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Bhopal News: महिला अपराधों में 20% बढ़ोतरी, पूर्व चाइल्डलाइन डायरेक्टर ने माता-पिता को दी अहम सलाह

भोपाल  राजधानी में महिला सुरक्षा के दावों के बीच एक बेहद चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है। सरकारी आंकड़ों और पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, शहर में महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ होने वाले अपराधों में लगातार तेजी आ रही है। स्थिति कितनी संवेदनशील है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 2024 की तुलना में वर्ष 2025 में दुष्कर्म के मामलों में सीधे 20 फीसदी का उछाल दर्ज किया गया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि भोपाल इस वक्त महिला सुरक्षा के मामले में एक तरह से 'बारूद के ढेर' पर बैठा है। हर दिन एक रेप और एक छेड़छाड़ की वारदात पुलिस से मिले आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 में भोपाल में दुष्कर्म के 305 मामले दर्ज किए गए थे, जो 2025 में बढ़कर 367 हो गए। इस साल यानी 2026 के शुरुआती पांच महीनों (जनवरी से मई) के आंकड़े भी डराने वाले हैं। इस अवधि में अब तक 167 मामले दर्ज हो चुके हैं, जबकि पिछले साल इसी अवधि में 164 मामले आए थे। इसका सीधा मतलब यह है कि राजधानी में औसत रूप से हर दिन एक दुष्कर्म और एक छेड़छाड़ का मामला पुलिस स्टेशन पहुंच रहा है। हालांकि, इस साल छेड़छाड़ के मामलों में 7% की मामूली गिरावट (155 केस) देखी गई है। 60% मामलों में 'सोशल मीडिया' का खूनी खेल इस पूरे ट्रेंड पर चिंता जताते हुए सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक गहरे और नए खतरे की ओर इशारा किया है, वह है सोशल मीडिया। भोपाल में हो रहे महिला और बाल अपराधों का विश्लेषण करने पर सामने आया है कि अपराधियों का सबसे बड़ा हथियार अब फेसबुक, इंस्टाग्राम और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बन चुके हैं। हमने जितने मामलों का विश्लेषण किया है, उनमें से लगभग 60% मामलों का कोई न कोई लिंक सोशल मीडिया से जुड़ा है। छोटी बच्चियों, किशोरियों और यहां तक कि नाबालिग लड़कों को भी ऑनलाइन शिकार बनाया जा रहा है। पॉक्सो के कई मामलों में बच्चों को ऑनलाइन बातचीत के जरिए प्रभावित किया गया। आरोपी फर्जी नाम, गलत उम्र और झूठी पहचान बताकर पहले बच्चों का भरोसा जीतते हैं, और फिर यह दोस्ती प्रताड़ना, ब्लैकमेलिंग और यौन शोषण में बदल जाती है। अर्चना सहाय, सामाजिक कार्यकर्ता एवं पूर्व डायरेक्टर, चाइल्डलाइन, भोपाल 'माता-पिता की बात सुनना बंद कर रही हैं लड़कियां' अर्चना सहाय ने पारिवारिक ताने-बाने पर पड़ रहे इसके असर को लेकर सचेत किया। उन्होंने बताया कि कई मामलों में लड़कियां ऑनलाइन बने दोस्तों के प्रभाव में इस कदर आ जाती हैं कि वे अपने माता-पिता की बातें सुनना तक बंद कर देती हैं। कुछ मामलों में तो बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी या घर से भागने जैसा आत्मघाती कदम उठा लिया। उन्होंने अपील की है कि बच्चों को स्मार्टफोन देने से पहले पैरेंट्स उन्हें सायबर सेफ्टी के बारे में जरूर शिक्षित करें। अधिकांश मामलों में 'अपराधी' कोई अनजान नहीं इधर, पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अधिकांश मामलों में आरोपी कोई अजनबी नहीं, बल्कि पीड़िता का कोई परिचित, रिश्तेदार या सोशल मीडिया का करीबी दोस्त ही निकलता है। हालांकि, मामलों की संख्या बढ़ने के पीछे पुलिस का तर्क है कि अब समाज में जागरूकता बढ़ी है, जिससे लोग चुप रहने के बजाय थानों में आकर एफआईआर दर्ज करवा रहे हैं। पुलिस कमिश्नर संजय कुमार ने बताया कि जांच अधिकारियों को संवेदनशील बनाने के लिए लगातार ट्रेनिंग दी जा रही है।  

मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (UCC) पर बड़ा अपडेट, मतांतरित आदिवासियों के सुझावों की कानूनी समीक्षा जारी

