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बार चुनाव लड़ना हुआ महंगा! भोपाल में नामांकन शुल्क में रिकॉर्ड बढ़ोतरी से वकीलों में नाराजगी

भोपाल  राजधानी भोपाल बार संघ चुनाव इस बार प्रत्याशियों के लिए बेहद खर्चीला साबित हो रहा है, क्योंकि विभिन्न पदों की नामांकन फीस में 42% से लेकर रिकार्ड 75% तक की भारी वृद्धि की गई है। इस बार के चुनाव में सबसे ज्यादा प्रतिशत वृद्धि (75%) सह-सचिव, कोषाध्यक्ष और पुस्तकालयाध्यक्ष के पदों पर देखी गई है, जिनकी फीस सीधे 20 हजार से बढ़ाकर 35 हजार रुपये कर दी गई है। वहीं सबसे बड़े यानी अध्यक्ष पद के लिए भी दो वर्ष पहले की तुलना में सीधे 42.85% (15,000 रुपये) का इजाफा किया गया है। फीस में की गई यह बेतहाशा बढ़ोतरी इस समय कोर्ट परिसर में उम्मीदवारों और वकीलों के बीच चर्चा और आक्रोश का सबसे बड़ा विषय बनी हुई है। आर्थिक रूप से कमजोर अधिवक्ताओं के लिए बड़ी चुनौती इस बढ़ोतरी पर वरिष्ठ अधिवक्ता प्रियनाथ पाठक ने गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि जिस प्रकार चुनाव लड़ने के लिए नामांकन शुल्क में 50 से 75 फीसदी तक की वृद्धि की गई है, उससे सबसे बड़ी दिक्कत यह आ रही है कि जो अधिवक्ता आर्थिक रूप से कमजोर हैं, उनके लिए अब चुनाव लड़ना बेहद मुश्किल काम हो गया है। इसके कारण कई योग्य उम्मीदवार चुनाव मैदान से दूर रहने को मजबूर हो रहे हैं। वहीं, सचिव पद (जिसमें 60% की वृद्धि हुई है) का चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी अनुराग दुबे ने भी इस बढ़ी हुई फीस पर कड़ी आपत्ति जताई है और इसे उम्मीदवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बताया है। नियमों को ताक पर रख उड़ाई जा रही आचार संहिता की धज्जियां चुनाव का प्रचार और जनसंपर्क कोर्ट परिसर में बहुत तेजी से चल रहा है, लेकिन इसके साथ ही चुनावी आचार संहिता के नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। नियमों के मुताबिक कोर्ट परिसर के भीतर किसी भी तरह के झंडे, बैनर या पोस्टर लगाने पर पूरी तरह प्रतिबंध है। इसके बावजूद, सख्त हिदायतों और पाबंदियों को ताक पर रखकर पूरे परिसर को प्रचार सामग्री से पाट दिया गया है। कोर्ट परिसर की दीवारों, खंभों और दरवाजों पर प्रत्याशियों के पोस्टर और झंडे साफ नजर आ रहे हैं, जिससे आचार संहिता का खुला उल्लंघन दिखाई दे रहा है। क्यों बढ़ानी पड़ी फीस? इस बार बारिश के मौसम को देखते हुए वाटरप्रूफ टेंट की व्यवस्था करनी होगी, जिसके कारण टेंट का खर्च काफी महंगा होने वाला है। इसके अलावा, समय के साथ स्टेशनरी की लागत भी बढ़ गई है। कुल मिलाकर विगत दो वर्षों में महंगाई में काफी ज्यादा इजाफा हुआ है, इसी व्यावहारिक कारण से इस बार नामांकन फीस में बढ़ोतरी करने का निर्णय लिया गया है।" वासु वासवानी, मुख्य चुनाव अधिकारी, भोपाल बार काउंसिल। विभिन्न पदों के लिए निर्धारित नामांकन फीस की तुलनात्मक तालिका पद का नाम -वर्तमान निर्धारित फीस -दो वर्ष पहले की फीस- सीधे हुई बढ़ोतरी -कुल प्रतिशत वृद्धि (%) अध्यक्ष- 50,000 रुपये -35,000 रुपये- 15,000 रुपये- 42.85% की वृद्धि उपाध्यक्ष- 45,000 रुपये -30,000 रुपये- 15,000 रुपये- 50.00% की वृद्धि सचिव- 40,000 रुपय -25,000 रुपये- 15,000 रुपये- 60.00% की वृद्धि सह-सचिव- 35,000 रुपये -20,000 रुपये- 15,000 रुपये- 75.00% की वृद्धि कोषाध्यक्ष- 35,000 रुपये -20,000 रुपये- 15,000 रुपये- 75.00% की वृद्धि पुस्तकालयाध्यक्ष-35,000 रुपये -20,000 रुपये- 15,000 रुपये- 75.00% की वृद्धि वरिष्ठ कार्यकारिणी सदस्य-15,000 रुपये- 10,000 रुपये- 5,000 रुपये- 50.00% की वृद्धि कनिष्ठ कार्यकारिणी सदस्य-7,500 रुपये- 5,000 रुपये- 2,500 रुपये- 50.00% की वृद्धि। 

