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पीएम आवास योजना के हितग्राहियों को राहत, हाईकोर्ट के आदेश से घर का सपना हो सकता है पूरा

छिन्दवाड़ा   प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत छिन्दवाड़ा में 6 साल पहले मकान बनाकर देने और फिर प्रोजेक्ट कैंसिल करने के मामले में बड़ा अपडेट है. 6 साल पहले हितग्राहियों से लाखों रुपए लेने के बाद अचानक प्रोजेक्ट कैंसिल कर देने के मामले में हाईकोर्ट के फैसले से हितग्राहियों को बड़ी राहत मिली है. 15 दिन में हितग्राही को मकान करें हैंड ओवर : हाईकोर्ट नगर निगम के पीएम हाउसिंग प्रोजेक्ट को लेकर शुरुआत से मामला सुर्खियों में रहा है. आनंद एसोसिएटस द्वारा बरती गई अनियमितता, खजरी प्रोजेक्ट में पजेशन न मिलने, ईमलीखेड़ा प्रोजेक्ट में साढ़े तीन लाख रु बढ़ाने और परतला प्रोजेक्ट को 6 साल तक काम बंद रखने के बाद अचानक प्रोजेक्ट निरस्त करने के मामले ने तूल पकड़ा था. इधर निगम प्रबंधन परतला प्रोजेक्ट को निजी या अर्धशासकीय एजेंसी को हैंडओवर करने की प्लानिंग कर रहा था, इसी बीच हाईकोर्ट द्वारा खजरी टाउनशिप में एक हितग्राही की याचिका पर अहम फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट ने निगम द्वारा जारी किए आवंटन निरस्त के आदेश को रद्द करते हुए हितग्राही को 15 दिनों के अंदर शेष राशि जमा करने के निर्देश दिए गए हैं, जिसके बाद मकान हैंड ओवर करने के आदेश दिए हैं. रेरा नियमों के विरुद्ध आवंटन निरस्त याचिकाकर्ता आरती बघेल ने बताया कि उन्होंने 24 अप्रैल 2023 को याचिका दायर की थी, जिसमें उल्लेख किया था, कि उन्हें आवंटित मकान एमआईजी 31 का आवंटन रदद कर दिया गया है. इसे चुनौती दी गई थी, जिस पर याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने बताया कि रेरा समझौते के तहत बुकिंग के समय पहली किश्त 10 प्रतिशत व कब्जे के समय दूसरी किश्त जमा करना थी. आरती ने निविदा निकलने पर आवेदन दिया व पहली किश्त के रूप में 4 लाख 30 हजार रूपए जमा किए, जिस पर उन्हें एमआईजी 31 आवंटित किया गया. इसके बाद 2 सितंबर 2022 को उन्हें डिमांड नोटिस जारी किया गया, जिसमें शेष राशि 38 लाख 70 हजार जमा करने के लिए कहा गया, जो कि रेरा समझौते के विपरीत है. राशि जमा नहीं करने पर आवंटन रदद करने की धमकी दी गई थी. इसके विपरीत मकान का निर्माण भी पूरा नहीं किया गया, इस वजह से याचिकाकर्ता ने बाकी राशि जमा नहीं की, तो उनका आवंटन 24 अप्रैल 2023 को मनमाने तरीके से रद्द कर दिया गया. याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने रेरा के समझौते के तहत पूर्व में निर्धारित शर्तों को बदलने पर सवाल उठाए, जिसके बाद याचिकाकर्ता को निर्देश दिए गए कि वह शेष राशि को इस आदेश से 15 दिनों की अवधि के अंदर जमा करे और नगर निगम 15 दिनों में उसे मकान दे. इस मामले में नगर निगम कमिश्नर चंद्रप्रकाश राय ने बताया, ''अभी कोर्ट के ऐसे किसी भी आदेश की जानकारी नहीं मिली है. कोर्ट ने अगर फैसला सुनाया है और हमें आदेशित किया जाता है तो कोर्ट के फैसले के अनुसार नगर निगम के एडवोकेट से सलाह लेंगे और उसके बाद ही आगे कुछ कह सकेंगे.'' परतला हितग्राहियों को भी मिला आधार हाईकोर्ट का फैसला पूरे प्रदेश में स्वाभाविक रूप से लागू होता है. ऐसे में परतला हितग्राहियों द्वारा भी शुरुआत में बुकिंग राशि जमा की थी, ऐसे में प्रोजेक्ट पूरा नहीं होने पर व मकान का आवंटन किए जाने के बाद हैंडओवर नहीं किए जाने पर यह फैसला एक बड़ा आधार बन सकता है, जिससे एक बार फिर परतला प्रोजेक्ट में हितग्राहियों को अपना मकान मिलने की उम्मीद नजर आ रही है इमलीखेड़ा,परतला और खजरी में पीएम आवास योजना 2019 में नगर निगम छिंदवाड़ा में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अफॉर्डेबल हाउस सरकारी जमीन पर बनाकर बेचने के लिए टेंडर निकाले थे, जिसमें इमलीखेड़ा में 78 खजरी में 43 और परतला में 23 ड्यूप्लेक्स मकान बनाकर पहले आओ पहले पाओ की योजना के तहत बेच दिए गए थे. इमलीखेड़ा और खजरी प्रोजेक्ट अभी भी अधूरे पड़े हैं लेकिन परतला प्रोजेक्ट को नगर निगम की अनुशंसा पर सरकार ने निरस्त कर दिया है.

