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रेलवे में सख्ती तेज! 11 चोर दबोचे गए, 23 अवैध वेंडरों पर भी चला शिकंजा

भोपाल रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों में यात्रियों के सामान की चोरी तथा अवैध वेंडरों की गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए भोपाल मंडल द्वारा विशेष अभियान चलाया जा रहा है। अभियान के तहत रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) और वाणिज्य विभाग की संयुक्त कार्रवाई में चोरी करने वाले आरोपितों और नियमों का उल्लंघन करने वाले वेंडरों पर सख्त कार्रवाई की गई है। जुर्माना लगाकर भेजा जेल वरिष्ठ मंडल सुरक्षा आयुक्त डॉ. अभिषेक और वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक सौरभ कटारिया के निर्देशन में चलाए गए अभियान के दौरान पिछले तीन दिनों में यात्रियों का सामान चोरी करने या चोरी का प्रयास करने वाले 11 संदिग्धों को पकड़ा गया। इनमें से दो आरोपितों के खिलाफ जीआरपी थाना भोपाल में प्रकरण दर्ज किया गया, जबकि नौ अन्य को रेलवे न्यायालय ने दोषी पाते हुए 2,500 रुपये जुर्माना और 30 दिन के कारावास की सजा सुनाई। अवैध वेंड पर भी शिकंजा यात्रियों को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण खान-पान उपलब्ध कराने के उद्देश्य से रेलवे स्टेशनों पर संचालित स्टालों और फूड यूनिट्स का भी निरीक्षण किया गया। जांच के दौरान नियमों का उल्लंघन करने वाले 23 वेंडरों के खिलाफ कार्रवाई की गई। रेलवे अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2026 में मई माह तक केवल भोपाल पोस्ट द्वारा ही 591 वेंडरों पर विभिन्न नियमों के उल्लंघन के मामलों में कार्रवाई की जा चुकी है। यात्रियों से सतर्क रहने की अपील रेलवे अधिकारियों का कहना है कि इस विशेष अभियान का उद्देश्य यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, चोरी की घटनाओं को रोकना और अधिकृत वेंडरों के माध्यम से बेहतर सेवाएं उपलब्ध कराना है। रेलवे ने यात्रियों से भी अपील की है कि वे अपने सामान की सुरक्षा को लेकर सतर्क रहें और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तत्काल आरपीएफ या रेलवे अधिकारियों को दें।  

