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AMCA बनाम F-35: क्या भारत रचेगा नया इतिहास? देसी फाइटर जेट प्रोजेक्ट ने बढ़ाई दुनिया की धड़कनें

बेंगलुरु  भारत ने रक्षा तकनीक की दुनिया में एक ऐसा दांव चला है, जिसने दुनिया के बड़े सैन्य विशेषज्ञों को चौंका दिया है. पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट एडवांस मीडियम कंबैट एयरक्राफ्ट यानी AMCA के लिए जारी हुए आरएफपी ने सिर्फ एक नए विमान की कहानी शुरू नहीं की, बल्कि भारत के डिफेंस इंडस्ट्रियल मॉडल को ही बदलने का संकेत दे दिया है. इसमें सबसे बड़ा संदेश यह है कि करीब सात दशक तक लड़ाकू विमान निर्माण में अकेले खिलाड़ी रहे सरकारी कंपनी एचएएल का एकाधिकार अब टूटता दिख रहा है. पहली बार भारत सरकार ने AMCA जैसे रणनीतिक और अत्यंत संवेदनशील प्रोजेक्ट के लिए निजी कंपनियों को आगे कर दिया है।  एलएंडटी-बीईएल, टाटा एडवांस सिस्टम्स और भारत फोर्ज-बीईएचएल जैसे निजी समूह अब उस दौड़ में हैं, जो भारत को अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों की श्रेणी में ला सकती है. लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत वाकई 30 महीने में वह कर सकता है, जिसके लिए अमेरिका जैसी सुपरपावर को 5 से 6 साल लगे थे? AMCA सिर्फ फाइटर जेट नहीं, भारत का टेक्नोलॉजिकल टेस्ट है AMCA परियोजना को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान सिर्फ एक एयरक्राफ्ट नहीं होता. यह उड़ने वाला सुपरकंप्यूटर होता है. इसमें स्टील्थ डिजाइन, सेंसर फ्यूजन, AI आधारित एवियोनिक्स, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, सुपरक्रूज क्षमता और अत्याधुनिक हथियार एक साथ काम करते हैं. दुनिया में अभी तक केवल अमेरिका, चीन और सीमित स्तर पर रूस ही इस तकनीक को पूरी तरह विकसित कर पाए हैं. भारत अब इसी क्लब में प्रवेश करना चाहता है।    लेकिन असली कहानी यहां टाइमलाइन की है. अमेरिका को 72 महीने, भारत को सिर्फ 30 महीने! AMCA के RFP के अनुसार:     पहला प्रोटोटाइप 24 महीने में तैयार करना होगा     30 महीने के भीतर उसकी पहली उड़ान होगी     कुल 1800 शॉर्टिज सात वर्षों में पूरी करनी होंगी     उसके बाद ही सीरियल प्रोडक्शन शुरू होगा यानी अगर सब कुछ समय पर हुआ तो 2034-35 तक AMCA भारतीय वायुसेना में शामिल हो सकता है. अब इसकी तुलना अमेरिका से कीजिए।  F-22 और F-35 का उदाहरण अमेरिका ने 1991 में लॉकहीड मार्टिन-बोइंग टीम को F-22 रैप का कॉन्ट्रैक्ट दिया था. लेकिन पहला प्रोटोटाइप 1997 में रोलआउट हुआ और उसी साल उसकी पहली उड़ान हुई. यानी पहली उड़ान में करीब 72 महीने लगे. F-35 की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. F-35 लाइटिंग-II का कॉन्ट्रैक्ट 2001 में दिया गया. पहला प्रोटोटाइप 2006 में तैयार हुआ. यानी यहां भी लगभग 60 महीने लगे. अब भारत कह रहा है कि वह 30 महीने में पहली उड़ान करा देगा. यही वजह है कि दुनिया की नजरें इस प्रोजेक्ट पर टिक गई हैं।  HAL का युग खत्म या नई शुरुआत? AMCA प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा राजनीतिक और औद्योगिक संदेश यह है कि भारत अब सरकारी मॉडल से आगे बढ़कर निजी रक्षा उद्योग पर भरोसा कर रहा है. एचएएल ने दशकों तक मिग-21, जैगुआर, सुखोई-30MKI और तेजस जैसे विमानों का निर्माण किया. लेकिन तेजस प्रोग्राम में हुई लंबी देरी ने सरकार को यह सोचने पर मजबूर किया कि क्या भारत को तेज़ी से आगे बढ़ने के लिए नए मॉडल की जरूरत है? फिर यहीं से निजी क्षेत्र की एंट्री हुई. हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि प्रोटोटाइप निर्माण के बाद जब AMCA के बड़े पैमाने पर उत्पादन की बारी आएगी, तब एचएएल फिर से रेस में शामिल हो सकता है. क्योंकि HAL के पास मौजूदा असेंबली लाइनें हैं. एयरफोर्स के साथ दशकों का अनुभव है. सप्लाई चेन पहले से विकसित है. बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता है. लेकिन जिस निजी कंपनी को शुरुआती प्रोटोटाइप कॉन्ट्रैक्ट मिलेगा, उसे तकनीकी बढ़त मिल जाएगी. इसलिए यह लड़ाई सिर्फ एक कॉन्ट्रैक्ट की नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के एयरोस्पेस इकोसिस्टम की है।  सबसे बड़ी चुनौती- अनुभव की कमी यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारतीय निजी कंपनियां इतनी जल्दी फाइटर जेट निर्माण की क्षमता विकसित कर पाएंगी? सच्चाई यह है कि किसी भी निजी कंपनी ने अभी तक फाइटर जेट की फाइनल असेंबली लाइन नहीं बनाई है. टाटा ने जरूर एयरबस के साथ मिलकर C-295 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट लाइन बनाई है, लेकिन वह फाइटर जेट नहीं है. स्टील्थ कोटिंग, सेंसर फ्यूजन और सुपरसोनिक डिजाइन जैसी तकनीकें भारत के लिए नई हैं।  इसके अलावा RFP में साफ कहा गया है कि नई कंपनी भारतीय नियंत्रण में होगी. विदेशी शेयर होल्डिंग सीमित रहेगी. सीईओ, सीएफओ और बोर्ड भारतीय नागरिक होंगे. विदेशी कंपनियों की प्रत्यक्ष भागीदारी लगभग नहीं होगी. यानी भारत को यह लड़ाई लगभग अकेले लड़नी होगी।  क्या भारत चुपके से डिफेंस टेक सुपरपावर बन रहा है? ऐसे में यह बड़ा सवाल बन गया है. यहां एक बड़ा बदलाव दिखाई देता है. पिछले दस वर्षों में भारत ने रक्षा क्षेत्र में कई बड़े परिवर्तन किए हैं. जैसे-     मिसाइल टेक्नोलॉजी में तेज प्रगति     स्वदेशी रडार और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम     ड्रोन और AI आधारित युद्ध प्रणालियां     ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक क्षमता     तेजस Mk1A और टीईडीबीएफ जैसी परियोजनाएं अब AMCA उस पूरी रणनीति का अगला चरण है. सरकार शायद यह समझ चुकी है कि अगर भारत को भविष्य के युद्धों में आत्मनिर्भर बनना है, तो उसे अब सिर्फ लाइसेंस प्रोडक्शन से आगे बढ़ना होगा. यही वजह है कि AMCA को केवल रक्षा परियोजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय तकनीकी मिशन की तरह देखा जा रहा है।  AMCA की सबसे बड़ी ताकत उसकी महत्वाकांक्षा है और सबसे बड़ा खतरा भी वही है. अगर टाइमलाइन फिसली तो लागत कई गुना बढ़ सकती है. एयरफोर्स की क्षमता प्रभावित होगी. विदेशी लड़ाकू विमानों पर निर्भरता बढ़ेगी. निजी क्षेत्र का भरोसा भी हिल सकता है. तेजस परियोजना पहले ही दिखा चुकी है कि भारत में जटिल एयरोस्पेस प्रोजेक्ट समय से पीछे जा सकते हैं. ऐसे में 30 महीने की समय सीमा कई विशेषज्ञों को अवास्तविक लग रही है।  असली गेमचेंजर क्या हो सकता है? फिर भी इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सकारात्मक पक्ष यह है कि भारत अब टेक्नोलॉजी रिस्क लेने को तैयार दिख रहा है. पहले भारत विदेशी तकनीक खरीदता था. अब भारत खुद प्लेटफॉर्म डिजाइन करना चाहता है. पहले सरकारी कंपनियां केंद्र में थीं. … Read more

