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चुनाव नतीजों के चार महीने बाद राजनीतिक दलों ने दिया खर्च का ब्यौरा चुनाव आयोग को

पटना बिहार विधानसभा चुनाव 2025 जीतने के लिए बीजेपी ने सभी पार्टियों से ज्यादा खर्च किया है. बीजेपी ने 146.71 करोड़ रुपये खर्च किए हैं तो कांग्रेस ने कुल 35.07 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. बीजेपी ने जमा पूंजी का 2 फीसदी खर्च किया तो कांग्रेस ने अपनी कुल जमा पूंजी का 28 फीसदी पैसा खर्च कर दिया है।  बीजेपी ने पिछले बिहार विधानसभा चुनाव की तुलना में इस बार तीन से ज्यादा पैसा चुनाव प्रचार पर खत्म किया है. 2020 में बीजेपी ने करीब 54 करोड़ रुपये खर्च किए थे, लेकिन इस बार 146.71 करोड़ रुपये खर्च किए हैं।   बिहार में बीजेपी का खर्च करना इस बार कामयाब रहा और राज्य में 89 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. वहीं, दूसरी तरफ कांग्रेस ने बीजेपी की तुलना में भले ही पैसा कम खर्च किया हो, लेकिन अपनी जमा पूजी का बहुत बड़ा हिस्सा बिहार में खर्च कर दिया है।  बिहार चुनाव में किस पार्टी ने कितना खर्च किया चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बाद अपने खर्च की हिसाब देती हैं. इसी मद्देनजर बिहार चुनाव में खर्च किए पैसे का लेखा-जोखा सियासी दलों ने चुनाव आयोग को दिए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी ने बिहार चुनाव खर्च की रिपोर्ट 10 फरवरी को चुनाव आयोग को सौंपी है, जिसमें पार्टी ने बताया है कि उसने 146.71 करोड़ रुपये खर्च किए हैं।  वहीं, बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने कुल 35 करोड़ रुपये खर्च किए हैं तो सीपीआई (एम) ने महज 26.75 लाख रुपये खर्च किए हैं. बहुजन समाज पार्टी ने बिहार चुनाव में सिर्फ 9.01 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. आरजेडी और जेडीयू सहित दूसरे दलों के खर्च का लेखा-जोखा अभी चुनाव आयोग को उपलब्ध नहीं कराया गया है, जिसके चलते उन्होंने कितना खर्च किया है, उसका आंकड़ा पता नहीं चल सका।  बीजेपी और कांग्रेस ने कहां कितना पैसा खर्च किया बिहार चुनाव में बीजेपी ने 146 करोड़ रुपये जो खर्च किए हैं, उसमें 117 करोड़ रुपये सियासी माहौल बनाने के लिए प्रचार और स्टार कैंपेनर के ट्रैवेल पर खर्च किए हैं. बीजेपी ने चुनाव प्रचार और विज्ञापन पर 43.53 करोड़ रुपये खर्च किए तो स्टार कैंपेनर्स की यात्रा पर 37.28 करोड़ रुपये खर्च किए और साथ में दूसरे नेताओं के यात्रा पर 4.44 करोड़ रुपये खर्च किए गए।  बीजेपी ने चुनाव प्रचार के विज्ञापन पर खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा गूगल इंडिया लिमिटेड पर किया, जिसे पार्टी ने 14.27 करोड़ रुपये दिए. इसके अलावा बीजेपी ने अपने उम्मीदवारों पर 29.71 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, जिसमें पार्टी ने उन्हें चुनाव लड़ने के लिए आर्थिक मदद के तौर पर देखा जाता है।  कांग्रेस ने बिहार चुनाव में खर्च किए गए 35 करोड़ रुपये में से 12.83 करोड़ रुपये स्टार कैंपेनर्स की यात्रा पर लगे. इसके अलावा कांग्रेस ने सोशल मीडिया कैंपने के लिए 11.24 करोड़ रुपये खर्च किए। इसके अलावा लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की बिहार में निकाली गई वोटर अधिकार यात्रा पर भी खर्च किए।    बीजेपी ने जमापूंजी का 2% खर्चा तो कांग्रेस ने 28% रिपोर्ट से पता चलता है कि पिछले साल नवंबर में बिहार चुनाव खत्म होने पर बीजेपी का क्लोजिंग बैलेंस 7,088.58 करोड़ रुपये था. इसके मुताबिक चुनाव से पूर्व बीजेपी के पास 7235.26 करोड़ रुपये था, जिसमें से 146.71 करोड़ खर्च किया गया. इसके बाद 7,088.58 करोड़ रुपये बचे थे. इस तरह बीजेपी ने अपनी जमापूंजी का करीब 2 फीसदी पैसा ही बिहार चुनाव में खर्च किया है।  वहीं, कांग्रेस के पास बिहार चुनाव के बाद कुल 89.13 करोड़ रुपये बचे थे. कांग्रेस ने चुनाव में 35.07 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. इस लिहाज से कांग्रेस के चुनाव से पहले 124.2 करोड़ रुपये था, जिसमें से 35.07 करोड़ रुपये खर्च करने का मतलब साफ है कि पार्टी ने अपनी जमापूंजी का 28.23 फीसदी पैसा बिहार चुनाव में खर्च किया।  कांग्रेस-बीजेपी का एक विधायक पर कितना खर्च बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने सबसे ज्यादा 89 विधायक जीतने में सफल रही जबकि कांग्रेस को महज 6 सीटें मिली हैं. बिहार चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के द्वारा खर्च किए गए पैसे को विधायकों की संख्या के लिहाज से देखें तो बीजेपी को एक विधायक 1 करोड़ 64 लाख का पड़ा. कांग्रेस के सिर्फ 6 विधायक जीते हैं, ऐसे में कांग्रेस को एक विधायक 5 करोड़ 83 लाख का पड़ा.  2020 के चुनाव की तुलना में तीन गुना खर्च किया बिहार के पिछले यानी 2020 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने कुल 54.72 करोड़ रुपये खर्च किए थे, जिसमें से लगभग 28.02 करोड़ रुपये बिहार राज्य इकाई द्वारा और 26.69 करोड़ रुपये केंद्रीय मुख्यालय द्वारा खर्च किए गए थे. बीजेपी इस चुनाव में सबसे अधिक खर्च करने वाली पार्टी थी।  वहीं, 2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने कुल 12.35 करोड़ रुपये खर्च किए थे, इसमें से बड़ा हिस्सा 11.69 करोड़ रुपये दिल्ली केंद्रीय मुख्यालय से आया था, जबकि राज्य इकाई का खर्च काफी कम दिखाया गया है. इस हिसाब से देखें तो इस बार कांग्रेस और बीजेपी तीन गुना पैसा चुनाव कैंपेन पर खर्च किया है। 

