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शीतलहर से बचाव के लिए एडवाइजरी जारी, आवश्यक तैयारियों और जनजागरूकता पर जोर

शीतलहर से बचाव के लिए आवश्यक तैयारियों एवं जनजागरूकता के लिए एडवाइजरी जारी गर्म कपड़े पहनें, कई परतों में वस्त्र धारण करें, अनावश्यक यात्रा से बचें संतुलित आहार व विटामिन-सी युक्त फल-सब्जियों का करें सेवन भोपाल आयुक्त लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा  तरुण राठी ने शीतलहर से बचाव के लिए समस्त चिकित्सा महाविद्यालयों के अधिष्ठाता, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी और सिविल सर्जन सह मुख्य अस्पताल अधीक्षक द्वारा मैदानी कर्मियों एवं आम नागरिकों को शीतलहर के लक्षण, बचाव उपाय तथा Do’s & Don’ts के संबंध में जागरूक करने और आवश्यक तैयरियां रखने के निर्देश दिए गए हैं। उल्लेखनीय है कि प्रदेश में माह दिसंबर एवं जनवरी के दौरान शीतलहर का प्रकोप प्रायः देखने को मिलता है। इस अवधि में कई क्षेत्रों में न्यूनतम तापमान 5–7 डिग्री सेल्सियस अथवा उससे कम दर्ज किया जाता है, जिससे जन-मानस के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है। अत्यधिक ठंड के कारण हाइपोथर्मिया, फ्रॉस्टबाइट जैसी शीतजनित बीमारियाँ तथा विषम परिस्थितियों में मृत्यु की संभावना भी हो सकती है। शीतलहर के दौरान विशेष रूप से 65 वर्ष से अधिक आयु के वृद्धजन, 5 वर्ष से कम आयु के बच्चे, हृदय एवं श्वसन रोग से पीड़ित व्यक्ति, बेघर लोग, खुले स्थानों व निर्माण स्थलों पर कार्यरत श्रमिक, सड़क किनारे रहने वाले व्यक्ति एवं छोटे व्यवसायी अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। शीतलहर क्या है शीतलहर एक मौसम संबंधी घटना है जिसमें न्यूनतम तापमान में अचानक गिरावट आती है, ठंडी हवाएँ चलती हैं तथा पाला या बर्फ जमने जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।  शीतलहर के दौरान क्या करें (Do’s) स्थानीय रेडियो, टीवी एवं समाचार पत्रों के माध्यम से मौसम की जानकारी नियमित रूप से लेते रहें। पर्याप्त मात्रा में गर्म कपड़े पहनें तथा कई परतों में वस्त्र धारण करें। सिर, गर्दन, हाथ एवं पैरों को अच्छी तरह ढकें; टोपी, मफलर एवं मोज़े का प्रयोग करें। वॉटरप्रूफ जूतों का उपयोग करें। गर्म एवं तरल पेय पदार्थ (चाय, सूप आदि) लेते रहें तथा संतुलित आहार व विटामिन-सी युक्त फल-सब्जियों का सेवन करें। ठंडी हवा से बचें, यथासंभव घर के अंदर रहें एवं अनावश्यक यात्रा से बचें। बच्चों, बुजुर्गों, अकेले रहने वाले एवं असहाय व्यक्तियों का विशेष ध्यान रखें। आवश्यक दवाइयों, ईंधन, पेयजल एवं अन्य आवश्यक सामग्रियों का पूर्व भंडारण रखें। ठंड से प्रभावित होने पर तुरंत चिकित्सकीय परामर्श लें और निकटस्थ अस्पताल से संपर्क करें। क्या न करें (Don’ts) अत्यधिक ठंड में खुले स्थानों पर अनावश्यक समय तक न रहें। गीले कपड़े पहनकर न रहें, तुरंत सूखे कपड़े पहनें। हाइपोथर्मिया से पीड़ित व्यक्ति को मादक पेय पदार्थ न दें। गंभीर ठंड के लक्षणों को नज़रअंदाज़ न करें। हाइपोथर्मिया एवं फ्रॉस्टबाइट के लक्षण तेज कंपकंपी, अत्यधिक थकान, भ्रम की स्थिति, बोलने में कठिनाई, नींद आना। हाथ-पैर की उंगलियों, कानों या नाक में सुन्नता, सफेद या पीला पड़ना। शिशुओं में ठंडी, लाल त्वचा एवं ऊर्जा की कमी। हाइपोथर्मिया एक चिकित्सकीय आपात स्थिति है। ऐसे में व्यक्ति को तुरंत गर्म स्थान पर ले जाकर सूखे कंबल से ढकें और शीघ्र अस्पताल पहुँचाएँ। मौसम की जानकारी नागरिक अद्यतन मौसम पूर्वानुमान एवं शीतलहर संबंधी चेतावनी निम्न वेबसाइट्स से प्राप्त कर सकते हैं