राज्यसभा चुनाव में पोलिंग एजेंट की भूमिका अहम, क्रॉस वोटिंग रोकने पर नजर

रांची  झारखंड में दो सीटों के लिए निर्धारित राज्यसभा चुनाव में तीन उम्मीदवारों के होने से निगाहें 18 जून पर टिक गई हैं जिस दिन मतदान होना है। निर्वाची पदाधिकारी ने बुधवार को निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नथवाणी के नामांकन से संबंधित शिकायतों के बाद उसपर लगे होल्ड को वापस लेने का निर्णय सुनाकर सभी को चुनाव लड़ने का मौका दे दिया है। इस परिस्थिति में 18 जून को मतदान की तिथि पर सभी की निगाहें टिक गई हैं और इस दिन सबसे महत्वपूर्ण भूमिका में विभिन्न दलों के अधिकृत पोलिंग एजेंट होंगे। ऐसा इसलिए कि सभी विधायकों को मतदान के पूर्व अपनी पार्टी के पोलिंग एजेंट को भरा हुआ मतपत्र दिखाना है। पोलिंग एजेंट की भूमिका महत्वपूर्ण झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए झामुमो से बैद्यनाथ राम, कांग्रेस से प्रणव झा और निर्दलीय परिमल नथवाणी मैदान में हैं। ऐसे में अब पार्टियों के अधिकृत पोलिंग एजेंट की नियुक्ति और उसकी भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। सभी दलों के विधायकों को अपनी पार्टी के अधिकृत पोलिंग एजेंट को बैलेट पेपर दिखाने की बाध्यता है। बैलेट पेपर नहीं दिखाने की स्थिति में उनके मत को रद किया जा सकता है। यह व्यवस्था क्रास वोटिंग को रोकने के लिए है। यह भी पक्की बात है कि अगर क्रास वोटिंग के बाद भी वह विधायक अपना मतपत्र दिखाकर भर देता है तो उसका मत रद नहीं होगा। इस प्रविधान के कारण अब पोलिंग एजेंटों की नियुक्ति महत्वपूर्ण है। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि अगर किसी दल का विधायक और उसका पोलिंग एजेंट आपस में मिल जाते हैं तो क्रास वोटिंग करने वाले विधायक की पहचान करना मुश्किल है। झारखंड में इस तरह का प्रकरण पहले भी हो चुका है और लोग महीनों तक अनुमान ही लगाते रहे कि किस विधायक ने क्रॉस वोटिंग की और किस ने नहीं।

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव टले, 2027 के बाद वोटिंग कराने के पीछे क्या है रणनीति?

लखनऊ  उत्तर प्रदेश की 'गांव की सरकार' लखनऊ के गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है. यूपी के पंचायत चुनाव को 2027 विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा था, लेकिन योगी सरकार के फैसले के बाद सियासी सस्पेंस गहरा गया है. कार्यकाल समाप्त होने पर प्रधानों को ही ग्राम पंचायतों का प्रशासक नियुक्त करने के सरकार के निर्णय लिए जाने के बाद कहा जाने लगा है कि 2027 के बाद ही सूबे में पंचायत चुनाव हो सकेंगे।  योगी सरकार ने पंचायत चुनाव के लिए समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन का निर्णय लिए जाने के साथ ही पंचायत चुनाव की तस्वीर लगभग साफ हो गई थी. आयोग की सिफारिशें आने, सीटों का आरक्षण तय किए जाने और राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव संपन्न कराने की प्रक्रिया में ही नौ महीने से अधिक समय लगेंगे।  यूपी में जब आरक्षण की प्रक्रियाएं पूरी होंगी तो उस समय प्रदेश में विधानसभा चुनाव की सरगर्मी रहेगी. यही वजह है कि योगी सरकार ने सोमवार को ग्राम प्रधान के कार्यकाल खत्म होने से पहले ही उन्हें ही प्रशासक नियुक्त कर दिया है. इसके चलते ही माना जा रहा है कि यूपी में पंचायत चुनाव अब विधानसभा चुनाव के बाद ही हो सकेंगे।  योगी सरकार ने प्रधानों को बनाया प्रशासक उत्तर प्रदेश में साल 2021 में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव हुए थे, जिसमें 58,189 ग्राम प्रधान चुने गए थे. इन प्रधानों का कार्यकाल मंगलवार यानी 26 मई 2026 को समाप्त हो रहा था, लेकिन समय पर चुनाव नहीं होने के चलते योगी सरकार ने ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने का निर्णय लिया.  इस फैसले के बाद माना जा रहा है कि ब्लॉक प्रमुखों और जिला पंचायत अध्यक्षों को भी सरकार प्रशासक बनाने का निर्णय जल्द ही ले सकती है।   उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों को ही छह महीने के लिए प्रशासक बनाने का निर्णय पहली बार हुआ है, इससे पहले जब भी समय पर पंचायत चुनाव नहीं हो पाते थे, तो सहायक विकास अधिकारी को ग्राम पंचायत का प्रशासक बनाया जाता रहा है, लेकिन पहली बार ग्राम प्रधान को नियुक्त किया गया है. हालांकि प्रधान अब प्रशासक बनकर भी कोई नीतिगत निर्णय नहीं ले सकेंगे. विशेष स्थितियों में निर्णय के प्रस्ताव जिलाधिकारी उस पर स्वीकृति के बाद कर सकेंगे।  विधानसभा चुनाव के बाद ही पंचायत चुनाव ग्राम प्रधान के बाद बीडीसी, ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत सदस्य और जिला पंचायत अध्यक्ष को भी योगी सरकार प्रशासक नियुक्त कर सकती है, क्योंकि इनके भी कार्यकाल खत्म हो रहे हैं. यूपी में मौजूदा ग्राम पंचायतों का कार्यकाल मई से जुलाई 2026 के बीच खत्म हो रहा है. नियम के मुताबिक चुनाव हो जाने चाहिए थे, लेकिन योगी कैबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट के 'ट्रिपल टेस्ट' फॉर्मूले के तहत हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय समर्पित पिछड़ा वर्ग (OBC) आयोग के गठन को मंजूरी दे दी है, जो सूबे में आरक्षण का निर्धायण करेगी।  ओबीसी आयोग को उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों में रैपिड सर्वे कर पिछड़ों के सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक आंकड़ों की जांच करने के लिए 6 महीने का समय दिया गया है. इस तरहह नवंबर 2026 तक तो ओबीसी आयोग की रिपोर्ट आएगी. इसके बाद सीटों का नए सिरे से आरक्षण तय होगा और मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) को दुरुस्त किया जाएगा. जब ये पूरी प्रक्रिया खत्म होगी, तब तक साल 2026 बीत चुका होगा और दहलीज पर खड़ा होगा 2027 का यूपी विधानसभा चुनाव. ऐसे में विधानसभा चुनाव के बाद ही पंचायत चुनाव हो सकेंगे।  यूपी में पंचायत चुनाव की तैयारी कर रहे भावी प्रधानों, बीडीसी सदस्यों और जिला पंचायत अध्यक्ष पद के दावेदारों को बहुत बड़ा झटका लगा है. चर्चा थी कि साल 2026 के मध्य तक पंचायत चुनाव का बिगुल फूंक दिया जाएगा, लेकिन अब जो सियासी और कानूनी समीकरण बने हैं, उसने साफ कर दिया है कि यूपी में पंचायत चुनाव अब 2027 के विधानसभा चुनाव के बाद ही होंगे।  योगी सरकार ने क्यों कदम पीछे खींच लिए? योगी सरकार अगर समय रहते हुए पंचायत चुनाव करा सकती थी. लेकिन ओबीसी आयोग के गठन में देरी किए जाने के चलते मामला फंस गया. कोर्ट के हस्ताक्षेत्र के बाद ही योगी सरकार ने ओबीसी आयोग का गठन किया. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंचायत चुनाव को टालने के पीछे सिर्फ कानूनी पेच नहीं, बल्कि एक सोची-समझी सियासी रणनीति भी है।  मार्च 2027 में उत्तर प्रदेश में सत्ता का 'महामुकाबला' यानी विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में कोई भी राजनीतिक दल विधानसभा के फाइनल से ठीक पहले पंचायत चुनाव का भारी जोखिम नहीं उठाना चाहती है.  इसकी एक बड़ी वजह यह है कि पंचायत चुनाव के नतीजो को 2027 के चुनाव से जोड़ा जाता. साल 2021 के पंचायत चुनाव में बीजेपी को सपा से कड़ी टक्कर मिली थी और कई जिलों में निर्दलीयों का बोलबाला रहा था. योगी सरकार नहीं चाहती कि 2027 के मुख्य चुनाव से ऐन पहले किसी भी तरह का 'एंटी-इंकंबेंसी' या नकारात्मक संदेश जनता के बीच जाए।  पंचायत चुनाव किसी पार्टी के सिंबल पर कम और स्थानीय रसूख, परिवार और चेहरे पर ज्यादा लड़े जाते हैं. एक-एक सीट पर बीजेपी या सपा के कई-कई कार्यकर्ता ताल ठोक देते हैं., अगर विधानसभा चुनाव से ठीक पहले टिकट न मिलने पर कार्यकर्ता बागी हो गए, तो इसका सीधा नुकसान 2027 के मुख्य चुनाव में उठाना पड़ सकता है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने पहले ही पंचायत चुनाव लड़ने से मना कर दिया था।  बीजेपी और सपा में शह-मात का खेल योगी सरकार के इस कदम पर अब यूपी की सियासत गरमा गई है. मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा है कि बीजेपी को अपनी जमीन खिसकने का अहसास हो गया है, इसलिए वो ओबीसी आरक्षण और सर्वे के बहाने चुनाव को टाल रही है. सरकार के ही सहयोगी दलों (जैसे ओम प्रकाश राजभर और संजय निषाद) के बयानों से भी पहले ही यह संकेत मिल रहे थे कि बिना पूरी तैयारी के चुनाव कराना मुमकिन नहीं है।  उत्तर प्रदेश में अब 'गांव की सरकार' का फैसला, लखनऊ की 'बड़ी सरकार' बनने के बाद ही होगा. योगी सरकार ने बेहद चतुराई से कानूनी पेच का सहारा लेकर 2027 के सेमीफाइनल को टाल … Read more