झारखंड की 8 नगर परिषदों और 9 नगर पंचायतों में निर्दलीयों का दबदबा, भाजपा और झामुमो ने दर्ज की जीत

रांची  झारखंड की नगर परिषदों और नगर पंचायतों के चुनाव परिणामों में छोटे शहरी क्षेत्रों के स्थानीय मुद्दे और व्यक्तिगत छवि निर्णायक भूमिका में नजर आई. कई जगहों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने प्रमुख दलों को कड़ी टक्कर देते हुए अपना दमखम दिखाया. वहीं, कुछ इलाकों में भाजपा और झामुमो के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिला. इसके अलावा, दूसरे दलों की उपस्थिति सीमित रही. एनडीए और इंडिया गठबंधन में शामिल आजसू और राजद समर्थित किसी प्रत्याशी के जीतने की जानकारी नहीं है. झारखंड के 17 नगर अध्यक्ष पद पर निर्दलीयों का कब्जा झारखंड के 39 छोटे में से 17 शहरों के नगर अध्यक्ष पद पर ऐसे प्रत्याशियों ने जीत हासिल की है, जिनको किसी दल का समर्थन मिला. वहीं, भाजपा समर्थित कुल 11 प्रत्याशियों को जीत मिली है, जबकि झामुमो समर्थित नौ प्रत्याशी जीतने में सफल रहे हैं. दो प्रत्याशी कांग्रेस और एक प्रत्याशी माले समर्थित है. भाजपा ने संतुलित उपस्थिति दर्ज कराई इस बार शहरी मतदाताओं ने स्थानीय मुद्दों जैसे सड़क, जलापूर्ति, स्वच्छता, प्रकाश व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही को प्राथमिकता दी है. स्थानीय स्तर पर सक्रियता और व्यक्तिगत संपर्क बनाए रखनेवाले प्रत्याशियों को बिना किसी दल के समर्थन के भी लाभ मिला. भाजपा और झामुमो ने अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों में संगठनात्मक मजबूती के दम पर प्रदर्शन किया. झामुमो का संताल और कोल्हान क्षेत्र में प्रभाव कायम दिखा, जबकि भाजपा ने विभिन्न जिलों में संतुलित उपस्थिति दर्ज कराई. आठ नगर पंचायतों के विजेताओं को समर्थन नहीं नगर परिषद और नगर पंचायतों के परिणाम को अलग-अलग देखा जाए, तो कुल 20 परिषदों में से पांच पर झामुमो, चार पर भाजपा, दो पर कांग्रेस और नौ पर ऐसे प्रत्याशियों को जीत मिली है, जिन्हें किसी भी दल का समर्थन नहीं मिला. वहीं, राज्य की 19 नगर पंचायतों में से छह पर भाजपा, चार पर झामुमो और एक पर माले समर्थित उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है. आठ नगर पंचायतों पर ऐसे प्रत्याशियों ने कब्जा जमाया, जिन्हें किसी भी दल से समर्थन नहीं था. नगर पंचायतों में कांग्रेस समर्थित एक भी प्रत्याशी जीत का स्वाद नहीं चख सका. 9 नगर पंचायत और 8 नगर परिषदों में निर्दलीयों की जीत     हुसैनाबाद नगर पंचायत: अजय भारती     हरिहरगंज नगर पंचायत: कुमारी शीला चौधरी     छत्तरपुर नगर पंचायत: अरविंद गुप्ता     श्री बंशीधरनगर नगर पंचायत: साधना देवी     मझिआंव नगर पंचायत: सुमित्रा देवी     लातेहार नगर पंचायत: महेश सिंह     कोडरमा नगर पंचायत: साजिद हुसैन लल्लू     बासुकीनाथ नगर पंचायत: वीणा देवी     जामताड़ा नगर पंचायत: आशा गुप्ता     गढ़वा नगर परिषद: आशीष सोनी उर्फ दौलत सोनी     विश्रामपुर नगर परिषद: गीता देवी     चतरा नगर परिषद: अताउर रहमान     झुमरीतिलैया नगर परिषद: रमेश हर्षधर     गोड्डा नगर परिषद: सुशील रमानी     पाकुड़ नगर परिषद: शबरी पाल     चिरकुंडा नगर परिषद: सुनीता देवी     कपाली नगर परिषद: परवेज आलम     सिमडेगा नगर परिषद: ओलिवर लकड़ा 7 नगर पंचायत और 4 नगर परिषदों में भाजपा के अध्यक्ष     डोमचांच नगर पंचायत: उमेश वर्मा     बड़कीसरैया नगर पंचायत: शोभा देवी     लातेहार नगर पंचायत: महेश सिंह     राजमहल नगर पंचायत: केताबुद्दीन     महागामा नगर पंचायत: प्रबोध सोरेन     बरहरवा नगर पंचायत: अर्पिता दास     खूंटी नगर पंचायत: रानी टूटी     मिहिजाम नगर परिषद: जयश्री देवी     मधुपुर नगर परिषद: मिती कुमारी     लोहरदगा नगर परिषद: अनिल उरांव     गुमला नगर परिषद: शकुंतला उरांव 4 नगर पंचायत और 5 नगर परिषद में झामुमो के अध्यक्ष     बुंडू नगर पंचायत: जीतेंद्र उरांव     राजमहल नगर पंचायत: केताबुद्दीन     सरायकेला नगर पंचायत: मनोज कुमार चौधरी     चाकुलिया नगर पंचायत: सोमवारी सोरेन     साहिबगंज नगर परिषद: रामनाथ पासवान     दुमका नगर परिषद: अभिषेक चौरसिया     चकधरपुर नगर परिषद: शनि उरांव     चाईबासा नगर परिषद: नितिन प्रकाश     जुगसलाई नगर परिषद: नौशान खान कांग्रेस और माले समर्थित प्रत्याशी     फुसरो नगर परिषद: निर्मला देवी (कांग्रेस)     रामगढ़ नगर परिषद: कुसुमलता कुमारी (कांग्रेस)     धनवार नगर पंचायत: विनय कुमार संथालिया (माले)  

चुनाव के टिकट का ऐलान, 4 उम्मीदवारों का नाम तय; जानिए कोयल मल्लिक की राजनीति में एंट्री

कलकत्ता  पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने आगामी राज्यसभा चुनावों के लिए अपने चार उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर दी है। इस सूची में राजनीति, प्रशासनिक सेवा, कानून और सिनेमा जगत की जानी-मानी हस्तियों को जगह दी गई है। पार्टी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर जानकारी देते हुए बताया कि पूर्व डीजीपी राजीव कुमार, अभिनेता से नेता बने बाबुल सुप्रियो, मशहूर वकील मेनका गुरुस्वामी और बंगाली अभिनेत्री कोयल मल्लिक को संसद के उच्च सदन के लिए चुना गया है। यह घोषणा राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों से ठीक पहले की गई है, जिसे ममता बनर्जी का एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। कौन हैं TMC के ये 4 दिग्गज उम्मीदवार? पार्टी ने अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों को चुनकर एक संतुलित टीम बनाने की कोशिश की है: राजीव कुमार: राजीव कुमार बंगाल के प्रभावशाली पुलिस अधिकारी रहे हैं। उन्होंने जुलाई 2024 से लेकर 31 जनवरी 2026 को अपनी सेवानिवृत्ति तक राज्य के पुलिस महानिदेशक के रूप में कार्य किया। उनके प्रशासनिक अनुभव का लाभ पार्टी को दिल्ली में मिलेगा। बाबुल सुप्रियो: पूर्व केंद्रीय मंत्री और मशहूर गायक बाबुल सुप्रियो पहले भाजपा में थे, लेकिन बाद में उन्होंने TMC का दामन थाम लिया था। वे अपनी प्रखर वक्ता शैली के लिए जाने जाते हैं। कोयल मल्लिक: बंगाली सिनेमा की मशहूर अभिनेत्री कोयल मल्लिक को उम्मीदवार बनाकर TMC ने ग्लैमर और जन-अपील का कार्ड खेला है। उनके पिता रंजीत मल्लिक भी बंगाल के दिग्गज अभिनेता रहे हैं। मेनका गुरुस्वामी: सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने IPAC मामले में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का प्रतिनिधित्व किया था। उनकी कानूनी समझ संसद में पार्टी के पक्ष को मजबूती देगी। विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा संदेश TMC ने अपने उम्मीदवारों को बधाई देते हुए कहा है कि उन्हें इन नेताओं की नेतृत्व क्षमता और समर्पण पर पूरा भरोसा है। पार्टी ने उम्मीद जताई है कि ये चारों उम्मीदवार हर भारतीय के अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए TMC की विरासत को आगे बढ़ाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव से ठीक पहले इन नामों का चयन करके ममता बनर्जी ने यह संदेश दिया है कि उनकी पार्टी हर वर्ग प्रशासन, कला और कानून के बुद्धिजीवियों को साथ लेकर चलने में विश्वास रखती है।

