samacharsecretary.com

ममता के घर में TMC नेताओं की तीखी बयानबाजी, अभिषेक बनर्जी पर टिप्पणियों से बढ़ी सियासी हलचल

कोलकत्ता  तृणमूल कांग्रेस (TMC) विधायकों की मंगलवार को हुई आंतरिक बैठक में असहमति देखने को मिली। खबर है कि फालता सीट पर 21 मई को फिर से होने वाले चुनाव से पार्टी के उम्मीदवार जहांगीर खान के अचानक नाम वापस लेने से टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं। सूत्रों के अनुसार, कालीघाट में हुई इस बैठक में टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी और अभिषेक भी मौजूद थे। बैठक में विधायकों ने फालता में अचानक हुए राजनीतिक उथल-पुथल और पार्टी के संगठनात्मक कामकाज पर सवाल उठाए। इस घटनाक्रम की वजह जहांगीर खान हैं, जो फालता में राजनीतिक रस्साकशी के स्वघोषित 'पुष्पा' हैं। उन्होंने दिन में, फिर से होने वाले चुनाव से अपना नाम वापस लेने की घोषणा करके राज्य के राजनीतिक हलकों को चौंका दिया, जिससे हालिया विधानसभा चुनावों की सबसे विवादित सीटों में से एक पर भाजपा के लिए जीत की राह आसान होती दिख रही है। जहांगीर खान के खिलाफ TMC ने क्यों नहीं की कार्रवाई? पार्टी सूत्रों के अनुसार, कोलकाता के दो और हावड़ा के एक विधायक ने जहांगीर के नाम वापस लेने का हवाला देते हुए बैठक में सवाल उठाए। संयोगवश, तीनों विधायक कालीघाट की बैठक में एक ही वाहन से पहुंचे थे। टीएमसी सूत्रों ने बताया कि ये सवाल उठाए गए कि जहांगीर ने मतदान से दो दिन पहले चुनाव से नाम वापस ले लिया, फिर भी उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई। अभिषेक बनर्जी पर निशाना कुछ टिप्पणियों को अभिषेक पर परोक्ष रूप से निशाना साधने के रूप में देखा गया, जिनके डायमंड हार्बर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत फालता विधानसभा क्षेत्र आता है। दो वरिष्ठ विधायकों ने जहांगीर को 'केंद्रीय प्रशासन वाले क्षेत्र का नेता' कहकर कथित तौर पर व्यंग्य किया, जो यह डायमंड हार्बर क्षेत्र में कड़े नियंत्रण वाले राजनीतिक तंत्र की धारणा पर एक स्पष्ट कटाक्ष था। यह सवाल भी उठाया गया कि जहांगीर, जिन्हें कथित तौर पर काफी संगठनात्मक समर्थन प्राप्त है और जिनकी प्रभावशाली नेताओं से निकटता है, ने चुनाव से हटने का फैसला क्यों किया। हाल के हफ्तों में फालता सीट का राजनीतिक महत्व काफी बढ़ गया है। फालता सीट पर 29 अप्रैल को हुए चुनाव को बाद में रद्द कर दिया गया और दोबारा चुनाव कराने की घोषणा की गई थी। श्मशान घाट के मुद्दे पर तंज हालिया चुनाव से पहले, प्रचार के दौरान अभिषेक ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि जहांगीर ने उनसे इलाके में श्मशान घाट बनवाने का अनुरोध किया है। बाद में उन्होंने टिप्पणी की कि 4 मई को विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद, 'दिल का दौरा पड़ने से मरने वालों' का वहां अंतिम संस्कार किया जा सकेगा। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने बताया कि मंगलवार की चर्चा के दौरान यह विवादास्पद टिप्पणी फिर से सामने आई और विधायकों ने कथित तौर पर पूछा कि अब श्मशान घाट कौन बनवाएगा और किसके लिए बनवाएगा। टीएमसी के वरिष्ठ नेताओं ने इन टिप्पणियों को पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए ऐसे समय में एक व्यापक संदेश के रूप में देखा है, जब संगठन के कुछ वर्ग निजी तौर पर चुनाव के बाद की रणनीति पर चर्चा कर रहे हैं। अभिषेक की हालिया राजनीतिक उपस्थिति को लेकर उठ रहे सवालों के मद्देनजर भी इस चर्चा का महत्व बढ़ गया। चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद से ममता बनर्जी सार्वजनिक रूप से सक्रिय रही हैं – कार्यक्रमों में भाग लेती रहीं और चुनाव बाद हुई हिंसा के मुद्दों पर अदालतों का रुख किया। जबकि, अभिषेक अपेक्षाकृत कम सक्रिय रहे और फालता विधानसभा सीट उनके संसदीय क्षेत्र में आने के बावजूद चुनाव प्रचार के दौरान प्रमुखता से नजर नहीं आए।. ये विधायक हुए नाराज टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, कुणाल घोष, रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा ने पार्टी नेतृत्व की खुलकर आलोचना की है। यह घटनाक्रम ऐसे समय पर हुआ है, जब भारत निर्वाचन आयोग की तरफ से डेटा सामने आया है, जिसमें कहा गया है कि ममता बनर्जी भवानीपुर सीट के 267 में 207 बूथों पर पीछे चल रहीं थीं। यहां उन्हें शुभेंदु अधिकारी के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। अभिषेक बनर्जी पर हुए नाराज सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया कि तीनों विधायकों ने आरोप लगाए हैं कि सांसद अभिषेक बनर्जी के फैसले पार्टी पर थोपे गए थे, जिसके चलते पार्टी को झटका लगा। साथ ही फालता से जहांगीर खान के नामांकन वापस लेने पर भी तंज कसा गया। क्या था रिएक्शन रिपोर्ट के अनुसार, सूत्रों ने कहा, 'बुआ और भतीजे की जोड़ी को समझ ही नहीं आया कि उनके साथ अचानक यह क्या हो गया। वे दोनों बिल्कुल चुपचाप बैठे सुनते रहे। उनके चेहरे पर गुस्सा साफ दिख रहा था, लेकिन वे कुछ बोले नहीं।' उन्होंने बताया ठीक इसके पहले ही पार्टी प्रमुख ने दावा किया था कि भाजपा भविष्य में केंद्र से चली जाएगी। अखबार से बातचीत में एक सूत्र ने कहा, 'कुणाल ने खुलकर कहा कि अब बहुत हो गया है और खुलकर बोलने की आजादी मांगी। उन्होंने कहा कि उनके कालीघाट वाले घर पर ऐसी बहुत सी बैठकें हो चुकी हैं, अब हमें उन बैठकों को छोड़कर सड़कों पर उतरना चाहिए ताकि बीजेपी की इस बुलडोजर आर्मी से गरीब और बेबस लोगों को बचाया जा सके।' लगातार दूसरी बार हारी हैं ममता बनर्जी साल 2021 में ममता बनर्जी को नंदीग्राम सीट से हार का सामना करना पड़ा था। हालांकि, टीएमसी ने राज्य में 200 से ज्यादी सीटों पर जीत हासिल कर सरकार बरकरार रखने में सफलता हासिल की थी। वहीं, 2026 में उन्हें दोहरा झटका लगा। एक ओर जहां उन्होंने भवानीपुर सीट शुभेंदु अधिकारी के हाथों गंवाई। जबकि, टीएमसी भी महज 80 सीटें ही जीत सकी। भाजपा ने अधिकारी को मुख्यमंत्री बनाया। 15 विधायक गायब बैठक में विधायकों की उपस्थिति को लेकर भी चिंता जताई गई। पार्टी सूत्रों के अनुसार, लगभग 15 विधायक अनुपस्थित थे।कई विधायकों ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया, वहीं मालदा के एक विधायक ने नेतृत्व को कथित तौर पर सूचित किया कि वह काम के सिलसिले में दिल्ली में हैं। इससे राजनीतिक हलकों में उनके संभावित भावी कदम को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं, हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई। LoP पर क्या … Read more