पश्चिम मध्य रेलवे का बड़ा फैसला, 14 स्टेशनों को मिला जंक्शन का दर्जा

बीना  पश्चिम मध्य रेलवे ने जबलपुर जोन के अंतर्गत जबलपुर, भोपाल व कोटा मंडल के कुल 14 स्टेशनों को जंक्शन का दर्जा दिया है, इसमें मालखेड़ी स्टेशन भी शामिल है, जो कि अब जंक्शन के नाम से पहचाना जाएगा। जंक्शन का दर्जा मिलने के बाद स्टेशन पर सुविधाओं में विस्तार की उम्मीद भी जाग गई है। बीना शहर से महज दो किलोमीटर दूर यह स्टेशन अभी जबलपुर मंडल में आता है, जहां पर सुविधाओं के विस्तार की मांग लगातार की जाती है, लेकिन यहां पर जो ट्रेनें खड़ी होती हैं, उनके अनुसार सुविधाओं में विस्तार की जरूरत है। दरअसल रेलवे अधोसंरचना विकास और नई रेल लाइनों, कॉर्ड लाइनों व बाईपास लाइनों के चालू होने के बाद यात्रियों व रेल परिचालन की सुविधा के लिए रेलवे स्टेशनों के नामों को संशोधित करने का निर्णय लिया गया है। इसी के तहत सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति और भारतीय रेलवे सम्मेलन (आईआरसीए), नई दिल्ली के से चर्चा के बाद पश्चिम मध्य रेल के तीनों मंडलों (जबलपुर, भोपाल एवं कोटा) के कुल 14 रेलवे स्टेशनों के नामों में संशोधन कर उन्हें अब आधिकारिक तौर पर जंक्शन स्टेशन के रूप में अधिसूचित कर दिया गया है। यह अधिसूचना तत्काल प्रभाव से लागू हो गई है। रेलवे ने स्पष्ट किया है कि इन सभी स्टेशनों के पुराने अल्फाबेटिकल (अक्षर) और न्यूमेरिकल (संख्यात्मक) कोड में कोई बदलाव नहीं किया गया है, वह पहले की तरह ही रहेंगे। केवल नाम में जंक्शन शब्द जोड़ा गया है। अल्फाबेटिकल और न्यूमेरिकल कोड यथावत रहेंगे रेल प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि स्टेशनों के अल्फाबेटिकल और न्यूमेरिकल कोड में कोई बदलाव नहीं किया गया है। केवल नाम के साथ 'जंक्शन' शब्द जोड़ा गया है।     पश्चिम मध्य रेलवे के 14 स्टेशनों के नाम में जुड़ा 'जंक्शन'     जबलपुर मंडल के सबसे ज्यादा 8 स्टेशन शामिल     भोपाल मंडल के 3 और कोटा मंडल के 3 स्टेशन अपग्रेड     रेलवे बोर्ड और IRCA की मंजूरी के बाद जारी हुई अधिसूचना     स्टेशन कोड पहले जैसे ही रहेंगे, उनमें कोई बदलाव नहीं     नए रेल रूट और कॉर्ड लाइन शुरू होने के बाद लिया गया फैसला     यात्रियों को सही रूट चुनने और ट्रेनों के संचालन में मिलेगी सुविधा जबलपुर मंडल के ये स्टेशन बने जंक्शन कटनी साउथ → कटनी साउथ जंक्शन (KTES) कटनी मुड़वारा → कटनी मुड़वारा जंक्शन (KMZ) कैमा → कैमा जंक्शन (KMA) सगमा → सगमा जंक्शन (SAGM) बांसापहाड़ → बांसापहाड़ जंक्शन (BNSP) बीना मालखेड़ी → बीना मालखेड़ी जंक्शन (MAKR) कटंगी खुर्द → कटंगी खुर्द जंक्शन (KTKD) कछपुरा → कछपुरा जंक्शन (KEQ)   भोपाल मंडल के ये स्टेशन बने जंक्शन तलवड़िया → तलवड़िया जंक्शन (TLV) रूठियाई → रूठियाई जंक्शन (RTA) संत हिरदाराम नगर → संत हिरदाराम नगर जंक्शन (SHRN) नई रेल लाइनों और बेहतर कनेक्टिविटी को देखते हुए 14 स्टेशनों को “जंक्शन” का दर्जा दिया गया है। इससे रेल संचालन और यात्रियों की सुविधा बेहतर होगी रेलवे अधिकारी, पश्चिम मध्य रेल विभाग कोटा मंडल के ये स्टेशन बने जंक्शन गंगापुर सिटी → गंगापुर सिटी जंक्शन (GGC) रामगंज मंडी → रामगंज मंडी जंक्शन (RMA) गुड़ला → गुड़ला जंक्शन (GQL) रेलवे अधिकारियों के मुताबिक, स्टेशनों को जंक्शन का दर्जा मिलने से ट्रेनों के सुचारू संचालन, नए रेल रूट के बेहतर प्रबंधन और यात्रियों को सही यात्रा मार्ग चुनने में काफी आसानी होगी। इसके साथ ही भविष्य में इन स्टेशनों पर सुविधाओं के विस्तार की संभावनाएं भी बढ़ जाएंगी। मालखेड़ी से जाती हैं चार दिशाओं में ट्रेनें मालखेड़ी स्टेशन जो अब जंक्शन है, यहां से चार दिशाओं में ट्रेनें चलती हैं, यहां से सीधे कटनी, झांसी, आगरा, मथुरा दिल्ली, गुना, कोटा अजमेर व भोपाल, इटारसी, मुंबई की ओर ट्रेनें चलती हैं। स्टेशन पर सुविधाओं के अभाव में अभी सिर्फ 24 ट्रेनों का स्टॉपेज है, जबकि यहां पर करीब 36 से अधिक ट्रेनें निकलती हैं, जिनमें से कई ट्रेनों का स्टॉपेज यहां पर नहीं है। अब लोगों को उम्मीद है कि सभी ट्रेनें यहां पर रुकेंगी और रिजर्वेशन टिकट काउंटर, पर्याप्त स्टॉल सहित अन्य सुविधाओं में विस्तार किया जाएगा। सुविधाएं बढ़ने से यात्रियों को परेशनियों से निजात मिलेगी। अभी सड़क, प्रकाश मूलभूत सुविधाओं की कमी है।

SC का बड़ा फैसला, रेलवे पर ₹15 हजार करोड़ का सरचार्ज बरकरार; पुरानी दलील नहीं आई काम

