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जिमखाना खाली कराना सरकार के लिए चुनौती, अब मैदान में उतरे सिंघवी

नईदिल्ली  दिल्ली के ऐतिहासिक जिमखाना क्लब (Delhi Gymkhana Club) को खाली कराने के केंद्र सरकार के फैसले पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. क्लब के स्थायी सदस्य और कर्मचारी अब इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं. सरकार ने क्लब को 5 जून तक 27.3 एकड़ जमीन और पूरी संपत्ति खाली करने का निर्देश दिया है।  सरकार का कहना है कि सफदरजंग रोड स्थित यह जमीन ‘अत्यंत संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्र’ में आती है और इसका इस्तेमाल रक्षा ढांचे और सार्वजनिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए किया जाएगा. हालांकि क्लब के कई सदस्यों ने सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया है।  अभिषेक मनु सिंघवी लड़ेंगे केस जानकारी के मुताबिक क्लब की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी को कानूनी लड़ाई के लिए नियुक्त किया गया है. बताया जा रहा है कि दिल्ली हाईकोर्ट में दो अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की जाएंगी. एक याचिका क्लब के सदस्यों की ओर से और दूसरी करीब 600 कर्मचारियों की ओर से दायर होगी।  113 साल पुराने इस क्लब के स्थायी सदस्यों ने रविवार को लंबी बैठक कर आगे की रणनीति पर चर्चा की. यह बैठक उस आदेश के एक दिन बाद हुई, जिसमें भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) ने क्लब से उसकी इमारत, लॉन और अन्य सुविधाएं खाली करने को कहा था. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया कि सरकार की तरफ से नियुक्त क्लब की जनरल कमेटी ने L&DO को पत्र लिखकर स्थिति स्पष्ट होने तक यथास्थिति बनाए रखने की मांग की है।  सरकारी अधिकारियों का कहना है कि सरकार लीज की शर्तों के तहत ‘सार्वजनिक हित’ में जमीन वापस लेने के लिए पूरी तरह अधिकृत है. दिल्ली जिमखाना क्लब उन दुर्लभ मामलों में शामिल है, जहां सरकार ने स्थायी लीज को समय से पहले खत्म कर ‘री-एंट्री’ की प्रक्रिया शुरू की है।  ‘सैकड़ों कर्मचारियों की रोजी-रोटी पर खतरा’ रिपोर्ट के मुताबिक, क्लब के सदस्य और कर्मचारी इसे अचानक लिया गया फैसला बता रहे हैं. उनका कहना है कि इससे न केवल क्लब की विरासत खतरे में पड़ जाएगी, बल्कि सैकड़ों कर्मचारियों की आजीविका भी प्रभावित होगी. क्लब से जुड़े रिटायर्ड जनरल पीके सहगल ने कहा कि सदस्यों ने सर्वसम्मति से सरकार के आदेश को अदालत में चुनौती देने का फैसला किया है. उन्होंने कहा कि बिना किसी पूर्व चेतावनी के लिया गया यह फैसला 600 कर्मचारियों की नौकरियों पर संकट खड़ा कर देगा।  कर्मचारियों में भी इस फैसले को लेकर गहरी नाराजगी है. जिमखाना एम्प्लॉयी वेलफेयर एसोसिएशन ने सरकार के आदेश का विरोध करते हुए कहा कि कई कर्मचारी पिछले 25-26 साल से यहां काम कर रहे हैं और अब उनकी रोजी-रोटी छिनने का खतरा पैदा हो गया है. एसोसिएशन के अध्यक्ष नंदन सिंह नेगी ने कहा कि कर्मचारी और उनके परिवार बेहद परेशान हैं. एक कर्मचारी ने कहा, ‘हमारी झुग्गियां पहले ही टूट रही हैं और अब नौकरी भी चली जाएगी. आखिर हम कहां जाएंगे?’ 1930 से मौद है जिमखाना क्लब कुछ सदस्यों ने सरकार के सुरक्षा संबंधी तर्क पर भी सवाल उठाए हैं. क्लब के एक पूर्व महासचिव ने कहा कि क्लब 1930 के दशक से यहां मौजूद है, जबकि प्रधानमंत्री आवास 1984 में इस इलाके में शिफ्ट हुआ था. अगर सुरक्षा का इतना बड़ा मुद्दा होता तो इतने वर्षों तक कोई समस्या क्यों नहीं हुई? टीओआई के मुताबिक, क्लब के सदस्य नितिन वर्मा ने आरोप लगाया कि सरकार ‘काल्पनिक’ आधार पर क्लब को बंद करना चाहती है. उन्होंने कहा कि क्लब में सुरक्षा के कड़े इंतजाम हैं और हर व्यक्ति की जांच होती है।  इस पूरे विवाद पर देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी और पुडुचेरी की पूर्व उपराज्यपाल किरन बेदी ने भी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि दिल्ली जिमखाना क्लब सिर्फ एक संपत्ति नहीं, बल्कि देश की खेल और संस्थागत विरासत का हिस्सा है. किरण बेदी ने कहा कि यहां देश के बेहतरीन टेनिस मुकाबले हुए हैं और इस जगह से कई पीढ़ियों की यादें जुड़ी हुई हैं. उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार इस फैसले पर दोबारा विचार करेगी।  पूर्व रॉ प्रमुख और क्लब के पूर्व अध्यक्ष एएस दुलत ने कहा कि सदस्य सरकार के फैसले के खिलाफ याचिका दायर करने के लिए हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं. वहीं इतिहासकार स्वप्ना लिडले ने क्लब के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि आजादी से पहले यह ब्रिटिश अधिकारियों का क्लब हुआ करता था, लेकिन 1945 के बाद भारतीयों को भी सदस्यता मिलने लगी. उन्होंने कहा कि विभाजन के समय पाकिस्तान जा रहे अधिकारियों के लिए यहां कई विदाई समारोह भी आयोजित हुए थे।  अब यह मामला कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर बड़ा विवाद बनता जा रहा है. आने वाले दिनों में दिल्ली हाईकोर्ट में इस पर सुनवाई होने की संभावना है। 

