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विदेश में संकट में भारतीय मजदूर, सिंगापुर की कंपनियों पर वेतन नहीं देने का आरोप

 नई दिल्ली सिंगापुर में भारतीय हाई कमीशन ने शाम को कहा कि वे सिंगापुर की उन तीन कंपनियों के कर्मचारियों के संपर्क में हैं, जिन्हें महीनों से सैलरी नहीं मिली है. वे 'नेशनल ट्रेड्स यूनियन कांग्रेस' और 'मिनिस्ट्री ऑफ मैनपावर' के साथ भी तालमेल बिठा रहे हैं, जो प्रभावित लोगों की मदद कर रहे हैं. SK इंडस्ट्रीज, KPA इंजीनियरिंग और VVR प्लांट इंजीनियरिंग ने भारत और बांग्लादेश के 400 से ज्यादा कर्मचारियों को बिना वेतन और रहने की जगह के छोड़ दिया है।   रिपोर्ट के मुताबिक, इन तीनों कंपनियों के एक कॉमन डायरेक्टर की पहचान भारतीय नागरिक रामू पलानी वेलु के तौर पर हुई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि सिंगापुर के स्थायी निवासी रामू के बारे में माना जा रहा है कि वे देश छोड़कर चले गए हैं।  कॉर्पोरेट इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म 'सयारी' की जांच से पता चला है कि वे सिंगापुर में सात कंपनियों के डायरेक्टर हैं, जो एयर-कंडीशनिंग, प्लंबिंग और बिल्डिंग से जुड़ी सेवाएं देती हैं। मजदूरों को दिए गए शॉपिंग वाउचर NTUC के सेक्रेटरी-जनरल एनजी ची मेंग, माइग्रेंट वर्कर्स सेंटर के प्रतिनिधि और मैनपावर राज्य मंत्री दिनेश वासु डैश ने बुधवार को मजदूरों से मुलाकात की और उन्हें मदद का भरोसा दिलाया. मजदूरों को SGD200 नकद और सुपरमार्केट शॉपिंग वाउचर दिए जा रहे हैं. इसके साथ ही, उनके रहने के लिए दूसरी जगह का इंतजाम किया जा रहा है और उन्हें नौकरी दिलाने की कोशिशें भी चल रही हैं।  जिन प्रवासी मजदूरों को वेतन नहीं मिला था, उन्होंने सोमवार को मैनपावर मंत्रालय को इस मामले की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि वे एयर-कंडीशनिंग मेंटेनेंस सर्विस देने वाली KPA इंजीनियरिंग और उससे जुड़ी कंपनी SK Industries में अपने मालिकों से संपर्क नहीं कर पा रहे हैं. एनजी ने कहा कि 'ट्राइपार्टाइट अलायंस फॉर डिस्प्यूट मैनेजमेंट' और ट्राइपार्टाइट पार्टनर इस मामले से जुड़े मालिकों से संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं।  रिपोर्ट के मुताबिक, रामू ने 2025 में VVR प्लांट इंजीनियरिंग का कामकाज संभाला. इससे पहले यह कंपनी भारतीय नागरिक रवि विक्टर और रवि विजयारानी, ​​और उनके सिंगापुर में रहने वाले बेटे रवि मार्टिन अब्राहम की थी. 23 साल के मार्टिन ने बताया कि परिवार ने यह कंपनी रामू को बेच दी थी. उन्होंने कहा, 'नई कंपनियों के लिए परमिट मिलना आसान नहीं है, इसलिए हमें लगा कि उन्होंने इसी वजह से हमारा पारिवारिक बिजनेस खरीदा है।  इस कंपनी को काफी कीमती माना जाता था क्योंकि इसके पास खास प्रोसेस सेक्टर के लिए वर्क परमिट थे, जिनसे जुरोंग आइलैंड जैसी जगहों पर प्रोसेस कंस्ट्रक्शन और मेंटेनेंस का काम किया जा सकता है।  रामू ने साल 2014 में अपना पहला बिजनेस KPA इंजीनियरिंग शुरू किया था और आखिरी बार इसकी कैपिटल SGD 1 मिलियन दर्ज की गई थी. रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय नागरिक सुंदरमूर्ति कोमथी ने 2016 से 2018 के बीच रामू के साथ कंपनी डायरेक्टर के तौर पर काम किया.  उनके जाने के बाद कृष्णमूर्ति सुंदरमूर्ति 2020 में डायरेक्टर बने और अभी भी एक्टिव डायरेक्टर हैं। KPA इंजीनियरिंग में काम करने वाले सैम ने बताया कि कर्मचारी रामू को 'बिग बॉस' के तौर पर जानते थे, जबकि रोजमर्रा का कामकाज मूर्ति नाम का एक भारतीय नागरिक संभालता था. सैम ने कहा, 'हम मूर्ति से संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया है।  साल 2019 में रामू ने SGD 100,000 की रजिस्टर्ड कैपिटल के साथ 'कम्फर्ट एयर इंजीनियरिंग' शुरू की और वह इसके अकेले डायरेक्टर हैं. साल 2023 में, उन्होंने SGD200,000 की कैपिटल के साथ 'SK इंडस्ट्रीज' रजिस्टर की और इसके भी अकेले डायरेक्टर हैं, जबकि सुंदरमूर्ति कोमथी इसके शेयरहोल्डर हैं।  साल 2025 में रामू ने एक ही दिन में तीन और कंपनियां रजिस्टर कीं- KMS इंटीग्रेटेड, GM इंटीग्रेटेड और HVS इंडस्ट्रीज. वे इन तीनों के अकेले डायरेक्टर हैं. KMS को SGD100,000 की कैपिटल के साथ रजिस्टर किया गया था, जबकि GM और HVS में से हर एक की कैपिटल SGD10,000 थी।  मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मिनिस्ट्री ऑफ मैनपावर ने इशारा किया है कि वह नियमों के संभावित उल्लंघन के लिए KPA इंजीनियरिंग और SK इंडस्ट्रीज की जांच कर रही है. यह मामला 400 से ज्याजा ऐसे कर्मचारियों से जुड़ा है, जिन्हें बिना सैलरी और रहने की जगह के छोड़ दिया गया था. अब भारत और सिंगापुर के अधिकारी, ट्रेड यूनियन और वर्कर ग्रुप उनकी मदद करने और इसके लिए जिम्मेदार लोगों का पता लगाने के लिए काम कर रहे हैं।   