राजस्थान में अब 3 से अधिक संतान वाले भी लड़ सकेंगे पंचायत चुनाव

जयपुर. राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनाव से पहले बड़ा बदलाव किया गया है। भजनलाल सरकार ने पंचायत और निकाय चुनाव लड़ने की योग्यता में बड़ा बदलाव किया है। इसके तहत अब राज्य में दो से अधिक संतान वाले भी स्थानीय चुनाव लड़ सकेंगे। यानी अब दो से ज्यादा बच्चे वाले भी सरपंच और पार्षद बन सकेंगे। उपमुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा, उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री राज्यवर्धन राठौड़ और संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल का कहना है कि दो से अधिक संतान होने पर चुनाव लड़ने का प्रतिबंध उस समय लागू किया गया था, जब जनसंख्या विस्फोट पर प्रभावी नियंत्रण की आवश्यकता थी। वर्ष 1991-94 के बीच प्रजनन दर 3.6 थी, जो वर्तमान में घटकर 2 रह गई है। ऐसे में इन प्रावधानों का प्रत्यक्ष प्रभाव अब कम होता जा रहा है। ऐसे में भजनलाल सरकार ने अब राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 की धारा-19 और राजस्थान नगरपालिका अधिनियम 2009 की धारा-24 में संशोधन करने का निर्णय लिया है। वर्तमान सत्र में ही पारित होंगे दोनों विधेयक कानून मंत्री जोगाराम पटेल ने बताया कि कैबिनेट ने राजस्थान पंचायतीराज संशोधन बिल और राजस्थान नगरपालिका संशोधन बिल 2026 को मंजूरी दे दी है। इन संशोधनों के लागू होने के बाद दो से अधिक संतानों वाले व्यक्तियों पर निकाय और पंचायत चुनाव लड़ने की लगी रोक समाप्त हो जाएगी। पटेल ने कहा कि दोनों विधेयकों को वर्तमान सत्र में ही पारित कराया जाएगा। इस निर्णय से ऐसे कई जनप्रतिनिधियों और संभावित उम्मीदवारों को राहत मिलेगी, जो अब तक इस प्रावधान के कारण चुनाव नहीं लड़ पा रहे थे। समय-समय पर उठती रही बदलाव की मांग पिछली गहलोत सरकार के दौरान कांग्रेस विधायक हेमाराम चौधरी ने 2 बच्चों की शर्त हटाने की मांग की थी। पिछले साल बजट सेशन के दौरान चित्तौड़गढ़ विधायक चंद्रभान सिंह आक्या ने भी सवाल उठाते हुए पूछा था कि दो से ज्यादा बच्चों वाले लोगों को विधानसभा और लोकसभा चुनाव लड़ने की इजाज़त देने और पंचायत चुनाव लड़ने से रोकने के पीछे क्या वजह है? साथ ही इस नियम पर फिर से विचार करने की अपील की थी। जनप्रतिनिधि-नेताओं के समान अवसर की मांग पर संशोधन जनप्रतिनिधियों और कई नेताओं ने दो बच्चों की बाध्यता हटाने की पुरजोर मांग की थी। खुद मंत्री झाबर सिंह खर्रा इन नेताओं की बात को कई बार दोहरा चुके हैं कि विधायक और सांसद चुनाव में ऐसी बाध्यता नहीं है। वहीं, सरकारी कर्मचारियों के प्रमोशन में भी यह शर्त पहले ही हटाई जा चुकी है। ऐसे में निकाय चुनाव में यह बाध्यता क्यों हो? जनप्रतिनिधियों को भी समान अवसर मिलना चाहिए। इसी आधार पर सरकार में तय हुआ कि सभी योग्य और सक्रिय लोगों को चुनाव लड़ने का मौका मिलना चाहिए, विशेषकर उन लोगों को जिन्होंने वर्षों तक जमीनी स्तर पर काम किया है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1995 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत के कार्यकाल में पंचायतीराज कानून और राजस्थान नगरपालिका कानून में संशोधन कर दो से अधिक संतानों वाले व्यक्तियों के चुनाव लड़ने पर रोक का प्रावधान जोड़ा गया था। उस समय इसका उद्देश्य जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देना बताया गया था। नियम लागू होने के बाद कई निर्वाचित प्रतिनिधियों की सदस्यता समाप्त भी हुई थी। इस फैसले से राजस्थान की राजनीति गरमा गई थी। 1997 में राजस्थान हाईकोर्ट ने इस बदलाव को सही ठहराते हुए कहा था कि यह आबादी बढ़ने से रोकने के लिए एक ज़रूरी कदम है। लेकिन, अब 30 साल पहले लागू किए गए प्रावधान को बदलने के निर्णय के बाद प्रदेश में स्थानीय निकाय और पंचायतीराज की राजनीति में बदलाव की संभावना है।

