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TMC में बढ़ी अंदरूनी खींचतान! निकाय चुनाव से पहले आमने-सामने दोनों धड़े

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में आगामी नवंबर में प्रस्तावित कोलकाता नगर निगम (KMC) और हावड़ा नगर निगम (HMC) के निकाय चुनावों की आहट के साथ ही राज्य का राजनीतिक पारा तेजी से चढ़ गया है। राज्य विधानसभा चुनावों में हार के बाद बिखरी तृणमूल कांग्रेस के अलग-अलग धड़ों- ममता बनर्जी की अगुवाई वाली MAITC, रितब्रता बनर्जी की DTC और नेशनल सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में शामिल हुए तृणमूल के बागी सांसदों- के बीच जुबानी जंग और प्रतिद्वंद्विता बेहद तेज हो गई है। दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल की 294 में से 209 विधानसभा सीटों पर कब्जा जमा चुकी भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने साफ कर दिया है कि वह निकाय चुनावों में किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी और सभी वार्डों पर अकेले चुनाव लड़ेगी। 'असली तृणमूल' की जंग और 'गद्दारों' के पोस्टर पर कालिख चुनाव अधिसूचना जारी होने से ठीक पहले तृणमूल के अलग-अलग गुटों में शह-मात का खेल शुरू हो चुका है। कालीघाट स्थित पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आवास पर हुई बैठक के बाद ममता बनर्जी के प्रति वफादार नेताओं ने कहा कि उम्मीदवार चयन में केवल निष्ठावान नेताओं को प्राथमिकता दी जाएगी। कांग्रेस के साथ गठबंधन पर पार्टी ने कहा कि इस पर केंद्रीय नेतृत्व निर्णय लेगा। ममता खेमे के विधायक कुणाल घोष ने श्यामाबाजार इलाके की दीवार पर बने एक ग्राफिटी का फोटो शेयर किया, जिसमें NCPI में शामिल हो चुके उत्तर कोलकाता के सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय के चेहरे पर काली स्याही पोत दी गई थी। इस ग्राफिटी में उनके साथ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य की तस्वीरें थीं, जिन्हें छुआ तक नहीं गया था। कुणाल घोष ने तंज कसते हुए कहा कि पार्टी के बाकी 'गद्दारों' के साथ भी ऐसा ही होना चाहिए। रीतब्रता बनर्जी के नेतृत्व वाले डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस (DTC) के अध्यक्ष अरूप राय ने स्पष्ट किया कि वे "असली तृणमूल" हैं और NCPI के साथ बिना किसी गठबंधन के अकेले चुनाव मैदान में उतरेंगे। न गठबंधन होगा, न दूसरे दल के दलबदलू लिए जाएंगे: BJP कोलकाता निकाय चुनावों के लिए गठित बीजेपी की चुनाव समिति के प्रमुख और केंद्रीय राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार ने पार्टी की पहली तैयारी बैठक के बाद साफ कर दिया कि बीजेपी किसी भी दल के साथ हाथ नहीं मिलाएगी। NCPI, जिसमें तृणमूल के 20 बागी सांसद शामिल हैं, बीजेपी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ना चाहती थी, लेकिन सुकांत मजूमदार और चुनाव समिति के सह-संयोजक रितेश तिवारी ने इसे खारिज करते हुए कहा कि बीजेपी कोलकाता और हावड़ा के सभी वार्डों में अपने उम्मीदवार उतारेगी। सुकांत मजूमदार ने यह भी साफ कर दिया कि जो पूर्व तृणमूल पार्षद चुनाव जीतने के बाद अब पाला बदलना चाहते हैं, उन्हें टिकट नहीं दिया जाएगा। पार्टी केवल अपने परफॉर्मेंस के आधार पर उम्मीदवारों का चयन करेगी। कोलकाता में 209 और हावड़ा में 68 वार्ड: परिसीमन के बाद पहला चुनाव पश्चिम बंगाल की नगर विकास मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने विधानसभा में जानकारी दी थी कि नागरिक सेवाओं को बेहतर और सुगम बनाने के लिए वार्डों का परिसीमन किया गया है। कोलकाता नगर निगम (KMC): वार्डों की संख्या 144 से बढ़ाकर 209 कर दी गई है। हावड़ा नगर निगम (HMC): वार्डों की संख्या 50 से बढ़ाकर 68 कर दी गई है। मई में विधानसभा चुनावों में हार के बाद कोलकाता के मेयर और तृणमूल पार्षदों ने इस्तीफा दे दिया था, जबकि हावड़ा में परिसीमन विवाद के कारण 2018 के बाद से चुनाव नहीं हुए थे। वर्तमान में दोनों निकायों की कमान राज्य सरकार की ओर से नियुक्त प्रशासकों के हाथों में है। चुनाव आयोग द्वारा अगले कुछ दिनों में अधिसूचना जारी होने की उम्मीद है।

राज्य महिला आयोग अध्यक्ष डॉ. ममता साहू ने किया कन्या छात्रावास का औचक निरीक्षण

रायपुर : राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. ममता साहू ने किया कन्या छात्रावास का औचक निरीक्षण छात्राओं से संवाद कर जानी समस्याएं, शीघ्र निराकरण के दिए निर्देश     रायपुर छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. ममता साहू ने राज्य महिला आयोग की टीम के साथ शंकर नगर, रायपुर स्थित राज्य स्तरीय पोस्ट मैट्रिक पिछड़ा वर्ग कन्या छात्रावास का औचक निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने छात्रावास में रह रही छात्राओं से संवाद कर उनकी समस्याएं, आवश्यकताएं और सुझाव सुने तथा छात्रावास की व्यवस्थाओं का जायजा लिया।     डॉ. ममता साहू ने छात्राओं से उनकी पढ़ाई, आवासीय सुविधाओं सहित अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं के संबंध में जानकारी ली। छात्राओं द्वारा बताई गई समस्याओं और सुझावों को गंभीरता से लेते हुए उन्होंने संबंधित अधिकारियों को समस्याओं के शीघ्र निराकरण तथा आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि छात्राओं को सुरक्षित, सुविधाजनक और सकारात्मक वातावरण उपलब्ध कराना प्राथमिकता है, ताकि वे निर्बाध रूप से अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए आगे बढ़ सकें।     निरीक्षण के दौरान राज्य महिला आयोग की ओर से श्रीमती मंजू थदानी एवं श्रीमती रश्मी तिवारी, सखी वन स्टॉप सेंटर रायपुर की संरक्षण अधिकारी श्रीमती प्रीति पांडेय सहित महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित रहे।

नंदीग्राम पर टिकी नजरें, शुभेंदु अधिकारी के लिए क्यों अहम है यह सीट?

