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फलता ने बढ़ाई ममता की टेंशन! TMC के लिए भवानीपुर से ज्यादा बड़ा झटका क्यों माना जा रहा नतीजा

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में फलता विधानसभा सीट पर हुए पुनर्मतदान के नतीजों ने पूरे राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार देबांशू पांडा ने इस सीट पर 1.09 लाख से भी ज्यादा वोटों के बड़े अंतर से जीत हासिल की है. यह जीत सिर्फ भाजपा की मजबूती को नहीं दिखाती, बल्कि 15 साल सत्ता में बैठी रही तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए एक ऐसा बड़ा झटका है जिसने पार्टी के भीतर एक गंभीर संकट का इशारा कर दिया है. जहां टीएमसी प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई. ये प्रत्याशी कोई और नहीं, टीएमसी संगठन में सबसे पावरफुल अभिषेक बनर्जी के राइट हैंड मैन कहे जाने वाले जहांगीर खान थे. जिन्होंने आखिरी वक्त मुकाबले से खुद को अलग कर लिया, और अपना वोट भी नहीं डाला।  ऐसे में यह सवाल तो बनता है कि टीएमसी के लिए ममता बनर्जी की सीट भवानीपुर की हार ज्यादा गंभीर थी, या फलता का नतीजा? भवानीपुर में होने वाले किसी भी राजनैतिक उतार-चढ़ाव को लोग अक्सर ममता बनर्जी के पर्सनल जादू और शहर के वोटर्स के मिजाज से जोड़कर देखते हैं, जहां हार-जीत का अंतर कभी-कभी पार्टी की ढिलाई की वजह से बदल सकता है. लेकिन फलता की हार तृणमूल कांग्रेस की उस 'ग्रासरूट मशीनरी' यानी जमीनी संगठन की नाकामी को सामने लाती है, जिसके दम पर पार्टी पिछले कई सालों से बंगाल पर राज कर रही है. यह हार इसलिए भी ज्यादा चुभने वाली है क्योंकि फलता सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस के 'नंबर दो' और ममता के उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी के लोकसभा क्षेत्र 'डायमंड हार्बर' का एक मुख्य हिस्सा है।  इस क्षेत्र के पुराने इतिहास को देखें तो दक्षिण 24 परगना जिला हमेशा से टीएमसी का सबसे मजबूत और अभेद्य गढ़ रहा है. इस जिले ने हमेशा तृणमूल कांग्रेस का बढ़-चढ़कर साथ दिया है. साल 2024 के लोकसभा चुनावों में, जब अभिषेक बनर्जी ने डायमंड हार्बर सीट से रिकॉर्ड अंतर से जीत हासिल की थी, तब इसी फलता विधानसभा क्षेत्र ने उन्हें अकेले 1.68 लाख वोटों की बड़ी लीड दी थी. उस चुनाव में अभिषेक बनर्जी का वोट शेयर फलता में लगभग 89% था, यानी  एकतरफा मुकाबला. लेकिन, सिर्फ दो साल के भीतर तृणमूल कांग्रेस का वोट शेयर गिरकर सिर्फ 3.7% पर आ जाना और पार्टी उम्मीदवार का चौथे नंबर पर खिसककर अपनी जमानत तक गंवा देना, किसी भी राजनैतिक पार्टी के लिए बहुत बड़ी नाकामी है. फलता सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं है, बल्कि यह वह इंडस्ट्रियल और ग्रामीण इलाका है जहां टीएमसी का बूथ मैनेजमेंट सबसे अचूक माना जाता था. इस सीट पर मिली करारी हार यह साफ करती है कि पार्टी का वह जमीनी ढांचा, जो कभी हर वोटर के घर तक पकड़ रखता था, अब पूरी तरह से बिखर चुका है।  