बड़े बदलाव के साथ होगा राजस्थान के पंचायत चुनाव

जयपुर. आगामी पंचायतीराज चुनाव इस बार एक बड़े बदलाव के साथ होने जा रहे है। राज्य निर्वाचन आयोग के आदेश के बाद पंच और सरपंच, दोनों ही पदों के चुनाव मतपत्र के जरिए होंगे। यह बदलाव केवल तकनीक का नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की रफ्तार और परिणामों के समय पर असर डाल सकता है। बैलेट पेपर की वापसी से चुनावी अमला और प्रत्याशियों, दोनों की चुनौतियां बढ़ेंगी। ऐसा होगा इस बार का बैलेट पेपर पंच का मतपत्र गुलाबी रंग के कागज पर होगा। सरपंच का मतपत्र सफेद कागज पर छपेगा। मतपत्र की चौड़ाई 4 इंच तय की गई है। ऊपरी हिस्से में काली सीमारेखा, बाई ओर क्रमांक और दाई ओर पंचायत वार्ड से जुड़ी निर्वाचन जानकारी होगी। सभी विवरण हिन्दी में होंगे। अभ्यर्थियों के नाम बाई ओर और चुनाव चिह्न दाई ओर होंगे। नोटा भी अनिवार्य रूप से शामिल रहेगा। ईवीएम से बैलेट, क्या बदलेगा मतदान की गति थोड़ी धीमी हो सकती है। मतगणना में समय ज्यादा लगेगा, जिससे नतीजे देर रात आ सकते हैं। यदि किसी प्रत्याशी ने मतगणना पर आपत्ति दर्ज कराई, तो पुनः गणना करनी पड़ेगा, जिससे विवाद और देरी की आशंका बढ़ेगी। चुनाव कर्मचारियों का कार्यभार बढ़ेगा, क्योंकि हर मतपत्र की हाथ से गिनती होगी। अभ्यर्थियों की संख्या बढ़ी तो मुड़ेगा मतपत्र नोटा सहित 9 प्रत्याशी तक एक स्तम्भ 10 से 18 प्रत्याशी दो स्तम्भ, जरूरत पड़ने पर अंतिम पैनल छायादार 18 से अधिक प्रत्याशी: तीन या अधिक स्तम्भ, खाली पैनल छायादार रखे जाएंगे। यानी प्रत्याशियों की संख्या जितनी ज्यादा, मतपत्र उतना लंबा और जटिल। 30 सरपंच और 240 वार्ड पंचों के चुनाव होंगे – 30 ग्राम पंचायत में 30 सरपंच और 240 वार्ड पंचों के चुनाव होंगे। पंचायत चुनाव के लिए प्रगणक नियुक्त किए गए हैं। मतदान केंद्र बनाए गए हैं। मतदाता सूची अपडेट की जा रही है। – डॉ. कृति व्यास, उपखंड अधिकारी एवं निर्वाचन अधिकारी, रावतभाटा

हिमंता का मास्टरस्ट्रोक: चुनाव से पहले महिलाओं को मिलेगा सीधे लाभ, आरक्षण की घोषणा भी

गुवाहाटी  असम में विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही सियासत गर्मा गई है. मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने राज्य की जनता के लिए बड़ी घोषणाओं की झड़ी लगा दी है.  असम कैबिनेट की बैठक में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए, जिन्हें चुनाव से पहले सरकार का सबसे बड़ा कार्ड माना जा रहा है. सरकार ने ‘मुख्यमंत्री महिला उद्यमिता योजना’ का दायरा बढ़ाते हुए इसमें 1 लाख से ज्यादा नए लाभार्थियों को जोड़ने का फैसला किया है. इसके अलावा आदिवासी और चाय बागान समुदाय के लोगों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण का रास्ता भी साफ कर दिया गया है. महिलाओं के खाते में सीधे पहुंचेगा पैसा, क्या है सरकार की स्कीम? असम सरकार की ‘मुख्यमंत्री महिला उद्यमिता योजना’ राज्य में काफी लोकप्रिय हो रही है. इस योजना के तहत राज्य की 32 लाख महिलाओं को पहले ही 10,000 रुपये की पहली किस्त मिल चुकी है. मुख्यमंत्री ने बताया कि कुछ पात्र महिलाएं इस फंड से वंचित रह गई थीं. इसी को देखते हुए कैबिनेट ने आज 1,03,500 नई लाभार्थियों को जोड़ने की मंजूरी दी है. बिहार, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की कैश ट्रांसफर योजनाओं की तर्ज पर असम की यह स्कीम भी महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए शुरू की गई है. जानकारों का मानना है कि चुनाव से ठीक पहले इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं को कैश देना वोट बैंक को साधने की एक बड़ी कोशिश है. नौकरियों में 3 प्रतिशत आरक्षण और नए सैनिक स्कूल की सौगात हिमंता कैबिनेट ने केवल महिलाओं के लिए ही नहीं, बल्कि आदिवासी और चाय बागान समुदायों के लिए भी बड़ा फैसला लिया है. अब राज्य की सरकारी नौकरियों (ग्रेड 1 और ग्रेड 2) में इन समुदायों के लिए 3 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित किया गया है. चाय बागान समुदाय असम की राजनीति में एक निर्णायक भूमिका निभाता है. ऐसे में यह आरक्षण चुनावी गणित को बदलने की ताकत रखता है. साथ ही कैबिनेट ने कार्बी आंगलोंग के लांगवोकु क्षेत्र में राज्य का दूसरा सैनिक स्कूल बनाने के लिए 335 करोड़ रुपये के फंड को भी हरी झंडी दिखा दी है. असम बना देश का सबसे तेजी से बढ़ने वाला राज्य असम की वित्त मंत्री अजंता नियोग ने विधानसभा में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 62,294.78 करोड़ रुपये का अंतरिम बजट (लेखानुदान) पेश किया. बजट भाषण के दौरान उन्होंने आरबीआई के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि असम इस समय देश का सबसे तेजी से बढ़ने वाला राज्य है. उन्होंने दावा किया कि राज्य की प्रति व्यक्ति आय पिछले पांच वर्षों में दोगुनी से भी अधिक हो गई है. साल 2020-21 में यह 86,947 रुपये थी, जो 2025-26 में बढ़कर 1,85,429 रुपये पहुंच गई है. यह 113 प्रतिशत की जबरदस्त बढ़ोतरी है. सरकार का लक्ष्य असम को 2028 तक 10 लाख करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था बनाना है. चुनाव आयोग की तैयारी और राजनीतिक दलों की मांग एक तरफ सरकार घोषणाएं कर रही है, तो दूसरी तरफ चुनाव आयोग ने भी कमर कस ली है. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की अगुवाई में आयोग की टीम असम के दौरे पर है. मंगलवार को सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने चुनाव आयोग से मुलाकात की. कांग्रेस, बीजेपी और आम आदमी पार्टी समेत कई दलों ने मांग की है कि असम में चुनाव एक या अधिकतम दो चरणों में कराए जाएं. इसके साथ ही दलों ने सुझाव दिया है कि चुनाव की तारीखें तय करते समय बिहू त्योहार का खास ख्याल रखा जाए. वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 20 मई को समाप्त हो रहा है, ऐसे में मार्च या अप्रैल में चुनाव होने की पूरी संभावना है.

