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ऊर्जा सुरक्षा पर भारत एक्टिव: रूस से भरोसा मिला तो अमेरिका से की खास अपील

 नई दिल्ली मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और पर्शियन गल्फ में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने अमेरिका से रूस से तेल खरीद पर दी गई छूट को आगे बढ़ाने की अपील की है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, नई दिल्ली ने वॉशिंगटन से कहा है कि मौजूदा हालात में ऊर्जा सप्लाई बनाए रखना बेहद जरूरी है, क्योंकि तेल बाजार में जारी अस्थिरता का असर सीधे भारत की अर्थव्यवस्था और आम लोगों पर पड़ सकता है।  अमेरिका ने पहली बार मार्च में भारत और अन्य मुल्कों को रूसी तेल खरीदने के लिए विशेष छूट दी थी. इसके बाद इसे बढ़ाकर 16 मई 2026 तक कर दिया गया. इस छूट की वजह से भारत रियायती दरों पर रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीद पा रहा है।  हालांकि, यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका लगातार भारत पर दबाव बनाता रहा है कि वह रूस से तेल खरीद कम करे ताकि मॉस्को पर आर्थिक दबाव बढ़ाया जा सके. लेकिन अब ईरान युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट में तनाव के कारण वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हो रही है, जिससे भारत की चिंता बढ़ गई है।  इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय अधिकारियों ने अमेरिकी पक्ष से कहा है कि अगर तेल बाजार में उथल-पुथल जारी रहती है तो इसके गंभीर सामाजिक और आर्थिक असर हो सकते हैं. खासतौर पर भारत जैसे देश में, जहां 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा जरूरतें काफी बड़ी हैं और पहले से ही कुकिंग गैस की कमी जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं. भारत के तेल मंत्रालय और विदेश मंत्रालय ने फिलहाल इस मामले पर सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की है. वहीं अमेरिकी ट्रेजरी विभाग की तरफ से भी कोई आधिकारिक जवाब नहीं आया है।  रूस का एनर्जी सप्लाई पूरा करने का वादा नई दिल्ली में होने वाली ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में शामिल होने से पहले ब्रॉडकास्टर आरटी इंडिया से बातचीत में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा कि रूस यह सुनिश्चित करेगा कि भारत के ऊर्जा हित पूरी तरह सुरक्षित रहें. उन्होंने कहा, "मैं गारंटी दे सकता हूं कि रूसी ऊर्जा सप्लाई से जुड़े भारत के हित प्रभावित नहीं होंगे. हम हरसंभव कोशिश करेंगे कि यह अनुचित कंपटीशन हमारे समझौतों को नुकसान न पहुंचाए।  रूसी विदेश मंत्री लावरोव ने जोर देकर कहा कि रूस ने ऊर्जा क्षेत्र में कभी भी भारत या किसी अन्य साझेदार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में विफलता नहीं दिखाई है. उन्होंने तमिलनाडु स्थित कुडनकुलम न्यूक्लियर एनर्जी प्लांट को भारत-रूस सहयोग का प्रमुख उदाहरण बताया और कहा कि नए पावर यूनिट्स पर काम जारी है. उन्होंने कहा, "भारत को और ऊर्जा की जरूरत है. हम गैस, तेल और कोयले जैसे हाइड्रोकार्बन की सप्लाई लगातार जारी रखे हुए हैं।  इस बीच भारत ने मई महीने में रिकॉर्ड स्तर पर रूसी तेल आयात किया है. इकोनॉमिक टाइम्स ने डेटा फर्म क्लेपेर के हवाले से बताया कि, मई में भारत रोजाना करीब 23 लाख बैरल रूसी तेल आयात कर रहा है. अनुमान है कि पूरे महीने का औसत करीब 19 लाख बैरल प्रतिदिन रह सकता है, जो अब भी बेहद बड़ा आंकड़ा माना जा रहा है।  विशेषज्ञों का मानना है कि मिडिल ईस्ट में संघर्ष लंबा खिंचने की स्थिति में भारत रूस से सस्ते तेल पर अपनी निर्भरता और बढ़ा सकता है, क्योंकि इससे घरेलू ईंधन कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है। 

भारत दौरे को लेकर सक्रिय हुआ बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड, BCCI से लगातार संपर्क में अधिकारी