TMC-Congress गठबंधन होता तो कितनी सीटें जीतती ममता? सामने आया बड़ा चुनावी समीकरण

कोलकत्ता  पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस भले ही सिर्फ एक राज्य केरल में जीत दर्ज करने में सफल रही हो, पर इन चुनाव में पार्टी यह साबित करने में सफल रही कि उसके बगैर INDIA गठबंधन के घटक दलों के लिए जीत आसान नहीं है। कम से कम पश्चिम बंगाल में यह बात सही बैठती है, क्योंकि भाजपा विरोधी वोट बंटवारे की वजह से तृणमूल कांग्रेस को करीब तीन दर्जन सीट का नुकसान हुआ है। 1 दर्जन से ज्यादा सीटों पर असर चुनाव परिणाम के आंकड़ों के मुताबिक, एक दर्जन से अधिक सीट पर कांग्रेस ने तृणमूल कांग्रेस को सीधे तौर पर प्रभावित किया है। वर्ष 2021 में इनमें से दस सीट टीएमसी के पास थी। पर इस बार कांग्रेस को टीएमसी और भाजपा के बीच जीत के अंतर से अधिक वोट मिले। इसके साथ टीएमसी को छह सीट का नुकसान नोटा की वजह से हुआ। इन सीट पर भी कांग्रेस को नोटा से अधिक वोट मिले थे। बंगाल में कुल विधानसभा सीटें 294 हैं, जिनमें से टीएमसी के खाते में 80 सीटें आईं हैं। जबकि, भाजपा 207 पर विजयी रही है। कांग्रेस ने 2 और लेफ्ट को 1 सीट मिली है। मुस्लिम वोटर्स ने दिया किसका साथ इसके साथ भाजपा को मुस्लिम वोट में विभाजन का भी फायदा मिला। मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर की कुल 43 में से 20 सीट पर भाजपा ने जीत दर्ज की। क्योंकि, मतदाता कांग्रेस, लेफ्ट, इंडियन सेकुलर फ्रंट और हुमायूं कबीर की पार्टी में बंट गए। जबकि वर्ष 2021 में मतदाता टीएमसी के पक्ष में एकजुट थे। उस वक्त टीएमसी को इन सीट में 35 और भाजपा को सिर्फ आठ सीटें मिली थी। लेफ्ट के पास सात फीसदी वोट राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि पश्चिम बंगाल में लेफ्ट वर्षों सरकार में रहा है। लेफ्ट के पास अभी भी करीब सात फीसदी वोट है। हार के बाद INDIA गठबंधन की दुहाई देने वाली पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले स्थिति को समझ लेतीं, तो उन्हें इस तरह हार का मुंह नहीं देखना पड़ता। विश्लेषकों का कहना है कि कई दर्जन ऐसी सीट हैं, जहां लेफ्ट और कांग्रेस को तृणमूल की हार के अंतर से अधिक वोट मिले हैं। स्थिति समझनी होगी कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि वक्त आ गया है कि सभी विपक्षी दल एक बार फिर एकजुट और नए सिरे से रणनीति बनाए। बकौल उनके, कांग्रेस अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार है, पर क्षेत्रीय पार्टियों को भी स्थिति को समझना होगा। सभी घटक दलों के बेहतर तालमेल और साझेदारी के साथ चुनाव में उतरना होगा। इसके लिए लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा में एकजुटता जरूरी है। पहले भी हुआ नुकसान ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि विपक्षी दलों के मत विभाजन का फायदा भाजपा को मिला है। वर्ष 2022 के गुजरात और 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम इसकी मिसाल हैं। दिल्ली में कांग्रेस को करीब एक दर्जन सीट पर हार के अंतर से अधिक वोट मिले थे। इसी तरह गुजरात में आप की वजह से कांग्रेस को 39 सीट का नुकसान हुआ था। इन सीट पर आप को भाजपा की जीत के अंतर से अधिक वोट मिले थे। जबकि आप को सिर्फ पांच सीटें मिली थी।

