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लखनऊ: एलडीए की एकमुश्त समाधान योजना में आवंटियों को मिली छूट, 11 लोग सम्मानित

लखनऊ राजधानी लखनऊ में एलडीए की एकमुश्त समाधान योजना (ओटीएस) आवंटियों के लिए बड़ी राहत लेकर आई है। शनिवार को एलडीए उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार ने ओटीएस के सफल आवेदकों को पारिजात सभागार में प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया। इस योजना का एक बड़ा लाभ सीतापुर रोड के आवंटी शिव प्रताप सिंह को मिला। समय पर भुगतान न होने के कारण चक्र वृद्धि और दंड ब्याज मिलाकर उनका बकाया 2.36 करोड़ रुपये हो गया था। ओटीएस में आवेदन करने पर उन्हें ब्याज माफी के साथ 37 लाख रुपये की सीधी छूट मिली। इसी तरह गोमती नगर की मंजू सोनी को 67 हजार रुपये और बसंत कुंज योजना की चेतना को 58 हजार रुपये की राहत मिली। सकारात्मक सहभागिता के लिए ऐसे 11 आवंटियों को सम्मानित किया गया। यह योजना 18 अप्रैल से शुरू हुई थी और 17 जुलाई तक चलेगी। अब तक 573 आवंटियों ने आवेदन किया है। इसके सापेक्ष 31.18 करोड़ रुपये की डिमांड जनरेट की गई है। वित्त नियंत्रक दीपक सिंह के अनुसार, प्राधिकरण भवन के कमेटी हॉल में विशेष हेल्प डेस्क बनाई गई है।  

बिहार बना 5जी का नया हब, गांव-गांव पहुंचा हाई-स्पीड इंटरनेट

पटना देश में 5जी नेटवर्क सेवाओं का विस्तार तेजी से हो रहा है। खास बात यह है कि जिस बिहार को अक्सर विकास की दौड़ में पीछे बताया जाता है, वह 5जी कवरेज के मामले में देश के टेक हब कर्नाटक और बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से भी आगे है। बिहार में अब 94.52% आबादी 5जी नेटवर्क की पहुंच में आ चुकी है। जबकि राष्ट्रीय औसत 86.18 प्रतिशत है। देश के आईटी हब कर्नाटक में यह कवरेज सिर्फ 79.92% है, जबकि यूपी में 85.25 % लोग 5जी से जुड़ पाए हैं। बेंगलुरु दुनिया की बड़ी-बड़ी टेक कंपनियों के दफ्तर हैं। फिर भी वहां का ग्रामीण इलाका 5जी की रफ्तार से दूर है। बिहार में ग्रामीण इलाकों में 5जी सेवाओं पर हुआ काम बिहार में 5जी सेवाओं की बेहतर कवरेज की सबसे बड़ी वजह यह है कि टेलीकॉम कंपनियों ने बिहार में ग्रामीण इलाकों को प्राथमिकता दी, जबकि कर्नाटक में शहरी क्षेत्रों पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया गया। बिहार में कंपनियों और सरकार ने मिलकर गांव-गांव तक 5जी नेटवर्क पहुंचाने में कवायद की है। केन्द्र सरकार के भारत नेट परियोजना के तहत बिहार के लगभग 8,860 ग्राम पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ा गया है, जिस पर 812 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए हैं। योजना का मकसद हर गांव में तेज इंटरनेट पहुंचाना है। बिहार ने इसे सफलतापूर्वक अमल में लाया। इसका नतीजा है कि आज बिहार के दूरदराज के गांवों में बैठे लोग भी अब 5जी इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। दूरसंचार दिवस का क्या है इतिहास यह दिवस पहली बार 1969 में मनाया गया था, जो 1865 में अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (आईटीयू) की स्थापना की वर्षगांठ के रूप में चुना गया। इसका उद्देश्य लोगों को दूरसंचार के महत्व, डिजिटल विभाजन को पाटने और नई तकनीकों के बारे में जागरूक करना है। यह दिन सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के माध्यम से दुनिया को जोड़ने और ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने का संदेश देता है। राष्ट्रीय राजमार्गों-ग्रामीण क्षेत्रों में नेटवर्क की समस्या बिहार में भले ही 5जी नेटवर्क का विस्तार तेजी से हो रहा है। लेकिन नेटवर्क कनेक्विटी अब भी कई जगहों पर ठीक नहीं है। राज्य के राष्ट्रीय राजमार्गों पर 1750 किलोमीटर क्षेत्र में 424 स्थान ऐसे हैं, जहां मोबाइल नेटवर्क बिल्कुल उपलब्ध नहीं है। इन जगहों पर टावरों के बीच की दूरी इतनी अधिक है कि नेटवर्क पहुंच ही नहीं पाता। दूरसंचार के मानक के अनुसार शहरी टावरों के बीच की दूरी 500 से 800 मीटर के बीच होनी चाहिए। लेकिन कई जगहों पर यह 1.5 से 2 किलोमीटर से भी अधिक है। गांवों में 3 से 5 किलोमीटर, जो 7 से 8 किलोमीटर तक भी है। इससे नेटवर्क की समस्या अब भी कई जगहों पर है। बीएसएनएल से केवल 36.89% कॉल ही लग पाया ट्राई ने नेटवर्क की स्थिति जानने के लिए जनवरी में इंडिपेंडेंट ड्राइव टेस्ट कराया। यह टेस्ट समस्तीपुर जिले में किया गया। सबसे बड़ी चिंता बीएसएनएल को लेकर सामने आई। बीएसएनएल से केवल 36.89% कॉल ही लग पाया, जबकि 10.04% कॉल ड्राप हो गई। एयरटेल और जियो ने 99% से अधिक कॉल सफलता दी। डाउनलोड स्पीड में भी बड़ा अंतर सामने आया। जियो ने 158 एमबीपीएस, एयरटेल ने 101 एमबीपीएस, जबकि बीएसएनएल का केवल 12 एमबीपीएस स्पीड रहा। ट्राई की रिपोर्ट के अनुसार सीवान, रोहतास, कैमूर, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर और सीमावर्ती इलाकों में टावरों के बीच अधिक दूरी है।

भोजशाला विवाद में बड़ा फैसल,अयोध्या जैसी बहस, हिंदू-मुस्लिम पक्ष के लिए क्या बदलेगा?

 नई दिल्ली मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। इंदौर खंडपीठ ने अपने 242 पन्नों के विस्तृत आदेश में कहा कि 11वीं शताब्दी का यह परिसर मूल रूप से देवी वाग्देवी (सरस्वती) को समर्पित मंदिर और संस्कृत शिक्षा का केंद्र था। हाईकोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के वर्ष 2003 के उस आदेश को रद कर दिया, जिसके तहत हिंदुओं को मंगलवार और मुस्लिमों को शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी गई थी। अदालत ने अब हिंदुओं को परिसर में प्रतिदिन पूजा का विशेष अधिकार देने का निर्देश दिया है। हाईकोर्ट ने क्या कहा? जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने कहा कि ऐतिहासिक साहित्य, पुरातात्विक साक्ष्य और अभिलेख यह साबित करते हैं कि विवादित स्थल भोजशाला था, जो परमार वंश के राजा भोज से जुड़ा संस्कृत अध्ययन का प्रमुख केंद्र था। अदालत ने अपने आदेश में कहा, "ऐतिहासिक साहित्य और पुरातात्विक संदर्भ यह स्थापित करते हैं कि यह क्षेत्र देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर और संस्कृत अध्ययन का केंद्र था। हिंदू पूजा की परंपरा समय-समय पर नियंत्रित जरूर हुई, लेकिन कभी समाप्त नहीं हुई।" बेंच ने 28 मार्च को स्वयं स्थल का निरीक्षण भी किया था। अदालत ने विवादित परिसर को प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958 के तहत संरक्षित स्मारक घोषित करते हुए कहा कि इसका प्रभाव 18 मार्च 1904 से माना जाएगा। ASI को फटकार हाईकोर्ट ने ASI की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि एजेंसी ने अपने वैधानिक दायित्वों का सही तरीके से पालन नहीं किया और भोजशाला परिसर के संरक्षण में जानबूझकर लापरवाही बरती। कोर्ट ने कहा कि किसी भी धार्मिक स्थल को संरक्षित घोषित करने से पहले ASI