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नरेंद्र के अंगदान से बचेंगी 5 जिंदगियां, लिवर-किडनी समेत कई अंग किए दान

जबलपुर जबलपुर में सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हुए 40 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर नरेंद्र रजक की जिंदगी तो नहीं बचाई जा सकी, लेकिन उनके परिवार के एक साहसिक और संवेदनशील फैसले ने कई लोगों को नया जीवन देने की उम्मीद जगा दी. ब्रेन डेड घोषित किए जाने के बाद पत्नी पूजा रजक और परिजनों ने नरेंद्र के अंगदान का निर्णय लिया।  इसके बाद अस्पताल प्रशासन, जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के समन्वय से अंगदान की प्रक्रिया पूरी की गई. नरेंद्र का हार्ट और लीवर विशेष चार्टर्ड विमान से अहमदाबाद भेजा गया, जबकि उनकी दोनों किडनी का प्रत्यारोपण जबलपुर में किया जाएगा. इसके अलावा आंखें और स्किन भी दान की गई हैं. नरेंद्र रजक मूल रूप से जबलपुर के गुप्तेश्वर क्षेत्र के निवासी थे और नागपुर की एचसीएल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के पद पर कार्यरत थे।  जबलपुर लौटते समय किसी अज्ञात वाहन ने उन्हें टक्कर मारी परिवार में पत्नी पूजा रजक, 12 वर्षीय बेटी भूमिका और आठ वर्षीय बेटा देवांश हैं. परिजनों के मुताबिक नरेंद्र 31 अक्टूबर को रिश्तेदारों के यहां गंगा पूजन कार्यक्रम में शामिल होने मनकेड़ी-कुआखेड़ा गए थे. वहां से जबलपुर लौटते समय किसी अज्ञात वाहन ने उन्हें टक्कर मार दी. हादसे में गंभीर रूप से घायल नरेंद्र को उपचार के लिए मेट्रो प्राइम अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी हालत लगातार गंभीर बनी रही।  चिकित्सकीय परीक्षण के बाद उन्हें ब्रेन डेड घोषित किया गया. नरेंद्र के ब्रेन डेड होने की जानकारी मिलने के बाद अस्पताल प्रबंधन ने परिजनों से अंगदान की संभावनाओं पर चर्चा की. इस कठिन परिस्थिति में पत्नी पूजा रजक ने परिवार के साथ मिलकर अंगदान की सहमति दी. एक तरफ परिवार अपने प्रिय सदस्य को खोने के गम से गुजर रहा था।  दूसरों की जिंदगी बचाने का फैसला बना मिसाल वहीं दूसरी तरफ दूसरों की जिंदगी बचाने के लिए लिया गया यह निर्णय समाज के सामने एक मिसाल बन गया. पूजा रजक ने कहा कि उनके परिवार की जिंदगी तो खत्म हो गई, लेकिन नरेंद्र के अंग किसी दूसरे परिवार में खुशियां लौटा सकते हैं. उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि जिन मरीजों को ब्रेन डेड घोषित किया जाता है, उनके परिजनों को अंगदान के बारे में जरूर विचार करना चाहिए।  पूजा रजक ने कहा कि दुनिया में पैसा देकर बहुत कुछ खरीदा जा सकता है, लेकिन किसी को जीवन देने वाले अंग नहीं खरीदे जा सकते. यदि हमारे परिवार के सदस्य के अंग किसी दूसरे व्यक्ति के काम आ सकते हैं तो इससे बड़ा पुण्य और क्या हो सकता है. उन्होंने कहा कि नरेंद्र का शरीर अब किसी दूसरे व्यक्ति की जिंदगी बचाने के काम आएगा, यही उनके परिवार के लिए सबसे बड़ा संतोष है।  हादसे वाले दिन नरेंद्र ने हेलमेट नहीं लगाया था नरेंद्र की पत्नी पूजा रजक ने एक भावुक बात साझा करते हुए बताया कि नरेंद्र हमेशा बाइक चलाते समय हेलमेट पहनते थे, लेकिन हादसे वाले दिन उन्होंने हेलमेट नहीं लगाया था. पूजा का कहना है कि अगर उस दिन नरेंद्र ने हेलमेट पहना होता तो शायद आज वह उनके बीच जिंदा होते. परिवार को इस बात का गहरा अफसोस है।  