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मध्यप्रदेश सरकार तीन किस्तों में लेगी 3 हजार करोड़ रुपये का कर्ज, कुल कर्ज बढ़कर 49,600 करोड़

भोपाल   मध्यप्रदेश की मोहन सरकार शीतकालीन सत्र के दौरान दूसरा अनुपूरक बजट पेश करने की तैयारी में है। इसके लिए सरकार एक बार फिर 3,000 करोड़ का कर्ज नीलामी प्रक्रिया के माध्यम से लेने जा रही है, जिसका भुगतान बुधवार को किया जाएगा। ये सभी कर्ज रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के जरिए लिए जा रहे हैं, और इनका ब्याज हर छह महीने में 3 जून और 3 दिसंबर को चुकाया जाएगा। इस नए कर्ज के साथ चालू वित्तीय वर्ष में राज्य का कुल कर्ज बढ़कर 49,600 करोड़ पहुंच जाएगा। पहला कर्ज 1 हजार करोड़ रुपए का होगा वित्त विभाग के द्वारा नोटिफिकेशन जारी किया गया। जिसके अनुसार, पहला कर्ज एक हजार करोड़ रुपए का होगा। जिसका भुगतान सरकार के द्वारा आठ साल में किया जाएगा। इसके बाद एक हजार करोड़ का दूसरा कर्ज भी लिया जाएगा। जिसको सरकार 13 साल में चुकाएगी। तीसरे कर्ज की राशि भी 1 हजार करोड़ रुपए होगी। जिसका भुगतान ब्याज के साथ 23 साल में किया जाएगा। इन कर्जों का ब्याज जून और दिसंबर महीने में अदा किया जाएगा। नवंबर में सरकार ने लिया था कर्ज इससे पहले सरकार ने 11 नवंबर को ऑक्शन के बाद सरकार ने 12 नवंबर को 1500-1500 सौ करोड़ के दो कर्ज और 1 हजार करोड़ का दूसरा कर्ज लिया था। जो कि 16 साल, 22 साल और 19 साल के लिए हैं। इनके ब्याज का भुगतान सरकार को 6-6 महीने की अवधि में करना होगा। ऐसे ही 28 अक्टूबर को 5200 करोड़ रुपए का कर्ज लिया था। उसमें पहली राशि 2700 करोड़ की थी, जो कि 21 साल के लिए ली गई थी। वहीं, दूसरी राशि 2500 करोड़ की, जो 22 साल के लिए ली गई थी। कर्ज लेने की लिमिट बरकरार सरकार ने अपनी रेवेन्यू को लेकर कहा है कि वित्त वर्ष 2023-24 में सरकार 12487.78 करोड़ के रेवेन्यू सरप्लस में थी। इसमें आमदनी 234026.05 करोड़ और खर्च 221538.27 करोड़ रहा। इसके विपरीत वित्त वर्ष 2024-25 में प्रदेश सरकार की रिवाइज्ड आमदनी 262009.01 करोड़ और खर्च 260983.10 करोड़ बताया है। इस तरह पिछले वित्त वर्ष में भी सरकार की आय 1025.91 करोड़ सरप्लस बताई गई है, जो भी कर्ज लिया जा रहा है वह लोन की लिमिट के भीतर है। ऐसे ही 30 सितंबर को 1500-1500 करोड़ के दो कर्ज लिए थे। जिसका भुगतान एक अक्टूबर को हुआ था। ये कर्ज 20 साल और 23 साल के अवधि के लिए हैं। इसका भुगतान एक अक्टूबर हो हुआ था। 

रायपुर: घर में पर्यटकों को ठहराकर कमाएं पैसा, होमस्टे नीति 2025-30 से ग्रामीणों को बड़ी मदद

रायपुर  छत्तीसगढ़ सरकार ने होमस्टे पॉलिसी लागू कर दी है,  सरकार ने 2025-30 के लिए नई छत्तीसगढ़ होमस्टे नीति 2025‑30 बनाई है, जिसका सबसे ज्यादा फायदा ग्रामीणों को मिलने वाला है, खास तौर पर बस्तर और सरगुजा संभाग के जिलों में पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस दिशा में और काम किया जा रहा है. इस पॉलिसी का मकसद प्रदेश के ग्रामीण और आदिवासी बहुल इलाकों, विशेष रूप से बस्तर और सरगुजा संभागों में होने वाली होमस्टे में और इजाफा करने की तैयारी है, ताकि ज्यादा से ज्यादा पर्यटक इस दिशा में आ सके.  होम-स्टे की सुविधा बढ़ेगी  छत्तीसगढ़ सरकार की इस पॉलिसी के तहत ग्रामीण परिवारों को प्रोत्साहन मिलेगा जो अपना घर पर्यटकों के ठहरने के लिए होम-स्टे के रूप में उपलब्ध कराएंगे. सरकार होम-स्टे सेट-अप की सुविधा देने के लिए वित्तीय मदद देगी, जिससे परिवारों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिलेगा. यानि अब जो इस दिशा में का करना चाहते हैं उन्हें इसका सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा. नए होम‌स्टे पर 1 लाख रुपए तक की मदद भी सरकार की तरफ से मिलेगी, जिसके लिए रिनोवेशन पर 50 हजार और 100 प्रतिशत ब्याज सब्सिडी भी ग्रामीणों को मिलेगी.  