samacharsecretary.com

बिहार की हाई-प्रोफाइल सीट पर पीके की एंट्री से मुकाबला हुआ और दिलचस्प

 पटना  बिहार की सबसे चर्चित विधानसभा सीटों में शामिल बांकीपुर पर होने वाले उपचुनाव में अब मुकाबला और दिलचस्प हो गया है। जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर खुद चुनावी मैदान में उतरेंगे। रविवार को पार्टी की कोर कमेटी की बैठक में उनके नाम पर औपचारिक मुहर लगा दी गई। कोर कमेटी की बैठक में हुआ पीके पर फैसला इसके बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में पार्टी नेताओं ने प्रशांत किशोर को बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के लिए जन सुराज का आधिकारिक प्रत्याशी घोषित किया। प्रशांत किशोर के चुनाव लड़ने की चर्चा पिछले कई दिनों से राजनीतिक गलियारों में थी, लेकिन अब पार्टी के औपचारिक एलान के साथ इस पर विराम लग गया है। जन सुराज इसे केवल एक उपचुनाव नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक ताकत और वैकल्पिक राजनीति की परीक्षा के रूप में देख रही है। पांच बार से लगातार जीतते रहे हैं न‍ित‍िन नवीन बांकीपुर विधानसभा सीट लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ मानी जाती रही है। इस सीट का प्रतिनिधित्व लगातार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन करते रहे हैं। उनके इस्तीफे के बाद यह सीट खाली हुई, जिस पर अब उपचुनाव कराया जा रहा है। ऐसे में प्रशांत किशोर के मैदान में उतरने से चुनावी मुकाबला सीधे तौर पर हाई-प्रोफाइल बन गया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि प्रशांत किशोर के उम्मीदवार बनने से इस सीट पर चुनाव सिर्फ स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बिहार की भविष्य की राजनीति, जन सुराज के जनाधार और विपक्षी राजनीति की दिशा पर भी नजर रहेगी। तेज प्रताप की पार्टी ने भी ठोका है दावा तेज प्रताप यादव ने इस सीट पर वीणा मानवी को जेजेडी का उम्‍मीदवार बनाया है। बताया जा रहा है क‍ि महागठबंधन की ओर से पीके को समर्थन क‍िया जाएगा। भाजपा जहां अपनी परंपरागत पकड़ बनाए रखने की कोशिश करेगी, वहीं जन सुराज इस चुनाव को अपने संगठन और राजनीतिक अभियान की बड़ी परीक्षा के रूप में पेश करेगी। उल्लेखनीय है कि बांकीपुर विधानसभा सीट पर 30 जुलाई को मतदान होना है, जबकि 3 अगस्त को मतगणना होगी। अब सभी प्रमुख दलों की नजर इस हाई-प्रोफाइल मुकाबले पर टिकी हुई है।

भारत निर्वाचन आयोग का राष्ट्रीय सम्मेलन, मीडिया एवं संचार अधिकारियों को दिए गए अहम दिशा-निर्देश

भारत निर्वाचन आयोग द्वारा मीडिया एवं संचार अधिकारियों के लिए राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित नई दिल्ली स्थित आईआईआईडीईएम में आयोजित हुआ एक दिवसीय प्रशिक्षण एवं संवाद कार्यक्रम रायपुर भारत निर्वाचन आयोग द्वारा नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डेमोक्रेसी एंड इलेक्शन मैनेजमेंट (आईआईआईडीईएम) में मीडिया एवं संचार अधिकारियों के लिए दूसरे एक दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। तीन जुलाई शुक्रवार को आयोजित सम्मेलन में देश के 16 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के विभिन्न जिलों के मीडिया नोडल अधिकारी, सोशल मीडिया नोडल अधिकारी, जिला जनसंपर्क अधिकारी तथा राज्य जनसंपर्क विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों सहित 260 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया। छत्तीसगढ़ से सहायक मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी, अपर संचालक जनसंपर्क विभाग तथा प्रदेश के सभी 33 जिलों के जिला जनसंपर्क अधिकारी सम्मेलन में शामिल हुए।             सम्मेलन को संबोधित करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार ने कहा कि भारत निर्वाचन आयोग की प्रत्येक कार्यवाही संविधान, निर्वाचन संबंधी कानूनों तथा आयोग द्वारा समय-समय पर जारी पारदर्शी दिशा-निर्देशों के अनुरूप संचालित होती है। उन्होंने सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाली भ्रामक एवं फर्जी सूचनाओं के प्रति सतर्क रहने तथा तथ्यात्मक जानकारी के प्रभावी प्रसार के माध्यम से गलत सूचनाओं पर अंकुश लगाने में मीडिया एवं संचार अधिकारियों की सक्रिय भूमिका पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हाल के विधानसभा चुनावों में रिकॉर्ड मतदान प्रतिशत भारतीय मतदाताओं के निर्वाचन प्रणाली पर गहरे विश्वास का परिचायक है।             चुनाव आयुक्त डॉ. विवेक जोशी ने डिजिटल युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), डीपफेक तथा भ्रामक डिजिटल सामग्री से उत्पन्न चुनौतियों का उल्लेख करते हुए अधिकारियों से आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुरूप इनका प्रभावी ढंग से मुकाबला करने का आह्वान किया। उन्होंने चुनावी साक्षरता क्लबों के माध्यम से युवा मतदाताओं को निर्वाचन प्रक्रिया से जोड़ने पर भी विशेष जोर दिया।          सम्मेलन में निर्वाचन प्रक्रिया के विभिन्न चरणों से संबंधित संचार रणनीतियों, मतदाता सूची प्रबंधन, मतदान एवं मतगणना प्रक्रिया, ईसीआईनेट, संवैधानिक एवं विधिक प्रावधानों, मीडिया प्रबंधन, प्रेस विज्ञप्ति लेखन, सोशल मीडिया के प्रभावी उपयोग तथा भ्रामक सूचनाओं के प्रबंधन पर विस्तृत तकनीकी एवं व्यावहारिक सत्र आयोजित किए गए। प्रतिभागियों को समूहों में निर्वाचन प्रक्रिया का व्यवहारिक प्रदर्शन कराया गया तथा प्रदर्शनी एवं मीडिया कॉर्नर का अवलोकन भी कराया गया। कार्यक्रम के दौरान हाल ही में चुनाव संपन्न कराने वाले राज्यों के अधिकारियों ने निर्वाचन प्रबंधन एवं जनसंचार से जुड़े अपने अनुभव साझा किए तथा प्रभावी संचार की सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों पर चर्चा की। सम्मेलन का समापन प्रतिभागियों एवं भारत निर्वाचन आयोग के अधिकारियों के बीच प्रश्नोत्तर सत्र के साथ हुआ।