डिजिटल फ्रॉड रोकने का प्रयास, लेकिन सिम बाइंडिंग से यूजर्स पर बढ़ सकती है मुश्किलें

 नई दिल्ली भारत इस वक्त डिजिटल फ्रॉड के ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां हर फोन कॉल, हर मैसेज और हर लिंक शक के घेरे में आ चुका है. डिजिटल अरेस्ट, फर्जी पुलिस कॉल, बैंक इम्पर्सोनेशन और फिशिंग ने टेक्नोलॉजी को सहूलियत से डर में बदल दिया है. ऐसे माहौल में सरकार जब सिम बाइंडिंग जैसे कदम की बात करती है, तो पहली नज़र में ये एक सख्त लेकिन ज़रूरी फैसला लगता है. लेकिन टेक्नोलॉजी की दुनिया में अक्सर वही फैसले सबसे ज़्यादा नुकसान करते हैं जो देखने में बहुत आसान लगते हैं. सिम बाइंडिंग क्या है और क्यों इसकी चर्चा चल रही है. एक तरफ जहां टेलीकॉम कंपनियां सिम बाइंडिंग के सपोर्ट में दिख रही हैं वहीं दूसरी तरफ यूजर्स, एक्सपर्ट्स और बड़ी कंपनियां इससे अलग राय रख रही हैं.  ज्यादातर एक्सपर्ट्स की राय यही है कि सिम बाइंडिग के फायदे तो हैं, लेकिन यूजर्स के लिए डेली ऐप यूज में मुश्किल खड़ा कर सकता है और ये महंगा अफेयर भी हो सकता है.  एक टेक एडिटर के तौर पर, जिसने टेलिकॉम पॉलिसी, साइबर फ्रॉड और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स 10 साल तक करीब से कवर किया है, यह कहना ज़रूरी है कि सिम बाइंडिंग फ्रॉड का इलाज कम और सिस्टम की गलत समझ ज़्यादा दिखाता है. इरादा सही हो सकता है, लेकिन तरीका न तो पूरा है और न ही भविष्य के लिए सुरक्षित. सिम बाइंडिंग और लिमिट्स सिम बाइंडिंग का कॉन्सेप्ट सीधा है. जिस मोबाइल नंबर से WhatsApp, Telegram या कोई भी मैसेजिंग ऐप रजिस्टर हुआ है, वही सिम कार्ड फोन में होना चाहिए. सिम निकली, बदली या डीऐक्टिवेट हुई तो ऐप काम करना बंद. कई बार लोग इंडिया से बाहर जाते हैं और रोमिंग प्लान नहीं लेते हैं और वहां होटल के वाईफाई पर डिपेंडेंट रहते हैं. ऐसी स्थिति में अगर सिम बाइंडिंग आ गया तो वो वॉट्सऐप या कोई दूसरा ऐप जो उस फ़ोन से लिंक है यूज़ नहीं कर पाएंगे. वॉट्सऐप चलाने के लिए भी उन्हें महंगे रोमिंग प्लान की ज़रूरत होगी जो 3000-4000 रुपये से स्टार्ट होता है.  थ्योरी में यह एक मजबूत सिक्योरिटी लेयर लगती है. लेकिन असल दुनिया में फ्रॉड जिस तरह काम करता है, वहां यह थ्योरी जल्दी टूट जाती है. आज के साइबर अपराधी एक फोन, एक सिम या एक अकाउंट पर निर्भर नहीं रहते. वे पूरे नेटवर्क पर काम करते हैं. केवाईसी, सिम, बैंक अकाउंट और कॉल सेंटर सब कुछ अलग-अलग लोगों के नाम पर. ऐसे में सिम को ऐप से बांध देने से अपराधी नहीं रुकते, सिर्फ रास्ता बदलते हैं. फ्रॉड की जड़ कहां है, और सरकार क्या पकड़ रही है डिजिटल फ्रॉड की सबसे बड़ी समस्या सिम नहीं है. असली समस्या है फर्जी या किराए की पहचान. भारत में आज भी सिम म्यूलिंग एक बड़ा नेटवर्क बन चुका है, जहां वैलिड केवाईसी पर सिम लेकर उन्हें अपराधी नेटवर्क को सौंप दिया जाता है.  