मुसलमानों को बनाया निशाना! शरिया स्कीम के जरिए हजारों करोड़ की ठगी का आरोप

 नई दिल्ली शरिया कानून के मुताबिक ब्याज (रिबा) कमाना हराम होता है और कई मुसलमान इस वजह से अपना पैसा बैंकों में भी जमा नहीं कराते हैं। ऐसे ही मुसलमानों को टारगेट करके एक महिला ने 6 हजार करोड़ रुपये जुटा लिए और 3000 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की। लालच दिया जाता था कि शरिया के नियमों का पालन करते हुए निवेश पर सालाना 36 फीसदी का मुनाफा मिलेगा। शुरुआत में कुछ लोगों को इसी तरह मोटा मुनाफा देकर विश्वास जीता गया और फिर हजारों करोड़ रुपये डकार लिए गए। पीटीआई के मुताबिक, ईडी ने कहा कि शेख, हीरा ग्रुप ऑफ कंपनीज और अन्य पर 36 प्रतिशत से अधिक वार्षिक मुनाफे का वादा करके लोगों से 5,978 करोड़ रुपये से अधिक की रकम जुटाने का आरोप है। हालांकि, वे मूल राशि भी वापस करने में विफल रहे जिससे 1.72 लाख से अधिक निवेशकों से 3,000 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी हुई। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट में ईडी की अब तक की जांच और अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि पिछले सप्ताह गुरुग्राम से गिरफ्तार की गई नौहेरा शेख ने शरिया कानून के मुताबिक मुसलमानों को निवेश और भारी मुनाफे का लालच दिया था और हजारों करोड़ रुपये जुटा लिए। सुप्रीम कोर्ट की ओर से बेल खारिज किए जाने और सरेंडर के आदेश के बाद नौहेरा एक महीने से अधिक समय से फरार चल रही थी। महाठगी की आरोपी शेख ने अदालतों और जांच एजेंसियों को कई बार गच्चा दिया था। उसने सुप्रीम कोर्ट को यह कहकर भी भ्रमिक करने की कोशिश की कि उसने हैदराबाद पुलिस के सामने सरेंडर किया था, लेकिन उसे हिरासत में लेने से इनकार कर दिया गया। नौहेरा शेख की 400 करोड़ की संपत्ति जब्त नौहेरा शेख के पास मौजूद 400 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की जा चुकी है और पीड़ितों को इसे लौटाने की प्रक्रिया चल रही है। ईडी के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, नौहेरा शेख, उसके परिजनों और अन्य ने लाखों लोगों को अपनी पोंजी स्कीम में निवेश के लिए लालच दिया और उनकी कमाई हड़प ली। शुरुआत में निवेश करने वालों को भारी-भरकम मुनाफा भी दिया गया, लेकिन बाद में करीब 1.7 लाख जमाकर्ताओं ने अपनी गाढ़ी कमाई शरिया वाले निवेश के नाम पर गंवा दी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में जांच का आदेश दिया था और ईडी से कहा था कि जब्त संपत्तियों की नीलामी करके पीड़ितों को रकम लौटाई जाए। आरोपी और उसके सहयोगियों ने कई शपथ पत्र दायर करके संपत्तियों की बिक्री में देरी की भरसक कोशिश की। उसके एक सहयोगी ने अपना नाम 'कल्याण बनर्जी' बताते हुए खुद को पीएमओ का अधिकारी बताने की कोशिश की। उसे जनवरी में गिरफ्तार कर लिया गया था। हीरा ग्रुप के जरिए की गई ठगी 2024 में जब एजेंसी ने नौहेरा के घर पर छापेमारी की तो 12 लग्जरी गाड़ियां बरामद की गईं, जिनमें बीएमडब्ल्यू और मर्सिडीज बेंज जैसी महंगी कारें शामिल थीं। 92 लाख रुपये कैश भी बरामद किया गया था। नौहेरा शेख ने 'हीरा ग्रुप' नाम से कंपनी बनाई थी, जिसके जरिए इतनी बड़ी रकम की ठगी की गई। शेख ने हीरा ग्रुप ऑफ कंपनीज के जरिए लोगों को निवेश के लिए आकर्षित किया। उसने खासतौर पर मुसलमानों को टारगेट बनाया जो शरिया के कानून के मुताबिक निवेश करना चाहते थे। ईडी के मुताबिक उसने 36 फीसदी सालाना मुनाफे का लालच दिया। लेकिन बाद में लोगों को मूलधन भी वापस नहीं कर पाई। गुरुग्राम में पहचान बदल रह रही थी नौहेरा गुरुग्राम में पकड़ी गई नौहेरा शेख यहां अपनी पहचान बदलकर रह रही थी। ईडी और हरियाणा पुलिस के जॉइंट ऑपरेशन के दौरान पकड़ी गई नौहेरा शेख सेक्टर 45 में रह रही थी। फर्जी आधार के जरिए उसने अपना नाम शेख खामर जहां बताया था।

