samacharsecretary.com

मोदी सरकार ने 6 साल में 9 देशों के साथ की ‘खास डील’, ट्रंप के टैरिफ का किया मुकाबला

नई दिल्ली रूस-युक्रेन की बीच युद्ध हो, इजरायल-फिलिस्तीन का संघर्ष हो, अमेरिका-ईरान की जंग हो या फिर दुनिया को डराने वाला ट्रंप टैरिफ, बीते कुछ सालों में तमाम ग्लोबल चुनौतियां सामने आई हैं, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) की रफ्तार तेज बनी हुई है. दुनिया ने भारत का लोहा माना है और ऐसा हो भी क्यों न आखिर जब दुनिया ट्रेड से लेकर महंगाई तक के जोखिम से जूझती रही, तो मोदी सरकार ने एक के बाद एक कमाल किया. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बीते छह सालों में भारत ने 9 देशों के साथ फ्री-ट्रेड एग्रीमेंट यानी FTA साइन किए हैं, जो अमेरिकी टैरिफ की काट साबित हुए हैं. सबसे ताजा डीन न्यूजीलैंड के साथ की गई है।  दनादन सरकार द्वारा तमाम देशों के साथ किए जा रहे एफटीए से जहां भारतीय सामानों के निर्यात के लिए नए और बड़े बाजार मिल रहे हैं, तो वहीं आयात पर सीमित निर्भरता भी कम हो रही है. इसके अलावा भारत में निवेश आने के रास्ते खुले हैं और रोजगार के अवसर बढ़ाने में भी ये कारगर साबित हो रहे हैं।  UK से लेकर EU तक से एफटीए इससे पहले भारत ने कई देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट साइन किए हैं. इनमें मॉरिसस, ब्रिटेन से लेकर यूरोपीय यूनियन (EU) तक के साथ किए गए एफटीए शामिल हैं।   नंबर-1: नंबर में मोदी सरकार ने मॉरिसस के साथ समझौता (India-Mauritius FTA) किया था और ये पहली बार था जबकि भारत ने किसी अफ्रीकन देश के साथ FTA किया था।  नंबर-2: 2022 में भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट साइन किया गया था. इस FTA के चलते जो टारगेट सेट किया गया था, उसके अनुरूप दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार को FY 2025 तक 100 अरब डॉलर पहुंचा।  नंबर-3: 2022 में ही भारत ने एक और डील डन की. इस बार भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर सहमति बनी और इस पर साइन किए गए. ये भारत द्वारा किया गया ऐसा पहला एफटीए थी, जिसमें 100 फीसदी निर्यात पर टैरिफ जीरो किया गया।  नंबर-4: 2024 के मार्च महीने की 10 तारीख को भारत और ईएफटीए (EFTA – स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड, लिकटेंस्टीन) देशों के बीच व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौते (TEPA) पर साइन किए गए. ये समझौता 1 अक्टूबर 2025 से प्रभावी हुआ. इसका लक्ष्य 15 साल में भारत में 100 अरब डॉलर का निवेश लाना रहा।  नंबर-5: 2025 में भारत और ब्रिटेन के बीच समझौता हुआ. जुलाई महीने में दोनों देशों ने  ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर साइन किए. इस एफटीए के तहत भारत के 99% निर्यात किए जाने वाले सामानों को ब्रिटेन में ड्यूटूी फ्री एक्सेस मिलने की राह पक्की हुई. इसके अलावा इस डील का उद्देश्य India-UK के बीच द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक 120 अरब डॉलर तक ले जाना है।  नंबर-6: 2025 के अंत में यानी दिसंबर महीने में फिर मोदी सरकार ने एक डील को अंजाम तक पहुंचा दिया. Trump Tariff को लेकर दुनिया में फैले खौफ के बीच भारत और ओमान के बीच व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (India-Oman CEPA) पर साइन किए गए. इसके तहत ओमान भारत को अपनी 98.08% टैरिफ लाइनों तक टैरिफ फ्री (Tariff Free) पहुंच प्रदान करेगा. इसमें भारत द्वारा ओमान को निर्यात की जाने वाली 99.38% वस्तुएं शामिल है. वहीं दूसरी ओर भारत ने अपनी कुल टैरिफ लाइन में से 77.79% पर शुल्क में राहत की पेशकश की है, जो ओमान से आयात होने वाले 94.81% सामान को कवर करती है।  नंबर-7: 2026 की शुरुआत यानी जनवरी महीने में भारत ने यूरोपीय संघ के साथ एक ऐतिहासिक डील की. India-EU FTA को 'मदर ऑफ ऑल डील्स' (Mother Of All Deals) कहा गया. डील के तहत भारतीय निर्यातकों को यूरोपीय संघ के देशों में जीरो टैरिफ एक्सपोर्ट (Zero Tariff Export) का एक्सेस मिला. ये डील सबसे ज्यादा कपड़ा-परिधान सेक्टर के लिए फायदे का सौदा है, क्योंकि अमेरिका के बाद इस सेक्टर में भारतीय निर्यात के लिए ईयू सबसे बड़ा मार्केट है, जिसका आकार 22 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा है. इसके अलावा देशों ने इस डील के तहत अपने मार्केट एक-दूसरे के लिए खोलने पर सहमति जताई और दोनों के 90 फीसदी तक प्रोडक्‍ट्स पर टैरिफ कम या समाप्‍त करने का ऐलान हुआ।  नंबर-8: 2026 में फरवरी महीने में टैरिफ से दुनिया को डराने वाले अमेरिका और भारत के बीच अंतरिम व्‍यापार समझौते के फ्रेमवर्क पर सहमति बनी. दोनों देशों ने कई चीजों को लेकर अपनी सहमति जाहिर की है. अमेरिका ने भारत पर रूसी तेल खरीद के कारण लगे एक्‍स्‍ट्रा 25 प्रतिशत टैरिफ को हटा दिया और रेसिप्रोकल टैरिफ को भी 25 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी कर दिया है, जो 7 फरवरी से प्रभावी है।  नंबर-9: भारत द्वारा सबसे ताजा एफटीए यानी Free Trade Agreement न्यूजीलैंड के साथ हुआ है और इस पर 27 अप्रैल को साइन किए गए हैं. India-New Zealand FTA पर केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और न्यूजीलैंड के ट्रेड मिनिस्टर टॉड मैक्ले ने साइन किए. सबसे खास बात ये है कि ये समझौता महज 9 महीनों में हो गया. ये फ्री ट्रेड एग्रीमेंट इस साल के अंत तक लागू हो सकता है।  FTA के तहत न्यूजीलैंड भारत को अपने बाजार में जीरो टैरिफ (Zero Tariff) एंट्री देगा और भारत से जाने वाले करीब 95% टैरिफ फ्री या कम टैरिफ से साथ पहुंचेंगे. इस डील का टारगेट दोनों देशों के बीच के द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करके 5 अरब डॉलर तक ले जाना है. इसके अलावा न्यूजीलैंड अगले 15 साल में भारत में 20 अरब डॉलर का निवेश करेगा। 