ये सिम पूरी तरह लीगल होते हैं, नंबर भी एक्टिव होते हैं और ट्रैकिंग भी संभव होती है. बावजूद इसके फिर भी फ्रॉड चलता रहता है. सिम बाइंडिंग इन नेटवर्क्स को तोड़ने की बजाय यह मान लेती है कि अपराधी टेक्नोलॉजी की बेसिक लेयर पर अटके हुए हैं. जबकि हकीकत यह है कि वे सिस्टम की कमजोरियों को बहुत गहराई से समझते हैं. यानी सरकार जिस समस्या का इलाज कर रही है, वो बीमारी की जड़ नहीं है. टेक्निकल हकीकत जिसे नीति से बाहर रखा गया यहां एक और अहम पहलू है जिस पर बहुत कम बात हो रही है. जिस तरह की सिम बाइंडिंग की कल्पना की जा रही है, वह मौजूदा मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम्स पर पूरी तरह संभव ही नहीं है. Android और iOS दोनों ही ऐप्स को लगातार सिम डिटेल्स या हार्डवेयर आइडेंटिफायर एक्सेस करने की परमिशन नहीं देते. यह कोई कमी नहीं, बल्कि यूज़र प्राइवेसी की बुनियाद है. इसी वजह से आज तक कोई भी मैसेजिंग ऐप ‘हर समय सिम मौजूद है या नहीं’ जैसी जांच नहीं करता. बैंकिंग ऐप्स यूज़ करते हैं सिम बाइंडिंग बैंकिंग ऐप्स भी जिसे सिम बाइंडिंग कहा जाता है, वह एक सीमित और टाइमली वेरिफिकेशन होता है, न कि स्थायी निगरानी.  सरकार जिस मॉडल को लागू करना चाहती है, वह या तो अधूरा रहेगा या फिर यूज़र एक्सपीरियंस को नुकसान पहुंचाएगा. अगर आप भी किसी बैंक का ऐप यूज़ करते हैं तो आपने ध्यान दिया होगा वो ऐप बिना रजिस्टर्ड सिम के काम नहीं करता. जिस फ़ोन में अकाउंट से लिंक्ड सिम डला है उस फ़ोन में ही बैंक का ऐप काम करता है. अगर सिम बाइंडिंग हुआ तो दूसरे मैसेजिंग ऐप के साथ भी ऐसा ही होगा.  आम यूज़र के लिए बढ़ता डिजिटल फ्रिक्शन अगर सिम बाइंडिंग को सख्ती से लागू किया जाता है, तो इसका सीधा असर आम यूज़र की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ेगा. आज लोग एक ही अकाउंट को फोन, लैपटॉप और टैबलेट पर इस्तेमाल करते हैं. मल्टी-डिवाइस एक्सपीरियंस मॉडर्न डिजिटल जीवन का हिस्सा बन चुका है. सिम बाइंडिंग इस सुविधा को कमजोर कर देगी. बार-बार लॉगआउट, री-वेरिफिकेशन, सिम बदलने पर ऐप बंद होना. ये सब उन लोगों के लिए बड़ी परेशानी बनेंगे जो टेक्नोलॉजी को काम के लिए इस्तेमाल करते हैं.  इंटरनेशनल ट्रैवल करने वाले, ई-सिम यूज़र और फ्रीलांसर सबसे पहले इसकी कीमत चुकाएंगे. फ्रॉड रोकने की कोशिश में सिस्टम ईमानदार यूज़र को सजा देने लगे, तो उस नीति पर सवाल उठना लाज़मी है. प्राइवेसी और भरोसे का बड़ा सवाल सिम बाइंडिंग सिर्फ सुविधा या टेक्नोलॉजी का मामला नहीं है. यह डिजिटल प्राइवेसी और भरोसे का भी सवाल है. हर अकाउंट को स्थायी रूप से एक सिम और पहचान से जोड़ देना अनॉनिमिटी को सीमित करता है. जर्नलिस्ट, व्हिसलब्लोअर्स और संवेदनशील वर्गों के लिए यह जोखिम भरा हो सकता है. हर यूज़र अपराधी नहीं होता, लेकिन सिम बाइंडिंग हर यूज़र को संदिग्ध मानकर सिस्टम डिजाइन करती है. यह सोच लोकतांत्रिक डिजिटल स्पेस के लिए खतरनाक हो सकती है. टेलिकॉम कंपनियां और पावर का बैलेंस यह भी संयोग नहीं है कि सिम बाइंडिंग को टेलिकॉम कंपनियों का समर्थन मिल रहा है. इससे नंबर-सेंट्रिक कंट्रोल मजबूत होता है और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर दबाव बढ़ता है.  सवाल यह है कि क्या यह फ्रॉड रोकने का प्रयास है या फिर डिजिटल इकोसिस्टम में … Read more

