samacharsecretary.com

आगरा में RTE दाखिले में लापरवाही, 18 स्कूलों पर कार्रवाई की तैयारी

 आगरा  यूपी के आगरा में निशुल्क शिक्षा का अधिकार (आरटीई) के तहत गरीब और कमजोर आय वर्ग के बच्चों को निजी स्कूल प्रवेश नहीं दे रहे हैं। 2213 बच्चे प्रवेश से वंचित हैं। स्कूल संचालक अभिभावकों को औपचारिकता पूरी कराने के लिए टाल मटोल करने में लगे हैं। शुक्रवार को जिला टास्क फोर्स (डीटीएफ) की बैठक में डीएम मनीष बंसल के सामने यह मामला आया तो उन्होंने ऐसे स्कूलों पर सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही इसमें लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की बात कही है। आरटीई के तहत आगरा के 8112 बच्चों को प्रवेश लिए चयनित किया गया था। इनमें से 5899 बच्चों को निजी स्कूलों में प्रवेश मिल चुका है। मगर 2213 बच्चे प्रवेश के लिए भटक रहे हैं। उनके माता-पिता स्कूलों के चक्कर काट-काटकर परेशान हो चुके हैं। डीएम ने जब इस लापरवाही का कारण पूछा तो अधीनस्थों ने बताया कि 18 निजी स्कूल हैं जो कि अड़चन पैदा कर रहे हैं। हालांकि इन स्कूलों को नोटिस जारी कर दिए हैं, लेकिन इसके बावजूद भी बच्चों को प्रवेश नहीं हुआ है। इस पर डीएम ने फटकार लगाते हुए इन स्कूलों पर कड़ी कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। बीईओ जाकर कराएं प्रवेश: डीएम डीएम मनीष बंसल ने कहा कि खंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) ऐसे स्कूलों में खुद जाकर देखें किन कारणों से बच्चों को प्रवेश नहीं मिल रहे हैं। जो औपचारिकताएं पूरी करा चुके हैं, उनके बच्‍चों को तत्काल प्रभाव से प्रवेश कराया जाए। प्रवेश नहीं देने के कारण जानकार उन्हें इसकी रिपोर्ट प्रस्तुत करें। आरटीई में शत प्रतिशत प्रवेश कराया जाना चाहिए। जो प्रवेश में बाधा डाल रहे हैं, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें। बीईओ रोजाना चखेंगे मिडडे मील नवागत डीएम मनीष बंसल ने स्कूल चलो अभियान को जनआंदोलन बनाने की बात कही है। स्कूलों में पंजीकरण की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ ये भी देखा जाए कि बच्चें प्रतिदिन स्कूल पहुंचे। इसके अलावा बच्चों को मिलने वाला मिड डे मील को बीईओ बच्चों के साथ बैठकर मिड डे मील खाएं। ऐसा करते हुए प्रतिदिन फोटो शेयर करें।  

BPSC परीक्षा में सॉल्वर गैंग का जाल, 8 FIR दर्ज

पटना बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) द्वारा आयोजित सहायक शिक्षा विकास पदाधिकारी (AEDO) की परीक्षा में धांधली की परतें अब तेजी से खुलने लगी हैं। आर्थिक अपराध इकाई (EOU) की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, इसमें एक बड़े संगठित गिरोह और 'सॉल्वर गैंग' की भूमिका सामने आ रही है। इस मामले में अब तक बिहार के 5 अलग-अलग जिलों में 8 एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं, वहीं पुलिस ने अब तक कुल 38 आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। EOU ने मामले की गंभीरता को देखते हुए BPSC से कई अहम जानकारियां मांगी हैं, जिससे आने वाले दिनों में कुछ बड़े नामों पर गाज गिरना तय माना जा रहा है। 5 जिलों में एक जैसा चीटिंग पैटर्न EOU की जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि मुंगेर, नालंदा, बेगूसराय, शेखपुरा और गया जैसे जिलों के परीक्षा केंद्रों पर धांधली का एक जैसा पैटर्न मिला है। कई अभ्यर्थी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज के साथ रंगे हाथों पकड़े गए। जांच के दौरान यह भी सामने आया है कि इस धांधली के पीछे एक बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा था, जो अभ्यर्थियों को 25 से 30 लाख रुपये में परीक्षा पास कराने का झांसा देता था। SIT का गठन कर अब इस संगठित गिरोह के मास्टरमाइंड की तलाश की जा रही है। ब्लैकलिस्टेड कंपनी पर क्यों मेहरबान था आयोग? जांच का सबसे बड़ा और विवादित पहलू परीक्षा आयोजित कराने वाली निजी एजेंसी 'मेसर्स साई एजु केयर प्राइवेट लिमिटेड, जयपुर' की भूमिका है। रिपोर्ट के अनुसार, जिस कंपनी को परीक्षा के संचालन की जिम्मेदारी दी गई थी, उसे नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने पहले ही ब्लैकलिस्टेड कर रखा है। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर एक दागी कंपनी को इतनी महत्वपूर्ण परीक्षा का जिम्मा कैसे दिया गया? इसके अलावा, बायोमेट्रिक हाजिरी लेने वाले कर्मचारियों की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई है, जिनसे अब कड़ी पूछताछ की जा रही है। 14 से 21 अप्रैल के बीच हुई थी परीक्षा BPSC ने 14 अप्रैल से 21 अप्रैल के बीच AEDO की परीक्षा आयोजित की थी। परीक्षा के दौरान ही कई केंद्रों से गड़बड़ी की खबरें आने लगी थीं, जिसके बाद EOU ने मोर्चा संभाला। अब EOU ने BPSC से उन सभी अधिकारियों और कर्मचारियों का ब्यौरा मांगा है, जो परीक्षा प्रक्रिया और एजेंसी के चयन में शामिल थे।