क्यों अहम है जनगणना? विकास, संसाधन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर दिखेगा व्यापक प्रभाव

लखीमपुर  खीरी में जनगणना-2027 के प्रथम चरण से मिले शुरुआती संकेत बताते हैं कि जिले की आबादी 46.59 लाख के करीब पहुंच गई है। पिछले 15 वर्षों में जनसंख्या और परिवारों की संख्या में हुई उल्लेखनीय वृद्धि का सीधा असर विकास योजनाओं पर पड़ेगा। अकेले खीरी जिले में 6.37 लाख की आबादी बढ़ी है। बढ़ती आबादी के अनुरूप शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क, बिजली और आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग भी बढ़ेगी। जनगणना के आंकड़े सरकार को यह तय करने में मदद करेंगे कि किन क्षेत्रों में नए विद्यालय, अस्पताल, आंगनबाड़ी केंद्र और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं स्थापित की जाएं। परिवारों की बढ़ती संख्या से आवास, रोजगार और शहरीकरण की चुनौतियां भी सामने आएंगी। वहीं, पक्के मकानों की बढ़ती संख्या ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन स्तर में सुधार का संकेत दे सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार जनगणना केवल आबादी गिनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि भविष्य की विकास नीतियों, संसाधनों के वितरण और सरकारी योजनाओं की प्राथमिकताओं का आधार है। इससे जिले के समग्र विकास की नई रूपरेखा तैयार होगी। क्या कहते हैं विशेषज्ञ     लखीमपुर खीरी की बढ़ती आबादी और परिवारों की संख्या में हो रही वृद्धि जिले की विकास आवश्यकताओं को नए सिरे से परिभाषित करेगी। जनगणना के आंकड़ों से यह स्पष्ट होगा कि जिले के किन क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, पेयजल और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं की सबसे अधिक जरूरत है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच विकास के अंतर को समझने में भी ये आंकड़े महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इसके आधार पर जिले में नए विद्यालयों, स्वास्थ्य केंद्रों, सड़कों और आवासीय योजनाओं की बेहतर योजना बनाई जा सकेगी। साथ ही सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की वास्तविक स्थिति सामने आने से उनके लिए लक्षित योजनाएं तैयार करना आसान होगा।     डॉ. सुभाष चन्द्रा, प्रोफेसर, वाईडीसी     लखीमपुर खीरी में जनसंख्या और परिवारों में हुई वृद्धि प्रशासन के लिए नई चुनौतियां और अवसर दोनों लेकर आएगी। जनगणना से प्राप्त आंकड़े यह तय करने में मदद करेंगे कि जिले में सरकारी संसाधनों का वितरण किस प्रकार किया जाए ताकि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ अधिक प्रभावी ढंग से लोगों तक पहुंच सके। बढ़ती आबादी के अनुरूप आधारभूत ढांचे का विस्तार भी जरूरी होगा। जनगणना के आंकड़े जिले की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का वास्तविक चित्र प्रस्तुत करेंगे, जिससे विकास योजनाओं को स्थानीय जरूरतों के अनुसार तैयार किया जा सकेगा।     डॉ. एससी मिश्रा, प्रोफेसर (सेवानिवृत्त)     लखीमपुर खीरी की अनुमानित आबादी 46 लाख से अधिक पहुंचना जिले के विकास की नई दिशा तय करेगा। जनगणना केवल लोगों की संख्या बताने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह जिले की भविष्य की जरूरतों का रोडमैप भी तैयार करती है। बढ़ती आबादी के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, आवास और रोजगार के क्षेत्र में मांग बढ़ेगी। जनगणना के आधार पर शासन और प्रशासन यह तय कर सकेंगे कि किन क्षेत्रों में अतिरिक्त संसाधनों और निवेश की आवश्यकता है। आने वाले वर्षों में जिले के संतुलित और समावेशी विकास के लिए ये आंकड़े सबसे महत्वपूर्ण आधार साबित होंगे।     राम मोहन गुप्ता, समाजसेवी  