अंगदान की प्रक्रिया को समय पर पूरा करने के लिए जबलपुर में ग्रीन कॉरिडोर बनाए गए. मेट्रो प्राइम अस्पताल के डॉक्टर राजीव बड़ेरिया ने बताया कि हार्ट और लीवर को अहमदाबाद पहुंचाने के लिए अस्पताल से डुमना एयरपोर्ट तक ग्रीन कॉरिडोर तैयार किया गया. वहीं किडनी को मेडिकल कॉलेज जबलपुर और मेट्रो प्राइम अस्पताल तक पहुंचाने के लिए अलग-अलग ग्रीन कॉरिडोर की व्यवस्था की गई।  60 से 68 डॉक्टरों की टीम ने निकाले अंग अंगों को निकालने और प्रत्यारोपण की प्रक्रिया में अस्पताल की लगभग 60 से 68 डॉक्टरों की टीम जुटी रही. अहमदाबाद से भी तीन डॉक्टरों की टीम जबलपुर पहुंची. इसके अलावा मेडिकल कॉलेज की टीम ने भी अंगदान की प्रक्रिया में सहयोग किया. नरेंद्र की एक किडनी मेडिकल कॉलेज जबलपुर और दूसरी किडनी मेट्रो प्राइम अस्पताल में प्रत्यारोपित की जाएगी।  हार्ट और लीवर अहमदाबाद के अस्पताल में जरूरतमंद मरीजों को लगाए जाएंगे. उनकी आंखें और स्किन भी दान की गई हैं. मेडिकल कॉलेज जबलपुर में उपलब्ध स्किन बैंक की सुविधा के माध्यम से स्किन को सुरक्षित करने की प्रक्रिया की गई. अंगदान की इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ी चुनौती हार्ट और लीवर को समय रहते अहमदाबाद पहुंचाना था।  टीम को अंगों के साथ वापस लौटना था, लेकिन… अहमदाबाद से आई टीम को अंगों के साथ वापस लौटना था, लेकिन रात के समय डुमना एयरपोर्ट बंद रहने और नियमित नाइट लैंडिंग की सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण परेशानी सामने आई. अस्पताल प्रबंधन ने इस समस्या से जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को अवगत कराया. इसके बाद कलेक्टर और सांसद के स्तर पर तत्काल प्रयास किए गए।  एविएशन अधिकारियों से समन्वय कर विशेष चार्टर्ड विमान की लैंडिंग और उड़ान के लिए एयरपोर्ट खुलवाने की व्यवस्था की गई. इसके बाद अहमदाबाद से आया विशेष विमान डुमना एयरपोर्ट पहुंचा और हार्ट तथा लीवर को विमान के जरिए अहमदाबाद रवाना किया गया. अहमदाबाद के मारेंगो सिम्स अस्पताल से पहुंचे डॉक्टर चिंतन सेठ ने बताया कि उनकी टीम हार्ट और लीवर को रिट्रीव करने के लिए जबलपुर आई थी. टीम में तीन डॉक्टर शामिल थे.। पूरी प्रक्रिया को तेजी और सावधानी से की गई चिंतन सेठ ने बताया कि हार्ट प्रत्यारोपण के लिए अहमदाबाद में 57 वर्षीय मरीज इंतजार कर रहा है. अंगदान के मामलों में समय बेहद महत्वपूर्ण होता है. अंगों को जितनी जल्दी सुरक्षित तरीके से निकालकर प्रत्यारोपण केंद्र तक पहुंचाया जाता है, सफलता की संभावना उतनी ही बेहतर रहती है. इसी वजह से पूरी प्रक्रिया को तेजी और सावधानी के साथ पूरा किया गया।  एसडीएम मदन रघुवंशी ने क्या बताया? एसडीएम मदन रघुवंशी ने बताया कि नरेंद्र रजक के परिजनों ने अंगदान का ऐतिहासिक निर्णय लिया. हार्ट और लीवर को अहमदाबाद भेजने के लिए प्रशासन ने तत्काल चार्टर्ड विमान की व्यवस्था सुनिश्चित कराई. अस्पताल से डुमना एयरपोर्ट तक ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया. वहीं किडनी को मेडिकल कॉलेज पहुंचाने के लिए भी अलग कॉरिडोर तैयार किया गया. पुलिस के वाहन अंगों को ले जाने वाले वाहनों के आगे तैनात रहे, ताकि रास्ते में यातायात बाधित न हो और अंगों को बिना किसी देरी … Read more

ब्रेन-डेड मरीज के अंगदान ने बचाईं 3 जिंदगियां, AIIMS भोपाल में सफल हुआ 30वां किडनी ट्रांसप्लांट