पंजाब में वोटिंग का दिन! निकाय चुनाव के लिए सुरक्षा कड़ी, बूथों पर CCTV से निगरानी

चंडीगढ़  पंजाब में नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों के लिए आज  यानि मंगलवार को मतदान हो रहा । राज्य की 8 नगर निगमों, 75 नगर परिषदों और 21 नगर पंचायतों के लिए आज  वोट डाले जा रहे , जबकि चुनावी नतीजों की घोषणा 29 मई को होगी।  वहीं, इस बार बैलेट पेपर के माध्यम से वोटिंग होगी। 3977 बूथ हैं। 36 हजार मुलाजिम चुनावी प्रक्रिया में शामिल हैं। 35500 पुलिस मुलाजिम व होमगार्ड जवान तैनात किए गए हैं। जबकि, हर बूथ पर 5 मुलाजिम तैनात रहेंगे। आईएएस व पीसीएस अफसर जिलों में तैनात किए गए हैं। 36.72 लाख मतदाता डालेंगे वोट इस बार बठिंडा, अबोहर, बटाला, बरनाला, कपूरथला, मोगा, पठानकोट और मोहाली नगर निगम के चुनाव सभी राजनीतिक दलों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बने हुए हैं। विशेष बात यह है कि बरनाला नगर निगम के लिए पहली बार चुनाव करवाए जा रहे हैं। राज्य चुनाव आयोग के मुताबिक इस चुनाव में कुल 36,72,932 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकेंगे। इसमें 18 लाख 990 पुरुष, 7,73,716 महिलाएं और 226 अन्य हैं। आप से सबसे अधिक उम्मीदवार मैदान में बता दें, पंजाब भर के निकाय चुनावों की घोषणा के बाद 10,809 उम्मीदवारों ने शुरुआती नामांकन भरा था। जिसमें से 2393 उम्मीदवारों ने अपना नाम वापस ले लिया था। 79 उम्मीदवारों को निर्विरोध चुन लिया गया है। अब चुनाव के लिए 7555 उम्मीदवार मैदान में हैं। इनमें सबसे अधिक उम्मीदवार सत्तापक्ष आम आदमी पार्टी (आप) के चुनाव लड़ रहे हैं जिनकी संख्या 1801 हैं। दूसरे नंबर पर कांग्रेस के 1550, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के 1316, शिरोमणि अकाली दल के 1251, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के 96, 1528 निर्दलीय और 13 अन्य उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। निकाय चुनाव सभी दलों के लिए अहम हैं, क्योंकि इसे 2027 में विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है। सभी पोलिंग बूथों के अंदर और बाहर सीसीटीवी पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए राज्य के सभी पोलिंग बूथों के अंदर और बाहर सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं और उनकी रिकॉर्डिंग कम से कम एक वर्ष तक सुरक्षित रखी जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी भी स्थिति में संबंधित फुटेज को बिना अनुमति नष्ट नहीं किया जाएगा। जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस दीपक मंचंदा की खंडपीठ ने नगर निकाय चुनावों से जुड़ी विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान ये निर्देश जारी किए। 26 मई को पंजाब में सरकारी छुट्टी का एलान पंजाब सरकार ने स्थानीय निकाय चुनावों के मद्देनजर सुचारू मतदान सुनिश्चित करने के लिए 26 मई को राज्य में सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है। इस दौरान चंडीगढ़ सहित पंजाब सरकार के सभी सरकारी दफ्तर, बोर्ड, कॉर्पोरेशन, शैक्षणिक संस्थान और अन्य सरकारी प्रतिष्ठान इस दिन बंद रहेंगे। इसके अलावा, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने भी अपने सभी अधिकारियों व कर्मचारियों के लिए 26 मई को विशेष आकस्मिक अवकाश की घोषणा की है। 5-6 दिन में ही निपटा प्रचार आगामी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले इन स्थानीय निकाय चुनावों को शहरी मतदाताओं के राजनीतिक मिजाज का लिटमस टेस्ट माना जा रहा है। बता दें, पंजाब राज्य चुनाव आयोग ने 11 मई को इन चुनावों का एलान किया था। 19 मई को नामांकन वापस लेने की प्रक्रिया के बाद उम्मीदवारों को प्रचार के लिए केवल 5-6 दिनों का ही समय मिल सका। जिसमें उम्मीदवारों ही नहीं, राजनीतिक पार्टियों के धुरंधरों नें इसमें पूरी ताकत झोंक दी। विधायकों मंत्रियों की परफॉर्मेंस का रिपोर्ट कार्ड होंगे नतीजे बता दें, सत्तारूढ़ 'आप' के विधायकों और मंत्रियों ने आज प्रचार में अपनी पूरी ताकत लगा दी, क्योंकि इन चुनावों के नतीजे उनकी परफॉर्मेंस का रिपोर्ट कार्ड तय करेंगे। इसके साथ ही, इन चुनावों से भाजपा का ग्राफ भी साफ हो जाएगा, जो इस बार काफी आक्रामक तरीके से चुनावी मैदान में उतरी है। राज्य चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार, पोलिंग स्टेशनों के आसपास किसी भी तरह की प्रचार सामग्री प्रदर्शित करने पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। अकाली दल ने की मतदान का समय बढ़ाने की मांग शिरोमणि अकाली दल ने राज्य चुनाव आयोग से मतदान का समय बढ़ाने की मांग की है। अकाली नेता डॉ. दलजीत सिंह चीमा ने कहा कि मतदान का समय सुबह 8 से 5 बजे की जगह सुबह 7 से शाम 6 बजे तक बढ़ाया जाना चाहिए। चीमा ने कहा कि प्रदेश में इस समय भीषण गर्मी का प्रकोप है जिसका असर मतदान प्रतिशत पर पड़ सकता है। अगर सुबह और शाम के चलते मतदान का समय दो घंटे बढ़ा दिया जाए तो उससे मतदान प्रतिशत में वृद्धि होगी। मौजूदा समय मजदूरों के लिए भी उपयुक्त नहीं है क्योंकि वो काम के कारण अपने मताधिकार का उपयोग नहीं कर पाएंगे।  

