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प्राइवेट स्कूलों को मिली राहत, नए सत्र में फीस बढ़ाने पर सरकार की अनुमति जरूरी नहीं

नई दिल्ली दिल्ली हाईकोर्ट ने  शिक्षा निदेशालय (DoE) को बड़ा झटका देते हुए एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। हाईकोर्ट ने कहा है कि दिल्ली के प्राइवेट स्कूल और बिना सरकारी सहायता वाले मान्यता प्राप्त स्कूलों को नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने पर फीस बढ़ाने के लिए शिक्षा निदेशालय से पहले से अनुमति या मंजूरी लेने की कोई कानूनी आवश्यकता नहीं है। एचटी की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस अनूप जयराम भंभानी की बेंच ने साफ किया कि पूर्व अनुमति केवल उसी स्थिति में जरूरी है, जब कोई स्कूल चालू शैक्षणिक सत्र के बीच में अचानक फीस बढ़ाना चाहता हो। कोर्ट ने यह कहा कि किसी स्कूल के खाते में केवल 'सरप्लस फंड' होने का मतलब यह कतई नहीं निकाला जा सकता कि वह स्कूल शिक्षा का व्यावसायीकरण कर रहा है। फीस बढ़ाने की स्वायत्तता पर हाईकोर्ट की मुहर हालांकि, बेंच ने अपने निर्देश में यह भी साफ कर दिया कि DoE को सौंपे गए बयानों में संबंधित स्कूलों द्वारा प्रस्तावित फीस में बढ़ोतरी केवल 2027 के शैक्षणिक सत्र से ही लागू होगी। बेंच ने कहा कि किसी भी स्कूल को पिछले शैक्षणिक सत्रों के लिए फीस या अन्य चार्जेस का कोई भी बकाया पिछली तारीख से मांगने या वसूलने की अनुमति नहीं होगी। DoE का काम स्कूलों के कामकाज को 'माइक्रो-मैनेज' करना नहीं बेंच ने यह साफ किया कि जो स्कूल किसी एकेडमिक सेशन की शुरुआत में फीस बढ़ाते हैं, उन्हें सेशन शुरू होने से पहले DoE को प्रस्तावित फीस का एक स्टेटमेंट जमा करना होगा। हालांकि, जस्टिस भंभानी ने कहा कि प्राइवेट, बिना सरकारी मदद वाले और मान्यता प्राप्त स्कूलों को अपनी वित्तीय आजादी का अधिकार बना रहेगा। शिक्षा निदेशालय का काम स्कूलों के रोजमर्रा के वित्तीय कामकाज को डिक्टेट करना या 'माइक्रो-मैनेज' करना नहीं है। DoE के रेगुलेटरी अधिकार बहुत सीमित हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि निजी, बिना सरकारी मदद वाले और मान्यता प्राप्त स्कूलों में फीस तय करने के मामले में DoE के रेगुलेटरी अधिकार बहुत सीमित हैं और वे आम तौर पर दखल देने की इजाजत नहीं देते। कोर्ट ने कहा कि किसी स्कूल के खातों में सिर्फ ज्यादा पैसे होने के आधार पर DoE यह नतीजा नहीं निकाल सकता कि स्कूल कमर्शियलाइजेशन (मुनाफाखोरी) कर रहा है। DoE को 2 महीने में प्रस्तावों पर लेना होगा फैसला हाईकोर्ट ने अपने फैसले में आगे कहा कि जहां कोई स्कूल चल रहे एकेडमिक सेशन के दौरान फीस बढ़ाने का प्रस्ताव रखता है, तो उसे अपना प्रस्ताव DoE को उस तारीख से कम से कम दो महीने पहले जमा करना होगा, जिस तारीख से बदली हुई फीस लागू करने की मांग की जा रही है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि DoE को ऐसे प्रस्ताव पर उसी दो महीने के समय में फैसला करना होगा, ऐसा न करने पर प्रस्ताव को मंजूर माना जाएगा। 137 प्राइवेट स्कूलों की याचिका पर आया फैसला यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब दिल्ली के 137 प्राइवेट स्कूलों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इन स्कूलों ने वर्ष 2016-17 से 2022-23 के बीच समय-समय पर फीस बढ़ाने के प्रस्ताव दिए थे, जिन्हें शिक्षा निदेशालय (DoE) ने खारिज कर दिया था। कोर्ट ने सरकार के उन आदेशों को 'गलतफहमी पर आधारित' बताते हुए पूरी तरह से रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने साफ किया कि जिन स्कूलों को सरकारी जमीन 'लैंड क्लॉज' (जमीन आवंटन की शर्त) के तहत मिली है, उन पर भी सत्र की शुरुआत में फीस बढ़ाने के लिए यही नियम लागू होगा।

सरकारी कर्मचारियों के लिए बड़ी खुशखबरी, 8वें वेतन आयोग में हो सकता है जबरदस्त वेतन इजाफा