भोपाल  मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक 20 जुलाई से प्रारंभ हो रहे विधानसभा के मानसून सत्र में प्रस्तुत किया जाएगा। इसमें आदिवासियों के साथ-साथ मतांतरित आदिवासी भी कानून के दायरे से बाहर रखे जा सकते हैं। इस विषय को लेकर सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई वाली समिति को जन परामर्श में बड़ी संख्या में सुझाव मिले हैं। अधिकतर का पक्ष है कि जब आदिवासी मतांतरित हो गया तो फिर उसे आदिवासियों को मिलने वाले अधिकार व सुविधा नहीं मिलने चाहिए। सैद्धांतिक तौर पर सभी इससे सहमत भी हैं लेकिन समिति कानूनी प्रावधान देख रही है। जन परामर्श में मिले विविध सुझाव जन परामर्श के दौरान भोपाल में पूर्व न्यायाधीश मोहन पी तिवारी ने आदिवासियों को लेकर यह तर्क रखा था कि इनकी अपनी परंपराएं और व्यवस्थाएं हैं, इसलिए इन्हें कानून के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए। जहां तक बात मत परिवर्तन करने वाले आदिवासियों की है, तो वे मतांतरण के बाद आदिवासी तो रह नहीं गए। ब्राह्मण व ऊंची जातियों के बच्चों से विवाह कर रहे हैं, फिर भी आदिवासी बने हुए हैं। वनवासी कल्याण आश्रम एसएस कुमरे ने भी इस बात पर जोर दिया कि आदिवासी समाज की लड़की अगर दूसरी जाति में विवाह करती है तो उस पर यूसीसी लागू होना चाहिए। इसी तरह के अन्य सुझाव भी आए हैं। कानूनी पहलुओं का अध्ययन सूत्रों का कहना है कि समिति में इस विषयों को लेकर काफी विचार-विमर्श हुआ है। कानूनी पहलू देखे गए। दरअसल, संविधान के प्रविधान अनुसार अनुसूचित जनजातियों के लिए धर्म आधारित कोई रोक-टोक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों में भी यह स्पष्ट किया गया है कि आदिवासी व्यक्ति किसी भी धर्म (जैसे ईसाई या इस्लाम) को अपना ले, फिर भी वह कानूनी रूप से अपना अनुसूचित जनजाति का दर्जा और उससे जुड़े अधिकार बनाए रख सकता है। जाति प्रमाण पत्र भी बनते हैं और आरक्षण का लाभ भी मिलता है।  

AI पर बढ़ा भारतीयों का विश्वास, 85% उपभोक्ताओं ने जताया भरोसा; रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

