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प्रेग्नेंसी में योगासन के अनगिनत लाभ, आयुष मंत्रालय ने किया खुलासा

नई दिल्ली  गर्भावस्था एक महिला के जीवन में बदलाव, शक्ति और नई शुरुआत का खूबसूरत सफर है। इस दौरान मां की सेहत का खास ख्याल रखना जरूरी है क्योंकि मां स्वस्थ रहेगी तो बच्चा भी स्वस्थ रहेगा। भारत सरकार का आयुष मंत्रालय गर्भवती महिलाओं को योग करने की सलाह देता है। योग न सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी बेहद फायदेमंद है। प्रेग्नेंसी के दौरान योग करने से कई समस्याएं कम हो जाती हैं। आमतौर पर महिलाओं को पीठ दर्द, सिरदर्द, मतली और सांस लेने में तकलीफ होती है। नियमित योग इन परेशानियों को काफी हद तक कम कर देता है। योग आसनों से शरीर में लचीलापन आता है, मांसपेशियां मजबूत होती हैं और प्रसव के समय जरूरी ताकत और सहनशक्ति मिलती है। योग नींद की गुणवत्ता भी सुधारता है। गर्भावस्था में कई महिलाएं नींद की समस्या से जूझती हैं। योग से गहरी और आरामदायक नींद आती है। साथ ही यह स्ट्रेस और एंग्जायटी को कम करने में बहुत मदद करता है। प्रेग्नेंसी के दौरान तनाव का होना आम है, लेकिन योग से मन शांत रहता है और मां बच्चे से गहरा भावनात्मक जुड़ाव महसूस करती है। आयुष मंत्रालय के अनुसार, योग मां का पालन-पोषण करता है ताकि वह आने वाले बच्चे का अच्छे से पालन-पोषण कर सके। यह मां को शांत, संतुलित और ऊर्जावान बनाए रखता है। गर्भावस्था के हर पड़ाव पर योग मां को शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार करता है। मदर्स डे (10 मई) के अवसर पर आयुष मंत्रालय ने खास अपील की है कि हर गर्भवती मां योग को अपनी दिनचर्या में शामिल करे। मंत्रालय का कहना है कि “मां का पहला तोहफा सेहत है”। वह योग अपनाकर खुद को स्वस्थ रख सकती है और बच्चे को भी स्वस्थ जीवन दे सकती है। योग के आसान और सुरक्षित आसन गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए हैं। इन्हें डॉक्टर या योग विशेषज्ञ की सलाह से करना चाहिए। सही तरीके से किए गए योग से न सिर्फ प्रसव आसान होता है बल्कि प्रसव के बाद रिकवरी भी तेज होती है।

2030 से पहले CO2 उत्सर्जन में गिरावट आ सकती है, 2025 में भारत का उत्सर्जन सिर्फ 0.7% बढ़ा