16 फरवरी को मनाया जाएगा राज्य निर्वाचन आयोग का स्थापना दिवस, समारोह में रावत की विशेष उपस्थिति

राज्य निर्वाचन आयोग का स्थापना दिवस समारोह 16 फरवरी को पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त  रावत होंगे मुख्य अतिथि भोपाल  मध्यप्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग का 32वां स्थापना दिवस समारोह 16 फरवरी को सुबह 11 बजे से आयोजित किया जायेगा। समारोह के मुख्य अतिथि भारत निर्वाचन आयोग के पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त  ओ.पी. रावत होंगे।  रावत "वन नेशन-वन इलेक्शन में स्थानीय निर्वाचन की भूमिका" विषय पर व्याख्यान देंगे। पूर्व राज्य निर्वाचन आयुक्त  आर परशुराम "स्थानीय निर्वाचन में सुधार की चुनौतियाँ" विषय पर उद्बोधन देंगे। दैनिक भास्कर, स्कूल ऑफ जर्नलिज्म के विभागाध्यक्ष  नरेन्द्र कुमार सिंह "जमीनी लोकतंत्र में पारदर्शी एवं निष्पक्ष चुनाव" विषय पर और एडवोकेट  सिद्धार्थ सेठ स्थानीय निर्वाचन में न्यायालयीन सबक" विषय पर उद्बोधन देंगे। सचिव राज्य निर्वाचन आयोग  दीपक सिंह ने बताया है कि समारोह में आयोग के निर्वाचन साहित्य-ई बुक का विमोचन और प्रेक्षा मोबाइल ऐप का शुभारंभ किया जायेगा। साथ ही स्थानीय निर्वाचन में उत्कृष्ट कार्य करने वाले अधिकारी-कर्मचारी को प्रशस्ति पत्र भी वितरित किये जायेंगे।  