न्यूजीलैंड से FTA समझौते में आम भारतीय के लिए बड़ी राहत, 5000 वीजा और 0 ड्यूटी का फायदा

नईदिल्ली  कल तक जो सिर्फ फाइलों का हिस्सा था आज वो हकीकत बन चुका है. दिल्ली और वेलिंगटन के बीच समुद्र की दूरियां अब व्यापार के सेतु से सिमट गई हैं। जब दुनिया के बड़े-बड़े देश ट्रेड वॉर और मंदी के साये में दुबके हैं, तब भारत ने महज 270 दिनों के भीतर न्‍यूजीलैंड के साथ वो महाकरार कर लिया है जिसने अंतरराष्ट्रीय मंच पर तहलका मचा दिया है। यह सिर्फ सरकारों के बीच का हाथ मिलाना नहीं है बल्कि भारत के उस मध्यमवर्गीय युवा के सपनों की उड़ान है जो विदेश में करियर बनाना चाहता है और उस छोटे उद्यमी की हिम्मत है जो अपना सामान दुनिया के कोने-कोने में बेचना चाहता है। 5000 वीजा का वो ब्रह्मास्त्र और जीरो ड्यूटी की वो चाबी अब आपके हाथ में है। आइए, इसे बहुत आसान भाषा में समझते हैं।  समझौते की 5 सबसे बड़ी ताकत · 5,000 वीजा का ‘एक्सप्रेस-वे’: अब हर साल कम से कम 5,000 ‘Temporary Employment Entry Visa’ की गारंटी मिलेगी. इसके तहत स्किल्ड प्रोफेशनल्स 3 साल तक न्यूजीलैंड में रहकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सकेंगे।  · 100% ड्यूटी फ्री एक्सेस: अब न्यूजीलैंड के बाजार में ‘मेड इन इंडिया’ का डंका बजेगा. भारत से जाने वाले टेक्सटाइल, लेदर, प्लास्टिक और इंजीनियरिंग सामान पर अब जीरो ड्यूटी लगेगी, जिससे भारतीय व्यापारियों का मुनाफा कई गुना बढ़ जाएगा।  · $20 बिलियन का ‘इन्वेस्टमेंट बूस्टर’: अगले 15 वर्षों में न्यूजीलैंड भारत में 20 बिलियन डॉलर (लगभग 1.6 लाख करोड़ रुपये) का भारी-भरकम निवेश करेगा जिससे भारत के बुनियादी ढांचे और स्टार्टअप्स को नई उड़ान मिलेगी।  · किसानों के लिए ‘कीवी’ तकनीक: केवल व्यापार ही नहीं बल्कि अब न्यूजीलैंड के विशेषज्ञ भारतीय किसानों को कीवी, सेब और शहद के उत्पादन में वैश्विक स्तर की तकनीक सिखाएंगे. यह साझेदारी भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए गेम-चेंजर साबित होगी।  · शराब और वाइन पर रियायत: भारत से जाने वाली वाइन और स्पिरिट्स को वहां ड्यूटी-फ्री एंट्री मिलेगी, जबकि न्यूजीलैंड की वाइन पर भारत में मिलने वाली रियायतें 10 वर्षों में धीरे-धीरे बढ़ाई जाएंगी।  कैसे संभव हुआ यह ‘एक्सप्रेस’ एग्रीमेंट? आमतौर पर फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) होने में वर्षों का समय लगता है लेकिन न्यूज़ीलैंड के साथ यह महज 9 महीनों में पूरा हो गया. इसके पीछे मुख्य कारण निम्नलिखित रहे: · रणनीतिक तालमेल: न्यूज़ीलैंड की कृषि और डेयरी विशेषज्ञता और भारत की विशाल मार्केट और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता एक-दूसरे की पूरक (Complementary) हैं।  · चीन से हटकर विकल्प की तलाश: दोनों देश अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए चीन पर निर्भरता कम करना चाहते हैं. यह साझा सुरक्षा और आर्थिक हित इस समझौते की सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति बना।  · विश्वास की नींव: पीयूष गोयल के नेतृत्व में भारतीय टीम ने पिछले साढ़े तीन साल में 7 समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं. यह ‘स्पीड’ भारत के नए वर्क कल्‍चर को दर्शाती है, जहां जटिल मुद्दों को सुलझाने के लिए डेडलाइन पर काम किया गया।  पाइपलाइन में और क्या है? न्यूज़ीलैंड तो बस शुरुआत है. भारत का असली लक्ष्य दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ सीधा व्यापारिक गलियारा बनाना है: · यूरोपीय संघ (EU) और अमेरिका: आने वाले कुछ महीनों में इन दो दिग्गजों के साथ समझौते होने की उम्मीद है. यह भारत के लिए अब तक की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत होगी. ईयू के साथ जनवरी में मदर ऑफ ऑल डील हुई थी. इसके पूरी तरह से लागू होने की प्रक्रियाएं जारी हैं।  · 9 समझौतों का जादुई आंकड़ा: इन समझौतों के बाद भारत के कुल 9 FTA हो जाएंगे. ये कोई साधारण देश नहीं बल्कि 38 विकसित देश होंगे।  · ग्लोबल GDP पर प्रभाव: इसके पूरा होते ही भारत की पहुंच दुनिया के लगभग दो-तिहाई व्यापार और 65-70% वैश्विक जीडीपी तक सीधे तौर पर हो जाएगी।  विकसित भारत 2047 के लिए यह क्यों जरूरी है? 1. मार्केट एक्सेस: भारतीय किसानों, कारीगरों और MSMEs को अब ग्लोबल मार्केट में अपनी जगह बनाने के लिए ऊंचे टैक्स (Tariffs) का सामना नहीं करना पड़ेगा।  2. निवेश का प्रवाह: न्यूज़ीलैंड का $20 बिलियन का वादा केवल शुरुआत है. अमेरिका और EU के साथ समझौते से भारत में अरबों डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) आएगा।  3. सर्विस सेक्टर की ताकत: भारत के आईटी और सर्विस सेक्टर के युवाओं के लिए इन विकसित देशों में काम करने और सेवा देने के रास्ते और आसान हो जाएंगे।  सवाल-जवाब न्यूज़ीलैंड के साथ FTA इतनी जल्दी (9 महीनों में) कैसे पूरा हो गया? यह दोनों देशों के बीच साझा लोकतांत्रिक मूल्यों, विश्वास और चीन पर निर्भरता कम करने की रणनीतिक जरूरत की वजह से संभव हुआ. पीयूष गोयल ने इसे “भरोसे और मजबूत रिश्तों” का परिणाम बताया है।  क्या भारत का अमेरिका के साथ भी कोई समझौता होने वाला है? जी हाँ, वाणिज्य मंत्री के अनुसार आगामी कुछ महीनों में अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) के साथ दो बड़े समझौते पाइपलाइन में हैं।  इन 9 FTA समझौतों का भारत की जीडीपी पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इन समझौतों के बाद भारत की पहुंच दुनिया की लगभग 65-70% ग्लोबल जीडीपी तक हो जाएगी, जिससे भारत के एक्सपोर्ट में भारी बढ़ोतरी और अर्थव्यवस्था में तेज उछाल आने की उम्मीद है।  इस समझौते से आम युवाओं को क्या फायदा होगा? यह FTA स्टार्टअप्स, डिजिटल इकोनॉमी और टेक्नोलॉजी सेक्टर में नए मौके पैदा करेगा. साथ ही, युवाओं के लिए ग्लोबल मार्केट में कौशल और प्रतिभा दिखाने के रास्ते खुलेंगे।   