 भोपाल  एम्स भोपाल में 30वां किडनी प्रत्यारोपण सफल रहा। अंतिम अवस्था की किडनी बीमारी से जूझ रहे मरीज को नई किडनी लगाई गई। सघन निगरानी में इलाज के बाद मरीज को पूरी तरह स्वस्थ होकर अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। मरीज को प्रत्यारोपण से पहले लंबे समय से हफ्ते में दो बार डायलिसिस करवाना पड़ रहा था। अचानक ब्लड प्रेशर बढ़ने पर उन्हें आपात स्थिति में एम्स में भर्ती किया गया था। जांच में पता चला कि उनकी दोनों किडनियां गंभीर रूप से खराब हो चुकी हैं। इसके बाद ट्रांसप्लांट ही एकमात्र रास्ता बचा था।

ब्रेन डेड महिला के परिवार का बड़ा फैसला, एक जिंदगी ने पाई नई धड़कन

नई दिल्ली शोक की गहरी छाया के बीच जब उम्मीद की एक किरण जन्म लेती है, तो वह इंसानियत की सबसे सुंदर तस्वीर बन जाती है। चंडीमंदिर स्थित कमांड हॉस्पिटल में 2 मई 2026 को कुछ ऐसा ही हुआ, जब एक 41 साल की महिला को ब्रेन डेड घोषित किए जाने के बाद उसके परिवार ने अपने दर्द को परे रखकर अंगदान का निर्णय लिया। एक ओर जहां परिवार अपूरणीय क्षति के दुख में डूबा था, वहीं दूसरी ओर उसी फैसले ने एक 14 साल के बच्चे की धड़कनों को नया जीवन दे दिया। यह कहानी सिर्फ एक ट्रांसप्लांट की नहीं, बल्कि साहस, संवेदना और मानवता के मोती को एक साथ पिरोया, जिसने कई जिंदगियों में उम्मीद की रोशनी भर दी। कैसे अंजाम दिया मिशन ब्रेन डेथ के बाद महिला का दिल इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल को भेजा गया। समय की संवेदनशीलता को देखते हुए अपोलो अस्पताल की एक स्पेशल टीम ने तुरंत एक चार्टर्ड प्राइवेट जेट की व्यवस्था की और चंडीगढ़ पहुंचकर दिल को सुरक्षित तरीके से दिल्ली लाया गया। तय समय-सीमा के भीतर इस हार्ट ट्रांसप्लांट को अंजाम दिया गया, जिससे एंड-स्टेज हार्ट फेल्योर से जूझ रहे 14 वर्षीय बच्चे को नई जिंदगी मिल गई। फिलहाल बच्चा आईसीयू में डॉक्टरों की निगरानी में स्थिर है। कमांड हॉस्पिटल की जमकर तारीफ इस जटिल और समयबद्ध ऑपरेशन को सफल बनाने में कई एजेंसियों का अहम योगदान रहा। कमांड हॉस्पिटल के कर्नल अनुराग गर्ग के प्रयास की खूब तारीफ की गई। वहीं इस काम के लिए हरियाणा ट्रैफिक पुलिस, पंजाब ट्रैफिक पुलिस ने चार्टर्ड फ्लाइट के लिए बिना देर किए व्यवस्था की और इस मिशन को अंजाम दिया गया। दिल्ली में ट्रैफिक पुलिस ने बदरपुर ट्रैफिक इंचार्ज एसआई अनिल कुमार की निगरानी में एयरपोर्ट से अस्पताल तक ग्रीन कॉरिडोर बनाया, जिससे दिल को महज 20 मिनट में अस्पताल पहुंचा दिया गया। इस पूरे मिशन में प्राइवेट जेट टीम ने भी अहम भूमिका निभाई। अपोलो अस्पताल ने डोनर परिवार की इस असाधारण उदारता को नमन करते हुए भारतीय सेना, कमांड हॉस्पिटल, नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (NOTTO) और सभी संबंधित एजेंसियों का आभार जताया। क्या बोले डॉक्टर अस्पताल ने कहा कि यह घटना अंगदान के महत्व और सामूहिक प्रयास की ताकत का एक मजबूत उदाहरण है। अपोलो अस्पताल के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. मुकेश गोयल ने बताया कि बच्चा पिछले एक साल से गंभीर हृदय रोग से जूझ रहा था और हर महीने उसे अस्पताल में भर्ती करना पड़ता था। उन्होंने कहा कि हार्ट ट्रांसप्लांट ही उसके जीवन को बचाने का एकमात्र विकल्प था। दो महीने पहले ही उसे नोट्टो (NOTTO) में रजिस्टर किया गया था, लेकिन पिछले हफ्ते उसकी हालत फिर बिगड़ गई थी। डॉ. गोयल के मुताबिक, 2 मई को कमांड हॉस्पिटल चंडीमंदिर में एक उपयुक्त डोनर हार्ट उपलब्ध हुआ। महिला को दो हफ्ते पहले ब्रेन हेमरेज हुआ था और वह ब्रेन डेड हो गई थीं। उनके