अभिषेक का 'डायमंड हार्बर मॉडल' ध्वस्त यह हार सीधे तौर पर टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की राजनैतिक साख और उनकी लीडरशिप पर बड़ा सवालिया निशान लगाती है. अभिषेक बनर्जी लगातार खुद को पार्टी के मॉडर्नाइजेशन और पार्टी ऑर्गेनाइजेशन में खुद को नए के लीडर के रूप में पेश करते रहे हैं. उन्होंने बार-बार 'डायमंड हार्बर मॉडल' की तारीफ की है. एक ऐसा मॉडल जिसे वे अच्छे गवर्नेंस, तुरंत एक्शन और अचूक चुनावी रणनीति का प्रतीक बताते थे. चुनाव प्रचार के आखिरी दिनों में, 2 मई को अभिषेक बनर्जी ने केंद्रीय नेतृत्व और भाजपा को खुली चुनौती देते हुए कहा था कि भाजपा को उनके डायमंड हार्बर मॉडल में एक मामूली खरोंच लगाने के लिए भी 10 जन्म लेने होंगे, और अगर हिम्मत है तो दिल्ली से अपने नेताओं को बुलाकर फलता में मुकाबला करके दिखाएं. इस तरह की आक्रामक चुनौती के बाद जब नतीजे पूरी तरह उल्टे आते हैं, तो राजनैतिक नुकसान सिर्फ एक सीट का नहीं होता, बल्कि नेता की साख पूरी तरह प्रभावित हो जाती है।  शुभेंदु अधिकारी ने इस नतीजे के तुरंत बाद तंज कसते हुए कहा कि कुख्यात 'डायमंड हार्बर' मॉडल अब तृणमूल के 'हार-बार' मॉडल में बदल चुका है. फलता की हार ने यह साबित कर दिया है कि केंद्रीय सुरक्षा बलों की 35 कंपनियों की तैनाती और कड़े इलेक्शन मैनेजमेंट के बीच, जब सरकारी मशीनरी का अनुकूल सहयोग मुमकिन नहीं हो पाता, तब संगठन की असली परीक्षा होती है. यह नतीजा अभिषेक बनर्जी के उस दावे को कमजोर करता है कि उनका संगठन बिना किसी अतिरिक्त मदद के भी अजेय है।  अंतर्कलह का अंत नहीं इसके साथ ही, फलता के नतीजे टीएमसी के भीतर पिछले काफी समय से चल रहे 'पुराने वफादार बनाम नए कॉर्पोरेट-शैली के रणनीतिकार' के अंदरूनी संघर्ष को और ज्यादा तेज करेंगे. ममता बनर्जी की राजनीति हमेशा से संघर्ष करने, सड़क पर उतरकर आंदोलन करने और जमीनी स्तर के पुराने नेताओं को साथ लेकर चलने पर टिकी रही है. इसके उलट, अभिषेक बनर्जी पर उन्हीं की पार्टी के लोग आरोप लगा रहे हैं कि उनका मॉडल कॉर्पोरेट इलेक्शन मैनेजमेंट, डेटा एनालिटिक्स और पारंपरिक नेताओं को दरकिनार कर नए चेहरों को आगे बढ़ाने की वकालत करता है. फलता की इस ऐतिहासिक पराजय से पार्टी के भीतर ममता बनर्जी के पुराने खेमे को अभिषेक के खिलाफ मुंह खोलने का एक और मौका मिल गया है. पार्टी के भीतर यह आवाजें उठने लगी हैं कि संगठन के फैसलों से पुराने और जमीनी नेताओं को साइडलाइन करने का नतीजा ही फलता में देखने को मिला है।  ममता की चुनौती अभिषेक को बचाना चुनाव प्रचार के आखिरी चरण में टीएमसी उम्मीदवार का अचानक पीछे हटने की घोषणा करना यह इशारा करता है कि लोकल लीडरशिप और शीर्ष नेतृत्व के रणनीतिकारों के बीच गहरा अविश्वास था. ममता बनर्जी के लिए यह स्थिति बेहद पेचीदा है. एक तरफ उन्हें अपने घोषित उत्तराधिकारी की साख को बचाना है, तो दूसरी तरफ पार्टी के बिखरते जा रहे कार्यकर्ताओं और पुराने नेताओं की नाराजगी को दूर करना है. भवानीपुर की जीत या हार ममता के अपने कंट्रोल में होती है, लेकिन फलता का बिखरना यह दिखाता है कि पार्टी पर उनकी पकड़ के बावजूद ऑर्गेनाइजेशन पर कंट्रोल कमजोर हो रहा है।  इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पहलू मतगणना के दिन तृणमूल की गैरमौजूदगी रही. टीएमसी जैसी मजबूत पार्टी का मतगणना केंद्रों पर अपने काउंटिंग एजेंट तक तैनात न … Read more

2027 मिशन के लिए BJP-RSS की सियासी कवायद तेज, भागवत का दौरा क्यों अहम?

