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डराने वाले आंकड़े: MP में HIV संक्रमण तेजी से बढ़ा, मां से बच्चों तक पहुंच रहा खतरा

इंदौर.  मध्य प्रदेश में एचआईवी संक्रमण को लेकर सामने आए ताजा आंकड़ों ने स्वास्थ्य तंत्र की चिंता बढ़ा दी है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस समय संक्रमण दर लगातार बढ़ रही है, उसी समय जांचों की संख्या में कमी क्यों आ रही है. इंदौर जैसे बड़े शहर में वर्ष 2022 में जहां करीब 1.47 लाख लोगों की एचआईवी जांच की गई थी, वहीं अब यह संख्या घटकर लगभग 85 हजार रह गई है. इसके बावजूद पॉजिटिव मरीजों की संख्या 492 से बढ़कर 615 तक पहुंच गई है. संक्रमण दर भी 0.33 प्रतिशत से बढ़कर 0.72 प्रतिशत हो गई है. यानी कम जांच के बावजूद ज्यादा संक्रमित सामने आ रहे हैं. यह संकेत देता है कि जमीनी स्तर पर संक्रमण की वास्तविक स्थिति आंकड़ों से कहीं अधिक गंभीर हो सकती है।  स्थिति केवल इंदौर तक सीमित नहीं है. राज्य एड्स नियंत्रण समिति के आंकड़े बताते हैं कि एचआईवी संक्रमित गर्भवती महिलाओं की संख्या पिछले पांच वर्षों में तेजी से बढ़ी है. वर्ष 2020-21 में जहां 3771 संक्रमित गर्भवती महिलाएं दर्ज थीं, वहीं 2025-26 में यह संख्या 7167 तक पहुंच गई. इसी अवधि में 200 से अधिक नवजात बच्चों में संक्रमण मां से पहुंचने के मामले सामने आए हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर जांच, नियमित दवा और चिकित्सकीय निगरानी से इस तरह के अधिकांश मामलों को रोका जा सकता है. इसके बावजूद बढ़ते आंकड़े स्वास्थ्य जागरूकता और उपचार व्यवस्था दोनों पर सवाल खड़े कर रहे हैं।  इंदौर में क्यों बढ़ रही संक्रमण दर स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार पिछले तीन वर्षों में एचआईवी पॉजिटिविटी रेट लगभग दोगुना हो गया है. वर्ष 2022 में यह दर 0.33 प्रतिशत थी, जो 2023 में 0.67 प्रतिशत, 2024 में 0.70 प्रतिशत और 2025 में 0.72 प्रतिशत तक पहुंच गई. विशेषज्ञों का मानना है कि असुरक्षित यौन संबंध और नशे के दौरान संक्रमित सुइयों का उपयोग संक्रमण फैलने के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।  जांच कम होने से छिप रही असली तस्वीर एचआईवी नियंत्रण का सबसे प्रभावी तरीका व्यापक स्क्रीनिंग और समय पर पहचान है. लेकिन इंदौर में जांचों की संख्या लगातार कम हो रही है. इससे कई संक्रमित व्यक्ति समय पर सामने नहीं आ पा रहे हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि कम स्क्रीनिंग के कारण संक्रमण की वास्तविक स्थिति का आकलन करना कठिन हो रहा है।  गर्भवती महिलाओं और नवजातों पर बढ़ता खतरा राज्य में एचआईवी संक्रमित गर्भवती महिलाओं की संख्या बढ़ना सबसे चिंताजनक पहलू माना जा रहा है. वर्ष 2025-26 में 743 एचआईवी पॉजिटिव गर्भवती महिलाओं की डिलीवरी दर्ज की गई. कई मामलों में गर्भावस्था के दौरान समय पर जांच नहीं हुई या उपचार बीच में छूट गया. परिणामस्वरूप संक्रमण मां से बच्चे तक पहुंचने का जोखिम बढ़ गया।  क्यों नहीं रुक रहा संक्रमण विशेषज्ञों के अनुसार कई कारण संक्रमण नियंत्रण में बाधा बन रहे हैं. इनमें समय पर जांच न होना, एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी बीच में छोड़ देना, संक्रमण की जानकारी छिपाना, नवजात को आवश्यक दवा न देना और संक्रमित मां द्वारा चिकित्सकीय सलाह के बिना स्तनपान कराना शामिल है।  केस स्टडी ने बढ़ाई चिंता एक मामले में महिला की पहली गर्भावस्था के दौरान एचआईवी जांच ही नहीं हुई. दूसरी गर्भावस्था में संक्रमण का पता चला. इसके बाद पति और पहला बच्चा भी संक्रमित पाए गए. दूसरे मामले में मां ने उपचार पूरा नहीं लिया और नवजात को निर्धारित दवा भी नहीं दी गई. बाद में बच्चा एचआईवी पॉजिटिव पाया गया।  कमलनाथ ने जांच और निगरानी का मुद्दा उठाया पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए सरकार से विशेष कदम उठाने की मांग की है. उन्होंने कहा कि गर्भवती महिलाओं की समय पर जांच और दवा उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी है. वहीं स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि एचआईवी को केवल चिकित्सा नहीं बल्कि सामाजिक जागरूकता के माध्यम से भी नियंत्रित किया जा सकता है। 