परिवार ने अंगदान का फैसला लेकर कई जिंदगियां बचा लीं। डॉक्टर के मुताबिक हार्ट ट्रांसप्लांट में समय बेहद अहम होता है और चार घंटे के भीतर दिल को प्रत्यारोपित कर रक्त संचार बहाल करना जरूरी होता है। डॉक्टरों की टीम दोपहर 1:30 बजे चार्टर्ड फ्लाइट से चंडीगढ़ रवाना हुई और शाम 7:30 बजे दिल्ली लौट आई। ग्रीन कॉरिडोर की मदद से दिल को आधे घंटे में अस्पताल पहुंचाया गया और आधी रात तक सफल ट्रांसप्लांट पूरा कर लिया गया। मरीज को अब कार्डियक सर्जरी आईसीयू में रखा गया है।

हरियाणा में अंगदान को लेकर युवाओं में उत्साह, 18-45 आयु वर्ग सबसे आगे

रोहतक. हरियाणा के युवाओं ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे केवल खेल मैदानों और सेना में ही नहीं, बल्कि मानवता की सेवा में भी सबसे आगे हैं। प्रदेश में अंगदान के लिए सबसे ज्यादा पंजीकरण युवाओं ने कराया है। ताजा आंकड़ों के अनुसार 18 से 45 वर्ष आयु वर्ग के लोगों ने सबसे अधिक संख्या में अंगदान का संकल्प लिया है। इससे साफ है कि नई पीढ़ी अब सामाजिक जिम्मेदारी को समझते हुए जीवन बचाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। हरियाणा के युवाओं ने यह संदेश दिया है कि म्हारे गाबरू बड़े दिलदार, केवल कहावत नहीं, बल्कि मानवता की मिसाल है। अब जरूरत है कि यह अभियान गांव-गांव और घर-घर तक पहुंचे, ताकि और ज्यादा लोग जीवनदान के इस महादान से जुड़ सकें। भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत संचालित नेशनल आर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट आर्गेनाइजेशन (नोटो) के मुताबिक सोमवार तक हरियाणा में कुल 7,998 लोगों ने अंगदान के लिए पंजीकरण कराया है। यह संख्या लगातार बढ़ रही है और प्रदेश में जागरूकता का संकेत मानी जा रही है। दिल, लीवर और फेफड़ों के लिए सबसे ज्यादा संकल्प हरियाणा के लोगों ने सबसे ज्यादा हृदय, लीवर और फेफड़ों के दान के लिए पंजीकरण कराया है। इससे स्पष्ट है कि लोग अब अंगदान के महत्व को समझ रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार पहले लोग अंगदान को लेकर भ्रांतियों और डर के कारण पीछे हटते थे, लेकिन अब स्थिति तेजी से बदल रही है। परिवार स्वयं जानकारी ले रहे हैं और अंगदान की प्रक्रिया समझना चाहते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी इस विषय पर जागरूकता बढ़ी है। युवाओं ने दिखाई सबसे ज्यादा रुचि आंकड़ों के अनुसार 18 से 30 वर्ष आयु वर्ग में सबसे अधिक 2,946 युवाओं ने अंगदान का संकल्प लिया है। वहीं 30 से 45 वर्ष आयु वर्ग के 3,025 लोगों ने पंजीकरण कराया है। इसका अर्थ है कि कुल पंजीकरण का सबसे बड़ा हिस्सा युवाओं और मध्यम आयु वर्ग से है। विशेषज्ञों का मानना है कि युवाओं में शिक्षा, इंटरनेट मीडिया जागरूकता और स्वास्थ्य संबंधी समझ बढ़ने से अंगदान के प्रति सकारात्मक सोच विकसित हुई है। हरियाणा में अंगदान पंजीकरण में पुरुषों की संख्या महिलाओं से काफी अधिक है। आंकड़ों के अनुसार 5,225 पुरुषों ने अंगदान का संकल्प लिया है, जबकि 2,773 महिलाओं ने भी इसमें भागीदारी दिखाई है। हालांकि सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि महिलाओं की भागीदारी भी लगातार बढ़ रही है और आने वाले समय में यह संख्या और मजबूत होगी। अंग     पंजीकरण संख्या हृदय     6050 लीवर     6166 फेफड़े     5750 पैंक्रियाज     5373 आंत     5279 किडनी     2654 परिवार को अपनी इच्छा बताना भी जरूरी बतौर विशेषज्ञ पंडित भगवत दयाल शर्मा हेल्थ विवि के कुलपति डा. एचके अग्रवाल का कहना है कि एक अंगदाता 8 लोगों की जान बचा सकता है और कई अन्य लोगों को नई जिंदगी दे सकता है। यही कारण है कि युवाओं का बढ़ता रुझान आने वाले समय में हजारों मरीजों के लिए उम्मीद बन सकता है। एक व्यक्ति की मृत्यु के बाद हृदय, लीवर, फेफड़े, किडनी सहित कई अंग जरूरतमंद मरीजों के लिए जीवन रक्षक साबित होते हैं। विशेष बात यह है कि केवल पंजीकरण काफी नहीं है। परिवार को अपनी इच्छा बताना भी जरूरी है। कई बार मृत्यु के बाद अंतिम निर्णय परिवार की सहमति से होता है। इसलिए युवाओं को अपने माता-पिता और परिजनों से इस विषय पर खुलकर बातचीत करनी चाहिए। उम्रवार आंकड़ों से समझिये बढ़ती पंजीकरण की रफ्तार आयु वर्ग     पंजीकरण संख्या 18-30 वर्ष     2946 30-45 वर्ष     3025 45-60 वर्ष     1411 60 वर्ष से ऊपर     611 पंजीकरण में पुरुष सबसे आगे श्रेणी     पंजीकरण महिलाएं     2773 पुरुष     5225

ब्रेन डेड मरीज के अंगदान से कई जिंदगियों को मिला नया जीवन, मानवता की मिसाल

रोहतक यह कहानी सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि समय के खिलाफ दौड़ती जिंदगी की एक सांस रोक देने वाली यात्रा है… जहां हर सेकंड की कीमत किसी की धड़कन तय कर रही थी. 9 अप्रैल की दोपहर हरियाणा के रोहतक स्थित पीजीआईएमएस में 37 वर्षीय व्यक्ति ब्रेन हेमरेज के बाद भर्ती हुआ था. उसने होश खो दिया था. डॉक्टरों ने तमाम कोशिशों के बाद उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया था. उसी दुख की घड़ी में एक उम्मीद जन्म ले रही थी. एक ऐसा निर्णय, जो कई जिंदगियों को बचाने वाला था. परिवार ने गहरा दर्द सहते हुए ऑर्गन डोनेट के लिए सहमति दे दी. यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन इंसानियत की मिसाल बन गया. कुछ ही घंटों में अस्पताल में सर्जिकल टीम एक्टिव हो गई. शरीर से अंगों को निकालने का काम शुरू हुआ- हार्ट, फेफड़े, लीवर, किडनी और कॉर्निया… हर ऑर्गन किसी न किसी अजनबी के लिए जीवन की नई किरण बनने वाला था. एजेंसी के अनुसार, दिल्ली के ओखला स्थित फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट में एक 26 साल का युवक भर्ती था, उसे गंभीर डाइलेटेड कार्डियोमायोपैथी थी- एक ऐसी बीमारी जिसमें दिल धीरे-धीरे कमजोर होकर शरीर का साथ छोड़ देता है. डॉक्टरों ने पहले ही बता दिया था कि बिना ट्रांसप्लांट के जीवन ज्यादा लंबा नहीं है. उस दिन जैसे ही उसे मैचिंग हार्ट मिलने की सूचना मिली, अस्पताल में हलचल तेज हो गई. दिल को रोहतक से दिल्ली तक पहुंचाने के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया. दिल्ली पुलिस और रोहतक पुलिस ने मिलकर सड़कों को इस तरह खाली कराया जैसे समय खुद रास्ता दे रहा हो. एम्बुलेंस में सुरक्षित रखा गया वह दिल, जो अभी कुछ समय पहले तक किसी और शरीर में धड़क रहा था, अब एक नए जीवन की ओर बढ़ रहा था. सायरन की आवाज के साथ एम्बुलेंस ने 2:50 बजे रोहतक से सफर शुरू किया. हर चौराहा पहले से खाली था, हर ट्रैफिक सिग्नल हरा. यह सिर्फ एक यात्रा नहीं थी, यह एक मानवीय कोशिश थी- जहां सिस्टम, डॉक्टर, पुलिस और आम लोग सभी एक साथ थे. 98 किलोमीटर की यह दूरी सामान्य दिनों में डेढ़ से दो घंटे लेती है, लेकिन उस दिन समय भी हार मान चुका था. मात्र 85 मिनट में एंबुलेंस दिल्ली के फोर्टिस एस्कॉर्ट्स अस्पताल पहुंच गई. जैसे ही हार्ट सर्जरी थिएटर में पहुंचा, डॉक्टरों की टीम तुरंत एक्टिव हो गई. हर सेकंड कीमती था. मशीनों की बीप, सर्जिकल उपकरणों की हल्की आवाज और डॉक्टरों की एकाग्रता- सब मिलकर उस कोशिश में थे, जहां दिल फिर से धड़कने वाला था. ऑपरेशन सफल रहा. 