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Festive Inflation: रसोई से बाजार तक महंगाई का असर, त्योहार पर खर्च करना हुआ मुश्किल

नई दिल्ली    सैलरी वहीं की वहीं थमी हुई है, लेकिन महंगाई है कि रुकने का नाम नहीं ले रही. जिसने रसोई से लेकर बाजार तक का पूरा गणित बिगाड़ दिया है. लेकिन त्योहार है, तो खरीदारी भी होगी. चाहे इसके लिए कर्ज ही क्यों न लेना पड़े, दोस्तों से उधार मांगना पड़े या फिर क्रेडिट कार्ड सहारा बने, लोग पीछे नहीं हटते।  दरअसल, इस त्योहारी सीजन में आम आदमी की जेब खाली हो चुकी है. पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दामों ने सभी बुनियादी चीजों को महंगा कर दिया है. इस बार दिवाली का उल्लास तो भरपूर मनेगा, लेकिन इसके ठीक बाद गहराता आर्थिक संकट हर मिडिल क्लास फैमिली की नींद उड़ाने के लिए तैयार है।  त्योहार छोड़िए, आज मध्यम वर्गीय परिवार के सामने सबसे बड़ा संकट बुनियादी जरूरतों को पूरा करने का है. पिछले कुछ समय में पेट्रोल और डीजल के दामों में जो तेजी आई है, उसने हर चीज का गणित बिगाड़ दिया है. क्योंकि जब ईंधन महंगा होता है, तो हर छोटी-बड़ी चीज चाहे वह सब्जी हो, दाल हो, कपड़े हों या फिर सजावट के सामान, सब महंगे हो जाते हैं. इसका सीधा असर खुदरा बाजार पर पड़ता है और कीमतें रॉकेट की रफ्तार से ऊपर भागती हैं।  हर घर बिगड़ रहा है बजट खाने-पीने की चीजें जैसे तेल, आटा, मसाले और सब्जियां आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं. गृहिणियां समझ नहीं पा रही हैं कि सीमित बजट में घर आखिर कैसे चलाएं? क्योंकि नौकरीपेशा लोगों के वेतन में या तो कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है या फिर वह महंगाई दर के मुकाबले बहुत कम है. ऐसे में अधिकतर परिवारों की मंथली बचत पहले ही खत्म हो चुकी है।  अब सवाल उठता है कि जब रोजमर्रा की जिंदगी चलाना ही मुश्किल है, तो ऐसे में त्योहार पर खर्च के लिए पैसे कहां से आएंगे? जबकि इस बीच बाजार लुभावनी स्कीमों से पटा पड़ा है, 'अभी खरीदें, बाद में भुगतान करें', 'नो कॉस्ट ईएमआई', और 'भारी छूट'. आम आदमी भी इन विज्ञापनों के झांसे में आसानी से आ जाते हैं. यहीं से कर्ज जाल में फंसना शुरू हो जाता है।  नए कपड़े, एलईडी टीवी, महंगे स्मार्टफोन और सोने के गहने खरीदना अब आसान हो गया है, क्योंकि लोग तुरंत भुगतान करने के बजाय किस्तों का सहारा लेते हैं. लेकिन ये किस्तें भारी पड़ती है, क्योंकि ऑफर के चक्कर में कई बार लोग आमदनी से ज्यादा खर्च कर देते हैं. लोग यह भूल जाते हैं कि क्रेडिट कार्ड या पर्सनल लोन पर लगने वाला ब्याज उनकी वित्तीय कमर तोड़ सकता है।  इस बीच जो पैसा अगले कुछ महीनों के राशन, बच्चों की फीस या इमरजेंसी के लिए होना चाहिए था, वह त्योहारी बिल चुकाने में चला जाता है. एक कर्ज चुकाने के लिए दूसरा कर्ज लेने की यह आदत परिवारों को कर्ज के कुचक्र में धकेल देती है।  क्या वाकई कोई विकल्प नहीं बचा है? आम आदमी के पास क्या सचमुच कोई दूसरा रास्ता नहीं है? यह सवाल हर उस व्यक्ति के मन में आता है, जो इस व्यवस्था से जूझ रहा है. क्योंकि लोग त्योहार आने से पहले कोई आर्थिक योजना नहीं बनाते. जब समय सिर पर आता है, तो बिना सोचे-समझे खर्च कर देते हैं. लेकिन ये हकीकत है कि महंगाई और आमदनी का यह अंतर रातो-रात खत्म नहीं होने वाला है, ये आंकड़े भी चीख-चीख कर बता रहे हैं।  दुनियाभर में महंगाई तेजी से बढ़ रही है, बढ़ती महंगाई की वजह से केंद्रीय बैंकों को कर्ज महंगा करना पड़ रहा है. अमेरिका जैसा विकसित देश महंगाई से जूझ रहा है, और फेड रिजर्व ब्याज दरें बढ़ाने के लिए लाचार है. भारत में भी पिछले हफ्ते ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने ब्याज दरों में 25 बेसिस प्वाइंट का इजाफा किया, जबकि इस साल रेपो रेट और 50 बेसिस प्वाइ्ंट्स बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है।   फेस्टिव सीजन से ठीक पहले रेपो रेट बढ़ने से तमाम तरह के कर्ज महंगे हो गए हैं. होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन लेने वाले करोड़ों मध्यम वर्गीय परिवारों की EMI बढ़ गई है. पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे आम आदमी को लोन की बढ़ी हुईं किस्तें आने वाले दिनों में और परेशान करेंगी।  आंकड़े दे रहे सबूत रही सही कसर महंगाई दर ने पूरी कर दी है. खुदरा महंगाई दर 2 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई, जबकि थोक महंगाई दर की बात करें, तो ये भी डबल डिजिट में पहुंच गई है. दशहरा से ठीक पहले दोनों आंकड़े सामने आए हैं, सितंबर में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.54% पर पहुंच गई. जबकि अगस्त में खुदरा महंगाई दर 4.82% थी. खाने-पानी के चीजें से तेजी से महंगी हुई हैं, जिससे खाद्य मुद्रास्फीति अगस्त के 5.97% से बढ़कर सितंबर में 7.74% पर पहुंच गई. खासकर सब्जियों, दालों और रोजमर्रा की जरूरत की अन्य चीजों के महंगे होने से आम आदमी की थाली पर सीधा असर पड़ा है. प्याज, चीनी और खाने के तेल की कीमतों में साल भर के अंदर बड़ा इजाफा हुआ है।  खुदरा के बाद थोक महंगाई दर ने आम आदमी को झटका दे दिया है. थोक मूल्य सूचकांक (WPI) सितंबर में उछलकर 11.39% पर पहुंच गई, जबकि अगस्त में यह 9.92% थी. थोक बाजार में ईंधन, बिजली और विनिर्मित उत्पादों की कीमतों में आई भारी तेजी इसके मुख्य कारण रहे।  थोक महंगाई का यह स्तर बताता है कि आने वाले दिनों में कंपनियों की लागत बढ़ने से बाजार में सामान और ज्यादा महंगे हो जाएंगे, जिसका सीधा बोझ अंतिम उपभोक्ता यानी आम जनता को ही उठाना पड़ेगा. सितंबर में खाद्य सूचकांक की महंगाई बढ़कर 8.66% हो गई, जो कि अगस्त में 7.05 फीसदी थी. यानी त्योहारों के बीच आम आदमी को महंगाई की चौतरफा मार पड़ने वाली है।  इसलिए आखिर में आपको सलाह दी जाती है, त्योहार हर साल आते हैं, अगले साल भी आएंगे, खुद को आर्थिक संकट में डालकर फिजूलखर्ची से बचने में ही भलाई है. बाजार जाने से पहले ही तय कर लें कि इस बार आप कुल कितने पैसे खर्च करेंगे? उस सीमा से एक रुपया भी ज्यादा खर्च न करें. क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल से बचें, क्योंकि इससे खर्च करने का … Read more