दरअसल, नीति के अनुसार होम-स्टे के लिए घर अपग्रेड करने के लिए 10 लाख रुपए तक की सहायता दी जाएगी. क्योंकि इससे स्थानीय लोग अपने घर को होम-स्टे में बदलकर स्थायी आय अर्जित कर सकेंगे, युवाओं, महिलाओं और स्थानीय कारीगरों के लिए स्वरोजगार व रोजगार के अवसर खुलेंगे. होम-स्टे की मदद से पर्यटक गांव की सादगी, प्राकृतिक सुंदरता, जनजातीय संस्कृति, लोक-कला, हस्तशिल्प, पारंपरिक व्यंजन आदि का अनुभव ले सकेंगे, जिससे स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा.   ग्रामीणों और पर्यटकों को फायदा कैसे रियल सरगुजिहा फीलिंग: सैलानियों को अब सरगुजा में रियल सरगुजिहा फीलिंग मिल सकेगी. जिस जंगल, पहाड़, गांव, घर खेत खलिहान, आदिवासी संकृति को देखने सैलानी यहां आते हैं. अब वो इन सबमें समाहित होकर उसका आनंद ले सकेंगे, क्योंकि सरकार की इस नीति के बाद सैलानियों को शहर के महंगे एसी वाले होटल में नहीं ठहरना पड़ेगा. पर्यटकों को मिलेगा होम स्टे का फायदा: होम स्टे के तहत पर्यटक गांव में ही ग्रामीणों के घर में रह सकेंगे. उनका खाना, उनकी चारपाई, खेत खलिहान, कुएं का पानी सहित तमाम लोकल कल्चर का आनंद उठा सकेंगे. सरकार होम स्टे को प्रमोट करने के लिए नीति बना चुकी है. इसे चरण बद्ध तरीके से लागू किया जाएगा. सरकार होम स्टे के लिए प्रोत्साहन राशि और लोन लेने पर ब्याज में भी छूट की योजना बना चुकी है. पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा: सरगुजा के पर्यटक स्थलों और लोक संकृति पर शोध करने वाले अजय कुमार चतुर्वेदी कहते हैं कि होम स्टे से प्रदेश के दो संभाग बस्तर और सरगुजा के पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा. सरगुजा का पर्यटन, धार्मिक, साहित्यिक सभी दृष्टि से समृद्ध है. यहां रामगढ़ है, डीपाडीह है, मैनपाट, सोमरसोत, तमोर पिंगला अभयारण्य, ओडगी में कूदरगढ़, गुरु घासीदास टाइगर रिजर्व के कई इलाके हैं. बस्तर में होम स्टे कल्चर:  प्रभारी मंत्री ओपी चौधरी ने होम स्टे के सम्बन्ध में पूरी जानकारी दी. उन्होंने कहा कि बस्तर के कुछ गांव में होम स्टे कल्चर विकसित हो चुका है. इसे देखते हुए सरकार ने होम स्टे नीति बनाई है. पर्यटक हमारे घर के एक कमरे में हमारे साथ रहेगा, जो हम खायेंगे वही खायेगा. हमारे खेत बाड़ी घूमेगा. विदेशों में ये कल्चर कई जगह है. सरकार करेगी मदद: मंत्री ओपी चौधरी ने कहा कि पर्यटन विभाग ने चिन्हांकन का काम शुरू कर दिया है. हम एक कमरे पर एक लाख रुपये प्रोत्साहन देंगे. पहले वर्ष 50 हजार, फिर अगले वर्ष 30 हजार और तीसरे वर्ष 20 हजार दिया जाएगा. आप चाहें तो लोन भी ले सकते हैं. उसमें सरकार इंटरेस्ट सब्सिडी देगी. एक व्यक्ति 6 कमरे तक बना सकता है. पर्यटकों और ग्रामीणों को होगा फायदा: बहरहाल सरकार की नीति का फायदा सीधे तौर पर पर्यटकों और स्थनीय ग्रामीणों को होगा. गांव के कच्चे के मकान का कमरा किराये पर देकर ग्रामीण पैसा कमा सकेंगे. ना सिर्फ कमरा बल्कि खाना व अन्य सुविधाओं का भी चार्ज वो सैलानियों से कर सकेंगे. सैलानियों के लिए भी ये सुनहरा अवसर होगा, क्योंकि जिस संस्कृति को वो दूर से देखने और फोटो क्लिक करने आते थे, अब वो उसी संस्कृति में रह सकेंगे. सैलानियों का खर्च बचेगा: पर्यटक सरगुजा का लोकल जीराफूल, लाकरा की चटनी, पूटू, जंगली साग, कुएं का पानी, चारपाई में पैरावट का बिस्तर जैसे अनुभव को जी सकेंगे. इससे सैलानियों के बजट में भी कमी आयेगी क्योंकि सरगुजा घूमने के लिए वो पहले अंबिकापुर आकर किसी महंगे होटल में ठहरते हैं और फिर यहां से कैब बुक करके घूमने जाते हैं. शाम को वापस आते हैं और अगले दिन फिर निकलते हैं. इस तरह सैलानियों का ट्रेवलिंग और स्टे का खर्च काफी अधिक हो जाता है, लेकिन होम स्टे में वो उसी गांव में रुक सकेंगे, जहां उनको घूमना है. छत्तीसगढ़ में बढ़ा होम स्टे  बता दें कि बीते कुछ सालों में छत्तीसगढ़ में भी होम स्टे पर्यटन में तेजी से बढ़ावा आया है, क्योंकि राज्य के बस्तर और सरगुजा संभागों के जंगली इलाकों और ग्रामीण इलाकों में होम स्टे का कल्चर बढ़ा है, बाहर से आने वाले लोग शहर की थकान से दूर गांवों की शांति और सुकून में रहना पसंद करते हैं, ऐसे में छत्तीसगढ़ सरकार भी इस दिशा में काम कर रही है, ताकि पर्यटन के साथ-साथ छत्तीसगढ़ की संस्कृति को भी बढ़ावा दिया जा सके. 