नई दिल्ली 8वें वेतन आयोग के तहत कर्मचारी कई बड़ी मांग कर रहे हैं. खासकर बेसिक सैलरी, फिटमेंट फैटक्‍टर और महंगाई भत्ता को लेकर मांगे उठ रही हैं. अगर ये मांगे मान ली जाती हैं तो केंद्रीय कर्मचारियों की मौज हो सकती है, जिनकी सैलरी में भारी बढ़ोतरी हो सकती है।  रेलवे कर्मचारियों की मांग इस बीच, रेलवे के कर्मचारियों की ओर से मांग उठी है कि उनकी मिनिमम बेसिक सैलरी बढ़ाकर ₹52,000 कर दिया जाए. इसके साथ ही फिटमेंट फैक्‍टर 4.38 तक बढ़ाने, HRA में भारी इजाफा और पुरानी पेंशन योजना लागू करने जैसी मांगें रखी हैं।  रेलवे की ये संस्‍था कर रही मांग अगर रेवले कर्मचारियों की ये मांगे मान ली जाती हैं तो जूनियर इंजीनियर, सीनियर सेक्शन इंजीनियर, असिस्टेंट मैनेजर और दूसरे तकनीकी कर्मचारियों के लिए 8वां वेतन आयोग बड़ी खुशखबरी ला सकता है. यह मांग इंडियन रेलवे टेक्निकल सुपरवाइजर एसोसिएशन (IRTSA) की ओर से की गई है।  अलग-अलग फिटमेंट फैक्‍टर की मांग IRTSA संगठन ने अलग-अलग लेवल के कर्मचारियों के लिए अलग फिटमेंट फैक्टर का सुझाव दिया है. L-1 से L-5 के लिए 2.92, L-6 से L-8 के लिए 3.50, L-9 से L-12 के लिए 3.80, L-13 से L-16 के लिए 4.09 और L-17 और L-18 के लिए 4.38 फिटमेंट फैक्‍टर रखा गया है।  कितनी बढ़ेगी सैलरी अगर मांगे मान ली जाती हैं तो मिनिमम बेसिक सैलरी ₹52,000 होगी और अधिकमत करीब ₹9.85 लाख रुपये तक की सैलरी हो जाएगी।  एचआरए में बढ़ोतरी की मांग रेलवे कर्मचारी संगठन ने एचआरए में भी बढ़ोतरी का अनुमान लगाया है, जो बढ़कर 40 फीसदी तक हो सकता है. संगठन का कहना है कि बड़े शहरों में रहने का खर्च तेजी से बढ़ा है, इसलिए HRA में बढ़ोतरी जरूरी है।  हाउस रेंट अलाउंस पर प्रस्ताव IRTSA ने कहा है कि 5वें वेतन आयोग द्वारा निर्धारित उस सिद्धांत का पालन 8वें वेतन आयोग में भी किया जाना चाहिए, जिसके तहत 50% DA को मूल वेतन के साथ मिला दिया जाता है। कर्मचारी संगठन ने यह सिफारिश की है कि DA पर टैक्स की राहत मिलनी चाहिए। IRTSA ने 8वें वेतन आयोग के लिए हाउस रेंट अलाउंस (HRA) की दरों में बढ़ोतरी का सुझाव दिया है। 7वें वेतन आयोग में HRA की दरें 8%, 16% और 24% थीं, जिन्हें 2024 में DA के 50% तक पहुंचने के बाद बढ़ाकर 10%, 20% और 30% कर दिया गया था। अब इसे चार श्रेणियों में बांटने की मांग की गई है। 50 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में 40 प्रतिशत HRA, 20 से 50 लाख आबादी वाले शहरों में 30 प्रतिशत, 5 से 20 लाख आबादी वाले शहरों में 20 प्रतिशत और 5 लाख से कम आबादी वाले शहरों में 10 प्रतिशत HRA देने की मांग रखी गई। इसके अलावा नाइट ड्यूटी अलाउंस की सीमा हटाने और ट्रांसपोर्ट अलाउंस को तीन गुना बढ़ाने का भी प्रस्ताव दिया गया। करियर प्रगति को लेकर IRTSA ने मॉडिफाइड एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन (MACP) योजना में बड़ा बदलाव सुझाया। संगठन चाहता है कि कर्मचारियों को 30 साल की सेवा में पांच प्रमोशन मिलें। ये प्रमोशन 6, 12, 18, 24 और 30 वर्ष की सेवा पूरी होने पर दिए जाएं। साथ ही जूनियर इंजीनियर (JE), सीनियर सेक्शन इंजीनियर (SSE) और अन्य तकनीकी कर्मचारियों की ट्रेनिंग अवधि को भी MACP के लिए सेवा अवधि में जोड़ा जाए। वेतन विसंगतियों को दूर करने की मांग भी प्रमुख रही। IRTSA ने जूनियर इंजीनियरों को उनके अधीन काम करने वाले वरिष्ठ तकनीशियनों से अधिक ग्रेड पे देने, SSE के वेतन स्तर को बढ़ाने और तकनीकी कर्मचारियों के लिए अलग वेतन संरचना बनाने की मांग की। 

छात्रों-शिक्षकों को बड़ी राहत, बिहार सरकार ने स्कूलों में पुरानी हाफ-डे व्यवस्था लौटाने का लिया फैसला

पटना बिहार के सरकारी स्कूलों के समय और कार्यदिवसों को लेकर पिछले कई महीनों से चल रहे विवाद पर अब सम्राट सरकार पूर्णविराम लगाने जा रही है. राज्य सरकार ने स्कूली बच्चों और शिक्षकों के हित में एक और बड़ा कदम उठाते हुए शनिवार को आधे दिन के कार्यदिवस वाली पुरानी व्यवस्था फिर से बहाल करने का निर्णय लिया है. सूत्रों के अनुसार, नए निर्णय के के तहत अब बिहार के सभी सरकारी स्कूलों में शनिवार को ‘हाफ डे’ यानी आधे दिन की पढ़ाई होगी. बताया जा रहा है कि शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ विस्तृत बैठक और नए शेड्यूल की गहन समीक्षा के बाद इस प्रस्ताव पर अंतिम सहमति बन गई है, और शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी जल्द ही इस नई व्यवस्था की आधिकारिक घोषणा करेंगे।  पौने छह लाख शिक्षकों और करोड़ों छात्रों को मिलेगी राहत बता दें कि पिछले कुछ समय से राज्य के पौने छह लाख सरकारी शिक्षक और विभिन्न शिक्षक संघ लगातार यह मांग उठा रहे थे कि शनिवार को फुल डे की जगह हाफ डे की व्यवस्था दोबारा शुरू की जाए. खासकर मई महीने की इस भीषण गर्मी और लू के थपेड़ों के बीच पूरे दिन स्कूल संचालन से बच्चों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ रहा था. इस नई व्यवस्था के लागू होने से न केवल प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के करोड़ों छात्र-छात्राओं को राहत मिलेगी, बल्कि मानसिक तनाव से जूझ रहे शिक्षकों को भी वीकेंड पर अपने जरूरी कार्यों को निपटाने का समय मिल सकेगा।  31 मई तक जारी हो जाएगी आधिकारिक अधिसूचना शिक्षा विभाग के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस नए स्कूल शेड्यूल और समय सारिणी यानी टाइम टेबल (Time Table) को लेकर ड्राफ्ट तैयार कर लिया गया है. विभाग आगामी 31 मई तक इस संबंध में विधिवत अधिसूचना जारी कर देगा. सम्राट सरकार का यह फैसला इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सरकार लगातार शिक्षा व्यवस्था में सुधार के साथ-साथ शिक्षकों और छात्रों के अनुकूल माहौल तैयार करने की कोशिशों में जुटी है. माना जा रहा है कि जून महीने में स्कूल खुलने के साथ ही यह व्यवस्था पूरी तरह से जमीन पर प्रभावी हो जाएगी।   

PM मोदी के सामने आया मंत्रियों का परफॉर्मेंस रिपोर्ट कार्ड, किस मंत्रालय ने मारी बाजी?

नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में सभी मंत्रालयों के कामकाज का लेखा-जोखा रखा गया। कैबिनेट सचिवालय द्वारा तैयार किए गए इस नए असेसमेंट सिस्टम के तहत साल 2025 के प्रदर्शन के आधार पर मंत्रालयों का 'रिपोर्ट कार्ड' पेश किया गया। इसमें विभिन्न श्रेणियों में सबसे अच्छा और सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले मंत्रालयों की पहचान की गई है। इस दौरान पीएम मोदी ने मंत्रियों को खर्चों पर लगाम लगाने और फिजूलखर्ची से बचने के सख्त निर्देश भी दिए हैं। नई मूल्यांकन प्रणाली: 2025 में कैसे तय हुई परफॉर्मेंस? कैबिनेट सचिवालय द्वारा तैयार किए गए इस नए असेसमेंट सिस्टम के तहत मंत्रालयों के प्रदर्शन की बारीकी से समीक्षा की गई। इस दौरान कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन ने सभी मंत्रालयों का विस्तृत स्कोरकार्ड पेश किया। बैठक में नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा सहित वरिष्ठ अधिकारियों ने इस बात पर जोर दिया कि सरकारी कामकाज को नागरिकों के लिए अधिक सुलभ कैसे बनाया जाए। किन पैमानों पर कसा गया मंत्रालयों को? मूल्यांकन के दौरान मंत्रालयों को सिर्फ उनके कोर काम पर नहीं, बल्कि संकट की स्थिति में उनकी सक्रियता पर भी परखा गया। शिकायत निवारण: आम जनता की समस्याओं को कितनी जल्दी और प्रभावी ढंग से सुलझाया गया। फाइल मैनेजमेंट: दफ्तरों में अटकी हुई फाइलों का निपटारा कितनी तेजी से हुआ। रणनीतिक सूझबूझ: अंतर-मंत्रालयी मामलों में सटीक और अहम सुझाव देना। संकट प्रबंधन: पश्चिम एशिया युद्ध जैसे वैश्विक संकट के बीच देश के हितों को सुरक्षित रखना। बेस्ट और वर्स्ट परफॉर्मर: किस मंत्रालय ने मारी बाजी? इस कड़ी समीक्षा में कुछ मंत्रालयों ने बेहतरीन काम कर टॉप स्कोर हासिल किया है, जबकि खराब प्रदर्शन करने वाले मंत्रालयों को सुधार के लिए चिन्हित किया गया है ताकि खामियों को दूर किया जा सके। खराब प्रदर्शन करने वाले मंत्रालयों के नाम सामने नहीं आए हैं। यहां सबसे अच्छा परफॉर्म करने वाले मंत्रालयों की लिस्ट है। मंत्रालय शानदार प्रदर्शन का क्षेत्र (Top Category) उपभोक्ता मामले मंत्रालय जन शिकायत निवारण और पश्चिम एशिया संकट प्रबंधन कोयला मंत्रालय फाइलों का त्वरित निपटान और उत्कृष्ट विभागीय प्रबंधन ऊर्जा मंत्रालय ऊर्जा सुरक्षा और लक्ष्यों की समय पर प्राप्ति स्वास्थ्य मंत्रालय स्वास्थ्य सुविधाओं और नीतिगत मोर्चे पर शानदार काम पीएम मोदी का सख्त निर्देश: फिजूलखर्ची पर लगेगी लगाम चार घंटे से अधिक चली इस बैठक में मोदी 3.0 की दूसरी वर्षगांठ (9 जून) से पहले सरकार की दिशा तय कर दी गई है। प्रधानमंत्री ने सभी मंत्रियों को वीआईपी कल्चर से दूर रहने की सख्त सलाह दी है। बैकग्राउंड और पीएम के प्रमुख निर्देश: विदेशी दौरों पर पाबंदी: जब तक देश के हित में बहुत जरूरी न हो या भारत के भविष्य के लिए अहम न हो, विदेशी यात्राएं नहीं होंगी। बड़े काफिलों से परहेज: मंत्रियों को अपने बड़े काफिलों को छोटा करने के निर्देश दिए गए हैं। जल्द ही इसके लिए एक नया अभियान शुरू हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय समिट रद्द: फिजूलखर्ची रोकने के लिए अफ्रीका और 'बिग कैट एलायंस' जैसी इंटरनेशनल मीटिंग्स फिलहाल टाल दी गई हैं। ऊर्जा संकट पर फोकस: पश्चिम एशिया के तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के गतिरोध को देखते हुए बायोगैस व नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल पर फोकस करने को कहा गया है। आम जनता के लिए इसका क्या मतलब है? अक्सर आम लोग सरकारी दफ्तरों में लटकती फाइलों और लेट-लतीफी से परेशान रहते हैं। इस 'रिपोर्ट कार्ड' सिस्टम से नौकरशाही और मंत्रियों को सीधा संदेश गया है कि उनकी कुर्सी 'परफॉर्मेंस' से तय होगी। इससे पब्लिक के लिए सरकारी योजनाओं का फायदा बिना किसी रुकावट के पहुंचने का रास्ता साफ होगा। साथ ही, अनावश्यक खर्चों पर रोक लगने से देश का पैसा सीधे विकास कार्यों और बुनियादी ढांचे पर खर्च हो सकेगा।

