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चेन्नई से दिल्ली तक बवाल: के. वेंकट नारायण की नियुक्ति पर विपक्ष ने उठाए सवाल

चेन्नई तमिलनाडु सरकार के एक फैसले ने नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने कारोबारी और फिल्म प्रोड्यूसर के. वेंकट नारायण को नई दिल्ली में तमिलनाडु का विशेष प्रतिनिधि नियुक्त किया है। इस पद को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया है। विपक्ष ने इस नियुक्ति को लेकर सरकार पर सवालों की बौछार कर दी है। एक साल के लिए बनाया गया नया पद राज्य सरकार की ओर से जारी आदेश के मुताबिक, यह पद फिलहाल एक साल के लिए बनाया गया है। मुख्य सचिव एम. साई कुमार ने इस संबंध में आदेश जारी किया। नियुक्ति की बाकी शर्तों की घोषणा बाद में की जाएगी। क्या होता है स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव का काम? नई दिल्ली में तमिलनाडु के स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव की जिम्मेदारी केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच तालमेल बनाने की होती है। इस पद पर बैठा व्यक्ति मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों की बैठकों का समन्वय करता है, केंद्र की योजनाओं और फंडिंग पर नजर रखता है, नीति से जुड़े मामलों की निगरानी करता है और संसद सत्र के दौरान राज्य के सांसदों के साथ समन्वय बनाने में मदद करता है। अब तक इस अहम पद पर आमतौर पर अनुभवी राजनेताओं की नियुक्ति होती रही है। कौन हैं के. वेंकट नारायण? के. वेंकट नारायण बेंगलुरु स्थित KVN ग्रुप के चेयरमैन हैं। उनकी कंपनी रियल एस्टेट और एंटरटेनमेंट सेक्टर में काम करती है। वह पहले प्रेस्टीज ग्रुप के CEO भी रह चुके हैं। साल 2020 में उन्होंने KVN प्रोडक्शंस की शुरुआत की और अब वही कंपनी मुख्यमंत्री विजय की आखिरी फिल्म 'जना नायकन' को प्रोड्यूस कर रही है। माना जा रहा है कि राजनीति में पूरी तरह सक्रिय होने से पहले यह विजय की अंतिम फिल्म होगी। विपक्ष ने उठाए सवाल इस नियुक्ति को लेकर विपक्षी दलों ने सरकार पर निशाना साधा है। DMK के राज्यसभा सांसद पी. विल्सन ने कहा कि तमिलनाडु के हितों की रक्षा करने वाले इतने अहम पद पर एक फिल्म प्रोड्यूसर की नियुक्ति करना उस पद की गरिमा को कम करता है। वहीं BJP के तमिलनाडु अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन ने सवाल उठाया कि कर्नाटक से करीबी संबंध रखने वाला व्यक्ति दिल्ली में तमिलनाडु का प्रभावी प्रतिनिधित्व कैसे करेगा। उन्होंने इसे राज्य के लोगों के साथ "बड़ा विश्वासघात" बताया। AIADMK ने आरोप लगाया कि सरकार कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के इशारों पर काम कर रही है, जबकि AMMK प्रमुख टीटीवी दिनाकरन ने कहा कि सरकार प्रशासनिक योग्यता के बजाय निजी करीबी लोगों को बड़े पद दे रही है। TVK ने किया बचाव विजय की पार्टी TVK ने विपक्ष के आरोपों को खारिज कर दिया। पार्टी नेताओं का कहना है कि वेंकट नारायण ने फिल्म 'जना नायकन' के निर्माण के दौरान विजय का मुश्किल समय में साथ दिया था और यह नियुक्ति उसी सहयोग के प्रति आभार जताने का तरीका है। पार्टी का यह भी कहना है कि वेंकट नारायण को बड़े कॉर्पोरेट और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट संभालने का लंबा अनुभव है, इसलिए उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई है। पहले ज्योतिषी, अब प्रोड्यूसर… बढ़ा विवाद यह पहली बार नहीं है जब मुख्यमंत्री विजय अपने करीबी लोगों की नियुक्तियों को लेकर विवादों में आए हैं। इससे पहले उनके लंबे समय से मैनेजर रहे जगदीश पलानीस्वामी को प्राइवेट सेक्रेटरी (पॉलिटिकल) बनाया गया था। वहीं ज्योतिषी रिकी राधन पंडित वेट्रिवेल को ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी (पॉलिटिकल) (OSD) नियुक्त किया गया था, लेकिन भारी आलोचना के बाद सरकार को वह फैसला वापस लेना पड़ा।