चंडीगढ़ में एक साल में बढ़े 102 HIV के मामले, मौतें भी हुई दोगुनी

चंडीगढ़. चंडीगढ़ में एचआईवी संक्रमण ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। हाल ही में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की राज्यसभा में पेश एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में शहर में एचआईवी के 166 नए मामले दर्ज किए गए। वर्ष 2023 में यह संख्या 82 थी। यानी एक वर्ष में 102 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार 2023 में जहां 17 मौतें हुई थीं, वहीं 2024 में यह संख्या बढ़कर 35 हो गई। चंडीगढ़ में हर 208वां व्यक्ति एचआईवी से जूझ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार 2023 में जहां 17 मौत हुई थीं, वहीं 2024 में यह संख्या बढ़कर 35 हो गई। एक वर्ष में मौतों का आंकड़ा दोगुना से अधिक होना स्वास्थ्य तंत्र के लिए चेतावनी है। वर्ष 2024-25 में एचआईवी संक्रमित की संख्या 5,996 दर्ज की गई। एचआईवी संक्रमितों का पीजीआई समेत शहर के अन्य सिविल अस्पतालों में इलाज चल रहा है। एचआईवी संक्रमित पंजीकृत लोगों में 45 प्रतिशत पंजीकृत लोग सेवा (सरकारी या निजी) कर रहे हैं, न कि ट्रक चालक या प्रवासी। इलाज से संक्रमण को फैलने से बचाने के लिए काम किया जा रहा है। 2015 में संयुक्त राष्ट्र ने 2030 तक इस बीमारी को समाप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया था। इसके लिए यूएनएड्स ने 90-90 लक्ष्य निर्धारित किया था। लक्ष्य के अनुसार 2030 तक यह सुनिश्चित किया जाना है कि 90 प्रतिशत लोगों को अपनी एचआईवी स्थिति के बारे में जानकारी हो। इसके साथ 90 प्रतिशत एचआईवी संक्रमित लोगों को इलाज दिया जा सके।

HIV संक्रमित बच्चों के मामले में सतना में कार्रवाई, ब्लड बैंक स्टाफ सहित 3 सस्पेंड

सतना  मध्य प्रदेश के सतना स्थित सरदार वल्लभभाई पटेल शासकीय अस्पताल में 6 बच्चों के एचआईवी संक्रमित पाए जाने के मामले में राज्य सरकार ने कार्रवाई करते हुए ब्लड बैंक प्रभारी और दो लैब टेक्नीशियन को सस्पेंड कर दिया है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने गुरुवार को बताया कि सतना में एचआईवी संक्रमित खून चढ़ाने के मामले की जांच के लिए मध्य प्रदेश में आयुष्मान भारत योजना के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) डॉ. योगेश भरसट की अध्यक्षता में गठित 7 सदस्यीय जांच कमेटी की प्रारंभिक रिपोर्ट के आधार पर यह कार्रवाई की गई। अधिकारी ने बताया कि राज्य के लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग ने 16 दिसंबर को यह कमेटी गठित की थी। अधिकारी ने बताया कि इस रिपोर्ट के आधार पर ब्लड बैंक प्रभारी डॉ, देवेंद्र पटेल और दो लैब टेक्नीशियन – राम भाई त्रिपाठी और नंदलाल पांडे को सस्पेंड कर दिया गया है। उन्होंने बताया कि इसके अलावा जिला अस्पताल के पूर्व सिविल सर्जन मनोज शुक्ला को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है और मामले में लिखित स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। अधिकारी के मुताबिक, स्पष्टीकरण संतोषजनक न होने पर शुक्ला को कड़ी विभागीय कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। उल्लेखनीय है कि 16 दिसंबर को खुलासा हुआ था कि सतना जिला अस्पताल में थैलेसीमिया से पीड़ित 6 बच्चे एचआईवी संक्रमित रक्त (ब्लड ट्रांसफ्यूजन) चढ़ाए जाने से इस लाइलाज बीमारी के शिकार हो गए हैं। इनमें से एक के माता-पिता भी इसकी चपेट में आ गए हैं। यह सारे मामले इस साल जनवरी से मई के बीच सामने आए हैं और सभी पीड़ितों का एचआईवी प्रोटोकॉल के तहत इलाज किया जा रहा है। मामला सामने आने के बाद इसे लेकर हंगामा खड़ा हो गया था, जिसके बाद सरकार ने इस मामले की जांच के लिए कमेटी गठित की थी।