हाईटेक एंबुलेंस सेवा से मिलेगा तेज इलाज, GPS और लाइफ सपोर्ट सिस्टम से लैस होंगे वाहन

चंडीगढ़ हरियाणा की सड़कों पर बढ़ते हादसे अब सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि हर मिनट जिंदगी और मौत की जंग बन चुके हैं। कई मामलों में एंबुलेंस की थोड़ी सी देरी भारी पड़ जाती है। इसे देखते हुए राज्य सरकार अब अपने इमरजेंसी एंबुलेंस नेटवर्क की रफ्तार को तेजी देगी ताकि हादसे के बाद मदद मिनटों में पहुंचे, घंटों में नहीं। इसके लिए राज्य सरकार अपने एंबुलेंस बेड़े में 296 नई एंबुलेंस शामिल करने जा रही है। इन एंबुलेंस के जरिये सरकार का लक्ष्य किसी भी हादसे या ट्रामा के स्पॉट पर दस मिनट से कम समय पर पहुंचने का रखा गया है। नए बेड़े में 70 एंबुलेंस एडवांस्ड लाइफ सपोर्ट वाली होंगी। 59 को आउटसोर्सिंग के जरिये शामिल किया जाएगा। बाकी 167 बेसिक लाइफ सपोर्ट (बीएलएस) एंबुलेंस की खरीद प्रक्रिया जारी है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के निदेशक डॉ. वीरेंद्र यादव ने बताया, ट्रॉमा, हार्ट अटैक और सड़क हादसों जैसी आपात स्थितियों में हर मिनट की अहमियत होती है। खासतौर पर हाईवे और घनी आबादी वाले शहरों में बढ़ती इमरजेंसी कॉल्स को देखते हुए त्वरित प्रतिक्रिया बेहद जरूरी हो गई है। कोशिश है कि जरूरत के समय एंबुलेंस दस मिनट से कम समय पर पहुंचे। मार्च का हमारी एंबुलेंस का औसत 9.29 मिनट का आया है। अब इसे नौ मिनट के आसपास ही रखना है। इस पर खासी निगरानी की जा रही है। अमर उजाला ने एंबुलेंस की कमी का भी मुद्दा उठाया था। सात जिलों में एंबुलेंस की संख्या बढ़ेगी राज्य में फिलहाल 550 एंबुलेंस हैं। इनमें 210 के वाहन अपनी उम्र पूरी कर चुके हैं। गुरुग्राम में 27 एंबुलेंस को बढ़ाकर 35, फरीदाबाद में 20 से 27, पंचकूला में 21 से 27, यमुनानगर में 20 से 25, हिसार में 30 से 33, करनाल में 30 से 31 और सिरसा में 32 से 37 एंबुलेंस तैनात करने का प्रस्ताव है। इस विस्तार का मकसद आपातकालीन प्रतिक्रिया समय को कम करना और दुर्घटना या गंभीर मरीजों तक तेजी से चिकित्सा सहायता पहुंचाना है। हाईटेक होगी एंबुलेंस सेवा नई एंबुलेंस सिर्फ संख्या नहीं बढ़ाएंगी, बल्कि तकनीक से भी लैस होंगी। इनमें रियल-टाइम जीपीएस ट्रैकिंग, ऑटोमैटिक कॉल-रूटिंग सिस्टम और डायरेक्ट कम्युनिकेशन डिवाइस लगाए जाएंगे जिससे कॉल से लेकर रिस्पॉन्स तक का समय घटेगा। एडवांस्ड लाइफ सपोर्ट एम्बुलेंस में कार्डियक मॉनिटर, डिफिब्रिलेटर, ऑक्सीजन सपोर्ट और जरूरी दवाओं जैसी सुविधाएं होंगी ताकि मरीज को मौके पर ही स्थिर किया जा सके। इसके साथ ही स्टाफ को भी विशेष ट्रेनिंग दी जाएगी। ड्राइवर, इमरजेंसी मेडिकल टेक्नीशियन और कॉल सेंटर ऑपरेटरों को खास ट्रेनिंग दी जाएगी ताकि कॉल आने से लेकर मरीज को अस्पताल पहुंचाने तक हर कदम पर बेहतर तालमेल बन सके। किस साल कितना टाइम रहा साल             एंबुलेंस का टाइम 2017-18             16 मिनट 2018-19             16 मिनट 2019-20             16 मिनट 2020-21             15 मिनट 2021-22             13 मिनट 2022-23             12 मिनट 2023-24             12 मिनट 2024-25             11 मिनट  