अफ्रीका का सबसे अमीर देश सेशेल्स: पर्यटन और निवेश से बनी समृद्धि की कहानी

नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने तीन दिनी दौरे पर सेशेल्स पहुंच गए हैं. वे वहां 50 वें राष्ट्रीय दिवस समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में 29 जून को शामिल होंगे. बीते शनिवार को सेशेल्स की धरती पर उतरते ही वहां के राष्ट्रपति डॉ पैट्रिक हर्मिनी ने उनका स्वागत किया. पीएम मोदी की इस यात्रा के बहाने सेशेल्स और भारत के रिश्ते के बारे में जानेंगे. यह भी कि आखिर यह छोटा सा द्वीपीय देश कैसे अफ्रीका का सबसे अमीर देश बन गया? सेशेल्स एक छोटा द्वीपीय देश है. यह हिन्द महासागर में स्थित है. आबादी महज 1.35 लाख है. क्षेत्रफल लगभग 450 वर्ग किलो मीटर है. यह 115 द्वीपों का एक समूह है. जमीन बहुत कम है. फिर भी यह अफ्रीका का सबसे अमीर देश माना जाता है. हैलो सेफ प्रॉसपेरिटी इंडेक्स 2026 के मुताबिक सेशेल्स अफ्रीका के सबसे अमीर देशों की सूची में टॉप पर है. उसे 98.09 अंक मिले हैं. मॉरीशस और अल्जीरिया इस सूची में क्रमशः दूसरे एवं तीसरे नंबर पर हैं. एजेंसी ने रैंकिंग तय करने में केवल प्रति व्यक्ति आय को महत्व नहीं दिया है. कुल पांच मानकों के आधार पर रैंकिंग तय हुई है. इनमें खरीदने की शक्ति, प्रति व्यक्ति आय, मानव विकास सूचकांक, आय का समान वितरण और सापेक्ष गरीबी को आधार बनाया गया है. प्रति व्यक्ति आय 42110 अमेरिकी डॉलर है. 256 साल पुराना है भारत-सेशेल्स का रिश्ता सेशेल्स छोटा देश भले ही है लेकिन भारत के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है. यहां पहली स्थाई बस्ती साल 1770 में बसाई गई. उस पहली खेप में जो 27 नागरिक यहां पहुंचे, उनमें पांच भारतीय भी थे. बाद में तमिलनाडु, बिहार, गुजरात और देश के अन्य हिस्सों से भी लोग पहुंचे. आज देश का हर आठवां व्यक्ति भारतवंशी मूल का है. 29 जून 1976 को सेशेल्स को ब्रिटेन से आजादी मिली और यह स्वतंत्र देश के रूप में दुनिया के नक्शे पर उभरा. इस छोटे से द्वीपीय देश पर पहले फ्रांसीसी और फिर बाद में ब्रिटेन ने राज किया. समृद्धि की आधारशिला है पर्यटन पर्यटन सेशेल्स की मुख्य कमाई का स्रोत है. यहां के समुद्र, बीच और नेचर पर्यटकों को आकर्षित करते हैं. यहां लक्जरी रिसोर्ट बन गए हैं. विदेशी पर्यटक महंगा खर्च करते हैं. होटल, यात्रा, खाना और गतिविधियां सरकार को राजस्व देती हैं. निजी निवेशकों ने भी यहां पूंजी लगाई है. पर्यटन ने नौकरियां बढ़ाईं. स्थानीय सेवाओं और कारीगरों को फायदा हुआ. इस देश में हर साल 3.5 से 4 लाख तक विदेशी पर्यटक पहुंचते हैं. मतलब देश की आबादी से कई गुना ज्यादा पर्यटक आते हैं. यहां सबसे ज्यादा पर्यटक यूरोप से आते हैं. फिर एशिया की बारी है. हाल के वर्षों में भारतीयों की ठीक-ठाक संख्या पहुँच रही है. मत्स्य और समुद्री संसाधन से भी होती है कमाई समुद्री मछली और समुद्री जीवन भी सेशेल्स की आमदनी का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है. पास के जल क्षेत्र में मछली प्रचुर मात्रा में मिलती है. मछली पालन और निर्यात से विदेशी मुद्रा आती है. समुद्री पर्यटन जैसे डाइविंग ने भी योगदान दिया. समुंद्री संरक्षण ने संसाधन को टिकाऊ बनाया. इस माध्यम से सेशेल्स हर साल 30 से 50 करोड़ अमेरिकी डॉलर की कमाई साल भर में करता है. सेशेल्स के कुल घरेलू निर्यात में 90 फीसदी हिस्सा मछली का है. निवेश और आर्थिक नीतियां सरकार ने विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया. निवेशकों को सरल नियम और कर प्रोत्साहन दिए गए. बैंकिंग और फाइनेंशियल सर्विसेस को विकसित किया गया. कई विदेशी कंपनियों ने यहां शाखाएं खोलीं. छोटे व्यवसायों को समर्थन मिला. नवाचार और सेवा क्षेत्र पर ध्यान दिया गया. यूएई, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका, चीन और भारत ने भी यहां निवेश किया हुआ है. यह निवेश मूलतः पर्यटन, अक्षय ऊर्जा, रियल स्टेट, मछली पालन आदि क्षेत्रों में हुए हैं. कैसी है वित्तीय और कर व्यवस्था? सेशेल्स ने कर नीति में लचीलापन रखा. कुछ सेवाओं पर कर कम रखा गया. यह नीति निवेश को आकर्षित करती है. निजी बैंकिंग और निवेश सेवाएं मजबूत हुईं. सरकार ने सार्वजनिक खर्च में समझदारी दिखाई. वित्तीय प्रबंधन ने देश की आय स्थिर रखी. यहां आयकर, व्यावसायिक कर, और वैल्यू एडेड टैक्स लागू है. यह व्यवस्था देशी-विदेशी सब पर समान है. विदेशी सहायता और अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध सेशेल्स ने वैश्विक साझेदारों से मदद ली. विकास परियोजनाओं में अनुदान और ऋण मिला. अंतरराष्ट्रीय संबंधों ने पर्यटन और व्यापार को बढ़ाया. राष्ट्रों के साथ द्विपक्षीय समझौते हुए. ये समझौते निवेश और सुरक्षा दोनों में मददगार रहे.सेशेल्स ने स्वास्थ्य और शिक्षा पर ज्यादा जोर दिया. साधारण शिक्षा तक अच्छी पहुंच हुई. स्वास्थ्य सेवाएं भी बेहतर हुईं. इनसे उत्पादकता बढ़ी. छोटी आबादी में कुशल मजदूरी का लाभ मिला. कौशल विकास ने सेवा क्षेत्र को मजबूत किया. सेशेल्स ने प्रकृति को बचाने पर जोर दिया. नेचर और बायोडायवर्सिटी संरक्षण ने पर्यटन को स्थायी बनाया. समुद्री रिज़र्व बनाए गए. पर्यटन और संरक्षण में संतुलन रखा गया. यह नीतियां दीर्घकालिक आमदनी सुनिश्चित करती हैं. चुनौतियां और सीमाएं भी कम नहीं छोटा आकार और सीमित संसाधन सेशेल्स के सामने चुनौतियां हैं. जलवायु परिवर्तन से खतरे बनते हैं. आर्थिक निर्भरता पर्यटन पर जोखिम है. महंगाई और आय असमानता भी समस्याएं हैं. फिर भी सरकार ने योजनाएं बनाकर सुधार किए. प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के क्या हैं मायने? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे ने जोर दिया कि सेशेल्स अफ्रीकी साझेदार है. दौरे ने द्विपक्षीय संबंधों को सुदृढ़ किया. यह दौरा आर्थिक सहयोग और निवेश पर सकारात्मक संकेत देता है. ऐसे दौरे से व्यापार और पर्यटन में और अवसर बन सकते हैं. सरल शब्दों और संक्षेप में कहें तो सेशेल्स की समृद्धि कई कारणों का मेल है. पर्यटन इसका मुख्य स्तंभ है. समुद्री संसाधन, निवेश-अनुकूल नीतियां और अच्छा प्रशासन भी महत्वपूर्ण हैं. पर्यावरण संरक्षण और मानव विकास ने स्थिरता दी है. छोटी आबादी ने प्रति व्यक्ति आय बढ़ने में मदद की. प्रधानमंत्री मोदी के दौरे जैसे कदम दोस्ती और सहयोग बढ़ाते हैं. हालांकि, आगे की राह एकदम आसान नहीं है. आगे चुनौतियां बनी रहेंगी. पर अपनी सही नीतियों से सेशेल्स टिकाऊ समृद्धि बनाए रख सकता है.       