पटना की बांकीपुर सीट पर उपचुनाव का ऐलान, तेज प्रताप और जनसुराज ने उतारे उम्मीदवार

पटना  पटना के बांकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव को लेकर तारीख का ऐलान कर दिया गया है। चुनाव आयोग ने बताया है कि बांकीपुर विधानसभा सीट पर 30 जुलाई को मतदान होगा। गुरुवार को चुनाव आयोग ने तीन राज्यों की तीन सीटों के उपचुनावों की घोषणा की। इनमें बिहार के बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र का उपचुनाव 30 सितंबर 2025 को किए गए मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन के आधार पर होगा। यह सीट भाजपा के नीतिन नवीन के इस्तीफे के कारण खाली हुई है। आयोग के अनुसार 6 जुलाई को उपचुनाव की अधिसूचना जारी होगी और नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। 13 जुलाई तक नामांकन पत्र दाखिल होगा। 14 जुलाई को नामांकन पत्रों की जांच होगी। जबकि, 16 जुलाई तक नामांकन पत्र वापस लेने की अंतिम तिथि निर्धारित की गई है। 30 जुलाई को मतदान होगा और 3 अगस्त को मतगणना के बाद चुनाव परिणाम जारी कर दिया जाएगा। बांकीपुर विधानसभा सीट मुख्य तौर से बीजेपी और नितिन नवीन का अभेद किला माना जाता है। इस सीट से बीजेपी के मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन जीत का परचम लहराते आए हैं। नितिन नवीन अब राज्यसभा सांसद बन गए हैं लिहाजा उन्होंने यह सीट छोड़ दी थी। नितिन नवीन के सीट छोड़ने के बाद इस सीट पर अब उपचुनाव होंगे। पटना की एक अहम विधानसभा सीट कही जाने वाली बांकीपुर विधानसभा सीट पर दिलचस्प मुकाबला होने की उम्मीद है। तेज प्रताप यादव ने वीणा मानवी को बनाया है उम्मीदवार बिहार में जनशक्ति जनता दल अध्यक्ष तेज प्रताप यादव ने पटना की सामाजिक कार्यकर्ता वीणा मानवी को बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव के लिए अपनी पार्टी का उम्मीदवार घोषित किया है। जेजेडी पहली पार्टी है जिसने इस सीट पर कुछ दिनों पहले अपने उम्मीदवार का ऐलान किया था। पार्टी प्रत्याशी का ऐलान करते हुए तेजप्रताप यादव ने विश्वास जताया था कि उनकी नवगठित पार्टी कई दशकों से भाजपा का गढ़ रही इस सीट पर सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) को कड़ी चुनौती देगी। तेज प्रताप यादव ने कहा था कि वीणा मानवी एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र के लोगों के लिए लगातार काम करती रही हैं। वह आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने के साथ-साथ वैश्य समुदाय से भी आती हैं, जिस पर भाजपा हमेशा विशेष ध्यान देती रही है। जनसुराज भी मैदान में उतरने को तैयार इस सीट पर जनसुराज पार्टी भी ताल ठोकने के लिए बेकरार है। ऐसा कहा जा रहा है कि इस सीट पर जनसुराज पार्टी अपना उम्मीदवार उतारेगी। हालांकि, अटकलें तो यह भी हैं कि खुद प्रशांत किशोर इस सीट से अपनी किस्मत आजमा सकते हैं। प्रशांत किशोर बांकीपुर विधानसभा सीट को लेकर लगातार अपने बयानों से बीजेपी को घेर भी रहे हैं। एक बयान में प्रशांत किशोर ने यह भी दावा किया था कि इस सीट से बीजेपी को सिर्फ जनसुराज ही हरा सकती हैं। बता दें कि पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में नितिन नवीन ने लगातार पांचवीं बार इस सीट पर जीत दर्ज की थी। उन्होंने अपने निकटतम राजद प्रतिद्वंद्वी को लगभग 50 हजार मतों के बड़े अंतर से हराया था। अप्रैल में नितिन नवीन के सीट छोड़ने के बाद जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने घोषणा की थी कि उनकी पार्टी भाजपा से यह सीट छीनने के लिए पूरी ताकत लगाएगी। किशोर ने इसे राज्य की सम्राट चौधरी सरकार पर जनमत संग्रह जैसा बताया था। विधानसभा चुनाव में अपेक्षित सफलता नहीं मिलने के बाद संगठन को फिर से सक्रिय करने में जुटे किशोर ने यह भी कहा था कि यदि पार्टी के भीतर सहमति बनी तो वह स्वयं भी इस सीट से चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं। जब तेज प्रताप यादव से पूछा गया था कि क्या वह प्रशांत किशोर को अपनी पार्टी के लिए चुनौती मानते हैं, तो उन्होंने कहा था कि हर किसी का स्वागत है। सभी अपनी किस्मत आजमा सकते हैं। हम किसी को रोक नहीं रहे हैं।  