ममता सरकार के नेताओं पर बड़ा असर! अभिषेक बनर्जी की सुरक्षा घटी, बंगाल में सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा

कोलकाता पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद नई बीजेपी सरकार ने रविवार को VIP सुरक्षा का रिव्यू कर ढांचागत बदलाव करते हुए तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी समेत कई हाई-प्रोफाइल नेताओं और पूर्व पुलिस अधिकारियों की वीआईपी सुरक्षा में भारी कटौती की है. इस प्रशासनिक समीक्षा के बाद गृह विभाग ने कल्याण बनर्जी, सुब्रत बख्शी, राजीव कुमार और अरूप बिस्वास जैसे कई वीआईपी के घरों के बाहर तैनात हाउस गार्ड्स को तुरंत वापस ले लिया है।  अधिकारियों के अनुसार, ताजा थ्रेट परसेप्शन (खतरे का आकलन) की नई समीक्षा में पाया गया कि इन लोगों को अब अत्यधिक सुरक्षा की जरूरत नहीं है. हालांकि, प्रशासन ने स्पष्ट आदेश दिया है कि पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सुरक्षा में कोई कटौती नहीं होगी और उनकी सुरक्षा में कोई कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।  प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, राज्य में सरकार बदलने के ठीक बाद सुरक्षा समीक्षा प्रक्रिया शुरू की गई थी. इसके तहत सबसे पहले टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी की सुरक्षा को कम किया गया है. सरकार ने उनकी 'जेड-प्लस' (Z-Plus) कैटेगरी की सुरक्षा और विशेष पायलट कार की सुविधाओं को पूरी तरह बंद कर दिया है. इसके अलावा कालीघाट स्थित उनके आवास और कैमैक स्ट्रीट पर उनके ऑफिस कैंपस के बाहर तैनात पुलिस बल को भी वापस बुला लिया गया है।  MP's और MLA's को मिलेगी केवल तय सुरक्षा सरकार द्वारा जारी नई गाइडलाइन के मुताबिक, टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी और पूर्व पुलिस प्रमुख राजीव कुमार को अब केवल सांसद के रूप में मिलने वाली सुरक्षा ही दी जाएगी. पूर्व मंत्री अरूप बिस्वास के पास वर्तमान में कोई मंत्री पद या विधायी पद नहीं होने के कारण उनकी पुरानी सुरक्षा हटा दी गई है।  वहीं, बेलियाघाटा के विधायक कुणाल घोष को शारदा मामले में जमानत के बाद कोर्ट के निर्देश पर मिली अतिरिक्त सुरक्षा हटाकर अब केवल विधायक स्तर की सुरक्षा दी गई है।  पूर्व DGP और वकीलों की सुरक्षा भी घटी सुरक्षा में कटौती की इस लिस्ट में पूर्व डीजीपी मनोज मालवीय, पूर्व कार्यवाहक डीजीपी पीयूष पांडे और टीएमसी के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने वाले एक प्रमुख अधिवक्ता का नाम भी शामिल है. पीयूष पांडे को अब केवल उनके वर्तमान पद के अनुसार ही सुरक्षा कवर मिलेगा. सरकार का स्पष्ट निर्देश है कि किसी भी व्यक्ति को उसकी वास्तविक जरूरत से ज्यादा सुरक्षा नहीं दी जानी चाहिए, इसलिए इन अतिरिक्त सुरक्षा बलों को वापस बुलाया गया है।  ममता बनर्जी की सुरक्षा रहेगी बरकरार विभिन्न नेताओं की सुरक्षा में कटौती के बीच प्रशासन ने ये भी साफ किया है कि पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सुरक्षा व्यवस्था से कोई समझौता नहीं किया जाएगा. कोलकाता पुलिस को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि ममता बनर्जी के आवास, उनके दौरों और सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान पर्याप्त सुरक्षा बल तैनात रहने चाहिए. अधिकारियों ने कहा कि उनकी सुरक्षा व्यवस्था में किसी भी प्रकार की लापरवाही को बिल्कुल भी सहन नहीं किया जाएगा। 