शिक्षक भर्ती को लेकर बड़ा फैसला, मेरिट आधार पर होगा चयन

 भोपाल मध्य प्रदेश में सरकारी स्कूलों में शिक्षक बनने की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। अब शिक्षक भर्ती के लिए अलग से चयन परीक्षा आयोजित नहीं की जाएगी। उम्मीदवारों को केवल शिक्षक पात्रता परीक्षा पास करनी होगी और उसी के आधार पर भर्ती प्रक्रिया पूरी की जाएगी। स्कूल शिक्षा विभाग ने इस नई व्यवस्था की तैयारी शुरू कर दी है। सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा मप्र कर्मचारी चयन मंडल (ESB) के लिए “कनिष्ठ सेवा संयुक्त परीक्षा नियम-2026” का प्रारूप तैयार कर लिया गया है। संभावना है कि यह नियम अगले एक माह के भीतर लागू कर दिए जाएंगे। जुलाई व अगस्त में माध्यमिक व प्राथमिक पात्रता परीक्षा से इसकी शुरुआत होगी। दोहरी परीक्षा प्रणाली होगी समाप्त अब तक उच्च माध्यमिक, माध्यमिक और प्राथमिक शिक्षक भर्ती में पहले पात्रता परीक्षा और उसके बाद चयन परीक्षा आयोजित की जाती थी। इस व्यवस्था के कारण अभ्यर्थियों को दो बार आवेदन करना पड़ता था और अलग-अलग परीक्षाओं की तैयारी करनी पड़ती थी। नई प्रणाली लागू होने के बाद यह पूरी प्रक्रिया आसान हो जाएगी और केवल एक परीक्षा के आधार पर भर्ती की जाएगी। वर्ष 2018 में आयोजित उच्च माध्यमिक और माध्यमिक शिक्षक भर्ती में भी एकल परीक्षा प्रणाली अपनाई गई थी। उस समय करीब 21 हजार पदों पर भर्ती की गई थी। हालांकि बाद में शिक्षक भर्ती-2023 और प्राथमिक शिक्षक भर्ती-2024 में फिर दो चरणों वाली परीक्षा प्रणाली लागू कर दी गई थी। अब विभाग फिर से पुरानी एकल परीक्षा व्यवस्था लागू करने जा रहा है। सरकारी शिक्षकों के लिए स्कोर कार्ड की वैधता दो वर्ष नई व्यवस्था के तहत सरकारी स्कूलों में शिक्षक बनने के लिए जारी स्कोर कार्ड की वैधता दो वर्ष तक रहेगी। यदि इस अवधि में अभ्यर्थी को नियुक्ति नहीं मिलती है तो उसे दोबारा परीक्षा देनी होगी। भर्ती के लिए विभागीय पोर्टल पर रिक्त पदों की जानकारी जारी की जाएगी और मेरिट के आधार पर चयन किया जाएगा। निजी स्कूलों में भी पात्रता परीक्षा अनिवार्य निजी स्कूलों में भी अब केवल पात्रता परीक्षा पास अभ्यर्थियों की ही नियुक्ति की जाएगी। हालांकि निजी विद्यालय किसी भी वर्ष की पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण उम्मीदवार को नियुक्त कर सकेंगे। निजी स्कूलों के लिए स्कोर कार्ड की वैधता आजीवन रहेगी। अभ्यर्थियों को आर्थिक राहत नई व्यवस्था से अभ्यर्थियों पर आर्थिक बोझ भी कम होगा। पहले सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों को पात्रता परीक्षा और चयन परीक्षा दोनों के लिए अलग-अलग 500 रुपये शुल्क देना पड़ता था। हर वर्ष लगभग पांच से छह लाख अभ्यर्थी इन परीक्षाओं में शामिल होते हैं। अब एक ही परीक्षा होने से समय और धन दोनों की बचत होगी। स्कोर सुधारने का मिलेगा मौका ईएसबी अधिकारियों के अनुसार नई प्रणाली में अभ्यर्थियों को भविष्य में अपने स्कोर में सुधार करने का अवसर भी मिलेगा। उम्मीदवार चाहें तो दोबारा परीक्षा देकर बेहतर अंक प्राप्त कर सकते हैं। अब शिक्षक भर्ती के लिए सिर्फ पात्रता परीक्षा होगी। चयन परीक्षा नहीं होगी। आजीवन वैध रहेगा, लेकिन अभ्यर्थी चाहें तो अपने स्कोर में सुधार के लिए दोबारा परीक्षा दे सकते हैं।- केके द्विवेदी, संचालक, स्कूल शिक्षा विभाग  

आतंकियों की जमानत पर गरमाई बहस, सरकार ने SC में कसाब और हाफिज सईद का किया जिक्र

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट में इन दिनों आतंकवाद निरोधी कानून 'UAPA' के तहत जमानत के नियमों को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ी हुई है। केंद्र सरकार ने कोर्ट में एक बेहद कड़ा सवाल उठाया है- 'क्या ट्रायल में देरी के आधार पर अजमल कसाब या हाफिज सईद जैसे खूंखार आतंकियों को भी जमानत दी जा सकती है?' इस मामले का सीधा असर भारत की न्याय प्रणाली और जेलों में बंद उन सैकड़ों विचाराधीन कैदियों पर पड़ेगा, जो सालों से UAPA के तहत बिना सजा के जेल काट रहे हैं। यह बहस राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच एक नई लकीर खींचेगी। क्या है पूरा मामला और केंद्र की दलील? सुप्रीम कोर्ट की दो अलग-अलग बेंचों ने UAPA आरोपियों की जमानत को लेकर विपरीत राय दी है। हाल ही में एक बेंच ने कहा था कि मुकदमे (Trial) में लंबी देरी होने पर आरोपियों को जमानत मिलनी चाहिए। इसी निष्कर्ष पर आपत्ति जताते हुए केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एसवी राजू ने कोर्ट में कड़ा तर्क दिया। उन्होंने कहा कि ट्रायल में देरी के आधार पर सभी को एक ही चश्मे से नहीं देखा जा सकता। "अजमल कसाब के मामले में बड़ी संख्या में गवाह थे, जिससे ट्रायल में देरी हुई। तो क्या आप उसे सिर्फ देरी के आधार पर जमानत दे देंगे? अगर हाफिज सईद को पाकिस्तान से लाया जाए और सबूत जुटाने के कारण ट्रायल में 5 साल लग जाएं, तो क्या उसे भी जमानत मिल जाएगी?" – एसवी राजू, ASG (सुप्रीम कोर्ट में) अपराध की गंभीरता और भूमिका है अहम ASG राजू ने जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की बेंच के सामने स्पष्ट किया कि जमानत देते समय अपराध की गंभीरता और उसमें आरोपी की भूमिका को जरूर देखा जाना चाहिए। उन्होंने 2020 के दिल्ली दंगा मामले का उदाहरण दिया। कोर्ट ने इस मामले में 5 आरोपियों को जमानत दी थी, लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे आरोपियों को उनकी गंभीर भूमिका के चलते राहत नहीं दी थी। इसे महज एक गणितीय फॉर्मूले की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट की दो बेंचों में मतभेद UAPA के तहत जमानत के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की ही दो बेंचों के फैसले आपस में टकरा रहे हैं। इसी वजह से यह विवाद इतना गहरा गया है। इसे समझने के लिए नीचे दी गई टेबल देखें: बेंच (जज) मामला मुख्य टिप्पणी जस्टिस बीवी नागरत्ना और उज्ज्वल भुइयां सैयद इफ्तिखार अंद्राबी केस (मई 2026) ट्रायल में लंबी देरी और जेल में लंबा समय बिताना जमानत का मजबूत आधार है। 'जेल अपवाद है, बेल नियम है' का सिद्धांत यहां भी लागू होता है। जस्टिस अरविंद कुमार और पीबी वराले दिल्ली दंगा केस / उमर खालिद (जनवरी 2026) केवल लंबी कैद को जमानत का 'गणितीय फॉर्मूला' नहीं बनाया जा सकता। आरोपी की भूमिका और अपराध की गंभीरता देखना अनिवार्य है। अब 'बड़ी बेंच' करेगी इस विवाद का फैसला  इस मतभेद को हमेशा के लिए सुलझाने के लिए जस्टिस अरविंद कुमार और पीबी वराले की बेंच ने 22 मई 2026 को इस मामले को सुप्रीम कोर्ट की एक 'बड़ी बेंच' के पास भेज दिया है। अब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) इस कानूनी सवाल के लिए एक नई बेंच का गठन करेंगे। हालांकि, इस बीच कोर्ट ने 2020 दिल्ली दंगों के दो अन्य आरोपियों (तस्लीम अहमद और खालिद सैफी) को मामले के निपटारे तक 6 महीने की अंतरिम जमानत दे दी है।  UAPA मामलों की टाइमलाइन इस कानूनी विवाद की जड़ें पिछले कुछ सालों के बड़े फैसलों से जुड़ी हैं। 2021 (केए नजीब केस): सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की बेंच ने ऐतिहासिक फैसला दिया था। इसमें माना गया कि अगर ट्रायल में बहुत ज्यादा देरी हो रही है, तो मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 21) के तहत UAPA में भी जमानत दी जा सकती है। जनवरी 2026: दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका इसी आधार पर खारिज हुई कि उनका अपराध गंभीर था और केवल समय बीतने पर जमानत नहीं मिल सकती। मई 2026 (अंद्राबी केस): दूसरी बेंच ने कहा कि ट्रायल में देरी होने पर जमानत मिलनी ही चाहिए, जिससे यह मौजूदा विरोधाभास पैदा हुआ। 22 मई 2026: सुप्रीम कोर्ट ने जमानत के इस अहम मामले को अंतिम और स्पष्ट फैसले के लिए 'लार्जर बेंच' के पास रेफर कर दिया।  