ढाका भारत और बांग्लादेश के बीच क्रिकेट रिश्तों को लेकर पिछले कुछ महीनों से लगातार विवाद और तनाव की खबरें सामने आती रही थीं. लेकिन अब पूर्व बांग्लादेशी कप्तान और बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (BCB) के मौजूदा अध्यक्ष तमीम इकबाल ने दोस्ताना बयान देकर माहौल बदलने की कोशिश की है। तमीम इकबाल ने साफ कहा है कि अब भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (BCCI) और बीसीबी के बीच कोई बड़ा मुद्दा नहीं बचा है और भारत का बांग्लादेश दौरा दोनों देशों के रिश्तों को नई दिशा दे सकता है. भारत को अगस्त 2025 में बांग्लादेश दौरे पर ODI और T20I सीरीज खेलनी थी. लेकिन दोनों देशों के बीच बढ़े राजनीतिक तनाव के कारण यह दौरा टाल दिया गया और इसे सितंबर 2026 तक शिफ्ट कर दिया गया। मुस्ताफिजुर को बाहर करने पर बिगड़े हालात इसके बाद दोनों बोर्ड्स के संबंधों में उस वक्त तल्खी आई, जब बीसीसीआई के निर्देश पर इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) फ्रेंचाइजी कोलकाता नाइट राइडर्स ने मुस्ताफिजुर रहमान को अपने स्क्वॉड से रिलीज कर दिया. हालात इतने खराब हो गए थे कि बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने खिलाड़ियों की सुरक्षा का हवाला देते हुए आईसीसी मेन्स टी20 वर्ल्ड कप 2026 से अपना नाम वापस ले लिया था. हालांकि बाद में स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हुई और अब भारत सितंबर 2026 में बांग्लादेश दौरे पर 6 मुकाबले खेल सकता है। तमीम इकबाल ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत करते हुए कहा कि उनके मौजूदा बीसीसीआई अध्यक्ष मिथुन मन्हास के साथ काफी अच्छे रिश्ते हैं. उन्होंने कहा कि दोनों ने आईपीएल में एक साथ क्रिकेट खेला है और मिथुन कई बार ढाका लीग खेलने भी बांग्लादेश आ चुके हैं। तमीम इकबाल ने भारतीय टीम की सुरक्षा को लेकर भी बड़ा बयान दिया. तमीम ने साफ कहा कि बांग्लादेश में भारतीय टीम की सुरक्षा को लेकर कभी कोई खतरा नहीं रहा. तमीम कहते हैं, 'जब भारत बांग्लादेश आता है तो पूरा स्टेडियम भर जाता है. लोग इस मुकाबले को बेहद पसंद करते हैं. मुझे नहीं लगता कि अब बीसीबी और बीसीसीआई के बीच कोई वास्तविक समस्या बची है। भारत का बांग्लादेश दौरा सिर्फ क्रिकेट सीरीज नहीं होगा, बल्कि दोनों देशों के क्रिकेट रिश्तों को फिर से मजबूत करने का बड़ा मौका साबित हो सकता है. अगर यह सीरीज तय कार्यक्रम के अनुसार होती है, तो यह लंबे समय बाद दोनों बोर्ड्स के बीच रिश्तों में आई खटास को खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम माना जाएगा। भारत का बांग्लादेश दौरा (2026) 1 सितंबर- पहला वनडे, मीरपुर 3 सितंबर- दूसरा वनडे, मीरपुर 6 सितंबर- तीसरे वनडे, चटगांव 9 सितंबर- पहला टी20, चटगांव 12 सितंबर- दूसरा टी20I, मीरपुर 13 सितंबर- तीसरा टी20I, मीरपुर

भारतीयों के लिए खुशखबरी: कनाडा में परमिट समाप्ति के बाद भी 90 दिन तक कानूनी रूप से रह सकेंगे

चंडीगढ़  कनाडा में रह रहे भारतीयों खासकर पंजाबियों के लिए बड़ी राहत की खबर है। अब वर्क परमिट या स्टडी परमिट खत्म होने के बाद लोगों को तुरंत भारत लौटने की मजबूरी नहीं होगी। कनाडा की इमिग्रेशन एजेंसी इमिग्रेशन, रिफ्यूजी एंड सिटिजनशिप कनाडा ने नियमों में बदलाव करते हुए नया विकल्प शुरू किया है। पहले नियमों के तहत यदि किसी व्यक्ति का वर्क परमिट खत्म हो जाता था तो उसे केवल वर्कर कैटेगरी में ही अपना स्टेटस बहाल कराना पड़ता था। इसी तरह स्टूडेंट को भी स्टूडेंट कैटेगरी में ही आवेदन करना होता था। नई नौकरी या नया कोर्स न मिलने की स्थिति में लोगों को कनाडा छोड़कर भारत लौटना पड़ता था। अब नए नियमों के तहत वर्क या स्टडी परमिट खत्म होने के बाद व्यक्ति 90 दिनों के भीतर विजिटर रिकॉर्ड के लिए आवेदन कर सकता है। इससे वह बिना नौकरी या पढ़ाई के भी कानूनी रूप से कनाडा में रह सकेगा। हालांकि इमिग्रेशन, रिफ्यूजी एंड सिटिजनशिप कनाडा ने स्पष्ट किया है कि स्टेटस बहाली की प्रक्रिया पूरी होने तक व्यक्ति न तो काम कर सकेगा और न ही पढ़ाई जारी रख पाएगा। इमिग्रेशन एक्सपर्ट पूजा सिंह ने बताया कि पहले भी 90 दिन का नियम लागू था लेकिन उस दौरान व्यक्ति केवल अपने पुराने स्टेटस को ही बहाल कर सकता था। अब विजिटर रिकॉर्ड का विकल्प मिलने से लोगों को अतिरिक्त राहत मिली है। नए नियम के तहत विजिटर स्टेटस बहाल करने के लिए 346.25 कनाडाई डॉलर फीस तय की गई है। यह नियम 1 मई 2026 से लागू हो चुका है। एक्सपर्ट्स ने सलाह दी है कि लोग समय रहते आवेदन करें क्योंकि आउट ऑफ स्टेटस होने का असर भविष्य में पीआर और एक्सप्रेस एंट्री प्रोफाइल पर पड़ सकता है। 