‘हार के बाद कोर्ट का सहारा’… ममता बनर्जी पर पूर्व जज की तीखी टिप्पणी

कोलकत्ता  पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के काला कोट पहनकर कोर्ट जाने को लेकर बवाल छिड़ गया है। अब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू ने आरोप लगाए हैं कि बनर्जी ने सुर्खियों में बने रहने के लिए अदालत को चुना है। साथ ही उन्होंने कहा है कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद वह ऐसा कर रहीं हैं। इधर, BCI यानी भारतीय विधिज्ञ परिषद ने भी तृणमूल कांग्रेस प्रमुख से जवाब तलब किया है। जस्टिस काटजू ने लिखा, 'ममता बनर्जी हाई कोर्ट क्यों गईं? जाहिर है क्योंकि वह अपना खुद का चुनाव हार गई हैं और इसलिए वह विधानसभा में चिल्ला नहीं सकतीं। लेकिन उनके पास ऐसी जगह होनी चाहिए जहां वह चिल्ला सकें, ताकि उन्हें पब्लिसिटी मिले और वह सुर्खियों में बनी रहें। इसलिए उन्होंने हाई कोर्ट को चुना है।' एक अन्य पोस्ट में उन्होंने लिखा, 'ममता बनर्जी ने तो हद कर दी थी।' ममता बनर्जी काले कोट में कोर्ट पहुंचीं बनर्जी गुरुवार को वकील का गाउन पहनकर कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंची। बनर्जी ने चुनाव के बाद कथित हिंसा और पार्टी दफ्तरों पर हमलों के मामले में अपनी दलील में कहा कि ‘बंगाल कोई बुल्डोजर राज्य नहीं है। अदालत से बाहर निकलते समय कुछ लोगों ने ममता के खिलाफ नारे भी लगाए। मामला मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल और जस्टिस पार्थसारथी सेन की खंडपीठ के सामने सुनवाई के लिए आया। बनर्जी के साथ तृणमूल कांग्रेस की वरिष्ठ नेता चंद्रिमा भट्टाचार्य और कल्याण बनर्जी भी थे। यह मामला टीएमसी की ओर से वकील शीर्षन्या बंद्योपाध्याय की दायर एक जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें 2026 के विधानसभा चुनाव के नतीजों की घोषणा के बाद पार्टी कार्यालयों पर हमलों और उसके कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा का आरोप लगाया गया है। BCI ने मांगा जवाब BCI ने पश्चिम बंगाल बार काउंसिल से बनर्जी के पंजीकरण और पेशेवर वकालत की स्थिति के संबंध में 48 घंटों के भीतर एक विस्तृत रिपोर्ट भेजने को कहा। दरअसल, कोई भी व्यक्ति, जो संवैधानिक पद पर है या लाभकारी रूप से नियोजित है, उसे अपना बार लाइसेंस सेवा के दौरान निलंबित करवाना पड़ता है और फिर से वकालत करने के लिए इसे दोबारा चालू कराना होता है। पत्र में कहा गया है, 'ममता बनर्जी ने 2011 से 2026 तक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया। उक्त अवधि के दौरान उनके संवैधानिक सार्वजनिक पद को ध्यान में रखते हुए और इस समय पर इस बात पर कोई राय व्यक्त किए बिना कि ऐसी उपस्थिति की अनुमति है या नहीं, बीसीआई को उनके पंजीकरण, वकालत, निलंबन और दोबारा प्रारंभ की तथ्यात्मक स्थिति आपके रिकॉर्ड से सत्यापित करने की आवश्यकता है।' बीसीआई ने पश्चिम बंगाल बार काउंसिल से बनर्जी की पंजीकरण संख्या और राज्य बार काउंसिल में उनके नामांकन की तारीख भी बताने को कहा है।

ममता बनर्जी की हाईकोर्ट में एंट्री पर शुभेंदु का हमला, बोले- मेरे पास बेकार चीजों के लिए समय नहीं

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पूर्व ममता बनर्जी ने खुद एक केस की पैरवी की थी। उन्होंने वकील बनकर आदलत में बहस की थी। चुनाव में उन्हें करारी हाल झेलनी पड़ी। आज जब वह कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंचीं तो वह फिर एकबार वकील के लिबास में नजर आईं। ममता के इस कदम के बारे में जब पश्चिम बंगाल के नए-नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से पूछा गया तो उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि उनके पास बहुत काम हैं। इन बातों पर प्रतिक्रिया देने का समय नहीं है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा, "मेरे पास बहुत काम है। मेरे पास छोटी-मोटी बातों में उलझने का समय नहीं है। समय बहुत कीमती है। मैं बेमतलब के मुद्दों में नहीं उलझा हुआ हूं।" आपको बता दें कि ममता बनर्जी ने वकीलों के लिए तय की गई पोशाक पहनकर कोर्टरूम में प्रवेश किया। ममता बनर्जी चुनाव के बाद हुई हिंसा से जुड़े मामलों के सिलसिले में कोर्ट में पेश हुईं। उस दिन कोर्ट में उनके साथ चंद्रिमा भट्टाचार्य और कल्याण बनर्जी भी मौजूद थे। विधानसभा चुनावों के बाद राज्य के अलग-अलग हिस्सों में अशांति की खबरें सामने आई हैं। इन आरोपों के मद्देनजर तृणमूल सांसद कल्याण बनर्जी के वकील बेटे शीर्षान्या बनर्जी ने हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की है। इस मामले की सुनवाई गुरुवार को हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पाल और न्यायाधीश पार्थसारथी सेन की पीठ के समक्ष होनी है। 12 मई को तृणमूल कांग्रेस ने कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनाव के बाद हुई हिंसा के मामलों के संबंध में एक याचिका दायर की। पार्टी की ओर से वकील शीर्षान्या बनर्जी ने जनहित याचिका (PIL) दायर की। मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पाल और न्यायाधीश पार्थसारथी सेन की खंडपीठ का ध्यान इस मामले की ओर आकर्षित किया गया और मामले की शीघ्र सुनवाई का अनुरोध किया गया। इसके बाद खंडपीठ ने निर्देश दिया कि इस मामले की सुनवाई आज यानी कि गुरुवार को की जाएगी।