बार चुनाव लड़ना हुआ महंगा! भोपाल में नामांकन शुल्क में रिकॉर्ड बढ़ोतरी से वकीलों में नाराजगी

भोपाल  राजधानी भोपाल बार संघ चुनाव इस बार प्रत्याशियों के लिए बेहद खर्चीला साबित हो रहा है, क्योंकि विभिन्न पदों की नामांकन फीस में 42% से लेकर रिकार्ड 75% तक की भारी वृद्धि की गई है। इस बार के चुनाव में सबसे ज्यादा प्रतिशत वृद्धि (75%) सह-सचिव, कोषाध्यक्ष और पुस्तकालयाध्यक्ष के पदों पर देखी गई है, जिनकी फीस सीधे 20 हजार से बढ़ाकर 35 हजार रुपये कर दी गई है। वहीं सबसे बड़े यानी अध्यक्ष पद के लिए भी दो वर्ष पहले की तुलना में सीधे 42.85% (15,000 रुपये) का इजाफा किया गया है। फीस में की गई यह बेतहाशा बढ़ोतरी इस समय कोर्ट परिसर में उम्मीदवारों और वकीलों के बीच चर्चा और आक्रोश का सबसे बड़ा विषय बनी हुई है। आर्थिक रूप से कमजोर अधिवक्ताओं के लिए बड़ी चुनौती इस बढ़ोतरी पर वरिष्ठ अधिवक्ता प्रियनाथ पाठक ने गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि जिस प्रकार चुनाव लड़ने के लिए नामांकन शुल्क में 50 से 75 फीसदी तक की वृद्धि की गई है, उससे सबसे बड़ी दिक्कत यह आ रही है कि जो अधिवक्ता आर्थिक रूप से कमजोर हैं, उनके लिए अब चुनाव लड़ना बेहद मुश्किल काम हो गया है। इसके कारण कई योग्य उम्मीदवार चुनाव मैदान से दूर रहने को मजबूर हो रहे हैं। वहीं, सचिव पद (जिसमें 60% की वृद्धि हुई है) का चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी अनुराग दुबे ने भी इस बढ़ी हुई फीस पर कड़ी आपत्ति जताई है और इसे उम्मीदवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बताया है। नियमों को ताक पर रख उड़ाई जा रही आचार संहिता की धज्जियां चुनाव का प्रचार और जनसंपर्क कोर्ट परिसर में बहुत तेजी से चल रहा है, लेकिन इसके साथ ही चुनावी आचार संहिता के नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। नियमों के मुताबिक कोर्ट परिसर के भीतर किसी भी तरह के झंडे, बैनर या पोस्टर लगाने पर पूरी तरह प्रतिबंध है। इसके बावजूद, सख्त हिदायतों और पाबंदियों को ताक पर रखकर पूरे परिसर को प्रचार सामग्री से पाट दिया गया है। कोर्ट परिसर की दीवारों, खंभों और दरवाजों पर प्रत्याशियों के पोस्टर और झंडे साफ नजर आ रहे हैं, जिससे आचार संहिता का खुला उल्लंघन दिखाई दे रहा है। क्यों बढ़ानी पड़ी फीस? इस बार बारिश के मौसम को देखते हुए वाटरप्रूफ टेंट की व्यवस्था करनी होगी, जिसके कारण टेंट का खर्च काफी महंगा होने वाला है। इसके अलावा, समय के साथ स्टेशनरी की लागत भी बढ़ गई है। कुल मिलाकर विगत दो वर्षों में महंगाई में काफी ज्यादा इजाफा हुआ है, इसी व्यावहारिक कारण से इस बार नामांकन फीस में बढ़ोतरी करने का निर्णय लिया गया है।" वासु वासवानी, मुख्य चुनाव अधिकारी, भोपाल बार काउंसिल। विभिन्न पदों के लिए निर्धारित नामांकन फीस की तुलनात्मक तालिका पद का नाम -वर्तमान निर्धारित फीस -दो वर्ष पहले की फीस- सीधे हुई बढ़ोतरी -कुल प्रतिशत वृद्धि (%) अध्यक्ष- 50,000 रुपये -35,000 रुपये- 15,000 रुपये- 42.85% की वृद्धि उपाध्यक्ष- 45,000 रुपये -30,000 रुपये- 15,000 रुपये- 50.00% की वृद्धि सचिव- 40,000 रुपय -25,000 रुपये- 15,000 रुपये- 60.00% की वृद्धि सह-सचिव- 35,000 रुपये -20,000 रुपये- 15,000 रुपये- 75.00% की वृद्धि कोषाध्यक्ष- 35,000 रुपये -20,000 रुपये- 15,000 रुपये- 75.00% की वृद्धि पुस्तकालयाध्यक्ष-35,000 रुपये -20,000 रुपये- 15,000 रुपये- 75.00% की वृद्धि वरिष्ठ कार्यकारिणी सदस्य-15,000 रुपये- 10,000 रुपये- 5,000 रुपये- 50.00% की वृद्धि कनिष्ठ कार्यकारिणी सदस्य-7,500 रुपये- 5,000 रुपये- 2,500 रुपये- 50.00% की वृद्धि। 