यात्री सुविधाओं और परिवहन व्यवस्था को लेकर परिवहन सचिव ने की चर्चा

रायपुर छत्तीसगढ़ में यात्री सुरक्षा को और मजबूत बनाने के लिए परिवहन विभाग ने बड़ा फैसला लिया है। अब सभी यात्री बसों में वाहन लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (वीएलटीडी) लगाना और उसे सक्रिय रखना अनिवार्य होगा। निर्धारित समय सीमा के भीतर नियम का पालन नहीं करने वाले बस संचालकों के खिलाफ मोटरयान अधिनियम, 1988 के तहत कार्रवाई की जाएगी।           परिवहन सचिव एवं परिवहन आयुक्त श्री एस. प्रकाश ने आज इंद्रावती भवन नवा रायपुर स्थित परिवहन कार्यालय में सभी बस संचालकों एवं विभाग द्वारा वीएलटीडी लगाने हेतु अधिकृत वेंडरों की संयुक्त बैठक लेकर यात्री बसो में स्थापित वाहन लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस की अद्यतन स्थिति की समीक्षा की। उन्होंने कहा है कि जिन बसों में अभी तक वाहन लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (वीएलटीडी) नहीं लगी है, उनमें 15 दिनों के भीतर इसे अनिवार्य रूप से स्थापित किया जाए। वहीं जिन बसों में यह उपकरण लगा हुआ है लेकिन संचालित नहीं है, उन्हें तत्काल चालू किया जाए।            परिवहन विभाग के अनुसार वर्ष 2025 में राजस्थान के फलोदी और तेलंगाना के रंगारेड्डी में हुए भीषण सड़क हादसों के बाद सर्वाेच्च न्यायालय के निर्देशों और भारत सरकार की गाइडलाइन के अनुरूप यह निर्णय लिया गया है। सार्वजनिक परिवहन में यात्रा करने वाली महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह व्यवस्था लागू की जा रही है।             विभाग ने बताया कि राज्य मुख्यालय के कमांड एवं नियंत्रण केंद्र से सभी बसों की गतिविधियों पर नजर रखी जाएगी। उपग्रह आधारित ट्रैकिंग प्रणाली के माध्यम से यह पता लगाया जा सकेगा कि बस निर्धारित मार्ग पर चल रही है या नहीं तथा समय पर संचालन हो रहा है या नहीं। यात्रियों को भी संगवारी ऐप के जरिए बसों की वास्तविक समय की लोकेशन की जानकारी मिल सकेगी।        अतिरिक्त परिवहन आयुक्त श्री डी. रविशंकर ने बताया कि राज्य के सभी जिलों में स्वचालित नंबर प्लेट पहचान कैमरे और बुद्धिमान यातायात प्रबंधन प्रणाली स्थापित की जा रही है। इससे नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों की तत्काल पहचान कर कार्रवाई की जा सकेगी।      उल्लेखनीय है कि वाहन लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस एक ऐसी उपग्रह आधारित प्रणाली है, जो वाहन की हर पल की स्थिति और लोकेशन की जानकारी नियंत्रण केंद्र तक पहुंचाती है। किसी भी आपात स्थिति में त्वरित सहायता उपलब्ध कराने में यह तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। परिवहन विभाग ने स्पष्ट किया है कि 15 दिन की मोहलत समाप्त होने के बाद नियमों की अनदेखी करने वाले बस संचालकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

पासपोर्ट से साबित नहीं होती नागरिकता! बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले ने क्या कहा, जानिए