HIV स्क्रीनिंग में मध्यप्रदेश की धीमी प्रगति, गर्भवती महिलाओं का केवल 46% हुआ टेस्ट; आम जनता का आंकड़ा बेहतर

भोपाल  मध्यप्रदेश में HIV नियंत्रण को लेकर एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। सामान्य आबादी की HIV जांच रिकॉर्ड तेजी से लक्ष्य के करीब पहुंच रही है, लेकिन गर्भवती महिलाओं की स्क्रीनिंग लगातार पिछड़ रही है, जो मां से बच्चे में वायरस के संक्रमण रोकने के लक्ष्य को सीधे चुनौती देती है। जबकि ICTC और PPP-ICTC मिलाकर राज्य में हुई HIV जांचों ने इस साल कमाल कर दिया है। अक्टूबर 2025 तक ही 12.23 लाख के लक्ष्य में 12.13 लाख जांच हो चुकी हैं। कई जिलों में आंकड़े लक्ष्य को पार कर चुके हैं। यह दर्शाता है कि आमजन के बीच टेस्टिंग नेटवर्क मजबूत और सक्रिय है। दूसरी ओर, वही अवधि में गर्भवती महिलाओं की HIV जांच जो सबसे संवेदनशील श्रेणी मानी जाती है। 22.85 लाख के लक्ष्य के मुकाबले सिर्फ 10.54 लाख तक ही पहुंच पाई। यह आंकड़ा सिर्फ 46% उपलब्धि को दर्शाता है। मतलब आधी महिलाएं अभी भी HIV टेस्ट से बाहर हैं, जबकि यही टेस्ट भविष्य में जन्म लेने वाले बच्चों को HIV के खतरे से बचाता है। गर्भवती महिलाओं की HIV जांच,   2023-24: लक्ष्य 22.25 लाख – उपलब्धि 20.98 लाख 2024-25: लक्ष्य 22.58 लाख – उपलब्धि 18 लाख  2025-26: (अक्टूबर तक) लक्ष्य 22.85 लाख- उपलब्धि 10.54 लाख लगातार तीन साल से लक्ष्य अधूरा यानी तीन साल लगातार MP गर्भवती महिलाओं की HIV जांच का लक्ष्य पूरा नहीं कर पाया।स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यह मां से बच्चे में HIV संक्रमण रोकथाम कार्यक्रम (PPTCT) की सबसे कमजोर कड़ी है। कम जांच से घटते संक्रमण के आंकड़ों की असल तस्वीर भी धुंधली संक्रमित गर्भवती महिलाओं की संख्या सन                  संक्रमित की  संख्या – 2023-24         754 – 2024-25         671 – 2025-26        492 (अक्टूबर तक) जांच कम होने के प्रमुख कारण  संक्रमितों की संख्या कम दिख रही है, लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि जांच कम होगी तो संक्रमण वास्तविकता से कम दिखाई देगा। अधूरी स्क्रीनिंग का मतलब है कि कई महिलाएं और उनके नवजात जोखिम में बने रह सकते हैं। जांच कम होने का मुख्य कारण ग्रामीण इलाकों में समय पर ANC विजिट नहीं हो रही है। ICTC केंद्रों तक पहुंच की दूरी होने के कारण लोग जांच नहीं करवा पाते हैं। जागरूकता की कमी के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को जांच करने में अभी भी शर्मिंदगी महसूस होती है। कुछ जिलों में ट्रेनिंग की कमी है। सब मिलकर गर्भवती महिलाओं की टेस्टिंग के आंकड़े नीचे खींच रहे हैं।  मां-बच्चे की सुरक्षा के लिए टेस्टिंग की रफ्तार बढ़ाना जरूरी जहां आम नागरिकों की HIV जांच में प्रदेश अच्छी प्रगति दिखा रहा है, वहीं गर्भवती महिलाओं की धीमी टेस्टिंग राज्य के स्वास्थ्य मॉडल पर बड़ा सवाल छोड़ती है। यदि गर्भवती महिलाओं की स्क्रीनिंग पर फोकस तेज़ नहीं किया गया, तो मां से शिशु में संक्रमण रोकने का राष्ट्रीय लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो सकता है। 