अगस्त के मुकाबले सितंबर में तेजी से बढ़ी थोक महंगाई, WPI दर 9.92% से उछलकर 11.39% पर पहुंची

नई दिल्ली त्योहारों और कारोबारी गतिविधियों के बीच आम जनता और उद्योग जगत के लिए एक चिंताजनक आंकड़ा सामने आया है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, सितंबर 2026 में भारत की थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) आधारित महंगाई दर उछलकर दोहरे अंक में 11.39 प्रतिशत पर पहुंच गई है। अगस्त 2026 में यह दर 9.92 प्रतिशत दर्ज की गई थी। सभी वस्तुओं के लिए ऑल इंडिया होलसेल प्राइस इंडेक्स अगस्त के 110.8 से बढ़कर सितंबर में 112.5 हो गया है। थोक कीमतों में आई यह अचानक तेजी मुख्य रूप से खनिज तेल, खाद्य वस्तुओं, कच्चे तेल व प्राकृतिक गैस, कोयले, बुनियादी धातुओं और रसायनों के महंगे होने की वजह से देखी गई है।देश में थोक मूल्य सूचकांक यानी WPI पर आधारित महंगाई दर सितंबर महीने में बढ़कर 11.39% पर पहुंच गई है, जो कि इससे पिछले महीने यानी अगस्त में 9.92% थी. थोक महंगाई में हुई इस तेज बढ़ोतरी से साफ है कि आने वाले दिनों में उत्पादन और विनिर्माण लागत बढ़ने का असर आम जनजीवन और खुदरा बाजारों पर भी पड़ सकता है।  महंगाई में इस बढ़ोतरी के पीछे खाद्य पदार्थों, ईंधन और मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी वस्तुओं की बढ़ती कीमतें प्रमुख वजह रही हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि सितंबर में किन चीजों की कीमतों में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी हुई और इसके पीछे क्या वजहें हैं।  सितंबर में कितनी बढ़ी थोक महंगाई?     सितंबर में थोक महंगाई दर बढ़कर 11.39% पर पहुंच गई, जबकि अगस्त में यह 9.92% थी.     खाद्य पदार्थों की महंगाई दर अगस्त के 7.05% से बढ़कर सितंबर में 8.66% हो गई.     मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी वस्तुओं की महंगाई दर 8.37% से बढ़कर 9.76% पर पहुंच गई.     ईंधन और बिजली की महंगाई दर में भी काफी तेजी आई है. अगस्त में यह 22.93% थी, जो सितंबर में बढ़कर 25.85% हो गई. किन चीजों की कीमतों ने बढ़ाई महंगाई? थोक महंगाई में तेजी के पीछे कई तरह की वस्तुओं की बढ़ती कीमतें जिम्मेदार हैं. वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के मुताबिक, सितंबर में महंगाई बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों में कुछ खास चीजें शामिल रहींहैं।      मिनरल ऑयल और पेट्रोलियम उत्पाद     खाद्य पदार्थ     कच्चा पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस     कोयला और लिग्नाइट     बुनियादी धातुएं और उनसे बनने वाले उत्पाद     रसायन और रासायनिक उत्पाद     कपड़ा, रबर और प्लास्टिक उत्पाद     बिजली के उपकरण पश्चिम एशिया में युद्ध का महंगाई पर क्या असर पड़ा? वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और उर्वरकों की कीमतों में बढ़ोतरी का असर भी महंगाई पर देखने को मिल रहा है. पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुई रुकावटों से इनकी आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बढ़ा है. भारत कच्चे तेल के आयात के लिए इस समुद्री मार्ग पर काफी हद तक निर्भर है. ऐसे में जब कच्चे तेल और दूसरी जरूरी वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं, तो परिवहन, उत्पादन और खेती की लागत पर भी असर पड़ता है।  थोक महंगाई में उछाल की सबसे बड़ी वजह क्या है? सितंबर महीने में थोक महंगाई को बढ़ाने में सबसे बड़ा योगदान ईंधन और बिजली श्रेणी का रहा है।     