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम सीट का उपचुनाव मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। मुख्यमंत्री बनने के बाद यह उनकी पहली परीक्षा भी है। इस सीट पर उपचुनाव से पहले नाटकीय घटनाक्रम देखा जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने संचिता प्रधान डे को अपना उम्मीदवार बनाकर उतारा था। वहीं मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात के बाद संचिता प्रधान ने बिना कोई वजह बताए ही अपना नामांकन वापस ले लिया। इसके बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस के उम्मीदवार मिलन प्रधान के समर्थन का ऐलान कर दिया। इसके कुछ देर बाद ही एक पुराने मामले में प्रधान की गिरफ्तारी हो गई। राहुल गांधी ने अपने उम्मीदवार की गिरफ्तारी को लेकर शुभेंदु सरकार पर निशाना साधा और इसे लोकतंत्र पर प्रहार बताया है। अधिकारी ने खेला इमोशनल दांव शुभेंदु अधिकारी ने भी नंदीग्राम सीट पर इमोशनल दांव खेलते हुए अपने पीए रहे चंद्रनाथ रथ की मां हसीरानी रथ को अपना उम्मीदवार बनाया है। 6 मई को रथ की मध्यमग्राम में हत्या कर दी गई थी। सीबीआई इस हत्याकांड की जांच कर रही है। शुभेंदु अधिकारी के लिए क्यों अहम है नंदीग्राम नंदीग्राम की सीट शुभेंदु अधिकारी की प्रतिष्ठा से इसलिए जुड़ी है क्योंकि उन्होंने अपनी असल राजनीति की शुरूआत यहीं से की थी। उन्होंने नंदीग्राम में ही ममता बनर्जी के साथ किसानों के भूमि अधिग्रहण के खिलाफ मोर्चा खोला था। इसी वजह से बंगाल से लेफ्ट की सरकार चली गई और ममता बनर्जी की अगुआई में टीएमसी की सरकार बन गई। ममता बनर्जी बंगाल में 15 साल मुख्यमंत्री रहीं लेकिन शुभेंदु अधिकारी के रास्ते ममता बनर्जी से अलग हो गए। शुभेंदु अधिकारी 2016 में नंदीग्राम से विधायक चुने गए। वहीं 2021 में उन्होंने अपनी राजनीतिक गुरु ममता बनर्जी को ही नंदीग्राम से हरा दिया। यहीं से नंदीग्राम के समीकरण बदलने लगे। 2026 में शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम और भवानीपुर दो जगहों से चुनाव लड़ा और नंदीग्राम सीट पर फिर से जीत हासिल की। हालांकि उन्होंने भवानीपुर सीट को चुना और इसलिए नंदीग्राम सीट पर उपचुनाव हो रहे हैं। हालांकि शुभेंदु अधिकारी इस सीट को किसी कीमत पर हाथ से निकलने नहीं देना चाहते हैं। 6 अक्टूबर पर नंदीग्राम के साथ ही रेजीनगर सीट पर भी उपचुनाव होने हैं। ये उपचुनाव बंगाल में शुभेंदु अधिकारी की छवि पर बड़ा असर डालने वाले हैं। अधिकारी ने मुख्यमंत्री बनते ही कई बड़े फैसले लिए हैं और बड़े परिवर्तन का प्रयास किया है। अब इन दोनों सीटों की जनता इस बात पर भी मुहर लगाएगी कि उसे उनके फैसले पंसद आए हैं या नहीं। वहीं अधिकारी पर यह भी दवाब है कि बिहार की बांकीपुर सीट जैसा हाल यहां ना हो

ममता बनर्जी का नया गठबंधन प्लान? कांग्रेस से दूरी और अलग मोर्चे की अटकलें तेज

नई दिल्ली 2029 लोकसभा चुनाव से पहले भारत की राजनीति में बड़ी हलचल होने के आसार हैं। इसके संकेत हाल ही में हुईं कुछ बैठकों से मिल रहे हैं। DMK यानी द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम सांसद कनिमोई ने पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात की है। खबरें हैं कि बगैर कांग्रेस के और भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ एक क्षेत्रीय दलों का गठबंधन तैयार करने की योजना बनाई जा रही है। हालांकि, इसे लेकर औपचारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया है। कनिमोई और बनर्जी ने गुरुवार को कोलकाता में मुलाकात की। हालांकि, कालीघाट स्थित पूर्व सीएम के आवास पर हुई बैठक में किन मुद्दों पर बात की गई, इसे लेकर स्थिति साफ नहीं हो पाई है। इससे पहले डीएमके नेता शिवसेना यूबीटी चीफ उद्धव ठाकरे और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी एसपी से लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले से मिली थीं। कहा जा रहा है कि वह जल्द ही आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल से मिल सकती हैं। तीसरे मोर्चे की तैयारी  डीएमके के एक नेता ने कहा, 'हम बगैर कांग्रेस के एक तीसरे मोर्चे की संभावनाएं तलाश रहे हैं।' इधर, अखबार से बातचीत में एक टीएमसी सांसद ने कहा, 'ममता बनर्जी के DMK प्रमुख एमके स्टालिन के साथ बहुत अच्छे संबंध हैं। वह गैर NDA पार्टियों के साथ भी अच्छे रिश्ते बनाए रखती हैं और INDIA ब्लॉक के उन सदस्यों के करीब हैं जो कांग्रेस समर्थक नहीं हैं। आज की बातचीत सिर्फ उनके और कनिमोई के बीच हुई। इसके अलावा कुछ भी कहना सिर्फ अटकलें लगाना होगा।' DMK तो है क्या ममता बनर्जी भी कांग्रेस से नाराज? तमिलनाडु की राजनीति में लंबे समय तक कांग्रेस और डीएमके एक साथ रहे। विधानसभा और लोकसभा चुनाव साथ लड़े, लेकिन 2026 चुनाव के बाद स्थिति बदल गई। कांग्रेस राज्य के सबसे बड़े दल तमिलागा वेत्री कझगम से जा मिली और पुराने साथी डीएमके के छोड़ दिया। नतीजा यह हुआ कि डीएमके ने कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा और INDIA गठबंधन से भी दूरी बना ली। वहीं, ममता बनर्जी की नाराजगी की एक वजह सीट शेयरिंग हो सकती है। खबरें थीं कि पश्चिम बंगाल की दो सीटों पर होने वाले आगामी उपचुनाव को लेकर ममता ने कांग्रेस से मदद मांगी थी, जिसे कांग्रेस ने ठुकरा दिया। हालांकि, टीएमसी नेता इससे इनकार कर रहे हैं। जबकि, कांग्रेस खुलकर इसे स्वीकार कर रही है। खबरें थीं कि पूर्व सीएम ने कांग्रेस से रेजिनगर सीट पर समर्थन मांगा था और नंदीग्राम सीट छोड़ने की पेशकश की थी। कांग्रेस के पूर्व में प्रदेश अध्यक्ष रहे प्रदीप भट्टाचार्य ने पीटीआई को बताया था, 'प्रस्ताव यह था कि तृणमूल कांग्रेस रेजीनगर से चुनाव लड़ेगी और नंदीग्राम सीट कांग्रेस के लिए छोड़ देगी। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने इस पर समय मांगा और बाद में प्रदेश के नेताओं से इस प्रस्ताव पर चर्चा की।' उन्होंने कहा, 'प्रदेश नेतृत्व का मानना था कि गठबंधन के लिए यह सही समय नहीं है। उचित समय आने पर इस पर विचार किया जा सकता है, लेकिन अभी नहीं। यह सही फैसला है।' कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता सुमन रॉय चौधरी ने कहा, 'जब तृणमूल सत्ता में थी, तब उसने ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं दिया था, जब भाजपा के खिलाफ मिलकर चुनाव लड़ने की संभावना थी। अब जब वह अकेली और पराजित है, तो ऐसा लगता है कि उसे कांग्रेस के महत्व का एहसास हुआ है।' गठबंधन की पहले भी हुईं हैं कोशिशें साल 2013 में ममता बनर्जी ने कोशिशें की थीं कि बगैर कांग्रेस और भाजपा के गठबंधन तैयार किया जा सके। इसके बाद 2018 में तेलंगाना के तत्कालीन मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव भी अलग-अलग राज्यों का दौरा करते नजर आए। 2024 से पहले केजरीवाल भी गठबंधन को कोशिश कर रहे थे।