की जिम्मेदारी होती है कि वह उस स्थल की मूल प्रकृति, स्वरूप और धार्मिक चरित्र का सही निर्धारण करे। केंद्र और ASI को क्या निर्देश दिए गए? अदालत ने केंद्र सरकार और ASI को भोजशाला परिसर का प्रशासन और प्रबंधन संभालने का निर्देश दिया है। इसके मुताबिक, ASI को संरक्षण, रखरखाव और धार्मिक गतिविधियों के नियमन का पूर्ण अधिकार होगा। परिसर को संस्कृत अध्ययन केंद्र के रूप में विकसित करने पर भी जोर दिया गया। श्रद्धालुओं की सुविधाओं, सुरक्षा व्यवस्था और धार्मिक स्थल की पवित्रता बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाने को कहा गया। कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह भी कहा कि लंदन म्यूजियम में रखी गई देवी सरस्वती की प्रतिमा को भारत वापस लाने की मांग पर विचार किया जाए। अयोध्या फैसले की झलक हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले के निर्णय का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि पुरातात्विक साक्ष्यों की व्याख्या अनुभव, ऐतिहासिक समझ और विवेकपूर्ण निर्णय के आधार पर की जानी चाहिए। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकारों का दायित्व है कि वे ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले स्थलों का संरक्षण करें और संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करें। मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट जाएगा इस मामले में मुस्लिम पक्ष को बड़ा झटका लगा है। मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी सहित मुस्लिम पक्ष की याचिकाएं हाईकोर्ट ने खारिज कर दीं। MKWS के अध्यक्ष अब्दुल समद ने कहा कि वे इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। उनका आरोप है कि अदालत ने जिन रिपोर्टों पर भरोसा किया, वे एकतरफा थीं। मुस्लिम पक्ष के वकील अशर वारसी ने कहा कि ASI की वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट त्रुटिपूर्ण है। वहीं AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि यह परिसर 700 वर्षों से मस्जिद के रूप में इस्तेमाल होता रहा है और उन्हें उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के फैसले को पलट देगा। जैन समुदाय के दावे पर अदालत की टिप्पणी मामले में जैन समुदाय ने भी दावा किया था कि यह स्थल मूल रूप से मध्यकालीन जैन मंदिर था। अदालत ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत में जैन और हिंदू परंपराएं सदियों से साथ-साथ विकसित हुई हैं। पूजा पद्धति अलग हो सकती है, लेकिन दोनों में समान आध्यात्मिक तत्व मौजूद हैं। कोर्ट ने कहा कि खुदाई में जैन तीर्थंकर की प्रतिमा मिलना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि दोनों परंपराओं की मूर्तियां अक्सर एक-दूसरे के धार्मिक स्थलों में पाई जाती रही हैं। राजनीतिक प्रतिक्रिया मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने फैसले का स्वागत करते हुए इसे भारत की सांस्कृतिक विरासत, आस्था और इतिहास के सम्मान का महत्वपूर्ण क्षण बताया। उन्होंने कहा कि यह निर्णय ऐतिहासिक तथ्यों और भारतीय संस्कृति के संरक्षण की दिशा में अहम कदम है। क्या है भोजशाला विवाद? धार स्थित भोजशाला को हिंदू पक्ष देवी सरस्वती का मंदिर और संस्कृत पाठशाला मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा है। वर्ष 2003 में ASI ने व्यवस्था बनाई थी कि हिंदू मंगलवार को पूजा करेंगे और मुस्लिम शुक्रवार को नमाज अदा करेंगे। अब हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था को खत्म करते हुए हिंदू पक्ष को दैनिक पूजा का अधिकार दे दिया है।  