साइबर दोस्ती के चलते शादीशुदा युवक HIV पॉज़िटिव, चेतावनी बढ़ी

चंडीगढ़  एक शादीशुदा युवक ने ऑनलाइन डेटिंग एप के जरिये समलैंगिक युवक से दोस्ती कर ली। इसके बाद दोनों ने कई बार यौन संबंध बनाए। इससे वह एचआईवी संक्रमित हो गया। तबीयत बिगड़ने पर एआरटी सेंटर में जांच की तो संक्रमित होने का खुलासा हुआ। अब युवक का जिला नागरिक अस्पताल के एआरटी सेंटर पर उपचार चल रहा है।  एआरटी सेंटर के काउंसलर ने बताया कि इस तरह के मामले बढ़ रहे हैं। पहले भी ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। एआरटी सेंटर के काउंसलर रविंद्र सिंह ने बताया कि ताजा मामला सनौली रोड का है। करीब 38 वर्षीय युवक काफी समय से बीमार था। उसकी एचआईवी जांच की तो वह संक्रमित मिला। युवक की एआरटी सेंटर पर कांउसिलिंग की गई तो उसने आपबीती बताई।  पीड़ित युवक ने बताया कि वह शादीशुदा है। कुछ समय पहले उसने ऑनलाइन डेटिंग एप के माध्यम से एक युवक से दोस्ती की। इसके बाद दोनों की गहरी दोस्ती हो गई। बाद में उन्होंने कई बार संबंध बनाए। जिसके बाद उसकी तबीयत खराब होने लगी तो उसने चिकित्सक को दिखाया। काफी इलाज कराने के बाद भी सुधार नहीं हुआ तो चिकित्सकों ने उसे एचआईवी की जांच कराने की सलाह दी। इसके बाद उसने एआरटी सेंटर पर पहुंचकर एचआईवी की जांच की। जांच में एचआईवी संक्रमित होने की पुष्टि हुई। 