भारत का रक्षा खर्च 8.66 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ा, ऑपरेशन सिंदूर का प्रभाव

  नई दिल्ली स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) ने 27 अप्रैल 2026 को अपनी नई रिपोर्ट जारी की है. रिपोर्ट के अनुसार साल 2025 में पूरी दुनिया का सैन्य खर्च रिकॉर्ड 28.87 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. यह 2024 की तुलना में 2.9 प्रतिशत ज्यादा है. दुनिया भर में लगातार संघर्ष और युद्ध बढ़ रहे हैं, इसलिए हर देश अपनी सुरक्षा के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर रहा है. यह 11वां साल है जब दुनिया का सैन्य खर्च लगातार बढ़ा है।  भारत 2025 में दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा रक्षा खर्च करने वाला देश रहा. भारत ने अपना सैन्य खर्च 8.9 प्रतिशत बढ़ाकर 8.66 लाख करोड़ रुपये कर लिया. इस बढ़ोतरी के पीछे मुख्य वजह मई 2025 में पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ चलाया गया ऑपरेशन सिंदूर था।  इस ऑपरेशन के बाद भारत ने ड्रोन, काउंटर-ड्रोन, एयर डिफेंस सिस्टम और आधुनिक हथियारों की खरीद तेज कर दी। पाकिस्तान का रक्षा खर्च भी 11 प्रतिशत बढ़कर लगभग 1.12 लाख करोड़ रुपये हो गया।  मध्य पूर्व में खर्च लगभग स्थिर मध्य पूर्व का सैन्य खर्च 2025 में 2.05 लाख करोड़ रुपये रहा, जो 2024 से सिर्फ 0.1% ज्यादा है. इजरायल का खर्च 4.9% घटकर 4.54 लाख करोड़ रुपये रह गया क्योंकि जनवरी 2025 में हमास के साथ संघर्ष विराम हो गया था. लेकिन तुर्की का खर्च 7.2% बढ़कर 2.82 लाख करोड़ रुपये हो गया. ईरान का खर्च दूसरी बार घटा और 5.6% कम होकर 69,560 करोड़ रुपये रह गया।  दुनिया के टॉप तीन देश: अमेरिका, चीन और रूस दुनिया के सबसे ज्यादा रक्षा खर्च करने वाले तीन देश अमेरिका, चीन और रूस हैं. इन तीनों ने मिलकर 2025 में 13.91 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जो पूरी दुनिया के सैन्य खर्च का 51 प्रतिशत है. अमेरिका ने 2025 में लगभग 8.97 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जो 2024 से 7.5 प्रतिशत कम है।  मुख्य वजह यह थी कि साल भर में यूक्रेन को नई सैन्य मदद नहीं दी गई. लेकिन अमेरिका ने अपने परमाणु और सामान्य हथियारों में निवेश बढ़ाया ताकि चीन को इंडो-पैसिफिक में रोका जा सके।  यूरोप में 14% की भारी बढ़ोतरी 2025 में यूरोप का सैन्य खर्च सबसे तेजी से बढ़ा. यह 14% बढ़कर 8.12 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. रूस का खर्च 5.9% बढ़कर 1.79 लाख करोड़ रुपये हो गया, जो उसके कुल जीडीपी का 7.5% है. यूक्रेन ने 20% बढ़ोतरी के साथ 7.9 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जो उसके जीडीपी का 40% है।  NATO के 29 यूरोपीय देशों ने कुल 5.25 लाख करोड़ रुपये खर्च किए. जर्मनी का खर्च 24 प्रतिशत बढ़कर 1.07 लाख करोड़ रुपये हो गया. स्पेन का खर्च तो 50 प्रतिशत बढ़कर 3.78 लाख करोड़ रुपये हो गया।  मध्य पूर्व में खर्च लगभग स्थिर मध्य पूर्व का सैन्य खर्च 2025 में 2.05 लाख करोड़ रुपये रहा, जो 2024 से सिर्फ 0.1% ज्यादा है. इजरायल का खर्च 4.9% घटकर 4.54 लाख करोड़ रुपये रह गया क्योंकि जनवरी 2025 में हमास के साथ संघर्ष विराम हो गया था. लेकिन तुर्की का खर्च 7.2% बढ़कर 2.82 लाख करोड़ रुपये हो गया. ईरान का खर्च दूसरी बार घटा और 5.6% कम होकर 69,560 करोड़ रुपये रह गया।  एशिया और ओशिनिया में सबसे तेज बढ़ोतरी एशिया और ओशिनिया में सैन्य खर्च 8.1 प्रतिशत बढ़कर 6.40 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. यह 2009 के बाद सबसे तेज सालाना बढ़ोतरी है. चीन ने 7.4 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ 3.16 लाख करोड़ रुपये खर्च किए. जापान का खर्च 9.7 प्रतिशत बढ़कर 5.85 लाख करोड़ रुपये हो गया. ताइवान ने 14 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ 1.71 लाख करोड़ रुपये खर्च किए।  मई 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के आतंकवादी ठिकानों पर ऑपरेशन सिंदूर चलाया. इसके बाद भारत सरकार ने रक्षा खरीद को बहुत तेज कर दिया. खासतौर पर ड्रोन, काउंटर-ड्रोन सिस्टम, एयर डिफेंस और आधुनिक सैन्य प्लेटफॉर्म्स पर जोर दिया गया. SIPRI रिपोर्ट साफ बताती है कि भारत अब अपनी सुरक्षा को और मजबूत बनाने के लिए लगातार खर्च बढ़ा रहा है।  दुनिया क्यों बढ़ा रही है रक्षा खर्च? SIPRI की रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में संघर्ष बढ़ रहे हैं – यूक्रेन-रूस युद्ध, मध्य पूर्व में तनाव, चीन-ताइवान की स्थिति और भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव. हर देश अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर रहा है. 2026 में अमेरिका का खर्च और बढ़ने की उम्मीद है।  भारत का 8.66 लाख करोड़ रुपये का रक्षा बजट दिखाता है कि देश अपनी सीमाओं की सुरक्षा और आधुनिक हथियारों को प्राथमिकता दे रहा है. ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह बढ़ोतरी भारत की मजबूत रक्षा नीति का प्रमाण है।  SIPRI की रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में संघर्ष बढ़ रहे हैं – यूक्रेन-रूस युद्ध, मध्य पूर्व में तनाव, चीन-ताइवान की स्थिति और भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव. हर देश अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर रहा है. 2026 में अमेरिका का खर्च और बढ़ने की उम्मीद है।  भारत का 8.66 लाख करोड़ रुपये का रक्षा बजट दिखाता है कि देश अपनी सीमाओं की सुरक्षा और आधुनिक हथियारों को प्राथमिकता दे रहा है. ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह बढ़ोतरी भारत की मजबूत रक्षा नीति का प्रमाण है। 

