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सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी का हमला और ऐतिहासिक विनाश की कहानी

  सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में अमृत महोत्सव मनाया गया. सोमनाथ के वैभव का आकर्षण सात दरिया पार तक है, क्योंकि सोमनाथ ज्योतिर्लिंग में स्वयं ही शक्तिशाली चुंबकीय प्रभाव है. आत्मिक ऊर्जा के साथ परमात्मिक शक्ति का चुंबकीय गुण भी इसमें है. तभी तो इस दिव्य मंदिर की संपदा को लूटने का लालच अफगानिस्तान के गजनी के लुटेरे महमूद गजनवी को यहां खींच लाया था. एक हजार साल पहले कड़ाके की ठंड में ऊटों, घोड़ों पर सवार 30 हजार की लुटेरी सेना के साथ वह थार का रेगिस्तान पार कर सोमनाथ पहुंचा था. सन 1026 में जनवरी की शुरुआत थी. गजनवी के लोगों ने सोमनाथ का किला घेर लिया. तीरों से हमले किए. दो दिन तो स्थानीय परमार और चालुक्य राज की सेना ने गजनवी के आक्रांता लुटेरों को खदेड़ दिया. लेकिन तीसरे दिन वो मंदिर में घुसने में कामयाब हो गए. मंदिर के पुजारी और रखवाले छिपकर देख रहे थे कि भगवान सोमनाथ शायद प्रकट होकर आक्रांताओं का संहार कर देंगे. जब पुजारी और रक्षक छुप गए तो सोमनाथ भी शायद अंतर्धान हो गए. हजार साल पहले इस घटनाक्रम के साक्षियों ने कई जगह लिखा और बताया है कि सोमनाथ ज्योतिर्लिंग हवा में झूलता था. इसमें जबरदस्त चुंबकीय शक्ति थी. उसी से तालमेल बिठाते हुए प्राचीन भारतीय वास्तु शिल्पियों ने मंदिर के गर्भगृह की दीवारों और शिखर गुंबद में जगह-जगह समुचित कोण पर शक्तिशाली चुंबक फिट किए थे. गजनवी की सेना जब मार-काट मचाती हुई मंदिर के गर्भगृह में पहुंची तो हवा में लटके ज्योतिर्लिंग को तोड़ने के लिए तलवार लेकर आगे बढ़ी. लेकिन उनकी तलवारें शक्तिशाली ज्योतिर्लिंग से चिपक गईं. यह देखकर गजनवी चौंक गया. उसके एक साथी ने भाला पकड़ाया. जैसे ही उसने भाला उठाया, वो हाथ से छूटकर पीछे दीवार में फिट चुंबक में जाकर चिपक गया. यह देखकर गजनवी की पूरी सेना डर गई. लकड़ी के लट्ठों से ध्वस्त किया शिवलिंग तभी उसके साथ मौजूद आक्रांताओं ने दिमाग लगाया. फिर लकड़ी के भारी भरकम लट्ठों से शिवलिंग ध्वस्त किया गया. गर्भगृह और मंडप की दीवारों पर लगे बेशकीमती पत्थर और हीरे-जवाहरात निकाले गए. दरवाजों पर जड़ा सोना नोंच लिया गया. मंदिर में भगवान सोमनाथ के रत्नजड़ित स्वर्ण छत्र, चंवर, पूजा के बर्तन और खजाने में मौजूद अकूत संपदा लूट ली गई. मंदिर का गर्भगृह अमूमन तीसरे प्रकोष्ठ में होता था. लिहाजा वहां अंधेरा ही रहता था. अंदर प्रज्वलित बड़े दीपक का प्रकाश दीवारों में जड़े रत्नों से परावर्तित होकर पूरे गर्भगृह को रोशन कर देता था. गजनी के लुटेरों ने मंदिर में लगे चंदन के दरवाजे तक उखाड़ लिए, जिन पर सोने के मोटे परतों की नक्काशी थी. मारकाट और लूटपाट के बाद गजनवी की सेना फौरन