राज्यसभा चुनाव को लेकर BJP की बड़ी रणनीति, तीसरी सीट जीतने पर भी नजर

भोपाल  मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर राज्यसभा चुनाव की सरगर्मी तेज हो गई है। इस बार बीजेपी रणनीति में बड़ा बदलाव करने जा रही है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी इस बार 'सवर्ण' चेहरे पर दांव लगाने की तैयारी में है। बीजेपी अपनी दो सुरक्षित सीटों के साथ कांग्रेस के कब्जे वाली तीसरी सीट पर भी नजर रखे हुए है। पार्टी तीसरी सीट जीतकर दिल्ली (केंद्रीय नेतृत्व) को 'गिफ्ट' देना चाहती है। इसके लिए बीजेपी कांग्रेस से आए किसी नेता को चेहरा बना सकती है। पार्टी की नजर उन विधायकों पर भी है जो कांग्रेस का खेल बिगाड़ सकते हैं। पहली सीट का गणित सामान्य वर्ग को मौका देने की वजह मध्य प्रदेश से राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रही हैं। इनका कार्यकाल 26 जून 2026 को समाप्त होगा। इनमें दो सीटें बीजेपी (डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी और जॉर्ज कुरियन) और एक सीट कांग्रेस (दिग्विजय सिंह) के पास है। बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, पिछले चुनावों में पार्टी ने दलित, ओबीसी और महिला कार्ड खेलकर सामाजिक संतुलन साधा था। इस बार समीकरण बदल रहे हैं। पार्टी अब ठाकुर या ब्राह्मण कोटे से किसी कद्दावर चेहरे को राज्यसभा भेजना चाहती है। इसी कड़ी में अरविंद भदौरिया और कांतदेव सिंह के नाम चर्चा में हैं। दोनों नेता आरएसएस के करीबी माने जाते हैं और संगठन में गहरी पकड़ रखते हैं। 1. कांतदेव सिंह (प्रदेश उपाध्यक्ष): विंध्य क्षेत्र से आने वाले कांतदेव सिंह की जमीनी पकड़ मजबूत मानी जाती है। यदि बीजेपी किसी क्षत्रिय चेहरे को चुनती है तो वे सबसे प्रबल दावेदार हैं। वे प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा के करीबी हैं। उज्जैन संभाग के प्रभारी रहने के साथ सिंगरौली निकाय चुनाव में भी उनकी अहम भूमिका रही है। 2. अरविंद भदौरिया: पूर्व मंत्री अरविंद भदौरिया का नाम भी इस रेस में बना हुआ है। संगठन और सरकार में काम करने का उनका लंबा अनुभव पार्टी के काम आ सकता है। 2020 में मप्र में हुए सत्ता परिवर्तन में अरविंद भदौरिया की अहम भूमिका थी। ज्योतिरादित्य सिंधिया 22 विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए थे। तत्कालीन कमलनाथ सरकार अल्पमत में आ गई थी। 22 विधायकों को बैंगलुरू के एक रिसॉर्ट में रखा गया था। विधायकों को अलग-अलग जगहों से बैंगलुरू ले जाने और वहां रुकवाने की जिम्मेदारी अरविंद भदौरिया के पास थी। कमलनाथ सरकार गिरने के बाद शिवराज सरकार में भदौरिया को कैबिनेट मंत्री बनाया गया था। हालांकि, वे 2023 का विधानसभा चुनाव हार गए थे। एससी-एसटी वर्ग को एडस्ट किया जा सकता है सवर्ण कार्ड की चर्चा के बीच बीजेपी अन्य वर्गों को भी नजरअंदाज नहीं कर रही है। एससी वर्ग: चंबल-ग्वालियर क्षेत्र में अनुसूचित जाति की बड़ी आबादी को देखते हुए लाल सिंह आर्य का नाम चर्चा में है। एसटी वर्ग: बेहतर प्रदर्शन के आधार पर डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी को दोबारा मौका मिल सकता है। मालवा के आदिवासी वोट बैंक को साधने के लिए रंजना बघेल का नाम भी चर्चा में है। जॉर्ज कुरियन: भरोसेमंद चेहरा फिर हो सकता है रिपीट केंद्रीय राज्यमंत्री जॉर्ज कुरियन को बीजेपी दोबारा राज्यसभा भेज सकती है। 1980 से पार्टी से जुड़े कुरियन उन वफादार नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने जनसंघ के दौर से पार्टी का झंडा थामे रखा है। वे फिलहाल मत्स्य पालन, पशुपालन और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। तीसरी सीट के राजनीतिक समीकरण को समझने के लिए राज्यसभा चुनाव के वोटिंग पैटर्न को समझना जरूरी है। न गुप्त मतदान, न ही ईवीएम का इस्तेमाल राज्यसभा चुनाव में न गुप्त मतदान होता है और न ही ईवीएम का इस्तेमाल होता है। राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवारों के नाम के आगे एक से चार तक नंबर लिखा होता है। इसमें विधायकों को वरीयता के आधार पर उस पर चिह्न लगाना होता है। राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए जरूरी वोटों की संख्या पहले से तय होती है। यह संख्या कुल विधायक और राज्यसभा सीटों के आधार पर तय होती है। इसमें एक विधायक के वोट की वैल्यू 100 होती है। कुल विधायकों की संख्या को 100 से गुणा किया जाता है राज्यसभा चुनाव में एक फॉर्मूला इस्तेमाल किया जाता है। इसमें कुल विधायकों की संख्या को 100 से गुणा किया जाता है। इसके बाद राज्यसभा सीटों की संख्या में एक जोड़कर भाग दिया जाता है। फिर कुल संख्या में एक जोड़ा जाता है। अंत में जो संख्या निकलती है, वही जीत के लिए जरूरी होती है। कांग्रेस के पास संख्या बल, लेकिन क्रॉस वोटिंग का डर मध्य प्रदेश में राज्यसभा की एक सीट कांग्रेस के खाते में मानी जा रही है। हालांकि, बीजेपी इस सीट पर भी उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है। कांग्रेस को आशंका है कि कुछ विधायक क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं या मतदान से अनुपस्थित रह सकते हैं। इससे तीसरी सीट पर मुकाबला रोचक हो सकता है।     दतिया से विधायक राजेंद्र भारती का चुनाव रद्द होने के बाद यह सीट फिलहाल खाली है।     विजयपुर से विधायक मुकेश मल्होत्रा की सदस्यता समाप्त करने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई है। हालांकि, वे राज्यसभा चुनाव में मतदान नहीं कर पाएंगे।     बीना से कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे हाल के दिनों में बीजेपी के कार्यक्रमों में नजर आई हैं। हालांकि, उन्होंने अब तक इस्तीफा नहीं दिया है। कांग्रेस उनसे संपर्क बनाए हुए है, लेकिन पार्टी के भीतर उनकी भूमिका को लेकर असमंजस है।     अटेर से कांग्रेस विधायक हेमंत कटारे बजट सत्र में उप नेता प्रतिपक्ष पद से इस्तीफा दे चुके हैं। उन्होंने इसके पीछे पारिवारिक कारण बताए थे।     टिमरनी से कांग्रेस विधायक अभिजीत शाह हाल ही में आरएसएस से जुड़े कार्यक्रम में शामिल हुए थे। इस कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर भी साझा किया गया।     सुसनेर से कांग्रेस विधायक भैंरो सिंह परिहार ने हाल ही में कहा था कि उनका संघ से वैचारिक जुड़ाव है।     कांग्रेस को आशंका है कि बीजेपी हाल ही में पार्टी छोड़कर आए किसी नेता को उम्मीदवार बना सकती है। संभावित नामों में सुरेश पचौरी की चर्चा सबसे ज्यादा है। माना जाता है कि उनके दोनों दलों के नेताओं से अच्छे संबंध हैं। कमलनाथ हो सकते हैं उम्मीदवार कांग्रेस आलाकमान … Read more