रूस दौरे के बीच बड़ा भू-राजनीतिक घटनाक्रम, पुतिन-तालिबान समझौते से बढ़ी हलचल

नई दिल्ली अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कभी-कभी एक ही दिन की घटनाएं आने वाले कई वर्षों की रूपरेखा तैयार कर देती हैं. गुरुवार को कुछ ऐसा ही हुआ. इस्लामाबाद में बैठकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ तालिबान और भारत के खिलाफ जहर उगल रहे थे. उसी समय रूस में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और तालिबान एक साथ पाकिस्तान की फील्डिंग सेट कर रह थे. हालांकि दोनों के तरीके अलग-अलग थे, लेकिन जो कदम उठाए वह पाकिस्तान खिलाफ था. रूस में पहला इंटरनेशनल सिक्योरिटी फोरम आयोजित किया गया, जिसमें 120 से ज्यादा देशों के प्रतिनिधि पहुंचे थे. भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के प्रतिनिधि भी यहां थे. भारत के NSA अजीत डोभाल ने कहा कि आतंकवाद पर ‘दोहरा मापदंड नहीं चलेगा’. वहीं दूसरी तरफ रूस और तालिबान के बीच सैन्य सहयोग समझौते पर मुहर लग रही थी. रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान अफगानिस्तान ने एयर डिफेंस सिस्टम भी मांगे. तीनों घटनाओं को अलग-अलग देखने पर तस्वीर अधूरी लग सकती है. लेकिन इन्हें एक साथ जोड़ें तो पाकिस्तान के लिए उभरती नई रणनीतिक चुनौती साफ दिखाई देती हैं।  शहबाज शरीफ ने क्या कहा? पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम की वर्षगांठ पर दिए संदेश में शहबाज शरीफ ने आरोप लगाया कि तालिबान सरकार भारत के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में मदद कर रही है. यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान और तालिबान के रिश्ते लगातार खराब हो रहे हैं. डूरंड लाइन पर झड़पें बढ़ी हैं और पाकिस्तान की एयरफोर्स कई बार अफगानिस्तान के अंदर हवाई और सैन्य कार्रवाई कर चुकी है. लेकिन जब शहबाज शरीफ जहर उगल रहे थे, तब रूस में कुछ और ही हो रहा था।  रूस में क्या हो रहा था? रूस में आयोजित इंटरनेशनल सिक्योरिटी फोरम में NSA अजीत डोभाल ने आतंकवाद पर सख्त रुख अपनाया. डोभाल ने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में दोहरा मापदंड नहीं हो सकता. जिम्मेदार देशों को तय करना होगा कि वे आतंकवाद के प्रायोजकों का समर्थन करेंगे या उनके खिलाफ निर्णायक कार्रवाई. डोभाल ने किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन आतंकवाद को लेकर भारत का रुख लंबे समय से पाकिस्तान के खिलाफ रहा है. यानी जिस दिन शहबाज भारत और तालिबान पर आरोप लगा रहे थे, उसी दिन भारत रूस के मंच से आतंकवाद पर अपनी लाइन दुनिया के सामने रख रहा था. लेकिन पाकिस्तान को इसकी आदत है. इसीलिए पाकिस्तान के लिए असली बुरी खबर अफगानिस्तान से आई।  असली कहानी रूस-तालिबान डील में छिपी है द इंडिपेंडेंट की रिपोर्ट के मुताबिक सबसे बड़ा घटनाक्रम रूस और तालिबान के बीच हुआ सैन्य सहयोग समझौता है. रूस पहले ही जुलाई 2025 में तालिबान सरकार को मान्यता देने वाला दुनिया का पहला देश बन चुका है. अब उसने रक्षा सहयोग को भी आगे बढ़ा दिया है. हालांकि समझौते की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन अफगानिस्तान की प्राथमिकताओं को देखकर कई सवाल उठ रहे हैं. तालिबान की सबसे बड़ी सैन्य चिंता पाकिस्तान की सीमा पार कार्रवाई है. पाकिस्तान ने पिछले कई महीनों में कई बार आतंकवाद विरोधी अभियान के नाम पर अफगान क्षेत्र में हवाई हमले किए हैं. अफगानिस्तान की नजर में यह उसकी संप्रभुता का उल्लंघन है. यही वजह है कि अफगानिस्तान अब रूस से आधुनिक एयर डिफेंस क्षमता विकसित करना चाहता है ताकि भविष्य में अगर कोई उसकी हवाई सीमा का उल्लंघन करे तो जवाब दिया जा सके।  पाकिस्तान की टेंशन क्यों बढ़ सकती है? अभी तक पाकिस्तान के पास एक बड़ा रणनीतिक फायदा था. अफगानिस्तान के पास आधुनिक एयर डिफेंस नेटवर्क नहीं है. लेकिन अगर रूस किसी स्तर पर एयर डिफेंस, रडार, सैन्य प्रशिक्षण, उपकरणों की मरम्मत या पुराने लेकिन प्रभावी रक्षा सिस्टम उपलब्ध कराता है, तो स्थिति बदल सकती है. तालिबानी रक्षा मंत्री मोहम्मद याकूब ने एयर डिफेंस मांगा है. हो सकता है कि भविष्य में रूस उसे S-400 या पैंटसिर एयर डिफेंस सिस्टम दे. यह भी हो सकता है कि अपने पुराने मिग या सुखोई जेट भी अफगानिस्तान को दे. इसका मतलब यह नहीं कि कल ही अफगानिस्तान को मिग या सुखोई विमान मिल जाएंगे. लेकिन यह जरूर है कि तालिबान पहली बार किसी बड़ी सैन्य शक्ति के साथ औपचारिक रक्षा साझेदारी बना रहा है. और यह बात पाकिस्तान के साथ-साथ अमेरिका को परेशान कर सकती है।  हिंदू-सिख पर क्या बोला तालिबान? मॉस्को में तालिबान के रक्षा मंत्री मोहम्मद याकूब ने हिंदू और सिख समुदायों को अफगानिस्तान लौटने का खुला निमंत्रण भी दिया. उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान उनका भी देश है और तालिबान उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करेगा. यह सिर्फ सामाजिक बयान नहीं था. इसे तालिबान की उस कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है जिसमें वह दुनिया के सामने खुद को सिर्फ एक उग्रवादी संगठन नहीं बल्कि एक ‘सामान्य सरकार’ के रूप में पेश करना चाहता है। 

बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर सुरक्षा एजेंसियां सतर्क, दूसरे राज्यों में भी बढ़ाई गई निगरानी

भुवनेश्वर ओडिशा सरकार ने पश्चिम बंगाल के साथ सीमा साझा करने वाले अपने जिलों को बांग्लादेशी घुसपैठियों के संभावित प्रवेश को लेकर सतर्क किया है। ओडिशा सरकार ने यह कदम पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी प्रशासन द्वारा बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ 'पता लगाओ, हटाओ और निर्वासित करो' की नीति अपनाए जाने के बाद उठाया है। पश्चिम बंगाल से सटे बालासोर और मयूरभंज जिलों के अधिकारियों को ओडिशा सरकार ने यह निर्देश तब जारी किए गए, जब उत्तर 24 परगना जिले के बसीरहाट उप-मंडल स्थित हाकिमपुर जांच चौकी पर बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिकों के एकत्र होने की खबर सामने आई। सीमा पर अलर्ट पुलिस उपमहानिरीक्षक (पूर्वी परिक्षेत्र) पिनाक मिश्रा ने कहा, 'चूंकि संदिग्ध बांग्लादेशी घुसपैठियों ने पश्चिम बंगाल के भीतर आवाजाही शुरू कर दी है, इसलिए उनके ओडिशा में प्रवेश की आशंका है। इसी कारण हम सतर्क हैं और ऐसी किसी भी गतिविधि को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठा रहे हैं।' ओडिशा-पश्चिम बंगाल सीमा पर निगरानी बढ़ा दी गई है ताकि राज्य में किसी भी प्रकार की अवैध आवाजाही को रोका जा सके। मिश्रा ने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से घुसपैठियों का पता लगाकर उन्हें कानून के तहत भारत से निर्वासित करने का स्थायी निर्देश है और हम उसी के अनुरूप कार्य कर रहे हैं। राज्य सरकार ने सभी जिलों विशेषकर सीमावर्ती जिलों में विशेष अभियान चलाया है। घुसपैठियों के जलमार्गों से प्रवेश की संभावना को लेकर मिश्रा ने बताया कि इसके लिए संबंधित पुलिस थानों को सतर्क कर दिया गया हैं। दो जिलों में ज्यादा सतर्कता बालासोर और मयूरभंज ओडिशा के दो ऐसे जिले हैं, जिनकी सीमा पश्चिम बंगाल से लगती है। बालासोर जिले के भोगराई और जलेश्वर ब्लॉक पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर, पश्चिम मेदिनीपुर और झाड़ग्राम जिलों से सटे हुए हैं, जबकि मयूरभंज जिले की पूर्वी सीमा का एक हिस्सा पश्चिम मेदिनीपुर जिले से लगता है। राजनीतिक बयानबाजी शुरू इस बीच, ओडिशा में बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और विपक्षी बीजू जनता दल (बीजद) के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गया। ओडिशा के कानून मंत्री पृथ्वीराज हरिचंदन ने कहा कि घुसपैठिये राज्य के लिए एक बड़ी समस्या हैं और राज्य सरकार उनकी पहचान तथा निर्वासन के लिए अभियान पहले ही शुरू कर चुकी है, जबकि बीजद नेता गणेश्वर बेहरा ने इस दावे को खारिज कर दिया। बेहरा ने कहा, 'ओडिशा में घुसपैठिये ही केवल बड़ी समस्या नहीं हैं। पश्चिम बंगाल में स्थिति अलग है, वहां उनकी संख्या लाखों में है। ओडिशा में उनकी संख्या 150 से भी कम है। साढ़े चार करोड़ की आबादी वाले राज्य में घुसपैठियों की संख्या करीब 150 हो सकती है। यह बहुत छोटा मुद्दा है, लेकिन राज्य सरकार प्रचार पाने के लिए राई का पहाड़ बना रही है।' हालांकि, हरिचंदन ने चेतावनी जारी करते हुए कहा कि ओडिशा में अवैध रूप से रह रहे घुसपैठियों 'बच नहीं सकते'। उन्होंने कहा कि हम राज्य में रह रहे अवैध विदेशी नागरिकों को निर्वासित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