सोमनाथ से भाग खड़ी हुई. क्योंकि उन्हें अंदेशा था कि चालुक्य और परमार राजा सेना लेकर उसे खदेड़ने कभी भी आ सकते हैं. सोमनाथ और वेरावल के दस हजार से अधिक गांवों, कस्बों और शहरों के लाखों कारोबारी श्रद्धालु मंदिर में बड़ी श्रद्धा से लाभ का निश्चित हिस्सा अपने आराध्य को अर्पित करते थे. गजनवी हजारों ऊंटों पर लादकर वो संपदा ले गया. यह गजनवी का भारत पर अंतिम हमला बताया जाता है, क्योंकि इसके बाद उसके बहुत सारे सैनिक और ऊंट, घोड़े मारे गए. हालांकि गजनी वापस पहुंचने पर गजनवी को वहां के शासक ने कई उपाधियां दी. वहीं, सोमनाथ मंदिर कुछ साल बाद फिर गर्व से सिर उठाए शान से खड़ा हुआ. जैसे अमावस्या के बाद आई पूर्णिमा की रात. सोमनाथ मंदिर को पूरे 17 बार ध्वस्त किया गया. लेकिन मंदिर हर बार ध्वस्त होकर संवरता रहा, क्योंकि यह ज्योतिर्लिंग स्वयं प्रकाश है और जगत प्रकाशक भी. सोमनाथ के शिवलिंग के अवशेष आज कहां है? दिव्य चुंबकीय शक्ति से युक्त सोमनाथ ज्योतिर्लिंग हवा में लटकने वाला ऐसा शिवलिंग था, जिसे स्पर्श नहीं किया जाता था. खंडित होने के हजार साल बाद उस ज्योतिर्लिंग के अवशेष एक बार फिर आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर ने सार्वजनिक किए. दक्षिण भारत के एक श्रद्धालु परिवार ने ठीक हजार साल पहले सुनसान पड़े सोमनाथ मंदिर के गर्भगृह से ज्योतिर्लिंग के बचे हुए अवशेष सहेजकर रख लिए. दक्षिण भारतीय ब्राह्मण परिवार के उन वंशजों ने सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के अंग अवशेषों की हजार साल तक अपने निजी मंदिर में आराधना की. फिर उन्होंने श्री श्री रविशंकर को सौंप दिया. दिल्ली में जब रविशंकर ने इसके दर्शन जनता को कराए तो मैंने साक्षात्कार के दौरान जिज्ञासा की कि सोमनाथ ज्योतिर्लिंग तो चुंबकीय शक्ति से युक्त था. इस पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि हमने भी सबसे पहले यही गुण देखा था. उन्होंने जब चांदी की थाली में रखे लगभग तीन इंच की गोलाई वाले दिव्य शिवलिंग के थोड़ा ऊपर दूसरे शिवलिंग को घुमाया तो थाली में रखा शिवलिंग भी घूमने लगा. फिर उन्होंने थाली के नीचे एक शिवलिंग घुमाया, तब भी वैसा ही दृश्य दिखा यह प्रमाण सिद्ध करने को काफी है कि मूल सोमनाथ ज्योतिर्लिंग कितना दिव्य और शक्तिशाली रहा होगा. साथ ही, मंदिर की दीवारों, ऊंचे गुंबदों और शिखर में प्रयुक्त चट्टानों में किस तरह शक्तिशाली चुंबक फिट कर इस ज्योतिर्लिंग की शक्ति को चैनलाइज किया होगा. कल्पना कीजिए जब दुनिया में ज्ञान का अंधेरा था तो भारतीय स्थापत्य और वस्तु शिल्प कला कितनी उन्नत रही होगी. इसके प्रमाण सिर्फ सोमनाथ मंदिर ही नहीं बल्कि दक्षिण भारत के अनेक मंदिर हैं, जिनमें कहीं खंभे हवा में झूल रहे हैं तो कहीं पत्थर के खंभों और सीढ़ियों पर थाप मारने पर उनसे संगीत के सधे स्वर निकलते हैं.    