बच्चों को संक्रमित खून देने का मामला: झारखंड HC ने सरकार से की कड़ी पूछताछ

  रांची झारखंड उच्च न्यायालय ने खून चढ़ाने से 5 बच्चों के कथित रूप से एचआईवी से संक्रमित हो जाने पर राज्य सरकार को रक्त आधान के लिए मानक संचालन प्रक्रिया का पालन नहीं करने को लेकर फटकार लगाई। मुख्य न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने इस विषय का जनहित याचिका के रूप में स्वत: संज्ञान लेकर सुनवाई करते हुए स्वास्थ्य सचिव अजय कुमार सिंह को फटकार लगाई। कहा, खबर है कि चाईबासा जिले में पांच बच्चों को खून चढ़ाया गया और इसके बाद वे एचआईवी पॉजिटिव पाए गए। ये बच्चे थैलेसीमिया के मरीज थे और चाईबासा के सदर अस्पताल में इलाज कराने पहुंचे थे। इलाज के तहत उन्हें खून चढ़ाया गया। इस साल अगस्त और सितंबर में अलग-अलग तारीखों पर इन बच्चों को रक्त चढ़ाया गया था। खंडपीठ ने कहा कि सरकार को ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए। अदालत ने स्वास्थ्य सचिव को एक हलफनामा दाखिल कर राज्य के सरकारी और निजी अस्पतालों में आयोजित रक्तदान शिविरों का विवरण पीठ को बताने का निर्देश दिया। अदालत ने अस्पतालों में रक्त की मांग और ‘ब्लड बैंकों' द्वारा उपलब्ध कराई गई मात्रा के बारे में भी जानकारी मांगी। अदालत ने विभाग को राष्ट्रीय रक्त नीति के अनुसार तैयार की जाने वाली मानक संचालन प्रक्रिया पीठ के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। सुनवाई के दौरान, पीठ ने सरकार को यह बताने का आदेश दिया कि अस्पतालों में ‘न्यूक्लिक एसिड टेस्ट (एनएटी)' करने के लिए उन्नत स्क्रीनिंग मशीनें क्यों नहीं लगाई गई हैं। सामाजिक कार्यकर्ता अतुल गेरा ने अदालत को बताया कि किसी मरीज को रक्त चढ़ाने से पहले उसकी गुणवत्ता निर्धारित करने और एचआईवी की उपस्थिति का पता लगाने के लिए एनएटी आवश्यक है। इससे पहले, अदालत ने थैलेसीमिया से पीड़ित एक बच्चे के माता-पिता द्वारा लिखे गए पत्र के आधार पर स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका की सुनवाई शुरू की थी। इस बच्चे को कथित रूप से संक्रमित रक्त चढ़ाया गया था। कथित तौर पर, बच्चे को दूषित रक्त के माध्यम से एचआईवी संक्रमण हुआ था, जिसके बाद उसके पिता ने मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र लिखा था। मुख्य न्यायाधीश ने इसे एक जनहित याचिका में बदल दिया था। झारखंड सरकार ने 26 अक्टूबर को पश्चिमी सिंहभूम के सिविल सर्जन और अन्य संबंधित अधिकारियों को निलंबित कर दिया था, जब यह बात सामने आई कि चाईबासा में थैलेसीमिया से पीड़ित पांच बच्चों को रक्त चढ़ाने के बाद उनकी एचआईवी जांच पॉजिटिव आई थी।  

HIV मामलों में वृद्धि के बीच Meghalaya में शादी से पहले compulsory टेस्टिंग क़ानून की तैयारी

शिलांग देश के पूर्वोत्तर राज्य मेघालय में अब शादी से पहले एचआईवी टेस्ट को अनिवार्य बनाने की तैयारी चल रही है। हेल्थ मिनिस्टर एंपरीन लिंगदोह ने शुक्रवार को यह बात कही। उन्होंने कहा कि सरकार राज्य में एचआईवी/एड्स के बढ़ते मामलों को देखते हुए विवाह से पहले जांच अनिवार्य करने के लिए नया कानून लाने पर विचार कर रही है। उन्होंने बताया कि मेघालय एचआईवी/एड्स प्रसार के मामले में देश में छठे स्थान पर है और पूर्वोत्तर क्षेत्र पर इसका अधिक प्रभाव देखा जा रहा है। लिंगदोह ने कहा, ‘अगर गोवा ने विवाह से पहले एचआईवी जांच को अनिवार्य कर दिया है तो मेघालय को भी इस तरह का कानून क्यों नहीं लागू करना चाहिए? यह पूरे समाज के लिए फायदेमंद होगा।’ स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि उन्होंने उपमुख्यमंत्री प्रेस्टोन टिनसोंग की अध्यक्षता में एक बैठक में हिस्सा लिया, जिसमें समाज कल्याण मंत्री पॉल लिंगदोह और ईस्ट खासी हिल्स जिले के आठ विधायक भी शामिल हुए। इस बैठक में एचआईवी/एड्स पर एक नीति बनाने पर चर्चा हुई। उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य विभाग को इस संबंध में कैबिनेट नोट तैयार करने का निर्देश दिया गया है। साथ ही इसी तरह की बैठकें गारो हिल्स और जैंतिया हिल्स क्षेत्रों में आयोजित की जाएंगी ताकि क्षेत्रवार रणनीति तैयार की जा सके। स्वास्थ्य मंत्री ने चिंता व्यक्त करते हुए बताया कि सिर्फ ईस्ट खासी हिल्स जिले में ही अब तक एचआईवी/एड्स के 3,432 मामले सामने आ चुके हैं जिनमें से केवल 1,581 मरीज ही उपचार प्राप्त कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि राज्य में इस संक्रमण का प्रमुख कारण असुरक्षित यौन संबंध हैं। मंत्री ने कहा, ‘हमें सुनिश्चित करना होगा कि जांच के बाद संक्रमित पाए गए हर व्यक्ति का इलाज कराया जाए। एचआईवी/एड्स घातक नहीं है, अगर इसका समय पर और सही तरीके से इलाज हो।’ बता दें कि गोवा में भी ऐसे तमाम मामले पाए जाने के बाद एचआईवी टेस्ट को लेकर नियम बनाया गया है।