ईंधन एवं बिजली क्षेत्र: इस सेगमेंट में सालाना महंगाई दर अगस्त के 22.93 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर में 25.85 प्रतिशत के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। इसका इंडेक्स भी 108.3 से चढ़कर 110.5 हो गया।     विज्ञापन     निर्मित उत्पाद: मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की महंगाई दर में भी बढ़ोतरी हुई और यह अगस्त के 8.37 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर में 9.76 प्रतिशत हो गई, जबकि इसका सूचकांक 108.8 से बढ़कर 110.2 पर दर्ज किया गया।     विज्ञापन     प्राथमिक वस्तुएं: प्राइमरी आर्टिकल्स श्रेणी में महंगाई दर 7.76 प्रतिशत से बढ़कर 8.67 प्रतिशत हो गई और इंडेक्स 118.1 से बढ़कर 120.3 हो गया। थाली का बजट क्यों बिगड़ रहा है और फूड इंडेक्स का क्या हाल है? आम उपभोक्ताओं के रसोई बजट से जुड़ा डब्ल्यूपीआई फूड इंडेक्स, जिसकी कुल सूचकांक में 24.99 प्रतिशत की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है, सितंबर में बढ़कर 8.66 प्रतिशत हो गया। अगस्त 2026 में यह 7.05 प्रतिशत पर था। मंत्रालय के अनुसार, इस फूड इंडेक्स में प्राइमरी आर्टिकल्स ग्रुप के तहत आने वाले 'फूड आर्टिकल्स' और मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स के तहत आने वाले 'फूड प्रोडक्ट्स का निर्माण' दोनों शामिल हैं। विभिन्न क्षेत्रों और प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (पीपीआई) पर क्या प्रभाव पड़ा है? थोक कीमतों के साथ-साथ ऑल इंडिया आउटपुट प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (पीपीआई) भी अगस्त के 110.8 से बढ़कर सितंबर में 112.5 पर पहुंच गया है। अलग-अलग क्षेत्रों की स्थिति इस प्रकार है:     खनन एवं उत्खनन: माइनिंग का आउटपुट पीपीआई सितंबर में उछलकर 129.2 हो गया, जो अगस्त में 122.0 था।     कृषि, वानिकी और मत्स्य पालन: इसका इंडेक्स 116.5 से बढ़कर 118.7 पर आ गया।     बिजली क्षेत्र: बिजली का सूचकांक अगस्त के 90.9 से बढ़कर सितंबर में 92.0 दर्ज किया गया।     निर्मित उत्पाद: मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स का पीपीआई भी 109.7 से बढ़कर 111.0 हो गया। आंकड़ों का संशोधन और जुलाई महीने की क्या स्थिति रही? वाणिज्य मंत्रालय ने पिछले महीनों के आंकड़ों की स्थिति भी साफ की है। जुलाई 2026 का अंतिम डब्ल्यूपीआई इंडेक्स 110.0 पर अपरिवर्तित रहा, जिसके चलते जुलाई की अंतिम थोक महंगाई दर 9.78 प्रतिशत तय हुई। जुलाई का अंतिम इंडेक्स 2022-23 बेस ईयर के आधार पर 98.97 प्रतिशत की वेटेड रिस्पॉन्स रेट के साथ तैयार किया गया था। वहीं, सितंबर 2026 का प्रोविजनल इंडेक्स 83.4 प्रतिशत की वेटेड रिस्पॉन्स रेट पर आधारित है। डब्ल्यूपीआई के आंकड़े क्या संकेत दे रहे? ईंधन और बुनियादी कच्चे माल की लागत बढ़ने से उद्योगों की विनिर्माण लागत बढ़ी है। थोक स्तर पर कीमतों में यह दोहरे अंक की वृद्धि (11.39%) यह दर्शाती है कि आने वाले समय में खुदरा बाजारों पर भी इसका दबाव देखने को मिल सकता है, जिससे उपभोक्ता वस्तुओं और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर असर पड़ सकता है। खुदरा महंगाई में भी दर्ज हुई बढ़ोतरी थोक महंगाई के साथ खुदरा महंगाई दर में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. सितंबर में खुदरा महंगाई बढ़कर 5.54% पर पहुंच गई, जो पिछले 23 महीनों का उच्चतम … Read more