पानी संकट से निपटने को पंजाब सरकार का बड़ा कदम, DSR तकनीक अपनाएंगे किसान

चंडीगढ़  देश के सबसे अधिक भूजल संकट झेल रहे राज्यों में शामिल पंजाब में गिरते भूजल स्तर को रोकने के लिए राज्य सरकार ने डायरेक्ट सीडिंग ऑफ राइस (डीएसआर) तकनीक को बड़े स्तर पर बढ़ावा देने का फैसला किया है। जल संरक्षण को ध्यान में रखते हुए सरकार ने वर्ष 2026-27 के फसल सीजन में राज्यभर में पांच लाख एकड़ भूमि को डीएसआर तकनीक के तहत लाने का लक्ष्य तय किया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पंजाब अपने वार्षिक भूजल पुनर्भरण (ग्राउंडवॉटर रिचार्ज) का 156.36 प्रतिशत तक दोहन कर रहा है। राज्य के 153 प्रशासनिक ब्लॉकों में से 111 ब्लॉक ‘ओवर एक्सप्लॉइटेड’ श्रेणी में आ चुके हैं। इसका अर्थ है कि इन क्षेत्रों में भूजल का इस्तेमाल उसकी प्राकृतिक भरपाई से कहीं अधिक हो रहा है। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए पंजाब सरकार ने डीएसआर तकनीक को प्रोत्साहित करने की नीति अपनाई है। इस योजना के तहत डीएसआर अपनाने वाले किसानों को ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से प्रति एकड़ 1500 रुपये की वित्तीय सहायता दी जाएगी। आगामी वित्तीय वर्ष में डीएसआर कार्यक्रम के लिए सरकार ने 40 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2025-26 में 23,410 किसानों ने डीएसआर तकनीक अपनाई थी। इन किसानों को कुल 35.38 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की गई। डीएसआर तकनीक पंजाब सरकार की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य भूजल संरक्षण, पारंपरिक धान रोपाई पर निर्भरता कम करना और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि डीएसआर तकनीक पारंपरिक धान खेती की तुलना में पानी, बिजली और श्रम लागत में उल्लेखनीय कमी लाती है। ऐसे में यह तकनीक पंजाब के कृषि और पर्यावरण संबंधी संकट से निपटने में अहम भूमिका निभा सकती है।

कप्तानी बचाना होगा मुश्किल! IPL 2026 के बाद इन स्टार खिलाड़ियों की छिन सकती है कमान