नामांकन रद्द होने से बदला चुनावी गणित, पंजाब निकाय चुनाव में BJP की रणनीति पर नजर

चंडीगढ़  पंजाब के निकाय चुनाव में कई सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला है तो कई में आमने-सामने की सीधी टक्कर है। इसकी दो बड़ी वजह सामने आ रही हैं एक तो कई वार्डों में कुछ प्रत्याशियों के प्रचार में धार नहीं दिख रही और दूसरी, कई जगह मुख्य पार्टियों के प्रत्याशी ही मैदान से बाहर हैं। आठ नगर निगमों और 97 नगर परिषदों व नगर पंचायतों की बात करें तो आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी तो लगभग सभी सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं मगर भाजपा, शिरोमणि अकाली दल (शिअद) और कांग्रेस जैसे मुख्य सियासी दलों के प्रत्याशी मैदान से बाहर हैं।  शिअद के अध्यक्ष सुखबीर बादल, भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सुनील जाखड़ और पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग आरोप लगाते हैं कि यह स्थिति इसलिए बनी है क्योंकि कई वार्डों में जानबूझकर उनके मजबूत प्रत्याशियों के नामांकन पत्र रद्द कर दिए गए हैं। ऐसा करने का कोई मजबूत आधार भी नहीं बताया जा रहा है। कई प्रत्याशी अपना दुखड़ा लेकर राज्य चुनाव आयोग तक भी पहुंचे थे जिनकी शिकायतें संबंधित जिलों के जिला निर्वाचन अधिकारियों को आगामी कार्रवाई के लिए भेज दी गई हैं। उधर, बहुत से वॉर्डों में सिर्फ दो ही प्रत्याशी हैं जबकि बठिंडा नगर निगम के वॉर्ड नंबर 30 और सुनाम नगर परिषद का वॉर्ड नंबर 15, ये दो वॉर्ड ऐसे हैं जहां 10-10 प्रत्याशी चुनावी मैदान में हैं। आठ नगर निगमों में प्रत्याशियों की स्थिति 105 नगर निकायों में से आठ नगर निगमों के चुनाव सभी दलों के लिए बड़ी प्रतिष्ठा का सवाल हैं क्योंकि इन निगमों के अंतर्गत बड़ा शहरी क्षेत्र आता है। सभी नगर निगमों में 50-50 वार्ड हैं मगर बहुत वार्डों में मुख्य सियासी दलों के प्रत्याशी ही चुनाव रण से बाहर हैं जबकि आप के प्रत्याशी करीबन हर सीट पर चुनाव लड़ रहे हैं। बरनाला नगर निगम में भाजपा के 26 प्रत्याशी, कांग्रेस के 36 और शिअद के 27 प्रत्याशी, बठिंडा नगर निगम में भाजपा के 42, कांग्रेस के 43 और शिअद के 46 प्रत्याशी, अबोहर नगर निगम में भाजपा के 49, कांग्रेस के 31 और शिअद के 33 प्रत्याशी, बटाला नगर निगम में भाजपा के 22, कांग्रेस के 48 और शिअद के 21 प्रत्याशी, बरनाला नगर निगम में भाजपा व शिअद के 27-27 प्रत्याशी और कांग्रेस के 39 प्रत्याशी, कपूरथला नगर निगम में भाजपा के 33, कांग्रेस के 50, शिअद के 23 प्रत्याशी, मोगा नगर निगम में भाजपा के 40, कांग्रेस के 48 व शिअद के 38 प्रत्याशी और पठानकोट नगर निगम में भाजपा-कांग्रेस के 50-50 जबकि शिअद के 30 प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा केंद्रीय योजनाओं के गणित के सहारे भाजपा ने हर नगर निकाय की अलग-अलग रणनीति खास ढंग से बनाई है। भाजपा जानती है कि पंजाब में उनकी सरकार नहीं है लिहाजा पार्टी ने केंद्रीय योजनाओं के गणित के आधार पर अपना होमवर्क किया है। भाजपा ने हर नगर निकाय के लिए हजारों परचे छपवाए हैं जिसमें यह बताया गया है कि संबंधित वार्ड में स्वच्छ भारत मिशन शहरी, अमरूत योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, प्रधानमंत्री मानधन श्रम योगी योजना, एक राष्ट्र एक राशन कार्ड योजना व प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत कितने लोगों को लाभ मिला है। यह भी बताया गया है कि इन योजनाओं में साल 2015-16 से साल 2025-26 तक कितने करोड़ संबंधित नगर निकाय के लिए केंद्र सरकार की ओर से पहुंचे। इसके अतिरिक्त मतदाताओं को यह भी बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने अपने 11 साल के कार्यकाल में पंथक, पंजाब व पंजाबियों से जुड़े क्या-क्या बड़े काम किए हैं। इसमें साल 1984 के दंगा पीड़ितों को इंसाफ दिलवाने का भी जिक्र है।  