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने देश के सबसे बड़े बिजली उपभोक्ताओं में से एक भारतीय रेलवे को बड़ा वित्तीय झटका दिया है. अदालत ने साफ किया है कि रेलवे बिजली कानून के तहत कोई विशेष दर्जा पाने का हकदार नहीं है. उसे अन्य औद्योगिक इकाइयों की तरह ही अपनी बिजली खपत पर सभी तरह के सरचार्ज देने होंगे. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने रेलवे की आठ अपीलों को पूरी तरह खारिज कर दिया है. कोर्ट ने विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण के पुराने फैसले को सही ठहराया है. इस फैसले से राज्यों की बिजली वितरण कंपनियों को बड़ी राहत मिली है, लेकिन रेलवे के बजट पर इसका बहुत बुरा असर पड़ने की आशंका है।  रेलवे पर क्यों फूटा 15,000 करोड़ रुपये का वित्तीय बम? भारतीय रेलवे हर साल करीब 33 अरब यूनिट से ज्यादा बिजली का इस्तेमाल करती है. इस बड़े फैसले के बाद रेलवे को बैकडेटेड एरियर यानी पुराना बकाया भी चुकाना होगा. राज्यों के हिसाब से यह क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज 50 पैसे से लेकर 2.5 रुपये प्रति यूनिट तक है।  सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों की डिस्कॉम कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे रेलवे के ओपन एक्सेस इस्तेमाल की अवधि और क्षेत्र के हिसाब से बकाया राशि का आकलन करें. रेलवे के आंतरिक अनुमानों के अनुसार यह कुल बकाया राशि कम से कम 15,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है. यह रकम रेलवे के चालू वित्त वर्ष के बजट को पूरी तरह बिगाड़ सकती है।  10 साल पुराने कानूनी दांवपेंच में कहां मात खा गई रेलवे?     रेलवे साल 2015 से अदालत में यह दलील दे रही थी कि वह एक ‘डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी’ है. इस रणनीति के पीछे रेल मंत्रालय और ऊर्जा मंत्रालय का साल 2014 का एक पत्र था।      रेलवे का दावा था कि रेलवे एक्ट 1989 की धारा 11 के तहत उसे खुद का बिजली नेटवर्क और डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम बनाने का अधिकार प्राप्त है. इसलिए वह ग्रिड से सीधे बिजली लेते समय किसी भी तरह का सरचार्ज देने के लिए उत्तरदायी नहीं है।      सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि कानूनन डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी होने के लिए दूसरों को बिजली बेचना जरूरी है, जबकि रेलवे पूरी बिजली खुद ही कंज्यूम करती है।  रेलवे डिस्ट्रीब्यूटर है या सिर्फ एक कंज्यूमर? सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी पहलुओं को स्पष्ट करते हुए कहा कि रेलवे का पूरा ओवरहेड इक्विपमेंट और ट्रैक्शन सबस्टेशन उसका आंतरिक सिस्टम है. यह कोई पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम नहीं है. बिजली कानून के तहत लाइसेंसी कहलाने के लिए दो शर्तें पूरी होनी चाहिए।      पहली शर्त यह कि आपके पास डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम हो.     दूसरी यह कि आप किसी तीसरे पक्ष को बिजली की सप्लाई करते हों. रेलवे जो भी बिजली खरीदती है, उसका इस्तेमाल केवल इंजनों, सिग्नलों और स्टेशनों को चलाने में होता है. वह इसे किसी बाहरी उपभोक्ता को नहीं बेचती है. इसी आधार पर कोर्ट ने रेलवे को बिजली कानून की धारा 2(15) के तहत सिर्फ एक कंज्यूमर माना है।  क्या अब फेल हो जाएगी रेलवे की महा-बचत योजना? रेलवे बोर्ड के पूर्व सदस्य मोहम्मद जमशेद के अनुसार, इस अदालती आदेश में रेलवे की पूरी वित्तीय बचत को खत्म करने की क्षमता है. रेलवे ने साल 2015 के आसपास एक बड़ी नीतिगत पहल शुरू की थी. इसके तहत ओपन एक्सेस से सस्ती बिजली खरीदकर एक दशक में 41,000 करोड़ रुपये से ज्यादा बचाने का लक्ष्य था. यह नया फैसला उस पूरी योजना पर पानी फेर सकता है।  रेलवे ने अपने ब्रॉड-गेज नेटवर्क का लगभग 100% इलेक्ट्रिफिकेशन पूरा कर लिया है. इस मिशन पर करीब 46,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं. डीजल पर निर्भरता कम करने और पर्यावरण को बचाने की यह मुहिम अब ओपन एक्सेस मार्केट के महंगे सरचार्ज के जाल में फंस गई है। 

MP में रेलवे का मेगा प्रोजेक्ट, 4329 करोड़ की चौथी लाइन से भोपाल-इटारसी सफर होगा और तेज

भोपाल   मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से बीना के बीच जल्द ही ट्रेनों की रफ्तार बढ़ने जा रही है. इटारसी भोपाल बीना के बीच बनने जा रही चौथी रेल लाइन के काम ने तेजी पकड़ ली है. चौथी रेल लाइन को केन्द्रीय बजट में स्वीकृति मिलने के बाद इसके सर्वे का काम पूरा हो गया है. रेल्वे अधिकारियों के मुताबिक इसके लिए टेंडर प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है, जो जल्द ही पूरी कर ली जाएगी. 237 किलोमीटर लंबे रूट की इस परियोजना के लिए केन्द्र सरकार द्वारा 100 करोड़ का बजट भी आवंटित कर दिया गया है।  237 किलोमीटर रूट पर बनेंगे 39 बड़े पुल इटारसी भोपाल बीना तीनों बड़े जंक्शन हैं, जो देश के अलग-अलग हिस्सों को रेल लाइन से जोड़ते हैं. तीनों बड़े स्टेशनों के बीच कुल लंबाई 237 रूट किलोमीटर है. इन रूट पर लगातार यात्री गाड़ियों और मालगाड़ियों के संचालन का दबाव बढ़ रहा है. इसको देखते हुए इटारसी से बीना तक चौथी रेल लाइन का काम शुरू होने जा रहा है. इस परियोजना के पूरे होने के बाद ट्रेन 9 सुरंगों से होकर गुजरेगी. इसके अलावा 4 महत्वपूर्ण पुलों का भी निर्माण किया जाएगा।  4329 करोड़ होंगे खर्च इस रूट में 39 बड़े पुल, 151 छोटे पुल, 43 रोड ओवर ब्रिज और 39 रोड अंडर ब्रिज का निर्माण किया जाएगा. इस परियोजना की कुल अनुमानित लागत 4329 करोड़ रुपए हैं. परियोजना के लिए समय सीमा 4 साल निर्धारित की गई है।  रेल रूट से जुड़ेगी हेरीटेज साइट चौथी रेल लाइन का काम पूरा होने से मध्यप्रदेश और आसपास के दूसरे राज्यों के प्रमुख हेरीटेज साइज और ईकोटूरिज्म साइट की कनेक्टीविटी और बेहतर होगी. खासतौर से वर्ल्ड हेरीटेज साइट सांची, भीमबेटिका, सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के अलावा दूसरे कई टूरिस्ट स्पॉट्स तक पहुंचना और आसान हो जाएगा. यह नया रेल कॉरिडोर इटारसी से शुरू होकर भोपाल होते हुए बीना तक जाएगा. इस रूट पर सीहोर, भोपाल, विदिशा, रायसेन, सागर जिले सीधे तौर से जुड़ेंगे।  उत्तर से दक्षिण भारत की कनेक्टिविटी और बेहतर होगी इस रेल लाइन का काम पूरे होने से ट्रेफिक का दबाव कम होगा ओर ट्रेनों की रफ्तार बढ़ेगी. भोपाल रेल मंडल के डीसीएम नवल अग्रवाल ने बताया, '' इस परियोजना के पूरे होने से 15.2 मिलियन टन अतिरिक्त माल ढुलाई की क्षमता सालाना विकसित होगी. इसका फायदा क्षेत्र में उद्योग और लॉजिस्टिक को मिलेगा. इस रूट पर 25 जोड़ी यात्री ट्रेनों के अलावा करीबन 200 मालगाड़ियों का संचालन और बढ़ेगा. इस परियोजना को चार चरणों में पूरा किया जा रहा है. पहला बीना से सुमेर, दूसरा सुमेर से रानी कमलापति स्टेशन, तीसरा रानीकमलापति रेल्वे स्टेशन से बरखेड़ा और बरखेड़ा से इटारसी तक रहेगा. इसके लिए भूमि अधिग्रहण काम चल रहा है। 