लखनऊ  उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव की सियासी तपिश के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत रविवार की शाम तीन दिवसीय दौरे पर लखनऊ पहुंचे. संघ प्रमुख आरएसएस भले ही पूर्वी क्षेत्र के प्रशिक्षण वर्ग में शामिल होने के लिए आए हों, लेकिन विधानसभा चुनाव से पहले उनके इस दौरे के सियासी मायने निकाले जा रहे हैं।  मोहन भागवत के तीन के लखनऊ प्रवास को विशुद्ध रूप से आरएसएस के कार्यक्रम से जुड़ा बताया जा रहा है. प्रशिक्षण वर्ग में बौद्धिक निर्देशन के साथ ही संघ के शताब्दी वर्ष और विभिन्न अभियानों की समीक्षा करेंगे, लेकिन संघ प्रमुख की इस यात्रा ने प्रदेश की सियासी सरगर्मी को बढ़ा दी है।  उत्तर प्रदेश को देश की 'सत्ता का प्रवेश द्वार' कहा जाता है. यूपी की सियासत में आरएसएस की भूमिका हमेशा से एक 'साइलेंट किंगमेकर' और 'ग्राउंड इंजीनियर' की रही है. भले ही संघ खुद को एक सांस्कृतिक संगठन कहता है, लेकिन बीजेपी के लिए जनसंघ के दौर से ही सियासी रण में वो मददगार बनता रहा है. 2017 और 2022 में बीजेपी को मिली जीत में संघ का रोल काफी अहम रहा है. ऐसे में 2027 से पहले मोहन भागवत एक बार फिर से यूपी पहुंचे हैं।  लखनऊ के दौरे पर मोहन भागवत संघ प्रमुख मोहन भागवत तीन दिन के लखनऊ दौरे पर हैं और निराला नगर स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में ठहरे हैं. वो मंगलवार तक लखनऊ में रहेंगे. लखनऊ में संघ का अवध, गोरक्ष, काशी और कानपुर प्रांत के स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण वर्ग चल रहा है. इस दौरान मोहन भागवत  प्रशिक्षण वर्ग में बौद्धिक निर्देशन के साथ ही संघ के शताब्दी वर्ष और विभिन्न अभियानों की समीक्षा करेंगे।  मोहन भागवत पूर्वी क्षेत्र के पदाधिकारियों के साथ बैठकों में वह शताब्दी वर्ष के तहत चल रहे गृह संपर्क अभियान, हिंदू सम्मेलनों सहित विभिन्न अभियानों के अलावा शाखा विस्तार पर चर्चा करेंगे और आगे के अभियानों और कार्यक्रमों को लेकर निर्देश देंगे. हालांकि संघ प्रमुख अपने प्रवास के दौरान किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगे, लेकिन आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ बीजेपी के प्रमुख पदाधिकारियों, सरकार के प्रतिनिधियों और संघ के प्रशिक्षण वर्ग में शामिल हो सकते हैं।  सीएम से डिप्टीसीएम से होगी मुलाकात? संघ प्रमुख मोहन भागवत से  लखनऊ प्रवास के दौरान सरकार और बीजेपी नेता मुलाकात करने से भी पहुंच सकते हैं. सीएम योगी आदित्यनाथ से लेकर डिप्टीसीएम केशव प्रसाद मौर्य और बृजेश पाठक सहित यूपी सरकार के कई बड़े मंत्री मुलाकात कर सकते हैं. इसके अलावा बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष पकंज चौधरी भी दिल्ली से लखनऊ पहुंच गए हैं. सरकार और बीजेपी संगठन के तमाम अहम लोग  संघ प्रमुख से मिलने के लिए निराला नगर जा सकते हैं।  उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव है. ऐसे में सरकार के कामकाज और 2027 विधानसभा चुनाव तैयारियों को लेकर भी चर्चा हो सकती है. ऐसे में वह प्रदेश के राजनीतिक हालात की भी जानकारी ले सकते हैं और जमीनी हकीकत को समझने की कोशिश करेंगे. इससे पहले भी देखा गया है कि संघ प्रमुख लखनऊ पहुंचे हैं तो सरकार से लेकर संगठन तक के लोग उनसे मिलने पहुंचते रहे हैं।  ट्रिपल एस मॉडल' से सत्ता की हैट्रिक यूपी में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिहाज से संघ प्रमुख मोहन भागवत प्रचारकों और प्रमुख पदाधिकारियों से प्रदेश की समाजिक और राजनीतिक स्थितियों के संबंध में भी फीडबैक लेंगे. बीजेपी संगठन और सरकार के प्रमुख पदाधिकारियों से मुलाकात में संगठन और सरकार के बीच समन्वय के मुद्दों पर भी बात हो सकती है. इसे ट्रिपल एस मॉडल के रूप में देखा जाता है. यह मॉडल पूरी तरह सरकार, संगठन और संघ के तीन स्तंभों पर आधारित माना जाता है।  संघ विचारधारा और अनुशासित कैडर नेटवर्क देता है. बीजेपी का संगठन चुनावी लामबंदी और राजनीतिक रणनीति संभालता है. जबकि सरकार अपने कामकाज और योजनाओं के आधार पर जनता के बीच संदेश पहुंचाती है. ये तीनों जब एक ही दिशा में काम करते हैं तो बीजेपी की चुनावी मशीनरी काफी प्रभावी मानी जाती है.  2014 के बाद बीजेपी की चुनावी जीत में इस मॉडल की भूमिका को लेकर चर्चा होती रही है।  2027 की चुनावी जंग जीतने का प्लान 2027 चुनाव से पहले फिर के एक बार ट्रिपल एस के बीच तालमेल बैठकर सत्ता की हैट्रिक लगाने का प्लान है. इसीलिए होली के बाद से यूपी के अलग-अलग क्षेत्रों में संघ और बीजेपी के बीच समन्वय बैठकों की एक पूरी श्रृंखला चली. इन बैठकों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और पार्टी के प्रदेश महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह हिस्सा लिए थे, जबकि संघ के क्षेत्रीय और प्रांत स्तर के प्रचारक भी बैठक में शिरकत करते थे।  राजनीतिक विश्लेषक इन बैठकों को सिर्फ नियमित संगठनात्मक संवाद नहीं मानते, बल्कि 2027 के चुनावों से पहले बीजेपी की चुनावी रणनीति का शुरुआती खाका खींचने की कवायद बताते हैं. हालांकि, यह है कि बीजेपी और संघ के बीच इस तरह की समन्वय बैठकें नई नहीं हैं.  2019 के लोकसभा चुनाव से एक साल पहले भी इसी तरह का संवाद अभियान चलाया गया था. इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले जमीन पर सियासी माहौल बनाने के लिए यह रणनीति अपनाई गई थी. संघ और बीजेपी के सियासी तालेमल से ही चुनावी जंग जीतने में सफल रही है।  यूपी संघ-BJP की सियासी प्रयोगशाला उत्तर प्रदेश संघ की सियासी प्रयोगशाला रही है. 1984 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी पूरे देश में महज 2 सीटों पर सिमट गई थी. इसके बाद संघ के तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहब देवरस की रणनीति के तहत संघ परिवार (विशेषकर विश्व हिंदू परिषद) ने राम मंदिर आंदोलन की कमान संभाली. संघ ने इस आंदोलन के जरिए उत्तर प्रदेश के बिखरे हुए हिंदू समाज को एक वैचारिक सूत्र में पिरोया।  संघ के कार्यकर्ता 'शिला पूजन' और गांवों में 'राम ज्योति' यात्राओं के जरिए घर-घर दस्तक दी. इस वैचारिक जमीन का राजनीतिक फायदा बीजेपी को मिला, लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा और कल्याण सिंह के उभार के साथ 1991 में पहली बार हबयूपी में सरकार बनी. 2002 से 2012 के बीच यूपी में भाजपा लगातार कमजोर हो रही थी और तीसरे-चौथे नंबर की पार्टी बन चुकी थी। इसके बाद 2014 के … Read more