थमा चुनाव प्रचार, अब वोटिंग की बारी! पंजाब के 105 निकायों में कल डाले जाएंगे वोट

चंडीगढ़  पंजाब के 105 नगर निकायों के लिए 26 मई को मतदान होगा और 29 मई को मतगणना के बाद नतीजे घोषित किए जाएंगे। रविवार को चुनावी शोर थम गया और अब रैलियों व सभाओं पर पाबंदी रहेगी और उम्मीदवार घर-घर जाकर प्रचार करेंगे। आज पोलिंग पार्टियां रवाना होंगी। पंजाब के आठ नगर निगमों, 76 नगर परिषदों और 21 नगर पंचायतों की सीटों के लिए यह चुनाव हो रहे हैं। चुनाव के लिए 7555 उम्मीदवार मैदान में हैं क्योंकि 79 उम्मीदवारों को निर्विरोध चुन लिया गया है। 2393 उम्मीदवारों ने अपना नाम वापस ले लिया था। इनमें सबसे अधिक उम्मीदवार सत्तापक्ष आम आदमी पार्टी (आप) के चुनाव लड़ रहे हैं जिनकी संख्या 1801 हैं। दूसरे नंबर पर कांग्रेस के 1550, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के 1316, शिरोमणि अकाली दल के 1251, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के 96, 1528 निर्दलीय और 13 अन्य उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। निकाय चुनाव सभी दलों के लिए अहम हैं, क्योंकि इसे 2027 में विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है। अकाली दल ने की मतदान का समय बढ़ाने की मांग  शिरोमणि अकाली दल ने राज्य चुनाव आयोग से मतदान का समय बढ़ाने की मांग की है। अकाली नेता डॉ. दलजीत सिंह चीमा ने कहा कि मतदान का समय सुबह 8 से 5 बजे की जगह सुबह 7 से शाम 6 बजे तक बढ़ाया जाना चाहिए। चीमा ने कहा कि प्रदेश में इस समय भीषण गर्मी का प्रकोप है जिसका असर मतदान प्रतिशत पर पड़ सकता है। अगर सुबह और शाम के चलते मतदान का समय दो घंटे बढ़ा दिया जाए तो उससे मतदान प्रतिशत में वृद्धि होगी। मौजूदा समय मजदूरों के लिए भी उपयुक्त नहीं है क्योंकि वो काम के कारण अपने मताधिकार का उपयोग नहीं कर पाएंगे।  