कम लागत, बेहतर उत्पादन और मिट्टी की सुरक्षा का नया विकल्प : नैनो उर्वरक

रायपुर खेती में बढ़ती लागत, मिट्टी की घटती उर्वरा शक्ति और रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से पैदा हो रही चुनौतियों के बीच अब नैनो यूरिया और नैनो डीएपी किसानों के लिए एक उपयोगी और लोकप्रिय विकल्प बन गई है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि किसान संतुलित और वैज्ञानिक तरीके से इनका उपयोग करें तो इससे खेती की लागत कम करने, उत्पादन बेहतर बनाने और मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिल सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले समय में खेती को टिकाऊ और लाभकारी बनाए रखने के लिए उर्वरकों के उपयोग के तौर-तरीकों में बदलाव जरूरी होगा। यही कारण है कि अब किसानों के बीच नैनो उर्वरकों को लेकर रुचि बढ़ रही है। छत्तीसगढ़ सहित देश के अधिकांश धान उत्पादक क्षेत्रों में सामान्यतः प्रति एकड़ 2 से 3 बोरी यूरिया और 1 बोरी डीएपी का उपयोग किया जाता है। मौजूदा कीमतों के अनुसार एक बोरी यूरिया की कीमत लगभग 270 रुपये और एक बोरी डीएपी की कीमत लगभग 1350 रुपये है। इस प्रकार केवल यूरिया और डीएपी पर प्रति एकड़ करीब 1900 से 2200 रुपये तक खर्च हो जाता है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार 500 मिलीलीटर नैनो यूरिया की एक बोतल का प्रभाव लगभग एक बोरी पारंपरिक यूरिया के बराबर माना जाता है। फसल में दो चरणों में छिड़काव के जरिए पारंपरिक यूरिया की जरूरत को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यदि किसान 2 बोरी ठोस यूरिया की जगह 2 बोतल नैनो यूरिया का उपयोग करते हैं तो अनुमानित खर्च 100 रुपये प्रति एकड़ बचत होती है। दो बोरी पारंपरिक यूरिया का मूल्य लगभग 540 रुपये है। इसके स्थान पर 2 बोतल नैनो यूरिया| लगभग 450-500 में आता है। यानि सीधे खाद लागत में बचत के साथ-साथ परिवहन, भंडारण और मजदूरी खर्च में भी कमी आती है। इसी प्रकार कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि 50 किलो डीएपी की पूरी मात्रा उपयोग करने के बजाय यदि किसान 25 किलो डीएपी के साथ 500 मिली नैनो डीएपी का उपयोग करें तो प्रति एकड़ लगभग 75 से 150 रुपये तक की बचत होती है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार पारंपरिक यूरिया का बड़ा हिस्सा मिट्टी, पानी और वातावरण में नष्ट हो जाता है। इसके विपरीत नैनो यूरिया के सूक्ष्म कण सीधे पौधों द्वारा तेजी से अवशोषित किए जाते हैं। इससे पौधों को संतुलित पोषण मिलता है। विशेषज्ञों के मुताबिक संतुलित उपयोग की स्थिति में इसके कई सकारात्मक परिणाम सामने आए है।फसल की बढ़वार बेहतर होती है। पौधों की हरियाली लंबे समय तक बनी रहती है। दानों का भराव मजबूत होता है।उत्पादन की गुणवत्ता सुधरती है। उर्वरकों की उपयोग दक्षता बढ़ती है। कई कृषि परीक्षणों में 5 से 8 प्रतिशत तक उत्पादन वृद्धि के संकेत भी मिले हैं। कृषि क्षेत्र के जानकार बताते हैं कि लगातार अधिक मात्रा में रासायनिक खाद के उपयोग से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है। नैनो उर्वरकों का संतुलित उपयोग मिट्टी में पोषक तत्वों के संतुलन को बनाए रखने में मदद कर सकता है। इसके अलावा रासायनिक अवशेष कम होते हैं।भूजल प्रदूषण घटता है।मिट्टी की जैविक सक्रियता बेहतर बनी रहती है।पर्यावरणीय प्रभाव कम होता है।इसी कारण वैज्ञानिक खेती में अब संतुलित उर्वरक उपयोग पर अधिक जोर दिया जा रहा है । वैज्ञानिक सलाह के अनुसार संतुलित रूप से नैनो उर्वरकों का उपयोग बढ़ाते हैं तोआयातित उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी है।विदेशी मुद्रा की बचत भी होगी। देश में उर्वरक उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। उत्पादन इकाइयों में रोजगार बढ़ेगा। कृषि क्षेत्र आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ेगा। कृषि विभाग के अनुसार प्रदेश में पारंपरिक उर्वरकों का पर्याप्त भंडारण उपलब्ध है और किसानों को घबराने की जरूरत नहीं है। रायपुर जिले की समितियों में वर्तमान मे यूरिया की उपलब्धता  9,102 मीट्रिक टन और कुल भंडारित यूरिया की मात्रा 10,732 मीट्रिक टन है, जब कि डीएपी की उपलब्धता 3,092 मीट्रिक टन और कुल भंडारित डीएपी की मात्रा 3,927 मीट्रिक टन है। इसके साथ ही कृषि सेवा केंद्रों और समितियों के माध्यम से नैनो यूरिया और नैनो डीएपी की उपलब्धता भी बढ़ाई जा रही है ताकि किसान आवश्यकता और उपयोगिता के आधार पर इन विकल्पों का इस्तेमाल कर सकें। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में वैज्ञानिक खेती, संतुलित उर्वरक उपयोग और आधुनिक तकनीकों का समन्वय ही खेती को अधिक लाभकारी बनाएगा। नैनो यूरिया और नैनो डीएपी को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण तकनीकी विकल्प माना जा रहा है, जो कम लागत, बेहतर उत्पादन और मिट्टी की सुरक्षा तीनों मोर्चों पर किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।

मध्य प्रदेश में ट्रांसफर सीजन शुरू, स्कूल शिक्षा विभाग ने मांगी स्कूलवार पदों की जानकारी