पटना समेत कई जिलों में गर्मी का असर, उत्तर बिहार में भारी बारिश की संभावना

 पटना बिहार में इन दिनों मौसम का दोहरा मिजाज देखने को मिल रहा है। राज्य के एक हिस्से में आंधी-बारिश हो रही है, तो दूसरे हिस्से में लू और भीषण गर्मी पड़ रही है। मौसम विज्ञान केंद्र, पटना की ताजा बुलेटिन के अनुसार, उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व और दक्षिण-पूर्व बिहार में बादल छाए रहने की संभावना है। वहीं बाकी हिस्सों में भीषण गर्मी और हीट वेव का असर बना रहेगा। इन जिलों में भारी बारिश का अलर्ट मौसम विभाग के मुताबिक, सुपौल, अररिया, कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया, सहरसा और मधेपुरा जिलों के अनेक स्थानों पर भारी बारिश की आशंका जताई गई है। इन इलाकों में जलभराव और स्थानीय स्तर पर परेशानी की स्थिति बन सकती है। वहीं उत्तर-पश्चिम, उत्तर-मध्य, उत्तर-पूर्व और दक्षिण-पूर्व बिहार में मेघ गर्जन, बिजली चमकने और 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज झोंकेदार हवाएं चलने की संभावना है। जबकि दक्षिण-पश्चिम और दक्षिण-मध्य बिहार में भी गरज-चमक के साथ 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से हवाएं चलने की संभावना है। इन जिलों में लू का प्रकोप बारिश के बीच दक्षिण-पश्चिम बिहार के कुछ हिस्सों में भीषण गर्मी भी लोगों को परेशान करेगी। मौसम विभाग ने भभुआ (कैमूर), बक्सर और रोहतास जिलों में हीट वेव चलने की चेतावनी जारी की गई है। ऐसे में लू के प्रकोप से बचने के लिए इन क्षेत्रों के लोगों अनावश्यक घर से बाहर नहीं निकलने की अपील की गई है। मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक, पश्चिम चंपारण, सीवान, मुजफ्फरपुर, दरभंगा जिले में अधिकतम तापमान 32 से 34 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम 24 से 26 डिग्री सेल्सियस रहने की संभावना है। वहीं उत्तर-पूर्व बिहार के अररिया, पूर्णिया, सुपौल अधिकतम तापमान 30 से 32 डिग्री सेल्सियस के बीच रह सकता है। इसके अलावा, दक्षिण-पश्चिम और दक्षिण-मध्य बिहार के पटना, गया, बक्सर, भोजपुर यहां गर्मी का असर अधिक रहेगा और अधिकतम तापमान 36 से 38 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है, जबकि न्यूनतम तापमान 26 से 28 डिग्री सेल्सियस रहने का अनुमान है।  