अंकारा में बैलिस्टिक मिसाइल का प्रदर्शन, माइकल रुबिन ने जताई भारत पर खतरे की आशंका

अंकारा तुर्की ने हाल ही में इस्तांबुल में रक्षा और एयरोस्पेस प्रदर्शनी में अपनी नई यिल्दिरिमहान इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल का अनावरण किया है। मिसाइल का परीक्षण इस साल के आखिर में किया जाएगा। तुर्की का कहना है कि यह मिसाइल मैक 25 की गति से 3,000 किलोग्राम वॉरहेड ले जाने में सक्षम है। तुर्की के दावे सही हैं तो यह मिसाइल यूरोप, अफ्रीका, पश्चिम एशिया और भारत को निशाना बना सकती है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) के पूर्व अधिकारी माइकल रुबिन ने कहा है कि यह भारत के लिए चिंता का सबब है क्योंकि तुर्की प्रेसिडेंट रेसेप तैयप एर्दोगन ने पश्चिम एशिया से आगे बढ़ते हुए कश्मीरी अलगाववादी आंदोलन को अपना मुद्दा बना लिया है। विदेश नीति के जानकार माइकल रुबिन ने संडे गार्डियन में अपने लेख में कहा है कि भारतीय अधिकारियों को तुर्की से यह सवाल पूछना चाहिए कि उनको इतनी लंबी मारक क्षमता की मिसाइल की जरूरत क्यों है। तुर्की के प्रतिद्वंद्वी- ग्रीस, साइप्रस, इजरायल, मिस्र, आर्मेनिया और ईरान तो पहले ही उसकी टायफून मिसाइलों की मारक सीमा के भीतर आते हैं। तुर्की को क्यों है मिसाइल की जरूरत रुबिन का कहना है कि अपनी सीमाओं के पास हमला करने के लिए ICBM विकसित नहीं की जाती है। इस बात की संभावना नहीं है कि तुर्की को आइसलैंड या इंडोनेशिया पर हमले की जरूरत पड़ेगी। नाटो सदस्य होने के नाते तुर्की को रूस का मुकाबला करने के लिए अपनी खुद की लंबी दूरी की मिसाइलें विकसित करने की जरूरत नहीं है। ऐसे में भारत ही तुर्की का संभावित लक्ष्य बचता है। रेसेप तैयप एर्दोगन ने इस्तांबुल मेयर और तुर्की के राष्ट्रपति के तौर पर खुद को 'इस्लामी शासन' को बढ़ावा देने वाले के तौर पर पेश किया है। वह खुद को शरिया का सेवक बता चुके हैं। तुर्की में मजबूत होने के बाद से एर्दोगन ने दुनिया में अपनी महत्वाकांक्षा दिखाई है। उन्होंने ना सिर्फ पश्चिम एशिया में पैर फैलाए हैं बल्कि एशिया पर भी नजर जमा रखी ह कश्मीर पर एर्दोगन की नजर! रुबिन का दावा है कि एर्दोगन की इस्लामी महत्वाकांक्षा पश्चिम एशिया से आगे बढ़ते हुए कश्मीरी अलगाववादी आंदोलन तक आ गई हैं। उनका मानना है कि कश्मीरी में अलगाववाद और आतंकवाद जायज है। साल 2020 में एर्दोगन ने जोर देकर कहा था कि कश्मीर हमारे लिए उतना ही नजदीक है जितना तुर्की हमारे लिए है। एर्दोगन ने कश्मीर को एक ज्वलंत मुद्दा बताया है। तुर्की ने कश्मीरी छात्रों को स्कॉलरशिप देना बढ़ा दिया है ताकि उन्हें तुर्की-शैली के इस्लामी विचारों में ढाला जा सके और शायद उन्हें सैन्य प्रशिक्षण भी दिया जा सके। एर्दोगन जिस तरह से नव-ओटोमनवाद को बढ़ावा देते हैं, उसी तरह वे इसमें विश्वास रखते हैं कि भारत पर मुसलमानों का शासन होना चाहिए। पाकिस्तान के जरिए भारत पर निशाना हालिया समय में कश्मीर को लेकर तुर्की के बयानों में नरमी देखी गई है। इसे किसी बड़े तूफान से पहले की शांति भी कहा जा सकता है। तुर्की शायद भारत पर सीधे हमला ना करे लेकिन वह पाकिस्तान की रक्षा और कश्मीर से जुड़े आतंकी गुटों के खिलाफ भारत की जवाबी कार्रवाई को रोकने के लिए अपनी मिसाइलों का इस्तेमाल कर सकता है।  