पार्टी के नाम-निशान पर किसका हक? ममता-चिराग विवाद के बीच समझें एकनाथ शिंदे को कैसे मिली शिवसेना

नई दिल्ली ममता बनर्जी ने मई में पश्चिम बंगाल गंवाया और सितंबर में तृणमूल कांग्रेस नाम और दो फूल जोड़ा चुनाव चिह्न भी छोड़ना पड़ा। हालांकि, इनका इस्तेमाल अरूप रॉय गुट भी नहीं कर सकेगा। अंतरिम आदेश के जरिए मुख्य नाम और चिह्न को फ्रीज कर दिया गया है। आगे जाकर स्थिति बदल भी सकती है। सवाल है कि जब साल 2022 में शिवसेना टूटने के मामले में महाराष्ट्र के मौजूदा उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाले गुट को चुनाव आयोग ने नाम और निशान कैसे दे दिया था। पहले समझते हैं कि अगर एक ही पार्टी में दो गुट बन जाते हैं और दोनों ही मुख्य दल होने का दावा करते हैं, तो चुनाव आयोग फैसला किस तरह से लेता है। चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968, यह वही आदेश है जिसका इस्तेमाल करके चुनाव आयोग एक पूरी प्रक्रिया से गुजरता और पता लगाता है कि किसे पार्टी का चुनाव चिह्न, झंडा और नाम मिलेगा। इसमें भी धारा 15 बेहद अहम है। कानून समझ लेते हैं इस कानून की धारा 15 के अनुसार, 'जब आयोग को अपने पास मौजूद जानकारी से यह पता चलता है कि किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के विरोधी गुट या समूह हैं और हर कोई खुद को ही वह असली दल बताता है। ऐसे में आयोग मामले से जुड़े सभी उपलब्ध तथ्यों और हालात पर विचार करने और उन गुटों या समूहों के नेताओं और अन्य लोगों की बात सुनने के बाद यह तय कर सकता है कि उन विरोधी गुटों या समूहों में से कोई एक ही वह मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है या उनमें से कोई भी नहीं है। आयोग का यह फैसला उन सभी विरोधी गुटों या समूहों पर लागू होगा।' आसान भाषा में एक जानकार बताते हैं कि चुनाव आयोग इस बात पर फोकस करेगा कि दोनों गुटों में संगठन स्तर पर कितने सदस्य हैं। साथ ही विधायकों और सांसदों की गिनती भी अहम भूमिका निभाएगी। दोनों पक्ष इसकी जानकारी एक हलफनामे के जरिए देंगे। पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी बताते हैं कि आयोग 'रूल ऑफ मेजॉरिटी' के आधार पर फैसला करता है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग जांच करेगा कि किस गुट के पास सांसद, विधायक और संगठन पर ज्यादा समर्थन है। पार्टी किसके साथ, यह पता करने का भी एक तरीका है पूर्व चुनाव आयुक्त बताते हैं कि संगठन में ज्यादा समर्थन किसके साथ है, यह पता करने के लिए सभी पार्टी पदाधिकारी और उन लोगों को गिना जाता है, जो पार्टी के अध्यक्ष चुनने का अधिकार रखते हैं। पार्टी को इस संबंध में अपना हलफनामा दाखिल करना होता है। इसके बाद आयोग हस्ताक्षरों को मिलाता है। पूरी प्रक्रिया के बाद तय किया जाता है कि किस पार्टी को चिह्न मिलेगा। एकनाथ शिंदे को क्यों मिल गया चुनाव चिह्न हालांकि, शिवसेना में टूट मामले में भी चुनाव आयोग ने पहली ही बार में शिंदे गुट को मुख्य दल नहीं माना था। पहले शिवसेना नाम और तीर कमान चिह्न को फ्रीज कर दिया गया और दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चिह्न चुनने के लिए कहा गया था। 2023 में इसका अधिकार शिंदे समूह को मिला। आयोग ने कहा था कि उनका बहुमत के परीक्षण पर आधारित है, क्योंकि शिंदे गुट का समर्थन कर रहे विधायकों को 2019 विधानसभा चुनाव में करीब 76 फीसदी वोट मिले। जबकि, उद्धव ठाकरे गुट के मामले में यह आंकड़ा 23.5 प्रतिशत पर था। उस चुनाव में अविभाजित शिवसेना के कुल 55 उम्मीदवार जीते थे। 78 पेज लंबे आदेश में आयोग ने कहा था, 'शिव सेना पार्टी का नाम और पार्टी का चुनाव चिह्न तीर कमान याचिकाकर्ता गुट के पास ही रहेगा।' याचिकाकर्ता शिंदे गुट था। चुनाव आयोग के सामने शिंदे गुट ने साबित किया था कि उसके पास 40 विधायकों और 18 में से 13 सांसदों का समर्थन है। साथ ही गुटों ने संगठन स्तर पर भी हस्ताक्षरों से जुड़ा एक हलफनामा आयोग में दाखिल किया था। TMC के मामले में क्या बोला चुनाव आयोग खास बात है कि टीएमसी के मामले में अभी अंतरिम आदेश ही जारी हुआ है। संभावनाएं हैं कि आगे चलकर किसी गुट को मुख्य नाम और चिह्न मिल भी सकता है, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है। अंतरिम आदेश में कहा गया है, 'रिकॉर्ड पर मौजूद सभी जानकारियों पर ठीक से विचार करने के बाद… आयोग का मानना ​​है कि तृणमूल कांग्रेस में दो विरोधी गुट हैं, जिनमें से एक का नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं और दूसरे की कमान अरूप रॉय संभाल रहे हैं।' अंतरिम आदेश के अनुसार, 'अब हर गुट खुद के असली तृणमूल कांग्रेस होने का दावा कर रहा है, इसलिए चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैराग्राम 15 के तहत आयोग को इस मामले पर ठोस फैसला लेना होगा।' आयोग ने साफ कर दिया है कि मौजूदा उपचुनाव की स्थिति को देखते हुए ऐसा किया गया है और मौजूदा अंतरिम आदेश मामला खत्म होने तक जारी रहेगा। खास बात है कि 6 अक्टूबर को नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा सीट पर उपचुनाव होने हैं। दोनों ही गुटों ने सीटों पर अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है। चिराग पासवान मामले में किसी को नहीं मिले यह टूट साल 2021 की है। तब रामविलास पासवान के निधन के कुछ समय बाद झोपड़ी के चिह्न वाले लोक जनशक्ति पार्टी में खटपट की खबरें तेज हो गईं थीं। दरअसल, यहां पसवान के बेटे और मौजूदा सांसद चिराग और भाई पशुपति कुमार पारस में दल को लेकर विवाद था। दोनों ही असली दल की अगुवाई का दावा कर रहे थे। 2 अक्टूबर 2021 को चुनाव आयोग ने अंतरिम आदेश जारी किया था, जिसके बाद नाम और चिह्न को फ्रीज कर दिया गया था और किसी को भी इसके इस्तेमाल की अनुमति नहीं थी। दो दिन बाद यानी 5 अक्टूबर को नए नाम और चिह्न आवंटित किए गए। खास बात है कि इसके 28 दिन बाद ही 30 अक्टूबर 2021 में बिहार में दो सीटों पर उपचुनाव होने थे। ठीक वैसा ही जैसा बंगाल में दो सीटों पर उपचुनाव होने हैं। चुनाव आयोग ने चिराग और पशुपति गुट को अपने नाम में लोक जनशक्ति पार्टी नाम का जुड़ाव रखने की अनुमति दे दी थी और … Read more