नई दिल्ली IPL 2026 लीग स्टेज का अंत हो गया है। 10 में से 4 ही टीमों को प्लेऑफ का टिकट मिला है, वहीं 6 टीमें टूर्नामेंट से बाहर हो गई है। प्लेऑफ के लिए क्वालीफाई करने वाली टीमों में डिफेंडिंग चैंपियन रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के अलावा गुजरात टाइटंस, सनराइजर्स हैदराबाद और राजस्थान रॉयल्स शामिल हैं। वहीं दिल्ली कैपिटल्स, पंजाब किंग्स, चेन्नई सुपर किंग्स, लखनऊ सुपर जाएंट्स, कोलकाता नाइट राइडर्स और मुंबई इंडियंस प्लेऑफ की दौड़ से बाहर हो गई है। आईपीएल 2026 के प्लेऑफ में ना पहुंचने वाली 6 में से 5 टीमों के कप्तान रडार पर हैं। टीम के साथ-साथ उनकी निजी परफॉर्मेंस भी कुछ खास नहीं रही है, जिस वजह से अगले सीजन उनसे कप्तानी छीनी जा सकती है। आईए जानते हैं इन कप्तानों के बारे में-     हार्दिक पांड्या- गुजरात टाइटंस को एक ट्रॉफी समेत कुल दो बार फाइनल में पहुंचाने वाले कप्तान हार्दिक पांड्या की जब से मुंबई इंडियंस की टीम में वापसी हुई है, तब से उनका प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा है। पांड्या अब कुल तीन सीजन में एमआई की कप्तानी कर चुके हैं, जिसमें से एक ही बार वह 5 बार की इस चैंपियन टीम को प्लेऑफ तक पहुंचा पाए हैं। बाकी दो बार टीम बॉटम ऑफ द टेबल ही रही है। आईपीएल 2026 में तो हार्दिक पांड्या का गेंद और बल्ले से भी प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। कप्तानी का दबाव उनके परफॉर्मेंस पर साफ देखने को मिला। अगर एमआई को अपनी साख बचानी है तो अगले सीजन कप्तान बदलने की जरूरत है, हां हार्दिक पांड्या बतौर खिलाड़ी जरूर खेल सकते हैं।     हार्दिक पांड्या IPL 2026- 10 मैच 206 रन और 4 विकेट     रुतुराज गायकवाड़- एमआई के अलावा चेन्नई सुपर किंग्स ने भी आईपीएल की 5 ट्रॉफी जीती है, पिछले तीन सीजन इस टीम के लिए भी काफी खराब रहे हैं। सीएसके पिछले तीन सीजन में एक भी बार प्लेऑफ के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाई है। आईपीएल 2026 उनके लिए ठीक-ठाक रहा। शुरुआत थोड़ी खराब हुई, मगर बीच में टीम ने जरूर वापसी की। हालांकि प्लेऑफ का टिकट उन्हें इस बार भी नहीं मिला। पूरे सीजन कप्तानी का दबाव गायकवाड़ पर दिखा, उनका बैटिंग स्ट्राइक रेट 125 से भी कम का था। इस सीजन धोनी भी उनका मार्गदर्शन करने के लिए नहीं थे। सीएसके के पास संजू सैमसन के रूप में एक तैयार कप्तान है, जो आईपीएल में पहले भी कप्तानी कर चुका है।     रुतुराज गायकवाड़ IPL 2026- 14 मैच 337 रन     ऋषभ पंत- 27 करोड़ के ऋषभ पंत की कप्तानी पर भी तलवार लटकी है। पिछले दो सीजन में देखने को मिला है कि लखनऊ सुपर जाएंट्स सीजन की शुरुआत में काफी खराब खेलती है, उनकी बैटिंग-बॉलिंग दोनों निराश करती है, मगर जैसे ही टीम टूर्नामेंट से बाहर होती है या होने की कगार पर होती है सभी खिलाड़ी फॉर्म में लौट जाते हैं, सभी खुलकर खेलने लगते हैं और अंत में टीम कुछ मैच जीतती भी है। पंत का निजी परफॉर्मेंस हालांकि उनके स्टैंडर्ड के हिसाब से काफी खराब रहा है। एलएसजी उन्हें रिटेन तो कर सकती है, मगर कप्तान बदलने का समय आ गया है। टीम में मिचेल मार्श और एडन मारक्रम जैसे दो अनुभवी इंटरनेशनल कप्तान भी है।     ऋषभ पंत IPL 2026- 14 मैच 312 रन     अक्षर पटेल- अक्षर पटेल एक बेहतरीन खिलाड़ी है, मगर उनमें एक लीडर की झलक नहीं दिखाई देती। दिल्ली कैपिटल्स को एक ऐसे कप्तान की जरूरत है जो आगे आकर टीम को लीड करे और जीत का रास्ता दिखाए। डीसी की टीम में केएल राहुल एक ऐसा नाम है, जो आईपीएल में पहले भी कप्तानी कर चुका है। एलएसजी को वह प्लेऑफ तक लेकर गए हैं। अक्षर का निजी परफॉर्मेंस में भी बतौर कप्तान काफी कमी आई है।     अक्षर पटेल IPL 2026- 14 मैच 173 रन और 11 विकेट     अजिंक्य रहाणे- 2024 की चैंपियन कोलकाता नाइट राइडर्स की किस्मत ट्रॉफी जीतने के बाद मानों अचानक पलट गई। मेंटोर गौतम गंभीर टीम इंडिया के हेड कोच बन गए, वहीं टीम ने चैंपियन कप्तान श्रेयस अय्यर को भी रिलीज कर दिया। अय्यर को रिलीज करने के बाद जब केकेआर की टीम नीलामी में उतरी तो उन्हें कोई बड़ा लीडर अपनी टीम में नहीं जोड़ा। अनुभवी अजिंक्य रहाणे को उन्होंने अंत में कप्तानी सौंपी, मगर उनके अंडर टीम का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। केकेआर को एग्रेसिव कप्तान की जरूरत है जो नई सोच के साथ टीम को आगे ले जा सके।    

Women Become Owner: जिले में 65% संपत्ति हिस्सेदारी महिलाओं के नाम, रोज हो रहे 75 पंजीयन