टोल पर नहीं लगेगी लंबी लाइन! NHAI ने फरीदाबाद-बदरपुर को बैरियर फ्री बनाने की तैयारी शुरू की

फरीदाबाद दिल्ली-आगरा हाईवे पर फरीदाबाद बॉर्डर स्थित बदरपुर टोल टैक्स प्लाजा अगले छह महीनों में बैरियर फ्री होने जा रहा है। एनएचएआई (नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया) ने इसके लिए पूरी तैयारी शुरू कर दी है। इस बदलाव के बाद वाहनों को बिना रुके ही टोल टैक्स का भुगतान करना संभव होगा, जिससे ट्रैफिक की गति बढ़ेगी और लंबी लाइनें समाप्त होंगी। कैसे काम करेगा हाईटेक सिस्टम एनएचएआई ने बताया कि बैरियर फ्री व्यवस्था के तहत हाईटेक कैमरे और इलेक्ट्रॉनिक टोल वसूली सिस्टम लगाए जाएंगे। टोल की वसूली इलेक्ट्रॉनिक तरीके से हो जाएगी वाहन जब टोल प्लाजा से गुजरेंगे, तो उनके रजिस्ट्रेशन नंबर को कैमरे द्वारा स्कैन किया जाएगा और टोल की वसूली इलेक्ट्रॉनिक तरीके से हो जाएगी। इसके लिए वाहन मालिकों को डिजिटल टोल पास या ई-टोल वॉलेट का इस्तेमाल करना होगा। इस तकनीक के लागू होने से प्लाजा पर ट्रैफिक जाम की समस्या काफी हद तक कम हो जाएगी। इसके अलावा, यह प्रणाली पारदर्शिता बढ़ाने और नकद लेनदेन से होने वाली परेशानियों को भी समाप्त करने में मदद करेगी। एनएचएआई की तैयारी एनएचएआई अधिकारियों ने बताया कि बैरियर फ्री सिस्टम लगाने के लिए पहले से ही आवश्यक सर्वे और तकनीकी तैयारी शुरू कर दी गई है। छह महीनों में पूरा किया जाएगा     उच्च तकनीक कैमरे, सेंसर और डिजिटल टोल प्रणाली की स्थापना का काम क्रमिक रूप से अगले छह महीनों में पूरा किया जाएगा।     अधिकारी यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि नए सिस्टम की टेस्टिंग पूरी तरह से हो और कोई तकनीकी गड़बड़ी न हो।     सड़क सुरक्षा और सुविधा में सुधार विशेषज्ञों का कहना है कि बैरियर फ्री टोल प्लाजा न केवल यात्रियों की सुविधा बढ़ाएगा, बल्कि सड़क सुरक्षा में भी मदद करेगा।     टोल प्लाजा पर अक्सर लंबी कतारों और अचानक ब्रेकिंग के कारण दुर्घटनाएं होती रही हैं। यात्रियों को होगा ये लाभ बैरियर फ्री प्रणाली से वाहनों की गति नियंत्रित रूप से बनी रहेगी और यह जोखिम कम होगा। यात्रियों के लिए लाभ ट्रक, बस और निजी वाहन चालक लंबे समय से टोल प्लाजा पर जाम और देरी से परेशान थे। बैरियर फ्री व्यवस्था लागू होने के बाद अब उन्हें बिना रुके ही टोल का भुगतान करने की सुविधा मिलेगी। इससे समय की बचत होगी और लॉन्ग-डिस्टेंस ट्रैवल को आसान बनाया जा सकेगा। भविष्य की योजनाएं एनएचएआई ने संकेत दिया है कि इस तरह के बैरियर फ्री टोल सिस्टम को अन्य हाईवे प्लाजा पर भी लागू करने की योजना है। इसका उद्देश्य पूरे देश में डिजिटल और स्मार्ट टोलिंग सिस्टम को बढ़ावा देना है, जिससे राष्ट्रीय राजमार्गों पर यातायात सुगम और सुरक्षित बन सके।  

मध्यप्रदेश की नई ट्रांसफर पॉलिसी जारी, लापरवाह कर्मचारियों पर कार्रवाई; महिलाओं और रिटायरमेंट के करीब कर्मचारियों को राहत

