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पूर्व विधायक ताहिर हुसैन को झटका, दिल्ली दंगा केस में जमानत नहीं मिली

 नई दिल्ली दिल्ली की एक अदालत ने गुरुवार को 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की साजिश से जुड़े मामले में पूर्व AAP विधायक ताहिर हुसैन, सलीम मलिक और अथर खान की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर बाजपेयी ने तीनों आरोपियों को राहत देने से इनकार कर दिया. न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक तीनों आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसी मामले में पांच अन्य आरोपियों को जमानत दिए जाने के बाद समानता (पैरिटी) के आधार पर जमानत की मांग की थी. हालांकि, अदालत ने उनकी दलीलों को स्वीकार नहीं किया. इन तीनों पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत आरोप लगाए गए हैं. अभियोजन के मुताबिक, इनकी भूमिका 2020 के दंगों की साजिश में अहम रही है. अथर खान, जो पहले एक कॉल सेंटर कर्मचारी रह चुका है, पर आरोप है कि वह उत्तर-पूर्वी दिल्ली के चांद बाग इलाके में हुए विरोध प्रदर्शन के प्रमुख आयोजकों में से एक था. दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के अनुसार, अथर ने वहां भड़काऊ भाषण दिए और कथित तौर पर गुप्त बैठकों में हिस्सा लिया, जिनमें 'दिल्ली जलाने का समय आ गया है' जैसे बयान दिए गए. उस पर सीसीटीवी कैमरों को नष्ट कराने में समन्वय करने का भी आरोप है. वहीं सलीम मलिक पर भी आरोप है कि वह CAA-NRC विरोधी बैठकों के 11 कथित आयोजकों और वक्ताओं में शामिल था. पुलिस के अनुसार, इन आयोजकों में मोहम्मद सलीम खान, सलीम मलिक, मोहम्मद जलालुद्दीन उर्फ गुड्डू भाई, शहनवाज, फुरकान, मोहम्मद अय्यूब, मोहम्मद यूनुस, तबस्सुम, मोहम्मद अयाज और उसका भाई खालिद शामिल थे. गौरतलब है कि 5 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इसी मामले में पांच आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दी थी. हालांकि, शीर्ष अदालत ने जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद और शारजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा था कि उमर खालिद और शारजील इमाम के खिलाफ UAPA के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है और सभी आरोपी एक जैसी स्थिति में नहीं हैं. इस मामले में कुल 20 आरोपियों के नाम सामने आए थे, जिनमें से दो अब भी फरार हैं. शेष 18 में से कई ने पहले जमानत याचिकाएं दायर की थीं. इनमें से सात आरोपी अब भी जेल में बंद हैं, जिनमें उमर खालिद, शारजील इमाम, अथर खान, सलीम मलिक, पूर्व आप पार्षद ताहिर हुसैन, तसलीम अहमद और खालिद सैफी शामिल हैं.