रांची में जल संकट गहराया, धुर्वा-हटिया क्षेत्र में आपूर्ति बाधित

रांची  झारखंड की राजधानी रांची इन दिनों भीषण जल संकट से जूझ रही है. खासकर धुर्वा और आसपास के इलाकों में स्थिति बेहद गंभीर हो गई है. पिछले तीन दिनों से जलापूर्ति व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है, जिससे करीब एक लाख की आबादी बूंद-बूंद पानी के लिए परेशान है. भीषण गर्मी के बीच पानी की कमी ने लोगों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं. हटिया डैम से सप्लाई बाधित शहर के कई प्रमुख इलाकों (धुर्वा, हटिया, डोरंडा, हिनू, बिरसा चौक और एयरपोर्ट क्षेत्र) में हटिया डैम से होने वाली जलापूर्ति बाधित हो गई है. इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को पिछले 72 घंटों से नियमित पानी नहीं मिल पा रहा है. इससे दैनिक जीवन पूरी तरह प्रभावित हो गया है. जलापूर्ति बाधित होने का असर घरों के साथ-साथ छोटे व्यवसायों और दुकानों पर भी देखने को मिल रहा है. बिजली कटौती बनी मुख्य वजह पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के अनुसार इस संकट की सबसे बड़ी वजह लगातार हो रही बिजली कटौती है. हटिया डैम स्थित वाटर ट्रीटमेंट प्लांट और पंपिंग स्टेशनों को पर्याप्त बिजली नहीं मिल पा रही है. बिजली की कमी के कारण पानी को लिफ्ट करने और पाइपलाइन में पर्याप्त दबाव (प्रेशर) बनाने में समस्या आ रही है. इसी वजह से जलापूर्ति पूरी तरह सुचारू नहीं हो पा रही है. आंशिक सप्लाई से बढ़ी परेशानी पिछले तीन दिनों से इन इलाकों में केवल आंशिक जलापूर्ति ही हो रही है. कई जगहों पर नलों में पानी आता भी है, तो उसका प्रेशर बेहद कम होता है. इससे लोगों को पानी भरने में काफी दिक्कत हो रही है. धुर्वा सेक्टर-2 के निवासी राजीव सिन्हा बताते हैं कि नल से पानी या तो आता नहीं है, और अगर आता है तो इतना कम कि बर्तन भरना भी मुश्किल हो जाता है. बाजार से पानी खरीदने को मजबूर लोग जल संकट के चलते लोग अब बाजार से जार और बोतलबंद पानी खरीदने को मजबूर हो गए हैं. इससे आम लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है. गर्मी के मौसम में पानी की मांग पहले से ज्यादा होती है, लेकिन सप्लाई अनियमित होने के कारण स्थिति और बिगड़ गई है. कई परिवारों को अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए पानी का इंतजाम करना चुनौती बन गया है. विभाग ने जताई परेशानी पेयजल विभाग के अधिकारियों का कहना है कि वे बिजली विभाग के साथ समन्वय बनाकर स्थिति को सुधारने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन जब तक पावर कट की समस्या दूर नहीं होती, तब तक जलापूर्ति को पूरी तरह बहाल करना मुश्किल रहेगा. अधिकारियों के अनुसार, जैसे ही बिजली आपूर्ति सामान्य होगी, जलापूर्ति भी धीरे-धीरे सुचारू हो जाएगी. लोगों में बढ़ती नाराजगी लगातार हो रही पानी की किल्लत से लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही है. स्थानीय निवासियों का कहना है कि हर साल गर्मी के मौसम में ऐसी समस्या सामने आती है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकाला जाता. लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि जलापूर्ति और बिजली व्यवस्था को बेहतर बनाया जाए, ताकि भविष्य में इस तरह की परेशानी से बचा जा सके. जल्द समाधान की उम्मीद फिलहाल प्रशासन और संबंधित विभाग स्थिति को सामान्य करने के प्रयास में जुटे हैं. लेकिन जब तक बिजली की समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता, तब तक जल संकट से पूरी तरह राहत मिलना मुश्किल नजर आ रहा है. रांची के हजारों लोगों के लिए यह समय काफी चुनौतीपूर्ण है, और सभी को जल्द से जल्द राहत मिलने की उम्मीद है.  