72 घंटे में भारत की जीत, अमेरिकी विशेषज्ञ ने साझा किया रणनीति का विश्लेषण

 नई दिल्ली अमेरिकी सैन्य विशेषज्ञ जॉन स्पेंसर ने ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ पर कहा है कि भारत ने इस संघर्ष में रणनीतिक रूप से बड़ी जीत हासिल की. उन्होंने बताया कि 10 मई की सुबह तक भारत ने हवाई क्षेत्र में पूरी श्रेष्ठता बना ली थी, जबकि पाकिस्तान अपने हवाई ऑपरेशनों को जारी रखने में कमजोर हो चुका था।  यह नतीजा किसी एक हमले या छोटी लड़ाई का परिणाम नहीं था, बल्कि कई दिनों तक चली सावधानीपूर्वक योजना और दुश्मन की एयर डिफेंस सिस्टम को नष्ट करने की मुहिम का नतीजा था. मई 2025 में भारत ने 6-7 मई की रात पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी ठिकानों पर हमले किए।  जब पाकिस्तान ने भारत के शहरों और सैन्य ठिकानों पर जवाबी हमला किया, तब भारत ने भी पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों पर मजबूत जवाब दिया. यह चार दिन का संघर्ष 10 मई को पाकिस्तान की मांग पर युद्धविराम के साथ खत्म हुआ. इस दौरान भारत ने पाकिस्तानी एयरबेस, एयर डिफेंस सिस्टम और कई अन्य सैन्य सुविधाओं को निशाना बनाया।  भारत की रणनीति कैसे काम की अमेरिकी सेना के पूर्व मेजर जॉन स्पेंसर अब मैडिसन पॉलिसी फोरम में वॉर स्टडीज के चेयर और अर्बन वारफेयर इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर हैं. उन्होंने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर विस्तार से बताया कि भारत ने कैसे पाकिस्तान की हवाई रक्षा को कमजोर किया. उन्होंने कहा कि 8 मई को भारत ने पाकिस्तानी हवाई रक्षा ठिकानों पर हमले किए, जिनमें चूनियां और पासरूर में अर्ली वार्निंग रडार और कम से कम एक HQ-9 सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल बैटरी शामिल थी. 9 मई को भी और हमले किए गए।  ये हमले ज्यादातर लॉइटरिंग मुनिशन से किए गए. इनका मकसद था कि पाकिस्तान के रडार और मिसाइल सिस्टम को लगातार दबाव में रखा जाए, चाहे वे पहले हमलों से बचे हों या नई जगह पर तैनात किए गए हों. स्पेंसर ने लिखा कि इन हमलों से पाकिस्तान की देखने, कॉर्डिनेशन करने और जवाब देने की क्षमता बुरी तरह प्रभावित हुई. हवाई युद्ध में यह बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इससे पहले कि लड़ाकू विमान आमने-सामने आएं, दुश्मन की रक्षा प्रणाली ही ध्वस्त हो जाती है।  S-400 ने बदला खेल, पाकिस्तानी विमानों पर हालत खराब हो गई स्पेंसर ने एक और महत्वपूर्ण बात बताई. भारत की S-400 मिसाइल सिस्टम ने एक हाई वैल्यू एयरबोर्न प्लेटफॉर्म को करीब 300 किलोमीटर दूर से निशाना बनाया. इससे पाकिस्तान एयर फोर्स को यह सोचना पड़ा कि वे कहां और कैसे अपने विमानों को उड़ा सकते हैं. इस वजह से पाकिस्तानी विमानों का ऑपरेशन क्षेत्र सीमित हो गया. उन्हें ज्यादा सावधानी बरतनी पड़ी।  स्पेंसर ने माना कि शुरू के कुछ घंटों में पाकिस्तान ने कुछ भारतीय विमानों को गिराने में सफलता हासिल की. यह शुरुआती सफलता पाकिस्तान के लिए प्रचार का अच्छा मौका बनी, लेकिन स्पेंसर कहते हैं कि छोटी-मोटी सफलता पूरे अभियान की जीत नहीं तय करती।  पाकिस्तान ने बाद में सैकड़ों ड्रोन, CM-400एकेजी मिसाइलें, फतेह और हत्फ रॉकेट दागे, लेकिन भारत की एकीकृत एयर डिफेंस सिस्टम ने इन्हें रोक लिया. भारत ने अपनी स्वदेशी आईएसीसीसीएस (Integrated Air Command, Control and Communication System) और आकाशतीर प्रणाली का इस्तेमाल किया, जिसने पाकिस्तानी हमलों को नाकाम कर दिया।  आधुनिक युद्ध: सिर्फ विमान नहीं, पूरा सिस्टम लड़ता है जॉन स्पेंसर ने जोर देकर कहा कि आधुनिक युद्ध में सिर्फ लड़ाकू विमान एक-दूसरे से नहीं लड़ते. इसमें एंटी-एयरक्राफ्ट गन, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, कमांड नेटवर्क और एकीकृत सिस्टम बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं. भारत के पास बड़े पैमाने, गहराई और बेहतर एकीकरण था. इसी वजह से भारत शुरुआती झटके को सहन कर सका और फिर अपना ऑपरेशनल टेम्पो पाकिस्तान पर थोप दिया।  दूसरी ओर पाकिस्तान मुख्य रूप से चीन से मिले हथियारों पर निर्भर था. शुरुआत में इनसे कुछ सफलता मिली, लेकिन जब भारत ने पाकिस्तान की महत्वपूर्ण नोड्स को नष्ट कर दिया तो पाकिस्तान लड़ने लायक नहीं बचा।  रणनीतिक जीत भारत की ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने दिखाया कि अच्छी योजना, स्वदेशी तकनीक और मजबूत एकीकरण से छोटी-मोटी शुरुआती असफलताओं को भी पलटकर बड़ी जीत हासिल की जा सकती है. जॉन स्पेंसर जैसे अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि भारत ने हवाई श्रेष्ठता हासिल कर पाकिस्तान को ऑपरेशन करने लायक ही नहीं छोड़ा. यह संघर्ष दिखाता है कि भविष्य के युद्धों में सिस्टम की मजबूती और निरंतर दबाव कितना निर्णायक साबित होता है। 

भारत-वियतनाम रिश्तों में मजबूती, 13 समझौते और जल्द ही UPI का फास्ट पेमेंट सिस्टम से कनेक्शन