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: कुत्ते के काटने से हुई मौत पर राज्य सरकार को भरना होगा भारी मुआवजा

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने  कहा कि कुत्ते के काटने और किसी बच्चे, बड़े या बूढ़े, कमजोर व्यक्ति की मौत या चोट लगने पर, वह भारी मुआवजा तय कर सकता है, जिसका भुगतान राज्य सरकार करेगी. जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने मामले में सुनवाई की. पीठ ने कहा कि 75 साल से सरकारों ने आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए कुछ नहीं किया. अदालत ने कहा कि वह इस लापरवाही के लिए राज्य सरकारों को जिम्मेदार ठहराना चाहती है. पीठ ने कहा कि "इसके लिए उनसे जवाब तलब करें." जस्टिस नाथ ने कहा, "हर कुत्ते के काटने और बच्चे, बड़े या बूढ़े, कमजोर व्यक्ति की मौत या चोट के लिए, हम सरकार की तरफ से भारी मुआवजा तय कर सकते हैं. पिछले 75 वर्षों से कुछ नहीं किया गया." एक पशु कल्याण संगठन की तरफ से वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा, माय लॉर्ड्स, आपको ऐसा करना चाहिए, आपको बिल्कुल करना चाहिए. जस्टिस नाथ ने कहा, "साथ ही, उन सभी लोगों की जिम्मेदारी और जवाबदेही है जो दावा करते हैं कि वे कुत्तों को खाना खिला रहे हैं… उनकी रक्षा करें, उन्हें घर ले जाएं. उन्हें अपने परिसर में, अपने घर में रखें. उन्हें हर जगह कूड़ा क्यों फैलाना चाहिए और लोगों को डराना और काटना, जिससे मौत हो." जस्टिस मेहता ने कुत्तों द्वारा लोगों का पीछा करने के बारे में भी कहा. जस्टिस नाथ ने कहा कि कुत्ते के काटने का प्रभाव जिंदगी भर रहता है. गुरुस्वामी ने कहा कि वह भी कुत्ते के हमले का शिकार हो चुकी हैं. जस्टिस मेहता ने कहा कि भावनाएं और चिंताएं सिर्फ कुत्तों के लिए होती हैं. गुरुस्वामी ने जवाब दिया कि उन्हें इंसानों की भी उतनी ही चिंता है. गुरुस्वामी ने कहा कि जो तरीके काम करेंगे, वे हैं कुत्तों का रोगाणुनाशन (Sterilization) और उनके साथ मानव व्यवहार. साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि नियामक अपना काम करने में विफल रहे. पीठ के सामने यह तर्क दिया गया कि ऐसे नियामक या केंद्र फंड का कम इस्तेमाल कर रहे हैं, और ABC रूल्स सिर्फ कुत्तों की जनसंख्या नियंत्रण के बारे में नहीं हैं, बल्कि ये जानवरों को बंद रखने के खिलाफ एक कोशिश है. सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से पूछा, जब नौ साल के बच्चे को आवारा कुत्ते मार देते हैं, जिन्हें कुत्ता प्रेमी संगठन खाना खिला रहे हैं, तो किसे जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए? पीठ ने आगे पूछा, क्या इस कोर्ट को अपनी आंखें बंद कर लेनी चाहिए और चीजों को होने देना चाहिए? पीठ ने कहा कि उसके पास केंद्र सरकार और राज्य सरकारों से गंभीर सवाल हैं, वह उन्हें कब सुनेगी. पीठ ने यह भी कहा कि जानवरों से इंसानों को होने वाले दर्द का क्या, अगर जानवर इंसानों पर हमला कर दे तो कौन जिम्मेदार होगा?

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: कॉन्ट्रेक्ट पर काम करने वालों को सरकारी कर्मचारियों के समान अधिकार नहीं