मोबाइल विवाद पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पत्नी की अपील नामंजूर, तलाक पर लगी मुहर

जबलपुर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने हाल ही में अपने एक फैसले में एक आदमी को उसकी पत्नी से दी गई तलाक को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता का मोबाइल तोड़ना स्वाभाविक प्रतीत होता है। कोई भी आदमी अपनी पत्नी को व्यभिचार जारी रखते देखना पसंद नहीं करेगा। इसलिए पति ने गुस्से में आकर पत्नी का प्रेमी से संपर्क तोड़ने के लिए उसका मोबाइल तोड़ दिया।   बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कथित व्यभिचार को दर्शाने वाली मोबाइल फोन की तस्वीरों के आधार पर दी गई तलाक को बरकरार रखा। कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी के तहत प्रमाण पत्र पर जोर नहीं दिया। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों को सबूत के रूप में स्वीकार्यता से संबंधित है। किसी इलेक्ट्रानिक उपकरण से प्राप्त साक्ष्य को वैध माने जाने के लिए धारा 65बी का प्रमाण पत्र पेश करना जरूरी है। हाई कोर्ट के जस्टिस विशाल धागत और जस्टिस बीपी शर्मा की पीठ ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम वैवाहिक मामलों पर सख्ती से लागू नहीं होता है क्योंकि फैमिली कोर्ट को किसी भी प्रकार का साक्ष्य स्वीकार करने की अनुमति है। हाई कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट अधिनियम की धारा 14 के अनुसार, फैमिली कोर्ट किसी भी रिपोर्ट, बयान, दस्तावेज, सूचना या मामले को साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर सकता है, जो उसके विचार से किसी विवाद से प्रभावी ढंग से निपटने में सहायक हो। चाहे वह भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के तहत प्रासंगिक या स्वीकार्य हो या न हो। भारतीय साक्ष्य अधिनियम वैवाहिक मामलों में सख्ती से लागू नहीं होता है और कोर्ट को सत्य का पता लगाने के लिए किसी भी रिपोर्ट, बयान, दस्तावेज को साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने का अधिकार दिया गया है। अतः कोर्ट को उक्त तस्वीरों पर भरोसा करते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले में कोई गलती नहीं दिखती है। तलाक के फैसले के खिलाफ अपील करने वाली पत्नी ने तर्क दिया था कि कथित तस्वीरें किसी दूसरे मोबाइल से ली गई थीं क्योंकि पति ने उसका मोबाइल फोन तोड़ दिया था। कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि पत्नी ने तस्वीरों में अपनी मौजूदगी से इनकार नहीं किया था, बल्कि सिर्फ इतना कहा था कि तस्वीरें फर्जी हैं। कोर्ट ने कहा कि केवल इतना कहा गया है कि ये तस्वीरें किसी चालबाजी का उपयोग करके बनाई गई हैं। इन फर्जी तस्वीरों को किसने और कैसे बनाया है, इसका जिक्र नहीं किया गया है। इन तस्वीरों को लेकर टकराव से बचने के लिए केवल एक सामान्य बयान दिया गया है। पत्नी की इस दलील पर कि प्राथमिक उपकरण (पहला मोबाइल) उपलब्ध नहीं था, कोर्ट ने कहा कि पति ने तस्वीरों को अपने फोन में ट्रांसफर करने के बाद गुस्से में आकर उसे तोड़ दिया था। कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता ने अपने बयान में कहा था कि तस्वीरें उसके मोबाइल से पति के मोबाइल में ट्रांसफर की गई थीं, जिसके बाद पति ने उसका मोबाइल तोड़ दिया। कोर्ट ने कहा कि पति का मोबाइल तोड़ना स्वाभाविक प्रतीत होता है। पति के मोबाइल फोन में पत्नी के व्यभिचार के सबूत थे। उसने वे तस्वीरें अपने मोबाइल में ट्रांसफर कर लीं। कोई भी आदमी अपनी पत्नी को व्यभिचार जारी रखते देखना पसंद नहीं करेगा। इसलिए पति ने गुस्से में आकर और पत्नी का प्रेमी से संपर्क तोड़ने के लिए उसका मोबाइल तोड़ दिया। रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों, पत्नी की स्वीकारोक्ति और तस्वीरें तैयार करने वाले व्यक्ति के साक्ष्यों पर विचार करते हुए कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ पत्नी की अपील में कोई दम नहीं है। कोर्ट ने पत्नी द्वारा दायर अपील खारिज कर दी।  