ममता गुट की प्रत्याशी के नाम वापस लेने के बाद बड़ा ऐलान, नंदीग्राम में कांग्रेस के साथ आईं ममता

कोलकाता पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव से पहले बड़ा सियासी घटनाक्रम देखने को मिला है. ममता बनर्जी गुट की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने सीएम शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात करने के बाद अपना नामांकन वापस ले लिया. इसको लेकर अब पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाए हैं. साथ ही इस सीट पर होने वाले उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन का ऐलान किया है।  संचिता प्रधान डे के उम्मीदवारी वापस लिए जाने के बाद ममता बनर्जी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया. उन्होंने ऐलान किया कि उनका गुट नंदीग्राम में कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान का समर्थन करेगा और अब इस सीट पर अपना कोई उम्मीदवार नहीं उतारेगा।  उन्होंने बताया कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने उन्हें गुरुवार को फोन किया था. ममता ने INDIA गठबंधन के प्रति पूरी एकजुटता जताते हुए कहा कि सभी मिलकर लड़ेंगे. उन्होंने अरविंद केजरीवाल के ट्वीट का भी जिक्र किया और कहा कि सभी मिलकर लड़ाई लड़ेंगे।  बता दें कि नंदीग्राम उपचुनाव के लिए ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने संचिता प्रधान डे को उम्मीदवार बनाया था. 13 सितंबर को उनके नाम का ऐलान किया गया था. वहीं बीजेपी ने नंदीग्राम से हसीरानी रथ को उम्मीदवार बनाया है. वह शुभेंदु अधिकारी के पूर्व निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की मां हैं. ऋतब्रत गुट की ओर से मोहम्मद एतेशामुल हक मैदान में हैं. कांग्रेस ने मिलन प्रधान को टिकट दिया है. वहीं वाम मोर्चे ने भी अपना उम्मीदवार उतारा है।  चुनाव आयोग पर बरसीं ममता ममता बनर्जी ने मौजूदा घटनाक्रम पर चुनाव आयोग और बीजेपी पर कई आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि आज लोकतंत्र के इतिहास में काला दिन है. ममता ने आरोप लगाया कि उनकी पार्टी को हराने के लिए SIR का इस्तेमाल किया गया और EVM को हाईजैक किया गया. उन्होंने चुनाव आयोग पर बीजेपी के अहंकार को संतुष्ट करने के लिए काम करने का आरोप लगाया।  ममता ने यह भी आरोप लगाया कि बंगाल चुनाव में मतगणना का काम CRPF के जरिए कराया गया. उन्होंने कहा कि टीएमसी 29 साल पुरानी पार्टी है और इसके बावजूद पार्टी का बैंक खाता फ्रीज कर दिया गया।  ममता ने दावा किया कि पुलिस उनके कार्यकर्ताओं पर बीजेपी में शामिल होने का दबाव बना रही है और करीब 14 हजार कार्यकर्ता जेल में हैं. उनके पार्टी कार्यकर्ताओं को उनसे मिलने की इजाजत नहीं दी जा रही है और वह खुद भी हाउस अरेस्ट में हैं।  'इंटरिम ऑर्डर है, लड़ाई जारी रखेंगे' टीएमसी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चुनाव आयोग के अंतरिम फैसले पर ममता ने कहा कि यह अंतिम फैसला नहीं है और उनकी पार्टी इसे कानूनी तौर पर चुनौती देगी. उन्होंने कहा कि वह सिर नहीं झुकाएंगी और पार्टी फिर वापसी करेगी।  वह अपनी आखिरी सांस तक ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस नहीं छोड़ेंगी. उन्होंने खुद को टीएमसी की संस्थापक चेयरपर्सन बताया।  उन्होंने यह भी कहा कि चार महीने पहले जिन लोगों ने एक चुनाव चिह्न पर जीत हासिल की थी, वे अब उसी के खिलाफ कैसे खड़े हो सकते हैं. ममता ने बागी गुट पर निशाना साधते हुए कहा कि अब यह सामने आ गया है कि असली तृणमूल कौन है और कौन लोग पार्टी के नाम पर फायदा उठा रहे थे. ममता ने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का नाम लिए बिना उन पर भी हमला बोला. उन्होंने कहा कि वह योगी से भी बदतर हो गए हैं और सभी को धमका रहे हैं।  टीएमसी के नाम-सिंबल की लड़ाई के बीच नया मोड़ यह पूरा घटनाक्रम टीएमसी के दोनों गुटों को नाम और सिंबल आवंटन के बीच आया है. चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को 'Mamata All India Trinamool Congress' नाम और 'फुटबॉल खिलाड़ी' चुनाव चिह्न दिया है. वहीं, अरूप रॉय के नेतृत्व वाले गुट को 'Democratic Trinamool Congress' नाम और 'लिफाफा' चुनाव चिह्न मिला है. आयोग ने दोनों गुटों को आगामी उपचुनाव के लिए पुराने 'All India Trinamool Congress' नाम और 'जोड़ा घास फूल' वाले चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करने से रोक दिया था।  6 अक्टूबर को दो विधानसभा सीटों पर होना है उपचुनाव बता दें कि राज्य की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव होना है. नतीजे 9 अक्टूबर हो जारी होंगे. राज्य के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों सीटों से जीत दर्ज की थी. बाद में उन्होंने नंदीग्राम सीट छोड़ने का फैसला किया, जिससे यह सीट रिक्त हुई. वहीं एजेयूपी (AJUP) नेता हुमायूं कबीर ने नौदा और रेजीनगर दोनों सीटों पर जीत हासिल की थी, जिसके बाद उन्होंने रेजीनगर सीट से इस्तीफा दे दिया था. इसके चलते नंदीग्राम और रेजीनगर सीट पर उपचुनाव होने जा रहा है। 