26 वर्षीय मरीज, जो कुछ समय पहले तक जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था, अब धीरे-धीरे नए दिल की धड़कन महसूस कर रहा था. ICU में उसकी हालत स्थिर बताई गई और डॉक्टरों की निगरानी जारी रही. एक डोनर से कई जिंदगियां बचाई गईं. फेफड़े गुरुग्राम के अस्पताल भेजे गए, लीवर और पैंक्रियास एम्स दिल्ली को मिले, जबकि किडनी और कॉर्निया रोहतक में ही इस्तेमाल किए गए. यह मानवता की कहानी है. यह बताती है कि जब सिस्टम, तकनीक और इंसानियत साथ आते हैं, तो असंभव भी संभव हो जाता है. सबसे महत्वपूर्ण उस परिवार का साहस है, जिसने अपने दर्द को दूसरों की उम्मीद में बदल दिया. 98 किलोमीटर की वह सड़क शायद आम दिनों में सिर्फ एक मार्ग है, लेकिन उस दिन वह जीवन की सबसे तेज दौड़ बन गई, जहां एक दिल ने हार मानने से इनकार कर दिया, और कई दिलों को जीने का मौका दे दिया.

अंगदान को मिले राजकीय सम्मान की मांग: डॉ. रमन सिंह ने मुख्यमंत्री को लिखा पत्र”

अंगदान को मिले राजकीय सम्मान” विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने मुख्यमंत्री को लिखा पत्र मृत्योपरांत अंगदान को बढ़ावा देने से चिकित्सीय क्षेत्र और मानवता का उत्थान संभव : विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह का मुख्यमंत्री से राजकीय सम्मान देने का आग्रह रायपुर,  छत्तीसगढ़ विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने राज्य में अंगदान को प्रोत्साहन देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और मानवीय पहल करते हुए माननीय मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय को पत्र लिखकर यह आग्रह किया है कि मृत्योपरांत अंगदान करने वाले व्यक्तियों को “राजकीय सम्मान” प्रदान करने की नीति पर गंभीरता से विचार किया जाए। विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने अपने पत्र में श्री सुरेश खांडवे (अध्यक्ष सर्वधर्म सेवा संस्था, भिलाई) की माँग को आगे बढ़ाते हुए उल्लेख किया है कि देश में अंगदान की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। वर्तमान में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर मात्र 0.34 प्रतिशत लोग ही अंगदान कर रहे हैं, जबकि आँख, किडनी, लीवर जैसे महत्वपूर्ण अंगों की अनुपलब्धता के कारण हर वर्ष लाखों लोगों की असमय मृत्यु हो जाती है। यदि अंगदान को सामाजिक सम्मान और सरकारी मान्यता मिले, तो इस संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है। डॉ. रमन सिंह ने पत्र में यह भी लिखा है कि छत्तीसगढ़ राज्य अंगदान के मामले में देश के कई अन्य राज्यों की तुलना में पीछे है, जबकि तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्यों ने अंगदाताओं को राजकीय सम्मान देने की घोषणा कर उल्लेखनीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। इन राज्यों में इस निर्णय के बाद अंगदान के प्रति जनजागरूकता और सहभागिता में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। विधानसभा अध्यक्ष ने अपने पत्र में यह भी बताया कि सर्वधर्म सेवा संस्था, (छ.ग.) के अध्यक्ष श्री सुरेश खांडे द्वारा राज्य में मृत्योपरांत अंगदान करने वालों को राजकीय सम्मान दिए जाने की मांग की गई है, जिसे जनहित में अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है। डॉ. रमन सिंह ने माननीय मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि जनहित को सर्वोपरि रखते हुए इस विषय पर सकारात्मक निर्णय लिया जाए तथा संबंधित विभागों को आवश्यक निर्देश देकर उपयुक्त कार्यवाही सुनिश्चित की जाए, ताकि छत्तीसगढ़ में अंगदान को सामाजिक स्वीकृति, सम्मान और प्रेरणा मिल सके।