स्वास्थ्य आपातकाल में भी महंगा टैक्स! एयर प्यूरिफायर पर 18% GST पर HC की कड़ी टिप्पणी

नई दिल्ली  दिल्ली में प्रदूषण संकट के बीच हाई कोर्ट ने एयर प्यूरिफायर पर टैक्स कटौती के पक्ष में रुख जाहिर करते हुए केंद्र सरकार से पूछा कि क्यों एयर इमरजेंसी के दौरान भी 18 पर्सेंट टैक्स लग रहा है? अदालत ने केंद्र सरकार को यह भी बताने को कहा है कि क्यों तुरंत टैक्स में कटौती नहीं की जा सकती है। हाई कोर्ट ने प्रदूषण की वजह से आम लोगों को ही रही समस्याओं की ओर ध्यान खींचते हुए कहा, ‘हम एक दिन में 21 हजार बार सांस लेते हैं। नुकसान की गणना कीजिए।’ चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तुषार राव गेडेला की बेंच एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें एयर प्यूरिफायर को मेडिकल डिवाइस की श्रेणी में रखने की मांग की गई है जिससे यह 5 फीसदी जीएसटी स्लैब के दायरे में आ जाएगा। इस पर जवाब के लिए केंद्र सरकार से और समय की मांग किए जाने पर बेंच ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, ‘यह उचित समय क्या होता है? जब हजारों लोग मर जाएंगे? इस शहर के हर व्यक्ति को साफ हवा की आवश्यकता है और आप यह भी नहीं दे सकते हैं। कम से कम आप इतना कर सकते हैं कि एयर प्यूरिफायर तक उनकी पहुंच हो।’ अदालत ने कहा- तुरंत सरकार से पूछकर बताएं प्रस्ताव जजों ने तात्कालिक राहत की संभावनाओं पर भी सवाल किए। अदालत ने कहा, 'इस आपातकालीन स्थिति में आप राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत अस्थायी कदम के तौर पर इसमें छूट क्यों नहीं दे सकते हैं।' बेंच ने सरकारी वकील से इस पर निर्देश लेने और प्रस्ताव को अदात में 2.30 के बाद रखने को कहा। पीआईएल को अधिवक्ता कपिल मदान ने दायर की और अदालत से आग्रह किया है कि केंद्र सरकार को एयर प्यूरिफायर को मेडिकल डिवाइस का दर्जा देने का निर्देश दिया जाए। एयर प्यूरिफायर पर मौजूदा समय में 18 पर्सेंट जीएसटी लगाया जाता है।  

संवेदनशील फैसला: छुट्टी के बावजूद हाईकोर्ट की सुनवाई, रेप पीड़िता के 25 सप्ताह के गर्भपात को मंजूरी