मध्य प्रदेश विधानसभा में चर्चा: मेडिकल कॉलेज और शिक्षकों की भर्ती, 903 लोगों पर एक डॉक्टर की स्थिति

भोपाल  विधानसभा के विशेष सत्र में बुधवार को बैतूल विधायक और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने बताया कि 2003 में मात्र पांच शासकीय और दो निजी मेडिकल कॉलेज थे। आज 19 सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं, छह केंद्र सरकार की मदद से बन रहे हैं। 14 निजी मेडिकल कॉलेज हैं और 13 पीपीपी मोड पर बनाए जा रहे हैं। कुछ सालों में 52 मेडिकल कॉलेज दिखेंगे हेमंत खंडेलवाल ने कहा कि कुछ सालों में 52 मेडिकल कॉलेज दिखेंगे। पीपीपी मोड पर बनने वाले चार मेडिकल कॉलेज का भूमिपूजन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा 23 दिसंबर को करेंगे। उन्होंने कहा कि अमेरिका में 320 लोगों पर एक, चीन में साढ़े चार सौ लोगों पर एक, जापान में 400 लोगों पर एक और मध्य प्रदेश में 903 लोगों पर एक डॉक्टर है। जब 52 मेडिकल कॉलेज धरातल पर आएंगे तो लगभग 10 हजार सीटें हो जाएंगी और हम देश के अग्रणी मेडिकल स्टेट में हो जाएंगे। जहां डॉक्टर और मरीज व्यक्तियों का अनुपात बराबर हो जाएगा। उन्होंने बताया कि पूरे देश में सर्वाधिक 34 लाख मरीजों का इलाज आयुष्मान योजना में प्रदेश सरकार ने कराया है। प्रदेश में 30 हजार शिक्षकों की भर्ती होगी स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने विभागीय उपलब्धियां गिनाते हुए आगामी कार्य योजना भी बताई। उन्होंने कहा कि 30 हजार 281 शिक्षक पदों पर भर्ती प्रक्रिया प्रारंभ कर दी है। 75 हजार के अतिरिक्त शिक्षकों की नियुक्ति की है। अतिथि शिक्षक को अप्रैल से लगाएंगे। पहले शिक्षक की छुट्टी पर क्लास खाली रहती थी, लेकिन अब एक दिन के लिए भी प्रधानाध्यापक अतिथि शिक्षक नियुक्त कर सकेंगे। तीन साल में 1,390 स्कूल भवन बनाए जाएंगे 20 हजार से अधिक अतिशेष शिक्षकों का युक्तियुक्तिकरण किया है। अधोसंरचना विकास के काम सभी स्कूलों में चल रहे हैं। आगामी तीन साल में 1,390 स्कूल भवन बनाए जाएंगे। 39 हजार स्कूल भवनों की मरम्मत होगी। निजी विद्यालयों में सिलेबस यूनीफॉर्म में आर्थिक शोषण की शिकायतें आती हैं। आगामी सत्र से हम शासकीय प्रेस से छपवाकर निजी स्कूल के लिए जनपद मुख्यालय स्तर पर बुक शिविर लगाए जाएंगे। बदतर स्थिति में है कानून व्यवस्था कांग्रेस विधायक बाला बच्चन ने कानून व्यवस्था का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार के मामले में पूरा थाना जेल चला गया। मप्र के इतिहास में पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। भोपाल में एमडी ड्रग की फैक्ट्री पकड़ाई। जनवरी 2024 से 30 जून 2025 तक 10,840 महिलाएं दुष्कर्म का शिकार हुईं। 