मुंबई  भारतीय नागरिकता के प्रमाण को लेकर चल रही बहस के बीच एक बार फिर यह सवाल केंद्र में आ गया है कि आखिर किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता तय करने का अंतिम आधार क्या है. कानूनी सूत्रों और उपलब्ध प्रावधानों के अनुसार, भारत में नागरिकता से जुड़े सवालों के निपटारे के लिए नागरिकता अधिनियम, 1955 ही मुख्य और कानून है. यही कानून तय करता है कि कौन भारतीय नागरिक हो सकता है, किन आधारों पर नागरिकता प्राप्त की जा सकती है और किन परिस्थितियों में नागरिकता समाप्त भी हो सकती है. बॉम्‍बे हाईकोर्ट 13 साल पुराने एक मामले में भारतीय पासपोर्ट और इंडियन सिटिजनशिप पर बड़ा फैसला दिया था।  सूत्रों के मुताबिक, आम धारणा के विपरीत पासपोर्ट, आधार कार्ड, पैन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र या अन्य पहचान संबंधी दस्तावेज अपने आप में किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं हैं. इन दस्तावेजों का अपना प्रशासनिक और वैधानिक महत्व जरूर है, लेकिन इनका उद्देश्य मुख्य रूप से ट्रैवल की अनुमति देना, पहचान स्थापित करना, कर व्यवस्था, कल्याणकारी सेवाओं का लाभ या चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी जरूरतों को पूरा करना है. नागरिकता का सवाल इन दस्तावेजों से ऊपर उठकर नागरिकता अधिनियम, 1955 में निर्धारित कानूनी कसौटियों पर तय होता है।  क्‍या है एक्‍सपर्ट की राय? जानकारों का कहना है कि नागरिकता अधिनियम भारत में राष्ट्रीयता के प्रश्न पर सबसे महत्वपूर्ण कानून है. इसके तहत नागरिकता जन्म, वंश, रजिस्‍ट्रेशन, नैचुरलाइजेशन और किसी क्षेत्र के भारत में विलय जैसे विभिन्न आधारों पर प्राप्त की जा सकती है. साथ ही यह कानून यह भी स्पष्ट करता है कि कौन सी श्रेणियां ऐसी हैं, जिन्हें नागरिकता पाने के अधिकार से बाहर रखा गया है. खासतौर पर अवैध प्रवासी यानी ऐसे लोग जो बिना वैलिड दस्तावेज या कानूनी अनुमति के भारत में आए हों या तय शर्तों का उल्लंघन करते हुए यहां रह रहे हों, उनके लिए नागरिकता प्राप्त करने के अधिकांश रास्ते बंद हैं।  गैर-नागरिकों को भी मिल चुका है पासपोर्ट? सूत्रों के अनुसार, कानून में नागरिक और अवैध प्रवासी के बीच यह स्पष्ट विभाजन महज तकनीकी व्यवस्था नहीं, बल्कि देश की संप्रभुता, आंतरिक सुरक्षा और नागरिक अधिकारों की रक्षा से जुड़ा विषय है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि नागरिकों के लिए निर्धारित संवैधानिक अधिकारों, सरकारी लाभों और कानूनी सुरक्षा का अनुचित इस्तेमाल ऐसे लोग न कर सकें, जिनके पास भारत में रहने का वैध आधार ही नहीं है. इसी संदर्भ में पासपोर्ट को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की गई है. सूत्रों का कहना है कि पासपोर्ट को भारतीय नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना कोई नया फैसला नहीं है. यह न तो हाल में लिया गया कोई निर्णय है और न ही पिछले कुछ वर्षों में बदली हुई व्याख्या. कानूनी रूप से पासपोर्ट कभी भी नागरिकता का अंतिम और निर्विवाद प्रमाण नहीं रहा है. पासपोर्ट अधिनियम, 1967 में भी ऐसे प्रावधानों का उल्लेख मिलता है, जिनके तहत कुछ विशेष परिस्थितियों में गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट जारी किया जा सकता है।  बॉम्‍बे हाईकोर्ट का 13 साल पुराना फैसला सूत्रों का कहना है कि 2013 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में साफ कहा था कि पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता. इस पृष्ठभूमि में यह समझना महत्वपूर्ण है कि पासपोर्ट, आधार, पैन या वोटर आईडी जैसे दस्तावेज किसी व्यक्ति की पहचान, निवास, करदाता स्थिति या चुनावी पंजीकरण को दर्शा सकते हैं, लेकिन नागरिकता का अंतिम परीक्षण नागरिकता अधिनियम, 1955 और उससे जुड़े कानूनी प्रावधानों के आधार पर ही होगा. ऐसे में नागरिकता को लेकर उठ रहे सवालों के बीच कानूनी स्थिति यही है कि भारत में नागरिकता का निर्धारण भावनात्मक या दस्तावेजों की सामान्य उपलब्धता से नहीं, बल्कि विधि द्वारा निर्धारित शर्तों और प्रमाणों के आधार पर किया जाएगा. यही वजह है कि नागरिकता के मुद्दे पर किसी भी दावे की जांच में मूल कानून और उसके तहत तय मानदंडों को ही सर्वोपरि माना जाता है। 

ऊर्जा मंत्री तोमर ने किया वेंडर-फ्रेंडली पोर्टल लॉन्च, अब बिल और पेमेंट की हर अपडेट मिलेगी ऑनलाइन

एमपी ट्रांसको ने लॉन्च किया वेंडर-फ्रेंडली पोर्टल बिल से लेकर भुगतान तक की रियल-टाइम ट्रैकिंग होगी संभव : ऊर्जा मंत्री तोमर भोपाल ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने बताया कि डिजिटल इंडिया अभियान में प्रदेश के ऊर्जा विभाग की भागीदारी को और आगे बढाते हुए मध्यप्रदेश पावर ट्रांसमिशन कंपनी (एमपी ट्रांसको) ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। इसके तहत कंपनी के वेंडर्स और कांट्रेक्टर्स की पारदर्शिता के लिए अत्याधुनिक वेंडर-फ्रेंडली पोर्टल लॉन्च किया गया है। इस पोर्टल के माध्यम से वेंडर्स और कांट्रेक्टर्स अपने बिलों की संपूर्ण प्रक्रिया को ऑनलाइन और रियल-टाइम में ट्रैक कर सकेंगे। तोमर ने बताया कि वर्तमान में कार्यरत वेंडर्स एवं कॉन्ट्रैक्टर्स के लिए वर्ष 2022 से इंटरनेट आधारित वेंडर्स पोर्टल संचालित है। इस व्यवस्था के तहत कॉन्ट्रैक्ट्स एवं वेंडर्स अपने देयक, आवश्यक दस्तावेज एवं अन्य संबंधित जानकारी ऑनलाइन प्रस्तुत करते हैं तथा उनके बिलों की जांच, स्वीकृति, भुगतान एवं अन्य समस्त प्रक्रियाएं पूर्णतः डिजिटल माध्यम से संपादित की जाती हैं। पोर्टल के जरिए बिलों की वर्तमान स्थिति की जानकारी कॉन्ट्रैक्टर्स को एसएमएस एवं ई-मेल के माध्यम से स्वतः प्राप्त होती रहती है। साथ ही वे किसी भी समय लॉग-इन कर अपने देयकों एवं भुगतान की अद्यतन स्थिति देख सकते हैं। बढेगी पारदर्शिता ऊर्जा मंत्री ने बताया कि इस डिजिटल व्यवस्था के पूर्ण रूप से लागू होने पर वेंडर्स, कांट्रेक्टर्स एवं अधिकारियों के समय की बचत होगी, कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बढ़ेगी तथा देयक निपटान प्रक्रिया अधिक सरल, त्वरित एवं प्रभावी बन सकेगी। सुविधा का किया जा रहा है विस्तार एमपी ट्रांसको के संयुक्त निदेशक विकास श्रीवास्तव ने जानकारी दी कि कंपनी ने इस सुविधा का विस्तार करते हुए टर्नकी कॉन्ट्रैक्ट्स के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार के कॉन्ट्रैक्ट्स से जुड़े वेंडर्स और कांट्रेक्टर्स के लिए भी इंटरनेट आधारित वेब पोर्टल प्रारंभ की है। इसके माध्यम से वेंडर्स अपने मोबाइल, टैबलेट अथवा कंप्यूटर से कहीं से भी लॉग-इन कर संबंधित कार्यालय में ऑनलाइन देयक प्रस्तुत कर सकेंगे। पोर्टल की विशेषता यह रहेगी कि वेंडर्स और कांट्रेक्टर्स अपने बिलों की प्रोसेसिंग की प्रत्येक अवस्था की जानकारी रियल-टाइम में प्राप्त कर सकेंगे।  