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी एजेंसी के जरिए अनुबंध पर नौकरी पाने वाले कर्मचारी सरकारी महकमों/ निकायों के नियमित कर्मचारियों के बराबर समानता का दावा नहीं कर सकते। शीर्ष अदालत ने सरकारी महकमों/निकायों के नियमित नौकरी को सार्वजनिक संपत्ति बताया। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और विपुल एम. पंचोली की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि नियमित नियुक्तियां पारदर्शी प्रक्रिया से होती हैं, जिससे सभी योग्य उम्मीदवारों को बराबर मौका मिलता है। पीठ ने कहा कि किसी एजेंसी/ठेकेदार के जरिए नौकरी देना उसकी मर्जी पर छोड़ दिया जाता है, जिससे कानून में दोनों श्रेणी पूरी तरह से अलग हो जाती हैं। शीर्ष अदालत ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा 2018 में पारित फैसला रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने किसी तीसरे पक्ष (ठेकेदार) द्वारा नगर निगम के लिए 1994 में अनुबंध पर रखे गए कर्मियों को नियमित कर्मचारी के समान वेतन एवं भत्ता से संबंधित लाभ देने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक नियमित और अनुबंध कर्मचारियों के बीच फर्क नहीं होंगे, तो अलग-अलग नियुक्ति तरीकों (स्थायी, अनुबंध और तदर्थ) के मूलभूत आधार अपनी पवित्रता खो देंगे। पीठ ने कहा कि कानून में इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती क्योंकि किसी राज्य प्राधिकार के तहत नौकरी एक सार्वजनिक संपत्ति है और देश के हर नागरिक को इसके लिए आवेदन करने का हक है। शीर्ष अदालत ने कहा कि नियमित नियुक्ति में सुरक्षा उपाय इसलिए हैं ताकि कोई पक्षपात या अन्य बाहरी विचार न हो, जहां लोगों को, केवल योग्यता के आधार पर, कानून में ज्ञात पूरी तरह पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से भर्ती किया जाता है। यह था मामला सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में नंदयाल नगरपालिका परिषद की अपील पर यह फैसला दिया है। अपील में हाईकोर्ट के 2018 के फैसले को चुनौती दी गई थी। यह मामला ठेकेदार जरिए नौकरी पर रखे गए सफाई कर्मचारियों से जुड़ा था और इस समय-समय पर ठेकेदार भी बदलता रहा।

सीजेआई सूर्यकांत के फैसले से बदल रही परंपरा: मां की जाति से मिलेगा कास्ट सर्टिफिकेट, न पिता की जाति से

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम फैसले में एक नाबालिग बच्ची की शिक्षा को ध्यान में रखते हुए उसकी मां की जाति ‘आदि द्रविड़’ के आधार पर अनुसूचित जाति (SC) प्रमाणपत्र जारी करने की मंजूरी दे दी. कोर्ट का यह फैसला दूरगामी असर डालने वाला माना जा रहा है. यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब शीर्ष अदालत के समक्ष पहले से ही कई याचिकाएं लंबित हैं, जिनमें उस परंपरागत नियम को चुनौती दी गई है, जिसके अनुसार बच्चे की जाति पिता की जाति के आधार पर तय की जाती रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने से इनकार कर दिया, जिसमें पुडुचेरी की इस बच्ची को एससी जाति प्रमाणपत्र जारी करने का निर्देश दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि अगर बच्ची को समय पर जाति प्रमाणपत्र नहीं मिला, तो उसका भविष्य प्रभावित हो सकता है. क्या बोले CJI सूर्यकांत? हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस मामले में कानून से जुड़े बड़े प्रश्न को अभी खुला रख रही है. इस दौरान सीजेआई सूर्यकांत की एक टिप्पणी ने नई बहस को जन्म दे दिया. उन्होंने कहा, ‘समय के साथ जब परिस्थितियां बदल रही हैं, तो फिर मां की जाति के आधार पर जाति प्रमाणपत्र क्यों नहीं जारी किया जा सकता?’ इस टिप्पणी को सामाजिक और कानूनी दृष्टि से एक बड़ा संकेत माना जा रहा है. अगर भविष्य में यह सिद्धांत स्थापित होता है, तो इसका अर्थ यह होगा कि अनुसूचित जाति की महिला और उच्च जाति के पुरुष की संतानें, भले ही वे उच्च जाति के सामाजिक माहौल में पली-बढ़ी हों, फिर भी वे एससी प्रमाणपत्र की हकदार हो सकती हैं. क्या है पूरा मामला? यह मामला पुडुचेरी की एक महिला से जुड़ा है, जिसने अपने तहसीलदार के पास आवेदन देकर अपने तीन बच्चों दो बेटियों और एक बेटे के लिए मां की जाति के आधार पर अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र जारी करने की मांग की थी. महिला ने अपने आवेदन में कहा था कि उसके माता-पिता और दादा-दादी सभी हिंदू आदि द्रविड़ समुदाय से संबंध रखते हैं. उसने यह भी बताया कि शादी के बाद उसका पति उसके मायके में ही रहता रहा है. इस मामले में केंद्र सरकार के पुराने अधिसूचनाओं का भी जिक्र किया गया. 5 मार्च 1964 और 17 फरवरी 2002 को जारी राष्ट्रपति अधिसूचनाओं और गृह मंत्रालय के निर्देशों के अनुसार, किसी व्यक्ति की जाति का निर्धारण मुख्य रूप से पिता की जाति और उसके निवास स्थान के आधार पर किया जाता रहा है. पिता से ही तय होती थी बच्चों की जाति सुप्रीम कोर्ट पहले भी इस सिद्धांत को कई मामलों में स्वीकार कर चुका है कि बच्चे की जाति का निर्धारण सामान्य रूप से पिता की जाति के आधार पर होगा. वर्ष 2003 में ‘पुनित राय बनाम दिनेश चौधरी’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आरक्षण से जुड़े मामलों में जाति निर्धारण का निर्णायक आधार पिता की जाति होगी और परंपरागत हिंदू कानून के तहत संतान पिता से ही अपनी जाति प्राप्त करती है, न कि मां से. हालांकि, 2012 में आए ‘रमेशभाई दबाई नाइका बनाम गुजरात सरकार’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस सिद्धांत को कुछ हद तक लचीला बनाया था. उस फैसले में अदालत ने कहा था कि अंतरजातीय विवाह या आदिवासी और गैर-आदिवासी विवाह से जन्मे बच्चे की जाति का निर्धारण केवल पिता की जाति के आधार पर यांत्रिक तरीके से नहीं किया जा सकता. उस फैसले में यह भी कहा गया था कि ऐसे मामलों में यह अनुमान जरूर लगाया जा सकता है कि बच्चा पिता की जाति से जुड़ा होगा, लेकिन यह अनुमान अंतिम और अटल नहीं है. पहले क्या था जाति निर्धारण का नियम? सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले में यह भी साफ किया था कि अगर बच्चा यह साबित कर दे कि उसका पालन-पोषण अनुसूचित जाति या जनजाति से जुड़ी मां के सामाजिक परिवेश में हुआ है और उसे जीवन में वही सामाजिक भेदभाव, अपमान और वंचनाएं झेलनी पड़ी हैं, जो उस समुदाय के अन्य लोगों को झेलनी पड़ती हैं, तो उसे उस समुदाय से संबंधित माना जा सकता है. अब ताजा फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बच्ची के हितों को सर्वोपरि मानते हुए मां की जाति के आधार पर एससी प्रमाणपत्र जारी करने की अनुमति दे दी है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया है कि जाति निर्धारण से जुड़े बड़े कानूनी सवालों पर अंतिम फैसला बाद में किया जाएगा. इस फैसले के बाद देशभर में जाति प्रमाणपत्र, आरक्षण और अंतरजातीय विवाह से जुड़े अधिकारों को लेकर एक नई बहस छिड़ने की संभावना है. कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भविष्य में अदालत मां की जाति को भी निर्णायक आधार मानने की दिशा में जाती है, तो इससे सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने तय की सीमा: बिना पूछे महिला की तस्वीर लेना कब होगा गैरकानूनी