निकाय चुनाव: झारखंड में कैश पर कड़ी नजर, फ्लाइंग स्क्वॉड सक्रिय

रांची झारखंड में निकाय चुनाव को लेकर निर्वाचन प्रक्रिया को निष्पक्ष, पारदर्शी और शांतिपूर्ण बनाने के उद्देश्य से प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया है। मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए नकदी, शराब अथवा अन्य वस्तुओं के वितरण को दंडनीय अपराध बताते हुए प्रशासन ने आम नागरिकों से सतकर् रहने और सहयोग करने की अपील की है। अवैध गतिविधि पर फ्लाइंग स्क्वॉड की कड़ी नजर प्रशासन के अनुसार, चुनाव के दौरान किसी भी प्रकार की अवैध गतिविधि पर नजर रखने के लिए प्रत्येक थाना क्षेत्र में फ्लाइंग स्क्वॉड का गठन किया गया है। ये टीमें लगातार गश्त कर रही हैं और संवेदनशील इलाकों में विशेष निगरानी रखी जा रही है, ताकि चुनाव को प्रभावित करने वाले प्रयासों पर समय रहते रोक लगाई जा सके। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि चुनाव अवधि के दौरान यदि कोई व्यक्ति किसी निर्वाचन क्षेत्र में बड़ी मात्रा में नकदी लेकर चलता पाया जाता है, तो उससे धन के स्रोत और उसके उपयोग से संबंधित वैध दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा जाएगा। संतोषजनक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराने की स्थिति में नकदी को जब्त किया जा सकता है और संबंधित व्यक्ति के खिलाफ नियमानुसार कानूनी कारर्वाई की जाएगी।   केवल आम लोगों पर ही नहीं, बल्कि प्रत्याशियों पर भी होगा एक्शन प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह कारर्वाई केवल आम लोगों पर ही नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों, उनके कार्यकर्ताओं और प्रत्याशियों पर भी समान रूप से लागू होगी। किसी भी स्तर पर चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। नकदी के साथ-साथ शराब, उपहार सामग्री या अन्य किसी प्रकार की वस्तुओं का वितरण भी अपराध की श्रेणी में आएगा। आम नागरिकों से अपील करते हुए प्रशासन ने कहा है कि वे अनावश्यक रूप से बड़ी मात्रा में नकदी लेकर यात्रा करने से बचें। यदि किसी कारणवश नकदी ले जाना आवश्यक हो, तो संबंधित दस्तावेज अपने पास अवश्य रखें, ताकि जांच के दौरान किसी प्रकार की परेशानी न हो। उनमें से पैन कार्ड और उसकी प्रति, व्यापार निबंधन प्रमाण पत्र (यदि लागू हो), बैंक पासबुक या बैंक स्टेटमेंट, जिसमें नकदी निकासी का विवरण हो, नियमित नकद लेन-देन वाले व्यवसाय के लिए कैश बुक की प्रति, धन के उपयोग से संबंधित प्रमाण, जैसे विवाह निमंत्रण पत्र या अस्पताल में भर्ती से जुड़े दस्तावेज जैसे दस्तावेज रखना जरूरी है।        प्रशासन ने लोगों से यह भी आग्रह किया है कि यदि कहीं मतदाताओं को प्रभावित करने के उद्देश्य से नकदी, शराब या अन्य वस्तुओं का वितरण होता दिखाई दे, तो इसकी सूचना तत्काल स्थानीय पुलिस, निर्वाचन अधिकारियों या नियंत्रण कक्ष को दें। नागरिकों के सहयोग से ही स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित किया जा सकता है।

बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद चुनावी सियासी जंग शुरू, पार्टियां मैदान में उतरीं

ढाका  बांग्लादेश में 2024 के जन आंदोलन और लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहीं शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने के बाद पहले राष्ट्रीय चुनाव के लिए गुरुवार से प्रचार शुरू हो गया है. बड़े राजनीतिक दलों ने 12 फरवरी को होने वाले चुनाव से पहले ढाका और दूसरे शहरों में रैलियां की हैं. इस चुनाव को बांग्लादेश के इतिहास में बहुत अहम माना जा रहा है, क्योंकि यह शेख हसीना के हटने के बाद अंतरिम सरकार के तहत हो रहा है और इसमें लोग प्रस्तावित राजनीतिक सुधारों पर भी फैसला करेंगे. नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस की अगुवाई वाली अंतरिम सरकार ने निष्पक्ष चुनाव कराने का वादा किया है, लेकिन उनकी सरकार ने हसीना की पार्टी अवामी लीग पर बैन लगाया है, जिससे सवाल उठे हैं. अवामी लीग और बीएनपी लंबे समय से देश की राजनीति में अहम भूमिका निभाते रहे हैं. देश में कानून-व्यवस्था को लेकर भी चिंता है, लेकिन सरकार का कहना है कि वोटिंग शांतिपूर्ण तरीके से होगी. सैकड़ों प्रदर्शनकारियों और लोगों की मौत के बाद हुए हिंसक कार्रवाई के बीच हसीना के 5 अगस्त 2024 को देश छोड़कर भारत जाने के तीन दिन बाद यूनुस ने पद संभाला था. जमात-ए-इस्लामी ने बनाया गठबंधन अवामी लीग के चुनाव से बाहर होने के बाद जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाला 10 दलों का गठबंधन अपना असर बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. जमात-ए-इस्लामी को धर्मनिरपेक्ष समूहों की आलोचना झेलनी पड़ती है, जो कहते हैं कि उसकी नीतियां बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्षता को चुनौती देती हैं. जन आंदोलन के दौरान छात्र नेताओं द्वारा बनाई गई ‘नेशनल सिटिजन पार्टी’ (एनसीपी) भी इस गठबंधन में शामिल है. बीएनपी अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान को प्रधानमंत्री पद का बड़ा दावेदार माना जा रहा है. उनकी पार्टी को उनकी मां की राजनीतिक विरासत की वजह से मजबूत समर्थन मिला है. खालिदा जिया का पिछले महीने निधन हो गया था. रहमान 17 साल के निर्वासन के बाद पिछले महीने ब्रिटेन से बांग्लादेश लौटे हैं. तारिक रहमान करेंगे अभियान की शुरुआत रहमान गुरुवार को सिलहट शहर में एक रैली से अपने चुनाव अभियान की शुरुआत कर रहे हैं और आने वाले दिनों में कई जिलों का दौरा करेंगे. जमात-ए-इस्लामी और एनसीपी भी ढाका में अपने प्रचार की शुरुआत करने वाले हैं. इस चुनाव में एक राष्ट्रीय चार्टर पर जनमत संग्रह भी शामिल है, जिसके समर्थन में अंतरिम सरकार वोटरों से अपील कर रही है. सरकार का कहना है कि यह चार्टर सुधारों पर आधारित नई राजनीतिक दिशा दिखाता है. इस चार्टर पर पिछले साल देश के 52 पंजीकृत दलों में से 25 ने हस्ताक्षर किए थे. अवामी लीग ने इसका विरोध किया था, जबकि कई दलों ने दस्तावेज पर साइन करने से मना कर दिया था. ‘जुलाई राष्ट्रीय चार्टर’ का नाम जुलाई 2024 में शुरू हुए उस जन आंदोलन के नाम पर रखा गया है, जिसने हसीना सरकार के गिरने का रास्ता बनाया. अभी यह चार्टर बाध्यकारी नहीं है, लेकिन समर्थकों का कहना है कि इसे कानूनी रूप से लागू और संविधान का हिस्सा बनाने के लिए जनमत संग्रह जरूरी है. बांग्लादेश में संविधान में बदलाव सिर्फ संसद ही कर सकती है. अंतरिम सरकार का कहना है कि यह चार्टर सत्तावादी शासन से बचने के लिए ज्यादा नियंत्रण और संतुलन लाएगा, जिसमें राष्ट्रपति को ज्यादा अधिकार देकर अब तक ताकतवर रहे प्रधानमंत्री पद का संतुलन किया जाएगा. इसमें सांसदों के कार्यकाल की सीमा तय करने और हितों के टकराव, धनशोधन और भ्रष्टाचार रोकने के उपाय भी शामिल हैं.