पोल वॉल्ट स्पर्धा में 4.10 मीटर की छलांग के साथ एशियाई खेल 2026 के लिए किया क्वालीफाई

भोपाल  मध्यप्रदेश खेल एवं युवा कल्याण विभाग के अंतर्गत संचालित एथलेटिक्स अकादमी की प्रतिभावान खिलाड़ी नितिका आकरे ने ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में 24 से 28 जून 2026 तक आयोजित 65वीं राष्ट्रीय अंतर्राज्यीय सीनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए प्रदेश को गौरवान्वित किया है। प्रतियोगिता के दूसरे दिन सायंकालीन सत्र में आयोजित महिला पोल वॉल्ट स्पर्धा में नितिका ने 4.10 मीटर की ऊंचाई पार कर कांस्य पदक अर्जित किया। एशियाई खेल 2026 के लिए किया क्वालीफाई नितिका आकरे ने अपने शानदार प्रदर्शन के दम पर एशियाई खेल 2026 के लिए निर्धारित क्वालीफिकेशन मानक भी हासिल कर लिया। महिला पोल वॉल्ट स्पर्धा में कुल तीन खिलाड़ियों ने एशियाई खेलों के लिए क्वालीफाई किया, जिनमें नितिका भी शामिल रहीं। यह उपलब्धि उनकी निरंतर मेहनत, समर्पण और उत्कृष्ट प्रशिक्षण का परिणाम है। राष्ट्रीय स्तर पर मध्यप्रदेश की मजबूत उपस्थिति राष्ट्रीय प्रतियोगिता में पदक जीतने के साथ एशियाई खेलों के लिए क्वालीफाई करना मध्यप्रदेश की खेल प्रतिभाओं की बढ़ती क्षमता और खेल अकादमियों में उपलब्ध उच्च स्तरीय प्रशिक्षण व्यवस्था को दर्शाता है। नितिका की यह सफलता प्रदेश की महिला खिलाड़ियों के लिए भी प्रेरणादायी है। खेल मंत्रीविश्वास कैलाश सारंग ने दी बधाई खेल एवं युवा कल्याण मंत्रीविश्वास कैलाश सारंग ने नितिका आकरे को इस उपलब्धि पर बधाई देते हुए कहा कि प्रदेश की बेटियां राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि नितिका आगामी एशियाई खेलों में भी देश और प्रदेश का नाम रोशन करेंगी। उभरती खेल प्रतिभाओं के लिए मिसाल बनी नितिका नितिका आकरे की यह उपलब्धि प्रदेश के उभरते खिलाड़ियों, विशेषकर महिला एथलीटों के लिए प्रेरणास्रोत है। यह सफलता दर्शाती है कि प्रतिभा, अनुशासन और समर्पण के साथ राष्ट्रीय मंच पर उत्कृष्ट उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं।  