पंजाब में वोटिंग का दिन! निकाय चुनाव के लिए सुरक्षा कड़ी, बूथों पर CCTV से निगरानी

चंडीगढ़  पंजाब में नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों के लिए आज  यानि मंगलवार को मतदान हो रहा । राज्य की 8 नगर निगमों, 75 नगर परिषदों और 21 नगर पंचायतों के लिए आज  वोट डाले जा रहे , जबकि चुनावी नतीजों की घोषणा 29 मई को होगी।  वहीं, इस बार बैलेट पेपर के माध्यम से वोटिंग होगी। 3977 बूथ हैं। 36 हजार मुलाजिम चुनावी प्रक्रिया में शामिल हैं। 35500 पुलिस मुलाजिम व होमगार्ड जवान तैनात किए गए हैं। जबकि, हर बूथ पर 5 मुलाजिम तैनात रहेंगे। आईएएस व पीसीएस अफसर जिलों में तैनात किए गए हैं। 36.72 लाख मतदाता डालेंगे वोट इस बार बठिंडा, अबोहर, बटाला, बरनाला, कपूरथला, मोगा, पठानकोट और मोहाली नगर निगम के चुनाव सभी राजनीतिक दलों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बने हुए हैं। विशेष बात यह है कि बरनाला नगर निगम के लिए पहली बार चुनाव करवाए जा रहे हैं। राज्य चुनाव आयोग के मुताबिक इस चुनाव में कुल 36,72,932 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकेंगे। इसमें 18 लाख 990 पुरुष, 7,73,716 महिलाएं और 226 अन्य हैं। आप से सबसे अधिक उम्मीदवार मैदान में बता दें, पंजाब भर के निकाय चुनावों की घोषणा के बाद 10,809 उम्मीदवारों ने शुरुआती नामांकन भरा था। जिसमें से 2393 उम्मीदवारों ने अपना नाम वापस ले लिया था। 79 उम्मीदवारों को निर्विरोध चुन लिया गया है। अब चुनाव के लिए 7555 उम्मीदवार मैदान में हैं। इनमें सबसे अधिक उम्मीदवार सत्तापक्ष आम आदमी पार्टी (आप) के चुनाव लड़ रहे हैं जिनकी संख्या 1801 हैं। दूसरे नंबर पर कांग्रेस के 1550, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के 1316, शिरोमणि अकाली दल के 1251, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के 96, 1528 निर्दलीय और 13 अन्य उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। निकाय चुनाव सभी दलों के लिए अहम हैं, क्योंकि इसे 2027 में विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है। सभी पोलिंग बूथों के अंदर और बाहर सीसीटीवी पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए राज्य के सभी पोलिंग बूथों के अंदर और बाहर सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं और उनकी रिकॉर्डिंग कम से कम एक वर्ष तक सुरक्षित रखी जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी भी स्थिति में संबंधित फुटेज को बिना अनुमति नष्ट नहीं किया जाएगा। जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस दीपक मंचंदा की खंडपीठ ने नगर निकाय चुनावों से जुड़ी विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान ये निर्देश जारी किए। 