चंडीगढ़ मेयर चुनाव में AAP और कांग्रेस का गठबंधन टूटने के बाद, पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ने का किया ऐलान

चंडीगढ़. चंडीगढ़ मेयर चुनाव को लेकर बड़ी खबर है. यहां पर जहां कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी से गठबंधन करते हुए चुनाव लड़ने का ऐलान किया था. लेकिन अब पार्टी अकेले मेयर, सीनियर डिप्टी मेयर और डिप्टी मेयर का चुनाव अकेले लड़ेगी. चंडीगढ़ कांग्रेस के अध्यक्ष लक्की ने यह ऐलान किया है. इससे पहले, कांग्रेस ने आप के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का ऐलान किया था और चुनावी फार्मूला भी शेयर किया था, जिस पर सांसद मनीष तिवारी ने भी सहमति जताई थी. आम आदमी पार्टी के नेता अनुराग ढांडा ने कहा कि कांग्रेस के साथ आम आदमी पार्टी का ना कहीं कोई गठबंधन है, न कोई गठबंधन हो सकता है. कांग्रेस ने बीजेपी के साथ मिलकर इस देश को लूटा है। देश को लूटने वाली इन दोनों पार्टियों के खिलाफ AAP ही आम आदमी के संघर्ष की असली आवाज़ है. उधर, आम आदमी पार्टी ने चंडीगढ़ नगर निगम चुनावों के लिए मेयर पद पर योगेश ढींगरा (वार्ड25), सीनियर डिप्टी मेयर पद के लिए  मुन्नवर ख़ान (वार्ड-29) और डिप्टी मेयर पद के लिए जसविंदर कौर  ( वार्ड-1) को प्रत्याशी बनाया और अब ये सभी उम्मीदवार शाम 4 बजे अपने-अपने नामांकन पत्र दाखिल करेंगे. वहीं, कांग्रेस के प्रधान एचएस लकी ने न्यूज़ 18 से कहा कि हमारा आम आदमी पार्टी से कोई गठबंधन नहीं है और  हम तीनों पदों पर अपना उम्मीदवार खड़ा कर रहे हैं. अहम बात है कि तीन दिन पहले पार्टी ने गठबंधन पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया था और फार्मूला भी बताया था. इस फार्मुले के तहत मेयर का पद आम आदमी पार्टी को दिया गया था और बाकी दो पदों पर कांग्रेस चुनाव लड़ने जा रही थी. क्या है पूरा समीकरण उधर, आम आदमी पार्टी का एक पार्षद गायब हो गया है. अगर गयाब पार्षद बीजेपी में ज्वाइन करता है तो उनकी जीत पक्की हो सकती है. फिलहाल कोई भी आप काउंसलर या नेता उस गायब पार्षद के बारे में कोई जानकारी नहीं दे रहा है. निगम में कुल 35 पार्षद हैं और एक वोट सांसद का है. भाजपा के पास 18 वोट हैं, जबकि कांग्रेस के पास 7 और आम आदमी पार्टी के पास 11 पार्षद हैं. बहुमत का आंकड़ा 19 है. अगर कांग्रेस और आप में गठबंधन होता तो मुकाबला 18-18 की बराबरी पर अटक सकता था. लेकिन अब गठबंधन नहीं होगा और भाजपा का पलड़ा अब भारी हो गया है. गौर रहे कि 29 जनवरी को इन तीन पदों पर पार्षद वोट डालेंगे और इस बार गुप्त मतदान नहीं बल्कि हाथ उठाकर वोटिंग होगी.