बिलासपुर रेप पीड़िता नाबालिग किशोरी के गर्भपात को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए महत्वपूर्ण फैसला दिया है। शीतकालीन अवकाश के दौरान भी हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने विशेष सुनवाई करते हुए पीड़िता को गर्भपात की अनुमति प्रदान की। जस्टिस पी.पी. साहू ने इस मामले की सुनवाई करते हुए मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर रायपुर स्थित डॉ. भीमराव अंबेडकर मेमोरियल अस्पताल (मेकाहारा) एवं पं. जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज को निर्देश दिए हैं कि विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में गर्भपात कराया जाए और भ्रूण का डीएनए सुरक्षित रखा जाए। मामला रायपुर जिले की 16 वर्षीय नाबालिग किशोरी से जुड़ा है, जिसे आरोपी युवक ने प्रेमजाल में फंसाकर शादी का झांसा दिया और उसके साथ दुष्कर्म किया। परिजनों को तब संदेह हुआ जब किशोरी के पेट का आकार बढ़ने लगा। पूछताछ में किशोरी ने आपबीती बताई, जिसके बाद परिजन उसे चिकित्सक के पास लेकर गए। मेडिकल जांच में सामने आया कि किशोरी लगभग छह माह (करीब 25 सप्ताह) की गर्भवती है। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए पीड़िता ने अपने परिजनों के माध्यम से हाईकोर्ट में गर्भपात की अनुमति के लिए याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट ने 19 दिसंबर को डॉ. भीमराव अंबेडकर अस्पताल और जेएनएम मेडिकल कॉलेज को नोटिस जारी कर मेडिकल बोर्ड गठित कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि गर्भपात से पीड़िता को कोई गंभीर चिकित्सकीय जोखिम नहीं है। मेडिकल रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए हाईकोर्ट ने शीतकालीन अवकाश के बावजूद विशेष पीठ का गठन कर सुनवाई की। जस्टिस पी.पी. साहू ने याचिका स्वीकार करते हुए गर्भपात की अनुमति प्रदान की। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि दुष्कर्म पीड़िता को यह अधिकार और स्वतंत्रता मिलनी चाहिए कि वह स्वयं यह निर्णय ले सके कि वह गर्भावस्था जारी रखना चाहती है या उसे समाप्त करना चाहती है। भ्रूण का डीएनए सुरक्षित रखने के भी दिए निर्देश हाईकोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि पीड़िता और उसके परिजन अस्पताल अधीक्षक, स्त्री रोग विशेषज्ञ एवं संबंधित मेडिकल कॉलेज प्रशासन से समन्वय स्थापित कर सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूर्ण करें। गर्भपात की प्रक्रिया मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) एक्ट, 1971 के प्रावधानों के तहत, दो पंजीकृत चिकित्सकों और विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में कराई जाएगी। साथ ही, भविष्य में साक्ष्य के रूप में उपयोग के लिए भ्रूण का डीएनए सुरक्षित रखने के भी निर्देश दिए गए हैं। हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल कानूनन अहम है, बल्कि दुष्कर्म पीड़िताओं के अधिकार, गरिमा और मानसिक-शारीरिक सुरक्षा की दिशा में एक संवेदनशील और मानवीय पहल के रूप में देखा जा रहा है।

हाईकोर्ट के आदेश पर पुलिस सुरक्षा में पत्नी को पति के घर भेजा, मायके वालों से मुक्त कराया

जबलपुर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महिला को उसके परिवार से सुरक्षा देते हुए पति के घर पहुंचाने का आदेश दिया है। यह फैसला छिंदवाड़ा की एक महिला के मामले में आया, जिसने अपने पति के साथ रहने की इच्छा जताई लेकिन परिवार के हस्तक्षेप का डर भी जताया। उसके पति ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर कहा था कि उसकी पत्नी को बंधक बनाया गया है। महिला को कोर्ट में पेश करने के आदेश जस्टिस विवेक अग्रवाल और राम कुमार चौबे की बेंच ने महिला को कोर्ट में पेश करने के बाद यह आदेश दिया। महिला ने कहा कि वह अपने पति के साथ रहना चाहती है, लेकिन उसे डर है कि उसके परिवार वाले उनकी जिंदगी में 'अनुचित और अवैध हस्तक्षेप' कर सकते हैं। इसलिए उसने पुलिस सुरक्षा मांगी। कोर्ट ने पुलिस को दिए निर्देश कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया कि वे महिला को सुरक्षित रूप से उसके पति के घर, जो कि सीहोर जिले में है, पहुंचाएं। साथ ही, सीहोर के एसपी को जोड़े की सुरक्षा का जायजा लेने और उन्हें पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराने का भी आदेश दिया। कोर्ट ने अपने संक्षिप्त आदेश में कहा, 'महिला की दलीलों को सुनने और यह संतुष्ट होने के बाद कि वह वयस्क है, जैसा कि याचिकाकर्ता द्वारा पेश किए गए दस्तावेजी सबूतों से पुष्टि होती है, हम पुलिस कर्मियों से अनुरोध करते हैं जिन्होंने बंदी को लाया है, उसे सुरक्षित हिरासत में याचिकाकर्ता के घर ले जाएं, क्योंकि शादी विधिवत पंजीकृत है और वे विधिवत विवाहित पति-पत्नी हैं।' एसपी को दिए आदेश कोर्ट ने आगे कहा, 'हम सीहोर के अधीक्षक पुलिस से भी अनुरोध करते हैं कि वे खतरे की आशंका का परीक्षण करें और उचित सुरक्षा प्रदान करें और सीहोर के संबंधित पुलिस स्टेशन बारघाट को निर्देश दें कि जब भी याचिकाकर्ता या बंदी किसी अनुचित घटना की रिपोर्ट करें, तो पुलिस स्टेशन बारघाट, सीहोर को उचित संवेदनशीलता दिखानी चाहिए और उनके मामले को सहानुभूतिपूर्वक निपटाना चाहिए।'