बीजेपी उत्तर प्रदेश अध्यक्ष का ऐलान जल्द, संघ नाराजगी जताने के बाद सक्रिय

लखनऊ  उत्तर प्रदेश को बीजेपी का नया अध्यक्ष मिलने जा रहा है. आरएसएस और बीजेपी के बीच सोमवार को लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आवास पर समन्वय बैठक हुई. तीन घंटे तक चली इस विचार प्रवाह की बैठक में बीजेपी के प्रदेश के नाम पर मंथन किया गया और एसआईआर के मुद्दे पर चर्चा हुई. सूत्रों की मानें तो इसी सप्ताह बीजेपी यूपी के नए अध्यक्ष के नाम का ऐलान कर सकती है.  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कालिदास मार्ग स्थित सरकारी आवास पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बीजेपी और यूपी सरकार के बीच एक अहम बैठक आयोजित की गई. इस बैठक में सरकार के कामकाज की रिपोर्ट ली गई. साथ ही सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल बनाए रखने पर जोर दिया गया. बैठक में आरएसएस के सह सरकार्यवाह अरुण कुमार, बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष, प्रदेश संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह, प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी, उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक के साथ-साथ संघ के क्षेत्रीय प्रचारक भी उपस्थित रहे.  यूपी के नए बीजेपी अध्यक्ष का ऐलान जल्द  संघ और बीजेपी की समन्वय बैठक के दौरान पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष ने उत्तर प्रदेश बीजेपी के अगले संभावित अध्यक्ष का नाम भी साझा किया. सूत्रों के मानें तो इस सप्ताह ही यूपी बीजेपी को नया अध्यक्ष मिल सकता है. राज्य बीजेपी के अध्यक्ष का चुनाव करीब एक साल से लंबित है. उत्तर प्रदेश के 75 जिले को बीजेपी ने अपने संगठन स्तर पर 98 जिलों में बांट रखा है, जिसमें से 84 जिला अध्यक्ष नियुक्त कर दिए हैं. ऐसे में बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो गई है. माना जा रहा है कि इसीलिए संगठन महामंत्री ने समन्वय बैठक में संभावित अध्यक्ष के नाम को साझा किया. इस तरह संगठन में बदलाव की प्रक्रिया तेज होती दिख रही है और अब इसी सफ्ताह उत्तर प्रदेश बीजेपी को नया अध्यक्ष मिल सकता है. SIR पर  संघ ने क्यों जताई नाराजगी लखनऊ में हुई संघ–बीजेपी की विचार प्रवाह बैठक में उत्तर प्रदेश में चल रही एसआईआर प्रक्रिया प्रमुख चर्चा का विषय रहा. बैठक में संघ के नेताओं ने यह मुद्दा उठाया कि बीजेपी सांसद और विधायक एसआईआर प्रक्रिया की गतिविधियों में पर्याप्त भागीदारी नहीं दिखा रहे. उन्होंने स्पष्ट कहा कि जनप्रतिनिधियों को इस पहल में सक्रिय रूप से शामिल होना चाहिए. लोगों को जागरूक करना चाहिए और ज़मीन पर उनकी मदद सुनिश्चित करनी चाहिए. राम मंदिर के मुद्दे को धार देने का प्लान बैठक में यह भी तय किया गया कि इस साल अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण कार्य पूरा होने के बाद अब देशभर में इस व्यापक रूप से प्रचार प्रसार करने की योजना बनाई जाएगी, ताकि इसके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व को बड़े स्तर पर लोगों तक पहुंचाया जा सके. संघ की ओर से सीएम योगी को कहा गया कि वह प्रभारी मंत्रियों को कहें कि वे प्रवास के दौरान वैचारिक संगठनों से भी संवाद करें. इस बैठक में इस बात पर फैसला हुआ कि आने वाले दिनों में संघ राम मंदिर के मुद्दे को और धार देगा. पंचायत चुनाव से लेकर विधानसभा चुनाव तक अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का वादा पूरा करने को भी संघ, सरकार और भाजपा बड़ी उपलब्धि के रूप में जनता के बीच रखा जाएगा. सरकार-संगठन में बेहतर तालमेल पर जोर समन्वय बैठक में संघ, बीजेपी संगठन और योगी सरकार के बीच बेहतर तालमेल बनाए रखने पर विशेष जोर दिया गया. संगठनात्मक स्तर पर बूथ सशक्तिकरण, सामाजिक समरसता अभियान और सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं को जन-जन तक पहुंचाने की रणनीति पर भी विमर्श हुआ. इस बैठक में कहा गया कि जल्द ही बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा की जाएगी इसके साथ ही निगम और बोर्ड की नियुक्तियां जल्द होंगी. 