मुइज्जु सरकार ने भारत ने मालदीव की संकट घड़ी में बढ़ाया हाथ, 30 अरब रुपये की सहायता जारी

नई दिल्ली संकट की घड़ी में भारत ने मालदीव को एक बार फिर बड़ी मदद भेजी है। जानकारी के मुताबिक आर्थिक तंगी का सामना कर रहे मालदीव को राहत देते हुए भारत ने 30 अरब रुपये की पहली किश्त जारी करने को मंजूरी दे दी है। यह रकम भारतीय रिजर्व बैंक और मालदीव सरकार के बीच हुए SAARC करेंसी स्वैप फ्रेमवर्क के तहत दी जा रही है। माले स्थित भारतीय उच्चायोग ने गुरुवार को इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि यह कदम मालदीव की वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है। बता दें कि करेंसी स्वैप फ्रेमवर्क की व्यवस्था भारतीय रिजर्व बैंक और मालदीव सरकार के बीच हुए एक समझौते के तहत लागू की गई थी। अक्टूबर 2024 में मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच इस समझौते पर मुहर लगी थी। मालदीव पहले भी इसी फ्रेमवर्क के तहत 400 मिलियन डॉलर की राशि का उपयोग कर चुका है। संकट में मालदीव मालदीव की अर्थव्यवस्था कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रही है। विदेशी मुद्रा भंडार खत्म होने की कगार पर है। वहीं बढ़ते कर्ज के बोझ और राजस्व के सीमित स्रोतों के कारण सरकार को लगातार बाहरी मदद की जरूरत पड़ रही है। ऐसे में भारत की यह मदद न सिर्फ तात्कालिक राहत देती है, बल्कि मुइज्जु सरकार को आगे भी सहारा मिलेगा। भारत बना है मददगार भारत इससे पहले भी लंबे समय से मालदीव के लिए एक भरोसेमंद साझेदार रहा है और संकट के समय सबसे पहले मदद पहुंचाने वाले देशों में शामिल रहा है। 2012 में SAARC करेंसी स्वैप फ्रेमवर्क शुरू होने के बाद से भारत अब तक मालदीव को 1.1 अरब डॉलर से अधिक की वित्तीय सहायता दे चुका है। इसके अलावा, पिछले साल भारत ने मालदीव के अनुरोध पर 100 मिलियन डॉलर के ट्रेजरी बिल्स को भी रोलओवर किया था, जिससे तत्काल वित्तीय दबाव को कम करने में मदद मिली थी। क्या है SAARC करेंसी स्वैप फ्रेमवर्क? SAARC करेंसी स्वैप फ्रेमवर्क दक्षिण एशियाई देशों के लिए एक अहम सुरक्षा कवच की तरह काम करता है, जिसके जरिए जरूरत पड़ने पर तुरंत विदेशी मुद्रा उपलब्ध कराई जाती है। इससे भुगतान संतुलन के संकट और आयात-निर्यात से जुड़े दबावों को संभालने में मदद मिलती है। मालदीव जैसे छोटे द्वीपीय देश, जो पर्यटन और आयात पर काफी हद तक निर्भर हैं, उनके लिए इस तरह की व्यवस्था आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

भारत ने खोजा एनर्जी का ‘ब्रह्मास्‍त्र’, अब LPG और तेल के संकट का होगा अंत, हर घर का चूल्‍हा जलता रहेगा