सरकार को झारखंड HC का आदेश, अब मांस खुले में नहीं बिकेगा

रांची  झारखंड उच्च न्यायालय ने बीते शुक्रवार को राज्य सरकार को केंद्र द्वारा बनाए गए खाद्य सुरक्षा नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने और खुले में मांस की बिक्री को रोकने का निर्देश दिया। खुले में मांस की बिक्री पर झारखंड HC सख्त मुख्य न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की पीठ श्यामानंद पांडे द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने न्यायालय को बताया कि खुले में बकरियों व मुर्गियों को काटा जाता और उनके शवों को दुकानों में लटका दिया जाता है, जो राह चलते हुए लोगों को दिखाई देते हैं। पीठ ने खुले में मांस की बिक्री पर नाराजगी व्यक्त की और राज्य सरकार तथा रांची नगर निगम को इस संबंध में तत्काल कदम उठाने का निर्देश दिया। अदालत ने सरकार को केंद्र द्वारा बनाए गए खाद्य सुरक्षा नियमों को सख्ती से लागू करने का भी निर्देश दिया।  

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट: पति ने 2 साल तक खर्च नहीं दिया तो मुस्लिम महिला ले सकती है तलाक

 बिलासपुर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मुस्लिम कानून के तहत दिए गए एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि पति लगातार दो वर्ष तक पत्नी को भरण-पोषण नहीं देता है, तो पत्नी को तलाक लेने का कानूनी अधिकार है। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा पारित तलाक की डिक्री को सही ठहराते हुए पति की याचिका खारिज कर दी। हालांकि, पत्नी द्वारा लगाए गए क्रूरता के आरोप को कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया। यह मामला झारखंड के बोकारो जिले की एक मुस्लिम महिला से जुड़ा है, जिसका निकाह छत्तीसगढ़ निवासी व्यक्ति से 30 सितंबर 2015 को मुस्लिम रीति-रिवाज से हुआ था। निकाह के 15 दिन बाद ही दंपती के बीच विवाद शुरू हो गया। इसके बाद पत्नी मायके चली गई और तब से वहीं रह रही है। इस दौरान पति-पत्नी के बीच अलगाव बना रहा। पत्नी ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि पति ने मई 2016 से अब तक उसे कोई भरण-पोषण नहीं दिया। मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 की धारा 2(II) के तहत दो वर्ष तक भरण-पोषण न देना तलाक का वैध आधार है। फैमिली कोर्ट ने दस्तावेजों के आधार पर पत्नी की याचिका स्वीकार करते हुए तलाक की डिक्री पारित कर दी। इस फैसले को पति ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन डिवीजन बेंच ने तलाक के आधार को सही मानते हुए याचिका खारिज कर दी। भरण-पोषण न देना बना तलाक का आधार हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम कानून में पत्नी का भरण-पोषण पति की कानूनी जिम्मेदारी है। यदि पति लगातार दो वर्ष तक यह जिम्मेदारी नहीं निभाता, तो पत्नी को तलाक मांगने का अधिकार है, चाहे वह पति से अलग रह रही हो। कोर्ट ने पाया कि लगभग आठ वर्षों तक पति ने कोई भरण-पोषण नहीं दिया, जो कानूनन गंभीर चूक है। क्रूरता के आरोप से राहत कोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी द्वारा लगाए गए क्रूरता के आरोप पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में साबित नहीं हो सके। इससे पहले ट्रायल कोर्ट भी पति और उसके स्वजन को आईपीसी की धारा 498ए सहित अन्य धाराओं में बरी कर चुका था। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने क्रूरता के आरोप को खारिज करते हुए पति को इस बिंदु पर राहत दी, लेकिन तलाक की डिक्री को बरकरार रखा।