राज्यसभा सीटों पर बीजेपी की रणनीति तैयार, नए चेहरों को मिल सकता है मौका

भोपाल  केंद्रीय चुनाव आयोग ने राज्यसभा चुनाव का कार्यक्रम जारी कर मध्यप्रदेश की तीन सीटों में होने वाले चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी बढ़ा दी है। प्रदेश में तीन सदस्यों का कार्यकाल पूरा हो रहा है। इनमें भाजपा से सांसद और केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन और सुमेर सिंह सोलंकी है। कांग्रेस से दिग्विजय सिंह हैं। उनका कार्यकाल 21 जून को समाप्त हो रहा है। नए उम्मीदवारों के चयन को लेकर भाजपा में मंथन शुरू हो गया है। बीजेपी सूत्रों के अनुसार पार्टी में नए चेहरे पर विचार किया जा रहा है। अंतिम चर्चा के बाद उम्मीदवारों के नाम बंद लिफाफे में केंद्रीय समिति को भेजे जाएंगे। कांग्रेस की एक सीट पर भाजपा किसी डमी प्रत्याशी को समर्थन दे सकती है भाजपा राज्यसभा चुनाव के बहाने कांग्रेस की थाह भी नाप सकती है। चर्चा है कि कांग्रेस की एक सीट पर भाजपा किसी डमी प्रत्याशी को समर्थन दे सकती है। हाल ही में वर्चुअली बैठक भी बुलाई गई थी। शुरुआती चर्चा पूरी हो गई है। राज्यसभा का चुनाव कार्यक्रम जारी होने के बाद पार्टी द्वारा दिल्ली से मार्गदर्शन मांगकर पार्टी मुख्यालय में बीजेपी कोर ग्रुप की बैठक बुलाई जाएगी। केंद्रीय मंत्री कुरियन केरल में कांजिरापल्ली सीट से चुनाव लड़े थे, चुनाव हारने के कारण बदले समीकरण केंद्रीय मंत्री कुरियन केरल में कांजिरापल्ली सीट से चुनाव लड़े थे, लेकिन हार गए। ऐसे में माना जा रहा है कि भाजपा दोबारा उन्हें मप्र से उच्च सदन में भेजने पर विचार कर रही है। वजह यह भी है कि वे केंद्र में मत्स्य पालन, पशुपालन, डेयरी और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री हैं। जमीनी कार्यकर्ताओं में शुमार हैं। यदि मध्यप्रदेश मूल के व्यक्ति को भेजने की बात का मुद्दा उठा तो तस्वीर बदल सकती है। सुमेर सिंह की संघ में अच्छी पकड़ लेकिन उनके नाम पर संशय के बादल इतिहास के प्रोफेसर से राज्यसभा तक का सफर तय करने वाले बड़वानी के डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी की जगह पार्टी किसी अन्य युवा चेहरे पर विचार कर सकती है। शीर्ष नेताओं का मानना है कि भाजपा के पास कई अन्य चेहरे हैं जिन्हें अवसर मिलना चाहिए। राजनैतिक जीवन का पहला चुनाव ही राज्यसभा का लड़ा, सुमेर सिंह को प्रदेश में बीजेपी के आदिवासी चेहरे के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है हालांकि यह काम इतना आसान भी नहीं है। सांसद सुमेर सिंह की संघ में अच्छी पकड़ मानी जाती है। उन्होंने अपने राजनैतिक जीवन का पहला चुनाव ही राज्यसभा का लड़ा था। सुमेर सिंह को प्रदेश में बीजेपी के आदिवासी चेहरे के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता रहा है।

सत्ता के सेमीफाइनल में पंजाब की सियासत गरमाई, निकाय चुनाव में सभी दलों की साख दांव पर

चंडीगढ़  सत्ता का सेमीफाइनल माने जाने वाले पंजाब के निकाय चुनाव में सभी दलों के दिग्गज खूब पसीना बहा रहे हैं क्योंकि उनकी साख दांव पर है।  भाजपा, कांग्रेस, शिअद और आप के सभी वरिष्ठ नेता, मंत्री, विधायक व सांसद चुनावी रण में अपने-अपने प्रत्याशियों को जितवाने लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। चूंकि अब चुनाव को सिर्फ तीन दिन बचे हैं लिहाजा सभी दिग्गज अपने साथियों के साथ प्रचार अभियान में जुटे हैं। पंजाब में 26 मई को 105 नगर निकायों के चुनाव होने हैं इनमें 8 नगर निगम और 97 नगर परिषद और नगर पंचायतें शामिल हैं। 29 मई को परिणाम आएगा जो करीब आठ महीने बाद सूबे में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए सभी राजनीतिक पार्टियों के लिए एक आधार तय करेगा। चूंकि यह पूरा चुनाव शहरी वोटर पर आधारित है इसलिए राजनीतिक पार्टियां ज्यादा सतर्क हैं। वे जानती हैं कि ये चुनाव पंचायती चुनाव की तरह जातियों व समुदायों की सियासत के घेरे से बाहर रहेंगे। दलों ने उतारी दिग्गजों की फाैज राजनीतिक मामलों के जानकार परमजीत सिंह भी कहते हैं कि शहरी वोटर पढ़ा-लिखा व विकास का पक्षधर होता है। शहर की बुनियादी सुविधाएं उनकी बड़ी अपेक्षाओं में शामिल होती हैं और वे जाति-लिंग की सीमाओं को पार करते हुए मतदान करता है इसीलिए सभी दलों ने शहरी वोटरों को रिझाने के लिए अपने दिग्गजों की फौज उतारी है। भाजपा की रणनीतिक बैठकें, सुखबीर ने खुद संभाला मोर्चा भाजपा ने अपने प्रदेश स्तरीय सभी पदाधिकारियों और कार्यकारिणी सदस्यों को विभिन्न जिलों के निकायों की जिम्मेदारियां सौंपी रखी हैं। इनके अलावा पंजाब भाजपा के अध्यक्ष सुनील जाखड़, राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ व केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत बिट्टू भी बतौर स्टार प्रचारक विभिन्न जिलों में रणनीतिक बैठकें कर प्रत्याशियों व कार्यकर्ताओं की मेहनत को जीत में बदलने की कोशिशों में लगे हैं। शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर बादल ने खुद मोर्चा संभाला हुआ है। उनके साथ उपाध्यक्ष डॉ. दलजीत सिंह चीमा और बिक्रम सिंह मजीठिया को भी कई जिलों की जिम्मेदारियां सौंपी गई है। सुखबीर तो प्रत्याशियों के बुलावे पर जनसभाएं कर मतदाताओं को अकाली दल के पक्ष में करने का प्रयास कर रहे हैं। उधर, कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी भूपेश बघेल, प्रदेशाध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, सांसद एवं पूर्व डिप्टी सीएम सुखजिंदर सिंह रंधावा, नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा, राष्ट्रीय सचिव एवं विधायक परगट सिंह समेत अन्य विधायक और सांसद भी अपने प्रत्याशियों को जितवाने के लिए भागदौड़ कर रहे हैं। आप के मंत्रियों, विधायक की परफॉर्मेंस होगी तय निकाय चुनाव आम आदमी पार्टी के मंत्रियों व विधायकों की परफाॅर्मेंस तय करेंगे। पार्टी सूत्रों के अनुसार सभी विधायकों और मंत्रियों को उनके हलकों में स्थित निकायों को जितवाने की जिम्मेदारी दी गई है। इसी जीत या हार से पार्टी यह मालूम करना चाहती है कि उनके विधायकों व मंत्रियों की साढ़े चार साल में अपने-अपने क्षेत्रों के मतदाताओं पर कितनी पकड़ है। कुछ माह पूर्व हुए पंचायत चुनाव और अब निकाय चुनाव के परिणामों को आधार बनाकर ही आप आगामी विधानसभा चुनाव में टिकटों का बंटवारा करेगी। खराब प्रदर्शन वाले वाले विधायकों का टिकट भी कट सकता है।  