भोपाल  प्रदेश  में तबादलों का काउंटडाउन शुरू हो गया है। सरकार द्वारा लंबे समय से एक ही जगह पर जमे अधिकारियों और कर्मचारियों को हटाने की तैयारी तेज कर दी गई है। खासतौर पर राजस्व विभाग और पुलिस महकमे में बड़े स्तर पर फेरबदल के संकेत मिल रहे हैं। विभागीय स्तर पर अधिकारियों की सूचियां तैयार होना शुरू हो गई हैं। तीन साल या उससे अधिक समय से एक ही जिले और अनुभाग में पदस्थ अधिकारियों की जानकारी जुटाई जा रही है। इससे एसडीएम, तहसीलदार, नायब तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक और पटवारियों सहित कई अधिकारी प्रभावित होंगे। तबादले की अवधि नजदीक आने के साथ प्रदेश के अलग-अलग विभागों के विभागाध्यक्षों ने विभागीय तबादला नीति जारी करने के साथ जिलों में पदस्थ अलग-अलग कैडर के अफसरों का ब्यौरा जुटाना शुरू कर दिया है। लोक निर्माण और जल संसाधन विभाग ने इंजीनियरों की वर्तमान पोस्टिंग, पदनाम और अतिरिक्त प्रभार की जानकारी मांगी है तो स्कूल शिक्षा विभाग ने हर विद्यालय में पदस्थ एक-एक शिक्षक का ब्यौरा पोर्टल पर अपलोड करने के निर्देश दिए हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने संविदा कर्मचारियों के तबादले के लिए 2 जून तक ऑनलाइन आवेदन बुला लिए हैं, तो पीएचक्यू ने आरक्षक से सब इंस्पेक्टर तक के तबादले पांच जून तक करने की डेडलाइन तय कर दी है। मोहन कैबिनेट के फैसले के बाद 22 मई को सामान्य प्रशासन विभाग ने प्रदेश के कर्मचारी अधिकारियों के राज्य और जिला संवर्ग स्तर पर तबादले की पॉलिसी जारी कर दी है। इसमें तबादले की अलग-अलग परिस्थितियों के आधार पर विभागों को ऑनलाइन आवेदन मंगाने के लिए कहा गया है। साथ ही यह भी साफ किया गया है कि अगर कोई अधिकारी कर्मचारी सरकार द्वारा तय टारगेट को अचीव नहीं कर पाता है तो उसे प्रशासनिक आधार पर तीन साल की अवधि के पहले भी स्थानांतरित किया जा सकता है। जल संसाधन विभाग ने मांगी इंजीनियरों की पदस्थापना, अतिरिक्त प्रभार की जानकारी जल संसाधन विभाग ने आयुक्त कमांड क्षेत्र और विकास संचालनालय, आयुक्त भू अर्जन और पुनर्वास बाणसागर रीवा, सभी मुख्य अभियंता, परियोजना संचालक, अधीक्षण यंत्री और कार्यपालन यंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि विभाग के प्रथम, द्वितीय, तृतीय श्रेणी कर्मचारियों के नाम, पदनाम, पदस्थापना स्थल, जहां से वेतन निकलता है वहां की जानकारी के साथ गृह जिला, सेवानिवृत्ति तिथि, जिन पदों के अतिरिक्त प्रभार में हैं उस पद और कार्यालय का नाम तथा तारीख की जानकारी शासन को भेजें। स्कूल शिक्षा विभाग ने तबादले के पहले मांगा हर टीचर की पोस्टिंग का ब्यौरा उधर स्कूल शिक्षा विभाग ने भी एजुकेशन 3.0 पोर्टल पर हर विद्यालय में विषय वार पदस्थ शिक्षकों का ब्यौरा एंट्री करने के लिए कहा है। इसके लिए सभी जिला शिक्षा अधिकारियों से कहा गया है कि विद्यालय वार और विषय वार एंट्री कराएं और जिन शिक्षकों की मृत्यु हो गई है या रिटायर हो गए हैं, उनके नाम विद्यालय में पदस्थ शिक्षकों की सूची से हटाएं ताकि जब विभाग द्वारा तबादले की कार्यवाही की जाए तो यह स्थिति न बने कि विद्यालय में पहले से पर्याप्त शिक्षक पदस्थ हों और अतिरिक्त पदस्थापना हो जाए या फिर पद भरे होने की जानकारी पोर्टल पर हो जबकि वास्तव में टीचर न हों तो वहां पोस्टिंग न हो पाए। लोक शिक्षण आयुक्त इसकी जिलावार समीक्षा 30 मई को करेंगे। जनगणना में लगे शिक्षकों के तबादले फरवरी 2027 तक नहीं होंगे लोक शिक्षण आयुक्त ने एक अन्य निर्देश जारी कर कहा है कि जिन शिक्षकों की ड्यूटी जनगणना में लगी है उनके तबादले फरवरी 2027 तक नहीं होंगे। ऐसे शिक्षकों की संख्या 58 हजार से अधिक है जो जनगणना ड्यूटी में लगे हैं। इसलिए एक जून 2026 तक ऐसे सभी शिक्षकों की जानकारी एजुकेशन पोर्टल 3.0 पर एंट्री करने के लिए कहा गया है जो जनगणना में लगे हैं। एनएचएम ने 2 जून तक मांगा संविदा कर्मचारियों की डिटेल दूसरी ओर स्वास्थ्य विभाग ने भी इस पर काम शुरू कर दिया है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) की अपर मिशन संचालक दिशा नागवंशी ने एनएचएम में काम करने वाले संविदा कर्मचारियों के स्वैच्छिक स्थानांतरण के ऑनलाइन प्रस्ताव 2 जून तक मांगे हैं। इसके लिए संविदा तबादले की पॉलिसी भी जारी कर दी गई है। ऑनलान आवेदन 27 मई से लेने का सिलसिला पोर्टल पर शुरू हुआ है और 2 जून की रात 12 बजे तक आवेदन किए जा सकेंगे। इसके बाद तबादले किए जाएंगे। निर्देशों में कहा गया है कि तबादले के लिए तीन माह की सार्थक एप की उपस्थिति भी अपलोड करनी होगी। आवेदन सिर्फ ग्रामीण क्षेत्र से ग्रामीण क्षेत्र और शहरी क्षेत्र से शहरी क्षेत्र के लिए किए जा सकेंगे। रिक्त पद पर तबादले के लिए कम से कम और अधिकम 5 संस्थाओं की एंट्री आवेदन में करनी होगी। ऐसे कर्मचारी जिनकी नियुक्त दो साल के भीतर हुई है तथा दो साल में जिनका तबादला हो चुका है, उनके तबादले पर प्रतिबंध रहेगा। 5 जून तक आरक्षक से एसआई तक के तबादले करेंगे पुलिस आयुक्त-एसपी इसी तरह गृह विभाग के अंतर्गत पुलिस मुख्यालय ने भोपाल, इंदौर के पुलिस आयुक्त, एसपी रेल समेत सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों से कहा है कि किसी एक थाने में आरक्षक से लेकर सब इंस्पेक्टर तक के कर्मचारी की एक पद पर पदस्थापना पांच साल से अधिक नहीं होना चाहिए। साथ ही एक बार पोस्टिंग के बाद संबंधित कर्मचारी की पदस्थापना दोबारा उसी थाने में नहीं होनी चाहिए। अलग-अलग पदों पर पदस्थापना के मामले में किसी भी कर्मचारी की पोस्टिंग में तीन साल का अंतर होना चाहिए। इसके अलावा यह भी कहा गया है कि आरक्षक से लेकर सब इंस्पेक्टर तक के कर्मचारी को एक ही पुलिस अनुविभाग में दस साल से अधिक समय तक नहीं रहना चाहिए। पुलिस मुख्यालय ने इस आधार पर पांच जून तक तबादला करके सूची मुख्यालय को भेजने कहा है। सूत्रों के मुताबिक राज्य शासन जल्द ही तबादला नीति जारी कर सकता है। इसके पहले ही विभागों में अंदरखाने हलचल बढ़ गई है। कई अधिकारी अपने पसंदीदा जिलों में पदस्थापना के लिए राजनीतिक संपर्क साधने में जुट गए हैं। नेताओं और जनप्रतिनिधियों के यहां सिफारिशी पत्रों का दौर भी शुरू हो गया है। राजधानी भोपाल से लेकर जिला मुख्यालयों तक तबादलों को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। राजस्व … Read more