भोपाल  मौजूदा वित्तवर्ष में हुई रजिस्ट्री में आधी आबादी की संपत्ति की हिस्सेदारी 65 फीसदी तक हो गई है। हर साल 7 फीसदी की दर से ये बढ़ोतरी हो रही है। हालांकि, कुल संपत्तियों में महिलाओं का हिस्सा 19 फीसदी ही है। मध्य प्रदेश के भोपाल जिले में पंजीयन को लेकर सामने आ रही रोजाना की रिपोर्ट से ये स्थिति सामने आ रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह महिलाओं को रजिस्ट्री में दो फीसदी तक मिलने वाली छूट को बताया जा रहा है। संपत्ति के क्रय विक्रय को लेकर हो रहे पंजीयन में रोजाना महिलाओं के नाम जिले में औसतन 75 नए पंजीयन किए जा रहे हैं। ये क्रय विक्रय के औसत पंजीयन का 65 फीसदी है। बीते साल महिलाओं के नाम 38 हजार करोड़ रुपए की संपत्ति हुई भोपाल की शहरी संपत्ति में महिलाओं की हिस्सेदारी साल दर साल बढ़ोतरी कर रही है। बीते वित्तीय वर्ष 2025-26 की बात करें तो प्रदेश भर में महिलाओं के नाम 38 हजार करोड़ रुपए की संपत्ति खरीदी गई थी। इसमें भोपाल में 5900 करोड़ रुपए की संपत्ति महिलाओं के नाम पर दर्ज हुई थी। वित्त वर्ष 2024-25 की तुलना में ये दो फीसदी ज्यादा था। जिले में महिलाओं के नाम पर संपत्ति खरीदकर छूट का लाभ नियम से 128 करोड़ रुपए की स्टांप ड्यूटी बचाई जा सकी थी। पंद्रह दिन में महिलाओं के नाम 9000 संपत्तियां इस संबंध में जिला पंजीयक स्वप्नेश शर्मा का कहना है कि, पंजीयन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि, हर पंद्रह दिन में प्रदेश भर में महिलाओं के नाम पर 9400 संपत्तियां रजिस्टर्ड हो रही है। जबकि पुरुषों के नाम 7700 संपत्तियां दर्ज हो रही हैं। जाहिर है कि, महिलाओं के नाम 626 संपत्तियां रोजाना रजिस्टर्ड हो रही है। शासन के तय नियमों के अनुसार, संपदा 2.0 से पंजीयन की प्रक्रिया की जा रही है। अब पोर्टल पर किसी प्रकार की दिक्कत नहीं आ रही है। हर तरह की प्रॉपर्टी की डिमांड ज्यादा खास बात ये है कि, मौजूदा समय में जिलेभर में फ्लैट, प्लॉट, डुप्लेक्स, फार्म हाउस और कृषि भूमि हर श्रेणी की प्रॉपर्टी की खरीदारी हो रही है। खासकर शहर के विस्तार वाले इलाकों में निवेशकों की रुचि सबसे ज्यादा देखी जा रही है। रजिस्ट्री कार्यालय के अफसरों का कहना है कि, ज्यादा संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। हालांकि, उनका ये भी कहना कि, भारतीय कल्चर के के चलते यहां आम दिनों के मुकाबले त्योहारी सीजन में लोग प्रॉपर्टी की खरीदी ज्यादा करते हैं।

पेट्रोल-एथेनॉल दोनों पर चलेगी Maruti की नई कार, 5 जून को लॉन्च संभव

मुंबई  केंद्रीय सड़क परिवहन और हाईवे मंत्री नितिन गडकरी ने जानकारी दी है कि देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी Maruti Suzuki 5 जून, 2026 को वर्ल्ड एनवायरनमेंट डे पर भारत में एक फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल को लॉन्च कर सकती है. सड़क परिवहन और हाईवे मंत्री ने महाराष्ट्र के नागपुर में एक इवेंट के दौरान इसकी घोषणा की, जिसमें गडकरी ने कहा कि यह गाड़ी E100 फ्यूल ग्रेड पर चल सकेगी।  इस इवेंट में बोलते हुए नितिन गडकरी ने कहा कि, "ऐसे फ्लेक्स-फ्यूल इंजन वाली गाड़ियां जल्द ही बड़े पैमाने पर आने वाली हैं. इस साल पर्यावरण दिवस के मौके पर, दिल्ली में एक प्रोग्राम है, जहां Maruti Suzuki 100 प्रतिशत इथेनॉल से चलने वाली गाड़ियां लॉन्च करेगी।  बता दें कि Maruti Suzuki की पेरेंट कंपनी Suzuki जापान ने पिछले साल Japan Mobility Show 2025 में Maruti Fronx सबकॉम्पैक्ट SUV का फ्लेक्स-फ्यूल वर्जन प्रदर्शित किया था. इसके साथ ही, कम्प्रेस्ड बायोगैस से चलने वाली Maruti Victoris समेत कई दूसरी दो-पहिया और चार-पहिया गाड़ियां भी दिखाई गई थीं।  Suzuki ने उस समय Maruti Fronx फ्लैक्स-फ्यूल के बारे में गाड़ी के साइज़ के अलावा कुछ ही जानकारी दी थी. इंडिया-स्पेक मॉडल के मुकाबले, जापान में बिकने वाली Maruti Fronx में बड़ा नैचुरली एस्पिरेटेड 1.5-लीटर K-सीरीज़ पेट्रोल इंजन इस्तेमाल किया जाता है, जिसके साथ मैनुअल और ऑटोमैटिक गियरबॉक्स का विकल्प मिलता है।  भारतीय बाजार में, यह सबकॉम्पैक्ट SUV या तो 1.2-लीटर नैचुरली एस्पिरेटेड पेट्रोल या 1.0-लीटर टर्बो-पेट्रोल इंजन ऑप्शन के साथ आ सकती है, जिसके साथ मैनुअल और ऑटोमैटिक दोनों (1.2 पेट्रोल पर AMT) मिलते हैं. उस समय Suzuki ने Fronx फ्लेक्स फ्यूल के लिए इथेनॉल ब्लेंड रेटिंग के बारे में कभी नहीं बताया, हालांकि इसके साथ दिखाया गया दूसरा मॉडल, Suzuki Gixxer 250 का फ्लेक्स-फ्यूल वेरिएंट, E85 तक सपोर्ट करने वाला था। 