भारत के AMCA प्रोजेक्ट को झटका, अमेरिकी इंजन महंगा पड़ने से बढ़ी चिंता

 नई दिल्ली भारत का महत्वाकांक्षी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) प्रोजेक्ट नई मुश्किल में फंस गया है. अमेरिका की GE एयरोस्पेस कंपनी का F414 इंजन, जो AMCA Mk-1 और तेजस Mk-2 दोनों के लिए चुना गया था, अब महंगा हो गया है. पहले एक इंजन की कीमत करीब 70-80 करोड़ रुपये थी, जो अब 200 करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंच गई है।  यह बढ़ोतरी DRDO और एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) के लिए बड़ी चिंता बन गई है. तकनीकी बातचीत में प्रगति हुई थी, लेकिन कीमत, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, प्रोडक्शन और निवेश जैसे व्यावसायिक मुद्दों पर गतिरोध है. GE ने भारत में F414 इंजन की असेंबली और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने का प्रस्ताव दिया है, जिसके लिए 800 मिलियन डॉलर (लगभग 6000 करोड़ रुपये) से ज्यादा निवेश की मांग की गई है।  F414 इंजन मूल रूप से तेजस Mk-2 के लिए चुना गया था. AMCA Mk-1 के शुरुआती संस्करणों के लिए अंतरिम इंजन के रूप में रखा गया है. योजना के अनुसार पहले 2-4 स्क्वॉड्रनों में यह इंजन लगेगा. बाद में ज्यादा शक्तिशाली स्वदेशी इंजन आएगा. AMCA ट्विन इंजन वाला स्टेल्थ फाइटर है, इसलिए प्रोटोटाइप में 5 प्रोटोटाइप्स के लिए करीब 15 इंजनों की जरूरत पड़ेगी।  कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी ने प्रोटोटाइप विकास के लिए 15 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा मंजूर किए हैं. उड़ान परीक्षण में 1800 सॉर्टीज और सात साल लगेंगे. इंजन की समस्या से पूरा कार्यक्रम प्रभावित हो सकता है।  GE के साथ समझौते की चुनौतियां GE F414 पर भारत और अमेरिका के बीच मोदी और बाइडेन के समय मजबूत राजनीतिक समर्थन मिला था. HAL और GE के बीच MoU को रक्षा सहयोग की बड़ी उपलब्धि माना गया. लेकिन व्यावसायिक बातचीत जटिल हो गई है. GE की फैक्ट्री न सिर्फ AMCA बल्कि तेजस Mk-2 और ट्विन इंजन डेक-बेस्ड फाइटर (TEDBF) की जरूरतें भी पूरी कर सकती है।  फिर भी कीमत में अचानक वृद्धि और निवेश की ऊंची मांग ने बातचीत को मुश्किल बना दिया है. कुछ चर्चाओं में शुरुआती इंजन खरीद की संख्या घटाने पर भी विचार हुआ, लेकिन कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।  विकल्पों की तलाश: सैफ्रान और रोल्स-रॉयस अब भारतीय एजेंसियां विकल्प देख रही हैं. फ्रांस की सैफ्रान और ब्रिटेन की रोल्स-रॉयस कंपनियां पहले भी भारत के साथ इंजन विकास में साझेदारी के लिए इच्छुक रही हैं. दोनों कंपनियां टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और औद्योगिक सहयोग का बेहतर प्रस्ताव दे सकती हैं।   हालांकि इंजन बदलना आसान नहीं है क्योंकि यह उड़ान नियंत्रण, सर्टिफिकेशन, परीक्षण और परफॉर्मेंस को प्रभावित करता है. एयरफ्रेम डिजाइन लगभग फाइनल हो चुका है, इसलिए नया इंजन अनुकूलित करना पड़ेगा, पूरी डिजाइन नहीं बदलनी होगी।  तेजस Mk-1A पहले ही इंजन सप्लाई की समस्या से देरी झेल रहा है. AMCA में भी यही समस्या समयरेखा प्रभावित कर सकती है. यह कार्यक्रम भारत की स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी की स्टेल्थ तकनीक हासिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।  विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को मजबूत वार्ता करनी चाहिए. अगर GE से समझौता नहीं होता तो विकल्पों को तेजी से आगे बढ़ाना होगा. AMCA की सफलता न सिर्फ वायुसेना की ताकत बढ़ाएगी बल्कि भारत को वैश्विक रक्षा निर्यातक बनाने में भी मदद करेगी।  वर्तमान में तीन निजी कंपनियों – टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, L&T-BEL और भारत फोर्ज-BEML को प्रोटोटाइप विकास के लिए RFP जारी किए गए हैं. इंजन मुद्दे का जल्द समाधान AMCA कार्यक्रम की गति बनाए रखने के लिए जरूरी है। 

भोपाल में आज आपातकाल दिवस कार्यक्रम, CM करेंगे 2 हजार मीसाबंदी परिवारों को सम्मानित

भोपाल भोपाल के प्रतिष्ठित रवीन्द्र भवन में आपातकाल दिवस के अवसर पर आज  शुक्रवार को एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। इस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव शामिल होंगे।कार्यक्रम में लोकतंत्र सेनानी संघ के अध्यक्ष तपन भौमिक के साथ-साथ आपातकाल के दौरान जेल जाने वाले करीब दो हजार मीसाबंदी परिवारों के सदस्य शिरकत करेंगे।इस अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं मीसाबंदियों तथा उनके परिजनों को मंच से सम्मानित करेंगे, जो लोकतंत्र की रक्षा के लिए उनके द्वारा किए गए संघर्ष और बलिदान के प्रति सरकार की कृतज्ञता को प्रकट करेगा। मुख्यमंत्री मोहन यादव होंगे मुख्य अतिथि कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। इस दौरान वे आपातकाल के समय लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले मीसाबंदियों और उनके परिजनों को सम्मानित करेंगे। लोकतंत्र सेनानियों के संघर्ष को किया जाएगा याद समारोह में आपातकाल के दौरान जेल गए लोकतंत्र सेनानियों के योगदान और बलिदान को याद किया जाएगा। राज्य सरकार उनके संघर्ष के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए मंच से सम्मान प्रदान करेगी। 2000 परिवारों की रहेगी मौजूदगी कार्यक्रम में प्रदेशभर से करीब 2000 मीसाबंदी परिवारों के सदस्य शामिल होंगे। आयोजन का उद्देश्य लोकतंत्र की रक्षा के लिए किए गए त्याग और संघर्ष को नई पीढ़ी तक पहुंचाना तथा लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। इंदिरा सरकार के अहंकार ने आपातकाल लगाया- सीएम  इस अवसर पर मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सोशल मीडिया पर लिखा कि 25 जून, 1975… देश में लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला दिन, जब इंदिरा सरकार के अहंकार ने आपातकाल लगाया। इस विभीषिका के विरुद्ध डटकर खड़े होने वाले लोकतंत्र के प्रहरियों को सादर नमन करता हूं। आइए, संकल्प लें कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए सदैव समर्पित होकर देश की सेवा करते रहेंगे।  25 जून 1975 को लगा था आपातकाल उल्लेखनीय है कि देश में 25 जून 1975 को आपातकाल लागू किया गया था। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास के इस महत्वपूर्ण अध्याय के 50 वर्ष पूरे होने पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। भोपाल में आयोजित यह कार्यक्रम भी उसी श्रृंखला का हिस्सा होगा, जिसमें लोकतंत्र सेनानियों को विशेष सम्मान दिया जाएगा। 25 जून 1975 को लागू हुआ था आपातकाल भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में 25 जून 1975 का दिन महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी दिन देश में आपातकाल लागू किया गया था, जो मार्च 1977 तक प्रभावी रहा। इस अवधि में कई नागरिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाए गए थे और अनेक राजनीतिक नेताओं तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया था। सरकार और विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा हर वर्ष आपातकाल दिवस के अवसर पर लोकतंत्र सेनानियों के योगदान को याद करते हुए कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।  क्या है आपातकाल दिवस ? आपातकाल दिवस भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास के उस सबसे काले अध्याय की याद दिलाता है, जिसकी शुरुआत तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान हुई थी। 25 जून 1975 की आधी रात को देश में आधिकारिक रूप से आपातकाल (इमरजेंसी) की घोषणा की गई थी, जो 21 महीनों तक यानी 21 मार्च 1977 तक लागू रही। इस दौरान भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे, प्रेस और मीडिया पर सख्त सेंसरशिप लागू कर दी गई थी, और सरकार की नीतियों का विरोध करने वाले विपक्षी नेताओं व सामाजिक कार्यकर्ताओं को बिना किसी मुकदमे के जेलों में डाल दिया गया था।