रूस के समर्थन से बदलेगा अफगानिस्तान का खेल? मिग-सुखोई और S-400 को लेकर चर्चाएं तेज

काबुल   पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने  एक बयान में तालिबान पर हमला बोला. उन्होंने कहा कि तालिबान भारत के साथ मिलकर पाकिस्तान के खिलाफ काम कर रहा है. अब उन्हें दूसरा झटका लगा है. अफगानिस्तान में रूस ने एक ऐसा खेल खेला है, जिसने अमेरिका और पाकिस्तान को अलर्ट कर दिया है. रूस ने तालिबान के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाने का समझौता कर लिया है और इसके साथ ही दिखा दिया है कि वह एक बार फिर दक्षिण एशिया में सक्रिय होने लगा है. मॉस्को में आयोजित ‘इंटरनेशनल सिक्योरिटी फोरम’ में इस समझौते को मंजूरी दी गई. कार्यक्रम में तालिबान के रक्षा मंत्री और संगठन के वरिष्ठ नेता मोहम्मद याकूब भी मौजूद थे. खास बात यह है कि जुलाई 2025 में तालिबान सरकार को मान्यता देने के बाद रूस पहली बार उसके साथ इतने ऊंचे स्तर पर रक्षा सहयोग की तरफ बढ़ा है. हालांकि दोनों पक्षों ने समझौते की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की है, लेकिन इस कदम ने पूरे क्षेत्र के भविष्य के लिए नई बहस छेड़ दी है. सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या रूस इस डील के बाद अफगानिस्तान को मिग या सुखोई जै फाइटर जेट दे सकता है?  क्योंकि पाकिस्तान की एयरफोर्स के आगे तालिबान कुछ नहीं है और हर बार पाकिस्तान इनके जरिए ही हमला करता है. एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि तालिबान के रक्षा मंत्री ने रूस से आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम मांगा है. इसके बाद अटलकें लग रही हैं कि क्या S-400 या पैंटसिर एयर डिफेंस सिस्टम भी अफगानिस्तान को मिलेगा. इस समझौते की इसलिए भी चर्चा है कि इसी रूस ने USSR के समय अफगानिस्तान पर हमला किया था. तब यही तालिबान इससे लड़ रहा था।  रूस-तालिबान की दोस्ती से पाकिस्तान की बढ़ेगी टेंशन? यह समझौता सबसे ज्यादा अमेरिका-पाकिस्तान के लिए चिंता की बात है. पाकिस्तान और तालिबान के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में लगातार खराब हुए हैं. सबसे बड़ा विवाद पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा और TTP यानी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान को लेकर है. पाकिस्तान लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि TTP के लड़ाके अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल कर पाकिस्तान में हमले करते हैं. दूसरी तरफ तालिबान सरकार इन आरोपों को खारिज करती रही है।  इसके बावजूद पाकिस्तान ने कई बार अफगानिस्तान की सीमा में घुस कर हमले किए हैं, क्योंकि उसे पता है कि तालिबान ताकतवर नहीं है. अब अगर रूस तालिबान को सैन्य उपकरण, हथियारों की मरम्मत की सहायता, ट्रेनिंग या हथियार उपलब्ध कराता है तो अफगानिस्तान की तालिबान सरकार और मजबूत हो सकती है. इससे पाकिस्तान का दबाव बनाने का विकल्प कमजोर पड़ सकता है. खास बात यह भी है कि अफगान-सोवियत युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने अमेरिका के कहने पर तालिबान को ट्रेनिंग दी थी. इंडिपेंडेंट की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन थिंक टैंक के फेलो अलेक्सेई जाखरोव के मुताबिक, तालिबान अभी अफगानिस्तान के उत्तरी इलाकों में अस्थिरता और पाकिस्तान सीमा की सुरक्षा जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है. ऐसे में रूस की सैन्य सहायता उसके लिए काफी मददगार साबित हो सकती है। 

मात्र 5 रुपये में 1 लाख 10 हजार से अधिक किसानों को मिला नया स्थाई कृषि पंप कनेक्शन