चांदनी चौक मंदिर में पूजा-अर्चना, ‘हर हर महादेव’ के जयकारों से गूंजा वातावरण

 नई दिल्ली सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 गौरवशाली वर्ष पूर्ण होने के ऐतिहासिक अवसर पर सोमवार को देश भर में भक्ति और हर्षोल्लास का वातावरण रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर आयोजित इस विशेष उत्सव के क्रम में, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने राजधानी के प्राचीन एवं ऐतिहासिक श्री गौरी शंकर मंदिर (चांदनी चौक) पहुंचकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना और जलाभिषेक किया। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और अटूट श्रद्धा का संगम आज का दिन भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया। एक ओर जहां प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के प्रभास पाटन स्थित सोमनाथ मंदिर में नतमस्तक होकर राष्ट्र की खुशहाली की कामना की, वहीं दिल्ली में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने अपनी कैबिनेट के सहयोगियों के साथ देवाधिदेव महादेव की आराधना की। मुख्यमंत्री ने कैबिनेट मंत्री प्रवेश साहिब सिंह, मनजिंदर सिंह सिरसा और कपिल मिश्रा के साथ भगवान शिव का जलाभिषेक किया। मंदिर परिसर में सोमनाथ मंदिर के मुख्य आयोजन का लाइव प्रसारण देखा गया, जिससे श्रद्धालु वर्चुअली इस भव्य क्षण के साक्षी बने। 'हर हर महादेव' के जयकारों से पूरा चांदनी चौक और मंदिर प्रांगण गुंजायमान हो उठा। विरासत भी, विकास भी पूजा के उपरांत मीडिया से बात करते हुए मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि सोमनाथ मंदिर का इतिहास भारत की अपराजेय जिजीविषा का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि अनगिनत आक्रमणों और विध्वंसों के बावजूद सोमनाथ का बार-बार उठ खड़ा होना यह संदेश देता है कि भारत की सनातन चेतना को कोई पराजित नहीं कर सकता। आज प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में देश 'विकास भी और विरासत भी' के मंत्र पर चल रहा है। इस अवसर पर मुख्यमंत्री के साथ दिल्ली सरकार के वरिष्ठ मंत्री और भारी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। मंत्रियों ने भी इस अवसर को भारत की सांस्कृतिक एकता का महापर्व बताया और सोमनाथ के 75 गौरवशाली वर्षों को आत्मसम्मान का प्रतीक करार दिया।

गुजरात का सोमनाथ मंदिर: क्यों माना जाता है इसे 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम?