भारत-न्यूजीलैंड फ्री ट्रेड डील: निर्यात और MSME सेक्टर को बड़ा फायदा

 नई दिल्ली  भारत और न्यूजीलैंड के बीच लंबे समय से लंबित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर आज भारत मंडपम में हस्ताक्षर होने जा रहे हैं। इस मौके पर केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और न्यूजीलैंड के व्यापार एवं निवेश मंत्री टॉड मैक्ले मौजूद रहेंगे। यह समझौता मार्च 2025 में शुरू हुई बातचीत के बाद दिसंबर 2025 में अंतिम रूप से तैयार हुआ था। इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार और आर्थिक सहयोग को बढ़ाना है। पीयूष गोयल ने कहा कि यह समझौता आने वाले महीनों में लागू होगा और इससे भारत-न्यूजीलैंड के बीच व्यापार को नई गति मिलेगी। भारत को क्या होगा फायदा? इस समझौते के तहत भारत से न्यूजीलैंड जाने वाले करीब 70 प्रतिशत उत्पादों पर आयात शुल्क नहीं लगेगा। इससे भारतीय निर्यातकों को बड़ा लाभ मिलेगा। पीयूष गोयल के मुताबिक, इससे आगरा के लेदर उद्योग, उत्तर प्रदेश के हैंडलूम और हैंडीक्राफ्ट जैसे क्षेत्रों को नए मौके मिलेंगे। यह समझौता खास तौर पर श्रम आधारित और MSME सेक्टर के लिए फायदेमंद माना जा रहा है। इस समझौते में सेवा क्षेत्र को भी शामिल किया गया है। इसके तहत भारतीय पेशेवरों के लिए हर साल 5000 अस्थायी वीजा दिए जाएंगे, जिनकी अवधि तीन साल तक होगी। इन वीजा के तहत आईटी, इंजीनियरिंग, हेल्थकेयर, शिक्षा और कंस्ट्रक्शन जैसे क्षेत्रों में काम करने का मौका मिलेगा। इसके अलावा आयुष विशेषज्ञ, योग प्रशिक्षक, भारतीय शेफ और संगीत शिक्षक भी इसमें शामिल होंगे। नियमों में राहत और कृषि सहयोग FTA के तहत नियमों को आसान बनाया जाएगा और गैर-टैरिफ बाधाओं को कम किया जाएगा। इससे भारतीय दवाओं और मेडिकल उपकरणों को न्यूजीलैंड में जल्दी मंजूरी मिल सकेगी। कृषि क्षेत्र में भी दोनों देश मिलकर काम करेंगे। कीवी, सेब और शहद जैसे उत्पादों पर एग्री-टेक्नोलॉजी प्लान के जरिए सहयोग बढ़ाया जाएगा। इस समझौते का लक्ष्य अगले पांच साल में द्विपक्षीय व्यापार को 2.4 अरब डॉलर से बढ़ाकर 5 अरब डॉलर तक पहुंचाना है। न्यूजीलैंड को क्या मिलेगा? इस समझौते के तहत न्यूजीलैंड को भारत में अपने 95 प्रतिशत उत्पादों पर शुल्क में छूट या समाप्ति का लाभ मिलेगा। इनमें ऊन, कोयला, लकड़ी, वाइन, एवोकाडो और ब्लूबेरी जैसे उत्पाद शामिल हैं, जबकि कुछ उत्पादों पर कोटा लागू होगा। हालांकि भारत ने डेयरी, प्याज, चीनी, मसाले, खाद्य तेल और रबर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को इस समझौते से बाहर रखा है, ताकि घरेलू किसानों और उद्योगों की सुरक्षा हो सके। हस्ताक्षर से पहले पीयूष गोयल और टॉड मैक्ले ने अपने परिवार के साथ ताजमहल का दौरा किया और करीब दो घंटे वहां बिताए। इस दौरान गोयल ने आगरा के उद्योगपतियों से भी मुलाकात की, जिसमें लेदर, टेक्सटाइल, मसाले, हैंडलूम, हैंडीक्राफ्ट और कारपेट सेक्टर के प्रतिनिधि शामिल थे। उन्होंने कहा कि आगरा भविष्य में निर्यात के क्षेत्र में अहम भूमिका निभाएगा और यहां के उद्योगों की समस्याओं पर भी विस्तार से चर्चा की गई। साथ ही देशभर में 100 इंडस्ट्रियल पार्क बनाने की योजना के तहत आगरा के पास भी एक नया औद्योगिक पार्क बनाने पर विचार किया जा रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर,भारत की नई रणनीतिक सैन्य सोच का प्रदर्शन

