्ञेय अपराध तथा ट्रायर स्टेज में लागू होती है. पुलिस जांच कर रही है और चार्जशीट दायर नहीं की गयी है." हाई कोर्ट ने इस आदेश के साथ याचिका खारिज कर दी. 

मंदिर में सम्मान मांगना मौलिक अधिकार नहीं, भगवान सर्वोपरि — किस केस में हाईकोर्ट का अहम फैसला

मद्रास मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा है कि किसी भी मंदिर में किसी व्यक्ति को विशेष सम्मान मिलना कानूनी अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा है कि कोई व्यक्ति या संस्था इसे अपना कानूनी अधिकार नहीं मान सकती। इस दौरान हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए यह भी कहा कि मंदिर में पहला स्थान हमेशा भगवान का ही होता है और भगवान से ऊपर किसी को नहीं रखा जा सकता।   सुनवाई के दौरान जस्टिस एस एम सुब्रमण्यम और जस्टिस सी कुमारप्पन की बेंच ने श्रीरंगम श्रीमठ अंडवन आश्रमम की ओर से दायर अपील को खारिज करते हुए कहा कि भले ही मठों के प्रमुखों को सम्मान देने की परंपरा रही हो, लेकिन इसे कभी भी कानूनी अधिकार नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मंदिर में विशेष सम्मान नहीं मांगा जा सकता। क्या है मामला? यह मामला तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त (HR&CE) कानून, 1959 से जुड़ा है। इस मामले में दायर पहली याचिका में यह मांग की गई थी कि मंदिर की परंपराओं में सरकारी दखल ना दिया जाए। याचिका पर एकल पीठ ने फैसला सुनाते हुए था कि परंपरा के मुताबिक सिर्फ पांच मान्यता प्राप्त मठों, कांची कामकोटि पीठम, श्री अहोबिल मठ, श्री वनमामलाई मठ, श्री परकाल जीयर मठ और श्री व्यासराय मठ को ही मंदिर में विशेष सम्मान दिया जाता रहा है। इससे आगे किसी को सम्मान देना विवाद का कारण बन सकता है। इसके बाद श्रीरंगम श्रीमठ अंडवन आश्रमम ने अपील दायर कर कहा कि 1991 के बाद कई बार उसके मठ प्रमुख को भी सम्मान दिया गया, लेकिन बाद में बिना सुनवाई के यह परंपरा बंद कर दी गई। आश्रम की ओर से दलील दी गई कि उन्हें पहले मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया, जिससे वे अपनी बात नहीं रख सके। वहीं HR&CE डिपार्टमेंट ने कोर्ट को बताया कि तय परंपरा के अनुसार सिर्फ उन्हीं पांच मठों को सम्मान दिया जाता है और किसी भी बदलाव के लिए कानून के तहत औपचारिक फैसला जरूरी है। कोर्ट ने खारिज की अर्जी दलीलों को सुनने के बाद कोर्ट ने माना कि 1991 के बाद कुछ मौकों पर अपीलकर्ता मठ को सम्मान मिला था, लेकिन सिर्फ इससे कोई कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता। बेंच ने कहा कि मंदिर में सम्मान देने का मामला HR&CE एक्ट की धारा 63(e) के तहत सक्षम अधिकारी तय करेंगे। कोर्ट ने आश्रम को थोड़ी राहत देते हुए कहा कि वह चाहें तो HR&CE कानून के तहत संबंधित प्राधिकारी के पास अपनी शिकायत रख सकते हैं।  

पीएम आवास योजना के हितग्राहियों को राहत, हाईकोर्ट के आदेश से घर का सपना हो सकता है पूरा