एम्स भोपाल तक सीमित नहीं रहेगी सुविधा, अब मेडिकल कॉलेजों में भी होंगे ब्रेन-डेड मरीजों से अंगदान

भोपाल  एमपी के सभी ट्रॉमा सेंटर और मेडिकल कॉलेजों में ब्रेन-डेड मरीजों के अंग दान करने की व्यवस्था होगी। साथ ही ब्रेन डेड मरीज के परिवारों से अंगदान की मंजूरी के लिए जरूरी काउंसलिंग के लिए स्थायी काउंसलर की नियुक्ति भी की जाएगी।दरअसल, अंगदान को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (NOTTO) की गाइडलाइन आई है। प्रदेश के लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने कहा कि इनमें से कई का पालन पहले से किया जा रहा है। अब सरकारी अस्पतालों में ब्रेन-डेड मरीज से ऑर्गन डोनेशन के लिए जरूरी कदम उठाए जाएंगे। NOTTO से जारी निर्देश में कहा गया कि प्रदेश के सभी ट्रॉमा सेंटर्स में अंग एवं ऊतक प्राप्ति (ब्रेन-डेड मरीज से ऑर्गन डोनेशन) की व्यवस्था विकसित की जाए। उन्हें THOTA अधिनियम के तहत अंग प्राप्ति केंद्र के रूप में पंजीकृत किया जाए। साथ ही, मेडिकल कॉलेजों में भी चरणबद्ध तरीके से यह सुविधाएं विकसित की जाएं। हर साल 11 सौ ब्रेन-डेड मरीज से ऑर्गन डोनेशन, MP की हिस्सेदारी 0.7% भारत में हर साल 11 सौ के करीब ब्रेन-डेड मरीज से ऑर्गन डोनेशन होते हैं। जिसमें तेलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात की हिस्सेदारी 82% से अधिक है। वहीं, मध्यप्रदेश की 0.7 प्रतिशत, राजस्थान की 0.6 प्रतिशत और छत्तीसगढ की 0.3 प्रतिशत हिस्सेदारी रहती है। इसकी दो बड़ी वजह हैं, इनमें पहली सरकारी अस्पतालों में ब्रेन-डेड मरीज से ऑर्गन डोनेशनकी व्यवस्था ना होना और दूसरी जागरूकता की कमी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने इसको लेकर हाल में सरकार का विजन स्पष्ट किया है। जिसका एक उदाहरण यह कि इस 15 अगस्त को प्रदेश के सभी अंगदाताओं का राजकीय सम्मान किया जाएगा। ऑर्गन वेटिंग लिस्ट में महिलाओं को प्राथमिक्ता नई गाइडलाइन के अनुसार, हर राज्य में अब ऑर्गन वेटिंग लिस्ट में महिलाओं को अतिरिक्त अंक देने का प्रावधान किया जाएगा। इसके अलावा, यदि किसी पूर्व दिवंगत दाता के निकट संबंधी को अंग प्रत्यारोपण की आवश्यकता हो, तो उसे प्राथमिकता दी जाए। साथ ही, NOTTO ने साफ किया है कि नई गाइडलाइन का उद्देश्य जागरूकता बढ़ाना, अंगदान में पारदर्शिता लाना और लैंगिक असमानता को दूर करना है। यही वजह है कि जन-जागरूकता को बढ़ाने के लिए राज्य स्तर पर ब्रांड एम्बेसडर भी नियुक्त किए जाएं। इन गाइडलाइन का प्रदेश में पहले से हो रहा पालन     मृतक दाता के परिवार के सदस्यों को राज्य और जिला स्तर पर सार्वजनिक समारोहों जैसे 15 अगस्त, 26 जनवरी, राज्य स्थापना दिवस आदि पर सम्मानित किया जाना।     