मध्य प्रदेश में टाउनशिप परियोजनाओं पर बड़ा फैसला, अब नियमों के तहत होगा विकास

भोपाल  मध्यप्रदेश में टाउनशिप और बड़े आवासीय प्रोजेक्ट्स के विकास को लेकर सरकार ने महत्वपूर्ण बदलाव कर दिए हैं। अब मास्टर प्लान में लैंड यूज परिवर्तन करवाकर छोटे क्षेत्र में टाउनशिप विकसित करना आसान नहीं रहेगा। नगरीय विकास विभाग ने नगर तथा ग्राम निवेश नियम 2012 में संशोधन करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि टाउनशिप विकास के मामलों में अब इंटीग्रेटेड टाउनशिप पॉलिसी के प्रावधान प्रभावी होंगे। इसके बाद प्रदेश में 10 हेक्टेयर से कम क्षेत्र में टाउनशिप विकसित नहीं की जा सकेगी। अब नहीं टाउनशिप के लिए इंटीग्रेटेड नियम ही मान्य अभी तक एमपी के कई शहरों में मास्टर प्लान के तहत लैंड यूज बदलवाकर 2 हेक्टेयर जैसी छोटी जमीन पर भी आवासीय कॉलोनियां और टाउनशिप विकसित की जा रही थीं। सरकार ने फरवरी 2026 में इस संशोधन का प्रारूप जारी किया था। दावे-आपत्तियों के निराकरण के बाद मई से इसे अधिसूचित कर प्रभावी कर दिया गया है। संशोधन में नई धारा जोड़कर यह स्पष्ट किया है कि मास्टर प्लान या लैंड यूज परिवर्तन संबंधी प्रावधानों के बावजूद टाउनशिप के लिए इंटीग्रेटेड नियम ही मान्य होंगे। इंटीग्रेटेड टाउनशिप प्लान में ये संशोधन     अब इंटीग्रेटेड टाउनशिप पॉलिसी के नियम प्रभावी होंगे     5 लाख से कम आबादी वाले शहरों में न्यूनतम 10 हेक्टेयर तो इससे अधिक आबादी वाले शहरों में न्यूनतम 20 हेक्टेयर जमीन अनिवार्य।     नगरीय सीमा या प्लानिंग एरिया के बाहर कम से कम 40 हेक्टेयर में ही टाउनशिप विकसित होगी।     24 से 30 मीटर चौड़ी सड़क से कनेक्टिविटी जरूरी     सड़क, पेयजल, सीवेज, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था डेवलपर को स्वयं ही करनी होगी।     डेवलपर के लिए 5 करोड़ नेटवर्थ और 6 करोड़ टर्नओवर अनिवार्य।     लैंड यूज परिवर्तन के लिए अब 10 फीसदी राशि जमा करनी होगी।     प्रस्तावों पर सचिव नगरीय विकास या कलेक्टर की अध्यक्षता वाली समिति निर्णय लेगी। ये होंगे फायदे     बड़े और नियोजित टाउनशिप विकास को बढ़ावा मिलेगा।     अव्यवस्थित कॉलोनियों पर नियंत्रण लगेगा।     सड़क, पानी, बिजली और सीवेज जैसी सुविधाएं बेहतर होंगी।     पर्यावरणीय मानकों का पालन सुनिश्चित हो सकेगा और शहरी विकास अधिक व्यवस्थित और दीर्घकालिक होगा। ये नुकसान भी     छोटे और मझोले डेवलपर्स बाजार से बाहर हो सकते हैं     एफॉर्डेबल हाउसिंग प्रोजेक्ट्स कम होने की आशंका     मध्यमवर्गीय लोगों के लिए सस्ते घरों की उपलब्धता घट सकती है     बड़े भूखंड जुटाना कठिन होने से प्रोजेक्ट्स की लागत बढ़ सकती है     भोपाल-इंदौर में आवासीय प्रोजेक्ट्स की रगतार कम होगी एफॉर्डेबल हाउसिंग पर पड़ सकता है असर नए नियमों से छोटे और मझोले डेवलपर्स की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। रियल एस्टेट क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सबसे ज्यादा असर भोपाल और इंदौर जैसे शहरों में होगा। यहां 10 हेक्टेयर क्षेत्र जुटाना छोटे डेवलपर्स के लिए आसान नहीं होगा। वहीं पॉलिसी के तहत डेवलपर के लिए न्यूनतम 5 करोड़ की नेटवर्थ और 6 करोड़ रुपए का औसत वार्षिक टर्नओवर भी प्रभाव डालेगा। साथ ही टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग में पंजीयन के लिए 50 हजार रुपए खर्च करने होंगे, वहीं पांच साल बाद नवीनीकरण के लिए भी 25 हजार देना होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे और मझोले डेवलपर्स मध्यमवर्गीय और किफायती आवासीय योजनाएं विकसित करते हैं। ऐसे डेवलपर्स बाजार से बाहर होंगे तो एफॉर्डेबल हाउसिंग प्रोजेक्ट्स की संख्या घटने की आशंका है। साधिकार समितियां करेंगी अनुमोदन अब टाउनशिप संबंधी प्रस्तावों पर संचालक टाउन एंड कंट्री प्लानिंग की अध्यक्षता वाली समिति विचार नहीं करेगी। इसके स्थान पर नई साधिकार समितियां गठित की गई हैं। 5 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में सचिव नगरीय विकास की अध्यक्षता में समिति प्रस्तावों का परीक्षण-अनुमोदन करेगी। वहीं जिलों में अधिकार कलेक्टर की अध्यक्षता वाली समिति को है।