21,175 महिलाएं और 1,954 कन्याएं एक माह से अधिक समय तक लापता रही हैं। जून 2025 तक 34 हजार साइबर अपराध के दर्ज हुए। सरकार इन सभी विषयों पर ध्यान दें। सरकारी स्कूलों में नेता-अधिकारियों के बच्चे अवश्य पढ़ें उप नेता प्रतिपक्ष हेमंत कटारे ने कहा कि हर स्कूल के पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से कृषि से संबंधित एक कोर्स जोड़ जाए। कानून बनाकर यह अनिवार्य किया जाए कि जनप्रतिनिधि और अधिकारी कम से कम दो से पांच वर्ष तक अपने बच्चों का सरकारी स्कूलों में दाखिला कराएं। इससे अपने आप शिक्षण संस्थानों का सुधार हो जाएगा। 30,900 किमी सड़क बनाएंगे पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल ने कहा कि आने वाले तीन साल में 30,900 किलोमीटर सड़क और 1,767 क्षतिग्रस्त पुल बनाएंगे। एक हजार से ज्यादा पंचायतों में किसी भी प्रकार का नेटवर्क नहीं है। वहां काम शुरू करने जा रहे हैं। दिसंबर 2026 तक प्रदेश में कोई भी गांव या पंचायत ऐसी नहीं है जहां श्मशान घाट में कनेक्टिविटी न हो। दुकान के अंदर श्रम अधिकारी बिना आयुक्त की अनुमति नहीं जाएगा। सॉफ्टवेयर बताएगा परियोजना की समय-सीमा लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने कहा कि देश में पहली बार मध्य प्रदेश में हम वैज्ञानिक और सॉफ्टवेयर आधारित किसी भी परियोजना की समय-सीमा तय को कर रहे हैं। सॉफ्टवेयर बताएगा कि परियोजना की समय-सीमा कितनी होनी चाहिए। एक टाइगर कारिडोर निर्माण की योजना पहली बार देश में एक टाइगर कारिडोर निर्माण की योजना बनाई गई है। इसके लिए पांच नेशनल पार्क का चयन किया है। यह देश और विदेश के सभी पर्यटकों को आकर्षित करेगा। वहीं, भावांतर सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग ने हुए कहा कि भावांतर योजना में सरसों और मूंगफली का लाभ भी देने की कार्य योजना बनाई जा रही है। मौसम आधारित बीमा योजना भी शीघ्र प्रारंभ की जाएगी। उर्वरक की होम डिलेवरी सेवा भी शुरू करने का प्रयास किया जा रहा है। वर्ष 2026 को कृषि वर्ष के रूप में मनाया जाएगा। सीएम केयर योजना लाने जा रहे हैं उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने कहा कि हम सीएम केयर योजना लाने जा रहे हैं। इसमें कॉर्डियोलाजी, कैंसर, आर्गन ट्रांसप्लांट, क्रिटिकल केयर जैसे विभाग मेडिकल कॉलेज में खोले जाएंगे। भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर, इंदौर और रीवा मेडिकल कॉलेज को एम्स (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) की तर्ज पर तैयार करेंगे। दो साल में एक लाख माताओं में 173 मृत्यु हो जाया करती थी। वह घटकर 137 हो गई है। शिशु मृत्यु दर भी 48 से घटकर 37 हुई है। मध्य प्रदेश में साढ़े चार करोड़ लोगों का आयुष्मान योजना में पंजीयन हैं। गरीबों के उपचार के लिए 11 हजार करोड़ का भुगतान किया गया है। एयर एम्बुलेंस और शव वाहन योजना लागू की है।  

नया AI टोल सिस्टम क्या है? FASTag और GPS टोल से जानिए पूरा फर्क