नई दिल्ली ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बाद, मई 2025 में भारत की प्रतिक्रिया अब किसी अचानक बदलाव के बजाय अधिक एक विकसित रणनीतिक सोच के रूप में दिखाई देती है। पहलगाम आंतकी हमले में 26 नागरिकों की मौत के बाद, नई दिल्ली की कार्रवाई सिर्फ प्रतिक्रियात्मक नहीं थी। यह सोची-समझी संतुलित एक स्पष्ट जवाब देने वाली पहल थी, कि भारत अब अपनी सुरक्षा और हितों की रक्षा के लिए क्षमता के साथ-साथ राजनीतिक इच्छाशक्ति भी रखता है। पीछे मुड़कर देखने पर, सिंदूर एक ऐसा क्षण बनकर उभरा जहां इरादा और क्षमता असाधारण स्पष्टता के साथ एकरूप हो गए। सैन्य स्तर पर देखें तो इस ऑपरेशन की सबसे बड़ी विशेषता तीनों सेनाओं थल, जल और वायुसेना के बीच बेहतर समन्वय रहा। जिस व्यवस्था को अक्सर आपसी तालमेल की कमी के लिए आलोचना झेलनी पड़ती थी, उसने चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के नेतृत्व में एकीकृत और प्रभावी संचालन का प्रदर्शन किया। स्वदेशी प्रणालियों के प्रभावी उपयोग ने इसे और भी पुष्ट किया, जिससे यह संकेत मिलता है कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के प्रयास ठोस युद्धक्षेत्र लाभों में तब्दील होने लगे हैं। इससे समय के साथ ऐसी क्षमताओं को बनाए रखने की भारत की क्षमता में विश्वास मजबूत हुआ है। स्थिति को अनियंत्रित किए बिना भी बनाया जा सकता है दबाव इस ऑपरेशन का एक और महत्वपूर्ण पहलू युद्धक्षेत्र का विस्तार रहा। नियंत्रण रेखा के पार जाकर पाकिस्तान के रणनीतिक क्षेत्रों में कार्रवाई करके भारत ने यह स्पष्ट किया कि परमाणु निरोध (न्यूक्लियर डिटरेंस) की सीमाएं उतनी कठोर नहीं हैं जितनी पहले मानी जाती थीं। भारत ने दिखाया कि बिना स्थिति को अनियंत्रित किए संतुलित और सीमित पारंपरिक सैन्य कार्रवाई के जरिए भी दबाव बनाया जा सकता है। इसमें नौसेना की सक्रियता ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे ऑपरेशन का दायरा और प्रभाव दोनों बढ़े। कूटनीतिक मोर्चे पर भी भारत का रुख स्पष्ट कूटनीतिक मोर्चे पर भी ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत का रुख अधिक स्पष्ट और आत्मविश्वास भरा नजर आता है। पाकिस्तान के साथ संबंधों में अब यह संकेत दिया गया है कि संवाद और सहयोग उसके व्यवहार पर निर्भर करेगा। जल और कनेक्टिविटी जैसे मुद्दों को भी सुरक्षा से जोड़कर भारत ने यह स्पष्ट किया है कि आतंकवाद को समर्थन देने की कीमत केवल सैन्य नहीं, बल्कि बहुआयामी होगी। ऑपरेशन सिंदूर पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया खासकर अमेरिका का रुख, भारत के रणनीतिक माहौल को समझने में अहम संकेत देता है। अमेरिका ने भारत की कार्रवाई को आतंकवाद के खिलाफ कदम के रूप में स्वीकार