राज्यसभा चुनाव में पोलिंग एजेंट की भूमिका अहम, क्रॉस वोटिंग रोकने पर नजर

रांची  झारखंड में दो सीटों के लिए निर्धारित राज्यसभा चुनाव में तीन उम्मीदवारों के होने से निगाहें 18 जून पर टिक गई हैं जिस दिन मतदान होना है। निर्वाची पदाधिकारी ने बुधवार को निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नथवाणी के नामांकन से संबंधित शिकायतों के बाद उसपर लगे होल्ड को वापस लेने का निर्णय सुनाकर सभी को चुनाव लड़ने का मौका दे दिया है। इस परिस्थिति में 18 जून को मतदान की तिथि पर सभी की निगाहें टिक गई हैं और इस दिन सबसे महत्वपूर्ण भूमिका में विभिन्न दलों के अधिकृत पोलिंग एजेंट होंगे। ऐसा इसलिए कि सभी विधायकों को मतदान के पूर्व अपनी पार्टी के पोलिंग एजेंट को भरा हुआ मतपत्र दिखाना है। पोलिंग एजेंट की भूमिका महत्वपूर्ण झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए झामुमो से बैद्यनाथ राम, कांग्रेस से प्रणव झा और निर्दलीय परिमल नथवाणी मैदान में हैं। ऐसे में अब पार्टियों के अधिकृत पोलिंग एजेंट की नियुक्ति और उसकी भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। सभी दलों के विधायकों को अपनी पार्टी के अधिकृत पोलिंग एजेंट को बैलेट पेपर दिखाने की बाध्यता है। बैलेट पेपर नहीं दिखाने की स्थिति में उनके मत को रद किया जा सकता है। यह व्यवस्था क्रास वोटिंग को रोकने के लिए है। यह भी पक्की बात है कि अगर क्रास वोटिंग के बाद भी वह विधायक अपना मतपत्र दिखाकर भर देता है तो उसका मत रद नहीं होगा। इस प्रविधान के कारण अब पोलिंग एजेंटों की नियुक्ति महत्वपूर्ण है। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि अगर किसी दल का विधायक और उसका पोलिंग एजेंट आपस में मिल जाते हैं तो क्रास वोटिंग करने वाले विधायक की पहचान करना मुश्किल है। झारखंड में इस तरह का प्रकरण पहले भी हो चुका है और लोग महीनों तक अनुमान ही लगाते रहे कि किस विधायक ने क्रॉस वोटिंग की और किस ने नहीं।

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव टले, 2027 के बाद वोटिंग कराने के पीछे क्या है रणनीति?