भोपाल राज्‍य शासन द्वारा घोषित 'किसान कल्याण वर्ष 2026' के अंतर्गत किसानों को सिंचाई पम्‍प कनेक्‍शन आसानी से उपलब्‍ध कराए जा रहे हैं। मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी द्वारा कंपनी के कार्यक्षेत्र में किसानों को अब मात्र 5 रूपये के प्रारंभिक शुल्‍क में नए बिजली कनेक्शन उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इस योजना के प्रभावी क्रियान्वयन से अब तक 01 लाख 10 हजार 478 कृषि पम्‍प कनेक्‍शन उपलब्‍ध करा दिये गये हैं। भोपाल रीजन के 8 जिलों के 9 हजार 305 गावों में 85 हजार 362 कृषि पम्‍प उपभोक्‍ताओं ने तथा ग्‍वालियर रीजन के 8 जिलों के 7 हजार 284 गावों में 25 हजार 116 कृषि पम्‍प उपभोक्‍ताओं ने 5 रूपये में नवीन कनेक्‍शन योजना का लाभ उठाया है। कंपनी द्वारा कृषि पम्पों के कनेक्शनों की संख्या बढ़ाए जाने के लिए ऐसे कृषक जिनके खेत विद्युत की उपलब्ध लाइन के समीप स्थित हैं, उनको प्रारंभिक शुल्‍क 5 रूपये में स्थाई कृषि पंप कनेक्शन प्रदान किये जा रहे हैं। कनेक्‍शन की शेष शुल्‍क राशि का भुगतान मासिक देयकों के साथ किश्‍तों में लिया जा रहा है। कंपनी ने कहा है कि आवेदक 5 रूपये में नवीन कनेक्‍शन के संबंध में किसी भी जानकारी के लिए नजदीकी विद्युत केन्‍द्र/जोन अथवा कंपनी के कॉल सेन्‍टर नंबर 1912 पर संपर्क कर सकते हैं।  

पड़ोसी देशों में बढ़ी मध्यप्रदेश के बंगला पान की मांग, सरकार ने बनाई स्पेशल एक्शन प्लान

प्रदेश के बंगला पान की महक पड़ोसी देशों तक पान की खेती को प्रोत्साहित करने 10 जिलों के लिये बनी विशेष कार्य योजना भोपाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में प्रदेश में किसान कल्याण के लिये निरंतर कार्य किये जा रहे। इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे है। आज मध्यप्रदेश का पान अपनी विशिष्ट सुगंध, कोमलता और स्वाद के कारण देश ही नहीं, बल्कि पड़ोसी देशों में भी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। प्रदेश के छतरपुर, रीवा, मंदसौर, नरसिंहपुर और टीकमगढ़ जैसे जिलों में पान की खेती वर्षों से की जा रही है, जो आज किसानों की आय का एक मजबूत आधार बनती जा रही है। विशेष रूप से छतरपुर का “बंगला पान” अपनी गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध है, जिसकी मांग पड़ोसी देशों- पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका तक फैली हुई है। मध्यप्रदेश सरकार द्वारा पान की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष कार्य योजना लागू की गई है, जिसके तहत 10 जिलों को शामिल करते हुए 1 करोड़ 3 लाख रुपये का प्रावधान किया गया है। इस योजना में किसानों को प्रशिक्षण, आधुनिक तकनीक, उन्नत किस्मों की रोपाई सामग्री और बरोज निर्माण के लिए सहायता प्रदान की जा रही है। छतरपुर में उगाया जाने वाला बंगला पान अपनी पतली बनावट, हल्की मिठास और लंबे समय तक ताजगी बनाए रखने की क्षमता के कारण निर्यात के लिए उपयुक्त माना जाता है। यही वजह है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर रीवा जिले के महसांव क्षेत्र के 2 गांवों में उत्पादित पान की पहचान भी विशेष है। यहां का पान उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों—वाराणसी, प्रयागराज और लखनऊ—तक बड़े पैमाने पर भेजा जाता है, वहां इसे अत्यंत पसंद किया जाता है। मध्यप्रदेश में पान की खेती मुख्यतः चौरसिया समाज द्वारा परंपरागत रूप से की जाती रही है। यह समाज पीढ़ियों से इस व्यवसाय से जुड़ा है और अपने अनुभव और पारंपरिक ज्ञान के आधार पर उच्च गुणवत्ता का पान तैयार करता है। पान की खेती में “बरोज” नामक संरक्षित ढांचे का उपयोग किया जाता है, जिसमें तापमान और नमी को नियंत्रित कर पौधों की विशेष देखभाल की जाती है। यह प्रक्रिया श्रमसाध्य होती है, लेकिन इसके परिणामस्वरूप उत्कृष्ट गुणवत्ता का पान प्राप्त होता है। वर्तमान समय में पान उत्पादकों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। विशेष रूप से पान मसाला और गुटखा जैसे उत्पादों के बढ़ते प्रचलन ने पारंपरिक पान की मांग को प्रभावित किया है। युवा पीढ़ी में इन उत्पादों की ओर झुकाव बढ़ने से पान की खपत में कुछ कमी आई है, जिससे किसानों की आय पर भी असर पड़ा है। इसके बावजूद, पारंपरिक पान की सांस्कृतिक और धार्मिक उपयोगिता आज भी बनी हुई है, जो इसकी स्थिर मांग को बनाए रखती है। पान का भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान है। यह न केवल स्वाद और ताजगी का प्रतीक है, बल्कि पूजा-पाठ, विवाह समारोह और अतिथि सत्कार में भी इसका महत्वपूर्ण उपयोग होता है। इस सांस्कृतिक महत्व के कारण पान की प्रासंगिकता आज भी बरकरार है। मध्यप्रदेश का पान न केवल स्थानीय बल्कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भी अपनी पहचान बना रहा है। यदि पान उत्पादकों को उचित प्रोत्साहन, विपणन सुविधा और जागरूकता मिले, तो यह क्षेत्र प्रदेश की अर्थव्यवस्था को और अधिक सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।  