नई दिल्ली   भारत में 85 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) पर मजबूत भरोसा जताया है और भविष्य को आकार देने में इसकी भूमिका को लेकर उत्साह दिखाया है। वहीं, 94 प्रतिशत लोगों का मानना है कि तकनीक ने उनके जीवन को पहले से बेहतर बनाया है। यह जानकारी मंगलवार को जारी अश्योरेंट इंक. की एक रिपोर्ट में सामने आई। इस रिपोर्ट के अनुसार, टेक्नोलॉजी सेंटिमेंट इंडेक्स में भारत को 74 अंक मिले हैं, जो वैश्विक औसत से काफी अधिक है। यह दर्शाता है कि भारतीय उपभोक्ताओं में नई तकनीकों के प्रति विश्वास मजबूत है और वे अगली पीढ़ी के डिजिटल अनुभवों को अपनाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय उपभोक्ता अब ऐसे एआई-सक्षम उपकरणों को तेजी से अपनाने के लिए तैयार हैं, जो उनकी उत्पादकता बढ़ाने, बेहतर संचार और रोजमर्रा के कामों को अधिक सुविधाजनक बनाने में मदद करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, स्मार्टफोन, कंप्यूटर और अन्य कनेक्टेड डिवाइस अब काम, मनोरंजन, संचार और वित्तीय लेनदेन जैसी दैनिक जरूरतों का अहम हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में उपभोक्ताओं की अपेक्षा है कि उन्हें हर समय बिना किसी रुकावट के सहज और भरोसेमंद डिजिटल अनुभव मिलें। अश्योरेंट इंटरनेशनल के अध्यक्ष फेडेरिको बुंगे ने कहा कि दुनिया भर में कनेक्टेड तकनीक लोगों के दैनिक जीवन का अहम हिस्सा बनती जा रही है। अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तकनीकी अनुभव लोगों की व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार खुद को ढालें, ताकि नवाचार के साथ सरलता, भरोसा और विश्वसनीयता भी बनी रहे। उन्होंने कहा कि भारत में यह बदलाव बेहद तेजी से हो रहा है, जहां के डिजिटल रूप से जागरूक उपभोक्ता एआई-आधारित नवाचारों को तेजी से अपना रहे हैं और ऐसे निर्बाध अनुभव चाहते हैं जो उनके दैनिक जीवन में बिना किसी परेशानी के शामिल हो जाएं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जब कनेक्टिविटी या स्टोरेज जैसी तकनीकी समस्याएं सामने आती हैं, तो वे लोगों की दिनचर्या को प्रभावित करती हैं। ऐसे में डिवाइस का भरोसेमंद प्रदर्शन और समय पर तकनीकी सहायता उपभोक्ताओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। रिपोर्ट के अनुसार, डिवाइस प्रोटेक्शन प्लान अब उपभोक्ताओं का भरोसा बढ़ाने और कंपनियों के ब्रांड मूल्य को मजबूत करने का अहम माध्यम बन रहे हैं। भारत में 97 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने कहा कि यदि उन्हें अपनी जरूरत के अनुसार अनुकूलित (कस्टमाइजेबल) प्रोटेक्शन प्लान मिलें, तो वे नया डिवाइस खरीदने और उसके साथ सुरक्षा योजना लेने के लिए अधिक इच्छुक होंगे। अश्योरेंट इंडिया की कंट्री डायरेक्टर हरिनी कन्नन ने कहा कि भारत दुनिया के सबसे गतिशील और भविष्य की ओर तेजी से बढ़ने वाले कनेक्टेड उपभोक्ता बाजारों में से एक है। उन्होंने कहा कि भारतीय उपभोक्ता बड़े पैमाने पर नई तकनीकों को अपना रहे हैं और चाहते हैं कि तकनीक बिना किसी परेशानी के उनके जीवन का हिस्सा बने। ऐसे में कंपनियों के लिए बेहतर प्रोटेक्शन और सर्विस अनुभव प्रदान कर खुद को प्रतिस्पर्धियों से अलग साबित करने का बड़ा अवसर मौजूद है।

MP News: बेतवा में अब नहीं मिलेगा जहरीला पानी, सीवेज और औद्योगिक प्रदूषण रोकने के लिए बड़ा एक्शन