ममता बनर्जी की पार्टी को मिला नया नाम-चिह्न, ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ सिंबल; ऋतब्रत गुट को ‘लिफाफा’

कोलकाता/नई दिल्ली   चुनाव आयोग ने टीएमसी में टूट के बाद ममता बनर्जी गुट को नए नाम की मंजूरी दे दी है। ममता बनर्जी गुट ने तीन नामों का विकल्प पेश किया था, इस आधार पर आयोग ने ' ऑल इंडिया तृणमूल ममता कांग्रेस ( AITMC ) का नाम दिया है। उनका चुनाव चिन्ह फुटबॉल खिलाड़ी होगा। जबकि बागी रितब्रत गुट को डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस नाम के साथ लिफाफा चुनाव चिन्ह दिया गया है। रितब्रत गुट ने आयोग को दो नाम सुझाए थे। गुरुवार को विवाद पर सुनवाई के बाद निर्वाचन आयोग ने टीएमसी का नाम और चुनाव चिन्ह फ्रीज कर दिया था। गुरुवार को फ्रीज हुआ था दो फूल वाला सिंबल गुरुवार को चुनाव आयोग ने टीएमसी के दोनों गुटों के दावों पर विचार किया था। करीब एक सप्ताह पहले भी आयोग ने ममता बनर्जी गुट और रितब्रत बनर्जी से दावों के समर्थन में दस्तावेज देने को कहा था। रितब्रत बनर्जी ने दावा किया था कि टीएमसी के संविधान के मुताबिक, ममता बनर्जी का अध्यक्ष पद का कार्यकाल पहले ही खत्म हो चुका था। अब नई कार्यकारिणी ने अरुप रॉय को अध्यक्ष चुना है। ममता बनर्जी ने गुट ने कहा कि पार्टी के संविधान के मुताबिक ममता बनर्जी ही पार्टी की अध्यक्ष हैं। उनके पास ही नई कार्यकारिणी और पदों पर नियुक्ति का अधिकार है। इसके बाद चुनाव आयोग ने 6 अक्टूबर को होने वाले नंदीग्राम और रेजिनगर उपचुनाव से पहले सिंबल विवाद पर निर्णय सुरक्षित रख गया। गुरुवार को आयोग ने ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस और चुनाव चिन्ह पत्तियों के साथ दो फूल को फ्रीज कर दिया था। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनाव आयोग की निंदा चुनाव आयोग के फैसले से ममता बनर्जी गुट के सांसद कल्याण बनर्जी ने असंतोष जाहिर किया। उन्होंने कहा कि यह फैसला स्वीकार नहीं है, मगर परिस्थितियों के आगे कुछ किया नहीं जा सकता है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी टीएमसी के सिंबल और नाम फ्रीज किए जाने पर हमला बोला। राहुल गांधी ने कहा कि बीजेपी वोट लूट के बाद अब पार्टी लूट रही है। यह लड़ाई सिर्फ ममता बनर्जी की नहीं, बल्कि हर वोटर की लड़ाई है, जो निष्पक्ष चुनाव चाहता है। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने चुनाव आयोग की आलोचना करते हुए कहा कि आयोग ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वह बीजेपी की कठपुतली है। 11 बजे तक चुनाव आयोग ने मांगे थे नए नाम और चिन्ह तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी अंदरूनी घमासान और पार्टी के टूटने के बाद चुनाव आयोग ने यह अंतरिम आदेश जारी किया था। आयोग ने स्पष्ट किया था कि ममता बनर्जी का गुट यानी 'कालीघाट-तृणमूल' और विरोधी गुट यानी 'ऋतब्रत-तृणमूल', दोनों में से कोई भी 'ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' नाम या पुराना 'जोड़ाफुल' सिंबल इस्तेमाल नहीं कर सकेगा। आयोग ने दोनों गुटों को आज सुबह 11 बजे तक अपनी पसंद के तीन नए नाम और चुनाव चिन्हों की लिस्ट सौंपने के निर्देश दिए थे। ममता और ऋतब्रत ने क्या-क्या नाम दिए? चुनाव आयोग की डेडलाइन से पहले दोनों धड़ों ने अपने-अपने नए नाम और प्रतीकों की लिस्ट आयोग को सौंप दी है। ममता बनर्जी ('कालीघाट-तृणमूल') गुट के विकल्प: 3 संभावित नाम: 'ममता सरभारतीय तृणमूल कांग्रेस', 'सरभारतीय तृणमूल कांग्रेस ममता', और 'तृणमूल ममता कांग्रेस'। चुनाव चिन्ह के विकल्प: सूत्रों के मुताबिक इस गुट ने फुटबॉल खिलाड़ी और क्रिकेट बैट जैसे प्रतीकों को अपनी पहली पसंद बताया है। ऋतब्रत गुट ('ऋतब्रत-तृणमूल') के विकल्प: 3 चुनाव चिन्ह: इस गुट ने चुनाव आयोग के फ्री-सिंबल लिस्ट में से 'ब्लैक बोर्ड', 'लिफाफा' और 'टॉर्च' की मांग की है। तृणमूल की टूट पर मचा सियासी घमासान तृणमूल का नाम और सिंबल छिन जाने के बाद राज्य और देश की राजनीति में जुबानी जंग तेज हो गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता केसी वेणुगोपाल ने सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए लिखा, "तृणमूल पहले ही टूट चुकी थी, अब उसका नाम और सिंबल भी चला गया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की तरफ से पीएम मोदी को जन्मदिन का ये लेट-नाइट गिफ्ट है।" वहीं, बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार ने चुनाव आयोग के इस कदम का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि पार्टी में जारी फूट और कानूनी स्थिति को देखते हुए चुनाव आयोग का यह फैसला पूरी तरह से तर्कसंगत और निष्पक्ष है। बहरहाल, 28 साल बाद अपने ही बनाए नाम और चुनाव चिन्ह से महरूम हुईं ममता बनर्जी के लिए यह उप-चुनाव एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बनने जा रहा है।  