भोपाल  एक नए विश्लेषण से पता चला है कि भारत के कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में वर्ष 2025 में केवल 0.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो दो दशकों से अधिक समय में सबसे धीमी वृद्धि है। जलवायु विज्ञान, नीति और ऊर्जा पर केंद्रित ब्रिटेन स्थित ऑनलाइन प्रकाशन कार्बन ब्रीफ के लिए सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) द्वारा किए गए विश्लेषण के अनुसार, भारत के कुल कार्बन2 उत्सर्जन के लगभग आधे हिस्से के लिए जिम्मेदार विद्युत क्षेत्र से होने वाला उत्सर्जन 2025 में लगभग 3.8 प्रतिशत कम हो गया और यह उस वर्ष के कुल उत्सर्जन में कमी का प्रमुख कारण हो सकता है। हाल के वर्षों में भारत के CO2 उत्सर्जन में 4 से 11 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो विश्व में सबसे तेज़ वृद्धि दरों में से एक है। विश्लेषण के अनुसार, 2025 में 0.7 प्रतिशत की वृद्धि कोविड काल को छोड़कर 2001 के बाद से सबसे कम थी। भारत के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कार्बन डाइऑक्साइड का योगदान लगभग 80 प्रतिशत है । भारत के उत्सर्जन की वृद्धि दर में कमी आना पर्यावरण की दृष्टि से वैश्विक स्तर पर अच्छी खबर है, क्योंकि भारत ग्रीनहाउस गैसों का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है। लेकिन यह भारतीय अर्थव्यवस्था की सुस्ती या औद्योगिक गतिविधियों और मांग में गिरावट का संकेत भी हो सकता है। हालांकि आधिकारिक उत्सर्जन डेटा तैयार करने और संकलित करने में वर्षों लग जाते हैं – भारत के उत्सर्जन पर नवीनतम आधिकारिक डेटा 2020 से संबंधित है – सीआरईए जैसे अध्ययन देश के उत्सर्जन का अनुमान लगाने के लिए बिजली उत्पादन, औद्योगिक उत्पादन और ईंधन खपत पर आवधिक डेटा जैसे विभिन्न संकेतकों का उपयोग करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक उत्सर्जन की धीमी पड़ती यह रफ्तार कोई संयोग नहीं, बल्कि ऊर्जा क्षेत्र में गहरे बदलाव का संकेत है। विशेषज्ञों के मुताबिक, स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ते कदम, कोयला आधारित बिजली में गिरावट और बिजली मांग की धीमी रफ्तार इन तीनों ने मिलकर नई उम्मीदें पैदा की हैं। ऊर्जा क्षेत्र बना बदलाव की धुरी रिपोर्ट के मुताबिक सबसे बड़ा और निर्णायक बदलाव बिजली क्षेत्र में देखने को मिला है, जहां 2025 में उत्सर्जन में 3.8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। इसके पीछे स्वच्छ ऊर्जा क्षमता में रिकॉर्ड बढ़ोतरी बड़ी वजह रही, जिससे हर साल करीब 90 टेरावाट-घंटे अतिरिक्त बिजली उत्पादन की संभावना तैयार हुई है। वहीं, बिजली की मांग में भी साफ सुस्ती दिखी, जो 2019 से 2023 के बीच 7.4 फीसदी की दर से बढ़ रही थी, वह 2025 में घटकर करीब एक फीसदी रह गई। ये संकेत साफ तौर पर दर्शाते हैं कि अब देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में स्वच्छ ऊर्जा तेजी से महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है और पारंपरिक स्रोतों की पकड़ कमजोर पड़ने लगी है। जीवाश्म ईंधनों की कमजोर पड़ती पकड़ विश्लेषण में इस बात का भी खुलासा किया गया है कि 2025 में तेल, गैस और कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों की मांग में भी नरमी देखी गई, जो ऊर्जा क्षेत्र में बदलती प्राथमिकताओं की कहानी कहती है। तेल की मांग में हो रही वृद्धि सिमटकर महज 0.4 फीसदी रह गई, जबकि गैस की मांग में 4 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। सबसे बड़ा बदलाव आयातित कोयले में देखने को मिला, जिसकी खपत 20 फीसदी तक घट गई, वहीं गैस आयात में भी 6 फीसदी की कमी आई है। ये आंकड़े सिर्फ गिरावट नहीं, बल्कि एक बड़े बदलाव का संकेत हैं। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत अब धीरे-धीरे विदेशी ईंधनों पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है, जिससे न केवल ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो रही है, बल्कि देश वैश्विक ईंधन संकटों के झटकों से भी खुद को बेहतर तरीके से बचाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उद्योग बढ़ा रहे उत्सर्जन हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तस्वीर पूरी तरह सकारात्मक नहीं है, क्योंकि उद्योग अब भी उत्सर्जन बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। खासकर इस्पात और सीमेंट जैसे बुनियादी उद्योगों में तेजी से विस्तार देखने को मिला है, जहां इस्पात उत्पादन में 8 फीसदी और सीमेंट उत्पादन में 10 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। यही वजह है कि कुल कार्बन उत्सर्जन में हल्की बढ़ोतरी बनी रही, जो यह संकेत देती है कि स्वच्छ ऊर्जा की प्रगति के बावजूद औद्योगिक क्षेत्र में बदलाव अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। क्या आ गया निर्णायक मोड़? विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत का बिजली क्षेत्र अब एक 'टर्निंग पॉइंट' पर पहुंच सकता है, जहां स्वच्छ ऊर्जा की बढ़ोतरी, बिजली मांग से बराबरी या उससे आगे निकल जाए। सीआरईए के प्रमुख विश्लेषक लाउरी मायल्लीवीरता के मुताबिक अगर यही रुझान जारी रहा तो यह कोयला आधारित बिजली में स्थाई गिरावट की शुरुआत हो सकती है। दिलचस्प बात यह है कि गुजरात, राजस्थान और तमिलनाडु जैसे राज्य पहले ही इस बदलाव की दिशा में आगे बढ़ चुके हैं। उन्होंने उम्मीद जताई है कि देश के लिए 2026 एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है, जब अक्षय ऊर्जा क्षमता में बढ़ोतरी पहली बार बिजली मांग के विस्तार को पीछे छोड़ दे, यह बदलाव भारत के बिजली क्षेत्र की दिशा और भविष्य दोनों को निर्णायक रूप से बदलने का संकेत होगा। रिपोर्ट और सीआरईए से जुड़ी विश्लेषक अनुभा अग्रवाल का इस बारे में कहना है कि जीवाश्म ईंधनों की खपत में गिरावट से न सिर्फ आयात घटा है, बल्कि वैश्विक तेल-गैस संकट के असर से भी देश को राहत मिली है। उनका कहना है कि 2025 में तापीय बिजली संयंत्रों में आयातित कोयले की खपत 20 फीसदी तक घट गई, जबकि कुल गैस आयात में भी 6 फीसदी की कमी दर्ज की गई। यह बदलाव बेहद अहम है, क्योंकि इससे देश की मौजूदा वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति संकट के प्रति संवेदनशीलता कम हुई है। उनके मुताबिक, स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ना सिर्फ जलवायु के लिए नहीं, बल्कि बेहतर हवा और मजबूत ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी जरूरी है। हालांकि इस सकारात्मक रुझान के बीच एक चिंता भी बनी हुई है। भारत अभी भी कोयला आधारित बिजली क्षमता और जीवाश्म ईंधन आधारित उद्योगों के विस्तार की योजना बना रहा है, जो आने वाले वर्षों में उत्सर्जन की दिशा तय करेगा। बिजली … Read more