भोपाल  मध्यप्रदेश सरकार ने तबादला नीति-2026 लागू करते हुए प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया है। नई नीति के तहत अब तय लक्ष्य पूरा नहीं करने वाले अधिकारी-कर्मचारियों को निर्धारित समय सीमा से पहले भी हटाया जा सकेगा। सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) ने कैबिनेट की मंजूरी के बाद आदेश जारी कर 1 जून से 15 जून तक तबादलों की प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि सभी ट्रांसफर आदेश केवल ऑनलाइन जारी होंगे। 15 जून के बाद जारी किए गए तबादला आदेश मान्य नहीं माने जाएंगे। नई नीति का असर लाखों सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों पर पड़ेगा। खराब प्रदर्शन पर समय से पहले होगा तबादला नई व्यवस्था में प्रथम और द्वितीय श्रेणी के कार्यपालिक अधिकारियों को एक जिले में तीन साल पूरा होने पर बाहर भेजा जा सकेगा। तृतीय श्रेणी कर्मचारियों पर भी यही नियम लागू होगा।हालांकि सरकार ने साफ किया है कि तीन साल की अवधि अनिवार्य शर्त नहीं होगी। यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी का प्रदर्शन खराब पाया जाता है या वह विभागीय लक्ष्य पूरे नहीं कर पाता है, तो प्रशासनिक आधार पर उसका तबादला पहले भी किया जा सकेगा। महिलाओं और सेवानिवृत्ति के करीब कर्मचारियों को राहत नई तबादला नीति में महिला कर्मचारियों को विशेष राहत दी गई है। अविवाहित, विधवा, तलाकशुदा और परित्यक्ता महिलाओं को गृह जिले में पदस्थ करने का प्रावधान रखा गया है। इसके अलावा जिन कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति में एक वर्ष या उससे कम समय बचा है, उनका सामान्य परिस्थितियों में तबादला नहीं किया जाएगा। पति-पत्नी को एक ही स्थान पर पदस्थ करने के लिए भी आवेदन स्वीकार किए जाएंगे। तीन साल से पहले भी हो सकेगा तबादला नई नीति के तहत प्रथम और द्वितीय श्रेणी के कार्यपालिक अधिकारियों को एक ही जिले में तीन वर्ष पूरे होने पर जिले से बाहर स्थानांतरित किया जा सकेगा। वहीं तृतीय श्रेणी कर्मचारियों का भी एक स्थान पर तीन वर्ष या उससे अधिक समय पूरा होने पर तबादला किया जा सकेगा। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि तीन वर्ष की अवधि तबादले की अनिवार्य शर्त नहीं होगी। यदि कोई अधिकारी या कर्मचारी पिछले वित्तीय वर्ष के निर्धारित लक्ष्य पूरे नहीं कर पाया है तो उसका तबादला तय अवधि से पहले भी किया जा सकेगा। प्रशासनिक आधार पर ऐसे मामलों को प्राथमिकता दी जाएगी। ई-ऑफिस के माध्यम से ही मंत्रियों को देना होगा अनुमोदन तबादले राज्य और जिला स्तर पर होंगे। पति-पत्नी (दंपती) की पदस्थापना एक स्थान पर रखी जाएगी। गंभीर बीमारी से पीड़ित शासकीय सेवकों को भी तबादले में रियायत दी जाएगी। मंत्री व प्रभारी मंत्रियों की अनुशंसा पर तबादले होंगे। मंत्री का अनुमोदन ई-ऑफिस के माध्यम से ही होगा। इतना ही नहीं विभाग अपनी सुविधा के अनुसार सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) के अनुमोदन व मुख्यमंत्री की अनुशंसा से तबादला नीति बना सकेंगे। स्वयं के व्यय वाले तबादलों में दो स्थितियां शामिल नहीं होंगी। इन्हें तबादला नीति से बाहर रखा गया है। पहला कि ऐसे शासकीय सेवक जो अति गंभीर बीमारी जैसे कैंसर, लकवा, हृदयाघात से पीड़ित हैं और मेडिकल बोर्ड की अनुशंसा पर स्थानांतरित किए जाते हैं उनका इस तबादला नीति में समावेश नहीं किया जाएगा। वहीं पति-पत्नी व स्वयं बीमारी से पीड़ित शासकीय सेवक भी तबादला नीति की निर्धारित सीमा से बाहर रखा गया है। तबादला प्रतिबंध अवधि के दौरान केवल विभागीय मंत्री के प्रशासकीय अनुमोदन पर ही तबादले होंगे। न्यायिक और प्रशासनिक सेवाओं पर लागू नहीं होगी नीति पद या संवर्ग की संख्या 200 तक है तो 20 प्रतिशत तबादले ही किए जाएंगे। वहीं 201 से 1000 संख्या तक 15 प्रतिशत, 1001 से 2000 तक 10 प्रतिशत और 2001 से अधिक होने पर पद या संवर्ग में कार्यरत संख्या के आधार पर स्थानांतरण किए जाएंगे। तबादले ई-ऑफिस के माध्यम से होंगे। इनमें स्वैच्छिक तबादले भी होंगे। यह नीति मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा, राज्य प्रशासनिक सेवा, राज्य पुलिस सेवा, राज्य वन सेवा एवं मध्य प्रदेश मंत्रालय पर लागू नहीं होगी। सेवानिवृत्ति के करीब पहुंचे अमले को राहत जिले के भीतर जिला संवर्ग/राज्य संवर्ग के तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों का जिला कलेक्टर द्वारा प्रभारी मंत्री के अनुमोदन से तबादला किया जाएगा। गृह विभाग में उप पुलिस अधीक्षक के कनिष्ठ स्तर के अधिकारियों, कर्मचारियों का स्थानांतरण पुलिस स्थापना बोर्ड द्वारा और जिले के भीतर पुलिस अधीक्षक द्वारा प्रभारी मंत्री के अनुमोदन से होगा। जिले के भीतर डिप्टी कलेक्टर/संयुक्त कलेक्टर अनुभाग परिवर्तन एवं तहसीलदार, नायब तहसीलदार की पदस्थापना प्रभारी मंत्री के परामर्श से की जाएगी। जिन अधिकारियों/कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति में एक वर्ष या उससे कम समय शेष हो, सामान्यतः उनका स्थानांतरण नहीं किया जाएगा। श्रृंखलाबद्ध तबादलों पर रोक सरकार ने विभागों को निर्देश दिए हैं कि केवल अवधि पूरी होने के आधार पर तबादले न किए जाएं। न्यायालयीन आदेश, गंभीर शिकायत, पदोन्नति, प्रतिनियुक्ति से वापसी और रिक्त पदों की आवश्यकता जैसे मामलों में ही तबादला प्रक्रिया अपनाई जाएगी।साथ ही रिक्त पदों को भरने के नाम पर एक के बाद एक किए जाने वाले श्रृंखलाबद्ध तबादलों पर भी रोक लगा दी गई है। पुलिस विभाग में अलग व्यवस्था लागू पुलिस विभाग में उप पुलिस अधीक्षक से नीचे के अधिकारियों और कर्मचारियों की पदस्थापना का निर्णय पुलिस स्थापना बोर्ड करेगा। जिले के भीतर पदस्थापना पुलिस अधीक्षक प्रभारी मंत्री की मंजूरी के बाद करेंगे।वहीं उप पुलिस अधीक्षक और उससे वरिष्ठ अधिकारियों के तबादले विभागीय मंत्री और मुख्यमंत्री की मंजूरी के बाद किए जाएंगे। गंभीर बीमारियों और दिव्यांग कर्मचारियों को छूट नई नीति में गंभीर बीमारियों से पीड़ित कर्मचारियों को भी राहत दी गई है। कैंसर, डायलिसिस और ओपन हार्ट सर्जरी जैसी गंभीर बीमारियों के मामलों में मेडिकल बोर्ड की अनुशंसा पर छूट दी जाएगी।इसके अलावा 40 प्रतिशत या उससे अधिक दिव्यांग कर्मचारियों का सामान्य परिस्थितियों में तबादला नहीं किया जाएगा। ऑनलाइन ट्रांसफर सिस्टम से बढ़ेगी पारदर्शिता सरकार ने सभी स्थानांतरण आदेश ऑनलाइन जारी करना अनिवार्य किया है। आदेश में कर्मचारी का एम्पलाई कोड दर्ज करना जरूरी होगा।तबादले के बाद पुराने स्थान से वेतन निकाले जाने पर इसे वित्तीय अनियमितता माना जाएगा। वहीं जिन अधिकारियों या कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार, गबन या नैतिक अपराधों की जांच लंबित है, उन्हें कार्यपालिक पदों पर पदस्थ नहीं किया जाएगा। रिक्त पदों के लिए श्रृखलाबंद तबादलों पर रोक सरकार ने विभागों को यह भी निर्देश … Read more