छिन्दवाड़ा   प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत छिन्दवाड़ा में 6 साल पहले मकान बनाकर देने और फिर प्रोजेक्ट कैंसिल करने के मामले में बड़ा अपडेट है. 6 साल पहले हितग्राहियों से लाखों रुपए लेने के बाद अचानक प्रोजेक्ट कैंसिल कर देने के मामले में हाईकोर्ट के फैसले से हितग्राहियों को बड़ी राहत मिली है. 15 दिन में हितग्राही को मकान करें हैंड ओवर : हाईकोर्ट नगर निगम के पीएम हाउसिंग प्रोजेक्ट को लेकर शुरुआत से मामला सुर्खियों में रहा है. आनंद एसोसिएटस द्वारा बरती गई अनियमितता, खजरी प्रोजेक्ट में पजेशन न मिलने, ईमलीखेड़ा प्रोजेक्ट में साढ़े तीन लाख रु बढ़ाने और परतला प्रोजेक्ट को 6 साल तक काम बंद रखने के बाद अचानक प्रोजेक्ट निरस्त करने के मामले ने तूल पकड़ा था. इधर निगम प्रबंधन परतला प्रोजेक्ट को निजी या अर्धशासकीय एजेंसी को हैंडओवर करने की प्लानिंग कर रहा था, इसी बीच हाईकोर्ट द्वारा खजरी टाउनशिप में एक हितग्राही की याचिका पर अहम फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट ने निगम द्वारा जारी किए आवंटन निरस्त के आदेश को रद्द करते हुए हितग्राही को 15 दिनों के अंदर शेष राशि जमा करने के निर्देश दिए गए हैं, जिसके बाद मकान हैंड ओवर करने के आदेश दिए हैं. रेरा नियमों के विरुद्ध आवंटन निरस्त याचिकाकर्ता आरती बघेल ने बताया कि उन्होंने 24 अप्रैल 2023 को याचिका दायर की थी, जिसमें उल्लेख किया था, कि उन्हें आवंटित मकान एमआईजी 31 का आवंटन रदद कर दिया गया है. इसे चुनौती दी गई थी, जिस पर याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने बताया कि रेरा समझौते के तहत बुकिंग के समय पहली किश्त 10 प्रतिशत व कब्जे के समय दूसरी किश्त जमा करना थी. आरती ने निविदा निकलने पर आवेदन दिया व पहली किश्त के रूप में 4 लाख 30 हजार रूपए जमा किए, जिस पर उन्हें एमआईजी 31 आवंटित किया गया. इसके बाद 2 सितंबर 2022 को उन्हें डिमांड नोटिस जारी किया गया, जिसमें शेष राशि 38 लाख 70 हजार जमा करने के लिए कहा गया, जो कि रेरा समझौते के विपरीत है. राशि जमा नहीं करने पर आवंटन रदद करने की धमकी दी गई थी. इसके विपरीत मकान का निर्माण भी पूरा नहीं किया गया, इस वजह से याचिकाकर्ता ने बाकी राशि जमा नहीं की, तो उनका आवंटन 24 अप्रैल 2023 को मनमाने तरीके से रद्द कर दिया गया. याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने रेरा के समझौते के तहत पूर्व में निर्धारित शर्तों को बदलने पर सवाल उठाए, जिसके बाद याचिकाकर्ता को निर्देश दिए गए कि वह शेष राशि को इस आदेश से 15 दिनों की अवधि के अंदर जमा करे और नगर निगम 15 दिनों में उसे मकान दे. इस मामले में नगर निगम कमिश्नर चंद्रप्रकाश राय ने बताया, ''अभी कोर्ट के ऐसे किसी भी आदेश की जानकारी नहीं मिली है. कोर्ट ने अगर फैसला सुनाया है और हमें आदेशित किया जाता है तो कोर्ट के फैसले के अनुसार नगर निगम के एडवोकेट से सलाह लेंगे और उसके बाद ही आगे कुछ कह सकेंगे.'' परतला हितग्राहियों को भी मिला आधार हाईकोर्ट का फैसला पूरे प्रदेश में स्वाभाविक रूप से लागू होता है. ऐसे में परतला हितग्राहियों द्वारा भी शुरुआत में बुकिंग राशि जमा की थी, ऐसे में प्रोजेक्ट पूरा नहीं होने पर व मकान का आवंटन किए जाने के बाद हैंडओवर नहीं किए जाने पर यह फैसला एक बड़ा आधार बन सकता है, जिससे एक बार फिर परतला प्रोजेक्ट में हितग्राहियों को अपना मकान मिलने की उम्मीद नजर आ रही है इमलीखेड़ा,परतला और खजरी में पीएम आवास योजना 2019 में नगर निगम छिंदवाड़ा में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अफॉर्डेबल हाउस सरकारी जमीन पर बनाकर बेचने के लिए टेंडर निकाले थे, जिसमें इमलीखेड़ा में 78 खजरी में 43 और परतला में 23 ड्यूप्लेक्स मकान बनाकर पहले आओ पहले पाओ की योजना के तहत बेच दिए गए थे. इमलीखेड़ा और खजरी प्रोजेक्ट अभी भी अधूरे पड़े हैं लेकिन परतला प्रोजेक्ट को नगर निगम की अनुशंसा पर सरकार ने निरस्त कर दिया है.