गैस सिलेंडर की कीमत में वृद्धि का खतरा, सरकारी सब्सिडी पर असर की संभावना, रिपोर्ट ने किया चिंता का इज़ाफा

नई दिल्ली  पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव का असर अब सीधे भारत के आम लोगों और कंपनियों की जेब पर दिखने लगा है। रेटिंग एजेंसी ICRA के अनुसार, अगर मौजूदा हालात ऐसे ही बने रहते हैं, तो वित्त वर्ष 2027 तक एलपीजी (LPG) पर होने वाला अंडर-रिकवरी यानी घाटा करीब ₹80,000 करोड़ तक पहुंच सकता है। अंडर-रिकवरी का मतलब होता है कि तेल कंपनियां गैस सिलेंडर को जिस कीमत पर बेच रही हैं, वह उसकी वास्तविक लागत से कम है और यह अंतर उन्हें खुद वहन करना पड़ता है। इसका सीधा असर तेल विपणन कंपनियों (OMCs) की कमाई और मुनाफे पर पड़ रहा है। दरअसल, कच्चे तेल की कीमतें वैश्विक स्तर पर काफी ऊंची बनी हुई हैं, जबकि भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को स्थिर रखा गया है। इससे कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ गया है। अनुमान है कि अगर कच्चा तेल 120-125 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना रहता है, तो पेट्रोल पर करीब ₹14 प्रति लीटर और डीजल पर ₹18 प्रति लीटर तक का नुकसान हो सकता है। इसके अलावा पश्चिम एशिया से एलपीजी की सप्लाई में आई बाधाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतें भी तेजी से बढ़ी हैं। हालांकि, भारत ने अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से एलपीजी आयात बढ़ाकर सप्लाई को कुछ हद तक संतुलित किया है, लेकिन फिर भी कंपनियों का घाटा कम नहीं हो पा रहा है। इसका असर केवल गैस सेक्टर तक सीमित नहीं है, बल्कि खाद (फर्टिलाइजर), केमिकल और सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन जैसे कई सेक्टर भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। खासकर उर्वरक उद्योग में अमोनिया और सल्फर जैसे कच्चे माल की कीमतें बढ़ने से उत्पादन लागत काफी बढ़ गई है। इसी वजह से सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी बढ़ने की संभावना है। ICRA का अनुमान है कि FY2027 में फर्टिलाइजर सब्सिडी ₹2.05 लाख करोड़ से ₹2.25 लाख करोड़ तक पहुंच सकती है, जो मौजूदा बजट से काफी ज्यादा है। वहीं, केमिकल और पॉलिमर सेक्टर में भी लागत बढ़ने से कंपनियों के मार्जिन पर दबाव रहेगा, हालांकि कुछ स्पेशलिटी केमिकल कंपनियां अपेक्षाकृत सुरक्षित रह सकती हैं। बढ़ती ऊर्जा कीमतें और सप्लाई में अनिश्चितता आने वाले समय में कई सेक्टर्स की कमाई पर असर डाल सकती हैं। हालांकि, सरकार और कंपनियां स्थिति को संभालने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन अगर हालात जल्द नहीं सुधरे तो इसका असर आम उपभोक्ता तक भी पहुंच सकता है।