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने एक महिला का वीडियो रिकॉर्ड करने के मामले में आरोपी को राहत दी है। कोर्ट का कहना है कि अगर किसी महिला का फोटो या वीडियो ऐसे समय में लिया जाता है, जहां वह निजी गतिविधि में नहीं है तो उसे IPC की धारा 354सी के तहत वॉयरिज्म का दोषी नहीं माना जा सकता। साथ ही अदालत ने कहा है कि चार्जशीट दाखिल करते समय पुलिस और आरोप तय करते समय ट्रायल कोर्ट को सावधान रहना चाहिए था। वॉयरिज्म का मतलब है किसी महिला को तब चुपके से देखना या ताक झांक करना, जब वह निजी गतिविधियों में शामिल हो। यह अपराध है। मामले पर सुनवाई कर रहे जस्टिस एनके सिंह और जस्टिस मनमोहन ने आरोपी के खिलाफ केस बंद कर दिया। उसके खिलाफ वॉयरिज्म के आरोप लगे थे। आरोप थे कि उसने महिला का वीडियो तब रिकॉर्ड किया था, जब वह विवादित संपत्ति में प्रवेश कर रही थी। कोर्ट ने जांच की थी कि एफआईआर और चार्जशीट में वॉयरिज्म का कोई अपराध बताया गया है या नहीं। कोर्ट ने समझाया कि वॉयरिज्म तब लागू होता है, जब निजी गतिविधि में महिला को चुपके से देखा जा रहा हो या रिकॉर्ड किया जा रहा हो। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में ऐसा कोई प्राइवेक्ट एक्ट नहीं है। कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने भी माना है कि एफआईआर से वॉयरिज्म का पता नहीं चला है। हालांकि, उच्च न्यायालय ने फिर भी आरोपी अपीलकर्ता को डिस्चार्ज करने से इनकार कर दिया था, जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने आपत्ति ली। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान गलत तरीके से रोके जाने के आरोपों की भी जांच की गई। कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता को किराएदार नहीं दिखाया गया था। साथ ही कोर्ट ने कहा कि पेश जानकारी से पता चलता है कि वह होने वाले किराएदार के तौर पर प्रॉपर्टी देखने आई थी। कोर्ट ने पाया कि एफाईआर पूरी तरह से संपत्ति को लेकर परिवार के विवाद से जुड़ी है। अदालत ने कहा कि अगर मुद्दों को क्रिमिनल केस के बजाए सिविल उपायों से सुलझाया जाना चाहिए था। बेंच ने उन मामलों में चार्जशीट दाखिल करने पर नाराजगी जाहिर की, जिनमें पक्का शक नहीं है। कोर्ट ने कहा कि इसके कारण पूरे आपराधिक न्याय व्यवस्था पर दबाव पड़ता है। क्या था मामला यह मामला कोलकाता के सॉल्ट लेक की एक रिहायशी संपत्ति का है, जिसे लेकर दो भाइयों में लंबे समय से विवाद चल रहा है। इस मामले में आरोपी तुहिन कुमार बिस्वास सह मालिक का बेटा और संपत्ति को लेकर हुए झगड़े के चलते ही यह एफआईआर दाखिल की गई थी। साल 2018 में आरोपी के पिता ने अपने भाई के खिलाफ सिविल सूट दाखिल किया था। 29 नवंबर 2018 को सिविल कोर्ट ने दोनों पक्षों को साझा अधिकार रखने और कोई थर्ड पार्टी राइट्स नहीं बनाने के निर्देश दिए थे। यह आदेश उस समय भी लागू था, जब शिकायतकर्ता ममता अग्रवाल मार्च 2020 में संपत्ति पर पहुंची थीं। इसके बाद अग्रवाल ने आरोपी के रिश्तेदार के कहने पर एफआईआर दर्ज कराई थी। उन्होंने आरोप लगाए थे कि आरोपी ने उन्हें जबरन रोका, धमकाया और बगैर उनकी सहमति के फोटो वीडियो बनाए। 16 अगस्त 2020 को पुलिस ने 354सी समेत अन्य धाराओं में केस दर्ज किया। ट्रायल कोर्ट और कलकत्ता हाईकोर्ट की तरफ से डिस्चार्ज करने से इनकार किए जाने के बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

MP और महाराष्ट्र में बाघों के शिकार पर बवाल, सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब, उठे संगठित गिरोहों के सवाल