गुजरात का सोमनाथ मदिर देवों के देव भगवान शिव शंकर को समर्पित है। यह गुजरात के वेरावल बंदरगाह से कुछ ही दूरी पर प्रभास पाटन में स्थित है। शिव महापुराण में सभी ज्योतिर्लिंगों के बारे में बताया गया है। इस ज्योतिर्लिंग के संबंध में मान्यता है कि सोमनाथ के शिवलिंग की स्थापना खुद चंद्र देव ने की थी। चंद्र देव के द्वारा स्थापित करने की वजह से इस शिवलिंग का नाम सोमनाथ पड़ा है। आइए जानते हैं इस प्रचीन मंदिर से जुड़ी कुछ खास बातें… ऐसा है मंदिर का स्वरूप सोमनाथ मंदिर की ऊंचाई लगभग 155 फीट है। मंदिर के शिखर पर रखे हुए कलश का वजन करीब 10 टन है और इसकी ध्वजा 27 फीट ऊंची और 1 फीट परिधि की है। मंदिर के चारों ओर विशाल आंगन है। मंदिर का प्रवेश द्वार कलात्मक है। मंदिर तीन भागों में विभाजित है। नाट्यमंडप, जगमोहन और गर्भगृह, मंदिर के बाहर वल्लभभाई पटेल, रानी अहिल्याबाई आदि की मूर्तियां भी लगी हैं। समुद्र किनारे स्थित ये मंदर बहुत ही सुंदर दिखाई देता है। ऐसे पड़ा मंदिर का नाम शिवपुराण के अनुसार चंद्र देव ने यहां राजा दक्ष प्रजापति के श्राप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव की तपस्या की थी और उन्हें यहीं ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान रहने की प्रार्थना की थी। बता दें कि सोम, चंद्रमा का ही एक नाम है और शिव को चंद्रमा ने अपना नाथ स्वामी मानकर यहां तपस्या की थी। इसी के चलते ही इस ज्योतिर्लिंग को सोमनाथ कहा जाता है। बाण स्तंभ का अनसुलझा रहस्य मंदिर के दक्षिण में समुद्र के किनारे बाण स्तंभ है, जो बहुत प्राचीन है, लगभग 6वीं शताब्दी से बाण स्तंभ का उल्लेख इतिहास में मिलता है, लेकिन ये कोई नहीं जानता कि इसका निर्माण कब हुआ था, किसने कराया था और क्यों कराया था। जानकार बताते हैं कि बाण स्तंभ एक दिशादर्शक स्तंभ है, जिसके ऊपरी सिरे पर एक तीर (बाण) बनाया गया है। जिसका मुंह समुद्र की ओर है। इस बाण स्तंभ पर लिखा है, आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव, पर्यंत अबाधित ज्योतिमार्ग, इसका मतलब ये है कि समुद्र के इस बिंदु से दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में एक भी अवरोध या बाधा नहीं है। इस पंक्ति का सरल अर्थ यह है कि सोमनाथ मंदिर के उस बिंदु से लेकर दक्षिण ध्रुव तक अर्थात अंटार्टिका तक एक सीधी रेखा खिंची जाए तो बीच में एक भी पहाड़ या भूखंड का टुकड़ा नहीं आता है। अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या उस काल में भी लोगों को ये जानकारी थी कि दक्षिणी ध्रुव कहां है और धरती गोल है? कैसे उन लोगों ने इस बात का पता लगाया होगा कि बाण स्तंभ के सीध में कोई बाधा नहीं है? ये अब तक एक रहस्य ही बना हुआ है। 17 बार हुए थे मंदिर पर आक्रमण सोमनाथ मंदिर का इतिहास बताता है कि समय-समय पर मंदिर पर कई आक्रमण हुए और तोड़-फोड़ की गई। मंदिर पर कुल 17 बार आक्रमण हुए और हर बार मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया। लेकिन मंदिर पर किसी भी कालखंड का कोई प्रभाव देखने को नहीं मिलता। मान्यता है कि सृष्टि की रचना के समय भी यह शिवलिंग मौजूद था ऋग्वेद में भी इसके महत्व का बखान किया गया है।

‘आक्रमणकारी चले गए, आस्था बची रही’— सोमनाथ मंदिर पर पीएम मोदी का बड़ा बयान

सोमनाथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार को गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर में आयोजित सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने 108 अश्वों के साथ निकाली गई भव्य शौर्य यात्रा में भाग लिया। यह यात्रा उन वीर योद्धाओं की स्मृति में निकाली गई, जिन्होंने सोमनाथ मंदिर की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी। यात्रा को साहस, बलिदान और वीरता का प्रतीक बताया गया। शौर्य यात्रा में शामिल होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सोमनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना की और इसके बाद एक विशाल जनसभा को संबोधित किया। सभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वह इसे अपना बड़ा सौभाग्य मानते हैं कि सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष के रूप में उन्हें इस स्वाभिमान पर्व की सेवा का अवसर मिला। उन्होंने देश और दुनिया से जुड़े श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए “जय सोमनाथ” का उद्घोष किया। पीएम मोदी ने कहा कि यह समय, यह वातावरण और यह उत्सव अपने आप में अद्भुत है। एक ओर भगवान महादेव की उपस्थिति, दूसरी ओर समुद्र की लहरें, मंत्रोच्चार की गूंज और भक्तों की आस्था, यह सब मिलकर इस पर्व को दिव्य बना रहा है। प्रधानमंत्री ने कहा कि सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में गौरव, गरिमा और आध्यात्मिक अनुभूति का संगम देखने को मिल रहा है। उन्होंने 72 घंटे तक चले अनवरत ओंकार नाद और मंत्रोच्चार का उल्लेख किया। पीएम मोदी ने बताया कि ड्रोन शो के जरिए सोमनाथ मंदिर के 1000 वर्षों के इतिहास को दर्शाया गया, जिसमें वैदिक गुरुकुलों के विद्यार्थियों ने भाग लिया। उन्होंने कहा कि 108 अश्वों के साथ निकली शौर्य यात्रा, मंत्रों और भजनों की प्रस्तुति अत्यंत भावुक और प्रेरणादायक रही, जिसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। 1000 साल पुराने इतिहास का जिक्र प्रधानमंत्री मोदी ने 1026 ईस्वी में सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले आक्रमण का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय हमारे पूर्वजों ने अपनी आस्था और विश्वास की रक्षा के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया। उन्होंने कहा कि आक्रांता यह सोचते रहे कि उन्होंने सोमनाथ को नष्ट कर दिया, लेकिन हजार साल बाद भी सोमनाथ मंदिर उसी शान से खड़ा है और भारत की शक्ति का प्रतीक बना हुआ है। 'आक्रांता इतिहास बन गए, सोमनाथ आज भी अडिग' : पीएम पीएम मोदी ने कहा कि गजनी से लेकर औरंगजेब तक जिन आक्रांताओं ने सोमनाथ को नष्ट करने की कोशिश की, वे इतिहास के पन्नों में सिमट गए, लेकिन सोमनाथ मंदिर आज भी सागर तट पर अडिग खड़ा है। उन्होंने कहा कि सोमनाथ का अर्थ ही अमरता और शक्ति से जुड़ा है, जो विनाश के बाद भी पुनर्निर्माण का संदेश देता है। सोमनाथ का इतिहास हार नहीं, विजय का है प्रधानमंत्री ने कहा कि सोमनाथ का इतिहास विनाश या पराजय का नहीं, बल्कि विजय और पुनर्निर्माण का इतिहास है। उन्होंने बताया कि यह पर्व केवल विध्वंस की याद नहीं, बल्कि हजार वर्षों की यात्रा और भारत के आत्मसम्मान का प्रतीक है। पीएम मोदी ने यह भी बताया कि यह वर्ष विशेष है, क्योंकि एक ओर सोमनाथ पर पहले हमले के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं, वहीं 1951 में हुए मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष भी पूरे हो रहे हैं। आजादी के बाद मंदिर पुनर्निर्माण का विरोध हुआ था प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आजादी के बाद कुछ लोगों ने सोमनाथ जैसे पवित्र स्थलों से दूरी बनाने की कोशिश की। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ इतिहासकारों और नेताओं ने आक्रांताओं के अत्याचारों को छिपाने का प्रयास किया और धार्मिक हमलों को केवल लूट तक सीमित बताया गया। उन्होंने कहा कि सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा सोमनाथ के पुनर्निर्माण की घोषणा का भी विरोध हुआ था और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के मंदिर आने पर भी आपत्तियां जताई गई थीं। 