26 मई को पंजाब में सरकारी छुट्टी का एलान पंजाब सरकार ने स्थानीय निकाय चुनावों के मद्देनजर सुचारू मतदान सुनिश्चित करने के लिए 26 मई को राज्य में सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है। इस दौरान चंडीगढ़ सहित पंजाब सरकार के सभी सरकारी दफ्तर, बोर्ड, कॉर्पोरेशन, शैक्षणिक संस्थान और अन्य सरकारी प्रतिष्ठान इस दिन बंद रहेंगे। इसके अलावा, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने भी अपने सभी अधिकारियों व कर्मचारियों के लिए 26 मई को विशेष आकस्मिक अवकाश की घोषणा की है। 5-6 दिन में ही निपटा प्रचार आगामी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले इन स्थानीय निकाय चुनावों को शहरी मतदाताओं के राजनीतिक मिजाज का लिटमस टेस्ट माना जा रहा है। बता दें, पंजाब राज्य चुनाव आयोग ने 11 मई को इन चुनावों का एलान किया था। 19 मई को नामांकन वापस लेने की प्रक्रिया के बाद उम्मीदवारों को प्रचार के लिए केवल 5-6 दिनों का ही समय मिल सका। जिसमें उम्मीदवारों ही नहीं, राजनीतिक पार्टियों के धुरंधरों नें इसमें पूरी ताकत झोंक दी। विधायकों मंत्रियों की परफॉर्मेंस का रिपोर्ट कार्ड होंगे नतीजे बता दें, सत्तारूढ़ 'आप' के विधायकों और मंत्रियों ने आज प्रचार में अपनी पूरी ताकत लगा दी, क्योंकि इन चुनावों के नतीजे उनकी परफॉर्मेंस का रिपोर्ट कार्ड तय करेंगे। इसके साथ ही, इन चुनावों से भाजपा का ग्राफ भी साफ हो जाएगा, जो इस बार काफी आक्रामक तरीके से चुनावी मैदान में उतरी है। राज्य चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार, पोलिंग स्टेशनों के आसपास किसी भी तरह की प्रचार सामग्री प्रदर्शित करने पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। अकाली दल ने की मतदान का समय बढ़ाने की मांग शिरोमणि अकाली दल ने राज्य चुनाव आयोग से मतदान का समय बढ़ाने की मांग की है। अकाली नेता डॉ. दलजीत सिंह चीमा ने कहा कि मतदान का समय सुबह 8 से 5 बजे की जगह सुबह 7 से शाम 6 बजे तक बढ़ाया जाना चाहिए। चीमा ने कहा कि प्रदेश में इस समय भीषण गर्मी का प्रकोप है जिसका असर मतदान प्रतिशत पर पड़ सकता है। अगर सुबह और शाम के चलते मतदान का समय दो घंटे बढ़ा दिया जाए तो उससे मतदान प्रतिशत में वृद्धि होगी। मौजूदा समय मजदूरों के लिए भी उपयुक्त नहीं है क्योंकि वो काम के कारण अपने मताधिकार का उपयोग नहीं कर पाएंगे।  

Horoscope Today 26 May: मेष से मीन तक पढ़ें आज का राशिफल और शुभ संकेत

मेष पिछले कुछ समय से आप जिस प्रोजेक्ट के लिए दिन-रात एक कर रहे थे, उसका क्रेडिट आखिरकार आपको मिलने वाला है। कानूनी या जमीन-जायदाद से जुड़े मामलों का फैसला आपके पक्ष में आ सकता है। कंस्ट्रक्शन के काम से जुड़े लोगों को अच्छा मुनाफा होगा। धन की बचत करने में आप सफल रहेंगे। सभी सदस्यों के बीच तालमेल बेहतर रहेगा। वृषभ वृषभ राशि वालों के जीवन में आज के दिन बड़े और पॉजिटिव बदलाव देखने को मिलेंगे। आलस्य छोड़कर एक्शन मोड में आने का समय है। टीम वर्क से किए गए कामों में आपको बड़ी सफलता मिलेगी। अगर आप अपनी नौकरी बदलना चाहते हैं, तो