लागत तक नहीं निकलने पर किसान का छलका दर्द, खेत में चलाया ट्रैक्टर

 बड़वानी  जिले के ग्राम करी में बैंगन की फसल के दाम नहीं मिलने से परेशान एक किसान ने अपनी चार बीघा फसल पर ट्रैक्टर चलाकर उसे नष्ट कर दिया। शुक्रवार को सामने आई इस घटना ने किसानों के बीच चिंता और चर्चा का विषय बना दिया है। किसान का कहना है कि मंडी में बैंगन का भाव इतना गिर गया कि तोड़ाई और ढुलाई का खर्च निकालना भी मुश्किल हो गया था। सेंगाव निवासी किसान राधेश्याम गेहलोद ने बताया कि उन्होंने इस सीजन में चार बीघा जमीन पर बैंगन की खेती की थी। फसल तैयार करने में उन्होंने और परिवार के सदस्यों ने दिन-रात मेहनत की, लेकिन बाजार में उचित दाम नहीं मिलने से उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा। एक बीघा में 50 हजार तक की लागत किसान के मुताबिक, एक बीघा बैंगन की खेती में करीब 50 हजार रुपए खर्च हुए। इसमें खाद, दवा, सिंचाई और मजदूरी शामिल है। इस हिसाब से चार बीघा में कुल लागत दो लाख रुपए से अधिक पहुंच गई। अच्छी पैदावार होने के बावजूद लागत निकलना भी मुश्किल हो गया। 50-60 बोरी बैंगन लेकर पहुंचे मंडी     राधेश्याम गेहलोद ने बताया कि वे 50 से 60 बोरी बैंगन लेकर मंडी पहुंचे थे।     प्रत्येक बोरी में करीब 50 से 60 किलो बैंगन भरा था।     उन्हें उम्मीद थी कि बैंगन 10 से 12 रुपए किलो तक बिकेगा।     लेकिन मंडी में भाव करीब 1 रुपए किलो मिला। कई व्यापारियों ने इस भाव पर भी खरीदने में रुचि नहीं दिखाई।     किसान ने कहा कि ऐसी स्थिति में फसल तोड़ने, मजदूरी देने और मंडी तक ले जाने का खर्च भी निकलना संभव नहीं था।     मजबूरी में उन्होंने खेत में खड़ी फसल पर ट्रैक्टर चलाकर उसे नष्ट कर दिया। “घाटे से बचने के लिए पशुओं को खिला रहे बैंगन” किसान के बेटे ने बताया कि इस बार बैंगन की बंपर पैदावार हुई थी, लेकिन दाम गिरने से किसान परेशान हैं। उन्होंने कहा कि कुछ किसान फसल खेत में ही छोड़ रहे हैं, जबकि कई किसान बैंगन पशुओं को खिला रहे हैं, ताकि अतिरिक्त नुकसान से बचा जा सके। दीपक के अनुसार, सीजन की शुरुआत में अच्छी गुणवत्ता वाला बैंगन करीब 5 रुपए किलो तक बिका था, लेकिन पिछले 20 दिनों से लगातार भाव गिरते जा रहे हैं। अब हालत यह है कि व्यापारी एक रूपये किलो में भी बैंगन खरीदने से बच रहे हैं। महंगे डीजल और ट्रांसपोर्ट को बताया वजह किसान परिवार ने संकट के लिए बढ़ती ट्रांसपोर्ट लागत और सरकारी नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। उनका कहना है कि डीजल महंगा होने से भाड़ा बढ़ गया है, जिसके कारण बाहर के व्यापारी बड़वानी मंडी से माल उठाने नहीं आ रहे। मंडी में बैंगन की आवक तो लगातार हो रही है, लेकिन खपत नहीं होने से किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।  

चर्चा में रहे 90 डिग्री ओवरब्रिज को सुधारने की जिम्मेदारी IIT भुवनेश्वर को, दूसरे पुलों की सुरक्षा पर बहस तेज

भोपाल मध्य प्रदेश में रेलवे ओवर ब्रिज (आरओबी) और फ्लाईओवर के निर्माण में सामने आ रही तकनीकी खामियों को दूर करने के लिए पीडब्ल्यूडी अब देश के प्रतिष्ठित आईआईटी संस्थानों की मदद ले रहा है. विभाग ने राज्य के कई बड़े प्रोजेक्ट्स की डिजाइन और तकनीकी जांच के लिए अलग-अलग आईआईटी के साथ अनुबंध किया है. अब तक आईआईटी दिल्ली, मुंबई, भुवनेश्वर और इंदौर को इस काम में शामिल किया जा चुका है।  भोपाल के ऐशबाग रेलवे ओवर ब्रिज का मामला सबसे ज्यादा चर्चा में रहा. इस ब्रिज के डिजाइन में 90 डिग्री का मोड़ होने के कारण इसकी काफी आलोचना हुई थी. अब इस बिगड़े हुए डिजाइन को सुधारने की जिम्मेदारी आईआईटी भुवनेश्वर को सौंपी गई है. पीडब्ल्यूडी इस ब्रिज की नई डिजाइन तैयार करवा रहा है ताकि भविष्य में लोगों को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।  एलीवेटेड कॉरिडोर का सर्वे आईआईटी दिल्ली को रीवा और जबलपुर के महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स की जिम्मेदारी दी गई है. दिल्ली आईआईटी विशेषज्ञों की टीम रीवा के एक प्रोजेक्ट और जबलपुर के एलीवेटेड कॉरिडोर का सर्वे कर रही है. इन तीनों परियोजनाओं की लागत करीब 500 करोड़ रुपए बताई जा रही है. इन प्रोजेक्ट्स का पहला सर्वे पूरा हो चुका है और तकनीकी सुधारों पर काम जारी है।  इटारसी के सांवलखेड़ा में बन रहे रेलवे ओवर ब्रिज में भी कुछ तकनीकी खामियां सामने आई थीं. इस परियोजना में आईआईटी मुंबई, आईआईटी दिल्ली के विशेषज्ञों के साथ मिलकर समाधान पर काम कर रहा है. एक्सपर्ट ब्रिज की डिजाइन और निर्माण गुणवत्ता की जांच कर रहे हैं।  कई गंभीर तकनीकी समस्याएं इसी तरह इंदौर में एलआईजी चौराहे से नवलखा तक बनने वाले 6.2 किलोमीटर लंबे एलीवेटेड कॉरिडोर में भी कई गंभीर तकनीकी समस्याएं मिली थीं. इस परियोजना की जांच और सुधार का काम आईआईटी इंदौर को दिया गया है।  पीडब्ल्यूडी का मानना है कि आईआईटी जैसे बड़े तकनीकी संस्थानों की मदद से ब्रिज और फ्लाईओवर की गुणवत्ता बेहतर होगी और भविष्य में डिजाइन संबंधी गलतियों को रोका जा सकेगा।