नंदीग्राम में ममता बनर्जी को घेरने की BJP की रणनीति, क्या बदलेगा चुनावी गणित?

कोलकाता  पश्चिम बंगाल की हाई प्रोफाइल नंदीग्राम सीट पर होने वाले उपचुनाव ने सियासी पारा चढ़ा दिया है. बीजेपी ने पूर्व पीए स्वर्गीय चंद्रनाथ रथ की मां हासीरानी रथ को टिकट देकर बड़ा इमोशनल दांव चला है. टीएमसी में बगावत, कांग्रेस के अलग लड़ने और हुमायूं कबीर के तेवरों से ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ गई हैं. वहीं शुभेंदु अधिकारी ने 2 करोड़ की सुपारी के आरोप लगाकर नया बवंडर खड़ा कर दिया है. पश्चिम बंगाल में दो विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव ने सियासी पारे को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है. इस पूरे सियासी घमासान में सबसे ज्यादा चर्चा हाई प्रोफाइल नंदीग्राम सीट की हो रही है. इस सीट को लेकर पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की टेंशन अलग ही लेवल पर पहुंच चुकी है।  भवानीपुर सीट अपने पास रखने के बाद नंदीग्राम सीट खाली हुई थी. अब इसी सीट पर बीजेपी ने एक ऐसा चौंकाने वाला नाम सामने रख दिया है, जिसने तृणमूल कांग्रेस के खेमे में खलबली मचा दी है. पार्टी के लिए अब इस सीट को बचाना एक बहुत बड़ी राजनीतिक चुनौती बन चुका है।  नंदीग्राम में बीजेपी ने किस इमोशनल कार्ड से बढ़ाई ममता की बेचैनी? बीजेपी ने नंदीग्राम उपचुनाव के लिए हासीरानी रथ को अपना उम्मीदवार बनाया है. हासीरानी रथ खुद एक सक्रिय बीजेपी कार्यकर्ता हैं. वे शुभेंदु अधिकारी के पूर्व पीए रहे स्वर्गीय चंद्रनाथ रथ की मां हैं. 6 मई 2026 को विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद उत्तर 24 परगना में चंद्रनाथ रथ की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।  बीजेपी ने हासीरानी रथ को टिकट देकर साफ संदेश दिया है कि पार्टी अपने हर एक कार्यकर्ता के साथ मजबूती से खड़ी है. इससे पहले आरजी कर केस के दौरान भी बीजेपी ने पीड़ित महिला डॉक्टर की मां को चुनावी मैदान में उतारा था।  जनता ने उस भावुक अपील पर मुहर लगाई और उन्होंने जीत दर्ज की. अब पार्टी ने उसी रणनीति और इमोशन के साथ हासीरानी रथ को नंदीग्राम के रण में उतारा है. हासीरानी रथ के नामांकन के दौरान खुद शुभेंदु अधिकारी मौजूद रहे।  क्या टीएमसी की आपसी फूट ने नंदीग्राम में मुकाबला त्रिकोणीय बना दिया है?     नंदीग्राम में इस बार राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं. मुकाबला सिर्फ बीजेपी और टीएमसी के बीच सीमित नहीं रह गया है. इस बार जमीनी स्तर पर टीएमसी बनाम टीएमसी की जंग देखने को मिल रही है.     पार्टी दो गुटों में बंट चुकी है और दोनों ही खेमों ने अपने प्रत्याशी मैदान में उतार दिए हैं. टीएमसी ने संचिता प्रधान को अधिकृत उम्मीदवार बनाया है।  वहीं बागी धड़े ने मोहम्मद एतेशामुल हक के नाम का ऐलान कर दिया है.     वोटों के इसी संभावित बंटवारे को देखते हुए शायद ममता बनर्जी खुद इस बार नंदीग्राम से नहीं उतरीं. हालांकि बागी गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने यह पेशकश की थी कि अगर ममता खुद चुनाव लड़ेंगी तो वे अपना उम्मीदवार वापस ले लेंगे. ममता के चुनाव न लड़ने से 15 साल में पहली बार ऐसा होगा जब वे विधानसभा में मौजूद नहीं रहेंगी।  शुभेंदु अधिकारी का कितना बड़ा फैक्टर रहेगा इस उपचुनाव में? नंदीग्राम सीट पर बीजेपी की स्थिति लगातार मजबूत मानी जा रही है. साल 2021 के मुकाबले 2026 के आम चुनाव में जीत का अंतर काफी बड़ा रहा था. उपचुनाव में सत्ता पक्ष का दबदबा रहने के बावजूद शुभेंदु अधिकारी की मजबूत पकड़ यहां गेमचेंजर साबित हो सकती है।  शुभेंदु अधिकारी का पूरा समर्थन और संगठन की ताकत हासीरानी रथ के पीछे खड़ी है. शुभेंदु अधिकारी ने दावा किया है कि इस बार बीजेपी यहां 50 हजार से ज्यादा के बड़े अंतर से जीत दर्ज करेगी. इसके साथ ही हासीरानी रथ को मिलने वाले सहानुभूति के वोट ममता बनर्जी के लिए बड़ी मुसीबत बन सकते हैं।  कांग्रेस ने कैसे फेरा ममता बनर्जी की चुनावी उम्मीदों पर पानी? नंदीग्राम की मुश्किलों के बीच ममता बनर्जी को कांग्रेस से भी कोई राहत नहीं मिली है. सूत्रों के मुताबिक उपचुनाव को लेकर टीएमसी ने कांग्रेस को एक खास फॉर्मूले की पेशकश की थी. प्रस्ताव यह था कि कांग्रेस नंदीग्राम से लड़े और रेजीनगर की सीट टीएमसी के लिए छोड़ दे।  कांग्रेस हाईकमान ने इस फॉर्मूले को सीधे तौर पर ठुकरा दिया. राहुल गांधी की पार्टी ने दोनों ही सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है. वामदलों की मौजूदगी के साथ कांग्रेस के अलग लड़ने से पूरा मुकाबला मल्टी-कॉर्नर हो चुका है. इसका सीधा नुकसान सत्ताधारी पार्टी को उठाना पड़ सकता है।  रेजीनगर में हुमायूं कबीर ने दीदी के लिए क्या नया चक्रव्यूह रचा है? उपचुनाव की दूसरी सीट रेजीनगर भी ममता बनर्जी के लिए आसान नहीं रहने वाली है. यह सीट हुमायूं कबीर के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी. यहां भी टीएमसी के बागी गुट ने अपना अलग उम्मीदवार मैदान में उतार दिया है।  हुमायूं कबीर ने अपने बेटे को निर्दलीय मैदान में उतारकर मुकाबले को बेहद पेचीदा बना दिया है. रेजीनगर में हुमायूं कबीर का अपना मजबूत जनाधार है. ऐसे में टीएमसी के लिए अपने परंपरागत वोटों को एकजुट रखना बहुत मुश्किल नजर आ रहा है।  2 करोड़ की सुपारी वाले आरोप से बंगाल की सियासत में कैसे आया उबाल? चुनावी माहौल के बीच चंद्रनाथ रथ की हत्या को लेकर शुभेंदु अधिकारी ने एक बहुत बड़ा और सनसनीखेज खुलासा किया है. शुभेंदु अधिकारी ने दावा किया कि उनके पूर्व पीए की हत्या कोई सामान्य वारदात नहीं थी. इसके लिए बाकायदा 2 करोड़ रुपये की सुपारी दी गई थी।  शुभेंदु अधिकारी ने सीधे तौर पर निशाना साधते हुए कहा कि यह रकम भाईपो गैंग की तरफ से दी गई थी. शुभेंदु ने कहा, ‘मैं जितना जानता हूं, ये पैसा विपुल को दो करोड़ रुपये देने के लिए दिया गया है, संद्रा को खत्म करने के लिए. इसमें आपके भतीजे का गैंग जुड़ा हुआ है. इसका CBI इन्वेस्टिगेशन करे, ये मेरा विश्वास है. लेकिन CBI अब तक बहुत दूर है। 