8th Pay Commission DA मर्जर पर वित्त मंत्रालय ने तोड़ी चुप्पी, एकीकरण से इनकार

नई दिल्ली केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए बहुप्रतीक्षित 8वें केंद्रीय वेतन आयोग (8th Central ) को लेकर चर्चाएं इन दिनों तेज हैं. सरकार द्वारा आयोग के गठन की अधिसूचना जारी किए जाने के बाद जहां कर्मचारियों को वेतन संशोधन की उम्मीद जगी थी, वहीं Terms of Reference (ToR) में कई अहम बिंदुओं की अस्पष्टता ने असंतोष को भी जन्म दिया है. इस बीच संसद में सरकार के ताजा जवाब ने कर्मचारियों की चिंताओं को और स्पष्ट कर दिया है. संसद में उठा मुद्दा, सरकार से मांगी गई थी स्थिति की जानकारी संसद के शीतकालीन सत्र के पहले दिन, 1 दिसंबर को लोकसभा में समाजवादी पार्टी के सांसद आनंद भदौरिया ने एक अतारांकित प्रश्न के माध्यम से सरकार से पूछा कि क्या 8वें केंद्रीय वेतन आयोग को आधिकारिक रूप से अधिसूचित कर दिया गया है और क्या बढ़ती महंगाई को देखते हुए महंगाई भत्ता (DA) को मूल वेतन में मर्ज करने का कोई प्रस्ताव सरकार के विचाराधीन है. इन सवालों का लिखित उत्तर देते हुए वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने लोकसभा को बताया कि केंद्र सरकार ने 3 नवंबर 2025 को एक प्रस्ताव (Resolution) जारी कर 8वें केंद्रीय वेतन आयोग के गठन को अधिसूचित कर दिया है. इसके साथ ही भारत के राजपत्र (Gazette Notification) की प्रति भी सदन के पटल पर रखी गई. हालांकि, DA को मूल वेतन में मर्ज करने की मांग पर सरकार ने साफ शब्दों में कहा कि फिलहाल ऐसा कोई प्रस्ताव सरकार के पास विचाराधीन नहीं है. सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि मौजूदा व्यवस्था के तहत महंगाई भत्ता (DA/DR) को AICPI-IW सूचकांक के आधार पर हर छह महीने में संशोधित किया जाता रहेगा. ToR को लेकर क्यों नाराज हैं कर्मचारी संगठन? 8वें वेतन आयोग के Terms of Reference जारी होने के बाद कर्मचारी संगठनों और पेंशनर संघों ने कई गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं. उनका मानना है कि वर्तमान ToR, 7वें वेतन आयोग की तुलना में अधिक सीमित और अस्पष्ट है. कर्मचारी संगठनों का कहना है कि 7वें वेतन आयोग की शर्तों में पेंशनरों का स्पष्ट रूप से उल्लेख था, जबकि 8वें वेतन आयोग के ToR में यह बात साफ नहीं कही गई है. इससे यह आशंका पैदा हो रही है कि पेंशन संशोधन के मुद्दे को अपेक्षित महत्व नहीं मिलेगा. ToR में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि नया वेतन ढांचा 1 जनवरी 2026 से लागू होगा या किसी अन्य तारीख से. इसका असर उन कर्मचारियों पर पड़ सकता है जो आगामी वर्षों में सेवानिवृत्त होने वाले हैं और अपनी वित्तीय योजना बना रहे हैं. DA को मूल वेतन में मर्ज करने की मांग क्यों तेज थी? कर्मचारी संगठनों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में लगातार ऊंची महंगाई के कारण कर्मचारियों की वास्तविक आय पर दबाव बढ़ा है. उनका तर्क है कि केवल छह महीने में DA संशोधन से महंगाई के प्रभाव की पूरी भरपाई नहीं हो पाती, जिससे कर्मचारियों की क्रय शक्ति लगातार घट रही है. इसी कारण DA को मूल वेतन में मर्ज करने की मांग लंबे समय से उठ रही थी. आगे क्या? अब 8वां केंद्रीय वेतन आयोग अपनी प्रक्रिया शुरू करेगा, विभिन्न मंत्रालयों से आंकड़े जुटाएगा और कर्मचारी संगठनों तथा अन्य हितधारकों से सुझाव प्राप्त करेगा. लेकिन ToR को लेकर जारी असंतोष को देखते हुए यह साफ है कि आने वाले महीनों में कर्मचारी संगठन सरकार पर दबाव बढ़ा सकते हैं.