नई दिल्ली  वियतनाम के राष्ट्रपति तो लाम के भारत दौरे को दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में गति देने वाला माना जा रहा है. भारत और वियतनाम अपनी व्यापक रणनीतिक साझेदारी के तहत सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. दोनों देशों के बीच बुधवार को 13 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं।  पीएम मोदी ने बताया कि हमारी साझा विरासत को जीवंत रखने के लिए, हम वियतनाम के प्राचीन चम्पा सभ्यता के मी सॉन और न्हान टवर मंदिरों का पुनर्निमाण कर रहे हैं. अब हम चम्पा सभ्यता की मनुस्क्रिप्ट को भी डिजिटलाइज करेंगे, और इस अमूल्य धरोहर को आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित करेंगे।  मोदी ने कहा कि हिंद-प्रशांत के लिए दोनों देशों का नजरिया एक जैसा है और दोनों पक्ष कानून के राज, शांति, स्थिरता और खुशहाली में योगदान देते रहेंगे. ऐसा समझा जाता है कि दोनों पक्षों के बीच प्रतिनिधिमंडल स्तर की बातचीत में चीन की बढ़ती मिलिट्री ताकत पर भी चर्चा हुई।  लाम, एक उच्च स्तर प्रतिनिधिमंडल के साथ, मंगलवार को भारत की अपनी तीन दिन की यात्रा पर निकले. इस महीने राष्ट्रपति चुने जाने के बाद यह देश की उनकी पहली सरकारी यात्रा है।  पीएम मोदी ने अपने मीडिया स्टेटमेंट में कहा कि भारत और वियतनाम ने रिश्तों को बेहतर व्यापक रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक ले जाने का फैसला किया है।  मोदी ने कहा, "वियतनाम भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी और विज़न ओशन का एक अहम स्तंभ है. हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भी, हम एक जैसी सोच रखते हैं." उन्होंने कहा, "हमारे मजबूत रक्षा और सुरक्षा सहयोग के जरिए, हम कानून के राज, शांति, स्थिरता और खुशहाली में योगदान देते रहेंगे।  प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत वियतनाम के सहयोग से आसियान (Association of Southeast Asian Nations) के साथ अपने संबंधों को और बढ़ाएगा. उन्होंने कहा कि वित्तीय संपर्क को बढ़ावा देने के लिए हमने दोनों देशों के सेंट्रल बैंकों के बीच सहयोग बढ़ाने का फैसला किया है।  उन्होंने कहा कि भारत का यूपीआई और वियतनाम का फास्ट पेमेंट सिस्टम जल्द ही जुड़ जाएगा. अपनी बात में लैम ने कहा कि दोनों पक्ष राजनीतिक विश्वास को गहरा करने और सुरक्षा सहयोग को बढ़ाने पर सहमत हुए।  पिछले साल, दोनों पक्षों ने सबमरीन सर्च, रेस्क्यू और व्यवस्था के लिए एक फ्रेमवर्क बनाने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. उन्होंने द्विपक्षीय रक्षा उद्योग सहयोग को मजबूत करने के लिए एक आशय का पत्र (LoI) पर भी हस्ताक्षर किया। 

हॉर्मुज बंद, फिर भी UAE और सऊदी से भारत में आयी भारी मात्रा में तेल, जानिए चौंकाने वाले आंकड़े