मुंबई  ईरान जंग की शुरुआत के साथ ही पूरी दुनिया नई समस्‍या से रूबरू होने लगी. ईरान ने एनर्जी कॉरिडोर होर्मुज स्‍ट्रेट को बार्गेनिंग चिप की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. इससे यूरोप से लेकर एशिया तक में एनर्जी क्राइसिस का दौर शुरू हो गया. प्रभावित देशों को अपने ऊर्जा स्रोतों के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर दिया. भारत भी पश्चिम एशिया संकट से अछूता नहीं है. ऐसे में देश में किसी तरह का ऊर्जा संकट न आए, इसको लेकर कई तरह के कदम उठाए गए हैं. पूर्व में लिए गए फैसलों का असर अब दिखने लगा है. सौर ऊर्जा के बाद अब भारत ने पवन ऊर्जा यानी विंड एनर्जी के क्षेत्र में नया इतिहास रचा है. अक्षय ऊर्जा से जुड़ी परियोजनाओं पर यदि इसी तरह गंभीरता से काम किया जाता रहा तो LPG और तेल के बिना भी भारत विकास की पटरी पर सरपट भागता रहेगा।  ईरान जंग के चलते दुनियाभर में एनर्जी क्राइसिस गहरा गई है. भारत भी इससे अछूता नहीं है. खाड़ी देश से आने वाले तेल और गैस पर निर्भरता को कम करने की कोशिशें भी तेज हो गई हैं. भारत भी इसमें पीछे नहीं है. भारत पिछले कुछ सालों में रिन्‍यूवेबल यानी अक्षय ऊर्जा पर मिशन मोड में काम रहा है. उसका परिणाम सामने आने लगा है. पिछले दिनों सौर ऊर्जा के जरिये रिकॉर्ड एनर्जी प्रोडक्‍शन किया गया था. भारत ने सोलर एनर्जी के जरिये 45 गीगावाट बिजली पैदा किया था. अब भारत ने पवन ऊर्जा के सेक्‍टर में जबरदस्‍त सफलता हासिल की है. यह उपलब्‍ध‍ि ऐसे समय में सामने आई है, जब दुनिया के तमाम देश ईरान युद्ध और होर्मुज सट्रेट संकट से दो-चार हो रही है. तेल और गैस की सप्‍लाई बुरी तरह से प्रभावित हुई है. ऐसे में भारत की यह उपलब्धि दिल को सुकून देने वाला है।  भारत ने स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान स्थापित करते हुए वर्ष 2025-26 के दौरान पवन ऊर्जा क्षमता में 6.1 गीगावाट (GW) की रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की है. केंद्रीय नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने इसकी जानकारी देते हुए कहा कि यह अब तक की सबसे बड़ी सालाना बढ़ोतरी है, जो देश की ऊर्जा सुरक्षा और ग्रीन एनर्जी फ्यूचर की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. विंड इंडिपेंडेंट पावर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (WIPPA) के स्थापना दिवस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रह्लाद जोशी ने बताया कि भारत इस समय वैश्विक स्तर पर पवन ऊर्जा क्षमता के मामले में चौथे स्थान पर है. देश में वर्तमान में 56.1 गीगावाट से अधिक स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता है, जबकि करीब 28 गीगावाट की परियोजनाएं विभिन्न चरणों में कार्यान्वयन के अधीन हैं।  केंद्रीय मंत्री ने इस क्षेत्र में मौजूद अपार संभावनाओं पर जोर देते हुए कहा कि 150 मीटर हब ऊंचाई पर भारत की पवन ऊर्जा क्षमता लगभग 1,164 गीगावाट आंकी गई है, जो देश को ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है. उन्होंने विश्वास जताया कि मौजूदा प्रयासों की गति बरकरार रही तो भारत 2030 तक 100 गीगावाट और 2036 तक 156 गीगावाट पवन ऊर्जा क्षमता हासिल कर सकता है. यह लक्ष्य वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के राष्ट्रीय संकल्प को पूरा करने में भी अहम योगदान देगा।  पवन ऊर्जा भारत के एनर्जी सिस्‍टम को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. प्रह्लाद जोशी ने कहा कि पवन ऊर्जा का उत्पादन मुख्य रूप से शाम और रात के समय अधिक होता है, जो बिजली की अधिक मांग वाले समय के साथ मेल खाता है. आंकड़ों के अनुसार, लगभग 45 प्रतिशत पवन ऊर्जा उत्पादन पीक डिमांड के समय होता है, जिससे यह सौर ऊर्जा का एक मजबूत पूरक बन जाती है. नीतिगत सुधारों का उल्लेख करते हुए मंत्री ने बताया कि केंद्र सरकार ने नवीकरणीय खरीद दायित्व (Renewable Purchase Obligations) के तहत पवन ऊर्जा के लिए एक विशेष घटक जोड़ा है, जिससे इस क्षेत्र में निरंतर मांग सुनिश्चित हो सके. इसके अलावा लेट पेमेंट सरचार्ज नियमों का सख्ती से पालन, पारदर्शी बोली प्रक्रिया और अप्रूव्ड लिस्ट ऑफ मॉडल्स एंड मैन्युफैक्चरर्स (ALMM) जैसी व्यवस्थाओं ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है और घरेलू निर्माण को बढ़ावा दिया है।  भारत ने पवन ऊर्जा के क्षेत्र में मजबूत घरेलू विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र भी विकसित किया है. देश की सालाना उत्‍पादन क्षमता 24 गीगावाट से अधिक है, जबकि स्वदेशीकरण का स्तर 70 से 80 प्रतिशत तक पहुंच चुका है. ब्लेड, टावर, गियरबॉक्स और अन्य महत्वपूर्ण उपकरणों के निर्माण में भारत ने मजबूत सप्‍लाई चेन तैयार की है, जो इसे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाती है।  उद्योग से जुड़ी चुनौतियों पर बात करते हुए प्रह्लाद जोशी ने कहा कि सरकार अतिरिक्त पवन ऊर्जा टेंडर जारी करने पर विचार कर रही है. साथ ही हाइब्रिड और राउंड-द-क्लॉक (RTC) परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे ग्रिड की दक्षता और विश्वसनीयता में सुधार होगा. डिविएशन सेटलमेंट मैकेनिज्म (DSM) जुर्माने, पावर कर्टेलमेंट और ट्रांसमिशन में देरी जैसे मुद्दों पर भी सरकार गंभीरता से काम कर रही है और इनके व्यावहारिक समाधान तलाशे जा रहे हैं।  हाल ही में शुरू किए गए 500 मेगावाट के ‘कॉन्ट्रैक्ट्स फॉर डिफरेंस’ (CfD) मॉडल पायलट को बाजार में स्थिरता और राजस्व सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया गया. जोशी ने कहा कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत के पास पवन ऊर्जा क्षेत्र में एक भरोसेमंद विनिर्माण और आपूर्ति साझेदार के रूप में उभरने का सुनहरा अवसर है, खासकर ऐसे समय में जब कई देश अपनी सप्लाई चेन में विविधता लाने की कोशिश कर रहे हैं।  अंत में प्रह्लाद जोशी ने जोर दिया कि आने वाले दशक में 156 गीगावाट के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करना पूरी तरह संभव है, बशर्ते स्पष्ट नीतिगत दिशा, मजबूत संस्थागत सहयोग और उद्योग की सक्रिय भागीदारी बनी रहे. उन्होंने पवन, सौर और ऊर्जा भंडारण को मिलाकर एकीकृत हाइब्रिड प्रणालियों पर अधिक ध्यान देने की अपील की, ताकि देश को एक विश्वसनीय, टिकाऊ और हरित ऊर्जा भविष्य की ओर अग्रसर किया जा सके। 

भारत करेगा ₹75,272 करोड़ की बड़ी डिफेंस डील, जर्मनी से आएगी दुनिया की सबसे साइलेंट सबमरीन टेक्नोलॉजी

नई दिल्ली/बर्लिन भारत और जर्मनी के बीच रक्षा क्षेत्र में एक बहुत बड़ी डील होने जा रही है. यह डील 8 अरब डॉलर (करीब 75,272 करोड़ रुपये) की है और अगले 90 दिनों के अंदर इस पर फाइनल मुहर लग सकती है. जर्मन रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने बुधवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ बातचीत के बाद इसकी जानकारी दी है. इस प्रोजेक्ट के तहत भारत में छह एडवांस सबमरीन बनाई जाएंगी. भारत सरकार वर्तमान में इस एग्रीमेंट को अंतिम रूप देने के लिए जरूरी कदम उठा रही है. राजनाथ सिंह इस समय जर्मनी की तीन दिवसीय यात्रा पर हैं।  भारत और जर्मनी की सबसे बड़ी डिफेंस डील क्या है? भारत और जर्मनी के बीच होने वाला यह समझौता डिफेंस सेक्टर में एक नया इतिहास रचने जा रहा है. 8 अरब डॉलर यानी करीब 75 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की यह डील सबमरीन के निर्माण से जुड़ी है. जर्मन रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने कील शहर में राजनाथ सिंह से मुलाकात के बाद भरोसा जताया कि अगले तीन महीनों में इस पर हस्ताक्षर हो जाएंगे. यह पहली बार होगा जब जर्मनी अपनी सबमरीन प्रोडक्शन टेक्नोलॉजी किसी गैर-यूरोपीय देश को ट्रांसफर करेगा. इस डील के लिए जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच पहले ही चर्चा हो चुकी है।  भारतीय नौसेना की ताकत कैसे बढ़ेगी? इस मेगा प्रोजेक्ट के तहत कुल छह सबमरीन का निर्माण भारत में ही किया जाएगा. इसके लिए जर्मनी की दिग्गज कंपनी थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) और भारत की सरकारी कंपनी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड साथ मिलकर काम करेंगी. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने खुद कील में स्थित TKMS की शिपयार्ड फैसिलिटी का दौरा किया. वहां उन्होंने टाइप 212 क्लास की सबमरीन की वर्किंग और उसकी क्षमताओं का जायजा लिया. यह सबमरीन अपनी साइलेंट ऑपरेटिंग क्षमता और मारक क्षमता के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है. इनके आने से भारतीय नौसेना की समुद्री ताकत कई गुना बढ़ जाएगी।  डिफेंस रोडमैप से दोनों देशों को क्या मिलेगा? सिर्फ सबमरीन ही नहीं, बल्कि दोनों देशों ने डिफेंस इंडस्ट्रियल कोऑपरेशन रोडमैप पर भी साइन किए हैं. इस रोडमैप का मुख्य उद्देश्य डिफेंस इक्विपमेंट का साथ मिलकर विकास और प्रोडक्शन करना है. भारत और जर्मनी अब हाई-टेक टेक्नोलॉजी पर मिलकर काम करेंगे. इसमें संयुक्त ट्रेनिंग और कैपेसिटी बिल्डिंग जैसे अहम हिस्से भी शामिल हैं. इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन की ट्रेनिंग के लिए भी एक समझौता हुआ है. राजनाथ सिंह ने बर्लिन में पिस्टोरियस के साथ क्षेत्रीय और ग्लोबल सुरक्षा चुनौतियों पर भी विस्तार से चर्चा की है।  क्या यह डील चीन और पाकिस्तान के लिए चुनौती है? हिंद महासागर में बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए भारत के लिए अपनी अंडरवाटर ताकत बढ़ाना बहुत जरूरी है. वर्तमान में भारत की सबमरीन फ्लीट को अपडेट करने की जरूरत है. जर्मनी के साथ यह डील इसी कमी को पूरा करेगी. यह समझौता न केवल भारत की सुरक्षा को पुख्ता करेगा, बल्कि डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में ‘मेक इन इंडिया’ को भी बढ़ावा देगा. दोनों देशों ने सैन्य संबंधों को अपनी रणनीतिक साझेदारी का मुख्य आधार बताया है. इससे भविष्य में भारत की निर्भरता अन्य देशों से कम होगी और अपनी टेक्नोलॉजी विकसित करने में मदद मिलेगी। 