अनक्लेम्ड बैंक फंड्स का अलर्ट: भोपाल में 230 करोड़, देशभर में 67,000 करोड़, RBI कैंप मददगार

भोपाल  राजधानी के 5 लाख 63 हजार 659 खाताधारकों ने करीब 10 साल अपने बैंक खातों में कोई ट्रांजेक्शन नहीं किया है। लेनदेन नहीं होने की वजह से निष्क्रिय पड़े इन खातों में करीब 230 करोड़ रुपए पड़े हैं। यदि आपका या आपके परिवार का पैसा पिछले दस साल से बैंक में जमा है और उसमें कोई लेनदेन नहीं किया है तो ऐसे पैसे खाते से निकाले जा सकते हैं। इसके लिए अब वित्तीय संस्थान ही आगे आ रहे हैं। जगह-जगह कैंप लगाकर लाभार्थियों को पैसा निकालने की सलाह दी जा रही है। रिजर्व बैंक ने ऐसे पैसे वापस करने के लिए 31 दिसंबर 2025 तक का समय दिया है। इसमें बैंक, बीमा कंपनी सहित अन्य वित्तीय संस्थान शामिल है। कैसे मिलेगी राशि बैंकर्स का कहना है कि इस प्रकार की राशि को प्राप्त करने के लिए बैंक में आवेदन देना होगा साथ ही खाते का केवायसी (खाताधारक का आधार, पेन नंबर) आदि देना होगा। यदि खाताधारक नहीं है और नामिनी बनाया है तो राशि नामिनी को मिलेगी अन्यथा विधिक वारिस को मिलेगी। ये पैसा जमाकर्ता एवं उतराधिकारियों की वैद्य संपत्ति है। सरकारी बैंकों में 20 करोड़, 210 करोड़ रुपए प्राइवेट बैंकों में जमा 2518 करोड़ रुपए जमा हैं मप्र के निष्क्रिय खातों में लेनदेन बंद… डीईए फंड में जाती है राशि बैंक अधिकारियों के मुताबिक सेविंग, रैकरिंग, करंट या इंश्योरेंस समेत किसी भी खाते में 10 साल तक लेनदेन नहीं होने पर खाता निष्क्रिय हो जाता है। इसके बाद जमा राशि आरबीआई के डीईए (डिपॉजिटर एजुकेशन एंड अवेयरनेस) फंड में ट्रांसफर होती है। इसके ब्याज से आरबीआई जागरूकता और शिक्षा कार्यक्रम चलाता है। देश में 67,000 करोड़ अनक्लेम्ड पड़े देश के लाखों लोगों की करीब 67,000 करोड़ रुपये की रकम (जून 2025 तक) बैंकों में लावारिस पड़ी है. यह वही धन है जिसे लोग पुराने खातों में छोड़कर भूल गए, या फिर उनके परिवार के सदस्यों को इन खातों की जानकारी ही नहीं मिली. कई मामलों में नॉमिनी जानकारी के अभाव, दस्तावेजों के गुम होने या जागरूकता की कमी के कारण परिवार इस जमा रकम को वर्षों तक क्लेम नहीं कर पाते. अनक्लेम्ड राशि बढ़ने की असली वजह भारतीय परिवारों में वित्तीय संवाद की कमी सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है. लोग निवेश करते तो हैं, लेकिन उसके बारे में परिवार को बताते नहीं. ऐसे में निवेशक की अनुपस्थिति या जानकारी के अभाव में धन वर्षों तक निष्क्रिय पड़ा रह जाता है. RBI की बड़ी पहल – पूरे देश में विशेष सहायता कैंप रिज़र्व बैंक ने 31 दिसंबर 2025 तक देशभर में विशेष सहायता कैंप शुरू किए हैं. इनका उद्देश्य है जनता तक भूला हुआ पैसा पहुंचाना, क्लेम प्रक्रिया आसान बनाना, वित्तीय जागरूकता बढ़ाना. कैंप में ग्राहकों को फ़ॉर्म भरने, दस्तावेज़ सत्यापन, नॉमिनी अपडेट और फॉलो-अप में सहायता दी जा रही है ताकि लोग आसानी से अपना पैसा वापस पा सकें. निष्क्रिय खाता क्या होता है? बचत या करंट अकाउंट में यदि दो साल तक कोई लेन-देन नहीं होता, तो वह निष्क्रिय (Inactive) मान लिया जाता है. पैसे सुरक्षित रहते हैं, लेकिन कई सेवाएं बंद हो जाती हैं. अगर 10 साल तक खाते में कोई गतिविधि न हो, तो उसमें मौजूद राशि ब्याज सहित RBI के DEA Fund में ट्रांसफर हो जाती है. अच्छी खबर यह है कि, ग्राहक या कानूनी वारिस कभी भी अपना पैसा क्लेम कर सकते हैं. कोई समयसीमा नहीं है. उद्गम पोर्टल से खातों की खोज उद्गम पोर्टल से कई बैंकों के खातों की खोज की सुविधा दी जा रही है। इससे प्रत्येक बैंक के दावे या निपटान प्रक्रिया की जानकारी मिलती है। हालांकि जमा राशि का दावा केवल संबंधित बैंक से ही किया जा सकता है। पैसे वापस कैसे पाएं?     