ममता कैबिनेट बर्खास्त, विधानसभा पर राज्यपाल का वीटो प्रभाव

कलकत्ता पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा संवैधानिक संकट तब खड़ा हो गया, जब राज्यपाल आर.एन. रवि ने अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए मंत्रिमंडल को बर्खास्त कर दिया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के इस्तीफ़ा देने से इनकार करने के बीच, राज्यपाल ने अपनी संवैधानिक वीटो शक्ति का प्रयोग करते हुए राज्य विधानसभा को भंग करने की अधिसूचना जारी कर दी। यह ऐतिहासिक निर्णय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 174(2)(b) के तहत लिया गया। राज्यपाल के निर्देश पर मुख्य सचिव दुष्यंत नारियाला द्वारा जारी इस आदेश के बाद, राज्य सरकार का अस्तित्व प्रभावी रूप से समाप्त हो गया है। राज्यपाल के इस कड़े कदम से बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में हलचल मच गई है, जिसके परिणामस्वरूप मंत्रिमंडल और विधानसभा, दोनों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया गया है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस समय बड़ा संवैधानिक संकट खड़ा हो गया, जब राज्यपाल आर. एन. रवि ने अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कैबिनेट को बर्खास्त कर दिया. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के इस्तीफे से इनकार के बीच राज्यपाल ने संवैधानिक वीटो का इस्तेमाल करते हुए 7 राज्य विधानसभा को भंग करने की अधिसूचना जारी कर दी है. यह ऐतिहासिक निर्णय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 174(2)(b) के तहत लिया गया है. मुख्य सचिव दुष्यंत नारियाला द्वारा राज्यपाल के निर्देशों पर जारी इस आदेश के बाद राज्य सरकार का वजूद समाप्त हो गया है. राज्यपाल के इस कड़े कदम ने बंगाल की सियासत में खलबली मचा दी है, जिससे कैबिनेट और विधानसभा दोनों तत्काल प्रभाव से भंग कर दी गई हैं।  अनुच्छेद 174(2)(b) और बंगाल का अभूतपूर्व संकट यह पूरी कार्रवाई भारतीय संविधान के अनुच्छेद 174(2)(b) के इर्द-गिर्द घूमती है. यह अनुच्छेद राज्यपाल को राज्य विधानसभा को भंग करने की शक्ति प्रदान करता है. आमतौर पर राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर ऐसा करते हैं लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में जब सरकार और राजभवन के बीच टकराव चरम पर था, राज्यपाल ने इस वीटो जैसी शक्ति का इस्तेमाल कर ममता सरकार के अस्तित्व को ही समाप्त कर दिया. मुख्य सचिव दुष्यंत नारियाला द्वारा जारी अधिसूचना स्पष्ट करती है कि यह निर्णय राजभवन के सीधे आदेश पर लिया गया है जो राज्य में गहरे राजनीतिक और प्रशासनिक गतिरोध का संकेत है।  पश्चिम बंगाल गवर्नर के आदेश के मुख्‍य प्‍वाइंट्स · ऐतिहासिक बर्खास्तगी: राज्यपाल आर. एन. रवि ने ममता बनर्जी की कैबिनेट को बर्खास्त कर 7 मई, 2026 से विधानसभा भंग करने की घोषणा की है।  · संवैधानिक आधार: इस पूरी कार्रवाई को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 174(2)(b) के तहत अंजाम दिया गया है, जो राज्यपाल को विधानसभा भंग करने का अधिकार देता है।  · अधिसूचना जारी: मुख्य सचिव दुष्यंत नारियाला ने आधिकारिक आदेश जारी कर बताया कि यह निर्णय राज्यपाल के निर्देशों पर तत्काल प्रभाव से लागू किया गया है।  · संवैधानिक संकट: ममता बनर्जी द्वारा पद छोड़ने से इनकार के बाद यह कदम उठाया गया, जिससे राज्य में निर्वाचित सरकार का शासन समाप्त हो गया है।  · आगे का रास्ता: विधानसभा भंग होने के बाद अब राज्य में राष्ट्रपति शासन या जल्द चुनाव की संभावनाएं प्रबल हो गई हैं।  सवाल-जवाब राज्यपाल ने किस संवैधानिक शक्ति के तहत पश्चिम बंगाल विधानसभा को भंग किया है? राज्यपाल ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 174(2)(b) के तहत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा को भंग किया है।  पश्चिम बंगाल गवर्नर का आदेश किस तारीख से प्रभावी माना जाएगा? मुख्य सचिव द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, विधानसभा भंग करने और कैबिनेट बर्खास्त करने का यह निर्णय 7 मई, 2026 से प्रभावी हो गया है।  क्या मुख्यमंत्री की सलाह के बिना विधानसभा भंग की जा सकती है? सामान्यतः राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर काम करते हैं, लेकिन असाधारण परिस्थितियों या संवैधानिक विफलता की स्थिति में राज्यपाल अनुच्छेद 174 के तहत स्वविवेक का प्रयोग कर सकते हैं।  मुख्य सचिव की पश्चिम बंगाल के गवर्नर के आदेश में क्या भूमिका रही? मुख्य सचिव दुष्यंत नारियाला ने राज्यपाल के निर्देशों को प्रशासनिक रूप से लागू किया और विधानसभा भंग करने की आधिकारिक अधिसूचना जारी की। 