Inflation Attack: त्योहारों के सीजन में बढ़ी महंगाई, आम आदमी की जेब पर पड़ेगा असर; जानें क्या हुआ महंगा

 नई दिल्ली भारत में फेस्टिव सीजन की शुरुआत से ठीक पहले महंगाई के मोर्चे पर तगड़ा झटका लगा है. सोमवार को देश में खुदरा महंगाई दर के आंकड़े आए, जो टेंशन बढ़ाने वाले हैं. दरअसल, सितंबर महीने में रिटेल महंगाई जोरदार रफ्तार से बढ़ते हुए 5.54% पर पहुंच गई, जबकि इससे पहले अगस्त महीने में ये 4.82% दर्ज की गई थी. यानी महीनेभर में महंगाई 0.72% बढ़ गई है. खासतौर पर खाने-पीने के सामानों के दाम बढ़ने का असर देखने को मिला है, जो महंगाई बढ़ाने में अहम रहे हैं।   खाद्य महंगाई तो 8% के करीब सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा जारी अनंतिम आंकड़ों को देखें, तो सितंबर महीने में भारत में खुदरा मुद्रास्फीति बढ़कर 5.54% हो गई, जबकि खाद्य महंगाई दर तेज रफ्तार से बढ़ते हुए 7.74% तक पहुंच गई. महंगाई के ये आंकड़े साफ दर्शाते हैं कि खाने-पीने के सामानों की बढ़ती कीमतों ने परिवारों के बजट को बिगाड़ने में अहम रोल निभाया है।  खुदरा महंगाई की सालाना दर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित होती है, जबकि खाद्य महंगाई को उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक (CFPI) का उपयोग करके मापा जाता है. दोनों की तुलना सितंबर 2026 की तुलना पिछले वर्ष के इसी महीने से की जाती है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में क्या हाल?  सितंबर महीने में ग्रामीण क्षेत्रों में रिटेल महंगाई 6.08% दर्ज की गई, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 4.88% रही. यानी शहरों की तुलना में ग्रामीण भारत में कीमतों पर दबाव अधिक रहा. बात खाद्य महंगाई की करें, तो ये ग्रामीण क्षेत्रों में 8.06% रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में 7.18% दर्ज की गई. इस माह के दौरान अखिल भारतीय खाद्य मुद्रास्फीति दर 7.74% रही।  प्याज ने निकाले आंसू, चांदी की चमक तेज सितंबर में लिस्टेड वस्तुओं में महंगाई की सबसे ज्यादा मार प्याज पर पड़ी. Onion Price में सालाना आधार पर 108.09% की वृद्धि दर्ज की गई. इससे पहले अगस्त में यह 48.78% थी. इसके अलावा चांदी के आभूषणों (Silver Jewelley) की महंगाई दर 87.80% रही. अदरक के दाम में 62.85% का उछाल, तो वहीं लहसुन की महंगाई दर बीते महीने के 43.60% से बढ़कर 54.62% हो गई. नींबू की कीमतों में भी वृद्धि देखी गई, इसपर महंगाई दर 36.41% तक पहुंच गई।  हालांकि, आलू की कीमतों में साल-दर-साल 11.50% की गिरावट आई, जबकि टमाटर की कीमतों में 8.62% की कमी दर्ज की गई. सितंबर में मोटर कार और जीप, भिंडी और नारियल की कीमतों में भी मुद्रास्फीति नकारात्मक रही. MoSPI ने बताया कि ऑनलाइन बाजारों सहित 1,407 शहरी बाजारों और राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के 1,465 गांवों से मूल्य आंकड़े इकठ्ठा किए गए. सितंबर माह के दौरान ग्रामीण और शहरी दोनों बाजारों में प्रतिक्रिया दर 100% रही। 