तो किया, लेकिन यह समर्थन पूरी तरह स्थायी या बिना शर्त नहीं था। दरअसल, भारत-अमेरिका संबंधों में एक तरह का व्यवहारिक (ट्रांजैक्शनल) दृष्टिकोण अभी भी मौजूद है। ट्रंप के दावे ने कम किया प्रभाव अमेरिका के लिए भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है, लेकिन पाकिस्तान से जुड़े संकटों के मामले में इस साझेदारी की सीमाएं हैं। डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे ने, जिसमें उन्होंने संघर्ष विराम में अपनी भूमिका बताई, भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की छवि को कुछ हद तक चुनौती दी। चाहे यह दावा कितना भी सही या गलत क्यों न हो, इससे भारत के उस रुख पर असर पड़ता है, जिसमें वह कश्मीर जैसे मुद्दों पर किसी तीसरे पक्ष की भूमिका को नकारता रहा है। इस तरह के बयान भारत के ऑपरेशन सिंदूर के मैसेज को कमजोर कर सकते हैं। वहीं ट्रंप के इस दावे का साया आज भी छाया हुआ है और भारत-अमेरिका संबंधों पर इसका प्रभाव, चाहे कितना भी सूक्ष्म क्यों न हो, आज भी बना हुआ है। नैरेटिव की लड़ाई अहम पाकिस्तान के लिए, ऐसे दावे एक तरह से कूटनीतिक राहत लेकर आए। इससे उसे अपने पुराने एजेंडे भारत के साथ विवादों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने को आगे बढ़ाने का मौका मिला। इस पूरे घटनाक्रम में नैरेटिव की लड़ाई उतनी ही अहम बन गई है जितनी वास्तविक सैन्य कार्रवाई। ऑपरेशन सिंदूर जहां भारत के लिए एक नई निरोधक नीति स्थापित करने का प्रयास था, वहीं उसकी व्याख्या को लेकर अस्पष्टता पाकिस्तान के लिए फायदेमंद रही। हालांकि, जमीनी स्तर पर इस ऑपरेशन के परिणामों ने पाकिस्तान के लिए यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रॉक्सी आतंकवाद की रणनीति अब अधिक महंगी साबित हो रही है। इससे दोनों देशों के संबंधों में एक कठोरता आई है और इस्लामाबाद को अपनी रणनीतिक सीमाओं का एहसास भी हुआ है। भारत के लिए चीन के नजरिए से भी ऑपरेशन सिंदूर महत्वपूर्ण रहा। पाकिस्तान के पास मौजूद चीनी हथियारों और प्रणालियों के प्रदर्शन के साथ-साथ भारत की बहु-आयामी कार्रवाई ने बीजिंग को यह संकेत दिया है कि भारत अब केवल एक क्षेत्रीय चुनौती नहीं, बल्कि एक व्यापक रणनीतिक क्षमता वाला देश बन रहा है। एक साल बाद यह साफ है कि ऑपरेशन सिंदूर किसी कठोर सिद्धांत की बजाय एक व्यवहारिक पैटर्न को दर्शाता है। भारत ने यह दिखाया है कि वह जरूरत पड़ने पर संतुलित और उद्देश्यपूर्ण तरीके से सैन्य शक्ति का उपयोग कर सकता है, साथ ही स्थिति को नियंत्रित भी रख सकता है। ऑपरेशन सिंदूर भारत की रणनीतिक परिपक्वता का संकेत है। आगे की चुनौती यही होगी कि इस संतुलन को बनाए रखा जाए जहां आक्रामकता हो, लेकिन उसके साथ विवेक भी बना रहे।