सपा ने I-PAC से किया अलगाव, ममता-स्टालिन की हार के बाद चुनाव प्रबंधन खुद करेगी पार्टी

  लखनऊ समाजवादी पार्टी ने बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में एमके स्टालिन की चुनावी हार के बाद चुनाव प्रबंधन कंपनी आई-पैक (I-PAC) से अपना रिश्ता खत्म करने का फैसला लिया है. बताया जा रहा है कि अब पार्टी खुद चुनाव प्रबंधन  करेगी।  आधिकारिक तौर पर हालांकि, समाजवादी पार्टी की तरफ से I-PAC आईपैक से ना तो रिश्ता जोड़ने का कोई बयान आया था. ना ही अब जबकि 2027 चुनाव के लिए आईपैक से संबंध टूटे हैं तो इसका कोई आधिकारिक बयान पार्टी की तरफ से अभी तक आया है, लेकिन पार्टी के सूत्र ये बता रहे हैं कि चुनाव प्रबंधन करने वाली सबसे चर्चित कंपनी I-PAC से अब समाजवादी पार्टी का कोई संबंध नहीं है, या यूं भी कहें कि बंगाल और तमिलनाडु में ममता बनर्जी और स्टालिन का हश्र देखने के बाद अब अखिलेश यादव ने आईपैक से दूरी बनाना ही बेहतर समझा है।  पार्टी के इंसाइडर्स यह बता रहे हैं कि आईपैक पर पड़े लगातार छापे और अब दो राज्यों में चुनावी हार, जहां आईपैक इस चुनाव को मैनेज कर रही थी उसके बाद पार्टी के थिंक टैंक ने इस संस्था से दूरी बनाना ही बेहतर समझा है और I-PAC को ये बात भी दिया गया है कि की चुनाव में साथ नहीं चल सकते।  बता दें कि जिस दिन कोलकाता में आईपैक ऑफिस में छापे पड़ रहे थे और ममता बनर्जी आईपैके के दफ्तर पहुंच गई थी, उसे दिन समाजवादी पार्टी ऑफिस आईपैक अपना प्रेजेंटेशन दे रही थी।  आईपैक के साथ जाने का सब कुछ तय हो चुका था, लेकिन प्रेजेंटेशन के दिन ही पड़े छापे ने अखिलेश यादव का जायका खराब कर दिया था और तभी यह पार्टी सोचने लगी थी क्या आईपैड को साथ लेना कहीं भारी तो नहीं पड़ जाएगा. अब ममता बनर्जी और स्टालिन की हार के बाद इस पर मोहर लग गई है, लेकिन शायद ही ऐसा हो कि सपा इसे आधिकारिक तौर पर स्वीकार करें। 