लगातार दूसरे महीने बढ़ी थोक महंगाई, फ्यूल-पावर से लेकर फूड इंडेक्स तक दिखा कीमतों का दबाव

नई दिल्ली भारत में थोक महंगाई (WPI) अगस्त में बढ़कर 9.92 फीसदी पर पहुंच गई है. जुलाई में यह आंकड़ा 9.78 फीसदी था. यानी एक महीने में थोक महंगाई में 0.14 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. सरकार की ओर से सोमवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक, खाने-पीने की चीजों, तैयार सामान और ईंधन-बिजली से जुड़ी कीमतों में तेजी ने महंगाई को ऊपर धकेला है. खास बात यह है कि ईंधन और बिजली की महंगाई बाकी प्रमुख श्रेणियों के मुकाबले काफी ज्यादा रही।  खाने-पीने की चीजों की कीमतों में भी अगस्त के दौरान दबाव बढ़ा. फूड इंडेक्स में थोक महंगाई अगस्त में 7.05 फीसदी रही, जबकि जुलाई में यह 6.65 फीसदी थी. यानी एक महीने में खाद्य महंगाई में 0.40 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. महंगाई बढ़ने में मिनरल ऑयल, खाद्य वस्तुएं और खाद्य उत्पादों का निर्माण जैसी श्रेणियों की अहम भूमिका रही. पश्चिम एशिया में तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़े घटनाक्रमों के बीच वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और उर्वरक की लागत बढ़ने का असर भी कीमतों पर पड़ा है।  मैन्युफैक्चर्ड आइटम्स में तेजी अगस्त में मैन्युफैक्चर्ड आइटम्स की थोक महंगाई 8.37 फीसदी रही. जुलाई में यह 8.29 फीसदी थी. यानी इस श्रेणी में भी महंगाई बढ़ी है. सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, बेसिक मेटल्स का निर्माण, नॉन-फूड आर्टिकल्स और केमिकल व केमिकल प्रोडक्ट्स का निर्माण अगस्त में थोक कीमतों पर दबाव बढ़ाने वाले प्रमुख क्षेत्रों में शामिल रहे।  फ्यूल-पावर में ज्यादा महंगाई थोक महंगाई के आंकड़े में सबसे ज्यादा दबाव फ्यूल और पावर से आया. इस श्रेणी में अगस्त की महंगाई दर 22.93 फीसदी रही. यह दर फूड और मैन्युफैक्चर्ड आइटम्स की तुलना में काफी ज्यादा है. मिनरल ऑयल की कीमतों में बदलाव का भी इस श्रेणी पर असर पड़ा है. ईंधन की लागत बढ़ने का असर आगे ट्रांसपोर्ट और उत्पादन लागत पर भी पड़ सकता है, जिसका प्रभाव दूसरी वस्तुओं की कीमतों पर दिखाई दे सकता है।  महंगाई बढ़ने की बड़ी वजहें ये रहीं वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के मुताबिक, अगस्त में थोक कीमतों पर दबाव बढ़ाने वाली प्रमुख चीजों में मिनरल ऑयल, फूड आर्टिकल्स, फूड प्रोडक्ट्स का निर्माण, बेसिक मेटल्स का निर्माण, नॉन-फूड आर्टिकल्स और केमिकल व केमिकल प्रोडक्ट्स का निर्माण शामिल रहे. यानी महंगाई का दबाव सिर्फ एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा. खाने-पीने की चीजों से लेकर ईंधन और औद्योगिक सामान तक कई हिस्सों में कीमतें बढ़ीं।  RBI के लिए भी अहम है आंकड़ा थोक महंगाई का यह आंकड़ा ऐसे समय आया है जब रिजर्व बैंक महंगाई और ब्याज दरों के रुख पर नजर रख रहा है. पिछले महीने मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने बेंचमार्क पॉलिसी रेट को 5.25 फीसदी पर बरकरार रखा था. RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खुदरा महंगाई का अनुमान 5 फीसदी रखा है. केंद्रीय बैंक ने कमजोर और असमान दक्षिण-पश्चिम मॉनसून और अल नीनो की स्थिति को महंगाई के लिए जोखिमों में शामिल किया था।  आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा? थोक महंगाई सीधे तौर पर आपकी खरीदारी की कीमत तय नहीं करती, लेकिन इसमें लगातार बढ़ोतरी का असर आगे चलकर कारोबार की लागत और कुछ वस्तुओं की खुदरा कीमतों पर पड़ सकता है. फिलहाल अगस्त के आंकड़ों में फूड, फ्यूल और पावर तथा मैन्युफैक्चर्ड आइटम्स तीनों में दबाव दिखाई दे रहा है. इसलिए आने वाले महीनों में इन तीनों क्षेत्रों की कीमतों का रुख अहम रहेगा. अगर ईंधन और कच्चे माल की लागत ऊंची बनी रहती है, तो महंगाई पर दबाव भी आगे बना रह सकता है। 