भारत के लिए बड़ा मौका: UAE के फैसले से रुपये में मिलेगा तेल, डॉलर की जरूरत नहीं

नई दिल्ली  संयुक्त अरब अमीरात (UAE) द्वारा UAE के OPEC (Organization of the Petroleum Exporting Countries) से बाहर निकलने की खबर को वैश्विक तेल बाजार में एक बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। इसे UAE का ‘मास्टरस्ट्रोक’ कहा जा रहा है, क्योंकि इससे वह अपनी तेल उत्पादन नीति पर अधिक स्वतंत्रता पा सकता है। लेकिन, इस फैसले का सबसे दिलचस्प असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश पर पड़ सकता है। आइए जरा विस्तार से समझते हैं कि इसका भारत को कितना लाभ मिलेगा? अब तक OPEC (Organization of the Petroleum Exporting Countries) के सदस्य देशों को उत्पादन कोटा और कीमतों को लेकर संगठन के नियमों का पालन करना पड़ता था। UAE के बाहर आने के बाद वह अपनी शर्तों पर उत्पादन बढ़ा सकता है और नए व्यापारिक समझौते कर सकता है। यही वह प्वाइंट है, जहां भारत के लिए एक बड़ा अवसर बनता दिख रहा है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था पर डॉलर आधारित भुगतान का भारी दबाव रहता है। अगर UAE भारत के साथ रुपये में तेल व्यापार करने के लिए सहमत होता है, तो यह भारत के लिए किसी लॉटरी से कम नहीं होगा। इससे भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (foreign exchange reserves) मजबूत होगा और डॉलर पर निर्भरता कम हो सकती है। रुपये में तेल खरीदने का मतलब है कि भारत को हर बार डॉलर खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी, जिससे रुपया स्थिर रह सकता है। साथ ही यह कदम भारत और UAE के बीच व्यापारिक संबंधों को और मजबूत करेगा। दोनों देशों के बीच पहले से ही मजबूत आर्थिक रिश्ते हैं और यह पहल उन्हें नई ऊंचाइयों तक ले जा सकती है। हालांकि, इस बदलाव के साथ कुछ चुनौतियां भी हैं। वैश्विक तेल बाजार बेहद संवेदनशील होता है और OPEC से बाहर निकलने के बाद UAE को कीमतों और मांग के उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा रुपये में व्यापार को बड़े स्तर पर लागू करना भी आसान नहीं होगा, क्योंकि इसके लिए वित्तीय ढांचे और भरोसेमंद सिस्टम की जरूरत होती है। फिर भी अगर यह रणनीति सफल होती है, तो यह न केवल भारत के लिए बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए भी एक नया मॉडल बन सकती है। कुल मिलाकर UAE का यह कदम आने वाले समय में तेल की राजनीति और अर्थशास्त्र दोनों को नई दिशा दे सकता है, जिसमें भारत एक बड़ा लाभार्थी बनकर उभर सकता है।

चीन की इकोनॉमी पर सवाल: डिग्रीधारी कचरा उठा रहे, डॉक्टर दे रहे खाना… दुनिया क्यों है डरी?