हेरिटेज शिमला रेल कार का आधुनिक अवतार, इमरजेंसी में भी नहीं थमेगी सुरक्षा

कालका   वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल कालका शिमला रेल मार्ग पर चलने वाली रेल मोटर कार का सफर और सुहाना और सुरक्षित होने जा रहा हैं। इंग्लैंड से 1927 में आई रेल कार में लगने वाले वैक्यूम ब्रेक सिस्टम को रेलवे ने कहा बाय-बाय कह दिया है। अब एयर ब्रेक सिस्टम का प्रयोग किया है। इसके ट्रायल भी सफल हो गए हैं। बस अब इस रेल कार को चलाने के लिए रेल मंत्रालय की ओर से हरी झंडी का इंतजार हैं। पुराना ब्रेक सिस्टम आपात स्थिति में ज्यादा प्रभावी नहीं माना जाता था। रेलवे को नए प्रयोग की आवश्यता महसूस हुई। लंबे परीक्षण के बाद रेल कार में एयर ब्रेक सिस्टम को लगाया गया है, जोकि आपात स्थिति में ज्यादा प्रभारी होगी। इससे सैलानियों का सफर ज्यादा सुहाना होगा और सुरक्षित होगा। कालका-शिमला रेल मार्ग पर टाॅय ट्रेन की शुरुआत वर्ष 1903 में हुई थी और उस वक्त स्टीम इंजन इस ट्रेक पर चलते थे। टाॅय ट्रेन से शिमला तक पहुंचने में करीब साढ़े पांच घंटों का समय लगता है। अंग्रेजों ने इस मार्ग पर रेल सेवा को ज्यादा आरामदायक बनाने और समय की बचत के लिए वर्ष 1927 में रेल कार सेवा का प्रारंभ की थी। समय के साथ नैरो गेज पटरी पर रेल कार सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र बनने लगी,जिससे रेल कार ने कम ही समय में देश और विदेशों में अपनी खास पहचान बनाई,जिसके चलते सैलानियों में रेल मोटर कार का जादू सिर चढ़कर बोलने लगा। रेल कार-टाॅय ट्रेन में अंतर टाॅय ट्रेन में छह डब्बे होते हैं। वर्तमान में रोजाना छह टाॅय ट्रेन कालका से शिमला जा रही है और उतनी ही वापस आ रही है। टाॅय ट्रेन शिमला तक जाने में 5.30 घंटे का समय लेती है। रेल कार में एक ही डिब्बा होता हैं। यानी ट्रेन ड्राइवर और यात्री एक साथ बैठते हैं। इसमें 12 व्यक्ति बैठ सकते हैं। ऑन डिमांड चलने वाली रेल कार चार घंटे में शिमला का सफर तय करती हैं। डेढ़ घंटे का समय बचता है। चार रेल मोटर कार वर्ष 1927 में शुरू हुई रेल कार सेवा अपनी तरह की एक खास सेवा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षो से यह रेलवे विभाग के लिए मानो मुसीबत भी बनी हुई है। रेल कार की रिपेयर के लिए पार्ट उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। तकनीकी खामियों के चलते रेल कार कार को ट्रैक पर चलाए रखना विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती है। रेलवे विभाग के पास फिलहाल चार रेल मोटर कार है, जिसमें दो की हालत ज्यादा ठीक नहीं मानी जा सकती है, जिससे रेल कार को रेगुलर चलाने की बजाय आन डिमांड ही चलाया जा रहा है।  