लखनऊ  उत्तर प्रदेश की 'गांव की सरकार' लखनऊ के गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है. यूपी के पंचायत चुनाव को 2027 विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा था, लेकिन योगी सरकार के फैसले के बाद सियासी सस्पेंस गहरा गया है. कार्यकाल समाप्त होने पर प्रधानों को ही ग्राम पंचायतों का प्रशासक नियुक्त करने के सरकार के निर्णय लिए जाने के बाद कहा जाने लगा है कि 2027 के बाद ही सूबे में पंचायत चुनाव हो सकेंगे।  योगी सरकार ने पंचायत चुनाव के लिए समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन का निर्णय लिए जाने के साथ ही पंचायत चुनाव की तस्वीर लगभग साफ हो गई थी. आयोग की सिफारिशें आने, सीटों का आरक्षण तय किए जाने और राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव संपन्न कराने की प्रक्रिया में ही नौ महीने से अधिक समय लगेंगे।  यूपी में जब आरक्षण की प्रक्रियाएं पूरी होंगी तो उस समय प्रदेश में विधानसभा चुनाव की सरगर्मी रहेगी. यही वजह है कि योगी सरकार ने सोमवार को ग्राम प्रधान के कार्यकाल खत्म होने से पहले ही उन्हें ही प्रशासक नियुक्त कर दिया है. इसके चलते ही माना जा रहा है कि यूपी में पंचायत चुनाव अब विधानसभा चुनाव के बाद ही हो सकेंगे।  योगी सरकार ने प्रधानों को बनाया प्रशासक उत्तर प्रदेश में साल 2021 में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव हुए थे, जिसमें 58,189 ग्राम प्रधान चुने गए थे. इन प्रधानों का कार्यकाल मंगलवार यानी 26 मई 2026 को समाप्त हो रहा था, लेकिन समय पर चुनाव नहीं होने के चलते योगी सरकार ने ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने का निर्णय लिया.  इस फैसले के बाद माना जा रहा है कि ब्लॉक प्रमुखों और जिला पंचायत अध्यक्षों को भी सरकार प्रशासक बनाने का निर्णय जल्द ही ले सकती है।   उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों को ही छह महीने के लिए प्रशासक बनाने का निर्णय पहली बार हुआ है, इससे पहले जब भी समय पर पंचायत चुनाव नहीं हो पाते थे, तो सहायक विकास अधिकारी को ग्राम पंचायत का प्रशासक बनाया जाता रहा है, लेकिन पहली बार ग्राम प्रधान को नियुक्त किया गया है. हालांकि प्रधान अब प्रशासक बनकर भी कोई नीतिगत निर्णय नहीं ले सकेंगे. विशेष स्थितियों में निर्णय के प्रस्ताव जिलाधिकारी उस पर स्वीकृति के बाद कर सकेंगे।  विधानसभा चुनाव के बाद ही पंचायत चुनाव ग्राम प्रधान के बाद बीडीसी, ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत सदस्य और जिला पंचायत अध्यक्ष को भी योगी सरकार प्रशासक नियुक्त कर सकती है, क्योंकि इनके भी कार्यकाल खत्म हो रहे हैं. यूपी में मौजूदा ग्राम पंचायतों का कार्यकाल मई से जुलाई 2026 के बीच खत्म हो रहा है. नियम के मुताबिक चुनाव हो जाने चाहिए थे, लेकिन योगी कैबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट के 'ट्रिपल टेस्ट' फॉर्मूले के तहत हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय समर्पित पिछड़ा वर्ग (OBC) आयोग के गठन को मंजूरी दे दी है, जो सूबे में आरक्षण का निर्धायण करेगी।  ओबीसी आयोग को उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों में रैपिड सर्वे कर पिछड़ों के सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक आंकड़ों की जांच करने के लिए 6 महीने का समय दिया गया है. इस तरहह नवंबर 2026 तक तो ओबीसी आयोग की रिपोर्ट आएगी. इसके बाद सीटों का नए सिरे से आरक्षण तय होगा और मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) को दुरुस्त किया जाएगा. जब ये पूरी प्रक्रिया खत्म होगी, तब तक साल 2026 बीत चुका होगा और दहलीज पर खड़ा होगा 2027 का यूपी विधानसभा चुनाव. ऐसे में विधानसभा चुनाव के बाद ही पंचायत चुनाव हो सकेंगे।  यूपी में पंचायत चुनाव की तैयारी कर रहे भावी प्रधानों, बीडीसी सदस्यों और जिला पंचायत अध्यक्ष पद के दावेदारों को बहुत बड़ा झटका लगा है. चर्चा थी कि साल 2026 के मध्य तक पंचायत चुनाव का बिगुल फूंक दिया जाएगा, लेकिन अब जो सियासी और कानूनी समीकरण बने हैं, उसने साफ कर दिया है कि यूपी में पंचायत चुनाव अब 2027 के विधानसभा चुनाव के बाद ही होंगे।  योगी सरकार ने क्यों कदम पीछे खींच लिए? योगी सरकार अगर समय रहते हुए पंचायत चुनाव करा सकती थी. लेकिन ओबीसी आयोग के गठन में देरी किए जाने के चलते मामला फंस गया. कोर्ट के हस्ताक्षेत्र के बाद ही योगी सरकार ने ओबीसी आयोग का गठन किया. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंचायत चुनाव को टालने के पीछे सिर्फ कानूनी पेच नहीं, बल्कि एक सोची-समझी सियासी रणनीति भी है।  मार्च 2027 में उत्तर प्रदेश में सत्ता का 'महामुकाबला' यानी विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में कोई भी राजनीतिक दल विधानसभा के फाइनल से ठीक पहले पंचायत चुनाव का भारी जोखिम नहीं उठाना चाहती है.  इसकी एक बड़ी वजह यह है कि पंचायत चुनाव के नतीजो को 2027 के चुनाव से जोड़ा जाता. साल 2021 के पंचायत चुनाव में बीजेपी को सपा से कड़ी टक्कर मिली थी और कई जिलों में निर्दलीयों का बोलबाला रहा था. योगी सरकार नहीं चाहती कि 2027 के मुख्य चुनाव से ऐन पहले किसी भी तरह का 'एंटी-इंकंबेंसी' या नकारात्मक संदेश जनता के बीच जाए।  पंचायत चुनाव किसी पार्टी के सिंबल पर कम और स्थानीय रसूख, परिवार और चेहरे पर ज्यादा लड़े जाते हैं. एक-एक सीट पर बीजेपी या सपा के कई-कई कार्यकर्ता ताल ठोक देते हैं., अगर विधानसभा चुनाव से ठीक पहले टिकट न मिलने पर कार्यकर्ता बागी हो गए, तो इसका सीधा नुकसान 2027 के मुख्य चुनाव में उठाना पड़ सकता है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने पहले ही पंचायत चुनाव लड़ने से मना कर दिया था।  बीजेपी और सपा में शह-मात का खेल योगी सरकार के इस कदम पर अब यूपी की सियासत गरमा गई है. मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा है कि बीजेपी को अपनी जमीन खिसकने का अहसास हो गया है, इसलिए वो ओबीसी आरक्षण और सर्वे के बहाने चुनाव को टाल रही है. सरकार के ही सहयोगी दलों (जैसे ओम प्रकाश राजभर और संजय निषाद) के बयानों से भी पहले ही यह संकेत मिल रहे थे कि बिना पूरी तैयारी के चुनाव कराना मुमकिन नहीं है।  उत्तर प्रदेश में अब 'गांव की सरकार' का फैसला, लखनऊ की 'बड़ी सरकार' बनने के बाद ही होगा. योगी सरकार ने बेहद चतुराई से कानूनी पेच का सहारा लेकर 2027 के सेमीफाइनल को टाल … Read more

पंजाब में वोटिंग का दिन! निकाय चुनाव के लिए सुरक्षा कड़ी, बूथों पर CCTV से निगरानी