भारत का बड़ा कदम: होर्मुज नाकेबंदी के बीच रूसी तेल की खरीद अब सरल, 2030 तक की किचकिच खत्म

नई दिल्ली अमेरिका और ईरान के बीच लड़ाई और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी से उभरे तेल-गैस संकट के बीच भारत ने बड़ा रणनीतिक दांव खेला है. भारत सरकार ने रूसी तेल की सप्लाई को निर्बाध बनाए रखने के लिए समुद्री बीमा देने वाली रूसी कंपनियों की संख्या बढ़ा दी है, जिससे आने वाले वर्षों तक तेल आयात में आने वाली बाधाएं काफी हद तक खत्म हो जाएंगी।  डायरेक्टरेट जनरल ऑफ शिपिंग (DGS) के फैसले के मुताबिक, अब 8 की जगह 11 रूसी बीमा कंपनियों को भारत के बंदरगाहों पर आने वाले जहाजों को कवर देने की मंजूरी दी गई है. ये कंपनियां प्रोटेक्शन एंड इंडेम्निटी (P&I) कवर प्रदान करेंगी, जो अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिए बेहद जरूरी होता है।  भारत ने खत्म किया सबसे बड़ा रोड़ा दरअसल, रूस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के चलते यूरोप की बड़ी बीमा कंपनियों ने रूसी तेल ढोने वाले जहाजों को कवर देना कम कर दिया था. ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि वह अपने लिए वैकल्पिक इंश्योरेंस व्यवस्था तैयार करे. अब रूसी कंपनियों को मंजूरी देकर भारत ने इस समस्या का बड़ा समाधान निकाल लिया है।  गज़प्रोम इंश्योरेंस और रोसगोस्त्राख जैसी प्रमुख कंपनियों को फरवरी 2027 तक बीमा सेवाएं देने की अनुमति दी गई है, जबकि VSK, सोगाज़ और अल्फास्ट्राखोवानी जैसी कुछ कंपनियों को 2030 तक की लंबी मंजूरी मिल गई है. यह संकेत है कि भारत ने सिर्फ तात्कालिक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक समाधान पर भी काम किया है।  इसके अलावा सोग्लासिए, स्बरबैंक इंश्योरेंस, उगोरिया इंश्योरेंस ग्रुप और ASTK इंश्योरेंस जैसी कंपनियों का रजिस्ट्रेशन भी बढ़ाया गया है. वहीं दुबई स्थित इस्लामिक प्रोटेक्शन एंड इंडेम्निटी क्लब को भी फरवरी 2027 तक सेवाएं देने की अनुमति देकर भारत ने गैर-पश्चिमी विकल्पों का दायरा और बढ़ा दिया है।  होर्मुज की टेंशन पर लगाम यह फैसला ऐसे समय आया है, जब होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी ने दुनियाभर में तेल सप्लाई की चिंता बढ़ा दी है. दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी रास्ते से गुजरता है, और किसी भी बाधा का सीधा असर भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर पड़ता है।  भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है. हाल के वर्षों भारत ने सस्ते रूसी तेल का आयात काफी बढ़ा दिया है. ऐसे में बीमा कवर की उपलब्धता सुनिश्चित करना बेहद जरूरी था, क्योंकि बिना बीमा के कोई भी जहाज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऑपरेट नहीं कर सकता।  विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह कदम वैश्विक अस्थिरता के बीच एक ‘सेफ्टी कवच’ की तरह काम करेगा. इससे न सिर्फ रूसी तेल की सप्लाई बनी रहेगी, बल्कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को भी बिना रुकावट पूरा कर सकेगा. कुल मिलाकर, होर्मुज संकट और पश्चिमी दबाव के बीच भारत ने एक ऐसा रास्ता निकाल लिया है, जिससे 2030 तक तेल सप्लाई से जुड़ी बड़ी ‘किचकिच’ खत्म होती नजर आ रही है। 

भारतीय जहाजों पर हमले के बाद ईरान को नई दिल्ली का चेतावनी भरा संदेश, नतीजे भुगतने होंगे