 नई दिल्ली आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) अब टोल गेट पर भी एंट्री करने जा रहा है. अब भारत के हाइवे और टोल गेट पर टोल चार्जेस काटने का काम AI बेस्ड सिस्टम से होगा. केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने बुधवार को राज्यसभा में बताया है कि सेटेलाइट बेस्ड टोल कलेक्शन सिस्टम साल 2026 के अंत तक लागू हो जाएगा.  दरअसल, प्रश्नकाल के दौरान सवालों के जवाब देते हुए मंत्री ने कहा कि न्यू टोल बेस्ड सिस्टम टेक्नोलॉजी सेटेलाइट और AI बेस्ड होगा. इसके लिए कार या अन्य व्हीकल मालिक को टोल गेट पर रुकने की जरूरत नहीं होगी. वह 80 किलोमीटर की स्पीड से भी टोल गेट पार कर सकेंगे.  सरकारी रेवेन्यू को होगा फायदा  मंत्री ने कहा कि AI Toll सिस्टम से 1500 करोड़ रुपये के फ्यूल सेविंग होगी और सरकारी रेवेन्यू में 6,000 करोड़ शामिल होंगे. AI बेस्ड टोल कलेक्शन सिस्टम फास्टैग और जीपीएस बेस्ड टोल सिस्टम से अलग होगा.  AI टोल सिस्टम कैसे काम करेगा? AI बेस्ड टोल कलेक्शन सिस्टम, असल में MLFF (Multi-Lane Free Flow) सिस्टम है. इस सिस्टम के तहत हाइवे पर टोल बूथ नहीं होंगे. इसके लिए एक लोहे का स्ट्रक्चर तैयार होगा, जिसको गैन्ट्री कहा जाता है. गैन्ट्री पर हाई रेजोल्यूशन कैमरा और सेंसर होंगे, जो कार की नंबर प्लेट को डिटेक्ट करेंगे और एनालाइज करेंगे. यह सिस्टम एंट्री और एग्जीट दोनों पर होगा, इसके बाद टोल चार्ज वसूला जाएगा. यह पूरा काम ऑटोमैटिक होगा और कार को टोल टैक्स के लिए कहीं रोकने की जरूरत नहीं होगी.  AI बेस्ड टोल फास्टैग और GPS बेस्ड सिस्टम से कितना अलग है?  सर्विस का नाम               FASTag (मौजूदा)           GPS/GNSS (सैटेलाइट)               AI आधारित (MLFF) टेक्नोलॉजी                  RFID (रेडियो फ्रीक्वेंसी)          सैटेलाइट ट्रैकिंग                           कैमरा और AI विजन रुकने की जरूर             थोड़ा रुकना पड़ता है      नहीं रुकना पड़ेगा                               नहीं रुकना पड़ेगा  डिवाइस                        विंडशील्ड पर स्टिकर     व्हीकल में OBU (डिवाइस)                   सिर्फ नंबर प्लेट हो  टोल रेट                          फिक्स्ड रेट                     जितनी दूरी उतना चार्ज                    जितनी दूरी उतना चार्ज  बैरियर                        टोल गेट लगे होते हैं              गेट फ्री टेक्नोलॉजी                             गेट फ्री टेक्नोलॉजी  मौजूदा FASTag सिस्टम का क्या होगा?  मौजूदा टोल कलेक्शन सिस्टम FASTag बेस्ड है, जिसमें व्हीकल के विंड स्क्रीन पर एक रेडियो फ्रिक्वेंसी (RFID) टैग लगाना होता है. इस सिस्टम के तहत एक छोटी चिप होती है. यह स्टिकर चिप प्रीपेड वॉलेट या बैंक अकाउंट से लिंक होता है.  FASTag बेस्ड स्टिकर वाली कार जैसे ही टोल गेट पर पहुंचती है, गेट के ऊपर लगे सेंसर RFID चिप को डिटेक्ट करते हैं. इसके बाद गेट ओपन हो जाते हैं. हालांकि फास्टैग में बैलेंस माइनस में है तो वह ब्लैक लिस्ट हो जाता है. इसकी वजह से टोल गेट ओपन नहीं होता है. ऐसे में आपको टोल चार्ज कैश में पेमेंट करनी पड़ती है.  AI और GPS टोल अलग-अलग सिस्टम हैं.  GPS आधारित सिस्टम (GNSS) के लिए व्हीकल में एक विशेष ट्रैकिंग डिवाइस (OBU) की जरूरत होगी. वहीं, AI सिस्टम मुख्य रूप से बाहरी कैमरों और आपकी गाड़ी की मौजूदा नंबर प्लेट की मदद से काम करता है. यह AI सिस्टम उन गाड़ियों के लिए भी यूजफुल होगा, जिनके अंदर GPS नहीं लगा है. 