आपातकालीन कर्मियों और एम्बुलेंस स्टाफ को सड़क दुर्घटना या स्ट्रोक से पीड़ित संभावित दाताओं की पहचान और अस्पताल के अंग दान समन्वयक को समय पर सूचित करने के लिए प्रशिक्षण दिया जाना। ब्रेन-डेड मरीज से ऑर्गन डोनेशन वाला एम्स अकेला सरकारी संस्थान मध्यप्रदेश में फिलहाल ब्रेन-डेड मरीज से ऑर्गन डोनेशन की व्यवस्था राजधानी के 3 समेत कुल 6 अस्पतालों में ही मौजूद है। इनमें एम्स भोपाल यह सुविधा वाला अकेला सरकारी अस्पताल है। इसके साथ, भोपाल और इंदौर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में यह व्यवस्था शुरू करने का काम अब तक कागजों में ही सीमित है। किडनी ट्रांसप्लांट में भोपाल आगे भोपाल के दो प्रमुख सरकारी अस्पताल, एम्स और हमीदिया में किडनी ट्रांसप्लांट रफ्तार पकड़ रहा है। एक तरफ एम्स में 11 किडनी ट्रांसप्लांट हुए, जिसमें से 3 कैडेवरिक ऑर्गन (यानी ब्रेन डेड मरीज से मिली किडनी) ट्रांसप्लांट थे। वहीं, गांधी मेडिकल कॉलेज में 10 किडनी ट्रांसप्लांट हुए और यह सभी लाइव थे। यानी, परिजनों ने अपनों को नया जीवन देने के लिए अपनी किडनी दान की। इसके अलावा, भोपाल का बंसल अस्पताल 400 से अधिक किडनी ट्रांसप्लांट कर चुका है। इन दोनों कैटेगरी (सरकारी और निजी अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट) में भोपाल प्रदेश में सबसे आगे हैं। लेकिन, देश में देखें तो टॉप 10 में भी नहीं है। देश के अन्य राज्यों की तुलना में प्रदेश काफी पीछे मध्य प्रदेश स्टेट ऑर्गन एंड टिशू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (SOTTO) की कंवीनर डॉ. कविता कुमार ने कहा कि अंगदान के मामले में मध्यप्रदेश अभी शुरुआती दौर में है, जैसे एक छोटा बच्चा चलना सीख रहा हो। इस क्षेत्र में अभी काफी काम बाकी है। सबसे अहम है कि अंगदान पर ज्यादा चर्चा हो और सही जानकारी लोगों तक पहुंचे। जब लोग इसके बारे में बात करेंगे, तो जागरूकता बढ़ेगी। उन्हें इसके फायदे समझ में आएंगे। एक बार जब लोग जान जाएंगे कि अंगदान से कितने लोगों की जान बच सकती है, तब राज्य में अंगदान का ग्राफ तेजी से बढ़ेगा। उन्होंने आगे कहा, सरकारी अस्पतालों में ब्रेन-डेड मरीज से ऑर्गन डोनेशन शुरू होना जरूरी है। इसके लिए अलग से मैनपावर, पर्याप्त स्पेस और एक बड़े सेटअप की जरूरत होती है। गांधी मेडिकल कॉलेज के पास मैनपावर और जगह तो है, लेकिन ऑर्गन रिट्रीवल के लिए आवश्यक मशीनें और जांच की सुविधा अभी विकसित करनी है। अच्छी बात यह है कि सरकार इस दिशा में काफी सक्रिय है। हमें भरोसा है कि जल्द ही प्रदेश में अंगदान की स्थिति बेहतर होगी और इसका ग्राफ ऊपर जाएगा। आठ अंगों को दान कर सकते हैं लोग     18 या उससे ‎अधिक उम्र के बाद ‎जीवित डोनर या तो‎ एक किडनी या लीवर ‎का केवल एक हिस्सा‎दान कर सकता है।     ‎किसी भी उम्र का ब्रेन‎स्टेम मृत डोनर 8‎ महत्वपूर्ण अंगों को‎ दान कर सकता है। ‎इनमें हार्ट, 2 फेफड़े,‎ लीवर, 2 किडनी,‎ पैंक्रियाज और छोटी‎ आंत, कॉर्निया, हड्डी,‎ त्वचा और हार्ट वाल्व ‎शामिल हैं।‎ लिविंग ऑर्गन डोनेशन     सबसे पहले डोनर के कुछ मेडिकल टेस्ट किए जाते हैं। यह जानने के लिए व्यक्ति डोनेशन के लिए उपयुक्त है।     इन टेस्ट में सबसे महत्वपूर्ण दो पहलू हैं। डोनर और रिसीवर की कंपैटिबिलिटी और डोनर की मेडिकल कंडीशन यानी उसका शारीरिक रूप से स्वस्थ होना।     सारे टेस्ट रिजल्ट पॉजिटिव होने और डॉक्टर के सर्टिफिकेट के बाद डोनर की बॉडी से डोनेट किया जा रहा हिस्सा सर्जिकली रिमूव किया जाता है और उसे रिसीवर की बॉडी में ट्रांसप्लांट किया जाता है।     डोनर को भी ऑर्गन डोनेशन के बाद कई हफ्तों में मेडिकल सुपरविजन में रखा जाता है। ब्रेन-डेड मरीज से ऑर्गन डोनेशन किसी भी कारण से हुई आकस्मिक मृत्यु के बाद … Read more