मध्यप्रदेश सरकार की बड़ी तैयारी, लाखों कर्मचारियों के प्रमोशन का रास्ता होगा साफ

भोपाल  मध्यप्रदेश के सरकारी सेवकों के लिए अच्छी खबर आई है। प्रदेश के अधिकारी, कर्मचारियों की 10 साल से अटकी पदोन्नति की प्रक्रिया 10-15 दिन में शुरू हो सकती है। राज्य सरकार ने इसकी पूरी तैयारी कर ली है। पदोन्नति की प्रक्रिया में बाधा बन रहे कानूनी मसले को सुलझाने के लिए अनेक वरिष्ठ अधिवक्ताओं से भी परामर्श लिया गया है। राज्य सरकार ने इस मुद्दे पर जबलपुर के अलावा दिल्ली के वरिष्ठ वकीलों और विधि विशेषज्ञों की राय ली है। संबंधित अधिकारियों ने सलाह के आधार पर ही मसौदा तैयार किया है। सीएम मोहन यादव CM Mohan Yadav ने 2016 से बंद पदोन्नति चालू करने का 2025 में ऐलान किया था। सरकार के इस फैसले से प्रदेश के 4.50 लाख सरकारी सेवकों को फायदा होगा। कर्मचारियों, अधिकारियों के प्रमोशन से कई पद भी खाली होंगे जिनपर युवाओं को भर्ती के मौके मिलेंगे। सरकार ने अलग से अपर मुख्य सचिवों, प्रमुख सचिवों, सचिवों, भारसाधक सचिवों व विभागाध्यक्षों को मौखिक रूप से पदोन्नति शुरू करने को कहा है। बड़ी संख्या में कर्मचारियों, अधिकारियों के पदोन्नत होने से करीब दो लाख पद खाली होने की उम्मीद है। इससे युवाओं की नौकरी का रास्ता साफ होगा। प्रदेश के मुख्य सचिव अनुराग जैन ने अधिकारियों से कहा कि वर्षों पुराने बने गैर जरूरी कानूनों को खत्म करने पर काम करें। वे गुरुवार को कलेक्टर-कमिश्नरों संग वीसी करेंगे, उसके लिए सभी विभाग प्रमुखों को तैयार रहने के लिए कहा है। प्रदेश में 10 साल से पदोन्नतियों पर रोक लगी है, 2016 मई से पदोन्नति बंद बता दें कि प्रदेश में 10 साल से पदोन्नतियों पर रोक लगी है, 2016 मई से पदोन्नति बंद है। इससे कर्मचारी, अधिकारी बिना प्रमोशन के ही रिटायर्ड हो रहे हैं। अभी तक लाखों सरकारी सेवक रिटायर्ड हो चुके हैं। सीएम मोहन यादव ने पिछले साल प्रदेश के कर्मचारियों, अधिकारियों के हित में पदोन्नतियां देने की घोषणा की थी। तब से इस संबंध में अनेक बैठकें हो चुकी हैं। 17 जून को कैबिनेट ने मप्र लोकसेवा पदोन्नति नियम- 2025 को मंजूरी दी। उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक की। इसमें 20 जुलाई से शुरू होने वाले विधानसभा के मानसून सत्र की तैयारी, कोर्ट केस प्राथमिकता से निराकृत करने, केंद्र-राज्य के काम को गंभीरता से करने, सीएम हेल्पलाइन की शिकायतों का निपटारा करने के लिए कहा। बताते हैं, बैठक में पदोन्नति संबंधी बात भी कही। 10 साल में ऐसे हालात 2016 मई से प्रदेश में पदोन्नति बंद है। 10 साल से बिना पदोन्नति ही रिटायर्ड हो रहे कर्मचारी 2026 मई तक लाखों सरकारी सेवक रिटायर्ड हुए सीएम यादव ने पदोन्नति देने की घोषणा की 2025 में बंद पदोन्नति चालू करने का किया ऐलान 10 दिन में शुरु करने की कवायद 4.50 लाख सरकारी सेवकों को फायदा पदोन्न्ति से दो लाख पद खाली होंगे युवाओं की नौकरी का रास्ता साफ होगा