रेलवे का हाईटेक प्लान! नए सिस्टम से बुलेट जैसी स्पीड में दौड़ेंगी मध्य प्रदेश की ट्रेनें

ग्वालियर भारतीय रेलवे ने अपनी पारंपरिक कछुआ चाल को अलविदा कहकर डिजिटल और हाईस्पीड युग में कदम रख दिया है। झांसी-हेतमपुर रेलखंड पर ऑटोमेटिक सिग्नलिंग सिस्टम (स्वचालित सिग्नल प्रणाली) के लागू होने से ट्रेनों के संचालन का पूरा गणित ही बदल गया है। लगभग 155 किलोमीटर लंबे इस व्यस्त रूट पर अब ट्रैक के हर एक किलोमीटर पर रेलवे की तीसरी आंख तैनात है। पहले जहां इस दूरी में केवल 34 सिग्नल थे, वहीं अब इनकी संख्या बढ़ाकर 162 कर दी गई है। इस बदलाव से न केवल ट्रेनों की रफ्तार बढ़ेगी, बल्कि यात्रियों को स्टेशन के बाहर (आउटर पर) बेवजह खड़े रहने की झंझट से भी मुक्ति मिल जाएगी। क्या है नया सिस्टम? एक के पीछे एक दौड़ेंगी ट्रेनें पुरानी व्यवस्था में एक स्टेशन से दूसरी ट्रेन तब तक रवाना नहीं की जाती थी, जब तक कि आगे चल रही ट्रेन अगले स्टेशन तक न पहुंच जाए।  अब क्या बदला: नई तकनीक में ट्रैक को छोटे-छोटे ब्लॉक (करीब 1-1 किमी) में बांट दिया गया है। ■ इलेक्ट्रॉनिक नजर: आधुनिक सेंसर्स और इलेक्ट्रॉनिक नेटवर्क के जरिए ट्रेन की लोकेशन बदलते ही सिग्नल का रंग अपने आप बदल जाता है। अब एक ही ट्रैक पर सुरक्षित दूरी बनाकर एक के पीछे दूसरी ट्रेनें आसानी से दौड़ सकेंगी। इससे ट्रैक की क्षमता कई गुना बढ़ गई है। लोको पायलट को ग्रीन सिग्नल की राहत, आउटर का रेड सिग्नल गायब 1. ड्राइवर्स का बढ़ा भरोसा: अब लोको पायलट को काफी पहले ही आगे के सिग्नल की सटीक स्थिति का पता चल जाता है। खराब मौसम या धुंध में भी ड्राइवर पूरे आत्मविश्वास के साथ ट्रेन की रफ्तार बनाए रख सकेंगे। 2. आउटर पर नो वेटिंग: अक्सर अगले स्टेशन से हरी झंडी न मिलने के कारण ट्रेनों को आउटर पर रोक दिया जाता था। अब ऑटोमेटिक ब्लॉक सिस्टम के कारण ट्रेनें एक-दूसरे के पीछे चलती रहेंगी, जिससे स्टेशन मास्टर को भी मैन्युअली सिग्नल ऑपरेट नहीं करना पड़ेगा। ग्वालियर में ट्रैक लोड हर दिन गुजरती हैं 236 ट्रेनें ग्वालियर से गुजरने वाले ट्रैफिक का दबाव इतना ज्यादा है कि यह सिस्टम 'लाइफलाइन' साबित होगा- ■ झांसी-आगरा रूट: 170 ट्रेनें ■ ग्वालियर-गुना रूट: 28 ट्रेनें ■ ग्वालियर-भिंड रूट: 06 ट्रेनें ■ ग्वालियर-कैलारस : 06 ट्रेनें ■ थ्रू (बिना रुके) ट्रेनें: 26 ट्रेनें ■ कुल: 236 ट्रेनें प्रतिदिन हर किलोमीटर पर ऑटोमेटिक सिग्नलिंग सिस्टम रेलवे ट्रैक के हर किलोमीटर पर ऑटोमेटिक सिग्नलिंग सिस्टम लगाया जा रहा है। इससे ट्रैक की कैपेसिटी और ट्रेनों की स्पीड दोनों बढ़ती है। सबसे बड़ा फायदा यह है कि ट्रेनों को अब किसी स्टेशन या आउटर पर बेवजह इंतजार नहीं करना पड़ता। झांसी मंडल में यह काम लगभग पूरा हो चुका है। -शशिकांत त्रिपाठी, सीपीआरओ, उत्तर मध्य रेलवे 

मोटापे और खर्राटों पर बड़ा दावा! एक इंजेक्शन ने स्टडी में दिखाया असरदार परिणाम