हाथरस से सियासी वार: सीएम योगी ने अखिलेश को मथुरा पर खुली चुनौती दी

लखनऊ समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने  दावा किया था कि उनकी सरकार आई तो अयोध्या को धार्मिक सिटी के रूप में विकसित किया जाएगा। अखिलेश के इसी दावे पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार की तीखा हमला किया। सीएम योगी ने अखिलेश यादव को चुनौती देते हुए कहा कि अयोध्या की पहचान बन चुकी है। अगर हिम्मत है तो यही बात मथुरा के लिए बोलकर दिखाइए। यह बोलकर दिखाइए कि जैसे अयोध्या के लिए श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन चला उसी तरह श्रीकृष्ण मुक्ति के लिए आंदोलन चलना चाहिए। सीएम योगी हाथरस में करोड़ों की विकास परियोजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण करने के बाद जनसभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि कल अखिलेश यादव का एक बयान पढ़ रहा था। वह कह रहे थे कि उनकी सरकार आएगी तो अयोध्या को धार्मिक नगरी बनाएंगे। सीएम योगी ने कहा कि आप क्या धार्मिक नगरी बनाएंगे, रामभक्तों पर गोली तो समाजवादी पार्टी की ही सरकार ने चलवाई थी। राम भक्तों की मेहनत से अब जब अयोध्या त्रेता युग का स्मरण करा रही है तो आपके मुंह में भी पानी आने लगा है। अयोध्या के लिए पश्चाताप, रामलला का जाकर दर्शन कीजिए योगी ने कहा कि अखिलेश जी अयोध्या को तो रामभक्तों ने सजा औऱ संवार दिया है। आप उसकी चिंता मत कीजिए, पश्चाताप कीजिए। एक बार कम से कम रामलला का दर्शन कर लीजिए, उसी से सद्बुद्धि आएगी। अब तैयारी कीजिए कि हम कृष्ण कन्हैया के लिए भी कुछ कर सकें। अब मथुरा की बात कीजिए। अगर सचमुच अपने को धार्मिक कहलाने का प्रयास कर रहे हैं तो मथुरा-वृंदावन और श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर खुलकर बोल दीजिए। अखिलेश को चुनौती देते हुए कहा कि यह बोलकर दिखाइए कि श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की तर्ज पर श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति का भी अभियान चलना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण की भूमि को भी सम्मान मिलना चाहिए। मुल्ला-मौलवियों के आगे घुटने टेकने का ही एजेंडा सीएम योगी ने कहा कि हमारी सरकार बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने का काम कर रही है। युद्धस्तर पर हम प्रयास कर रहे हैं लेकिन आप में हिम्मत नहीं है क्योंकि आप पर मुल्ला और मौलवियों के सामने घुटने टेकने के अलावा कोई एजेंडा नहीं है जिससे प्रदेश का विकास हो सके। कोई ऐसा एजेंडा नहीं है जिससे अयोध्या, मथुरा या काशी का उत्थान हो और उनकी पौराणिक पहचान स्थापित हो। कब्रिस्तान के पैसों को मंदिरों की ओर डायवर्ट किया कहा कि आंखों में धूल झोंकने का प्रयास मत कीजिए। अयोध्या पहचान की मोहताज नहीं है, अयोध्या ने दुनिया के सामने अपनी पहचान को बनाया हुआ है। आपने तो थानों में और जेलों में कृष्ण जन्माष्टमी मनाने पर भी रोक लगा दी थी। कांवर यात्रा पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। समाजवादी सरकार में पैसा कब्रिस्तान की बाउंड्री की तरफ जाता था, हमने उसे मंदिरों की तरफ डायवर्ट किया है। अखिलेश ने क्या कहा था अखिलेश यादव ने शनिवार को अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावा चोरी की चर्चा करते हुए कहा था कि हम धर्मनिष्ठता और सत्यनिष्ठता के साथ ये संकल्प लेते हैं कि नई सरकार बनाकर ‘अयोध्या’ को एक ऐसी अनुपम-अनुकरणीय धार्मिक नगरी के रूप में विकसित करेंगे, जहां विश्व भर से आए श्रद्धालु सच्ची आध्यात्मिकता की अद्वितीय अनुभूति करेंगे। अखिलेश ने एक्स पर लिखा था कि प्रभु के आशीर्वाद के साथ, हम अयोध्या के सनातन मान को आस्था-श्रद्धा, अखंड विश्वास और सच्ची भावना के ‘सियाराम-धाम’ के रूप में पुनर्स्थापित और पल्लवित करेंगे। इससे अयोध्यावासियों के भी परंपरागत गौरवभान और अधिकारों को पुन: स्थापित करेंगे।

FD भुगतान में 11 साल की देरी पर बैंक को झटका, उपभोक्ता को मिला पूरा मुआवजा

नई दिल्ली अगर आपने भी बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) करा रखा है, तो यह खबर आपके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। कई लोग मानते हैं कि FD सबसे सुरक्षित निवेश विकल्प है, लेकिन अगर बैंक ही मैच्योरिटी के बाद आपकी रकम लौटाने में आनाकानी करे तो क्या होगा? ऐसा ही एक मामला सामने आया, जिसमें एक व्यक्ति को अपनी 5 लाख रुपये की FD की रकम पाने के लिए लगभग 11 साल तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। आखिरकार, अदालत ने बैंक को कड़ी फटकार लगाते हुए न केवल पूरी रकम लौटाने, बल्कि 12% ब्याज और 10,000 रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया। यह मामला केरल के त्रिशूर निवासी सेतुमाधवन का है। उन्होंने बैंक में 5 लाख रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट कराई थी, जिसकी मैच्योरिटी 2 जून 2015 को पूरी हो गई थी। जब वे अपनी जमा राशि लेने बैंक पहुंचे, तो बैंक ने तकनीकी कारणों का हवाला देकर भुगतान करने से इनकार कर दिया। काफी प्रयासों के बावजूद जब पैसा नहीं मिला, तो उन्होंने जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का दरवाजा खटखटाया। उपभोक्ता आयोग ने सभी की जांच के बाद 31 दिसंबर 2021 को बैंक को आदेश दिया कि वह सेतुमाधवन को 5 लाख रुपये के साथ 12% सालाना ब्याज और 10,000 रुपये मुआवजा व मुकदमे का खर्च भी अदा करे। लेकिन, बैंक ने इस आदेश का पालन करने के बजाय अदालत में चुनौती देने का फैसला किया। बैंक ने पहले केरल हाईकोर्ट में अपील दायर की, लेकिन वह भी 825 दिन की देरी से। बैंक का तर्क था कि उस दौरान उसका प्रबंधन एक प्रशासक के अधीन था, इसलिए समय पर अपील नहीं की जा सकी। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने इस दलील को खारिज कर दिया और उपभोक्ता आयोग के फैसले को सही ठहराया। इसके बाद भी बैंक पीछे नहीं हटा और मामले को हाईकोर्ट की बड़ी बेंच के सामने ले गया। इस बार बैंक ने दलील दी कि वह एक सहकारी बैंक है और इसलिए इस विवाद का निपटारा उपभोक्ता आयोग नहीं, बल्कि सहकारी समिति कानून के तहत होना चाहिए। हालांकि, 2 जून 2026 को केरल हाईकोर्ट की बड़ी बेंच ने भी बैंक की सभी दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि उपभोक्ता संरक्षण कानून लोगों के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया खास कानून है और यह अन्य कानूनों के अतिरिक्त लागू होता है। इसलिए कोई भी बैंक या संस्था उपभोक्ता आयोग के अधिकार क्षेत्र से बच नहीं सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि जनता का पैसा रखने वाले बैंक की सबसे बड़ी जिम्मेदारी समय पर ग्राहकों को उनका पैसा लौटाना है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में बैंक के रवैये पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब बैंक खुद यह नहीं नकार रहा कि जमा राशि लौटानी है, तब केवल तकनीकी बहानों के आधार पर ग्राहक को परेशान करना बेहद निंदनीय है। अदालत ने कहा कि बैंक जैसे संस्थानों को जनता का विश्वास बनाए रखना चाहिए, न कि ग्राहकों को सालों तक न्याय के लिए भटकाना चाहिए। हालांकि, सुनवाई के दौरान बैंक की ओर से 6 महीने का समय मांगा गया, ताकि वह भुगतान कर सके। अदालत ने यह अनुरोध स्वीकार करते हुए बैंक को 6 महीने के भीतर पूरी राशि, 12% ब्याज और 10,000 रुपये मुआवजा देने का अंतिम मौका दिया। यह फैसला देशभर के करोड़ों FD निवेशकों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। अगर किसी बैंक या वित्तीय संस्था द्वारा मैच्योरिटी के बाद भी आपकी जमा राशि नहीं लौटाई जाती है, तो आप उपभोक्ता आयोग या अदालत का सहारा ले सकते हैं। अदालतों ने कई बार स्पष्ट किया है कि ग्राहकों के साथ लापरवाही करने वाले बैंकों को कानून के तहत जवाबदेह ठहराया जाएगा। एक्सपर्ट का मानना है कि यह फैसला बैंकिंग क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही को और मजबूत करेगा। साथ ही यह भी साबित करता है कि उपभोक्ता अपने अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई लड़कर न्याय प्राप्त कर सकते हैं, भले ही उसमें थोड़ा समय क्यों न लगे।  