 नई दिल्‍ली अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का रास्‍ता पूरी तरह से ब्‍लॉक है. अमेरिका का दावा है कि इस रास्‍ते से कोई तेल की जहाज नहीं गुजर रही है, क्‍योंकि उसकी सेना ने पूरी तरह से नाकाबंदी कर दी है. इतना ही नहीं अमेरिका ने वहां से गुजरने वाले जहाजों को देखते ही उड़ाने का भी आदेश दिया है।  यह वह रास्‍ता है, जहां से भारत और चीन जैसे देश मिडिल ईस्‍ट से भारी मात्रा में तेल का आयात करते हैं. इस बीच, एक ऐसा आंकड़ा सामने आया है, जो आपको भी हैरान कर देगा. दरअसल, मार्च की तुलान में भारत के तेल आयात का डाटा जारी हुआ है, जिसके मुत‍ाबिक भारत ने होर्मुज बंद रहने के बाद भी मिडिल ईस्‍ट के देशों से खूब तेल का आयात किया है. हालांकि, रूसी तेल खरीद में छूट मिलने के बाद भी कमी देखी गई है।  रूसी तेल का आयात गिरा  कमोडिटी एनालिटिक्स फर्म केप्लर के आंकड़ों के अनुसार, भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात अप्रैल में मार्च की रिकॉर्ड खरीद की तुलना में 21 प्रतिशत गिर गया. अप्रैल में हरदिन 1.56 मिलियन बैरल (एमबीडी) तेल का आयात यूक्रेन में हड़ताल के बाद एक प्रमुख रूसी टर्मिनल पर लोडिंग में आई बाधाओं से प्रभावित हुआ. यह मार्च की तुलना में भारी गिरावट है , जब भारत का आयात 1.98 मिलियन बैरल प्रतिदिन के रिकॉर्ड स्‍तर पर था।  भारत के किस कंपनी ने कितना तेल मंगाया?  इंडियन ऑयल ने हर दिन 677,000 बैरल तेल खरीदा और नंबर वन पर है. इसकी खरीद मार्च की तुलना में 14 फीसदी ज्‍यादा है. रिलायंस इंडस्ट्रीज 235,000 बैरल प्रतिदिन तेल खरीदकर दूसरे स्थान पर है. भारत पेट्रोलियम ने प्रतिदिन 176,000 बैरल तेल आयात किया, जो मार्च से 38 प्रतिशत कम है।  नाकाबंदी के बाद भी बढ़ी तेल खरीद  ऊर्जा के लिए महत्वपूर्ण मार्ग होर्मुज की नाकाबंदी के बावजूद, अप्रैल में पश्चिम एशियाई देशों से भारत में तेल की आपूर्ति में सुधार देखने को मिला है. सऊदी अरब से हरदिन 704,000 बैरल तेल का आयात हुआ, जो मार्च की तुलना में 23 प्रतिशत अधिक है. संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से आयात में 191 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह बढ़कर हरदिन 591,000 बैरल पहुंच गया।  नाकाबंदी के बाद भी कैसे भारत आया तेल?  तेल को सऊदी अरब की यानबू और यूएई की फुजैराह पाइपलाइनों के माध्यम से भेजा गया था, जो होमुज को बाईपास करती हैं और वैश्विक ऊर्जा आयात के लिए महत्वपूर्ण मार्गों के तौर पर उभर रही है. वेस्‍ट एशिया में चल रहे जंग के बीच, भारत ने वेनेजुएला, ईरान, ब्राजील और नाइजीरिया से भी तेल का आयात बढ़ाया है।  ईरान से इतना हुआ तेल का आयात  सात साल के अंतराल के बाद, भारत ने अप्रैल में ईरान से तेल की खरीद फिर से शुरू की और प्रतिदिन 137,000 बैरल तेल का आयात किया, जब अमेरिका ने प्रतिबंधों में 30 दिनों की छूट की घोषणा की. भारत ईरान से कच्चे तेल का एक प्रमुख खरीदार रहा है. 2018 में अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों को कड़ा करने के बाद, मई 2019 से आयात बंद हो गया, और इसकी जगह पश्चिम एशियाई, अमेरिकी और अन्य ग्रेड के माल ने ले ली. करीब एक साल के अंतराल के बाद, इस महीने वेनेजुएला से तेल का आयात 298,000 बैरल प्रति दिन रहा।  इन सभी आयातों के बीच, कुल आयात में कमी देखने को मिली है. ईरान युद्ध के बाद होर्मुज की नाकाबंदी के चलते, भारत का कच्चे तेल का आयात अप्रैल में घटकर 4.3 मिलियन बैरल हर दिन हो गया, जो पिछले महीने के 4.4 मिलियन बैरल से कम है, यह जानकारी केप्लर के आंकड़ों से मिलती है। 