सांसदों के टूटने से AAP संकट में, संसद में NDA को मिला रणनीतिक बढ़त

नई दिल्ली आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए ये हफ्ता किसी बुरे सपने से कम नहीं रहा. सात दिनों के अंदर पार्टी ने राज्यसभा में अपने 10 में से 7 सांसदों को खो दिया. इसे एक सोचा-समझा राजनीतिक ऑपरेशन बताया जा रहा है. इसकी वजह से संसद में सियासत का गणित पूरा तरह बदल गया है. बुधवार, 22 अप्रैल की सुबह जब अरविंद केजरीवाल को इस तरह के किसी कदम अंदेशा हुआ, तो उन्होंने तुरंत अपने सांसदों को फोन मिलाना शुरू किया. कुछ ने फोन उठाए, कुछ ने गोल-मोल जवाब दिए और कुछ ने फोन ही नहीं उठाए. केजरीवाल शुक्रवार सुबह तक संदीप पाठक को फोन करते रहे और उन्हें भरोसा दिया गया कि पाठक उनके ही साथ हैं. लेकिन शुक्रवार दोपहर तक पाठक सीधे बीजेपी मुख्यालय पहुंच गए और सत्ताधारी पार्टी का दामन थाम लिया. पहले आप सांसदों का विलय सोमवार, 27 अप्रैल को होना था. गृह मंत्री पश्चिम बंगाल चुनाव प्रचार से लौटकर सभी सांसदों से मिलने वाले थे. लेकिन फिर बीजेपी को पता चला कि केजरीवाल को इस साजिश की भनक लग गई है और वो सांसदों को मनाने की कोशिश में जुट गए हैं. ऐसे में इस 'ऑपरेशन' की तारीख बदल दी गई और शाह की गैर-मौजूदगी में ही शुक्रवार को मिशन को अंजाम दे दिया गया. इस ऑपरेशन के मुख्य किरदार 1. राघव चड्ढा: पर्दे के पीछे के रणनीतिकार राघव चड्ढा इस पूरे ऑपरेशन के फील्ड कमांडर बताए जा रहे हैं. शराब नीति मामले के बाद से ही वो पार्टी से दूरी बनाए हुए थे. लंदन में उनकी आंखों की सर्जरी के दौरान ही बीजेपी से बातचीत का रास्ता साफ हुआ. वापस आकर उन्होंने एक-एक करके दूसरे सांसदों को भरोसे में लिया. 2. संदीप पाठक: सबसे बड़ा झटका संदीप पाठक वो शख्स हैं जिन्होंने पंजाब में AAP की ऐतिहासिक जीत की नींव रखी थी. केजरीवाल को सबसे ज्यादा दुख पाठक के जाने का हुआ क्योंकि वो आखिरी मिनट तक केजरीवाल को वफादारी का भरोसा दिलाते रहे और फिर सीधे राघव चड्ढा के साथ बीजेपी में शामिल हो गए. 3. हरभजन सिंह: पहले ही तय था रुख पूर्व क्रिकेटर हरभजन सिंह का जाना चौंकाने वाला नहीं था. सूत्रों के मुताबिक, उपराष्ट्रपति चुनाव के दौरान ही BCCI से आए एक फोन ने उनका रुख साफ कर दिया था. वो पहले से ही बीजेपी के प्रभाव क्षेत्र में थे. 4. उद्योगपति सांसदों की 'मजबूरी' राजिंदर गुप्ता (ट्राइडेंट ग्रुप), विक्रमजीत साहनी और अशोक मित्तल (LPU) जैसे सांसदों का आधार राजनीति से ज्यादा व्यापार था. अशोक मित्तल के संस्थानों पर विलय से ठीक 9 दिन पहले ED की छापेमारी हुई थी. इन सांसदों के लिए केंद्र सरकार के साथ चलना एक व्यावसायिक जरूरत भी थी. बीजेपी को क्या मिला? राजनीतिक रूप से पंजाब में बीजेपी को शायद तुरंत बड़ा फायदा न मिले, क्योंकि इनमें से ज्यादातर सांसद जमीनी नेता नहीं हैं. लेकिन संसदीय गणित में बीजेपी को बंपर जीत मिली है: बीजेपी सांसदों की संख्या 113 पहुंच गई है और NDA ने पहली बार राज्यसभा में साधारण बहुमत पार कर लिया है. अब सरकार को 'वन नेशन वन इलेक्शन' जैसे बड़े बिल पास कराने के लिए क्षेत्रीय दलों के समर्थन की जरूरत नहीं पड़ेगी. विपक्ष अब राज्यसभा में बिलों को नहीं रोक पाएगा. शुक्रवार शाम तक AAP के पास राज्यसभा में सिर्फ 3 सांसद (संजय सिंह, एनडी गुप्ता और बलबीर सिंह सीचेवाल) रह गए. केजरीवाल ने इसे पंजाबियों के साथ धोखा बताया, लेकिन बीजेपी के लिए 2027 के पंजाब मिशन का असली खेल अब शुरू हुआ है.