चंडीगढ़  पंजाब में नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों के लिए आज  यानि मंगलवार को मतदान हो रहा । राज्य की 8 नगर निगमों, 75 नगर परिषदों और 21 नगर पंचायतों के लिए आज  वोट डाले जा रहे , जबकि चुनावी नतीजों की घोषणा 29 मई को होगी।  वहीं, इस बार बैलेट पेपर के माध्यम से वोटिंग होगी। 3977 बूथ हैं। 36 हजार मुलाजिम चुनावी प्रक्रिया में शामिल हैं। 35500 पुलिस मुलाजिम व होमगार्ड जवान तैनात किए गए हैं। जबकि, हर बूथ पर 5 मुलाजिम तैनात रहेंगे। आईएएस व पीसीएस अफसर जिलों में तैनात किए गए हैं। 36.72 लाख मतदाता डालेंगे वोट इस बार बठिंडा, अबोहर, बटाला, बरनाला, कपूरथला, मोगा, पठानकोट और मोहाली नगर निगम के चुनाव सभी राजनीतिक दलों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बने हुए हैं। विशेष बात यह है कि बरनाला नगर निगम के लिए पहली बार चुनाव करवाए जा रहे हैं। राज्य चुनाव आयोग के मुताबिक इस चुनाव में कुल 36,72,932 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकेंगे। इसमें 18 लाख 990 पुरुष, 7,73,716 महिलाएं और 226 अन्य हैं। आप से सबसे अधिक उम्मीदवार मैदान में बता दें, पंजाब भर के निकाय चुनावों की घोषणा के बाद 10,809 उम्मीदवारों ने शुरुआती नामांकन भरा था। जिसमें से 2393 उम्मीदवारों ने अपना नाम वापस ले लिया था। 79 उम्मीदवारों को निर्विरोध चुन लिया गया है। अब चुनाव के लिए 7555 उम्मीदवार मैदान में हैं। इनमें सबसे अधिक उम्मीदवार सत्तापक्ष आम आदमी पार्टी (आप) के चुनाव लड़ रहे हैं जिनकी संख्या 1801 हैं। दूसरे नंबर पर कांग्रेस के 1550, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के 1316, शिरोमणि अकाली दल के 1251, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के 96, 1528 निर्दलीय और 13 अन्य उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। निकाय चुनाव सभी दलों के लिए अहम हैं, क्योंकि इसे 2027 में विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है। सभी पोलिंग बूथों के अंदर और बाहर सीसीटीवी पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए राज्य के सभी पोलिंग बूथों के अंदर और बाहर सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं और उनकी रिकॉर्डिंग कम से कम एक वर्ष तक सुरक्षित रखी जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी भी स्थिति में संबंधित फुटेज को बिना अनुमति नष्ट नहीं किया जाएगा। जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस दीपक मंचंदा की खंडपीठ ने नगर निकाय चुनावों से जुड़ी विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान ये निर्देश जारी किए। 26 मई को पंजाब में सरकारी छुट्टी का एलान पंजाब सरकार ने स्थानीय निकाय चुनावों के मद्देनजर सुचारू मतदान सुनिश्चित करने के लिए 26 मई को राज्य में सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है। इस दौरान चंडीगढ़ सहित पंजाब सरकार के सभी सरकारी दफ्तर, बोर्ड, कॉर्पोरेशन, शैक्षणिक संस्थान और अन्य सरकारी प्रतिष्ठान इस दिन बंद रहेंगे। इसके अलावा, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने भी अपने सभी अधिकारियों व कर्मचारियों के लिए 26 मई को विशेष आकस्मिक अवकाश की घोषणा की है। 5-6 दिन में ही निपटा प्रचार आगामी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले इन स्थानीय निकाय चुनावों को शहरी मतदाताओं के राजनीतिक मिजाज का लिटमस टेस्ट माना जा रहा है। बता दें, पंजाब राज्य चुनाव आयोग ने 11 मई को इन चुनावों का एलान किया था। 19 मई को नामांकन वापस लेने की प्रक्रिया के बाद उम्मीदवारों को प्रचार के लिए केवल 5-6 दिनों का ही समय मिल सका। जिसमें उम्मीदवारों ही नहीं, राजनीतिक पार्टियों के धुरंधरों नें इसमें पूरी ताकत झोंक दी। विधायकों मंत्रियों की परफॉर्मेंस का रिपोर्ट कार्ड होंगे नतीजे बता दें, सत्तारूढ़ 'आप' के विधायकों और मंत्रियों ने आज प्रचार में अपनी पूरी ताकत लगा दी, क्योंकि इन चुनावों के नतीजे उनकी परफॉर्मेंस का रिपोर्ट कार्ड तय करेंगे। इसके साथ ही, इन चुनावों से भाजपा का ग्राफ भी साफ हो जाएगा, जो इस बार काफी आक्रामक तरीके से चुनावी मैदान में उतरी है। राज्य चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार, पोलिंग स्टेशनों के आसपास किसी भी तरह की प्रचार सामग्री प्रदर्शित करने पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। अकाली दल ने की मतदान का समय बढ़ाने की मांग शिरोमणि अकाली दल ने राज्य चुनाव आयोग से मतदान का समय बढ़ाने की मांग की है। अकाली नेता डॉ. दलजीत सिंह चीमा ने कहा कि मतदान का समय सुबह 8 से 5 बजे की जगह सुबह 7 से शाम 6 बजे तक बढ़ाया जाना चाहिए। चीमा ने कहा कि प्रदेश में इस समय भीषण गर्मी का प्रकोप है जिसका असर मतदान प्रतिशत पर पड़ सकता है। अगर सुबह और शाम के चलते मतदान का समय दो घंटे बढ़ा दिया जाए तो उससे मतदान प्रतिशत में वृद्धि होगी। मौजूदा समय मजदूरों के लिए भी उपयुक्त नहीं है क्योंकि वो काम के कारण अपने मताधिकार का उपयोग नहीं कर पाएंगे।  