WHO ने HIV की रोकथाम के लिए लेनाकापाविर के इस्तेमाल को मंजूरी दी

नई दिल्ली विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने ह्यूमन इम्युनो डिफिशिएंसी सिंड्रोम (HIV) की रोकथाम के लिए लेनाकापाविर (Lenacapavir) के इस्तेमाल को मंदूरी दे दी है. यह दवा HIV की रोकथाम की दिशा में एक मील की पत्थर की तरह साबित हो सकती है. यह दवा उन लोगों के लिए खासतौर पर जीवनरक्षक है जिन्हें HIV एक्सपोजर का रिस्क ज्यादा होता है, यानी सेक्स वर्कर या ऐसे लोग एचआईवी मरीजों के इलाज या देखरेख के काम से जुड़े हैं. WHO ने वैश्विक एचआईवी रोकथाम के प्रयासों को मजबूत करने के लिए नए दिशानिर्देश जारी किए और इस दौरान उन्होंने लॉन्ग टर्म सुरक्षा देने वाली इस एंटीरेट्रोवायरल दवाई को मंजूरी दी. लेनाकापाविर को मंजूरी घोषणा 14 जुलाई को पूर्व अफ्रीकी देश रवांडा की राजधानी किगाली में आयोजित 13वें अंतर्राष्ट्रीय एड्स सोसाइटी सम्मेलन में की गई. अमेरिका पहले ही दे चुका है मंजूरी हालांकि अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने लेनाकापाविर को पहले ही मंजूरी दे दी थी. एचआईवी की रोकथाम के लिए ये इंजेक्शन साल में दो बार प्री-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (PrEP) उपचार की स्थिति में दिया जाता है. इस इंजेक्शन को 2022 में एचआईवी के इलाज के लिए मंजूरी मिली थी. यह ट्रायल के दौरान एचआईवी संक्रमण से बचाने में असरदार साबित हुआ है. Theweek.in की रिपोर्ट के अनुसार, डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक Tedros Adhanom Ghebreyesus ने कहा कि हालांकि एचआईवी का टीका अभी तक नहीं बन पाया है लेकिन यह नई दवा, जिसे साल में केवल दो बार बस लेने की जरूरत होती है, अभी की सबसे अच्छी नई दवा है. बढ़ता बोझ, घटती सुरक्षा यह कदम दुनिया भर में एचआईवी रोकथाम के वित्तपोषण में आ रही कमी के कारण उठाया गया है.  केवल 2024 में ही लगभग 13 लाख लोग एचआईवी से संक्रमित हुए. इनमें से ज्यादातर लोग सेक्स वर्कर, पुरुषों के साथ यौन संबंध बनाने वाले पुरुष, ट्रांसजेंडर, नशीली दवाओं का इंजेक्शन लगाने वाले लोग, जेल में बंद लोग और बच्चे व किशोर थे. लेनाकापाविर क्या है? लेनाकापाविर (LEN) अमेरिकी दवा को कंपनी गिलियड साइंसेज ने बनाया है. यह Capsid Inhibitor नामक दवाओं के एक नए समूह से संबंधित है जो HIV Replication Cycle के कई चरणों को बाधित करके एचआईवी से सुरक्षा देने का काम करता है. LEN पहला PrEP इंजेक्शन है जिसे साल में केवल दो बार दिया जा सकता है.  लंबे समय तक मानव शरीर में असरदार रहने वाला यह इंजेक्शन गोलियों और बाकी ट्रीटमेंट्स की तुलना में ज्यादा शक्तिशाली है इसलिए यह उन लोगों के लिए काफी मददगार है जिन्हें एचआईवी संक्रमण होने का खतरा ज्यादा होता है.