भोपल  सुप्रीम कोर्ट ने  केंद्र सरकार, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) और अन्य से उस जनहित याचिका पर जवाब मांगा, जिसमें महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में कथित संगठित बाघ शिकार और अवैध वन्यजीव व्यापार रैकेट की सीबीआइ जांच की मांग की गई है। भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआइ) बीआर गवई और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ वकील गौरव कुमार बंसल द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें सक्रिय संगठित शिकार गिरोहों द्वारा बाघों के लिए उत्पन्न गंभीर खतरे पर प्रकाश डाला गया था। बंसल ने कहा कि कम से कम 30 प्रतिशत बाघ निर्दिष्ट बाघ अभयारण्यों के बाहर हैं और उन्होंने बाघों के बड़े पैमाने पर शिकार की खबरों का हवाला दिया। इन बिंदुओं पर दायर हुई है याचिका महाराष्ट्र सरकार की एसआईटी जांच में शिकारी, तस्करों और हवाला नेटवर्क का संगठित गिरोह सामने आया। यह गिरोह बाघों की खाल, हड्डियां और ट्रॉफी को राज्य की सीमाओं से बाहर और विदेशों तक तस्करी करता है। याचिका में रिपोर्ट का हवाला देकर कहा गया है कि बाघों का शिकार अब संरक्षित क्षेत्रों से बाहर वन प्रभागों और कॉरिडोर में ज्यादा हो रहा है, जहां निगरानी और सुरक्षा बेहद कमजोर है। वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India) ने इन क्षेत्रों को बाघों के फैलाव के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया है। बाघों के अंगों की तस्करी में लगे एक अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट के पर्दाफाश पीठ ने केंद्र एवं अन्य प्राधिकारियों की ओर से अदालत में पेश हुईं अतिरिक्त सालिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से याचिका पर निर्देश लेने को कहा। याचिका में मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में बाघों के व्यवस्थित शिकार और राज्यों एवं म्यांमार तक फैले बाघों के अंगों की तस्करी में लगे एक अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट के पर्दाफाश का हवाला दिया गया है। याचिका में कहा गया है, ''कई आरोपितों की गिरफ्तारी, बाघों की खाल, हड्डियां, हथियार और वित्तीय रिकार्ड की जब्ती, साथ ही एसआइटी के गठन से यह स्पष्ट हो गया है कि यह समस्या किसी एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि एक गहरे आपराधिक नेटवर्क के अस्तित्व को दर्शाती है जो कानून के शासन को कमजोर करता है।'' बाघ अभयारण्यों से सटे गैर-संरक्षित प्रादेशिक वन शिकारियों के आसान शिकार याचिका में यह भी कहा गया है कि अधिसूचित बाघ अभयारण्यों से सटे गैर-संरक्षित प्रादेशिक वन क्षेत्र बार-बार शिकारियों का आसान निशाना बन गए हैं। इसके फलस्वरूप कार्रवाई करने की वजहें और भी मजबूत हो जाती हैं। सीबीआइ जांच की मांग करते हुए याचिका में कहा गया है, ''जब तक यह अदालत हस्तक्षेप नहीं करती और एक व्यापक, स्वतंत्र और समन्वित जांच का निर्देश नहीं देती, तब तक राष्ट्र की पारिस्थितिक सुरक्षा और राष्ट्रीय पशु के अस्तित्व को गंभीर खतरा रहेगा।'' याचिका में यह भी कहा गया है, ''प्रतिवादियों (केंद्र और अन्य) को एसआइटी की सिफारिशों को तुरंत लागू करने और बाघ अभयारण्यों से सटे बाघ गलियारों और प्रादेशिक वन प्रभागों में प्रभावी सुरक्षा, निगरानी और गश्त बढ़ाने का निर्देश दिया जाए, और उन्हें मुख्य क्षेत्रों के समान माना जाए।'' याचिका में केंद्रीय गृह मंत्रालय, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) और एनटीसीए को पक्ष बनाया गया है। बंसल ने अदालत में कहा याचिकाकर्ता के वकील बंसल ने कहा कि भारत में 30% से अधिक बाघ संरक्षित क्षेत्रों के बाहर पाए जाते हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि तस्करी का यह संगठित नेटवर्क वन गुर्जर समुदाय जैसे आदिवासी समूहों से जुड़े गिरोहों को भी शामिल करता है। उन्होंने अदालत से मांग की कि इस मामले की सीबीआई जांच कराई जाए।