आगरा मोटापा से मधुमेह, खर्राटे, युवतियों में मासिक धर्म अनियमित होने के साथ ही फैटी लिवर की समस्या तेजी से बढ़ी है। एसएन मेडिकल कॉलेज में मोटापे के साथ इन बीमारियों से पीड़ित मरीजों पर स्टडी की गई, मरीजों को तीन महीने तक हर सप्ताह तिरजेपाइड इंजेक्शन दिया गया। तीन महीने में 10 प्रतिशत तक वजन वजन कम हो गया। इसके साथ ही खर्राटे की समस्या और पाली सिस्टिक ओवरी डिसऑर्डर (पीसीओएस ) से मासिक धर्म अनियमित होने की समस्या भी ठीक हो गई। यह स्टडी इसी वर्ष जर्नल ऑफ मिड टर्म में प्रकाशित हुई है। एसएन मेडिकल कॉलेज में 93 मरीजों पर की गई स्टडी के चौंकाने वाले नतीजे मधुमेह रोगियों में शुगर का स्तर नियंत्रित रखने के लिए तिरजेपाइड इंजेक्शन का इस्तेमाल किया जाता है। यह इंजेक्शन सप्ताह में एक बार लेना होता है। मरीज को दवाएं और इंसुलिन लेने की जरूरत नहीं पड़ती है। इससे वजन भी कम होता है। एसएन मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के डॉ. प्रभात अग्रवाल ने बताया कि मोटापे के कारण मधुमेह, खर्राटे, पीसीओएस, फैटी लिवर से पीड़ित 18 वर्ष से अधिक आयु के 93 मरीजों पर स्टडी की गई। इसमें मधुमेह रोगी 23 मरीज थे जबकि 70 मरीजों को मधुमेह नहीं था उन्हें खर्राटे सहित अन्य बीमारियां थी। इन्हें तीन महीने तक हर सप्ताह तिरजेपाइड इंजेक्शन दिया गया, पहले महीने 2.5 एमजी, दूसरी महीने 5 एमजी और तीसरे महीने 7.5 एमजी दिया गया। तीन महीने तक एक इंजेक्शन हर सप्ताह देने से सात किलोग्राम तक वजन हुआ कम डॉक्टर प्रभात अग्रवाल ने बताया कि तीन महीने में जिन मरीजों को मधुमेह की समस्या नहीं थी उनका सात किलोग्राम से अधिक वजन (10 प्रतिशत ) और जिनको मधुमेह की समस्या थी उनका वजन छह किलोग्राम तक कम हो गया। इससे खर्राटे और फैटी लिवर की समस्या में आराम मिल गया। एसएन की स्त्री रोग विभाग की डॉ. रुचिका गर्ग ने बताया कि स्टडी में 10 प्रतिशत युवतियों को शामिल किया गया था, इन्हें पीसीओ के कारण वजन अधिक होने से मासिक धर्म अनियमित थे। वजन कम होने से मासिक धर्म की समस्या भी ठीक हो गई। 72 सप्ताह में 20 प्रतिशत तम वजन हो सकता है कम डॉ. प्रभात अग्रवाल ने बताया कि इंजेक्शन 72 सप्ताह तक लिया जाए तो 20 प्रतिशत तक वजन कम हो सकता है। इसके साथ ही जीवनशैली में बदलाव, चिकनाई युक्त भोजन ना लेने और नियमित व्यायाम करने से इंजेक्शन बंद करने के बाद वजन बढ़ने से भी रोका जा सकता है। रक्त शर्करा, इंसुलिन और चयापचय पर प्रभाव वजन घटाने वाले इंजेक्शन आपके शरीर के रक्त शर्करा के प्रबंधन को भी बेहतर बनाते हैं।  ये इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार करते हैं, जिससे कोशिकाएं ऊर्जा का अधिक कुशलता से उपयोग कर पाती हैं। इससे पूरे दिन रक्त शर्करा का स्तर स्थिर रहता है। इंसुलिन प्रतिरोध होने पर , ग्लूकोज ऊर्जा के रूप में उपयोग होने के बजाय रक्तप्रवाह में ही रहता है। शरीर अधिक इंसुलिन का उत्पादन करके प्रतिक्रिया करता है, जिससे शरीर वसा-भंडारण मोड में बना रहता है। इंसुलिन प्रतिरोध से पीड़ित कई लोगों के लिए, अस्थिर रक्त शर्करा के कारण वजन कम करना बहुत मुश्किल हो जाता है। शरीर वसा-भंडारण मोड में बना रहता है। इंसुलिन प्रतिक्रिया में सुधार करके, वजन घटाने वाले इंजेक्शन अतिरिक्त इंसुलिन के स्तर को कम करने में मदद करते हैं जो शरीर को वसा-भंडारण मोड में बनाए रखता है। जब इंसुलिन संकेत अधिक संतुलित हो जाते हैं, तो कोशिकाएं ऊर्जा के लिए संग्रहित वसा का अधिक आसानी से उपयोग कर पाती हैं, जिससे वजन कम करना अधिक स्थिर और लंबे समय तक बनाए रखना आसान हो जाता है। एक सिरिंज पकड़े हुए हाथ और एक संदेश जिसमें लिखा है "वजन घटाने वाले इंजेक्शन कितनी जल्दी असर करते हैं" वजन घटाने वाले इंजेक्शन कितनी जल्दी असर दिखाना शुरू कर देते हैं? वजन घटाने वाले इंजेक्शन अक्सर पहले एक से दो हफ्तों में असर दिखाना शुरू कर देते हैं। शुरुआती बदलाव आमतौर पर आंतरिक होते हैं, न कि वजन मापने वाली मशीन पर दिखाई देते हैं।  