रेलवे कर्मियों की बढ़ी सैलरी: DA में इजाफा, जल्द खाते में आएगा 4 माह का एरियर

नई दिल्‍ली भारतीय रेलवे के कर्मचारियों के लिए गुड न्‍यूज आई है. रेलवे बोर्ड ने भी महंगाई भत्ते (DA) और महंगाई राहत (DR) में 2 फीसदी की बढ़ोतरी कर दिया है. यह वृद्धि 1 जनवरी 2026 से प्रभावी होगी. इसका मतलब हुआ की कर्मचारियों को चार महीने का एरियर मिलेगा. इस बढ़ोतरी के साथ ही डीए अब 58% से बढ़कर 60% हो गया है। इसका बढोतरी का लाभ सभी कार्यरत रेलवे कर्मचारियों, पेंशनभोगियों और फैमिली पेंशनभोगियों को मिलेगा जो 7वें वेतन आयोग के दायरे में आते हैं. उम्मीद है कि मई महीने की सैलरी और पेंशन में बढ़ी हुई दरें और बकाया राशि जुड़कर आएगी, जिससे कर्मचारियों के हाथ में आने वाला पैसा बढ़ जाएगा। साल में दो बार होता है DA में बदलाव महंगाई भत्ते में साल में दो बार संशोधन किया जाता है. पहला 1 जनवरी से और दूसरा 1 जुलाई से. डीए में बदलाव ऑल इंडिया कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (AICPI) के आंकड़ों के आधार परकिया जाता है ताकि महंगाई के असर को कम किया जा सके. अप्रैल में ने केंद्र सरकार के सभी कर्मचारियों के डीए में भी 2% की बढ़ोतरी हुई थी। 12 लाख को फायदा भारतीय रेलवे देश के सबसे बड़े नियोक्ताओं में से एक है. इस फैसले से करीब 12 लाख कर्मचारियों और पेंशनर्स को फायदा होगा और उनका वेतन वेतन बढ़ेगा। रेलवे पेंशनर्स को कितना फायदा होगा? रेल मंत्रालय के 7 मई 2026 के आदेश के मुताबिक, रेलवे पेंशनर्स और फैमिली पेंशनर्स को मिलने वाला DR अब बेसिक पेंशन का 60 फीसदी मिलेगा. इससे लाखों रिटायर्ड कर्मचारियों की मासिक आय बढ़ जाएगी.यह बढ़ोतरी अलग-अलग पेंशन स्तरों पर प्रभावी रूप से लागू होगी। यहां आसान भाषा में समझें कि आपके पेंशन लेवल के हिसाब से आपकी मंथली इनकम कितनी बढ़ जाएगी….     अगर किसी पेंशनर की बेसिक पेंशन 10,000 रुपये है, तो पहले उसे 58 फीसदी DR के हिसाब से कुल 15,800 रुपये मिलते थे. अब 60 फीसदी DR लागू होने के बाद उसे हर महीने 16,000 रुपये मिलेंगे. यानी हर महीने 200 रुपये का सीधा फायदा होगा.     ₹20,000 बेसिक पेंशन पाने वालों की पेंशन अब ₹31,600 से बढ़कर ₹32,000 हो जाएगी. इससे हर महीने ₹400 का फायदा होगा.     अगर बेसिक पेंशन 30,000 रुपये है, तो 2 फीसदी DR बढ़ने से उसकी मासिक पेंशन में करीब 600 रुपये की बढ़ोतरी होगी.     ₹40,000 बेसिक पेंशन वालों की पेंशन अब ₹63,200 से बढ़कर ₹64,000 हो जाएगी. इससे ₹800 महीने का फायदा होगा.     अगर बेसिक पेंशन ₹50,000 है, तो अब कुल पेंशन ₹79,000 से बढ़कर ₹80,000 हो जाएगी. यानी हर महीने ₹1,000 ज्यादा मिलेंगे.     ₹60,000 बेसिक पेंशन पाने वाले पेंशनर्स को अब ₹94,800 की जगह ₹96,000 मिलेंगे. इससे हर महीने ₹1,200 का फायदा होगा.     वहीं ₹70,000 बेसिक पेंशन वाले पेंशनर्स की कुल पेंशन अब ₹1,10,600 से बढ़कर ₹1,12,000 हो जाएगी. यानी हर महीने ₹1,400 की बढ़ोतरी होगी. कब से लागू होगी नई DR दर? सरकार ने साफ किया है कि DR में यह 2 फीसदी बढ़ोतरी 1 जनवरी 2026 से प्रभावी मानी जाएगी. इसका मतलब यह है कि रेलवे पेंशनर्स और फैमिली पेंशनर्स को बढ़ी हुई पेंशन के साथ पिछले महीनों का एरियर भी दिया जाएगा. एरियर जल्द ही उनके खातों में आ जाएगा। केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स का भी DA- DR बढ़ा 18 अप्रैल 2026 को पीएम नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए अतिरिक्त DA और DR किस्त को मंजूरी दी थी. इसके तहत DA और DR को 58 फीसदी से बढ़ाकर 60 फीसदी किया गया है. सरकार का कहना है कि यह फैसला बढ़ती महंगाई से राहत देने के लिए लिया गया है.