Crude Oil सस्ता होने से खुशखबरी, पेट्रोल-डीजल और LPG को लेकर बढ़ी उम्मीदें

नई दिल्‍ली  कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट आई है. अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की बढ़ती उम्मीदों के कारण सोमवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लुढ़ककर दो सप्ताह के निचले स्तर पर पहुंच गया. बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड वायदा 4.55% की गिरावट के साथ 98.83 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है. वहीं, अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी 4.73% टूटकर 92.03 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखा. दोनों ही अनुबंधों के लिए 7 मई के बाद का यह सबसे निचला स्तर है. क्रूड की कीमतों में आई यह गिरावट भारत के लिए बड़ी राहत है।  भारत के लिहाज से सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि इस संभावित समझौते से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) का संकट टल सकता है. तनाव से पहले दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से का तेल और एलएनजी का परिवहन इसी मार्ग से होता था. इस रूट के सुचारू होने से भारत में गैस और तेल की आपूर्ति निर्बाध रूप से जारी रहेगी, जिससे देश में एलपीजी की किल्लत का खतरा पूरी तरह टल जाएगा और आपूर्ति चेन मजबूत होगी।  अमेरिका-ईरान में शांति की उम्मीद से टूटे दाम तेल की कीमतों में यह बड़ी गिरावट अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की बढ़ती उम्मीदों के कारण आई है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान के बाद बाजार में सकारात्मक माहौल बना है. ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि दोनों देश एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर “काफी हद तक बातचीत पूरी” कर चुके हैं. इस समझौते के तहत मध्य पूर्व के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग को दोबारा पूरी तरह सुरक्षित बनाया जा सकता है।  भले ही ते बाजार इस खबर से झूम उठा हो, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अभी पूरी तरह जश्न मनाना जल्दबाजी होगी. राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ किया है कि उन्होंने अपने प्रतिनिधियों से ईरान के साथ किसी भी समझौते में जल्दबाजी न करने को कहा है, क्योंकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की रुकावटों समेत कई जटिल मुद्दों पर दोनों पक्षों में मतभेद अभी भी बरकरार हैं।   

Bhopal City Bus Service में बड़ा बदलाव, स्मार्ट सिटी CEO को मिला संचालन का जिम्मा

भोपाल भोपाल सिटी बसों से अब राजनीतिक दखल खत्म होने वाला है। यह सेवा अब मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा के अधीन हो गई है। इसका प्रभार अब महापौर या एमआईसी की जगह स्मार्ट सिटी सीईओ के पास रहेगा। भोपाल सिटी लिंक लिमिटेड‎(बीसीएलएल) ‎राज्य सरकार की नई 'मुख्यमंत्री सुगम‎परिवहन सेवा' का हिस्सा बन गई है। ‎इसका आधिकारिक पत्र भोपाल नगर निगम ‎को सौंप दिया गया है। अब तक बीसीएलएल में महापौर‎और एमआईसी (मेयर इन काउंसिल)‎ सदस्यों (पार्षदों) का सीधा दखल होता ‎था, लेकिन अब कमान पूरी तरह ‎प्रशासनिक अफसरों के हाथ में होगी। जब तक नया कार्यकारी बोर्ड पूरी ‎तरह आकार नहीं ले लेता, तब तक वर्तमान ‎व्यवस्था के तहत सीईओ के पद पर अंजू‎ अरुण ही प्रभारी बनी रहेंगी।‎ नई नीति में प्रदेश को सात जोन में बांटा नई नीति के तहत पूरे प्रदेश को 7 जोन ‎में बांटा गया है। इसमें भोपाल क्षेत्र के साथ ‎नर्मदापुरम संभाग को भी जोड़ा गया है।‎दोनों संभागों के कलेक्टर इसके बोर्ड में‎ होंगे, जो बस सेवा को नियंत्रित करेंगे।‎ सिफारिशें नहीं चलेंगी जानकारी के अनुसार, रूट्स तय करने, बसों के स्टॉपेज या‎नई बसें चलाने में अब पार्षदों या ‎एमआईसी की सिफारिशें नहीं चलेंगी। पूरा‎ नियंत्रण क्षेत्रीय कंपनी के पास होगा। इससे ‎सेवा के संबंध में फैसले तेजी से और‎ व्यावहारिक आधार पर लिए जाएंगे।‎ भोपाल क्षेत्रीय कंपनी ही अब तय करेगी ‎कि शहर और उप नगरीय इलाकों में कौन‎ से रूट पर कितनी बसें चलेंगी। किराया‎ निर्धारण और परमिट की पूरी व्यवस्था भी ‎यही कंपनी संभालेगी। जिससे नगर निगम‎पर निर्भरता खत्म होगी।‎ बीसीएलएल की बसों में अक्सर आने‎ वाली शिकायतों (जैसे चालकों की‎मनमानी, समय पर बस न मिलना) को‎दूर करने के लिए इसे टेलिजेंट ट्रांसपोर्ट‎ मैनेजमेंट सिस्टम से लैस किया जाएगा। ‎इससे बसों की लाइव ट्रैकिंग और सुचारू‎ मॉनिटरिंग सीधे मुख्यालय से होगी।‎ कार्रवाई भी समय पर हो सकेगी।‎ भोपाल क्लस्टर में चलेंगी 398 बसें‎ योजना के पहले चरण में भोपाल क्षेत्र के 104 ‎मार्गों पर कुल 398 बसें चलाने का खाका तैयार ‎किया गया है। ये बसें भोपाल शहर के मुख्य‎ मार्गों से लेकर उपनगरीय क्षेत्रों और नर्मदापुरम ‎संभाग के प्रमुख रूट्स को आपस में जोड़ेंगी।‎ सरकार खुद बसें खरीदने के बजाय निजी‎ ऑपरेटरों के जरिए इन 398 बसों का संचालन‎ पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल‎पर कराएगी। जिससे बीसीएलएल की तरह नगर‎ निगम पर वित्तीय बोझ नहीं बढ़ेगा।‎ बता दें कि पहले साढ़े तीन सौ से ज्यादा सिटी बसें भोपाल शहर में दौड़ती थी, लेकिन इनकी संख्या लगातार घटती गई। वर्तमान में करीब 70 बसें ही सड़कों पर दौड़ रही है। इस वजह से टैक्सी, ऑटो पर यात्रियों की निर्भरता बढ़ गई है।