बीडीए की बड़ी परियोजना: पीलीभीत बाइपास रोड सिक्सलेन और आठ लेन विस्तार की तैयारी तेज

बरेली  शहर के पीलीभीत बाइपास रोड पर प्रस्तावित सिक्स लेन का कार्य 50 प्रतिशत से अधिक पूर्ण हो गया है। परियोजना के अगले दो माह में पूर्ण होने और आमजन को सौंपने की संभावना जताई जा रही है। इसके लिए बीडीए की ओर से 60 करोड़ रुपये खर्च किया जा रहा है। परियोजना के तहत बैरियर-टू से बड़ा बाईपास तक मार्ग को सिक्सलेन में बदला जा रहा है। वहीं, बैरियर टू से सेटेलाइट तक मार्ग को आठ लेन बनाने के लिए मंगलवार को निविदा टेक्निकल बिड खोली जाएगी। बीडीए अधिकारियों के अनुसार वर्तमान में सड़क व फुटपाथ पर गिट्टी का कार्य लगभग पूर्ण कर लिया गया है। माना जा रहा है कि अब डीबीएम और वीसी का कार्य भी अगले दो माह में पूर्ण कर लिया जाएगा। पीलीभीत बाइपास सिक्सलेन मार्ग बना रहा बीडीए उल्लेखनीय है कि, शहर के सबसे व्यस्ततम मार्गों में एक पीलीभीत बाईपास मार्ग (बरेली एयरपोर्ट स्थित बैरियर-टू से बड़ा बाईपास तक) अब तक सिर्फ दो लेन होने की वजह से आए दिन जाम की समस्या बनी रहती थी। साथ ही दुर्घटनाएं भी होती रहती हैं। सड़क को चौड़ी करने के लिए पूर्व मंडलायुक्त सौम्या अग्रवाल के निर्देश पर पीडब्ल्यूडी ने बीते वर्ष बैरियर-टू से बड़ा बाईपास तक 4.86 किमी. मार्ग के फोरलेन निर्माण के लिए 136 करोड़ की कार्ययोजना शासन को प्रेषित की थी। अब तक 50 प्रतिशत से अधिक प्रगति का दावा इसके लिए कुछ धनराशि बीडीए से भी मांगी गई थी। मगर, परियोजना की स्वीकृति में लग रहे समय को देखते हुए अब बीडीए ने खुद मार्ग को चौड़ीकरण करने का निर्णय लिया। इस मार्ग पर एयरपोर्ट भी स्थित है। मार्ग के महज दो लेन होने के कारण एयरपोर्ट जाने वाले लोगों और दिल्ली, मुंबई व अन्य महानगरों से आने वाले यात्रियों को जाम के चलने परेशानी का सामना करना पड़ता था। 30 जून को खोली जाएगी निविदा इसी मार्ग पर ही सेटेलाइट से बड़ा बाईपास तक कई बड़े मैरिज हाल, होटल-रेस्टोरेंट व अन्य व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हैं। अब इस मार्ग चौड़ीकरण के बीच ही वर्तमान मंडलायुक्त भूपेंद्र एस चौधरी ने बीडीए को सेटेलाइट से बैरियर-टू तक आठ लेन व दो सर्विस लेन बनाने के लिए निर्देश दिए हैं, इसके लिए बीडीए की ओर से आमंत्रित निविदा 30 जून को खोली जाएगी। इस मार्ग के बनने के बाद शहर की तस्वीर बदलने की बात कही जा रही।  

फाइटर जेट इंजन में विदेशी निर्भरता बनी चुनौती, GE की कीमत बढ़ने से बढ़ी भारत की चिंता