नंदीग्राम में फिर अग्निपरीक्षा, टूट के बीच TMC को नहीं मिल रहा मजबूत उम्मीदवार; 6 अक्टूबर को उपचुनाव

कलकत्ता पश्चिम बंगाल का नंदीग्राम उपचुनाव रोचक होता जा रहा है। ममता बनर्जी की पार्टी के नेता पहले ही मैदान से दूरी बना रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण वरिष्ठ नेता अबु ताहिर का बयान है, जिसमें उन्होंने साफ कर दिया है कि वह चुनाव नहीं लड़ेंगे। साथ ही ममता बनर्जी को ही उतरने के लिए कहा है। खास बात है कि साल 2021 में टीएमसी सुप्रीमो को नंदीग्राम से हार का सामना करना पड़ा था। जबकि, 2026 में भी पार्टी यहां से हारी। दोनों ही चुनावों में अब मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को जीत मिली थी। नंदीग्राम सीट पर उपचुनाव के लिए 6 अक्तूबर को वोटिंग होने जा रही है और 9 अक्तूबर को नतीजों का ऐलान हो जाएगा। इधर, ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई वाले टीएमसी के दूसरे गुट ने भी ममता बनर्जी और सांसद अभिषेक बनर्जी को उपचुनाव लड़ने की चुनौती दे दी है। हालांकि, अब तक तय नहीं है कि टीएमसी किसे उम्मीदवार बनाने जा रही है। चुनाव लड़ने से साफ इनकार ताहिर ने कहा, 'ममता बनर्जी को नंदीग्राम उपचुनाव में आकर चुनाव लड़ना चाहिए। जब तृणमूल सत्ता में थी, तब वह चुनाव लड़ने के लिए आई थीं। अब मैं चुनाव क्यों लड़ूं?' पीटीआई भाषा के मुताबिक, उन्होंने कहा, 'टीएमसी के सत्ता में रहने के 15 वर्षों के दौरान मुझे क्या मिला? इन 15 वर्षों में मुझे कभी भी टीएमसी का उम्मीदवार नहीं माना गया। मुझे अयोग्य समझा गया। फिर अब मुझे बलि का बकरा बनाने के लिए क्यों चुना जाना चाहिए?' उन्होंने साफ कर दिया है कि अगर चुनाव लड़ने के बारे में राय ली जाती है, तो 'मैं इनकार कर दूंगा।' क्या ममता बनर्जी लड़ेंगी चुनाव एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कई नेताओं का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी के बंगाल में बढ़ते प्रभाव और टीएमसी में टूट देखते हुए ममता बनर्जी को मैदान में उतरना चाहिए। हालांकि, इसे लेकर उन्होंने आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा है। चैनल से बातचीत में नेताओं का कहना है कि विधायक बनकर ममता लोगों के मुद्दे उठा सकती हैं और नेता प्रतिपक्ष बन सकती हैं। अटकलें ये भी हैं कि टीएमसी वरिष्ठ नेता अखिली गिरी पर दांव खेल सकती है। फिलहाल, आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया। मंगलवार को मजिस्ट्रेट ने एक बैठक भी बुलाई थी, जिसमें लगभग सभी दल मौजूद थे। जबकि, टीएमसी गायब रही और इस कदम को उम्मीदवार नहीं मिलने से जोड़कर देखा जाने लगा था। बागी गुट भी चुनौती दे रहा बागी गुट के प्रवक्ता रिजू दत्ता ने उनके बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा ,'अबू ताहेर सही हैं। उन्हें अब चुनाव क्यों लड़ना चाहिए। यदि ममता बनर्जी चुनाव लड़ने की इच्छुक नहीं हैं तो उनके भतीजे और सभी कुछ जानने वाले राजनीतिज्ञ अभिषेक को ही चुनाव लड़ जाना चाहिए।' TMC को दो बार लगी चोट साल 2021 में 1956 वोट से हारी टीएमसी और तब ममता बनर्जी ही पार्टी की उम्मीदवार थीं। इसके बाद टीएमसी को दूसरा झटका 2026 में लगा जब पार्टी के नेता पवित्र कर भी 9 हजार से ज्यादा वोटों से हार गए। खास बात है कि दोनों ही मौकों पर विजेता शुभेंदु अधिकारी रहे थे। हालांकि, उन्होंने 2026 में दो सीटों पर जीत के बाद भवानीपुर को बरकरार रखा।