ममता की 3 घंटे की मौजूदगी और कार्यकर्ताओं का पहरा, टीएमसी के आरोप पर EC का जवाब

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल को दूसरे चरण की वोटिंग ख़त्म होने के एक दिन बाद ईवीएम और पोस्टल बैलट बॉक्स को रखने के लिए इस्तेमाल होने वाले स्ट्रॉन्ग रूम को लेकर विवाद हो गया।  30 अप्रैल की दोपहर से शुरू हुआ ये विवाद शाम तक काफ़ी बढ़ गया और कई जगह तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) नेताओं, उनके समर्थकों और प्रशासन-पुलिस के लोगों के बीच बहस देखने को मिली।  तृणमूल कांग्रेस के लोग स्ट्रॉन्ग रूम को लेकर पुलिस-प्रशासन पर 'धांधली' करने के आरोप लगाते दिखे. वहीं बीजेपी ने कहा कि ममता बनर्जी की पार्टी हार रही है, इसलिए 'धांधली' के आरोप लगाए जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल को दूसरे चरण में विधानसभा की 142 सीटों पर वोटिंग हुई थी. नतीजे 4 मई को आएंगे।   टीएमसी ने स्ट्रॉन्गरूम में पोस्टल बैलट से छेड़छाड़ का आरोप लगाया और इसके बाद पार्टी के नेताओं के संबंधित जगह पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद भी पहुंच गईं और धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया. विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इसे राजनीतिक ड्रामा बताया. मामले ने तूल पकड़ा तो चुनाव आयोग को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर स्थिति साफ करनी पड़ी. इस दौरान क्या-क्या हुआ? शाम तीन बजे के बाद तक सब सामान्य था, फिर एक ई-मेल आया. ई-मेल में इस बात की सूचना थी कि शाम 4 बजे स्ट्रॉन्गरूम खुलेगा. टीएमसी नेता कुणाल घोष और शशि पांजा मौके पर पहुंचे, लेकिन उनको अंदर जाने की इजाजत नहीं दी गई. टीएमसी ने इस पर शक जताते हुए पार्टी प्रतिनिधियों के बिना पोस्टल बैलट और पिंक पेपर संभालने को लोकतंत्र के खिलाफ बताया. टीएमसी ने इसका वीडियो भी शेयर किया और इसके बाद सियासी पारा चढ़ता ही चला गया. कुणाल घोष और शशि पांजा स्ट्रॉन्गरूम के बाहर धरने पर बैठ गए. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी मौके पर पहुंच गईं।  सीएम की अपील पर बड़ी तादाद में टीएमसी समर्थक पहले से ही मौके पर थे. सीएम ने समर्थकों से 24 घंटे स्ट्रॉन्गरूम की निगरानी करने की अपील की थी. ममता सखावत मेमोरियल स्कूल में बने स्ट्रॉन्गरूम में पहुंचीं और करीब तीन घंटे तक रहीं. इस स्कूल में भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र की ईवीएम रखी हुई है, जहां से खुद ममता बनर्जी उम्मीदवार हैं. ममता बनर्जी करीब तीन घंटे तक स्ट्रॉन्गरूम में रहीं. स्ट्रॉन्गरूम से निकलने के बाद उन्होंने आरोप लगाया कि सुरक्षाकर्मियों ने उनको अंदर जाने से रोक दिया. जब कहा कि मुझे जाने का अधिकार है, चुनाव नियमों के मुताबिक उम्मीदवार को सील कक्ष के बाहर तक जाने की अनुमति है, तब मुझे जाने दिया गया।  उन्होंने कई जगह गड़बड़ी मिलने का दावा करते हुए कहा कि अगर कोई गड़बड़ी हुई, तो हम लड़ेंगे. ईवीएम मशीन लूटने की कोई कोशिश करेगा, तो हम जिंदगी-मौत एक कर देंगे. टीएमसी के आक्रामक रुख, धरना-प्रदर्शन और आरोप के बीच कई घंटे तक माहौल गर्म बना रहा. इस दौरान टीएमसी और बीजेपी समर्थकों के बीच तीखी नोकझोंक भी हुई. बीजेपी नेता अमित मालवीय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कहा कि ममता बनर्जी का यह नाटकीय रवैया पश्चिम बंगाल के लिए सबसे साफ एग्जिट पोल है।  टीएमसी के आरोप टीएमसी ने चुनाव आयोग पर बीजेपी के साथ मिलकर लोकतंत्र से खिलवाड़ का आरोप लगाया और कहा कि स्ट्रॉन्गरूम के आसपास उनकी जानकारी के बगैर हलचल हो रही है, जो गलत है. कुणाल घोष ने कहा कि तय यह हुआ था कि बिना बताए स्ट्रॉन्गरूम की सील नहीं तोड़ी जाएगी. फिर ऐसा क्यों हुआ? उन्होंने विपक्ष पर भी हमला बोला और कहा कि हम जब गलत का विरोध कर रहे हैं, तब बीजेपी को इतनी मिर्ची क्यों लग रही है।  चुनाव आयोग का जवाब टीएमसी के आरोप पर चुनाव आयोग को रात के समय प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जवाब देना पड़ा. चुनाव आयोग ने टीएमसी के आरोप सिरे से खारिज कर दिए और कहा कि स्ट्रॉन्गरूम में रखे बैलट की छंटनी की जा रही थी. यह प्रक्रिया का हिस्सा है. चुनाव आयोग ने दावा किया कि सभी पार्टियों को इसकी जानकारी पहले ही दे दी गई थी. बैलट बॉक्स के साथ किसी तरह की कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है. खुदीराम अनुशीलन केंद्र के सभी सात स्ट्रॉन्गरूम पूरी तरह से सुरक्षित हैं. पोस्टल बैलट की छंटनी का काम दूसरे कमरे में चल रहा था। 

‘लोकतंत्र को खतरे में डालने का आरोप’, SC ने ममता बनर्जी को मतदान से पहले दी फटकार

नई दिल्ली  पश्चिम बंगाल में चुनावी शोर के बीच सुप्रीम कोर्ट से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए बड़ी और झकझोर देने वाली खबर आई है. अदालत ने एक मामले की सुनवाई के दौरान मुख्यमंत्री के आचरण पर बेहद सख्त और तीखी टिप्पणी की है. जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने ममता बनर्जी को फटकार लगाते हुए कहा कि जांच के बीच में हस्तक्षेप करना गंभीर मामला है. यह पूरा विवाद कोलकाता में राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म आई-पैक के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय की सर्च कार्रवाई से जुड़ा है. कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि किसी राज्य का मुख्यमंत्री जांच की प्रक्रिया में बाधा नहीं डाल सकता. इस मामले ने अब कानूनी के साथ-साथ राजनीतिक गलियारों में भी हलचल तेज कर दी है. सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियां ममता सरकार के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी कर सकती हैं।  ‘मुख्यमंत्री ने जांच के बीच दखल देकर सिस्टम को खतरे में डाला’ सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान बेहद हैरान करने वाली बात कही है. बेंच ने कहा कि हमने कभी नहीं सोचा था कि देश में ऐसा दिन भी आएगा जब कोई मुख्यमंत्री खुद जांच के बीच में दखल देगा. कोर्ट के मुताबिक यह राज्य बनाम केंद्र का विवाद बिल्कुल नहीं है. यह एक ऐसा मामला है जहां एक व्यक्ति, जो मुख्यमंत्री के पद पर है, वह जांच प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा है।  अदालत ने इसे सीधे तौर पर लोकतंत्र के लिए खतरा करार दिया है. जस्टिस मिश्रा ने कहा कि मुख्यमंत्री के इस कृत्य ने पूरे सिस्टम को जोखिम में डाल दिया है।  सुनवाई के दौरान टीएमसी की ओर से दलील दी गई कि यह मामला संघीय विवाद से जुड़ा है. हालांकि कोर्ट इस तर्क से बिल्कुल सहमत नजर नहीं आया. कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि कोई भी मुख्यमंत्री जांच के बीच नहीं जा सकता. आप इसे केंद्र-राज्य का विवाद बताकर अपना बचाव नहीं कर सकते हैं।  बेंच ने संविधान विशेषज्ञों का जिक्र करते हुए कहा कि सीरवाई और आंबेडकर जैसे दिग्गजों ने भी ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की होगी. किसी ने नहीं सोचा था कि एक मौजूदा मुख्यमंत्री खुद जांच के दौरान दफ्तर में पहुंच जाएगा।  क्या इस मामले की सुनवाई अब पांच जजों की बड़ी बेंच करेगी? टीएमसी की वकील मेनका गुरुस्वामी ने इस याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाए और मामले को 5 जजों की बेंच के पास भेजने की मांग की. सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को भी सिरे से खारिज कर दिया. कोर्ट ने पूछा कि आखिर इसमें ऐसा कौन सा बड़ा संवैधानिक सवाल है जिसे बड़ी बेंच को भेजा जाए? अदालत ने साफ किया कि हर अनुच्छेद 32 की याचिका को बड़ी बेंच को नहीं सौंपा जा सकता. यह सुनवाई ईडी अधिकारियों द्वारा दायर उन याचिकाओं पर हो रही है जिनमें सीबीआई जांच की मांग की गई है। 