शंभू ब्लास्ट के बाद रेलवे सुरक्षा पर हाई अलर्ट, संवेदनशील इलाकों में बढ़ी पेट्रोलिंग

 चंडीगढ़  पंजाब में रेलवे ट्रैक आतंकियों के निशाने पर है। सोमवार रात पटियाला के शंभू में डेडिकेटेड फ्रेट कारिडोर (डीएफसी) के ट्रैक पर हुए ब्लास्ट ने इस खतरे को और गहरा कर दिया है। सुरक्षा एजेंसियां इसे एक बड़े पैटर्न के तौर पर देख रही हैं, जिसमें रेलवे नेटवर्क को लगातार निशाना बनाने की कोशिशें सामने आ रही हैं। इससे पहले रेलवे ट्रैक के आसपास सोलर सीसीटीवी कैमरे कैमरे लगाए जाने के मामले सामने आए थे। पांच कैमरे पंजाब में लगे थे। एक पठानकोट व एक कपूरथला में बरामद किया था, लेकिन जालंधर मोगा व पटियाला में लगे तीन कैमरों का पता नहीं। जांच में पता चला था कि इनका इस्तेमाल जासूसी और ट्रैक की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किया जा रहा था। हाल ही में लखनऊ एटीएस (एटीएस) की ओर से भी एक ऐसे नेटवर्क का खुलासा किया गया, जो अलग-अलग इलाकों में रेलवे ट्रैक के आसपास आगजनी जैसी घटनाओं को अंजाम देता था। जांच एजेंसियों का मानना है कि इस तरह की गतिविधियां बड़े हमलों की तैयारी का हिस्सा हो सकती हैं। पिछले दो वर्षों के दौरान कई घटनाएं आई सामने पंजाब में पिछले दो वर्षों के दौरान भी कई घटनाएं सामने आई हैं। 23 जनवरी 2026 में सरहिंद के पास डेडिकेटेड फ्रेट कारिडोर (डीएफसी) रेलवे ट्रैक पर धमाका हुआ था, जिसमें करीब 60 फीट पटरी क्षतिग्रस्त हुई थी। वहीं, 2024 और 2025 में कई बार रेलवे ट्रैक पर लोहे की सरिया या अन्य वस्तुएं रखकर ट्रेन को पटरी से उतारने की कोशिशें हुईं थीं। विशेषज्ञों का कहना है कि रेलवे ट्रैक, खासकर मालगाड़ियों के रूट, देश की सप्लाई चेन की रीढ़ हैं। कोयला, खाद, अनाज और औद्योगिक सामान की ढुलाई इन्हीं रास्तों से होती है। ऐसे में इनको नुकसान पहुंचाने की कोशिश सीधे तौर पर आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती है। संवेदनशील इलाकों में पेट्रोलिंग बढ़ी फिलहाल रेलवे, आरपीएफ और राज्य पुलिस ने संवेदनशील इलाकों में पेट्रोलिंग बढ़ा दी है। निगरानी के लिए तकनीकी सर्विलांस और खुफिया इनपुट पर खास ध्यान दिया जा रहा है। फिर भी ऐसे षड्यंत्रों को समय रहते नाकाम करना बड़ी चुनौती है। पंजाब में रेलवे ट्रैक को उड़ाने की लगातार धमकियां मिल रही थीं। गत 24 अप्रैल को भी पटियाला, बठिंडा, लुधियाना व अमृतसर में ईमेल पर बम से रेलवे ट्रैक उड़ाने की धमकी मिली थी। तीन दिन बाद शंभू में ब्लास्ट की घटना हो गई।  

होशियारपुर में सरपंच का अनोखा कदम, रेलवे ने नहीं दिया गेटमैन तो खुद दिखाते हैं ट्रेन को हरी झंडी