SBI रिपोर्ट: डॉलर मजबूती के बावजूद रुपये में अगले 6 महीनों में होगा बदलाव

नई दिल्‍ली भारतीय रुपये की लगातार गिरावट ने एक्‍सपर्ट्स के बीच एक बहस छेड़ दी है कि आखिर ये कितना गिरेगा. SBI रिसर्च ने अपनी नई रिपोर्ट में एक बड़ा दावा किया है. एसबीआई ने 'इन रूपी वी ट्रस्‍ट' में कहा है कि भारतीय रुपया अभी डीवैल्‍यूवेशन के तीसरे चरण से गुजर रही है, जो रुपया और अमेरिकी डॉलर दोनों में एक साथ कमजोरी का दौर है.  एसबीआई ने कहा कि रुपये में गिरावट घरेलू व्यापक आर्थिक तनाव और वैश्विक अनिश्चितता, विशेष रूप से भू-राजनीतिक तनाव और व्यापार व्यवधानों के कारण हो रही है. रिपोर्ट में कहा गया है कि मार्कोव रिजीम-स्विचिंग मॉडल का उपयोग करते हुए, एसबीआई रिसर्च का अनुमान है कि रुपया लगभग छह महीने तक दबाव में रह सकता है. लेकिन इसके बाद इसमें शानदार तेजी आएगी. इसके बाद इसमें करीब 6.5 फीसदी की उछाल आ सकती है और संभावित तौर से  2026 में यह वापस 87 रुपये प्रति डॉलर की ओर बढ़ सकता है.  आरबीआई के एक्‍शन से उछला रुपया भारतीय रुपया मंगलवार को 91 प्रति डॉलर के स्तर को पार कर गया और सर्वकालिक निम्न स्तर पर पहुंच गया, लेकिन अगले दिन इसमें तेजी से सुधार हुआ.  बुधवार को मुद्रा 90.3475 प्रति अमेरिकी डॉलर पर कारोबार कर रही थी, जो इसके पिछले बंद भाव 91.0275 से 1 फीसदी  से ज्‍यादा की उछाल है. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के मजबूत हस्तक्षेप ने 17 दिसंबर को रुपये में सात महीनों में सबसे मजबूत तेजी आई, जिससे अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लंबे समय से चली आ लगातार गिरावट पर ब्रेक लग गई.  सरकारी बैंकों द्वारा डॉलर की लगातार बिक्री के बाद शुरुआती कारोबार में घरेलू मुद्रा में उछाल आया है. माना जा रहा है कि सरकारी बैंक ने केंद्रीय बैंक के हस्‍तक्षेप के बाद ऐसा फैसला किया है. इस हस्तक्षेप से अस्थिरता को कम करने और बाजार की भावना को स्थिर करने में मदद मिली. रुपये में 1.03% की वृद्धि हुई, जो 23 मई, 2025 के बाद से एक दिन में सबसे बड़ी तेजी है.  रुपये में गिरावट क्यों? एक्‍सपर्ट्स के अनुसार रुपये को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा संरचनात्मक परिवर्तन 2014 से पहले की अवधि की तुलना में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश में आई भारी गिरावट है. 2007 से 2014 के बीच, नेट पोर्टफोलियो निवेश औसतन 162.8 अरब डॉलर प्रति वर्ष था, जिससे करेंसी को मजबूती मिली थी. हालांकि, 2015 से 2025 तक, औसत निवेश घटकर 87.7 अरब डॉलर रह गया है, जिससे वैश्विक झटकों को झेलने की क्षमता कम हो गई है. अकेले 2025 में, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) का निवेश 10 अरब डॉलर से अधिक हो गया, जिससे रुपये पर लगातार दबाव बना रहा.  एसबीआई रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में भू-राजनीतिक तनाव और टैरिफ को भी रुपये में गिरावट की वजह बताई है.रिपोर्ट के मुताबिक, टैरिफ ऐलान के बाद से ही रुपये में 5.7 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है.   