ममता बनर्जी चुनाव आयोग के निशाने पर, CRPF जवानों को धमकाने का आरोप, रिपोर्ट मांगी

कोलकत्ता  पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राज्य में सियासी सरगर्मियां और चुनावी हिंसा को लेकर तनाव तेज हो गया है। चुनाव आयोग (ECI) ने सख्त कदम उठाते हुए जहां एक तरफ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के एक भाषण पर रिपोर्ट तलब की है, वहीं दूसरी तरफ कर्तव्य में घोर लापरवाही के आरोप में एक पुलिस इंस्पेक्टर को निलंबित कर दिया है। ममता बनर्जी के भाषण पर रिपोर्ट तलब भारत के चुनाव आयोग ने शुक्रवार को पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हालिया भाषण को लेकर एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपने को कहा है। यह भाषण दार्जिलिंग के नक्सलबाड़ी स्थित नंदप्रसाद गर्ल्स हाई स्कूल मैदान में एक जनसभा के दौरान दिया गया था। क्या है आरोप? चुनाव आयोग का दावा है कि भाषण के वीडियो में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कथित तौर पर सीआरपीएफ (CRPF) के जवानों को धमकाती नजर आ रही हैं। उन्होंने सभी महिलाओं और लड़कियों से मतदान केंद्रों पर मौजूद रहने को कहा और यह भी कहा कि अगर जरूरत पड़े, तो किसी भी स्थिति से निपटने के लिए घरेलू रसोई के उपकरणों का इस्तेमाल करें। बासंती पुलिस स्टेशन के प्रभारी निलंबित इस बीच चुनाव आयोग ने कार्रवाई करते हुए बासंती पुलिस स्टेशन के प्रभारी इंस्पेक्टर अविजित पॉल को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। यह कार्रवाई 26 मार्च को दक्षिण 24 परगना जिले के बासंती बाजार (बरुईपुर पुलिस जिला) इलाके में हुई हिंसक घटना के बाद की गई है। इस हिंसा में पुलिसकर्मियों सहित कई लोग घायल हो गए थे। यह हिंसा तब भड़की थी, जब बासंती विधानसभा क्षेत्र में भाजपा उम्मीदवार विकास सरदार का चुनाव प्रचार चल रहा था। चुनाव आयोग का बयान आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि पूर्व सूचना होने के बावजूद इंस्पेक्टर अविजित पॉल पर्याप्त पुलिस व्यवस्था करने में पूरी तरह विफल रहे। पिछले कुछ दिनों से केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) की उपलब्धता के बावजूद, उन्होंने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए CAPF की मांग नहीं की, जो उनकी ओर से गंभीर लापरवाही और ड्यूटी में कोताही को दर्शाता है। भाजपा सांसद का टीएमसी पर हमला इस हिंसक घटना की कड़ी निंदा करते हुए भाजपा सांसद बिप्लब कुमार देब ने शुक्रवार को "जिहादियों" और गुंडों पर सुनियोजित हमले का आरोप लगाया। समाचार एजेंसी ANI से बात करते हुए देब ने दावा किया कि बड़ी संख्या में ज्ञात हमलावरों ने पार्टी कार्यकर्ताओं पर हमला किया। जब पुलिस और सुरक्षा बलों ने बीच-बचाव की कोशिश की, तो उन पर भी हमला किया गया। टीएमसी पर आरोप: उन्होंने राज्य में हिंसा का माहौल बनाने के लिए सीधे तौर पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा, "बड़ी संख्या में जिहादियों ने, जिनके नाम पहचाने जा चुके हैं, हमारे कार्यकर्ताओं पर हमला किया। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व में जो गुंडों और जिहादियों का साम्राज्य खड़ा किया गया है, वही इस घटना का मुख्य कारण है, जो बासंती बाजार में देखने को मिला।" गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की तैयारियां जोरों पर हैं। राज्य में दो चरणों में- 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को मतदान होना है। दोनों चरणों के वोटों की गिनती 4 मई को निर्धारित की गई है।