कोल थॉमस एलन ने मचाया हड़कंप, कई हथियारों के साथ पकड़ा गया संदिग्ध

वॉशिंगटन वाइट हाउस के हिल्टन होटल में आयोजित करेंस्पॉन्डेंट डिनर के दौरान जो कुछ हुआ उससे 45 साल पुरानी यादें फिर ताजा हो गईं। पत्रकारों के लिए आयोजित किए गए इस डिनर में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, फर्स्ट लेडी मेलानिया ट्रंप, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस समेत कैबिनेट के सीनियर नेता मौजूद थे। उसी सयम बैंक्वेट के बाहर एक हथियारोंसे लैस 31 साल के युवक ने गोलीबारी शुरू कर दी। सीक्रेट सर्विस ने तुरंत ट्रंप समेत सभी को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया और उधर हमलावर को दबोच लिया गया। इस होटल में यह अपनी तरह की कोई पहली घठना नहीं है। 45 साल पहले भी एक राष्ट्रपति के साथ ऐसा ही हो चुका है। इसी होटल के बाहर रोनाल्ड रीगन पर भी हुआ था हमला अमेरिका के इतिहास में कई राष्ट्रपतियों की हत्या हो चुकी है। वहीं रोनाल्ड रीगन पर जानलेवा हमला किया गया था। 1981 में वह वॉशिंटन हिल्टन से बाहर निकले ही थे की एक शख्स ने उनपर गोलियां चला दीं। एक गोली उनके सीने में जा लगी। उन्हें कई दिनों तक अस्पताल में रहना पड़ा। उनकी जान बचा लगी गई थी। एफबीआई की आर्काइव के मुताबिक जॉन हिंकली जूनियर ने 6 गोलियां दागी थीं। होटल से सीधे एलिवेटर के जरिए उन्हें सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट किया गया। इस हममले में उनके साथ मौजूद सीक्रेट सर्विस के एजेंट भी घायल हो गए थे। 45 साल बाद फिर हिल्टन होटल में वैसा ही वाकया देखने को मिला। हालांकि इस बार कोई घायल नहीं हुआ। हमलावर को को मैग्नेट स्कैनिंग के दौरान बैंक्वेट में जाने से रोक दिया गया था और उसने वहीं फायरिंग शुरू कर दी। होटल की सुरक्षा रहती है चुस्त वॉशिंगटन होटल की काफी सुरक्षा रहती है। आम तौर पर यहां समान्य गेस्ट भी आते हैं लेकिन बालरूम में सरकारी कार्यक्रमों का आयोजन होता है। ऐसे में इसकी खास सुरक्षा रहती है। डिनर के कार्यक्रम के चलते इस होटल को आम लोगों के लिए दोपहर 2 बजे से रात के 8 बजे तक बंद कर दिया गया था। बालरूम में उस वक्त 2300 गेस्ट मौजूद थे। सभी अतिथियों को भी कई चरणों की सुरक्षा को पार करके आना था। दहशत का माहौल प्रत्यक्षदर्शियों  ने बताया कि गोलीबारी के कारण स्थिति काफी तनावपूर्ण हो गयी थी, लेकिन किसी भी खास मेहमान के घायल होने की खबर नहीं है। हमले के पीछे के मकसद की अभी जांच की जा रही है। अधिकारियों ने इलाके की घेराबंदी कर दी है और फॉरेंसिक टीमें घटनास्थल से सबूत जुटाने में लगी हैं। कई हथियारों से लैस था हमलावर वाइट हाउस ने पुष्टि की है कि स्थिति अब पूरी तरह नियंत्रण में है।। कानून प्रवर्तन सूत्रों के अनुसार, संदिग्ध हमलावर की पहचान कोल टॉमस एलन के रूप में हुई है। वह 31 वर्ष का है और कैलिफोर्निया के टोरेंस का रहने वाला है। उसके पास से एक शॉटगन, एक हैंडगन और कई चाकू बरामद हुआ है। शुरुआती जांच के अनुसार, हमलावर उसी होटल में ठहरा हुआ था, जहां कार्यक्रम आयोजित था। इसी वजह से वह सुरक्षा के बाहरी घेरे को पार करने में सफल रहा। राष्ट्रपति ट्रंप ने सीक्रेट सर्विस की बहादुरी की प्रशंसा की है और कहा है कि सुरक्षाबलों ने बहुत ही 'तेजी और निडरता' से काम किया।