नामांकन रद्द होने से बदला चुनावी गणित, पंजाब निकाय चुनाव में BJP की रणनीति पर नजर

चंडीगढ़  पंजाब के निकाय चुनाव में कई सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला है तो कई में आमने-सामने की सीधी टक्कर है। इसकी दो बड़ी वजह सामने आ रही हैं एक तो कई वार्डों में कुछ प्रत्याशियों के प्रचार में धार नहीं दिख रही और दूसरी, कई जगह मुख्य पार्टियों के प्रत्याशी ही मैदान से बाहर हैं। आठ नगर निगमों और 97 नगर परिषदों व नगर पंचायतों की बात करें तो आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी तो लगभग सभी सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं मगर भाजपा, शिरोमणि अकाली दल (शिअद) और कांग्रेस जैसे मुख्य सियासी दलों के प्रत्याशी मैदान से बाहर हैं।  शिअद के अध्यक्ष सुखबीर बादल, भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सुनील जाखड़ और पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग आरोप लगाते हैं कि यह स्थिति इसलिए बनी है क्योंकि कई वार्डों में जानबूझकर उनके मजबूत प्रत्याशियों के नामांकन पत्र रद्द कर दिए गए हैं। ऐसा करने का कोई मजबूत आधार भी नहीं बताया जा रहा है। कई प्रत्याशी अपना दुखड़ा लेकर राज्य चुनाव आयोग तक भी पहुंचे थे जिनकी शिकायतें संबंधित जिलों के जिला निर्वाचन अधिकारियों को आगामी कार्रवाई के लिए भेज दी गई हैं। उधर, बहुत से वॉर्डों में सिर्फ दो ही प्रत्याशी हैं जबकि बठिंडा नगर निगम के वॉर्ड नंबर 30 और सुनाम नगर परिषद का वॉर्ड नंबर 15, ये दो वॉर्ड ऐसे हैं जहां 10-10 प्रत्याशी चुनावी मैदान में हैं। आठ नगर निगमों में प्रत्याशियों की स्थिति 105 नगर निकायों में से आठ नगर निगमों के चुनाव सभी दलों के लिए बड़ी प्रतिष्ठा का सवाल हैं क्योंकि इन निगमों के अंतर्गत बड़ा शहरी क्षेत्र आता है। सभी नगर निगमों में 50-50 वार्ड हैं मगर बहुत वार्डों में मुख्य सियासी दलों के प्रत्याशी ही चुनाव रण से बाहर हैं जबकि आप के प्रत्याशी करीबन हर सीट पर चुनाव लड़ रहे हैं। बरनाला नगर निगम में भाजपा के 26 प्रत्याशी, कांग्रेस के 36 और शिअद के 27 प्रत्याशी, बठिंडा नगर निगम में भाजपा के 42, कांग्रेस के 43 और शिअद के 46 प्रत्याशी, अबोहर नगर निगम में भाजपा के 49, कांग्रेस के 31 और शिअद के 33 प्रत्याशी, बटाला नगर निगम में भाजपा के 22, कांग्रेस के 48 और शिअद के 21 प्रत्याशी, बरनाला नगर निगम में भाजपा व शिअद के 27-27 प्रत्याशी और कांग्रेस के 39 प्रत्याशी, कपूरथला नगर निगम में भाजपा के 33, कांग्रेस के 50, शिअद के 23 प्रत्याशी, मोगा नगर निगम में भाजपा के 40, कांग्रेस के 48 व शिअद के 38 प्रत्याशी और पठानकोट नगर निगम में भाजपा-कांग्रेस के 50-50 जबकि शिअद के 30 प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा केंद्रीय योजनाओं के गणित के सहारे भाजपा ने हर नगर निकाय की अलग-अलग रणनीति खास ढंग से बनाई है। भाजपा जानती है कि पंजाब में उनकी सरकार नहीं है लिहाजा पार्टी ने केंद्रीय योजनाओं के गणित के आधार पर अपना होमवर्क किया है। भाजपा ने हर नगर निकाय के लिए हजारों परचे छपवाए हैं जिसमें यह बताया गया है कि संबंधित वार्ड में स्वच्छ भारत मिशन शहरी, अमरूत योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, प्रधानमंत्री मानधन श्रम योगी योजना, एक राष्ट्र एक राशन कार्ड योजना व प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत कितने लोगों को लाभ मिला है। यह भी बताया गया है कि इन योजनाओं में साल 2015-16 से साल 2025-26 तक कितने करोड़ संबंधित नगर निकाय के लिए केंद्र सरकार की ओर से पहुंचे। इसके अतिरिक्त मतदाताओं को यह भी बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने अपने 11 साल के कार्यकाल में पंथक, पंजाब व पंजाबियों से जुड़े क्या-क्या बड़े काम किए हैं। इसमें साल 1984 के दंगा पीड़ितों को इंसाफ दिलवाने का भी जिक्र है।  