नई दिल्ली दो भारतीय क्रूड ऑयल जहाजों पर ईरानी नौसेना की गोलीबारी में कोई हताहत नहीं हुआ है। भारतीय अधिकारियों ने रविवार को इसकी पुष्टि की। हालांकि, उन्होंने बताया कि जहाजों के एक केबिन की खिड़की का शीशा टूट गया। भारतीय अधिकारियों ने तेहरान को साफ संदेश दिया कि ऐसी किसी भी हरकत के नतीजे भुगतने पड़ेंगे। समझा जाता है कि भारत में ईरानी दूतावास और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के बीच इस घटना को लेकर मतभेद है। सूत्रों ने बताया कि IRGC अमेरिका और इजरायल के साथ संघर्ष के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले सभी जहाजों पर टोल वसूलना चाहता है, जबकि भारतीय अधिकारी ऐसी मांग मानने को तैयार नहीं हैं। 2 भारतीय जहाजों (जग अर्णव और सन्मार हेराल्ड) पर ईरानी नौसेना की ओर से गोलीबारी की यह घटना तब हुई है, जब ईरानी युद्धपोत IRIS लवान अभी भी कोच्चि बंदरगाह पर खड़ा है। यह भारत से शरण मांगकर आया था। इस युद्धपोत के 183 चालक दल सदस्यों में से लगभग 120 को पहले ही स्वदेश भेज दिया गया है, जबकि कुछ जरूरी कर्मी जहाज की देखभाल के लिए केरल के बंदरगाह पर रुके हुए हैं। इस ईरानी जहाज की ओर से भारत से शरण इसलिए मांगी गई क्योंकि उसका दूसरा युद्धपोत IRIS डेना 4 मार्च को श्रीलंका के पास अमेरिकी पनडुब्बी से हमला कर डुबो दिया गया था। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि IRGC स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूल रहा है, लेकिन एक भारतीय अधिकारी ने कहा कि भारत किसी भी तरह का टोल देने की कोई संभावना नहीं है। उन्होंने बताया कि ईरानी गोलीबारी की इस घटना के नतीजे सामने होंगे। दोनों भारतीय जहाज बड़े क्रूड ऑयल टैंकर हैं और लाखों बैरल तेल ले जा रहे थे, जो शनिवार को ओमान के उत्तर में ईरानी नौसेना की गोलीबारी का शिकार हुए और उन्हें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से वापस मुड़ना पड़ा। नई दिल्ली ने ईरानी राजदूत को किया तलब ईरान ने पहले कहा था कि अमेरिका और इजरायल के साथ चल रहे संघर्ष में शामिल न होने वाले देशों के जहाजों को निशाना नहीं बनाया जाएगा। ताजा घटनाक्रम के बाद भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से कड़ी आपत्ति जताई गई है। नई दिल्ली ने ईरानी राजदूत को तलब किया और घटना पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। मरीन ट्रैफिक के अनुसार, भारतीय झंडे वाला बल्क कैरियर जग अर्णव सऊदी अरब के अल जुबैल से भारत की ओर आ रहा था। वहीं, दूसरा जहाज सन्मार हेराल्ड इराक से क्रूड ऑयल लेकर भारत जा रहा था। अधिकारियों ने कहा कि भारत इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की गोलीबारी को बहुत गंभीरता से ले रहा है और देश स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में खुली और स्वतंत्र नौवहन का समर्थन करता है। ईरान और ओमान के बीच स्थित होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम तेल पारगमन गलियारों में से एक है, जिसमें वैश्विक क्रूड शिपमेंट का 20% हिस्सा गुजरता है। भारत उन देशों में शामिल है जिनके सबसे अधिक जहाज इस स्ट्रेट से गुजरते हैं, जो खाड़ी क्षेत्र से ऊर्जा आयात पर उसकी निर्भरता को दर्शाता है। ईरान ने अमेरिका के साथ युद्ध के बीच भारत को मित्र राष्ट्रों की सूची में रखा है, जिनके जहाजों को इस स्ट्रेट से गुजरने की इजाजत दी जा रही है, जबकि अन्य देशों के जहाजों को ड्रोन-मिसाइल हमलों की धमकी देकर रोका जा रहा है। “होर्मुज़ फिर से बंद”-VHF प्रसारण ने बढ़ाई दहशत घटना के दौरान कई जहाजों ने एक रेडियो प्रसारण सुना, जिसमें दावा किया गया कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य को “पूरी तरह बंद” कर दिया गया है। प्रसारण में कहा गया कि अमेरिका के साथ वार्ता विफल होने के बाद यह कदम उठाया गया है और किसी भी जहाज को गुजरने की अनुमति नहीं होगी। इस संदेश ने पूरे समुद्री क्षेत्र में दहशत फैला दी, जिसके बाद कई जहाजों ने तुरंत अपनी दिशा बदल ली। भारत की कड़ी प्रतिक्रिया: ईरानी राजदूत तलब घटना के बाद भारत सरकार ने ईरानी राजदूत को तलब किया और इस पूरे मामले पर कड़ा विरोध दर्ज कराया। विदेश मंत्रालय ने इस घटना को गंभीर चिंता का विषय बताया और सुरक्षित समुद्री मार्ग सुनिश्चित करने की मांग की। सरकारी सूत्रों के अनुसार, शिपिंग महानिदेशालय (DG Shipping) स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और भारतीय नाविकों की सुरक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।   ईरान की सफाई और कूटनीतिक संतुलन की कोशिश इस बीच, ईरान की ओर से स्थिति को शांत करने की कोशिश भी दिखाई दी। भारत में ईरानी प्रतिनिधि ने कहा कि उन्हें घटना के विस्तृत विवरण की जानकारी नहीं है और दोनों देशों के बीच संबंध मजबूत बने हुए हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि मामला जल्द सुलझ जाएगा। समुद्री गलियारों में बढ़ता अनिश्चितता का साया होर्मुज़ जलडमरूमध्य वैश्विक तेल व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है। ऐसे में इस तरह की घटनाएं न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। फिलहाल स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है और अंतरराष्ट्रीय निगरानी तेज कर दी गई है। क्या कहा भारत ने ईरान से? भारत ने ईरान से साफ कहा कि वह इस घटना को गंभीरता से लेता है और ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए। विदेश सचिव ने ईरानी राजदूत से आग्रह किया कि वे भारत की चिंता अपने देश के अधिकारियों तक पहुंचाएं और भारतीय जहाजों के सुरक्षित मार्ग को जल्द बहाल करें। क्या ईरान ने कोई जवाब दिया? बैठक में ईरान के राजदूत ने भारत की चिंताओं को सुना और भरोसा दिया कि वे इस संदेश को तेहरान तक पहुंचाएंगे। उन्होंने कहा कि भारत की बात को गंभीरता से लिया जाएगा और संबंधित अधिकारियों तक तुरंत जानकारी दी जाएगी। होर्मुज का महत्व क्यों? होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है। यहां से बड़ी मात्रा में वैश्विक कच्चा तेल गुजरता है। भारत जैसे देश, जो खाड़ी क्षेत्र से तेल आयात करते हैं, इस मार्ग पर काफी निर्भर हैं। ऐसे में यहां किसी भी तरह का तनाव सीधे भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर असर डाल सकता है। क्या आगे हालात सुधरेंगे? भारत ने साफ किया है कि वह इस मार्ग … Read more

भारत ने अरब सागर में 400 किलोमीटर का नो फ्लाई जोन घोषित किया, ईरान युद्ध के बीच पाकिस्तान में खलबली