 नई दिल्ली  भारत अपना खुद का पांचवीं पीढ़ी का अत्याधुनिक स्टील्थ लड़ाकू विमान (AMCA) बनाने के सपने पर तेजी से काम कर रहा है। लेकिन इस बीच देश के सामने एक पुरानी और बड़ी चुनौती फिर से खड़ी हो गई है और वह है, लड़ाकू विमान का इंजन बनाना। इस बात को ऐसे समझिए कि भारत ने फाइटर जेट का ढांचा, रडार और हथियार तो खुद बना लिए हैं, लेकिन विमान का सबसे जरूरी हिस्सा यानी 'इंजन' के लिए हम आज भी विदेशों पर निर्भर हैं। ऐसे में अब अमेरिकी कंपनी द्वारा अचानक दाम बढ़ा दिए जाने से भारत के इस ड्रीम प्रोजेक्ट पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। अब सवाल अमेरिकी कंपनी की जरूरत क्यों? लड़ाकू विमान के इंजन की कीमतों में भारी उछाल के बाद यह सवाल दोबारा खड़ा हो गया है कि आखिर भारत को इस प्रोजेक्ट के लिए अमेरिकी बैसाखी की जरूरत क्यों पड़ रही है? अच्छा सवाल यह भी है कि क्या अमेरिकी कंपनी द्वारा बनाए गए इंजन की जरूरत केवल भारत को है या फिर अन्य देशों को भी? इस बात का जवाब है कि नहीं, सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि तुर्किए, दक्षिण कोरिया और स्वीडन जैसे देश भी अपने स्वदेशी लड़ाकू विमानों के लिए पूरी तरह अमेरिकी तकनीक पर निर्भर हैं। ऐसे में अब सवाल यह है कि भारत अपने लड़ाकू विमान के इंजन की बनावट को लेकर क्या कदम उठाने वाला है? पहले समझिए क्या है पूरा विवाद बता दें कि भारत के फाइटर जेट प्रोजेक्ट्स के लिए अमेरिका की मशहूर कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) से F414 इंजन खरीदने की बातचीत चल रही थी। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह बातचीत अब खटाई में पड़ती दिख रही है। इसका कारण है कि DRDO के सूत्रों के मुताबिक, जिस F414 इंजन की कीमत पहले प्रति यूनिट 70 से 80 करोड़ रुपये तय की जा रही थी, अमेरिकी कंपनी GE ने अब उसके दाम करीब तीन गुना बढ़ाकर बताए हैं। दाम बढ़ने के बाद बजट मुख्य चुनौती अमेरिकी कंपनी की तरफ से दाम तीन गुणा बढ़ाने के दावों के बाद समझौता अब अधर में पड़ता दिख रहा है। इस बात को ऐसे समझिए कि भारत सरकार ने इस विमान के शुरुआती 5 मॉडल बनाने के लिए 15000 करोड़ रुपये का बजट रखा है। ऐसे में इंजन महंगा होने से यह पूरा बजट गड़बड़ा सकता है। अब समझिए भारत के सामने क्या है मजबूरी? दाम बढ़ाने के बाद अब डिजाइन को लेकर सबसे बड़ी समस्या भारत के सामने खड़ी हो रही है। इस बात को ऐसे समझिए कि भारत की वैमानिकी विकास एजेंसी (ADA) ने AMCA लड़ाकू विमान का पूरा ढांचा इसी अमेरिकी F414 इंजन के हिसाब से डिजाइन किया है। इस मोड़ पर आकर इंजन बदलना बिल्कुल भी आसान नहीं है। दूसरी ओर प्रोजेक्ट में देरी की संभावना भी चिंता का विषय बन सकता है। कारण है कि भारत को शुरुआती टेस्टिंग के लिए 15 इंजनों की जरूरत है। अगर बातचीत में देरी हुई, तो विमान के आने का समय और आगे खिसक सकता है। हालांकि वैसे उम्मीद है कि यह विमान 2034 या 2035 तक भारतीय वायुसेना में शामिल हो पाएगा। इसका असर तेजस विमानों पर भी होगा? तो इस सवाल का जवाब है, हां शायद। रिपोर्ट की माने तो इंजनों के दाम बढ़ाने का असर सिर्फ लड़ाकू विमान AMCA ही नहीं, भारत का नया तेजस Mk2 विमान भी इसी इंजन पर चलने वाला है। वहीं, पुराने तेजस Mk1A के लिए भी अमेरिका से इंजनों की सप्लाई में देरी हो रही है, जिससे वायुसेना को विमान मिलने में लेट हो रहा है। सिर्फ भारत नहीं, दुनिया के ये बड़े देश भी हैं मजबूर अच्छा सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि इंजन के मामले में सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई और ताकतवर देश भी अमेरिका के भरोसे हैं। इस बात ऐसे समझिए कि तुर्किए का अपना पांचवीं पीढ़ी का विमान 'KAAN' भी शुरुआत में अमेरिकी GE F110 इंजन से ही उड़ेगा, क्योंकि उनका खुद का इंजन बनने में अभी कई साल लगेंगे। दूसरी ओर दक्षिण कोरिया का नया 'KF-21' लड़ाकू विमान भी अमेरिकी F414 इंजन की मदद से ही उड़ रहा है। स्वीडन का मशहूर 'ग्रिपेन' (Gripen E) विमान भी अमेरिकी इंजन पर निर्भर है। इसका नुकसान यह है कि स्वीडन अपनी मर्जी से इसे किसी दूसरे देश को बेच नहीं सकता, क्योंकि इसके लिए अमेरिका की मंजूरी (ITAR नियम) जरूरी होती है। अब सवाल- आखिर लड़ाकू विमान का इंजन बनाना इतना मुश्किल क्यों? गौरतलब है कि फाइटर जेट का इंजन बनाना दुनिया की सबसे जटिल और कठिन तकनीकों में से एक है। इन इंजनों को बहुत कम वजन और कम ईंधन में आसमान चीरने वाली ताकत पैदा करनी होती है। कारण है कि इंजन के अंदर का तापमान इतना ज्यादा होता है कि आम धातुएं तुरंत पिघल जाएं। इसके लिए खास 'सिंगल-क्रिस्टल ब्लेड्स' और अत्याधुनिक धातुओं की जरूरत होती है। ऐसे में फिलहाल दुनिया के सिर्फ 5 देश अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन के पास ही स्वतंत्र रूप से फाइटर जेट इंजन बनाने की तकनीक है। हालांकि इस बात में भी कोई दोहराई नहीं है कि भारत ने सालों पहले खुद का 'कावेरी इंजन' बनाने की कोशिश की थी, लेकिन वह लड़ाकू विमान को उड़ाने लायक ताकत नहीं दे पाया। अब उस इंजन के बदले हुए रूप का इस्तेमाल भारत के 'घातक' ड्रोन में किया जाएगा।