जैसे-जैसे हार्मोन और चयापचय स्थिर होने लगते हैं, अगले कुछ हफ्तों में वजन में स्पष्ट कमी आने लगती है।   सप्ताह 1-2: भूख में कमी आमतौर पर पहले एक से दो हफ्तों में ही लक्षण दिखने लगते हैं।  भूख में कमी अक्सर शुरुआत में ही शुरू हो जाती है। शोध परीक्षणों में, जिन लोगों को सेमाग्लूटाइड का इंजेक्शन दिया गया, उन्होंने जानबूझकर कैलोरी कम किए बिना भी अपनी कैलोरी की मात्रा में 24-35% की कमी देखी। आपको पाचन क्रिया में भी शुरुआती बदलाव नज़र आ सकते हैं।  जल्दी पेट भर जाना या लंबे समय तक पेट भरा रहना आम बात है। कई लोगों के लिए, यही वह पल होता है जब उन्हें एहसास होता है कि भूख कम होने में अब महीनों नहीं लगे हैं। यह अक्सर दिखने वाले पहले बदलावों में से एक होता है।   सप्ताह 3-6: वजन में स्पष्ट कमी शुरू होती है तीसरे और छठे सप्ताह के बीच, शारीरिक बदलाव अक्सर अधिक स्पष्ट होने लगते हैं।  यही वह समय होता है जब वजन घटाने वाले इंजेक्शन के परिणाम वास्तविक लगने लगते हैं। वजन में लगातार बदलाव आना शुरू हो सकता है। कपड़े पहले की तरह फिट होने लग सकते हैं। कुछ लोगों को रक्त शर्करा के स्थिर होने के साथ-साथ ऊर्जा में वृद्धि का अनुभव होता है। पहले महीने में आपका कितना वजन कम होता है,  यह अलग-अलग हो सकता है। शुरुआती वजन, इंसुलिन प्रतिरोध और जीवनशैली में बदलाव जैसे कारक महत्वपूर्ण होते हैं।    सप्ताह 8-12 और उसके बाद: स्थायी वसा हानि पहले दो से तीन महीनों के बाद, वज़न कम होना ज़्यादा स्थिर और अनुमानित लगने लगता है।  वसा का कम होना तेज़ गति के बजाय ज़्यादा नियमित हो जाता है। यही वो समय होता है जब दीर्घकालिक वज़न प्रबंधन आकार लेना शुरू करता है। चयापचय में समय के साथ सुधार होता रहता है। भूख का नियंत्रण स्थिर हो जाता है। रक्त शर्करा नियंत्रण में सुधार होता है। क्योंकि यह एक साप्ताहिक इंजेक्शन द्वारा ली जाने वाली वज़न घटाने की दवा है, इसलिए खुराक का समायोजन परिणामों और सहनशीलता दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सही तरीके से इस्तेमाल करने पर, … Read more

बुंडीबुग्यो स्ट्रेन से फैला ईबोला: लक्षण, खतरा और WHO की चेतावनी

नई दिल्ली विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने हाल ही में डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और युगांडा में फैले ईबोला वायरस इंटरनेशनल इमरजेंसी ऑफ कंसर्न यानी सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति की अंतरराष्ट्रीय चिंता की घोषित कर दी है. यह बीमारी बुंडीबुग्यो वायरस के कारण हो रही है, जो ईबोला वायरस का ही एक घातक स्ट्रेन है.   यह स्ट्रेन पहले की ज्यादातर महामारियों में फैलने वाले जैरे (Zaire) स्ट्रेन से अलग है. बुंडीबुग्यो स्ट्रेन की खोज 2007-2008 में युगांडा के बुंडीबुग्यो जिले में हुई थी, जहां यह पहली बार सामने आया. तब इसने 116 से ज्यादा लोगों को संक्रमित किया था और करीब 34-40 प्रतिशत मौतें हुई थीं. अब DRC के इटुरी प्रांत में यह 17वीं बार ईबोला का प्रकोप है, लेकिन इस बार वायरस का प्रकार अलग है. इस स्ट्रेन के लिए कोई स्पेशन वैक्सीन या खास दवा नहीं है, जो इसे और भी चुनौतीपूर्ण बनाता है. ईबोला वायरस कई प्रकार का होता है, लेकिन इंसानों में बड़े प्रकोप मुख्य रूप से तीन स्ट्रेन से होते हैं – ज़ैरे, सूडान और बुंडीबुग्यो. ज़ैरे स्ट्रेन सबसे घातक माना जाता है, जिसमें 60-90 