भोपाल मध्यप्रदेश सरकार नमामि गंगे मिशन के तहत बेतवा नदी के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए बड़े स्तर पर काम शुरू करने जा रही है। सरकार का फोकस केवल नदी की सफाई तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैज्ञानिक और दीर्घकालिक योजना के जरिए पूरे नदी तंत्र को पुनर्जीवित किया जाएगा। इसके लिए भोपाल में अधिकारियों को प्रशिक्षण देकर पूरे प्रोजेक्ट की योजना तैयार कराई जा रही है। बेतवा नदी के लिए व्यापक डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने के लिए इंजीनियरों को तकनीकी पहलुओं की जानकारी दी जा रही है। बेतवा जहां सबसे ज्यादा प्रदूषित, वहीं से होगी संरक्षण की शुरुआत मध्यप्रदेश में नमामि गंगे परियोजना से जुड़े अधिकारियों ने बताया कि बेतवा नदी का उद्गम रायसेन जिले के जंगलों में स्थित झिरी नामक स्थान पर है। लेकिन उद्गम के बाद भोपाल, रायसेन और विदिशा जिलों में यह नदी प्रदूषण का शिकार हो रही है। भोपाल की कलियासोत नदी और बेतवा का संगम भोजपुर के पास होता है, जहां नदी की स्थिति काफी खराब है। वहीं मंडीदीप के पास बेतवा का बड़ा हिस्सा जलकुंभी से ढक गया है। ऐसे में इन तीनों जिलों में बेतवा के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए विशेष योजना बनाई जा रही है। सीवेज ट्रीटमेंट पर सबसे ज्यादा फोकस भोपाल की कलियासोत नदी से लेकर बेतवा नदी में मिलने वाले सीवेज को रोकने और प्रदूषण कम करने के लिए तीनों जिलों के नगरीय निकायों के इंजीनियरों को विशेषज्ञों द्वारा विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। मंडीदीप में उद्योगों का प्रदूषित पानी सीधे बेतवा में मंडीदीप में उद्योग स्थापित होने के बाद से अब तक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट नहीं बन पाया है। इसके कारण उद्योगों से निकलने वाला प्रदूषित पानी सीधे बेतवा नदी में मिल रहा है। इसका असर नदी के साथ-साथ आसपास की खेती पर भी पड़ रहा है। सरकार की कोशिश है कि बेतवा की धारा निर्मल और अविरल बनाई जा सके। अधिकारियों ने बताया कि नमामि गंगे भारत सरकार का एकीकृत नदी संरक्षण मिशन है, जिसका उद्देश्य गंगा और उसकी सहायक नदियों का संरक्षण, पुनर्जीवन और समग्र विकास सुनिश्चित करना है। मध्यप्रदेश का गंगा बेसिन 34 जिलों और 283 शहरी निकायों तक फैला है। इसमें चंबल, बेतवा, सिंध, काली सिंध, धसान, केन, क्षिप्रा, गंभीर, टोंस, सोन और पावती जैसी 11 प्रमुख नदियां शामिल हैं। बेतवा पर बढ़ा प्रदूषण का दबाव प्रस्तुति में बताया गया कि बेतवा नदी इस समय अनुपचारित सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, नदी तटों के कटाव और पर्यावरणीय प्रवाह में कमी जैसी गंभीर समस्याओं का सामना कर रही है। इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिक और टिकाऊ डीपीआर तैयार की जाएगी। डीपीआर में शामिल होंगे ये प्रमुख बिंदु डीपीआर में केवल सीवेज प्रबंधन ही नहीं, बल्कि प्रदूषण नियंत्रण, अपशिष्ट जल एवं ठोस कचरा प्रबंधन, पर्यावरणीय प्रवाह बढ़ाना, नदी तटों का पुनर्स्थापन, जैव विविधता संरक्षण, जलग्रहण क्षेत्र का उपचार और जनभागीदारी जैसे विषय भी शामिल किए जाएंगे। अधिकारियों को मिलेगा विशेष प्रशिक्षण सरकार का मानना है कि डीपीआर तैयार करने में क्षेत्रीय अधिकारियों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी। इसलिए उन्हें डेटा संग्रह, विभिन्न विभागों के समन्वय, हितधारकों से परामर्श और परियोजना क्रियान्वयन की तकनीकी जानकारी दी जा रही है, ताकि नमामि गंगे मिशन के लक्ष्यों को समयबद्ध और प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके। प्रदेश में 824.57 करोड़ की आठ परियोजनाएं पहले से मंजूर नमामि गंगे मिशन के दूसरे चरण में मध्यप्रदेश को 824.57 करोड़ रुपए की आठ परियोजनाएं स्वीकृत हो चुकी हैं। इनमें इंदौर, उज्जैन और नागदा में सीवेज प्रबंधन, चित्रकूट की मंदाकिनी, मंदसौर की शिवना, ग्वालियर की मोरार नदी से जुड़े कार्य तथा मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) की चार प्रयोगशालाओं के सुदृढ़ीकरण की परियोजनाएं शामिल हैं। इन सभी योजनाओं को 100 प्रतिशत केंद्रीय सहायता से लागू किया जा रहा है। नमामि गंगे मिशन (मध्यप्रदेश) की प्रमुख जानकारी भारत सरकार ने वर्ष 2014 में नमामि गंगे कार्यक्रम शुरू किया था। पहले चरण में गंगा किनारे के पांच राज्यों में सीवेज, औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण और अन्य परियोजनाएं शुरू की गई थीं। दूसरे चरण में गंगा की सहायक नदियों वाले राज्यों, जिनमें मध्यप्रदेश भी शामिल है, में नदी प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी परियोजनाएं स्वीकृत की गईं। मध्यप्रदेश में स्वीकृत परियोजनाएं मध्यप्रदेश में कुल आठ परियोजनाएं स्वीकृत हुई हैं, जिनकी कुल लागत 824.57 करोड़ रुपए है। इनमें तीन परियोजनाएं नगरीय विकास एवं आवास विभाग (इंदौर, उज्जैन और नागदा) को सीवेज एवं प्रदूषण नियंत्रण के लिए मिली हैं। एक परियोजना चित्रकूट (सतना) में मंदाकिनी नदी पर घाट निर्माण के लिए है। एक परियोजना मंदसौर में शिवना नदी के पर्यावरण उन्नयन के लिए है। दो परियोजनाएं ग्वालियर में मोरार नदी के पुनर्जीवन और रिवर फ्रंट विकास के लिए हैं। एक परियोजना मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) की प्रयोगशालाओं के सुदृढ़ीकरण के लिए है। इनमें सबसे बड़ी परियोजना इंदौर की कान्ह एवं सरस्वती नदी प्रदूषण नियंत्रण परियोजना है, जिसकी स्वीकृत लागत 511.15 करोड़ रुपए है। क्रम परियोजना लागत (करोड़ रु.) 1 ग्वालियर में मोरार नदी का पुनर्जीवन एवं विकास 39.24 (स्वीकृति), 22.19 (अवार्ड) + 18% GST 2 मोरार नदी रिवर फ्रंट विकास (फेज-II), ग्वालियर 32.44 3 मंदसौर में शिवना नदी का पर्यावरण उन्नयन 28.91 (स्वीकृति), 27.12 (अवार्ड) 4 चित्रकूट (सतना) में मंदाकिनी नदी पर घाट निर्माण 31.88 (स्वीकृति), 26.22 (अवार्ड) 5 इंदौर में कान्ह एवं सरस्वती नदी प्रदूषण नियंत्रण हेतु अतिरिक्त विकेन्द्रीकृत STP 511.15 (स्वीकृति), 416.46 (अवार्ड) 6 उज्जैन में इंटरसेप्शन, डायवर्जन एवं STP कार्य 101.57 7 नागदा में इंटरसेप्शन, डायवर्जन एवं STP कार्य 65.98 8 MPPCB प्रयोगशालाओं का सुदृढ़ीकरण 13.40      