हाईकोर्ट की चेतावनी के बाद प्रशासन ने अवैध ढाबे पर चलाया बुलडोजर

मुंगेली बिलासपुर–रायपुर नेशनल हाईवे पर मुंगेली जिले में सरगांव के समीप संचालित अवैध ढाबे के विरुद्ध प्रशासन द्वारा सख्त कार्रवाई की गई. आमजन की सुरक्षा एवं सड़क दुर्घटनाओं की रोकथाम को ध्यान में रखते हुए यह कार्रवाई की गई है. प्राप्त जानकारी के अनुसार, शासकीय भूमि पर अवैध निर्माण कर वहां पर बरमदेव ढाबा का संचालन किया जा रहा था. न्यायालय तहसीलदार सरगांव के द्वारा अवैध अतिक्रमण हटाने का आदेश पारित किया गया था बेजा कब्जा नहीं हटाने के कारण ढाबा संचालक के विरुद्ध बेदखली नोटिस जारी किया गया था. नोटिस जारी करने के उपरांत भी ढाबा नहीं हटाए जाने पर प्रशासन द्वारा यह कार्रवाई की गई है. उल्लेखनीय है कि बिलासपुर–रायपुर नेशनल हाईवे के किनारे सरगांव क्षेत्र में ढाबा एवं शराब दुकान के संचालन से सड़क दुर्घटनाओं की आशंका को देखते हुए उच्च न्यायालय ने भी संज्ञान लिया. इसके पश्चात प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए पथरिया एसडीएम रेखा चंद्रा, तहसीलदार अतुल वैष्णव एवं राजस्व अमले की उपस्थिति में मौके पर पहुंचकर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की. प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि आम नागरिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और भविष्य में भी इस प्रकार के अवैध अतिक्रमण के विरुद्ध सख्त कदम उठाए जाएंगे.इसके साथ ही दुर्घटनाओं की रोकथाम हेतु संबंधित सड़क मार्ग पर ब्लैक स्पॉट का चिन्हांकन, रंबल स्ट्रिप, रोड डिमार्केशन,हाई रेजोल्यूशन कैमरा सहित अन्य आवश्यक यातायात सुरक्षा व्यवस्थाएं भी सुनिश्चित की गई हैं.

महत्वपूर्ण निर्णय: पत्नी का तलाक का हक सुरक्षित, मायके में रहने से प्रभावित नहीं होगा

बिलासपुर हाईकोर्ट ने मुस्लिम विवाह कानून से जुड़े एक मामले में अहम फैसला दिया है. कोर्ट ने साफ कहा है कि यदि पति लगातार दो वर्षों तक पत्नी का भरण-पोषण नहीं करता है, तो पत्नी को तलाक का अधिकार मिलेगा, भले ही वह अपने मायके में ही क्यों न रह रही हो. हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने यह टिप्पणी करते हुए फैमिली कोर्ट के तलाक आदेश को आंशिक रूप से सही ठहराया है. दरअसल, यह मामला कोरिया जिले के मनेंद्रगढ़ का है, जहां 30 सितंबर 2015 को मुस्लिम रीति-रिवाज से शादी हुई थी. विवाह के बाद पत्नी केवल 15 दिन ससुराल में रही और पारिवारिक विवाद के चलते मई 2016 से मायके में रहने लगी. पत्नी का आरोप था कि पति ने उसके नाम की 10 लाख रुपए की एफडी तुड़वाने का दबाव बनाया, जिसके बाद उसने घरेलू हिंसा, 498-ए और भरण-पोषण से जुड़े मामले दर्ज कराए फैमिली कोर्ट ने इन तथ्यों के आधार पर विवाह विच्छेद का आदेश दिया था. हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 की धारा 2(ii) में कहीं भी यह शर्त नहीं है कि पत्नी पति के साथ ही रह रही हो. कोर्ट ने रिकॉर्ड के आधार पर माना कि वर्ष 2016 से करीब आठ वर्षों तक पत्नी को कोई भरण-पोषण नहीं दिया गया, जो तलाक के लिए पर्याप्त आधार है. हालांकि, कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस निष्कर्ष को पलट दिया जिसमें पति पर पत्नी की संपत्ति हड़पने या उसके कानूनी अधिकारों में बाधा डालने का आरोप स्वीकार किया गया था. हाईकोर्ट ने कहा कि केवल एफडी तुड़वाने की मांग का आरोप पर्याप्त नहीं है, जब तक यह साबित न हो कि वास्तव में पत्नी की संपत्ति का दुरुपयोग किया गया. अंत में हाईकोर्ट ने भरण-पोषण न देने के आधार पर तलाक के आदेश को बरकरार रखते हुए संदेश दिया कि मुस्लिम महिलाओं के भरण-पोषण के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती.