होशियारपुर  गढ़शंकर के गांव बसियाला के सरपंच गुरदेव सिंह बिना गार्ड वाले रेलवे क्रॉसिंग पर एक अनौपचारिक गेटमैन की भूमिका निभा रहे हैं। सरपंच गुरदेव सिंह खुद मोर्चा संभालते हुए फाटक खोलते और बंद करते हैं। रेलवे विभाग ने अब तक फाटक पर कोई कर्मचारी तैनात नहीं किया है, जिसके कारण सरपंच को यह जिम्मेदारी उठानी पड़ रही है। इस स्थिति के चलते गांववासियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है और दुर्घटना का खतरा बना हुआ है। सरपंच गुरदेव सिंह ने कहा कि मुझे डर है कि कभी भी किसी बड़े हादसे का सामना करना पड़ सकता है। रेलवे फाटक पर कर्मचारियों की तैनाती न होने के कारण मुझे खुद फाटक खोलने और बंद करने का काम करना पड़ता है। हमने कई बार अधिकारियों से इस मामले में मदद मांगी है, लेकिन अब तक कोई हल नहीं निकला। हमें एक रास्ता यहां से रेलवे ने दिया है जो नवांशहर के गांव मुबारिकपुर में निकलता है। जबकि हमारे गांव बसियाला व रसूलपुर गढ़शंकर में पड़ते है। इसके अलावा यह रास्ता दोपहर और शाम के समय महिलाओं के अकेले आने जाने के लिए तो खतरनाक है। गन्ने की ट्रॉलियां भी इस रास्ते से नहीं निकल सकती। गांव वासियों के फाटक पर पहले एक व्यक्ति दस हजार सैलरी पर रखा था। वह भी काम छोड़ गया। उसके बाद से मैं खुद ही फाटक खोलने बंद करने का काम करता हूं।  ग्रामीणों ने चंदा इकठ्ठा कर लगवाया फाटक फाटक नहीं होने पर ग्रामीणों ने खुद चंदा इकट्ठा कर फाटक लगवाया, ताकि आने-जाने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके. इसके बावजूद कई बार रेलवे अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से यहां कर्मचारी तैनात करने की मांग की गई और इसके लिए ज्ञापन भी दिए गए, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. कुछ समय के लिए ग्रामीणों ने एक व्यक्ति को मासिक वेतन पर रखा भी, लेकिन कुछ ही समय बाद वह काम छोड़कर चला गया।  सरपंच में खुद संभाली जिम्मेदारी इसके बाद सरपंच गुरदेव सिंह ने खुद यह जिम्मेदारी संभाल ली. वह दिन में दो बार, जब ट्रेन आने का समय होता है. अपनी दुकान छोड़कर फाटक पर पहुंचते हैं. पहले वह मुबारकपुर के रेलवे स्टाफ से फोन पर ट्रेन की जानकारी लेते हैं, फिर समय पर फाटक बंद कर देते हैं और हाथ में हरी झंडी लेकर ट्रेन को सुरक्षित गुजरने का संकेत देते हैं।  न हो कोई हादसा इसलिए खुद ली जिम्मेदारी गुरदेव सिंह का कहना है कि उन्हें हमेशा इस बात का डर रहता है कि कहीं लापरवाही के कारण कोई बड़ा हादसा न हो जाए, इसलिए उन्होंने इसे अपनी नैतिक जिम्मेदारी मान लिया है. गांव के लोग भी उनके इस प्रयास की सराहना कर रहे हैं।  गांववासियों का कहना है कि यह रास्ता महिलाओं और बच्चों के लिए भी खतरनाक हो सकता है, खासकर जब वे अकेले इस रास्ते से गुजरती हैं। गांववासियों ने बार-बार विभिन्न नेताओं और अधिकारियों को ज्ञापन देकर रेलवे से इस फाटक पर कर्मचारी तैनात करने की मांग की है, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। पहले रेलवे ने इस रास्ते को बंद कर दिया था, लेकिन गांववासियों के संघर्ष के बाद इसे फिर से खोला गया। हालांकि, फाटक पर कर्मचारियों की तैनाती अभी तक नहीं की गई है। पूर्व सांसद अविनाश राय खन्ना ने हाल ही में केंद्रीय राज्य रेलवे मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू से मिलकर इस समस्या का समाधान करने की अपील की थी। बिट्टू ने आश्वासन दिया था कि जल्द ही इस मामले में कार्रवाई की जाएगी और एक टीम भेजकर कर्मचारी तैनात किया जाएगा। गांववासियों की मांग है कि रेलवे विभाग शीघ्र इस समस्या का समाधान करें और फाटक पर सुरक्षा के लिए कर्मचारी तैनात करें, ताकि किसी बड़े हादसे से बचा जा सके।

रेलवे ने मंजूरी दी 15 समर स्पेशल ट्रेनों को, भोपाल, जबलपुर और कोटा डिवीजन में बढ़ेगा यात्री लाभ

भोपाल  गर्मियों के मौसम में बढ़ने वाली यात्रियों की भीड़ को देखते हुए पश्चिम मध्य रेलवे ने इस बार पहले से व्यापक तैयारी की है। 15 अप्रैल से 15 जुलाई तक चलने वाले समर स्पेशल ट्रेनों के प्लान के तहत यात्रियों को अतिरिक्त सुविधा मिलेगी। रेलवे का उद्देश्य भीड़ को नियंत्रित करना और लंबी दूरी की यात्रा को अधिक सुगम बनाना है। रेलवे द्वारा तैयार योजना के अनुसार कुल 15 समर स्पेशल ट्रेनें चलाई जाएंगी, जिनके जरिए 288 ट्रिप्स संचालित होंगे। इनमें से पांच ट्रेनों को पहले ही मंजूरी मिल चुकी है, जबकि 10 नई ट्रेनों का प्रस्ताव रेलवे बोर्ड को भेजा गया है। भोपाल, जबलपुर और कोटा को बड़ा फायदा इस योजना का सबसे अधिक लाभ भोपाल, जबलपुर और कोटा डिवीजन के यात्रियों को मिलेगा। इन शहरों से देश के प्रमुख महानगरों और पर्यटन स्थलों के लिए सीधी कनेक्टिविटी बेहतर होगी। दक्षिण भारत के मैसूर और कोयंबटूर जैसे शहरों के लिए सीधी ट्रेन सुविधा मिलने से यात्रियों को बड़ी राहत मिलेगी। हर दिन हजारों यात्रियों को राहत रेलवे अधिकारियों के मुताबिक, इस व्यवस्था से प्रतिदिन करीब पांच से सात हजार यात्रियों को लाभ मिलेगा। गर्मियों में उत्तर भारत से महाराष्ट्र, दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर क्षेत्रों की ओर जाने वाले यात्रियों की संख्या अधिक रहती है, जिसे ध्यान में रखते हुए यह योजना बनाई गई है। 10 नई ट्रेनों का प्रस्ताव तैयार रेलवे ने 10 नई समर स्पेशल ट्रेनों का प्रस्ताव भी तैयार किया है, जिनके जरिए 158 अतिरिक्त ट्रिप्स संचालित करने की योजना है। इनमें रानी कमलापति से मैसूर, जबलपुर से येलहंका और कोटा से मथुरा व धनबाद के लिए ट्रेनें शामिल हैं। कुछ ट्रेनें साप्ताहिक होंगी, जबकि कुछ सप्ताह में दो बार चलाई जाएंगी। यात्रा होगी आसान और सुविधाजनक रेलवे का मानना है कि इन अतिरिक्त ट्रेनों से यात्रियों को कन्फर्म टिकट मिलने में आसानी होगी और वेटिंग की समस्या कम होगी। इससे सफर अधिक आरामदायक और व्यवस्थित बन सकेगा।