अपने बैंक की किसी भी शाखा में जाएं     KYC दस्तावेज (आधार, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस आदि) दें     क्लेम फॉर्म भरें     नॉमिनी/कानूनी वारिस से जुड़े प्रमाण प्रस्तुत करें     राशि (ब्याज सहित, जहाँ लागू हो) प्राप्त करें अनक्लेम्ड जमा ढूंढने के लिए RBI का UDGAM पोर्टल     वेबसाइट पर जाएं: udgam.rbi.org.in     मोबाइल नंबर या आधार से रजिस्टर करें     नाम, जन्मतिथि, मोबाइल आदि विवरण भरें     पोर्टल आपके नाम से जुड़े निष्क्रिय खाते या FDs की जानकारी दिखाएगा     बैंक का नाम और UDRN नंबर भी दिखाई देगा अब तक 30 बैंक इस पोर्टल से जुड़े हैं, जो कुल अनक्लेम्ड जमाओं का लगभग 90% कवर करते हैं. बैंकों को मिलेगा इनाम — RBI की नई योजना 1 अक्टूबर 2025 से लागू नई योजना के तहत—     4 साल निष्क्रिय खाते वापस दिलाने पर बैंक को 5% या 5,000 रु (जो कम हो)     10 साल निष्क्रिय खाते के भुगतान पर 7.5% या 25,000 रु (जो कम हो)     RBI हर तिमाही दावों की जांच कर 30 दिनों में इनाम जारी करेगा. इसका उद्देश्य है—     बैंकों को पुराने निष्क्रिय खातों के निपटान के लिए प्रोत्साहित करना     भविष्य में अनक्लेम्ड जमा की संख्या कम करना भविष्य में ऐसी परेशानी से बचने के उपाय     अपने सभी बैंक खाते, PPF, बीमा, म्यूचुअल फंड आदि की सूची बनाकर रखें     परिवार के सदस्यों को इसके बारे में जानकारी दें     हर खाते में नॉमिनी अपडेट करें     दस्तावेज सुरक्षित रखें     समय-समय पर खातों में लेन-देन करते रहें

बच्चों के लिए चेतावनी: 13 साल से पहले स्मार्टफोन से मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ते हैं नकारात्मक असर

नई दिल्ली 13 साल से कम उम्र में स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले बच्चों में युवावस्था में मेंटल हेल्थ संबंधी दिक्कतें पैदा हो सकती हैं. सोमवार को प्रकाशित एक ग्लोबल स्टडी में यह बात सामने आई है, जिसमें एक लाख से ज्यादा युवाओं का डेटा शामिल है. जर्नल ऑफ ह्यूमन डेवलपमेंट एंड कैपेबिलिटीज में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, 18 से 24 साल के उन युवाओं में आत्मघाती विचार, आक्रामकता, भावनात्मक अस्थिरता और कम आत्मसम्मान की शिकायतें ज्यादा देखी गईं, जिन्हें 12 साल या उससे कम उम्र में पहला स्मार्टफोन मिला था. बच्चों को कम उम्र में स्मार्टफोन देना उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है। एक नई ग्लोबल स्टडी में पता चला है कि 13 साल से कम उम्र में पहला स्मार्टफोन पाने वाले युवाओं में बड़े होकर डिप्रेशन, आक्रामकता और खुद को नुकसान पहुंचाने जैसे गंभीर मानसिक स्वास्थ्य जोखिम बढ़ जाते हैं। यह स्टडी 100,000 से ज़्यादा युवा वयस्कों पर की गई है और इसके नतीजे चिंताजनक हैं। यह रिसर्च 'Journal of Human Development and Capabilities' में छपी है। इसमें 18 से 24 साल के 100,000 से ज़्यादा युवाओं के डेटा का विश्लेषण किया गया। रिसर्च में पाया गया कि जिन युवाओं को 12 साल या उससे कम उम्र में पहला स्मार्टफोन मिला, उनमें मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं उन लोगों की तुलना में ज़्यादा थीं जिन्हें बाद में स्मार्टफोन मिला। स्टडी के मुताबिक, 13 साल से पहले स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले युवा वयस्कों में खुद को नुकसान पहुंचाने के विचार, आत्मविश्वास की कमी, भावनाओं को काबू न कर पाना, हकीकत से दूरी और आक्रामक व्यवहार जैसी समस्याएं ज़्यादा पाई गईं। रिसर्च में यह भी सामने आया कि स्मार्टफोन जितनी जल्दी मिला, "माइंड हेल्थ क्वोशेंट" (MHQ) स्कोर उतना ही कम था। उदाहरण के लिए, 13 साल की उम्र में फोन इस्तेमाल करने वालों का औसत स्कोर 30 था, जबकि 5 साल की उम्र में फोन इस्तेमाल करने वालों का औसत स्कोर सिर्फ 1 था। यह नतीजे अलग-अलग देशों और संस्कृतियों में भी देखे गए, जो बताते हैं कि यह सिर्फ सामाजिक प्रभाव नहीं है, बल्कि विकास से जुड़ा एक बड़ा संकेत है। 