Inflation Alert: खाद्य पदार्थों के बढ़ते दामों से तेज हुई रिटेल महंगाई, जानिए कितना बढ़ा असर

नई दिल्ली देश में खाने-पीने की चीजों के दाम मई महीने में बढ़े हैं. रिटेल महंगाई दर मई के महीने में बढ़कर 3.93 प्रतिशत पहुंच गई है. अप्रैल महीने में महंगाई दर 3.48 प्रतिशत थी. हालांकि, महंगाई दर रिजर्व बैंक के अनुमान 4 प्रतिशत से नीचे रही है।  महंगाई दर रिजर्व बैंक के अनुमान 4 प्रतिशत के लक्ष्य से नीचे है. लगातार 16वें महीने महंगाई दर आरबीआई के लक्ष्य के नीचे रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और ईरान युद्ध के कारण महंगाई दर बढ़ी है. जून के मॉनिटरी पॉलिसी में आरबीआई ने वित्त वर्ष 27 के लिए महंगाई दर को सुधार करते हुए पहले के 4.6 प्रतिशत की तुलना में बढ़ाकर 5.1 फीसदी किया था।  ईरान, अमेरिका और इजरायल युद्ध के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रेशर बढ़ा है. करेंसी मार्केट पर भी इसका असर पड़ा है. हालांकि, इन सब झटकों के बाद भी भारत की अर्थव्यवस्था काफी मजबूत है और देश की जीडीपी 7.8 प्रतिशत है. खाने-पीने की चीजों की बढ़ती कीमत महंगाई दर को बढ़ा रही है. इसकी कारण CPI में तेजी आई है।  अप्रैल के मुकाबले मई में दर्ज हुई बड़ी बढ़त सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि मई महीने की खुदरा महंगाई दर ने अप्रैल के 3.48% के स्तर से एक लंबी छलांग लगाई है और यह सीधे 3.93% पर जा पहुंची है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सीपीआई (कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स) की गणना श्रृंखला में हाल ही में किए गए ढांचागत बदलावों के बाद से अब तक की यह सबसे बड़ी और उच्चतम रीडिंग दर्ज की गई है। इस वृद्धि का मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आया उतार-चढ़ाव और घरेलू स्तर पर चुनिंदा खाद्य वस्तुओं की कीमतों में आई मौसमी तेजी को माना जा रहा है, जिसने खुदरा बाजार के रुख को बदल दिया है। आरबीआई के निर्धारित बजटीय लक्ष्य के भीतर आंकड़े महंगाई के इस बढ़ते ग्राफ के बीच आम आदमी और नीति निर्माताओं के लिए सबसे बड़ी तसल्ली यह है कि यह आंकड़ा अब भी केंद्रीय बैंक के नियंत्रण दायरे में है। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक को देश की आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए खुदरा महंगाई दर को 4% के मानक स्तर से नीचे रखने का वैधानिक लक्ष्य सौंपा हुआ है, जिसमें परिस्थितियों के अनुसार 2% का ऊपरी और निचला मार्जिन (टोलरेंस बैंड) शामिल किया गया है। वर्तमान में 3.93% की दर पर होने के कारण यह केंद्रीय बैंक के लिए नीतिगत ब्याज दरों (रेपो रेट) की समीक्षा करते समय बहुत अधिक आक्रामक रुख अपनाने के दबाव को कम करती है। पश्चिम एशिया के संकट का घरेलू बाजार पर सीधा असर बाजार विश्लेषकों का स्पष्ट अनुमान है कि पश्चिम एशिया क्षेत्र में जारी सैन्य और राजनीतिक गतिरोध के चलते वैश्विक व्यापारिक मार्गों पर माल ढुलाई की लागत में भारी इजाफा हुआ है। इस वैश्विक संकट के कारण भारत आयातित खाद्य तेलों, ईंधनों और अन्य आवश्यक कच्चे माल के लिए अधिक भुगतान कर रहा है, जिसका संचयी प्रभाव देश के भीतर खुदरा वस्तुओं के अंतिम मूल्य संवर्धन पर दिखाई दे रहा है। यदि आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर यह तनाव और गहराता है, तो आगामी तिमाहियों में घरेलू बाजार के भीतर खुदरा महंगाई दर के इस 4% के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार करने की संभावनाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।  