मोबाइल विवाद पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पत्नी की अपील नामंजूर, तलाक पर लगी मुहर

जबलपुर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने हाल ही में अपने एक फैसले में एक आदमी को उसकी पत्नी से दी गई तलाक को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता का मोबाइल तोड़ना स्वाभाविक प्रतीत होता है। कोई भी आदमी अपनी पत्नी को व्यभिचार जारी रखते देखना पसंद नहीं करेगा। इसलिए पति ने गुस्से में आकर पत्नी का प्रेमी से संपर्क तोड़ने के लिए उसका मोबाइल तोड़ दिया।   बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कथित व्यभिचार को दर्शाने वाली मोबाइल फोन की तस्वीरों के आधार पर दी गई तलाक को बरकरार रखा। कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी के तहत प्रमाण पत्र पर जोर नहीं दिया। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों को सबूत के रूप में स्वीकार्यता से संबंधित है। किसी इलेक्ट्रानिक उपकरण से प्राप्त साक्ष्य को वैध माने जाने के लिए धारा 65बी का प्रमाण पत्र पेश करना जरूरी है। हाई कोर्ट के जस्टिस विशाल धागत और जस्टिस बीपी शर्मा की पीठ ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम वैवाहिक मामलों पर सख्ती से लागू नहीं होता है क्योंकि फैमिली कोर्ट को किसी भी प्रकार का साक्ष्य स्वीकार करने की अनुमति है। हाई कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट अधिनियम की धारा 14 के अनुसार, फैमिली कोर्ट किसी भी रिपोर्ट, बयान, दस्तावेज, सूचना या मामले को साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर सकता है, जो उसके विचार से किसी विवाद से प्रभावी ढंग से निपटने में सहायक हो। चाहे वह भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के तहत प्रासंगिक या स्वीकार्य हो या न हो। भारतीय साक्ष्य अधिनियम वैवाहिक मामलों में सख्ती से लागू नहीं होता है और कोर्ट को सत्य का पता लगाने के लिए किसी भी रिपोर्ट, बयान, दस्तावेज को साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने का अधिकार दिया गया है। अतः कोर्ट को उक्त तस्वीरों पर भरोसा करते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले में कोई गलती नहीं दिखती है। तलाक के फैसले के खिलाफ अपील करने वाली पत्नी ने तर्क दिया था कि कथित तस्वीरें किसी दूसरे मोबाइल से ली गई थीं क्योंकि पति ने उसका मोबाइल फोन तोड़ दिया था। कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि पत्नी ने तस्वीरों में अपनी मौजूदगी से इनकार नहीं किया था, बल्कि सिर्फ इतना कहा था कि तस्वीरें फर्जी हैं। कोर्ट ने कहा कि केवल इतना कहा गया है कि ये तस्वीरें किसी चालबाजी का उपयोग करके बनाई गई हैं। इन फर्जी तस्वीरों को किसने और कैसे बनाया है, इसका जिक्र नहीं किया गया है। इन तस्वीरों को लेकर टकराव से बचने के लिए केवल एक सामान्य बयान दिया गया है। पत्नी की इस दलील पर कि प्राथमिक उपकरण (पहला मोबाइल) उपलब्ध नहीं था, कोर्ट ने कहा कि पति ने तस्वीरों को अपने फोन में ट्रांसफर करने के बाद गुस्से में आकर उसे तोड़ दिया था। कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता ने अपने बयान में कहा था कि तस्वीरें उसके मोबाइल से पति के मोबाइल में ट्रांसफर की गई थीं, जिसके बाद पति ने उसका मोबाइल तोड़ दिया। कोर्ट ने कहा कि पति का मोबाइल तोड़ना स्वाभाविक प्रतीत होता है। पति के मोबाइल फोन में पत्नी के व्यभिचार के सबूत थे। उसने वे तस्वीरें अपने मोबाइल में ट्रांसफर कर लीं। कोई भी आदमी अपनी पत्नी को व्यभिचार जारी रखते देखना पसंद नहीं करेगा। इसलिए पति ने गुस्से में आकर और पत्नी का प्रेमी से संपर्क तोड़ने के लिए उसका मोबाइल तोड़ दिया। रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों, पत्नी की स्वीकारोक्ति और तस्वीरें तैयार करने वाले व्यक्ति के साक्ष्यों पर विचार करते हुए कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ पत्नी की अपील में कोई दम नहीं है। कोर्ट ने पत्नी द्वारा दायर अपील खारिज कर दी।  