रेलवे ने कबाड़ बेचकर ₹6,800 करोड़ की कमाई की, 168% की वृद्धि से तोड़े सभी रिकॉर्ड

नई दिल्ली  भारतीय रेलवे ने अपनी वित्तीय सुदृढ़ता की दिशा में एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है. वित्त वर्ष 2025-26 के समापन पर जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, राष्ट्रीय ट्रांसपोर्टर ने स्क्रैप (कबाड़) की बिक्री से कुल 6,813.86 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया है. यह आंकड़ा रेल मंत्रालय द्वारा निर्धारित 6,000 करोड़ रुपये के वार्षिक लक्ष्य से लगभग 13.5 प्रतिशत अधिक है।  लगातार दूसरे वर्ष लक्ष्य से अधिक प्रदर्शन रेलवे की यह सफलता कोई आकस्मिक घटना नहीं है, बल्कि यह संसाधनों के कुशल मुद्रीकरण की दिशा में चल रहे व्यवस्थित प्रयासों का परिणाम है. पिछले वित्त वर्ष (2024-25) में भी रेलवे ने 5,400 करोड़ रुपये के लक्ष्य के मुकाबले 6,641.78 करोड़ रुपये की कमाई की थी. अधिकारियों के अनुसार, अनुपयोगी रेल पटरियों, पुराने इंजनों, कोचों और वैगनों के पारदर्शी ई-ऑक्शन के कारण राजस्व में यह निरंतर वृद्धि देखी जा रही है।  गैर-किराया राजस्व (NFR) में 168% की भारी वृद्धि रेलवे के लिए स्क्रैप की बिक्री न केवल आय का स्रोत बनी है, बल्कि इसने गैर-किराया आय) को भी मजबूती दी है. रिपोर्ट के अनुसार, विज्ञापन, स्टेशन पुनर्विकास और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों से होने वाली आय वित्त वर्ष 2021-22 के 290 करोड़ रुपये से बढ़कर अब 777.76 करोड़ रुपये हो गई है. यह पांच वर्षों में लगभग 168 प्रतिशत की शानदार वृद्धि है. इस वर्ष के लिए NFR का लक्ष्य 720.85 करोड़ रुपये रखा गया था, जिसे रेलवे ने सफलतापूर्वक पार कर लिया है।  बिना टिकट यात्रियों से वसूले 148 करोड़ रुपये बिना टिकट यात्रा करने वालों पर सख्ती बढ़ाकर 148 करोड़ रुपये वसूल किए गए हैं. माल ढुलाई में भी जोन ने 21 मिलियन टन से ज्यादा माल पहुंचाकर नया रिकॉर्ड बनाया है। उत्तर मध्य रेलवे के रेलवे यार्ड, वर्कशॉप और ट्रैक के किनारे पड़ी पुरानी लोहे की चीजें, पुराने सामान और बेकार माल को नीलामी के जरिए बेचा गया, रेलवे ने इसे “कबाड़ से जुगाड़” का नाम दिया है. इस अभियान से सिर्फ पैसे ही नहीं आए, बल्कि रेलवे के स्टेशन और यार्ड साफ-सुथरे भी हो गए हैं।  इसके अलावा, रेलवे ने बिना टिकट यात्रा पर बड़ी सख्ती की. विशेष टिकट चेकिंग ड्राइव चलाकर बिना टिकट यात्रा करने वालों से 148 करोड़ रुपये से ज्यादा का जुर्माना वसूला गया. अब रेलवे नियम तोड़ने वालों पर नजर रखने की व्यवस्था और मजबूत कर दी गई है।  पर्यावरण और संचालन को लाभ स्क्रैप मुद्रीकरण की इस प्रक्रिया ने न केवल खजाने को भरा है, बल्कि परिचालन दक्षता में भी सुधार किया है. यार्डों, वर्कशॉप और डिपो में सालों से पड़े कबाड़ के हटने से बहुमूल्य जगह खाली हुई है, जिससे रेलवे परिसरों में सुरक्षा और स्वच्छता बढ़ी है. साथ ही, स्क्रैपिंग और रीसाइक्लिंग के माध्यम से रेलवे अपने पर्यावरणीय लक्ष्यों (Waste-to-Wealth) को भी पूरा कर रहा है।  यात्रियों पर बिना बोझ डाले ढांचागत विकास सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस अतिरिक्त आय का उपयोग रेल बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण के लिए किया जाएगा. टिकट की दरों में वृद्धि किए बिना यात्रियों को बेहतर सुविधाएं, जैसे आधुनिक स्टेशन आउटलेट, बेहतर सुरक्षा प्रणालियां और डिजिटल सेवाएं प्रदान की जा रही हैं. वर्तमान में रेलवे नेटवर्क पर 22 प्रीमियम ब्रांडेड आउटलेट्स आवंटित किए जा चुके हैं, जो भविष्य में आय के नए द्वार खोलेंगे।