ग्वालियर-नागपुर सिक्सलेन कॉरिडोर से बदलेगी तस्वीर, 9 जिलों को मिलेगा बड़ा फायदा

सागर  ग्वालियर और नागपुर शहरों को सिक्सलेन हाइवे से जोड़ने के लिए नए कारीडोर का सर्वे तेजी से चल रहा है. इस कॉरिडोर को केंद्र सरकार द्वारा सहमति मिलने के बाद सरकार द्वारा फिजिबिलिटी सर्वे कराया जा रहा है. जिसमें ये देखा जाएगा कि इस कॉरिडोर पर कैसा ट्रैफिक रहेगा. फिलहाल ये तय किया गया है कि 40 हजार करोड़ की लागत से 569 किमी लंबा सिक्सलेन हाइवे बनाया जाएगा, जो मध्य प्रदेश के 9 जिलों से गुजरेगा. इन सभी जिलों में सिक्सलेन कॉरिडोर के किनारे इंडस्ट्रियल क्लस्टर की स्थापना की जाएगी, जो इन जिलों के व्यवसाय में पंख लगाएंगे।  भूतल परिवहन मंत्रालय की सहमति के बाद सर्वे कार्य शुरु ग्वालियर से नागपुर की कनेक्टिविटी अभी तक सीधे तौर पर नहीं है. ऐसे में केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय ने ग्वालियर, बैतूल, नागपुर कारीडोर के लिए सहमति दे दी है. फिलहाल जो प्रस्ताव है, उसके तहत 40 हजार करोड़ की लागत से 569 किमी लंबा सिक्स लेन कॉरिडोर बनाया जाएगा. ये कॉरिडोर ग्वालियर, मुरैना, शिवपुरी, अशोकनगर, विदिशा, भोपाल, रायसेन, नर्मदापुरम और बैतूल से होते हुए नागपुर तक जाएगा. ग्वालियर से शुरू होकर यह मार्ग नागपुर तक पहुंचेगा।  फिजिबिलिटी सर्वे और डीपीआर की तैयारी फिलहाल इस कारीडोर के लिए NHAI (National Highways Authority of India) द्वारा फिजिबिलिटी सर्वे किया जा रहा है. जिसका उद्देश्य ये है कि इस कॉरिडोर पर ट्रैफिक की स्थिति क्या होगी और क्या लाभ होगा. इसी आधार पर जल्द ही कॉरिडोर के अलाइनमेंट और डीपीआर को अंतिम रुप दिया जाएगा. फिलहाल इस बात पर भी मंथन चल रहा है कि इसे ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस वे की तरह बनाया जाए. ये अभी जो सड़क हैं, उसी का चौड़ीकरण सिक्सलेन के रूप में किया जाए।  ब्लैक स्पाॅट खत्म करने का होगा काम प्रस्तावित ग्वालियर बैतूल नागपुर कॉरिडोर के निर्माण की शुरूआत से ही यातायात सुरक्षा को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जा रही है. एनएचएआई कॉरिडोर के सिवनी जिले से गुजरने वाले हिस्से में लखनादौन और खवासा के बीच ब्लैक स्पॉट खत्म करने के लिए काम कर रहा है. इन ब्लैक स्पाॅट पर अंडरपास, ओवरब्रिज और पुलों का निर्माण किया जाएगा. अंडरपास के जरिए लोकल ट्रैफिक को अलग से रास्ता दिया जाएगा।  सफर में 6-7 घंटे कम लगेगा वक्त इस कॉरिडोर के बनने से ग्वालियर और नागपुर के बीच यात्रा में लगने वाला समय काफी कम हो जाएगा. फिलहाल ग्वालियर से नागपुर जाने में 22 से 24 घंटे लगते हैं. सिक्सलेन कारीडोर के बाद ये वक्त महज 16 से 18 घंटे रह जाएगा. इसके साथ ही सफर सुरक्षित हो जाएगा।  हर जिले में इंडस्ट्रियल क्लस्टर से व्यवसाय को लगेगे पंख पीडब्ल्यूडी मंत्री राकेश सिंह का कहना है कि, ''ये कॉरिडोर मध्य प्रदेश के जिन 9 जिलों से गुजर रहा है, वहां कॉरिडोर के किनारे इंडस्ट्रियल क्लस्टर बनाए जाएंगे. जिनका उद्देश्य लाजिस्टिक हब तैयार करना है. इस कॉरिडोर से पर्यटन व्यावसाय को पंख लगने के अलावा, खनिज, फल, अनाज, दवाईयां और प्लास्टिक व्यावसाय को पंख लगेगे. उद्यमियों की लागत और सफर में लगने वाला समय कम होगा. इस हाइवे की ग्वालियर-आगरा हाइवे और नागपुर पुणे मुंबई हाइवे से कनेक्टिविटी आसान हो  जाएगी। 

ज्योति बसु और ममता सरकार में नहीं हुआ जो, क्या अब सुवेंदु अधिकारी करेंगे बड़ा फैसला?