महंगाई ने तोड़ी 42 महीनों की सीमा, जानिए किन चीजों के दाम सबसे ज्यादा बढ़े

नई दिल्ली महंगाई को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ गई है. अप्रैल 2026 में थोक महंगाई दर यानी WPI (Wholesale Price Index) बढ़कर 8.30 फीसदी पर पहुंच गई, जो पिछले करीब 42 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है. मार्च 2026 में यह आंकड़ा 3.88 फीसदी था. बाजार को उम्मीद थी कि महंगाई करीब 5.50 फीसदी रह सकती है, लेकिन असली आंकड़े ने सभी अनुमान पीछे छोड़ दिए. इससे साफ है कि देश में लागत और ईंधन से जुड़ा दबाव तेजी से बढ़ रहा है।  वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत आने वाले DPIIT द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक इस बार महंगाई बढ़ने की सबसे बड़ी वजह ईंधन और ऊर्जा क्षेत्र रहा. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी और मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का सीधा असर भारत के थोक बाजार पर दिखाई दिया है।  ईंधन और तेल की कीमतों ने बढ़ाई चिंता अप्रैल महीने में फ्यूल एंड पावर कैटेगरी की महंगाई मार्च के 1.05 फीसदी से बढ़कर सीधे 24.71 फीसदी पर पहुंच गई. यह उछाल बेहद बड़ा माना जा रहा है। कच्चे तेल की थोक महंगाई 88 फीसदी से ऊपर पहुंच चुकी है. वहीं, पेट्रोल की कीमतों में 32.40 फीसदी और डीजल में 25.19 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. घरेलू LPG गैस भी महंगी हुई है और इसकी महंगाई दर 10.92 फीसदी रही।  विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान संकट और खाड़ी देशों में बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है. इससे कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़े और इसका असर सीधे भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों पर पड़ा. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है, इसलिए ग्लोबल मार्केट में बदलाव का असर घरेलू कीमतों पर जल्दी दिखता है।  खाने-पीने की चीजों से राहत हालांकि राहत की बात यह रही कि खाने-पीने की चीजों की महंगाई अभी ज्यादा नहीं बढ़ी है. अप्रैल में फूड इन्फ्लेशन बढ़कर 2.31 फीसदी रही, जबकि मार्च में यह 1.85 फीसदी थी. प्याज और आलू जैसी जरूरी सब्जियों के दाम अभी भी पिछले साल के मुकाबले कम बने हुए हैं. इससे आम लोगों को थोड़ी राहत मिली है।  लेकिन दूसरी ओर प्राइमरी आर्टिकल्स यानी कच्चे सामान की महंगाई 6.36 फीसदी से बढ़कर 9.17 फीसदी हो गई. वहीं, मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की महंगाई भी 3.39 फीसदी से बढ़कर 4.62 फीसदी पहुंच गई है. इसका मतलब है कि फैक्ट्रियों में बनने वाले सामान की लागत भी बढ़ रही है।  अन्य सेक्टर्स पर दबाव Core WPI यानी खाने-पीने की चीजों और ईंधन को छोड़कर बाकी वस्तुओं की महंगाई भी बढ़कर 5 फीसदी पर पहुंच गई है, जो 43 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है. मार्च में यह 3.7 फीसदी थी. इससे यह संकेत मिल रहा है कि महंगाई का दबाव अब सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है बल्कि बाकी सेक्टरों में भी फैलने लगा है।  अब बाजार और आम लोगों की नजरें मई महीने के आंकड़ों पर टिकी हैं. DPIIT के अनुसार मई 2026 के WPI आंकड़े 15 जून को जारी किए जाएंगे. अगर तेल की कीमतों में तेजी बनी रहती है, तो आने वाले महीनों में महंगाई और बढ़ सकती है। 

3.40% पर पहुंची महंगाई: जेब पर असर, लोन की EMI बढ़ने के संकेत

नई दिल्ली. भारत में महंगाई एक बार फिर हल्की बढ़त के साथ चर्चा में है, क्योंकि मार्च 2026 में खुदरा महंगाई दर 3.21% से बढ़कर 3.40% पहुंच गई है। यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से खाने-पीने की चीजों और ऊर्जा कीमतों में उछाल की वजह से हुई है, जिसमें पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव का बड़ा असर माना जा रहा है। हालांकि यह आंकड़ा अभी भी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (Reserve Bank of India) के 4% के लक्ष्य से नीचे है, लेकिन बढ़ती कीमतों का दबाव धीरे-धीरे साफ दिखने लगा है। खासकर फूड इंफ्लेशन 3.87% तक पहुंच गया है, जो आम लोगों के बजट पर सीधा असर डाल सकता है। सब्जियां, तेल और रोजमर्रा के खर्च महंगे हो रहे हैं। ऊर्जा की बात करें तो कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने ट्रांसपोर्ट, गैस और यहां तक कि रेस्टोरेंट के खर्च तक को प्रभावित किया है, जिससे महंगाई का असर और बढ़ गया है। यही वजह है कि RBI (Reserve Bank of India) ने हाल ही में ब्याज दरों को 5.25% पर स्थिर रखा है, ताकि हालात पर नजर रखते हुए जल्दबाजी में कोई बड़ा फैसला न लिया जाए। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर यही ट्रेंड जारी रहा, तो अप्रैल में महंगाई 4% के आसपास या उससे ऊपर भी जा सकती है। भले ही अभी स्थिति नियंत्रण में दिख रही हो, लेकिन ग्लोबल तनाव और तेल कीमतों के कारण आने वाले महीनों में महंगाई बढ़ने का खतरा बना हुआ है। इसका असर आम आदमी की जेब से लेकर देश की आर्थिक ग्रोथ तक पर पड़ सकता है, इसलिए आने वाला समय काफी अहम रहने वाला है। भारत में बढ़ती महंगाई का सीधा असर आम लोगों की डेली की जिंदगी पर पड़ता है। जब खुदरा महंगाई बढ़कर 3.40% होती है, तो सबसे पहले खाने-पीने की चीजें (सब्जी, तेल, दूध और राशन) महंगी हो जाती हैं। इससे मिडिल क्लास और लोअर इनकम परिवारों का मासिक बजट बिगड़ता है और बचत कम हो जाती है। दूसरा बड़ा असर ईंधन और ट्रांसपोर्ट पर पड़ता है। कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से पेट्रोल-डीजल और गैस सिलेंडर महंगे हो सकते हैं, जिससे यात्रा खर्च और रोजमर्रा की चीजों की कीमतें और बढ़ जाती हैं। इसका असर स्कूल फीस, किराया, और यहां तक कि बाहर खाने-पीने तक पर दिखाई देता है। तीसरा असर लोगों की खरीदारी क्षमता (Purchasing Power) पर पड़ता है। जब महंगाई बढ़ती है, तो सैलरी उतनी तेजी से नहीं बढ़ती, जिससे लोग गैर-जरूरी खर्च कम करने लगते हैं। जैसे नई कार, मोबाइल या लग्जरी चीजें खरीदने से बचते हैं। इसके अलावा अगर महंगाई लगातार बढ़ती रही तो RBI (Reserve Bank of India) ब्याज दरें बढ़ा सकता है, जिससे लोन (होम लोन, कार लोन) महंगे हो जाएंगे और EMI का बोझ बढ़ेगा। महंगाई का असर हर व्यक्ति की जेब पर पड़ता है।