बीजिंग  चीन का आर्थिक सपना अब एक बुरे सपने में ढलता नजर आ रहा है. वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) ने पहले ही 'व्हाइट कॉलर' नौकरियों के खतरे की चेतावनी दी थी, उसकी पुष्टि अब खुद चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के एक बड़े फैसले ने कर दी है. एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार चीन सरकार ने हाल ही में 20 करोड़ 'गिग वर्कर्स' के लिए नए लेबर नियम जारी किए हैं, जिससे साफ है कि वहां पारंपरिक नौकरियां अब इतिहास बन रही हैं।  'डू-एनीथ‍िंग' इकोनॉमी: पढ़ाई डिग्री की, काम कचरा उठाने का! चीन के सबसे बड़े प्लेटफॉर्म 'Xianyu' पर एक हैरान करने वाला ट्रेंड दिख रहा है. इसे 'डू-एनीथिंग' (कुछ भी करो) इकोनॉमी कहा जा रहा है. यहां युवा अपनी डिग्रियों को किनारे रखकर ऐसे काम कर रहे हैं जिनकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।  मसलन देर रात तक लोगों से बातें करना ताकि उनके 'धोखेबाज' पार्टनर को पकड़ा जा सके. इसके अलावा दूसरों के कुत्ते टहलाना और घर का कचरा बाहर फेंकना. बच्चों को स्कूल से लाना और लोगों की 'स्टडी हैबिट्स' पर निगरानी रखना।  जब डॉक्टर बने डिलीवरी बॉय…  यह संकट अब केवल युवाओं तक सीमित नहीं है. साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट (SCMP) और सोशल मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के सम्मानित डॉक्टर और प्रोफेशनल्स की आय में 30 से 40 प्रतिशत की भारी कटौती हुई है।  होम लोन (Mortgage) की किस्त चुकाने और परिवार पालने के लिए अब डॉक्टर्स अपनी शिफ्ट के बाद खाना डिलीवरी करने को मजबूर हैं. जो 'व्हाइट कॉलर' नौकरियां कभी चीन की आर्थिक ताकत थीं, अब वहां बोनस में देरी और सैलरी कट एक सामान्य बात हो गई है।  क्यों मजबूर हुई चीन सरकार? चीन की शहरी वर्कफोर्स का करीब 40 प्रतिशत (20 करोड़ से ज्यादा लोग) अब फूड डिलीवरी और राइड-हेलिंग जैसे अस्थायी कामों में लगा है. चीन की टॉप लीडरशिप को डर है कि अगर इन लोगों को सुरक्षा नहीं दी गई, तो देश में बड़ा सामाजिक विद्रोह हो सकता है।  क्या भारत के लिए है चेतावनी? विशेषज्ञ मान रहे हैं कि चीन का यह हाल वैश्विक 'व्हाइट कॉलर' नौकरियों के अंत की शुरुआत हो सकता है. भारत जैसे देशों के लिए यह सबक है कि स्किल्स को समय रहते न बदला गया, तो डिग्री सिर्फ कागज का टुकड़ा बनकर रह जाएगी। 

मध्यप्रदेश: दमोह की स्वावलंबी गोशाला परियोजना में पीएम मोदी के आगमन की तैयारी

 भोपाल प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी का तीसरी बार मध्य प्रदेश दौरे पर आएंगे। वो यहां सूबे के दमोह जिले आ सकते हैं। उनका आगमन लगभग तय माना जा रहा है। हालांकि, इससे पहले पीएम मोदी चुनावी सभाओं को संबोधित करने दमोह आए थे। इसके बाद वो अब बिना किसी चुनावी सभा के जिले की पथरिया विधानसभा इलाके में स्वावलंबी गोशाला के तहत बनने जा रही 517 एकड़ जमीन में गोशाला के भूमि पूजन समारोह में शामिल होने आएंगे। पीएम मोदी आगामी 10 मई को नरसिंहगढ़ इलाके में आ सकते हैं। माना जा रहा है कि, पीएम का आना लगभग तय है। दमोह जिले में स्वावलंबी गोशाला कामधेनु निवास की स्थापना के लिए विकासखंड पथरिया के ग्राम रानगिर, कल्याणपुरा और बिजोरी में स्वीकृत 517 एकड़ जमीन का कलेक्टर प्रताप नारायण यादव ने पुलिस अधीक्षक श्रुतकीर्ति सोमवंशी के साथ निरीक्षण किया। चूंकि, उक्त गोशाला के निर्माण कार्य के भूमि पूजन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दौरा प्रस्तावित है। अंतिम चरण में चल रही तैयारियां स्वीकृत भूमि पर गोशाला के निर्माण और संचालन के लिए मेसर्स श्रीराम मानेक एग्रो प्रोडक्टस प्राइवेट लिमिटेड मुंबई को मध्य प्रदेश गौसंबर्धन बोर्ड भोपाल द्वारा आदेशित किया गया है। दिए गए निर्देश इस संबंध में उपसंचालक पशुपालन डॉ. बृजेंद्र असाटी ने बताया कि मध्य प्रदेश गौसंबर्धन बोर्ड द्वारा गोशाला के संचालन के लिए नियुक्त कंपनी को समय सीमा में भूमि की फेंसिंग और अस्थायी 200 गौवन्श की गोशाला का निर्माण 10 मई 2026 के पहले किए जाने के निर्देश दिए गए हैं। वरिष्ठ अधिकारियों ने लिया जायजा एसपी ने कहा कि, इस गोशाला का भूमि पूजन वैसे तो प्रधानमंत्री के सानिध्य में होना प्रस्तावित है, जिसकी तैयारियां प्रक्रिया के अंतिम चरण में चल रही हैं। इसी के चलते कलेक्टर के साथ – साथ अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने व्यवस्थाओं का जायजा लिया और समय पर निर्धारित काम निपटाने के साथ साथ तैयारियों को लेकर जरूरी दिशा – निर्देश दिए।