कोलकाता  पश्चिम बंगाल की राजनीति बदलते ही अब उन मुद्दों पर भी तेजी दिखने लगी है, जो दशकों तक फाइलों और विवादों में दबे रहे. कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस इंटरनेशनल एयरपोर्ट के भीतर मौजूद 136 साल पुरानी गौरीपुर जामे मस्जिद को लेकर फिर से हलचल तेज हो गई है. यह वही मस्जिद है, जिसे लेकर पिछले करीब 30 साल से केंद्र सरकार और एयरपोर्ट अथॉरिटी लगातार चिंता जताती रही थी. लेकिन हर बार मामला धार्मिक संवेदनशीलता और राजनीतिक टकराव के कारण आगे नहीं बढ़ पाया. अब बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद तस्वीर बदलती दिख रही है. सूत्रों के मुताबिक नई सरकार और केंद्र के बीच तालमेल बढ़ने के बाद मस्जिद को एयरपोर्ट परिसर से बाहर शिफ्ट करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है. यही वजह है कि प्रशासन, एयरपोर्ट अथॉरिटी और जिला अधिकारियों की लगातार बैठकें हो रही हैं. सवाल सिर्फ एक इमारत का नहीं है, बल्कि एयरपोर्ट सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय एविएशन नियमों और बंगाल की नई राजनीतिक दिशा का भी बन चुका है।  दिलचस्प बात यह है कि यह मस्जिद एयरपोर्ट बनने से भी पहले की बताई जाती है. स्थानीय लोग इसे बांकड़ा मस्जिद के नाम से जानते हैं. मस्जिद रनवे के बेहद करीब मौजूद है और इसी कारण एयरपोर्ट संचालन में लंबे समय से दिक्कतें आ रही हैं. एविएशन अधिकारियों का दावा है कि मस्जिद की वजह से सेकेंडरी रनवे का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा. बड़े इंटरनेशनल विमानों की लैंडिंग और आधुनिक ILS सिस्टम लगाने में भी रुकावट बनी हुई है. यही कारण है कि एयरपोर्ट अथॉरिटी लंबे समय से इसे दूसरी जगह शिफ्ट करने का प्रस्ताव देती रही. अब सूत्र बता रहे हैं कि ईद-उल-अजहा के बाद इस मुद्दे पर बड़ा फैसला हो सकता है. हालांकि प्रशासन फिलहाल इसे पूरी तरह आपसी सहमति और शांति के साथ हल करने की रणनीति पर काम कर रहा है. मस्जिद कमेटी से भी कई दौर की बातचीत हो चुकी है और अगले हफ्ते फिर अहम बैठक होने की संभावना है।  एयरपोर्ट सुरक्षा बनाम धार्मिक ढांचा, अब तेज हुई हलचल     कोलकाता एयरपोर्ट के भीतर मौजूद यह मस्जिद सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एयर ट्रैफिक ऑपरेशन के लिए भी बड़ी चुनौती मानी जा रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक यह ढांचा एयरपोर्ट की बाउंड्री वॉल से करीब 150 मीटर अंदर और सेकेंडरी रनवे से सिर्फ 165 मीटर की दूरी पर मौजूद है. अंतरराष्ट्रीय एविएशन नियमों के अनुसार सक्रिय रनवे के 240 मीटर के दायरे में कोई स्थायी निर्माण नहीं होना चाहिए. इसी वजह से एयरपोर्ट अधिकारियों को रनवे के टचडाउन पॉइंट को 88 मीटर पीछे शिफ्ट करना पड़ा था।      हालांकि मौजूदा रनवे छोटे और मीडियम साइज के विमानों के लिए पर्याप्त है, लेकिन बोइंग 787 और एयरबस A330 जैसे बड़े विमानों के संचालन में परेशानी आती है. एयरपोर्ट सूत्रों का कहना है कि अगर यह बाधा हटती है तो कोलकाता एयरपोर्ट की इंटरनेशनल क्षमता और बढ़ सकती है. यही नहीं, कोहरे के दौरान इस्तेमाल होने वाला एडवांस ILS सिस्टम भी इस क्षेत्र में पूरी तरह इंस्टॉल नहीं हो पाया है. इससे सर्दियों में फ्लाइट ऑपरेशन प्रभावित होते हैं।  30 साल तक क्यों अटका रहा मामला?     एयरपोर्ट अथॉरिटी ने पहली बार इस मस्जिद को शिफ्ट करने का प्रस्ताव करीब तीन दशक पहले दिया था. उस दौरान ज्योति बसु सरकार थी. इसके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य और फिर ममता बनर्जी सरकार के समय भी यह मुद्दा उठा, लेकिन हर बार राजनीतिक और धार्मिक संवेदनशीलता के कारण मामला आगे नहीं बढ़ पाया. प्रशासन को डर था कि किसी भी जल्दबाजी से तनाव पैदा हो सकता है।      अब सत्ता परिवर्तन के बाद माहौल बदला हुआ दिखाई दे रहा है. नई सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात कर रही है. मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी पहले भी सार्वजनिक रूप से एयरपोर्ट सुरक्षा और ऑपरेशनल दिक्कतों का मुद्दा उठा चुके हैं. सूत्रों का दावा है कि केंद्र और राज्य के बीच समन्वय बढ़ने के बाद अब इस प्रोजेक्ट को गंभीरता से आगे बढ़ाया जा रहा है।  मस्जिद कमेटी ने क्या कहा? सूत्रों के मुताबिक मस्जिद कमेटी ने भी बातचीत में सहयोग का संकेत दिया है. कमेटी का कहना है कि वे एयरपोर्ट के विकास और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के खिलाफ नहीं हैं. लेकिन वे चाहते हैं कि पूरी प्रक्रिया सम्मानजनक और सहमति के साथ हो. कमेटी ने यह भी मांग रखी है कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे संगठनों से भी राय ली जाए।  फिलहाल प्रशासन वैकल्पिक जमीन और नई मस्जिद के ब्लूप्रिंट पर काम कर रहा है. बताया जा रहा है कि नई जगह पहले से ज्यादा बड़ी और सुविधाजनक हो सकती है. अधिकारियों की कोशिश है कि ईद के बाद इस मुद्दे पर सहमति का अंतिम फार्मूला तैयार कर लिया जाए।  हाई सिक्योरिटी के बीच होती है नमाज मौजूदा समय में इस मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए बेहद कड़ी सुरक्षा व्यवस्था अपनाई जाती है. नमाजियों को CISF की जांच से गुजरना पड़ता है. इसके बाद उन्हें एयरपोर्ट के हाई सिक्योरिटी जोन के भीतर बस से मस्जिद तक ले जाया जाता है. रोजाना 10 से 25 लोग यहां नमाज पढ़ने आते हैं, जबकि शुक्रवार को यह संख्या 80 तक पहुंच जाती है।  सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि एयरसाइड के भीतर किसी भी सिविलियन मूवमेंट से ऑपरेशन पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है. यही कारण है कि लंबे समय से इसे सुरक्षा जोखिम भी माना जाता रहा है. एयरपोर्ट प्रशासन चाहता है कि भविष्य में ऐसी स्थिति पूरी तरह खत्म हो और रनवे क्षेत्र पूरी तरह प्रतिबंधित जोन बना रहे।  क्या बंगाल में अब बदल रही है राजनीति की दिशा? राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह सिर्फ एयरपोर्ट या मस्जिद का मुद्दा नहीं है. यह बंगाल की नई राजनीतिक कार्यशैली का संकेत भी माना जा रहा है. भाजपा लंबे समय से इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा के मुद्दों को प्राथमिकता देने की बात करती रही है. अब जब राज्य और केंद्र की सोच एक दिशा में दिखाई दे रही है, तो कई पुराने विवादित प्रोजेक्ट्स भी तेजी पकड़ सकते हैं।  हालांकि विपक्ष इस पूरे मामले को राजनीतिक नजरिए से भी देख रहा है. उनका कहना है कि धार्मिक मामलों में सरकार … Read more