थमा चुनाव प्रचार, अब वोटिंग की बारी! पंजाब के 105 निकायों में कल डाले जाएंगे वोट

चंडीगढ़  पंजाब के 105 नगर निकायों के लिए 26 मई को मतदान होगा और 29 मई को मतगणना के बाद नतीजे घोषित किए जाएंगे। रविवार को चुनावी शोर थम गया और अब रैलियों व सभाओं पर पाबंदी रहेगी और उम्मीदवार घर-घर जाकर प्रचार करेंगे। आज पोलिंग पार्टियां रवाना होंगी। पंजाब के आठ नगर निगमों, 76 नगर परिषदों और 21 नगर पंचायतों की सीटों के लिए यह चुनाव हो रहे हैं। चुनाव के लिए 7555 उम्मीदवार मैदान में हैं क्योंकि 79 उम्मीदवारों को निर्विरोध चुन लिया गया है। 2393 उम्मीदवारों ने अपना नाम वापस ले लिया था। इनमें सबसे अधिक उम्मीदवार सत्तापक्ष आम आदमी पार्टी (आप) के चुनाव लड़ रहे हैं जिनकी संख्या 1801 हैं। दूसरे नंबर पर कांग्रेस के 1550, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के 1316, शिरोमणि अकाली दल के 1251, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के 96, 1528 निर्दलीय और 13 अन्य उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। निकाय चुनाव सभी दलों के लिए अहम हैं, क्योंकि इसे 2027 में विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है। अकाली दल ने की मतदान का समय बढ़ाने की मांग  शिरोमणि अकाली दल ने राज्य चुनाव आयोग से मतदान का समय बढ़ाने की मांग की है। अकाली नेता डॉ. दलजीत सिंह चीमा ने कहा कि मतदान का समय सुबह 8 से 5 बजे की जगह सुबह 7 से शाम 6 बजे तक बढ़ाया जाना चाहिए। चीमा ने कहा कि प्रदेश में इस समय भीषण गर्मी का प्रकोप है जिसका असर मतदान प्रतिशत पर पड़ सकता है। अगर सुबह और शाम के चलते मतदान का समय दो घंटे बढ़ा दिया जाए तो उससे मतदान प्रतिशत में वृद्धि होगी। मौजूदा समय मजदूरों के लिए भी उपयुक्त नहीं है क्योंकि वो काम के कारण अपने मताधिकार का उपयोग नहीं कर पाएंगे।  

राज्यसभा सीटों पर बीजेपी की रणनीति तैयार, नए चेहरों को मिल सकता है मौका

भोपाल  केंद्रीय चुनाव आयोग ने राज्यसभा चुनाव का कार्यक्रम जारी कर मध्यप्रदेश की तीन सीटों में होने वाले चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी बढ़ा दी है। प्रदेश में तीन सदस्यों का कार्यकाल पूरा हो रहा है। इनमें भाजपा से सांसद और केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन और सुमेर सिंह सोलंकी है। कांग्रेस से दिग्विजय सिंह हैं। उनका कार्यकाल 21 जून को समाप्त हो रहा है। नए उम्मीदवारों के चयन को लेकर भाजपा में मंथन शुरू हो गया है। बीजेपी सूत्रों के अनुसार पार्टी में नए चेहरे पर विचार किया जा रहा है। अंतिम चर्चा के बाद उम्मीदवारों के नाम बंद लिफाफे में केंद्रीय समिति को भेजे जाएंगे। कांग्रेस की एक सीट पर भाजपा किसी डमी प्रत्याशी को समर्थन दे सकती है भाजपा राज्यसभा चुनाव के बहाने कांग्रेस की थाह भी नाप सकती है। चर्चा है कि कांग्रेस की एक सीट पर भाजपा किसी डमी प्रत्याशी को समर्थन दे सकती है। हाल ही में वर्चुअली बैठक भी बुलाई गई थी। शुरुआती चर्चा पूरी हो गई है। राज्यसभा का चुनाव कार्यक्रम जारी होने के बाद पार्टी द्वारा दिल्ली से मार्गदर्शन मांगकर पार्टी मुख्यालय में बीजेपी कोर ग्रुप की बैठक बुलाई जाएगी। केंद्रीय मंत्री कुरियन केरल में कांजिरापल्ली सीट से चुनाव लड़े थे, चुनाव हारने के कारण बदले समीकरण केंद्रीय मंत्री कुरियन केरल में कांजिरापल्ली सीट से चुनाव लड़े थे, लेकिन हार गए। ऐसे में माना जा रहा है कि भाजपा दोबारा उन्हें मप्र से उच्च सदन में भेजने पर विचार कर रही है। वजह यह भी है कि वे केंद्र में मत्स्य पालन, पशुपालन, डेयरी और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री हैं। जमीनी कार्यकर्ताओं में शुमार हैं। यदि मध्यप्रदेश मूल के व्यक्ति को भेजने की बात का मुद्दा उठा तो तस्वीर बदल सकती है। सुमेर सिंह की संघ में अच्छी पकड़ लेकिन उनके नाम पर संशय के बादल इतिहास के प्रोफेसर से राज्यसभा तक का सफर तय करने वाले बड़वानी के डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी की जगह पार्टी किसी अन्य युवा चेहरे पर विचार कर सकती है। शीर्ष नेताओं का मानना है कि भाजपा के पास कई अन्य चेहरे हैं जिन्हें अवसर मिलना चाहिए। राजनैतिक जीवन का पहला चुनाव ही राज्यसभा का लड़ा, सुमेर सिंह को प्रदेश में बीजेपी के आदिवासी चेहरे के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है हालांकि यह काम इतना आसान भी नहीं है। सांसद सुमेर सिंह की संघ में अच्छी पकड़ मानी जाती है। उन्होंने अपने राजनैतिक जीवन का पहला चुनाव ही राज्यसभा का लड़ा था। सुमेर सिंह को प्रदेश में बीजेपी के आदिवासी चेहरे के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता रहा है।