प्रतिशत तक मौतें हो सकती हैं. बुंडीबुग्यो स्ट्रेन में कम घातक है. पिछली घटनाओं में इसकी मृत्यु दर औसतन 32-40 प्रतिशत रही है, हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में इसे 50 प्रतिशत तक बताया गया है. यह दर इलाज की उपलब्धता, मरीज की उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और संक्रमण की गंभीरता पर निर्भर करती है. फिर भी यह वायरस बहुत खतरनाक है क्योंकि यह तेजी से फैल सकता है. बिना उचित देखभाल के कई लोगों की जान ले सकता है. DRC के घने उष्णकटिबंधीय जंगलों में यह वायरस प्राकृतिक रूप से मौजूद रहता है. चमगादड़ जैसे जानवर इसके रिजर्वायर हो सकते हैं. बुंडीबुग्यो ईबोला के लक्षण क्या हैं? ईबोला के सभी स्ट्रेन के लक्षण लगभग एक जैसे होते हैं, लेकिन वे धीरे-धीरे बढ़ते हैं. शुरुआती लक्षण फ्लू जैसे दिखते हैं – अचानक तेज बुखार, सिरदर्द, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द, थकान और कमजोरी. कुछ दिनों बाद उल्टी, दस्त, पेट दर्द और गले में खराश जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं. बीमारी बढ़ने पर गंभीर लक्षण दिखते हैं जैसे आंखों, मसूड़ों या अन्य जगहों से बिना वजह खून बहना, शरीर में चोट के निशान, सांस लेने में तकलीफ और अंगों का फेल होना. संक्रमण के 2 से 21 दिनों के अंदर लक्षण दिख सकते हैं. वायरस शरीर के तरल पदार्थों (खून, उल्टी, दस्त, लार आदि) के सीधे संपर्क से फैलता है. मृत व्यक्ति के शरीर को छूने या दफनाने जैसी रस्मों के दौरान भी खतरा बहुत ज्यादा होता है. यह हवा, पानी या कीटों से नहीं फैलता. क्या यह ठीक हो सकता है?   बुंडीबुग्यो स्ट्रेन के लिए कोई खास एंटीवायरल दवा या वैक्सीन अभी नहीं है, जबकि ज़ैरे स्ट्रेन के लिए वैक्सीन और इलाज मौजूद हैं. इलाज मुख्य रूप से देखभाल पर निर्भर करता है. इसमें शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी पूरी करना, बुखार और दर्द की दवाएं देना, संक्रमण से बचाव के लिए एंटीबायोटिक्स अगर जरूरी हो, और गंभीर मामलों में ऑक्सीजन या ब्लड ट्रांसफ्यूजन शामिल है. जितनी जल्दी मरीज को अस्पताल में अलग-थलग करके इलाज शुरू किया जाए, उसके बचने की संभावना उतनी बढ़ जाती है. शुरुआती दिनों में सही देखभाल से कई मरीज बच जाते हैं. WHO और स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारी संपर्क ट्रेसिंग, संदिग्ध मरीजों को आइसोलेट करने और सुरक्षित दफनाने पर जोर दे रहे हैं. बीमारी को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय यात्रा पर पाबंदी नहीं लगानी चाहिए, बल्कि स्क्रीनिंग, जागरूकता और सीमा पर निगरानी बढ़ानी चाहिए. लोगों को सलाह दी जाती है कि संक्रमित क्षेत्र से आने वाले संपर्क में आए लोगों को 21 दिनों तक निगरानी में रखा जाए. हाथ धोना, संक्रमितों से दूरी बनाए रखना और जंगली जानवरों के संपर्क से बचना महत्वपूर्ण है. अफ्रीका के कई देशों में ईबोला बार-बार आता रहा है, लेकिन अच्छी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से इसे काबू में लाया जा सकता है. यह बीमारी इसलिए चिंताजनक है क्योंकि DRC और युगांडा की सीमा क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियां हैं, जो जांच और नियंत्रण को मुश्किल बनाती हैं. किंसासा और कंपाला में भी कुछ मामले सामने आए हैं. WHO ने सभी पड़ोसी देशों को अलर्ट रहने को कहा है. हालांकि यह महामारी स्तर का नहीं है, लेकिन सतर्कता जरूरी है.