चुनाव आयोग का बड़ा ऐलान, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में 18 जून को उपचुनाव

नई दिल्ली राज्यसभा की 24 खाली हो रही सीटों पर चुनाव की तारीख का ऐलान कर दिया गया है. चुनाव आयोग ने आज द्विवार्षिक चुनाव के लिए नोटिफिकेशन जारी कर दिया है. दस राज्यों की 24 सीटों पर 18 जून को मतदान होगा. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह रिटायर हो रहे हैं. वहीं, केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू और जॉर्ज कुरियन भी राज्यसभा से रिटायर हो रहे हैं।  18 जून को होगी वोटिंग  चुनाव आयोग के नोटिफिकेशन के मुताबिक एक जून को नोटिफिकेशन जारी होगा. 8 जून तक नामांकन भरा जा सकेगा. 9 जून को नामांकन की जांच होगी. 11 जून को नामांकन वापस लिया जा सकेगा. अगर जरूरी हुई तो 18 जून को वोटिंग होगी. वोटिंग सुबह 9 से शाम 4 बजे तक होगी. 18 जून को मतगणना होगी और 20 जून तक राज्यसभा का चुनाव पूरा कर लिया जाएगा।  11 बीजेपी से और 4 कांग्रेस के सांसद हो रहे रिटायर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कूरियन, और रवनीत सिंह बिट्टू आदि का कार्यकाल हो रहा है समाप्त।  कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और गुजरात से चार-चार सीटें होंगी खाली हो रही हैं. राजस्थान और मध्य प्रदेश से तीन-तीन सीटें खाली होने जा रही हैं. मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और झारखंड से एक-एक सीट खाली होंगी . इनके अलावा झारखंड, तमिलनाडु और महाराष्ट्र से एक-एक सीटों पर उपचुनाव भी हो सकता है. 22 रिटायर होने वाले सांसदों में 11 बीजेपी के हैं जबकि कांग्रेस के चार सांसद हैं।  चुनाव आयोग ने साफ निर्देश दिया है कि मतदान के दौरान केवल रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा उपलब्ध कराए गए विशेष बैंगनी रंग के स्केच पेन का ही इस्तेमाल किया जाएगा. किसी अन्य पेन के उपयोग की अनुमति नहीं होगी. साथ ही चुनाव प्रक्रिया की निगरानी के लिए पर्यवेक्षकों की नियुक्ति भी की जाएगी ताकि मतदान निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से संपन्न कराया जा सके।  राजनीतिक तौर पर इन चुनावों को काफी अहम माना जा रहा है, क्योंकि राज्यसभा में संख्या बल कई बड़े विधेयकों और राजनीतिक रणनीतियों पर असर डालता है. ऐसे में आने वाले दिनों में विभिन्न दल उम्मीदवारों के चयन और समर्थन जुटाने की कवायद तेज कर सकते हैं।  किस राज्य की कितनी सीटों पर चुनाव? आंध्र प्रदेश: 4 गुजरात: 4 कर्नाटक: 4 मध्य प्रदेश: 3 राजस्थान: 3 झारखंड: 2 मणिपुर: 1 मेघालय: 1 अरुणाचल प्रदेश : मिजोरम :1 नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 8 जून है. केंद्रीय मंत्रियों पर तलवार लटकी केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण और रेलवे राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू राजस्थान से राज्य सभा सांसद हैं. उनका कार्यकाल 21 जून को समाप्त हो रहा है. इसी तरह अल्पसंख्यक मामलों और मत्स्य पालन मंत्रालय में राज्य मंत्री जॉर्ज कूरियन मध्य प्रदेश से राज्य सभा सांसद हैं. उनका कार्यकाल भी 21 जून को समाप्त हो रहा है. माना जा रहा है कि पंजाब विधानसभा चुनाव के मद्देनजर रवनीत सिंह को पार्टी दोबारा राज्य सभा भेज सकती है।  वहीं कूरियन को केरल चुनाव के मद्देनजर सरकार में लाया गया था. अब देखना होगा कि बीजेपी उन्हें फिर से राज्य सभा भेजती है या नहीं. केंद्रीय मंत्रिपरिषद में इन दोनों मंत्रियों का बना रहना इस बात पर निर्भर करेगा कि वे फिर से राज्य सभा में आते हैं या नहीं।  खरगे और दिग्विजय का क्या होगा? कर्नाटक से संख्या बल के हिसाब से कांग्रेस को तीन सीटें मिल सकती हैं. इनमें से एक पर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का चुना जाना तय माना जा रहा है. वहीं मध्य प्रदेश में कांग्रेस को एक सीट जीतने के लिए जोर लगाना पड़ेगा. हालांकि उसके पास केवल छह सरप्लस वोट हैं. ऐसे में किसी वरिष्ठ नेता पर दांव लगाया जा सकता है. खुद दिग्विजय सिंह फिर से राज्यसभा जाने से इनकार कर चुके हैं. राज्य में दो सीटें बीजेपी और एक कांग्रेस को मिल सकती है. बीजेपी की ओर से केंद्रीय राज्य मंत्री जॉर्ज कूरियन भी दौड़ में हैं. राजस्थान में बीजेपी को दो और कांग्रेस को एक सीट मिल सकती है। बीजेपी की ओर से केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू और कांग्रेस की ओर से पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा का नाम चल रहा है।  गुजरात में कांग्रेस जीरो कांग्रेस को बड़ा झटका गुजरात में लगने जा रहा है. अभी गुजरात से राज्यसभा की 11 सीटों में कांग्रेस के केवल एक ही सदस्य हैं. शक्तिसिंह गोहिल विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे हैं. वे 21 जून को रिटायर हो रहे हैं. वर्तमान में एक सीट जीतने के लिए 46 वोट चाहिए जबकि कांग्रेस के पास केवल 12 विधायक हैं. यानी कांग्रेस का गुजरात से अपना कोई भी उम्मीदवार राज्यसभा चुनाव में नहीं जीत सकता. यह पहली बार होगा जब गुजरात जैसे महत्वपूर्ण राज्य से कांग्रेस का राज्य सभा में कोई भी सदस्य नहीं होगा. हालांकि झारखंड में कांग्रेस की उम्मीदें सत्तारूढ़ जेएमएम पर टिकी हैं. पार्टी को उम्मीद है कि जेएमएम यह सीट कांग्रेस को दे देगा. इस चुनाव में एनडीए की स्थिति वर्तमान स्तर पर ही रहने की संभावना है. हालांकि टीडीपी की सीटें बढ़ सकती हैं. बीजेपी के अभी राज्य सभा में 113 सांसद हैं और एनडीए के 148 सांसद हैं. इस दौर के चुनाव के बाद बीजेपी की संख्या कमोबेश इसी के आसपास रहेगा।  बीजेपी के 11 सांसद हो रहे रिटायर केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कूरियन और रवनीत सिंह बिट्टू समेत 11 बीजेपी सांसदों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। इसके अलावा कांग्रेस के मल्लिकार्जुन खरगे, पूर्व पीएम एचडी देवगौड़ा और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का भी कार्यकाल समाप्त होने को है। ऐसे में कर्नाटक, गुजरात और आंध्र प्रदेश में चार-चार सीटें खाली हो रही हैं। झारखँड, तमिलनाडुऔर महाराष्ट्र की एक-एक सीटों पर उपचुनाव हो सकताहै। 11 सांसदों में से 11 बीजेपी के और चार कांग्रेस के सांसद रिटायर हो रहे हैं। रवनीत सिंह बिट्टू केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण और रेलवे राज्य मंत्री हैं। 21 जून को उनका कार्यकाल समाप्त हो रहा है। माना जा रहा है कि पंजाब विधानसभा चुनाव को देखते हुए बिट्टू को फिर से राज्यसभा भेजा जा सकता है। फिलहाल वह राजस्थान से सांसद हैं। वहीं जॉर्च कूरियन की वापसी … Read more