2030 से पहले CO2 उत्सर्जन में गिरावट आ सकती है, 2025 में भारत का उत्सर्जन सिर्फ 0.7% बढ़ा

भोपाल  एक नए विश्लेषण से पता चला है कि भारत के कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में वर्ष 2025 में केवल 0.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो दो दशकों से अधिक समय में सबसे धीमी वृद्धि है। जलवायु विज्ञान, नीति और ऊर्जा पर केंद्रित ब्रिटेन स्थित ऑनलाइन प्रकाशन कार्बन ब्रीफ के लिए सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) द्वारा किए गए विश्लेषण के अनुसार, भारत के कुल कार्बन2 उत्सर्जन के लगभग आधे हिस्से के लिए जिम्मेदार विद्युत क्षेत्र से होने वाला उत्सर्जन 2025 में लगभग 3.8 प्रतिशत कम हो गया और यह उस वर्ष के कुल उत्सर्जन में कमी का प्रमुख कारण हो सकता है। हाल के वर्षों में भारत के CO2 उत्सर्जन में 4 से 11 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो विश्व में सबसे तेज़ वृद्धि दरों में से एक है। विश्लेषण के अनुसार, 2025 में 0.7 प्रतिशत की वृद्धि कोविड काल को छोड़कर 2001 के बाद से सबसे कम थी। भारत के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कार्बन डाइऑक्साइड का योगदान लगभग 80 प्रतिशत है । भारत के उत्सर्जन की वृद्धि दर में कमी आना पर्यावरण की दृष्टि से वैश्विक स्तर पर अच्छी खबर है, क्योंकि भारत ग्रीनहाउस गैसों का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है। लेकिन यह भारतीय अर्थव्यवस्था की सुस्ती या औद्योगिक गतिविधियों और मांग में गिरावट का संकेत भी हो सकता है। हालांकि आधिकारिक उत्सर्जन डेटा तैयार करने और संकलित करने में वर्षों लग जाते हैं – भारत के उत्सर्जन पर नवीनतम आधिकारिक डेटा 2020 से संबंधित है – सीआरईए जैसे अध्ययन देश के उत्सर्जन का अनुमान लगाने के लिए बिजली उत्पादन, औद्योगिक उत्पादन और ईंधन खपत पर आवधिक डेटा जैसे विभिन्न संकेतकों का उपयोग करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक उत्सर्जन की धीमी पड़ती यह रफ्तार कोई संयोग नहीं, बल्कि ऊर्जा क्षेत्र में गहरे बदलाव का संकेत है। विशेषज्ञों के मुताबिक, स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ते कदम, कोयला आधारित बिजली में गिरावट और बिजली मांग की धीमी रफ्तार इन तीनों ने मिलकर नई उम्मीदें पैदा की हैं। ऊर्जा क्षेत्र बना बदलाव की धुरी रिपोर्ट के मुताबिक सबसे बड़ा और निर्णायक बदलाव बिजली क्षेत्र में देखने को मिला है, जहां 2025 में उत्सर्जन में 3.8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। इसके पीछे स्वच्छ ऊर्जा क्षमता में रिकॉर्ड बढ़ोतरी बड़ी वजह रही, जिससे हर साल करीब 90 टेरावाट-घंटे अतिरिक्त बिजली उत्पादन की संभावना तैयार हुई है। वहीं, बिजली की मांग में भी साफ सुस्ती दिखी, जो 2019 से 2023 के बीच 7.4 फीसदी की दर से बढ़ रही थी, वह 2025 में घटकर करीब एक फीसदी रह गई। ये संकेत साफ तौर पर दर्शाते हैं कि अब देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में स्वच्छ ऊर्जा तेजी से महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है और पारंपरिक स्रोतों की पकड़ कमजोर पड़ने लगी है। जीवाश्म ईंधनों की कमजोर पड़ती पकड़ विश्लेषण में इस बात का भी खुलासा किया गया है कि 2025 में तेल, गैस और कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों की मांग में भी नरमी देखी गई, जो ऊर्जा क्षेत्र में बदलती प्राथमिकताओं की कहानी कहती है। तेल की मांग में हो रही वृद्धि सिमटकर महज 0.4 फीसदी रह गई, जबकि गैस की मांग में 4 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। सबसे बड़ा बदलाव आयातित कोयले में देखने को मिला, जिसकी खपत 20 फीसदी तक घट गई, वहीं गैस आयात में भी 6 फीसदी की कमी आई है। ये आंकड़े सिर्फ गिरावट नहीं, बल्कि एक बड़े बदलाव का संकेत हैं। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत अब धीरे-धीरे विदेशी ईंधनों पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है, जिससे न केवल ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो रही है, बल्कि देश वैश्विक ईंधन संकटों के झटकों से भी खुद को बेहतर तरीके से बचाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उद्योग बढ़ा रहे उत्सर्जन हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तस्वीर पूरी तरह सकारात्मक नहीं है, क्योंकि उद्योग अब भी उत्सर्जन बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। खासकर इस्पात और सीमेंट जैसे बुनियादी उद्योगों में तेजी से विस्तार देखने को मिला है, जहां इस्पात उत्पादन में 8 फीसदी और सीमेंट उत्पादन में 10 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। यही वजह है कि कुल कार्बन उत्सर्जन में हल्की बढ़ोतरी बनी रही, जो यह संकेत देती है कि स्वच्छ ऊर्जा की प्रगति के बावजूद औद्योगिक क्षेत्र में बदलाव अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। क्या आ गया निर्णायक मोड़? विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत का बिजली क्षेत्र अब एक 'टर्निंग पॉइंट' पर पहुंच सकता है, जहां स्वच्छ ऊर्जा की बढ़ोतरी, बिजली मांग से बराबरी या उससे आगे निकल जाए। सीआरईए के प्रमुख विश्लेषक लाउरी मायल्लीवीरता के मुताबिक अगर यही रुझान जारी रहा तो यह कोयला आधारित बिजली में स्थाई गिरावट की शुरुआत हो सकती है। दिलचस्प बात यह है कि गुजरात, राजस्थान और तमिलनाडु जैसे राज्य पहले ही इस बदलाव की दिशा में आगे बढ़ चुके हैं। उन्होंने उम्मीद जताई है कि देश के लिए 2026 एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है, जब अक्षय ऊर्जा क्षमता में बढ़ोतरी पहली बार बिजली मांग के विस्तार को पीछे छोड़ दे, यह बदलाव भारत के बिजली क्षेत्र की दिशा और भविष्य दोनों को निर्णायक रूप से बदलने का संकेत होगा। रिपोर्ट और सीआरईए से जुड़ी विश्लेषक अनुभा अग्रवाल का इस बारे में कहना है कि जीवाश्म ईंधनों की खपत में गिरावट से न सिर्फ आयात घटा है, बल्कि वैश्विक तेल-गैस संकट के असर से भी देश को राहत मिली है। उनका कहना है कि 2025 में तापीय बिजली संयंत्रों में आयातित कोयले की खपत 20 फीसदी तक घट गई, जबकि कुल गैस आयात में भी 6 फीसदी की कमी दर्ज की गई। यह बदलाव बेहद अहम है, क्योंकि इससे देश की मौजूदा वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति संकट के प्रति संवेदनशीलता कम हुई है। उनके मुताबिक, स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ना सिर्फ जलवायु के लिए नहीं, बल्कि बेहतर हवा और मजबूत ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी जरूरी है। हालांकि इस सकारात्मक रुझान के बीच एक चिंता भी बनी हुई है। भारत अभी भी कोयला आधारित बिजली क्षमता और जीवाश्म ईंधन आधारित उद्योगों के विस्तार की योजना बना रहा है, जो आने वाले वर्षों में उत्सर्जन की दिशा तय करेगा। बिजली … Read more