महंगाई घटने वाली है, RBI सर्वे ने दी खुशखबरी, त्योहारों पर बढ़ेगा आपका बजट

नई दिल्ली  केंद्र सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के घरों में खाने-पीने और दूसरी चीजों की कीमतों पर दबाव कम हो रहा है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के नए सर्वे से ये बात सामने आई है. आरबीआई का ये बाय-मंथली इन्फ्लेशन एक्सपेक्टेशंस सर्वे ऑफ हाउसहोल्ड्स (IESH) सितंबर 2025 का राउंड था. इसमें घरवालों ने बताया कि मुख्य उत्पादों की कीमतों और महंगाई का दबाव घट रहा है. हालांकि, अभी की महंगाई की धारणा थोड़ी बढ़ी हुई लगी. एनआई की रिपोर्ट के अनुसार, सर्वे में कहा गया कि घरों ने फूड प्रोडक्ट्स, नॉन-फूड प्रोडक्ट्स, हाउसिंग और सर्विसेज की लागत में राहत महसूस की है. ये सर्वे 28 अगस्त से 6 सितंबर के बीच 19 बड़े शहरों में किया गया. कुल 6,082 लोगों ने जवाब दिए. तीन महीनों में महंगाई की उम्मीद घटी सर्वे के नतीजों के अनुसार, घरों की मौजूदा मीडियन महंगाई की धारणा पहले राउंड से 20 बेसिस पॉइंट्स बढ़कर 7.4 फीसदी हो गई. लेकिन आने वाले समय के लिए उम्मीदें कम हुईं. अगले तीन महीनों की महंगाई की उम्मीद 20 बेसिस पॉइंट्स घटकर 8.1 फीसदी रह गई. एक साल आगे की उम्मीद 30 बेसिस पॉइंट्स कम होकर 8.7 फीसदी हो गई. एक साल में इतने फीसदी कीमतें बढ़ेंगी छोटे समय और एक साल के लिए, जिन लोगों को लगता है कि सामान्य कीमतें और महंगाई बढ़ेगी, उनका प्रतिशत पिछले सर्वे से कम हुआ. उत्पादों के हिसाब से, अगले तीन महीनों में 77.8 फीसदी लोगों को कीमतें बढ़ने की आशंका है, जो पहले 79.5 फीसदी था. एक साल में 86.8 फीसदी कीमतें बढ़ने का अंदेशा है, पहले ये 88.1 फीसदी था. उम्र के हिसाब से, 25 साल से कम उम्र के युवाओं ने सबसे कम मौजूदा महंगाई 7.0 फीसदी बताई. वहीं, 60 साल से ऊपर के घरों में ये 7.9 फीसदी रही. शहरों में कोलकाता में सबसे ज्यादा 10.5 फीसदी की धारणा थी, उसके बाद मुंबई 8.5 फीसदी और दिल्ली 8.0 फीसदी. आरबीआई ने साफ किया कि ये सर्वे घरों की महंगाई पर नजर डालता है, जो उनके खरीदारी के पैटर्न से प्रभावित होता है. लेकिन ये नतीजे बैंक की अपनी महंगाई की राय को जरूरी नहीं दर्शाते. ये जानकारी घरवालों को राहत देती है कि कीमतें धीरे-धीरे काबू में आ रही हैं, लेकिन सतर्क रहना जरूरी है.