26 मई को मतदान, मोहाली निगम चुनाव को लेकर तैयारियां तेज

मोहाली  नगर निगम मोहाली के 50 वार्डों में होने वाले चुनाव को लेकर पूरा शहर चुनावी रंग में रंग गया है। इस बार कुल 1,75,323 मतदाता 26 मई को अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। इनमें 90,484 पुरुष मतदाता, 84,831 महिला मतदाता तथा 8 अन्य मतदाता शामिल हैं। चुनावी माहौल जैसे जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है, वैसे वैसे और अधिक गरमाता जा रहा है। इस बार चुनाव के लिए प्रशासन ने पूरे शहर में 184 मतदान केंद्र स्थापित किए हैं, जहां मतदाता अपने अपने वार्डों के प्रतिनिधियों का चयन करेंगे। शांतिपूर्ण और निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करने के लिए सभी बूथों पर आवश्यक सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्थाएं की जा रही हैं। मतदान दिवस पर सभी वार्डों में स्थानीय प्रतिनिधियों के भाग्य का फैसला जनता के हाथों में होगा। 50 में 25 वार्ड महिलाओं के आरक्षित नगर निगम के 50 वार्डों में इस बार 25 वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित रखे गए हैं, जिससे स्थानीय निकायों में महिला प्रतिनिधित्व को बढ़ावा मिलेगा। आरक्षण व्यवस्था के चलते कई वार्डों में नए चेहरों को राजनीति में अवसर मिला है और विभिन्न दलों ने महिला उम्मीदवारों को आगे बढ़ाने पर विशेष फोकस किया है। 227 उम्मीदवारों में से 45 निर्दलीय भी मैदान में चुनाव मैदान में इस बार कुल 227 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, जिनमें 45 निर्दलीय प्रत्याशी भी शामिल हैं। निर्दलीय उम्मीदवारों की मौजूदगी ने कई वार्डों में मुकाबले को बेहद रोचक और त्रिकोणीय बना दिया है। प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच कई स्थानों पर सीधी टक्कर देखने को मिल रही है, जिससे चुनाव और भी दिलचस्प हो गया है। वार्ड 42 में इस बार हाई-प्रोफाइल मुकाबला इस पूरे चुनाव में सबसे अधिक चर्चा वार्ड नंबर 42 की हो रही है, जो इस बार हाई प्रोफाइल मुकाबले के रूप में उभरकर सामने आया है। यह वार्ड इसलिए भी खास है क्योंकि यहां मतदाताओं की संख्या केवल 979 है, जो पूरे नगर निगम क्षेत्र में सबसे कम है। कम मतदाता संख्या के कारण यहां हर वोट का महत्व और भी बढ़ जाता है और चुनाव परिणाम बेहद करीबी रहने की संभावना जताई जा रही है। वार्ड 42 में इस बार राजनीतिक समीकरण भी खासे दिलचस्प हैं, क्योंकि यहां से आम आदमी पार्टी के सबसे अमीर विधायक कुलवंत सिंह के पुत्र सरबजीत सिंह चुनाव मैदान में हैं, जिससे यह मुकाबला राजनीतिक रूप से और अधिक संवेदनशील और चर्चित हो गया है। इस वार्ड में भाजपा के मनजींदर सिंह, शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के अमित कुमार और कांग्रेस के जगदीप सिंह शेरगिल भी चुनावी मैदान में हैं, जिससे यहां मुकाबला बहुकोणीय बन गया है और हर दल अपनी जीत के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है। पूरे मोहाली शहर में चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं और हर वार्ड में उम्मीदवार डोर टू डोर प्रचार में जुटे हैं। विकास कार्य, सफाई व्यवस्था, सड़कें, पानी और बुनियादी सुविधाएं इस चुनाव के प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं। राजनीतिक दल मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए लगातार जनसभाएं और जनसंपर्क अभियान चला रहे हैं।