भारत के लिए बड़ा मौका: UAE के फैसले से रुपये में मिलेगा तेल, डॉलर की जरूरत नहीं

नई दिल्ली  संयुक्त अरब अमीरात (UAE) द्वारा UAE के OPEC (Organization of the Petroleum Exporting Countries) से बाहर निकलने की खबर को वैश्विक तेल बाजार में एक बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। इसे UAE का ‘मास्टरस्ट्रोक’ कहा जा रहा है, क्योंकि इससे वह अपनी तेल उत्पादन नीति पर अधिक स्वतंत्रता पा सकता है। लेकिन, इस फैसले का सबसे दिलचस्प असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश पर पड़ सकता है। आइए जरा विस्तार से समझते हैं कि इसका भारत को कितना लाभ मिलेगा? अब तक OPEC (Organization of the Petroleum Exporting Countries) के सदस्य देशों को उत्पादन कोटा और कीमतों को लेकर संगठन के नियमों का पालन करना पड़ता था। UAE के बाहर आने के बाद वह अपनी शर्तों पर उत्पादन बढ़ा सकता है और नए व्यापारिक समझौते कर सकता है। यही वह प्वाइंट है, जहां भारत के लिए एक बड़ा अवसर बनता दिख रहा है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था पर डॉलर आधारित भुगतान का भारी दबाव रहता है। अगर UAE भारत के साथ रुपये में तेल व्यापार करने के लिए सहमत होता है, तो यह भारत के लिए किसी लॉटरी से कम नहीं होगा। इससे भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (foreign exchange reserves) मजबूत होगा और डॉलर पर निर्भरता कम हो सकती है। रुपये में तेल खरीदने का मतलब है कि भारत को हर बार डॉलर खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी, जिससे रुपया स्थिर रह सकता है। साथ ही यह कदम भारत और UAE के बीच व्यापारिक संबंधों को और मजबूत करेगा। दोनों देशों के बीच पहले से ही मजबूत आर्थिक रिश्ते हैं और यह पहल उन्हें नई ऊंचाइयों तक ले जा सकती है। हालांकि, इस बदलाव के साथ कुछ चुनौतियां भी हैं। वैश्विक तेल बाजार बेहद संवेदनशील होता है और OPEC से बाहर निकलने के बाद UAE को कीमतों और मांग के उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा रुपये में व्यापार को बड़े स्तर पर लागू करना भी आसान नहीं होगा, क्योंकि इसके लिए वित्तीय ढांचे और भरोसेमंद सिस्टम की जरूरत होती है। फिर भी अगर यह रणनीति सफल होती है, तो यह न केवल भारत के लिए बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए भी एक नया मॉडल बन सकती है। कुल मिलाकर UAE का यह कदम आने वाले समय में तेल की राजनीति और अर्थशास्त्र दोनों को नई दिशा दे सकता है, जिसमें भारत एक बड़ा लाभार्थी बनकर उभर सकता है।

भारत की आर्थिक ताकत में तेजी, वैश्विक शांति में अहम भूमिका निभा सकता है: वैश्विक विशेषज्ञ

नई दिल्ली   भारत तेजी से एक आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है और वैश्विक स्तर पर छवि विश्व शांति व्यवस्था को आकार देने वाले, आर्थिक स्थिरता और टेक्नोलॉजी को बढ़ाने वाले देश की बन रही है। यह बयान बुधवार को ग्लोबल एक्सपर्ट्स की ओर से दिया गया। राष्ट्रीय राजधानी में इकोनॉमिस्ट एंटरप्राइज के 'रेजिलिएंट फ्यूचर्स समिट 2026' के साइडलाइन के दौरान आईएएनएस से ​​बातचीत में उन्होंने भू-राजनीतिक अनिश्चितता से निपटने, बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करने और एआई और उभरती टेक्नोलॉजी में इनोवेशन को बढ़ावा देने में भारत के बढ़ते प्रभाव का जिक्र किया। सिंगापुर की नेशनल यूनिवर्सिटी के ली कुआन यू स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी में अर्थशास्त्र के ली का शिंग प्रोफेसर डैनी क्वाह ने कहा कि वैश्विक आतंकवाद की बदलती प्रकृति और व्यापारिक गतिशीलता में आए बदलावों ने विश्व अर्थव्यवस्था में काफी अनिश्चितता पैदा कर दी है। क्वाह ने कहा कि व्यापारिक व्यवधानों से परे, एक गहरी चिंता वैश्विक विश्वास में कमी और बहुपक्षीय प्रणालियों का कमजोर होना है, जो पारंपरिक रूप से अंतरराष्ट्रीय सहयोग का आधार रही हैं। उन्होंने आईएएनएस को बताया,“भारत इसमें बड़ी भूमिका निभा सकता है और अगर भारत कोशिश करे तो शांति कायम होगी। लोग शांति लाने के लिए भारत की ओर देख रहे हैं। मुझे लगता है कि लोग उचित नेतृत्व के लिए भारत की ओर देख रहे हैं। उचित नेतृत्व क्या होगा, यह तय करना अभी भारत पर निर्भर है।” वहीं, लंदन के विज्ञान संग्रहालय के निदेशक इयान ब्लैचफोर्ड ने एआई के प्रति भारत के विशिष्ट और आशावादी दृष्टिकोण का जिक्र किया। ब्लैचफोर्ड ने कहा, “अगर आप अमेरिका और यूरोप के सार्वजनिक सर्वेक्षणों को देखें, तो अधिकांश आबादी एआई को लेकर चिंतित है। भारत में स्थिति इसके विपरीत है। भारत एआई केंद्रों के लिए क्षमता निर्माण कर रहा है और साथ ही इसके प्रभावों पर गहराई से विचार भी कर रहा है।” ब्लैचफोर्ड ने वैश्विक दक्षिण की व्यापक उपलब्धियों, विशेष रूप से भारत की विकास यात्रा की सराहना की। ब्लैचफोर्ड ने आईएएनएस को बताया, “देश आर्थिक विकास और जीवन स्तर में सुधार की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहा है, जबकि वह ऊर्जा की बढ़ती मांग जैसी चुनौतियों से भी जूझ रहा है।”उन्होंने आगे कहा, “यह पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं के विपरीत है, जिन्हें दशकों से समृद्धि का लाभ मिल रहा है।”

UAE के OPEC छोड़ने से भारत को फायदा, पाकिस्तान को नुकसान: जानिए किसे कितना फायदा हुआ