पर्यावरण नेतृत्व की मान्यता: पीएम मोदी को सेशेल्स ने दिया शीर्ष सम्मान

विक्टोरिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास में नेतृत्व के लिए सेशेल्स की ओर से देश का सर्वोच्च सम्मान ‘गार्डियन ऑफ द ब्लू होराइजन’ प्रदान किया गया है। रविवार को राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी ने उन्हें ये सम्मान दिया। 'गार्डियन ऑफ द ब्लू होराइजन' सम्मान प्रधानमंत्री मोदी की लंबे समय से जारी उस नीति और दृष्टिकोण को मान्यता देता है, जिसमें सतत विकास, हरित विकास और पर्यावरण-अनुकूल नीतियों पर जोर दिया गया है। पीएम मोदी के 'ग्रीन विजन' को मान्यता यह उपाधि उन कई वैश्विक मान्यताओं में नवीनतम है, जो प्रधानमंत्री मोदी को जलवायु परिवर्तन, सतत विकास और हरित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए मिल चुकी हैं। पिछले महीने मई 2026 में, संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने उन्हें कृषि क्षेत्र को मजबूत करने, खाद्य सुरक्षा बढ़ाने और सतत कृषि को प्रोत्साहित करने के लिए एग्रीकोला मेडल प्रदान किया था। सेशेल्स द्वारा दिया गया यह सम्मान प्रधानमंत्री मोदी के वैश्विक पर्यावरणीय नेतृत्व और “ग्रीन विज़न” को और अधिक मजबूत मान्यता के रूप में देखा जा रहा है। भारत के पीएम तीन दिवसीय आधिकारिक दौरे पर शनिवार को सेशेल्स पहुंचे। जहां राष्ट्रपति हर्मिनी ने उनका औपचारिक स्वागत किया। सेशेल्स के राष्ट्रपति के साथ द्विपक्षीय वार्ता रविवार को स्टेट हाउस में प्रधानमंत्री को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई। दोनों ने क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपसी हितों से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श किया। बैठक में विदेश मंत्री एस. जयशंकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल, विदेश सचिव विक्रम मिस्री और अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। नेशनल एसेंबली को संबोधित कर रचेंगे इतिहास पीएम मोदी भारतीय समुदाय की ओर से आयोजित कार्यक्रम में भी शामिल होंगे और सेशेल्स की नेशनल असेंबली को संबोधित करेंगे। जिसके साथ ही वे दुनिया के पहले ऐसे भारतीय प्रधानमंत्री बन जाएंगे जिन्होंने 20 देशों की संसद या नेशनल असेंबली को संबोधित किया है। सेशेल्स रवाना होने से पहले पीएम मोदी ने खुद इसकी जानकारी दी थी। एक्स पर उन्होंने लिखा, "मुझे सेशेल्स की नेशनल असेंबली को संबोधित करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बनने का सम्मान प्राप्त होगा। यह ऐतिहासिक अवसर उन सशक्त लोकतांत्रिक मूल्यों और संसदीय परंपराओं का प्रतीक है, जो हमारे दोनों देशों को एक-दूसरे से जोड़ती हैं

उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा पारिवारिक रहस्य! किम जोंग उन की मां की पहचान पर क्यों है सन्नाटा?

प्योंगयांग उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन से जुड़े कई रहस्यों पर अक्सर बात होती है। इनमें से एक बड़ा रहस्य उनकी मां के बारे में है। अपने 15 साल के शासनकाल में किम ने कभी भी सार्वजनिक रूप से अपनी मां का जिक्र नहीं किया है। उत्तर कोरिया जैसे देश में जो अपनी वंशानुगत शुद्धता पर गर्व करता है, किम की मां की पहचान ना केवल एक रहस्य की तरह है। इसकी वजह उनकी मां के परिवार की जड़ों को माना जाता है। किम के मातृपक्ष का वंश जापान से जुड़ा है। जापान के ओसाका शहर में किम की मां को योंग हुई का जन्म हुआ था। को हुई का जन्म 1952 में ओसाका में हुआ लेकिन उनके माता-पिता मूल रूप से जेजू द्वीप के रहने वाले थे, जो आज के दक्षिण कोरिया के दक्षिणी तट के पास स्थित है। वह करीब 10 साल की थीं, तो को का परिवार उत्तर कोरिया आ गया। दक्षिण कोरिया और जापान उत्तर कोरिया के दुश्मन मुल्क माने जाते हैं। योंग राजपरिवार का हिस्सा कैसे बनीं उत्तर कोरिया में आए लोगों को ईर्ष्या की नजर से देखा जाता था और जैपो कहा जाता था। यह एक अपमानजनक शब्द है। उत्तर कोरियाई समाज में ऊंच-नीच बहुत ज्यादा है। सख्त सामाजिक वर्गीकरण में जैपो लोग वेवरिंग क्लास में आते हैं। नॉर्दर्न रिसर्च एसोसिएशन के किम ह्युंग-सू कहते हैं कि शासन की पैकटू वंशावली को पवित्र माना जाता है। इसलिए सुप्रीम नेता के किसी जैपो का बेटा होने की बात सोचना भी नामुमकिन है। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, योंग हुई को उस वक्त किम जोंग-इल (किम जोंग उन के पिता) ने देखा था, जब उनको सत्ता संभालने के लिए तैयार किया जा रहा था। हालांकि उनकी शादी पहले ही किम यंग-सूक से हो चुकी थी लेकिन वह योंग हुई के भी करीब आ गए। दोनों साथ रहे और किम जोंग समेत तीन बच्चे हुए। इन बच्चों को लाइमलाइट ले दूर रखा गया क्योंकि उत्तर कोरिया में शादी के बिना बच्चों को बुरा माना जाता है। साल 2004 में निधन साल 2004 में पेरिस के एक अस्पताल में ब्रेस्ट कैंसर से हुई का निधन हो गया। उत्तर कोरियाई सरकारी मीडिया ने उनकी मौत के बारे में खबर नहीं दी। इसकी वजह उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि को माना गया। इसके उलट उनके बच्चों की किस्मत अलग थी। किम की पत्नी किम यंग सूक ने दो लड़कियों को जन्म दिया। ऐसे में उत्तराधिकार योंग हुई के बेटे किम को मिला। किम जोंग उन युवावस्था में ही अपने पिता के पसंदीदा बन गए थे, जिसका मुख्य कारण उनकी नेतृत्व क्षमता और प्रतिस्पर्धी स्वभाव था। उन्होंने कुछ समय के लिए स्विट्जरलैंड में विदेश में पढ़ाई भी की थी। इसलिए जब 2011 में किम जोंग-इल का निधन हुआ तो उस समय 27 साल के किम जोंग-उन ने सत्ता की बागडोर संभाल ली। मां के नाम से दूरी की वजह किम जोंग उन ने सत्ता संभालने के बाद दादा और पिता के जन्मदिन की तरह मांग के जन्मदिन को राष्ट्रीय अवकाश घोषित नहीं किया गया है। वह अपनी मां पर कोई बात नहीं करते हैं। एक्सपर्ट का कहना है कि अगर इस पर चर्चा होगी कि किम की मां जापान से कोरियाई मूल की थीं तो यह उनकी वैधता को हिला देगा। इसका उत्तर कोरियाई समाज पर बहुत असर होगा