स्वास्थ्य आपातकाल में भी महंगा टैक्स! एयर प्यूरिफायर पर 18% GST पर HC की कड़ी टिप्पणी

नई दिल्ली  दिल्ली में प्रदूषण संकट के बीच हाई कोर्ट ने एयर प्यूरिफायर पर टैक्स कटौती के पक्ष में रुख जाहिर करते हुए केंद्र सरकार से पूछा कि क्यों एयर इमरजेंसी के दौरान भी 18 पर्सेंट टैक्स लग रहा है? अदालत ने केंद्र सरकार को यह भी बताने को कहा है कि क्यों तुरंत टैक्स में कटौती नहीं की जा सकती है। हाई कोर्ट ने प्रदूषण की वजह से आम लोगों को ही रही समस्याओं की ओर ध्यान खींचते हुए कहा, ‘हम एक दिन में 21 हजार बार सांस लेते हैं। नुकसान की गणना कीजिए।’ चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तुषार राव गेडेला की बेंच एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें एयर प्यूरिफायर को मेडिकल डिवाइस की श्रेणी में रखने की मांग की गई है जिससे यह 5 फीसदी जीएसटी स्लैब के दायरे में आ जाएगा। इस पर जवाब के लिए केंद्र सरकार से और समय की मांग किए जाने पर बेंच ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, ‘यह उचित समय क्या होता है? जब हजारों लोग मर जाएंगे? इस शहर के हर व्यक्ति को साफ हवा की आवश्यकता है और आप यह भी नहीं दे सकते हैं। कम से कम आप इतना कर सकते हैं कि एयर प्यूरिफायर तक उनकी पहुंच हो।’ अदालत ने कहा- तुरंत सरकार से पूछकर बताएं प्रस्ताव जजों ने तात्कालिक राहत की संभावनाओं पर भी सवाल किए। अदालत ने कहा, 'इस आपातकालीन स्थिति में आप राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत अस्थायी कदम के तौर पर इसमें छूट क्यों नहीं दे सकते हैं।' बेंच ने सरकारी वकील से इस पर निर्देश लेने और प्रस्ताव को अदात में 2.30 के बाद रखने को कहा। पीआईएल को अधिवक्ता कपिल मदान ने दायर की और अदालत से आग्रह किया है कि केंद्र सरकार को एयर प्यूरिफायर को मेडिकल डिवाइस का दर्जा देने का निर्देश दिया जाए। एयर प्यूरिफायर पर मौजूदा समय में 18 पर्सेंट जीएसटी लगाया जाता है।