नई दिल्ली संयुक्त अरब अमीरात ने अपने हालिया कदमों से साफ संकेत दे दिया है कि वह पाकिस्तान-सऊदी अरब गठजोड़ के खिलाफ रणनीति बना रहा है. तेल उत्पादक देशों के संगठन OPEC से बाहर निकलने का उसका फैसला सऊदी अरब को बड़ा झटका देने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है. वहीं ये फैसला पाकिस्तान के लिए भी बड़ा मैसेज बनकर सामने आया है, जिसने पड़ोसी मुल्क की पेशानी पर निशान ला दिए हैं।  पाकिस्तान को झटका तो क्या भारत को लाभ? इसे पूरे मामले को भारत के लिहाज से देखें तो सवाल उठता है कि क्या ये फैसला भारत के पक्ष में जा सकता है? असल में यूएई के इस फैसले से ग्लोबल मार्केट में तेल की सप्लाई बढ़ सकती है, जिससे कीमतों में कमी आ सकती है. इसका सीधा फायदा भारत जैसे आयात करने वाले देशों को मिल सकता है, क्योंकि उनका तेल खर्च कम होगा और महंगाई पर भी असर पड़ेगा. एक्सपर्ट्स के नजरिये को समझें तो यह कदम भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक साबित हो सकता है।  ऐसे में जहां भारत को सस्ते तेल और मजबूत ऊर्जा साझेदारी का फायदा मिल सकता है, वहीं पाकिस्तान के लिए यह स्थिति आर्थिक दबाव और रणनीतिक असहजता बढ़ाने वाली बन सकती है। UAE ने क्यों लिया ऐसा फैसला?  अब इस पूरे फैसले को कैनवस पर और बड़ा करके देखें तो नजर आता है कि इससे पहले कई घटनाक्रम तेजी से सामने आए. ईरान के साथ टकराव के दौरान यूएई को सीधे हमलों का सामना करना पड़ा, जबकि खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों से उसे वह समर्थन नहीं मिला जिसकी उसे उम्मीद थी. वहीं, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा कर खुद को पीछे खींच लिया है, जिससे यूएई खुद को सैन्य रूप से असुरक्षित महसूस करने लगा।  रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजराइल और अमेरिका की ओर से तेहरान पर हमलों के बाद सबसे ज्यादा जवाबी कार्रवाई का सामना यूएई को करना पड़ा. अबू धाबी के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, 8 अप्रैल तक उसकी वायु रक्षा प्रणाली ने 537 बैलिस्टिक मिसाइल, 26 क्रूज मिसाइल और 2256 ड्रोन को इंटरसेप्ट किया।  पाकिस्तान को लेकर क्या है UAE की राय? यूएई का मानना है कि पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाकर ईरान के खिलाफ सख्त रुख नहीं अपनाया, जिससे अबू धाबी में नाराजगी बढ़ी. विशेषज्ञों के अनुसार, यूएई इस संघर्ष को “ब्लैक-वाइट” की तरह देख रहा है, जहां बीच की कोई लाइन नहीं है. यही कारण है कि पाकिस्तान की मध्यस्थता उसे रास नहीं आई।  इसी नाराजगी के चलते यूएई ने पाकिस्तान से 3.5 अरब डॉलर का कर्ज समय से पहले लौटाने की मांग कर दी, जो पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा था. हालांकि बाद में सऊदी अरब ने पाकिस्तान को 3 अरब डॉलर का कर्ज देकर राहत दी और 5 अरब डॉलर की क्रेडिट लाइन देने का वादा किया।  पाकिस्तान और सऊदी के बीच रक्षा समझौता सितंबर 2025 में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक रक्षा समझौता भी हुआ, जिसके तहत पाकिस्तान जरूरत पड़ने पर रियाद की सुरक्षा के लिए अपने परमाणु और मिसाइल संसाधन दे सकता है. ईरान के हमलों के बाद पाकिस्तान ने सऊदी अरब को इस समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।  UAE और भारत के मजबूत संबंध इन घटनाओं के बीच खाड़ी देशों के भीतर दरार साफ नजर आने लगी है. जहां यूएई भारत के साथ मजबूत संबंध बनाए हुए है, वहीं सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच एक नए रणनीतिक गठजोड़ की चर्चा हो रही है. यमन और सूडान जैसे क्षेत्रों में भी सऊदी अरब और यूएई के बीच मतभेद बढ़े हैं।  यमन में 2015 के सैन्य हस्तक्षेप के दौरान दोनों देश साथ थे, लेकिन बाद में रणनीति को लेकर टकराव बढ़ गया. सऊदी अरब ने हूती विद्रोहियों के साथ राजनीतिक समाधान की कोशिश की, जबकि यूएई ने अलगाववादियों का समर्थन किया. इसी तरह, सूडान में भी दोनों देश अलग-अलग गुटों का समर्थन कर रहे हैं।  तेल उत्पादन को लेकर भी दोनों देशों के बीच मतभेद सामने आए हैं. दशकों से सऊदी अरब OPEC का नेतृत्व करता रहा है, लेकिन यूएई अब अपने उत्पादन पर किसी तरह की पाबंदी नहीं चाहता. OPEC से बाहर निकलने के बाद यूएई अब अपनी पूरी क्षमता से तेल उत्पादन कर सकेगा, जो वैश्विक बाजार में उसके लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद हो सकता है।  सऊदी के साये में नहीं रहना चाहता UAE यूएई के ऊर्जा मंत्री सुनील मोहम्मद अल माजुरी ने कहा कि यह फैसला देश की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति और बाजार की जरूरतों के अनुरूप लिया गया है. वहीं उद्योग मंत्री सुल्तान अल जाबर ने इसे राष्ट्रीय हित और वैश्विक ऊर्जा स्थिरता के लिहाज से जरूरी कदम बताया।  करीब 59 साल बाद OPEC से अलग होने का यूएई का यह फैसला वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजार में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सऊदी अरब के साथ उसके संबंध पूरी तरह खत्म हो गए हैं. दोनों देश अब भी बड़े व्यापारिक साझेदार हैं और GCC के सदस्य हैं. लेकिन इतना तय है कि अबू धाबी ने यह साफ कर दिया है कि वह अब सऊदी नेतृत्व के साए में रहने को तैयार नहीं है. मौजूदा युद्ध, नाकेबंदी और बदलते गठजोड़ के बीच यूएई का यह कदम खाड़ी राजनीति में नए समीकरणों की शुरुआत कर सकता है।