वेनेजुएला आपदा: ला गुआइरा में भारी तबाही, राहत कार्यों में लापरवाही के आरोप

कराकास  वेनेजुएला में बीते दिनों आए 7.2 और 7.5 तीव्रता के विनाशकारी भूकंप ने भयंकर तबाही मचाई है। यहां मरने वालों और घायलों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। इस हादसे में मरने वालों की संख्या बढ़कर 1,430 हो गई है, जबकि 3,200 से अधिक लोग घायल हैं और करीब 50,000 लोग अभी भी लापता हैं। इस विनाशकारी भूकंप में सबसे अधिक ला गुआइरा राज्य प्रभावित हुआ है। यहां हर तरफ मलबे और सड़ते शवों की दुर्गंध फैली हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्राकृतिक आपदाओं के बाद पहले 72 घंटे जीवित लोगों को खोजने के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। वह समय अब समाप्त हो चुका है। जीवित लोगों की खोज अब शवों की खोज में बदल गई है। सेल्फी लेते नजर आएं अधिकारी भूकंप के बीच सरकारी संवेदनहीनता की एक बेहद शर्मनाक तस्वीर सामने आई है। एक तरफ जहां हजारों लोग मलबे के नीचे दबे हैं, लाशें सड़ रही हैं। वहीं दूसरी तरफ आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने आए सरकारी कर्मचारी और अधिकारी ध्वस्त इमारतों के सामने खड़े होकर 'सेल्फी' खींचते नजर आए। राहत कार्यों में सरकार द्वारा ढिलाई के बीच हद तो तब हो गई जब सरकार ने सबसे ज्यादा प्रभावित ला गुआइरा क्षेत्र में आम लोगों का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया और मलबे से अपनों की जान बचाने के लिए जुटे स्थानीय स्वयंसेवकों के लिए भी 'सुरक्षित प्रवेश पास (परमिट)' लेना अनिवार्य कर दिया। जिसको लेकर स्थानीय लोगों का गुस्सा भड़क उठा और कहा कि यहां अधिकारी मदद के लिए सेल्फी लेने के लिए आए थे। सड़ते शवों क दुर्गंध भीषण गर्मी में सड़ते शवों की दुर्गंध फैलने के कारण अधिकाधिक लोग मास्क पहने हुए हैं। जो लोग बच गए उनकी कहानियां एक मां को अपनी बेटी का शव कराकस के मुर्दाघर तक ले जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। बुधवार को ला गुआइरा में उनके घर के मलबे के गिरने से उनकी बेटी और दामाद की मौत हो गई। उन्होंने एएफपी को बताया, "हमने उन्हें खुद बाहर निकाला। कोई मदद नहीं आई। शवों के तेजी से सड़ने के कारण दंपति का अंतिम संस्कार बिना किसी शोक सभा के किया जाएगा। आखिर वे किस बात का इंतजार कर रहे हैं? वेनेजुएला में आए विनाशकारी भूकंप के बाद जहां एक तरफ लोग अपनों को खोने के गम में डूबे हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार और प्रशासन की सुस्ती ने इस दर्द को गुस्से में बदल दिया है। कैराबलेडा के समुद्रतटीय कस्बे में मलबे के बीच अपनों को तलाश रही माइलेडी रोमेरो ने कहा, "वहाँ कल रात से लाशों का ढेर लगा हुआ है। उन शवों में मासूम नवजात शिशु भी हैं। कल रात 8 बजे तक वहां मलबे के नीचे लोग ज़िंदा थे, चिल्ला रहे थे, लेकिन प्रशासन ने उन्हें बचाने की कोई जरूरत ही नहीं समझी। हमने अपने स्तर पर कई लाशें बाहर निकाली हैं, लेकिन उन्हें निकालने में भी अधिकारियों ने हमारी कोई मदद नहीं की। आखिर वे किस बात का इंतजार कर रहे हैं।" हालांकि, अमेरिकासहित 21 देश राहत दल खोज अभियान में जुटे हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN) के अनुसार इस आपदा से करीब 67 लाख लोग प्रभावित हुए हैं।