महानगरों में जमीन का संकट गहराया, भविष्य में आवास को लेकर बढ़ी चिंता

 नई दिल्ली पिछले कुछ दशकों में भारत की तस्वीर तेजी से बदली है, कभी गांवों का देश कहा जाने वाले भारत की एक बहुत बड़ी आबादी रोजगार, बेहतर शिक्षा और आधुनिक जीवनशैली की तलाश में शहरों का रुख कर चुकी है, लेकिन इस सामूहिक पलायन ने एक गंभीर और डरावने सवाल को जन्म दे दिया है, जब शहरों में ज़मीन सीमित है, तो आने वाले समय में ये लोग रहेंगे कहां रहेंगे।  रिपोर्ट्स के मुताबिक साल 2030 तक भारत की 40% से अधिक आबादी शहरों में रह रही होगी, इतनी बड़ी आबादी का दबाव झेलने के लिए हमारे शहरों के पास पर्याप्त जगह ही नहीं बची है. ज़मीन का यह संकट अब केवल एक अंदेशा नहीं, बल्कि हकीकत बन चुका है।  देश के प्रमुख आर्थिक केंद्र इस समय ज़मीन की भारी किल्लत से जूझ रहे हैं. मुंबई भौगोलिक रूप से तीन तरफ से पानी से घिरा है. कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि मुंबई के पास अब हॉरिजॉन्टल विस्तार के लिए जमीन का एक टुकड़ा भी नहीं बचा है. यही वजह है कि यहां झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या बढ़ी और रीडेवलपमेंट ही एकमात्र रास्ता रह गया. जमीन की कमी के कारण मुंबई भारत का सबसे महंगा और घना शहर बन चुका है।  नोएडा में जमीन खत्म होने के कगार पर  दिल्ली-NCR का सबसे पसंदीदा डेस्टिनेशन माना जाने वाला नोएडा भी अब इसी संकट के मुहाने पर खड़ा है. हालिया मीडिया रिपोर्ट्स और नोएडा अथॉरिटी की बैठकों से यह साफ हुआ है कि मूल नोएडा (Noida Master Plan 2031 के तहत) में अब नया अलॉटमेंट करने के लिए ज़मीन लगभग खत्म हो चुकी है. औद्योगिक, कमर्शियल और आवासीय प्लॉट्स के लिए अथॉरिटी के पास जगह नहीं बची है. यही वजह है कि अब उत्तर प्रदेश सरकार को 'न्यू नोएडा' (दादरी-नोएडा-गाजियाबाद इनवेस्टमेंट रीजन) बसाने के लिए मास्टर प्लान 2041 को मंजूरी देनी पड़ी है, जिसके तहत बुलंदशहर और गौतमबुद्ध नगर के 80 गांवों की जमीन अधिग्रहित की जा रही है।  क्या है इसका विकल्प?  जब ज़मीन खत्म हो रही हो, तो शहरों के पास फैलने का नहीं, बल्कि ऊपर उठने का ही विकल्प बचता है, आने वाले समय में शहरी आबादी पूरी तरह से हाईराइज इमारतों और वर्टिकल लिविंग पर निर्भर हो जाएगी. आने वाले समय में सरकारें FSI यानी ज़मीन के मुकाबले कितनी ऊंची इमारत बनाई जा सकती है के नियमों को और ढीला करेंगी, जहां पहले 4 से 5 मंजिला इमारतें बनती थीं, अब 40 से 50 मंजिला आवासीय टावर आम हो जाएंगे, एक ही एकड़ ज़मीन पर अब 50 परिवारों के बजाय 500 परिवार रह सकेंगे।  भविष्य के शहर हाईराइज सोसायटियों के अंदर सिमट जाएंगे. इन्हें 'वर्टिकल विलेज' कहा जाता है, जहां एक ही गगनचुंबी इमारत या परिसर के भीतर पार्क, जिम, स्विमिंग पूल, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और यहां तक कि स्कूल-अस्पताल भी मौजूद होंगे. लोगों की जमीन से निर्भरता पूरी तरह खत्म हो जाएगी. नोएडा की तर्ज पर अब हर बड़े शहर के पास जैसे न्यू नोएडा, नवी मुंबई, न्यू गुड़गांव बसाए जा रहे हैं. साथ ही रेलवे और मेट्रो स्टेशनों के आसपास हाई-डेंसिटी ऊंची इमारतें बनाई जा रही हैं ताकि लोग कम ज़मीन में रहकर सीधे पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल कर सकें।  क्या हैं चुनौतियां? बेशक हाईराइज इमारतें जमीन की कमी का समाधान हैं, लेकिन यह राह इतनी आसान नहीं है. 50 मंजिला इमारत में रहने वाले लोगों के लिए पानी, बिजली और सीवरेज सिस्टम का मैनेजमेंट करना बेहद जटिल होता जा रहा है. कंक्रीट के इन ऊंचे जंगलों के कारण शहरों में 'अर्बन हीट आइलैंड' बन रहे हैं, जिससे शहरों का तापमान गांवों के मुकाबले 3 से 5 डिग्री तक ज्यादा रहता है. भूकंप या आग लगने की स्थिति में इतनी ऊंची इमारतों से लोगों को सुरक्षित निकालना आज भी एक बड़ी चुनौती है।  गांवों से शहरों की तरफ बढ़ता इंसानी सैलाब रुकने वाला नहीं है और जमीन को रबर की तरह खींचा नहीं जा सकता, इसलिए भविष्य के भारत को 'आसमान' में ही अपनी जगह ढूंढनी होगी।