13 साल की उम्र एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस उम्र में बच्चों का दिमाग तेज़ी से विकसित हो रहा होता है। उनकी पहचान बन रही होती है और वे सामाजिक कौशल सीख रहे होते हैं। ऐसे नाजुक समय में स्मार्टफोन और डिजिटल दुनिया का ज़्यादा इस्तेमाल, असल ज़िंदगी के अनुभवों और मुश्किलों से निपटने के तरीकों पर भारी पड़ सकता है। रिसर्च बताती है कि जितनी जल्दी बच्चे डिजिटल दुनिया में कदम रखते हैं, उतना ही ज़्यादा उनके विकास को खतरा होता है। 13 साल से पहले स्मार्टफोन देने से बच्चों को कई खतरनाक चीज़ों का सामना जल्दी करना पड़ सकता है, जैसे: सोशल मीडिया पर तुलना और दबाव का माहौल। साइबरबुलिंग, उत्पीड़न या गलत कंटेंट का खतरा। देर रात तक स्क्रीन देखने से नींद का डिस्टर्ब होना। बाहरी दुनिया में लोगों से मिलना-जुलना कम होना और परिवार के साथ रिश्ते कमजोर होना। सिर्फ उम्र ही नहीं, लिंग का भी इस पर असर पड़ता है। स्टडी में पाया गया कि जिन लड़कियों को कम उम्र में स्मार्टफोन मिला, उनमें मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं ज़्यादा थीं। 5-6 साल की उम्र में स्मार्टफोन पाने वाली 18-24 साल की 48% लड़कियों ने खुद को नुकसान पहुंचाने के विचार आने की बात कही, जबकि 13 साल की उम्र में फोन पाने वाली ऐसी लड़कियों का प्रतिशत 28% था। लड़कों में यह आंकड़ा 31% से घटकर 20% हो गया। रिसर्च में यह भी पता चला कि जल्दी सोशल मीडिया इस्तेमाल करने की वजह से ही जल्दी स्मार्टफोन मिलने और खराब मानसिक स्वास्थ्य के बीच के लिंक का लगभग 40% हिस्सा समझाया जा सकता है। इसके अलावा, खराब पारिवारिक रिश्ते (13%), नींद की कमी (12%) और साइबरबुलिंग (10%) भी इसके कारण थे। यह स्टडी सिर्फ़ एक अवलोकन (observational) है, यह साबित नहीं करती कि स्मार्टफोन सीधे तौर पर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनते हैं। लेकिन, यह नतीजे आगे और गहरी रिसर्च की ज़रूरत पर ज़ोर देते हैं। हो सकता है कि कुछ बच्चे पहले से ही कुछ मुश्किलों (सामाजिक, पारिवारिक या व्यक्तिगत) का सामना कर रहे हों, जिसकी वजह से उन्हें जल्दी स्मार्टफोन मिल जाता है और बाद में उन्हें ज़्यादा परेशानी होती है। फिर भी, रिसर्चर डिजिटल दुनिया के बच्चों के विकास पर पड़ने वाले असर को समझने और मुश्किलों का सामना कर रहे बच्चों की पहचान करने और मदद करने के तरीके ढूंढ रहे हैं। इस बीच, माता-पिता और स्कूल दोनों ही बच्चों की सुरक्षा में अहम भूमिका निभा सकते हैं। माता-पिता के लिए कुछ सुझाव: स्मार्टफोन देने में देरी करें: रिसर्च के मुताबिक, 13 साल या उससे ज़्यादा उम्र होने तक बच्चों को पर्सनल स्मार्टफोन न देना उनके लंबे समय के मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहतर हो सकता है। स्पष्ट नियम और सीमाएं तय करें: जब भी स्मार्टफोन दें, तो स्क्रीन टाइम, सोशल मीडिया के इस्तेमाल और रात में फोन इस्तेमाल करने पर सीमाएं लगाएं। ऑनलाइन सुरक्षा और व्यवहार के बारे में सिखाएं: बच्चों को बताएं कि ऑनलाइन कैसे व्यवहार करना है, किस तरह के कंटेंट से दूर रहना है, साइबरबुलिंग का जवाब कैसे देना है और असल ज़िंदगी में लोगों से मिलना-जुलना क्यों ज़रूरी है। ऑफलाइन गतिविधियों को बढ़ावा दें: बच्चों को आमने-सामने बातचीत, खेलकूद, हॉबी और पर्याप्त नींद लेने के लिए प्रोत्साहित करें। ये सब चीज़ें मानसिक मजबूती के लिए बहुत ज़रूरी हैं। खुद स्वस्थ फोन इस्तेमाल का उदाहरण पेश करें: बच्चे अपने माता-पिता के व्यवहार से सीखते हैं। अपना स्मार्टफोन इस्तेमाल कम करें और बच्चों के साथ समय बिताएं। इससे एक अच्छा माहौल बनता है। शिक्षकों और स्कूलों के लिए कुछ सुझाव: स्मार्टफोन और सोशल मीडिया की नीतियां लागू करें: स्कूल फोन-फ्री समय या जगहें तय कर सकते हैं, डिजिटल वेलनेस प्रोग्राम चला सकते हैं और छात्रों को ऑनलाइन स्वस्थ व्यवहार के बारे में सिखा सकते हैं। डिजिटल साक्षरता सिखाएं: ऑनलाइन सुरक्षा, खुद को नियंत्रित करना, मीडिया को समझदारी से देखना और सोशल मीडिया के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर के बारे में सबक पढ़ाएं। स्क्रीन-आधारित गतिविधियों के बजाय सामाजिक और सीखने की गतिविधियों को बढ़ावा दें: बच्चों को आमने-सामने बातचीत करने, मिलकर … Read more