TMC अकाउंट फ्रीज मामला: हाईकोर्ट ने अर्जेंट सुनवाई से किया इनकार, ममता बनर्जी की बढ़ी मुश्किलें

कलकत्ता कलकत्ता हाईकोर्ट से मंगलवार को ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी को बड़ा झटका लगा है. कोर्ट ने पार्टी के तीन बैंक खातों को फ्रीज करने के खिलाफ दायर याचिका पर अर्जेंट सुनवाई करने से स्पष्ट मना कर दिया है। इस मामले की सुनवाई जस्टिस सौगत भट्टाचार्य कर रहे हैं. उन्होंने ममता गुट की याचिका पर तुरंत सुनवाई करने से मना कर दिया. उन्होंने आगे कहा कि इस केस की सुनवाई भी आम मामलों की तरह ही होगी, यानी जो नंबर तय है, उसी लिस्टिंग के अनुसार सुनवाई की जाएगी। ममता गुट के वकील किशोर दत्ता ने कोर्ट को बताया कि टीएमसी के तीन बैंक खातों पर रोक लगा दी गई है. इस वजह से इन खातों से किसी भी तरह का पेमेंट और लेन-देन नहीं हो पा रहा है. वकील ने कहा कि इन खातों में लगभग 440 करोड़ रुपये की भारी रकम फंसी हुई है. उन्होंने इस संकट को देखते हुए कोर्ट से तुरंत सुनवाई करने की अपील की, लेकिन अदालत ने उनकी ये मांग मानने से साफ इनकार कर दिया। बैंक खातों में 440 करोड़ जमा तृणमूल कांग्रेस के जिन तीन बैंक खातों पर रोक लगाई गई है, उनमें लगभग 440 करोड़ रुपये जमा हैं। यह कार्रवाई बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी के समर्थक कुछ विधायकों द्वारा बिधाननगर पुलिस आयुक्तालय के साइबर अपराध थाने में दर्ज कराई गई शिकायतों के बाद की गई है। शिकायत में उन्होंने प्राथमिकी दर्ज कर खातों की विस्तृत जांच कराने की मांग की थी।विधायकों ने अपनी शिकायत में बैंक खातों में जमा धन के स्रोत पर सवाल उठाते हुए सभी लेन-देन की जांच कराने की मांग की। उन्होंने जांचकर्ताओं से यह पता लगाने का आग्रह किया कि खातों में जमा धन वैध स्रोतों से आया है या फिर कथित अवैध गतिविधियों, जैसे 'कट मनी' की वसूली, सार्वजनिक धन के दुरुपयोग और घोटालों से अर्जित रकम से जुड़ा हुआ है। बता दें कि फलता के चुनाव के बाद कई ऐसे वीडियो सामने आए थे जिनमें लोगों को कटमनी वापस की गई थी। दरअसल सरकारी योजनाओं को लाभ देने के लिए वसूला गया धन कट मनी कहा जाता है। आरोप है कि ममता बनर्जी की सरकार में धड़ल्ले से लोगों से कटमनी वसूली जाती थी। तय समय से होगी सुनवाई सोमवार को मामले की शीघ्र सुनवाई की मांग किये जाने पर अदालत ने बैंक, पुलिस और राज्य सरकार को पक्षकार बनाने तथा उन्हें नोटिस जारी करने का निर्देश दिया था. मंगलवार को सभी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद फिर से त्वरित सुनवाई का अनुरोध किया गया, लेकिन अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया. न्यायमूर्ति ने दोहराया कि मामले की सुनवाई तय प्रक्रिया के अनुसार ही होगी. इस मामले में राज्य सरकार भी एक पक्ष है. राज्य की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से अनुरोध किया कि यदि त्वरित सुनवाई संभव नहीं है, तो कम से कम गुरुवार को पक्षों को अपनी दलीलें रखने का अवसर दिया जाये।  बागी विधायकों की शिकायत पर हुई कार्रवाई टीएमसी के इन बैंक खातों पर ये कार्रवाई बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी से जुड़े कुछ विधायकों की शिकायत के बाद हुई है. इन विधायकों ने बिधाननगर पुलिस कमिश्नरेट के साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी. अपनी शिकायत में उन्होंने इस मामले की पूरी जांच करने और एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी।  इन बागी विधायकों ने खातों में जमा करोड़ों रुपयों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. उन्होंने जांच टीम से मांग की है कि इस पैसे के सोर्स की जांच की जाए. वे पता लगाना चाहते हैं कि ये पैसा ईमानदारी की कमाई का है या फिर किसी गलत काम से आया है. उन्हें शक है कि ये पैसा कट-मनी (कमीशन), पब्लिक फंड की हेराफेरी और किसी बड़े घोटाले का हो सकता है।