इंटरव्यू कॉल्स आने की पूरी संभावना है। मिथुन लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट के लिए योजना बनाने का यह सही समय है। घर के माहौल में सुधार होगा। पीठ या जोड़ों के दर्द से थोड़ी परेशानी हो सकती है। शेयर मार्केट में बड़ा रिस्क लेने से पूरी तरह बचें। पैसों का लेनदेन करते समय लिखा-पढ़ी जरूर करें, नहीं तो धोखा हो सकता है। कर्क कर्क राशि वालों के लिए समय थोड़ा संभलकर चलने का है। ग्रहों का इशारा है कि इस समय आपको अपनी योजनाओं को पूरी तरह गुप्त रखना चाहिए, जब तक कि वे पूरी न हो जाएं। ऑफिस में कुछ लोग आपकी पीठ पीछे आपकी इमेज खराब करने की कोशिश कर सकते हैं, इसलिए अपने काम से काम रखें। सिंह फिजूलखर्ची पर अगर काबू नहीं रखा, तो बजट पूरी तरह गड़बड़ा सकता है। दोस्तों के साथ अच्छा समय बीतेगा, जिससे मानसिक रूप से हल्कापन महसूस होगा। योग और प्राणायाम को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। वाहन चलाते समय स्पीड पर कंट्रोल रखें। कन्या एक से अधिक माध्यम से धन का आगमन होगा, जिससे बैंक बैलेंस में सुधार देखने को मिलेगा। पार्टनर के साथ किसी लॉन्ग ड्राइव या डिनर डेट पर जाने का प्लान बन सकता है। सेहत बिल्कुल दुरुस्त रहेगी। करियर रोमांचक मोड़ ले सकता है। तुला तुला राशि के जातकों के लिए आज का दिन थोड़ा मिलाजुला रहेगा। इमोशन में बहकर कोई भी बड़ा फैसला न लें, खासकर जब बात आपके करियर या पैसों से जुड़ी हो। व्यापारियों को थोड़ा संभलकर कदम बढ़ाना होगा। नौकरी में काम की धीमी रफ्तार के कारण बॉस की डांट सुननी पड़ सकती है। वृश्चिक इंकम सामान्य रहेगी। सुख-सुविधाओं की चीजों पर अचानक बड़ा खर्च हो सकता है। लव लाइफ में किसी पुरानी बात को लेकर अनबन हो सकती है। खान-पान की लापरवाही से पेट की समस्या परेशान कर सकती है। धनु इंकम के रास्ते खुलेंगे, लेकिन घरेलू जरूरतों और बच्चों की पढ़ाई पर अचानक बड़ा खर्च सामने आ सकता है। दांपत्य जीवन में मधुरता आएगी। माइग्रेन या सिर के भारीपन को नजरअंदाज न करें, भरपूर नींद लें। धनु राशि वालों के लिए दिन मेहनत का मीठा फल चखने का है। मकर तुला राशि वालों के लिए ये दिन बेहद संतुलित और खुशनुमा रहने वाला है। कला, संगीत, लेखन या किसी भी क्रिएटिव फील्ड से जुड़े लोगों को कोई बड़ा प्लेटफॉर्म या पहचान मिल सकती है। बिजनेस करने वाले जातकों की बिक्री में उछाल आ सकता है। नौकरी में मनचाहा ट्रांसफर मिलने के योग हैं। कुंभ कुंभ राशि के जातकों के लिए दिन की शुरुआत थोड़ी भागदौड़ और मानसिक दबाव के साथ हो सकती है। ऑफिस में पेंडिंग काम का बोझ बढ़ेगा, लेकिन स्थिति अचानक आपके पक्ष में मुड़ जाएगी। सरकारी क्षेत्र या बड़े टेंडर्स से जुड़े व्यापारियों को कोई बड़ा कॉन्ट्रैक्ट मिल सकता है। नौकरीपेशा लोग सहकर्मियों की पॉलिटिक्स से दूर रहें। मीन आज के दिन सरप्राइज की बात हो सकती है, चाहे वह ट्रैवल हो या कोई इंटरेस्ट हो, यह आपके बॉन्ड को मजबूत करेगा। आपकी फाइनेंशियल सिचुएशन विकास के अवसरों से भरी रहेगी। हाथ आए मौकों को अपनाने की आपकी क्षमता न केवल आपकी सिचुएशन को सुरक्षित करेगी।