डॉलर की डिमांड रिपोर्ट में विदेशी मुद्रा बाजार के व्‍यापारी क्षेत्र में डॉलर की बढ़ती मांग पर भी प्रकाश डाला गया है. जुलाई 2025 से, अनिश्चितता के बीच आयातकों और निर्यातकों द्वारा हेजिंग बढ़ाने के कारण फॉरवर्ड बाजार में अतिरिक्त मांग में तेजी से वृद्धि हुई है. व्यापारी बाजार में कुल अतिरिक्त मांग 145 अरब डॉलर तक पहुंच गई, जिसके चलते भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को हस्तक्षेप करना पड़ा. क्या 2026 में रुपया 87 पर होगा? इस गिरावट के बाद भी एसबीआई रिसर्च रुपया पर पॉजिटिव बना हुआ है. इसके मार्कोव-स्विचिंग विश्लेषण से पता चलता है कि रुपया लगभग छह महीने बाद मौजूदा गिरावट के दौर से बाहर निकल सकता है. ऐतिहासिक रुझान बताते हैं कि एक बार ऐसा होने पर मुद्रा में उल्लेखनीय सुधार होता है. इसी आधार पर, रिपोर्ट भू-राजनीतिक जोखिमों में कमी और पूंजी प्रवाह में स्थिरता आने की स्थिति में, 2026 में लगभग 6.5% की संभावित वृद्धि का अनुमान है, जो 87 लेवल पर रुपया को पहुंचा देगा. 

सिर्फ एक साधारण ब्लड टेस्ट से पता चलेगा आप कितने दिन जिएंगे

नई दिल्ली ब्लड टेस्ट भले सुनने में साधारण लग सकता है लेकिन यह बहुत ही असरदार होता है. एक ब्लड टेस्ट सिर्फ आपके हेल्थ की अपडेट्स नहीं देता बल्कि यह भी बताता है कि आप कितना और जीने वाले हैं. हाल ही में इस संबंध में ब्रिटेन स्थित सरे यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने एक स्टडी की है. अब तक डॉक्टर किसी की उम्र, वजन, ब्लड प्रेशर, स्मोकिंग की आदत और कुछ सामान्य ब्लड टेस्ट के आधार पर ही खतरे का अनुमान लगाते रहे हैं. ये तरीके अक्सर बहुत ही सामान्य होते हैं और सही जानकारी नहीं दे पाते.  नई स्टडी में क्या खास है? इस समस्या को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञों ने यह जानने की कोशिश की कि क्या हमारे खून में पहले से ऐसे संकेत मौजूद हैं जो भविष्य की सेहत के बारे में बता सकें. इस स्टडी में खून में मौजूद प्रोटीन पर फोकस किया गया क्योंकि यह शरीर के अंदर चल रहे प्रोसेस की जानकारी देता है. अध्ययन में उम्र, BMI और स्मोकिंग जैसी आदतों को ध्यान में रखा जिससे सटीक नतीजे निकले. प्रोटीन पैनल और मौत का जोखिम इसके बाद वैज्ञानिकों ने सैकड़ों ऐसे प्रोटीन की पहचान की जिनका संबंध कैंसर, दिल की बीमारी और किसी भी वजह से होने वाली मौत के जोखिम से जुड़ा पाया गया. एक पैनल में 10 ऐसे प्रोटीन थे जो अगले 10 साल में मौत के कुल जोखिम से जुड़े थे. वहीं, दूसरे पैनल में 6 प्रोटीन रखे गए थे जो पांच साल के जोखिम का संकेत देते थे. यह मॉडल सिर्फ उम्र और लाइफस्टाइल पर आधारित पुराने तरीकों से बेहतर निकले.  कौन देता है शरीर में बदलाव की जानकारी? खून में मौजूद प्रोटीन शरीर के अंदर हो रहे बदलावों की रियल-टाइम जानकारी देते हैं. ये सूजन, अंगों पर दबाव या ऊतकों (Tissue) के खराब होने जैसे बदलावों को दिखा सकते हैं जो लक्षण के तौर पर सामने नहीं आते. लेकिन, वैज्ञानिकों ने यह भी साफ किया कि इस स्टडी का ये मतलब नहीं है कि कोई ब्लड टेस्ट मौत की तारीख बता देगा. यह भविष्यवाणी नहीं बल्कि एक चेतावनी की तरह है. इस टेस्ट में 39 से 70 साल के करीब 38 हजार लोगों को शामिल किया गया था.