कफ सिरप केस पर बहस खत्म, हाईकोर्ट ने निर्णय सुरक्षित रखा, आरोपियों की याचिका—मामला हो रद्द

प्रयागराज प्रदेश के चर्चित कफ सिरप मामले में दर्ज एफआईआर को खारिज करने की मांग वाली अर्जी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित किया है। शुक्रवार को हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई हुई। कोर्ट ने दोनों तरफ के वकीलों की दलील सुनने के बाद फैसला रिजर्व कर लिया है। वाराणसी के शुभम जायसवाल सहित 40 आरोपियों ने अपने खिलाफ प्रदेश के विभिन्न जिलों में दर्ज केस को रद्द करने और गिरफ्तारी पर रोक लगाने के लिए याचिका दायर की है। हाईकोर्ट ने फिलहाल आरोपियों की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा रखी है। कोडीनयुक्त कफ सिरप कांड की जांच में यूपी एसटीएफ ने लखनऊ आलम बाग के पास से सहारनपुर से दो अभियुक्त अभिषेक शर्मा और शुभम शर्मा को गिरफ्तार किया था। पूछताछ में 25 हजार रुपये के इनामी शुभम जायसवाल का पूरा नेटवर्क सामने आया है। दोनों ने एसटीएफ को बताया कि दोनों विशाल और विभोर राणा के लिए काम करते थे। विशाल और विभोर का शुभम जायसवाल के साथ व्यापारिक संबंध था। तीनों मिलकर कोडीनयुक्त कफ सिरप की तस्करी करते थे। माल वाराणसी, लखनऊ, कानपुर, गोरखपुर और आगरा समेत अन्य जगहों से फर्जी ई वे बिल बनाकर बंगाल के अलावा अन्य जगहों पर भेजा जाता था। विशाल और विभोर के नेटवर्क के जरिये सिरप देश के कई राज्यों में पहुंचाया जाता था। इसी बीच शुभम ने अपने पिता भोला जायसवाल के नाम पर रांची में एबॉट कंपनी की सुपर स्टॉकिस्ट हासिल कर ली और इन दोनों से किनारा कर लिया। इसके बाद लाइसेंस और दस्तावेज की आड़ में वह बड़े पैमाने पर कफ सिरप की सप्लाई को कानूनी शिपमेंट की तरह दिखाता था। सुपर सुपर स्टॉकिस्ट के बाद शुभम की सप्लाई चेन पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गई थी। सहारनपुर में पकड़े गए दोनों अभियुक्तों ने पूछताछ में बताया कि सिरप की कई खेप रांची से सीधे यूपी और हरियाणा रूट पर भेजी भेजी गई। गाजियाबाद में कोडीन सिरप का बनाया था गोदाम ड्रग विभाग की जांच में सामने आया है कि शुभम ने अपनी फर्म शैली ट्रेडर्स के नाम पर हिमाचल की फर्म से सिरप मंगाने के बाद उसे गाजियाबाद के गोदाम में रखता था। फर्जी फर्मों के कागज तैयार कर उसे आगरा, लखनऊ और वाराणसी तक सप्लाई करता था। वाराणसी से कोडीन सिरप की बड़ी खेप सोनभद्र के रास्ते झारखंड और पश्चिम बंगाल जाती थी। इसके बाद बांग्लादेश और नेपाल तक जाती थी।