Maruti Suzuki की शानदार बिक्री, नवंबर में 2.29 लाख से अधिक कारों की डिलीवरी

 नई दिल्ली मारुति सुजुकी के लिए बीता नवंबर बेहद ही ख़ास रहा है. कंपनी ने पिछले 30 दिनों में अब तक की सबसे ज्यादा कारों की बिक्री का रिकॉर्ड दर्ज किया है. यानी मारुति सुजुकी जब से कारों की बिक्री कर रही है तब से अब तक एक महीने में इतनी कारें नहीं बेची गई हैं. एक महीने में कुल 2.29 लाख से ज्यादा कारों की बिक्री कर मारुति सुजुकी ने इतिहास रचा है. इसके पीछे जीएसटी 2.0 रेट कट और फेस्टिव सीजन सेल ने अहम भूमिका निभाई है. इतिहास रचने वाला महीना मारुति सुज़ुकी ने नवंबर 2025 में कुल 2,29,021 यूनिट की बिक्री दर्ज की. यह कंपनी का अब तक का सबसे बड़ा मासिक सेल्स आंकड़ा है. यह प्रदर्शन स्पष्ट संकेत देता है कि घरेलू बाजार में ब्रांड के प्रोडक्ट पोर्टफोलियो की मांग जबरदस्त है और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी भारतीय कारों की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है.  घरेलू बिक्री और एक्सपोर्ट कुल बिक्री में से 1,74,593 यूनिट घरेलू बाजार में बिकीं. वहीं 8,371 यूनिट दूसरे OEMs (टोयोटा) को भेजी गईं. एक्सपोर्ट ने इस रिकॉर्ड को बनाने में बड़ी भूमिका निभाई और 46,057 यूनिट के साथ अब तक का सबसे ज्यादा मंथली एक्सपोर्ट दर्ज किया गया. खासतौर पर Jimny फाइव-डोर और Baleno जैसे मॉडलों की ग्लोबल डिमांड ने इस उछाल को मजबूत किया है. एंट्री-लेवल और कॉम्पैक्ट कारें मारुति सुजुकी की एंट्री लेवल और कॉम्पैक्ट कारों की डिमांड भी लगातार बनी हुई है. इस सेग्मेंट में आने वाली ऑल्टो के10, एस-प्रेसो, बलेनो, स्विफ्ट, वैगनआर, डिजायर और सेलेरियो ने नवंबर में जबरदस्त प्रदर्शन किया है. GST 2.0 लागू होने के बाद कीमतों में आई कमी और त्योहारों के दौरान बढ़ी खरीदारी ने सेल्स को स्पीड दी. मिनी और कॉम्पैक्ट सेगमेंट ने मिलकर 85,273 यूनिट की बिक्री की और पिछले साल की तुलना में मजबूत बढ़त दिखाई. यूटिलिटी व्हीकल लाइनअप ने दिखाया दम यूटिलिटी व्हीकल (UV) सेग्मेंट में मारुति सुजुकी लगातार अपनी उपस्थिति मजबूत कर रही है. हाल ही में कंपनी ने मिड-साइज सेग्मेंट में अपनी नई कार विक्टोरिस को लॉन्च किया है. इसके अलावा ब्रेजा, अर्टिगा, फ्रांक्स, ग्रैंड विटारा, एक्सएल6, जिम्नी और इन्विक्टो जैसी लोकप्रिय SUVs ने 72,498 यूनिट का योगदान दिया.   इकलौती वैन का दबदबा Maruti Eeco अपने सेग्मेंट की सबसे ज्यादा लोकप्रिय कार है. बीते नवंबर में इसके 13,200 यूनिट बेचे गए. इको वैन की डिमांड पहले जैसी ही बनी हुई है. जबकि लाइट कमर्शियल व्हीकल Super Carry के कुल 3,622 यूनिट की बिक्री की गई. इन दोनों के साथ कुल घरेलू आंकड़ा 1,74,593 यूनिट पर पहुंच गया. अप्रैल से नवंबर की कुल बिक्री भी पिछले वित्त वर्ष की तुलना में बेहतर रही है. आने वाली हैं ये दो कारें मारुति सुजुकी आज अपनी पहली इलेक्ट्रिक कार Maruti e Vitara को लॉन्च करने जा रही है. इस इलेक्ट्रिक एसयूवी को दो अलग-अलग बैटरी पैक के साथ पेश किया जाएगा. ये मारुति की पहली कार होगी जिसमें 7 एयरबैग मिलेगा. कंपनी का दावा है कि, सिंगल चार्ज में ये कार 500 किमी तक की रेंज देगी.  भारत में लॉन्च से पहले ही ई विटारा एक्सपोर्ट शुरू हो चुका है और अब तक इसके 7,000 यूनिट्स को दूसरे देशों में भेजा जा चुका है. दूसरी ओर Maruti Brezza के नए फेसिलिफ्ट मॉडल को लॉन्च करने की तैयारी है. हाल ही में नई मारुति ब्रेजा को टेस्टिंग के दौरान स्पॉट किया गया है. इस एसयूवी को भी कई महत्वपूर्ण बदलाव के साथ पेश किया जाएगा.