मुंबई  ईरान जंग की वजह से दुनियाभर में उथल-पुथल की स्थिति है. होर्मुज स्‍ट्रेट से जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने के कारण एनर्जी सप्‍लाई चेन भी चरमरा गई है. इसके चलते एशिया से यूरोप तक में पेट्रोल-डीजल और गैस की आपूर्ति में बाधा आई है. इन सबके बीच अरब सागर में अलग ही घमासान मचा हुआ है. पहले पाकिस्‍तान ने मिसाइल टेस्टिंग को लेकर नोटिस टू एयरमेन (NOTAM) जारी किया. इसके बाद भारत ने अरब सागर में ही पाकिस्‍तान से दोगुने दायरे तक के लिए NOTAM जारी कर दिया. भारत के इस कदम से पड़ोसी देश में खलबली मच गई है. भारत की तरफ से कुछ सप्‍ताह पहले अंडमान सागर क्षेत्र में भी NOTAM जारी किया गया था. यह 1500 से 3500 किलोमीटर तक के लिए था. अब अरब सागर में नो फ्लाई जोन का नोटिस इश्‍यू किया गया है।  अरब सागर एक बार फिर रणनीतिक गतिविधियों का केंद्र बनता दिख रहा है, जहां भारत और पाकिस्तान ने मिसाइल परीक्षणों को लेकर लगातार नेविगेशनल चेतावनियां (NOTAM) जारी की हैं. दोनों देशों द्वारा जारी इन अलर्ट्स से क्षेत्र में समानांतर सैन्य गतिविधियों का संकेत मिलता है, जिसने सुरक्षा विश्लेषकों का ध्यान आकर्षित किया है. आधिकारिक सूचनाओं के मुताबिक, पाकिस्तान ने 20 अप्रैल को सुबह 3 बजे से 21 अप्रैल दोपहर 3 बजे तक मिसाइल परीक्षण के लिए समय निर्धारित किया है. इसके तुरंत बाद भारत ने भी 22 अप्रैल सुबह 9:30 बजे से 25 अप्रैल रात 9:30 बजे तक अपने मिसाइल टेस्टिंग प्रोग्राम की घोषणा की है. NOTAM और समुद्री एडवाइजरी आमतौर पर नागरिक विमानों और जहाजों को सुरक्षित दूरी बनाए रखने के लिए जारी की जाती हैं, ताकि सैन्य अभ्यास के दौरान किसी तरह की दुर्घटना से बचा जा सके।  पाकिस्‍तान 200 तो भारत का 400 किलोमीटर का NOTAM इन परीक्षणों के लिए चिन्हित क्षेत्र अरब सागर में एक-दूसरे की समुद्री सीमाओं के काफी करीब बताए जा रहे हैं. पाकिस्तान का परीक्षण क्षेत्र लगभग 200 किलोमीटर तक फैला है, जबकि भारत का क्षेत्र करीब 400 किलोमीटर का है, जो अपेक्षाकृत बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास की ओर इशारा करता है. हालांकि, भारत और पाकिस्तान दोनों ही नियमित रूप से अपनी सैन्य तैयारियों के तहत मिसाइल परीक्षण करते रहे हैं, लेकिन इस बार इनका लगभग एक साथ होना विशेष महत्व रखता है. दोनों देश परमाणु क्षमता से लैस मिसाइल सिस्टम रखते हैं और इस तरह के परीक्षण पूर्व-निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत किए जाते हैं, ताकि किसी भी तरह की गलतफहमी या तनाव की स्थिति से बचा जा सके।  अरब सागर में भारत का सर्विलांस शिप इसी बीच, क्षेत्र में नौसैनिक गतिविधियों के बढ़ने की भी खबरें सामने आई हैं. बताया जा रहा है कि भारत ने अरब सागर में निगरानी के लिए अपने सर्विलांस पोत (INS ध्रुव) तैनात किए हैं, जबकि पाकिस्तान की नौसेना के फ्रिगेट्स इस समय श्रीलंका के आधिकारिक दौरे पर हैं. हालांकि ये गतिविधियां सामान्य सैन्य संचालन का हिस्सा हो सकती हैं, लेकिन मिसाइल परीक्षणों के साथ इनका समय मेल खाना दोनों देशों की सतर्कता को दर्शाता है. इस तरह की समानांतर सैन्य गतिविधियां क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन को प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन स्थापित संचार तंत्र और पारदर्शिता के चलते स्थिति नियंत्रण में रहती है. यह घटनाक्रम ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के लगभग एक साल बाद सामने आया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि दोनों देश अपनी सैन्य क्षमताओं को लगातार मजबूत करने और रणनीतिक संतुलन बनाए रखने की दिशा में सक्रिय हैं। 

चीन बना भारत का टॉप ट्रेड पार्टनर, 151 अरब डॉलर का कारोबार, ट्रंप के बाद जिनपिंग की बड़ी जीत

नई दिल्ली भारत के ग्लोबल ट्रेड में बड़ा उलटफेर देखने को मिला है. अमेरिका का दबदबा अब कमजोर पड़ता दिख रहा है, क्योंकि चीन ने 2025-26 में भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर बनने की बाजी मार ली है. भारत और चीन के बीच कुल ट्रेड 151.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. दिलचस्प बात यह है कि जहां ट्रेड बढ़ा है, वहीं भारत का चीन के साथ ट्रेड डिफिसिट भी बढ़ गया है।  अमेरिका दूसरे नंबर पर खिसका पिछले चार सालों (2021-22 से 2024-25) तक अमेरिका इस लिस्ट में टॉप पर बना हुआ था, लेकिन अब चीन ने उसे पीछे छोड़ दिया है. हालांकि, इस ट्रेड के साथ एक चिंताजनक बात भी सामने आई है. भारत का चीन के साथ ट्रेड डिफिसिट बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है।  क्या कहते हैं आंकड़े?     चीन के साथ ट्रेड- पिछले वित्त वर्ष में भारत ने चीन को 19.47 अरब डॉलर का सामान बेचा (निर्यात किया), जबकि वहां से 131.63 अरब डॉलर का सामान खरीदा (आयात किया). इसके चलते ट्रेड डिफिसिट बढ़कर 112.6 अरब डॉलर हो गया है, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है।      अमेरिका के साथ ट्रेड- अमेरिका को होने वाले निर्यात में मामूली बढ़त हुई है, लेकिन वहां से आयात बढ़ने की वजह से भारत का ट्रेड सरप्लस (मुनाफा) 40.89 अरब डॉलर से घटकर 34.4 अरब डॉलर रह गया है।      दूसरे देशों का हाल– रिपोर्ट के अनुसार, भारत का ब्रिटेन, नीदरलैंड और सिंगापुर जैसे देशों के साथ निर्यात घटा है. वहीं, यूएई, जर्मनी और इटली जैसे देशों के साथ ट्रेड में पॉजिटिव बढ़त देखी गई है. रूस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से होने वाले आयात में भी कमी आई है।  भारत का ट्रेड डिफिसिट कम होकर 20.67 अरब डॉलर हुआ भारत का मर्चेंडाइज ट्रेड डिफिसिट मार्च में कम होकर 20.67 अरब डॉलर हो गया है. वहीं, देश का निर्यात फरवरी के 36.61 अरब डॉलर से 6.3 फीसदी बढ़कर 38.92 अरब डॉलर हो गया है. वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने बताया कि 2025-26 के लिए भारत का कुल निर्यात 860.09 अरब डॉलर से ज्यादा हो गया है, जो 2024-25 के इसी अवधि के आंकड़े 825.26 अरब डॉलर की तुलना में 4.22 फीसदी की ग्रोथ दर्शाता है. इस दौरान भारत का आयात 5.98 फीसदी घटकर 59.9 अरब डॉलर रह गया, जिससे फिस्कल डेफिसिट में भी कमी आई है।