'आज भी भारत को बांटने की ताकतें सक्रिय' : पीएम पीएम मोदी ने कहा कि जो ताकतें पहले तलवारों से हमला करती थीं, वे आज अलग-अलग रूपों में भारत को कमजोर करने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने कहा कि देश को एकजुट और सतर्क रहकर ऐसी साजिशों का मुकाबला करना होगा। भारत ने दिल जीतने का रास्ता दिखाया प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन के अंत में कहा कि भारत की सभ्यता घृणा नहीं, बल्कि प्रेम और सृजन का मार्ग दिखाती है। भारत ने दुनिया को दूसरों को मिटाकर आगे बढ़ना नहीं, बल्कि लोगों का दिल जीतना सिखाया है। उन्होंने कहा कि सोमनाथ का हजार साल का इतिहास हमें आने वाले हजार वर्षों के लिए भी प्रेरणा देता रहेगा।  

सुधांशु त्रिवेदी का खुलासा, जवाहरलाल नेहरू ने सोमनाथ मंदिर पुनर्निर्माण पर दिखाया था असहमति

नई दिल्ली   भाजपा के राज्यसभा सांसद और प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और सोमनाथ मंदिर को लेकर एक सोशल मीडिया पोस्ट किया है, जिसके बाद से सियासत गर्मा गई है। सुधांशु त्रिवेदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर सिलसिलेवार पोस्ट कर आरोप लगाया कि आजाद भारत में सोमनाथ मंदिर के प्रति सबसे अधिक नकारात्मक रवैया खुद पंडित नेहरू का था। उन्होंने कहा कि जहां इतिहास में सोमनाथ को विदेशी आक्रमणकारियों ने लूटा, वहीं स्वतंत्र भारत में नेहरू ने इसके पुनर्निर्माण और प्रतीकात्मक महत्व को कमजोर करने की कोशिश की। अपने पहले पोस्ट में सुधांशु त्रिवेदी ने दावा किया कि पंडित नेहरू ने 21 अप्रैल 1951 को पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने सोमनाथ मंदिर से जुड़ी ऐतिहासिक कथाओं को “पूरी तरह झूठा” बताया। त्रिवेदी के अनुसार, नेहरू ने इस पत्र में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से इनकार करते हुए पाकिस्तान को आश्वस्त करने की कोशिश की और भारत की सभ्यतागत स्मृतियों के बचाव के बजाय “बाहरी तुष्टीकरण” को प्राथमिकता दी। दूसरे पोस्ट में भाजपा सांसद ने कहा कि पंडित नेहरू सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने आरोप लगाया कि नेहरू ने कैबिनेट मंत्रियों के साथ-साथ तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को भी पत्र लिखकर न सिर्फ पुनर्निर्माण पर सवाल उठाए, बल्कि उद्घाटन समारोह में शामिल न होने की सलाह दी। त्रिवेदी के मुताबिक, नेहरू ने सभी मुख्यमंत्रियों को भी पत्र लिखकर कहा था कि सोमनाथ मंदिर के निर्माण से विदेशों में भारत की छवि खराब हो रही है। साथ ही उन्होंने सूचना एवं प्रसारण मंत्री को प्राण-प्रतिष्ठा समारोह की मीडिया कवरेज कम करने का निर्देश दिया था। तीसरे पोस्ट में सुधांशु त्रिवेदी ने दावा किया कि नेहरू ने भारतीय दूतावासों को सोमनाथ ट्रस्ट को किसी भी तरह की सहायता देने से मना कर दिया था, यहां तक कि पवित्र नदियों से जल मंगाने की मांग भी ठुकरा दी गई। उन्होंने आरोप लगाया कि नेहरू ने राष्ट्रपति के सोमनाथ दौरे के “प्रभाव को कम करने” की कोशिश की और विदेश मंत्रालय के माध्यम से मंदिर से जुड़े प्रतीकात्मक आयोजनों को जानबूझकर सीमित किया। इन सोशल मीडिया पोस्ट के बाद राजनीतिक हलकों में एक बार फिर नेहरू की धर्मनिरपेक्षता, सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण और उस दौर की नीतियों को लेकर बहस तेज हो गई है। कांग्रेस की ओर से अब तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।