Indus Water Dispute: सिंधु जल को लेकर भारत का बड़ा संदेश, पाकिस्तान पर सख्त तेवर बरकरार

नई दिल्ली सिंधु जल संधि को लेकर भारत ने एक बार फिर अपना रुख साफ कर दिया है. केंद्र सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि 23 अप्रैल 2025 से सिंधु जल संधि को स्थगित (Abeyance) रखा गया है और यह फैसला तब तक प्रभावी रहेगा, जब तक पाकिस्तान विश्वसनीय और स्थायी रूप से सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देना पूरी तरह बंद नहीं कर देता. ऐसे में पाकिस्तान की ओर से लगातार उठाई जा रही आपत्तियों और पत्राचार का भारत की नीति पर फिलहाल कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा है।  इसी बीच पाकिस्तान के सिंधु जल आयुक्त सैयद मोहम्मद मेहर अली शाह ने दावा किया है कि उन्होंने पिछले साल अप्रैल से अब तक भारत के अपने समकक्ष को चिनाब नदी के जल प्रवाह में उतार-चढ़ाव को लेकर चार पत्र लिखे हैं, लेकिन उन्हें अब तक कोई जवाब नहीं मिला. उनका कहना है कि सबसे हालिया पत्र उन्होंने सोमवार रात भेजा, जिसमें चिनाब के जलस्तर में महत्वपूर्ण बदलाव पर स्पष्टीकरण मांगा गया है।  डॉन न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक इस्लामाबाद में आयोजित एक सेमिनार में शाह ने कहा कि चिनाब नदी के प्रवाह में हो रहा उतार-चढ़ाव केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि रणनीतिक जोखिम है. उनके मुताबिक नदी के जल प्रवाह से जुड़ा डेटा साझा न होने से पाकिस्तान के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि बदलाव प्राकृतिक कारणों से हुआ है या फिर ऊपरी हिस्से में किसी मानवीय गतिविधि के कारण।  हालांकि भारत की घोषित नीति बिल्कुल स्पष्ट है. 23 अप्रैल 2025 को भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद यह फैसला लिया था कि 1960 की सिंधु जल संधि को तब तक स्थगित रखा जाएगा, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह और भरोसेमंद तरीके से बंद नहीं करता. भारत का कहना है कि आतंकवाद और सामान्य द्विपक्षीय सहयोग एक साथ नहीं चल सकते।  क्या है सिंधु जल संधि 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई सिंधु जल संधि के तहत रावी, ब्यास और सतलुज नदियों का जल भारत को मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब का अधिकांश पानी पाकिस्तान के हिस्से में गया. संधि के तहत दोनों देशों के बीच जल प्रवाह से जुड़ा डेटा साझा करने, निरीक्षण करने और विवादों के समाधान के लिए स्थायी तंत्र भी बनाया गया था. लेकिन संधि स्थगित होने के बाद दोनों देशों के बीच यह संस्थागत संवाद लगभग ठप पड़ गया है।  पाकिस्तान के सिंधु जल आयुक्त का कहना है कि पिछले एक वर्ष में उनके देश ने संधि के तहत डेटा साझा करना जारी रखा, बैठकों का प्रस्ताव भेजा, निरीक्षण और परियोजनाओं से जुड़ी जानकारी मांगी, लेकिन भारत की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. उन्होंने दावा किया कि मई 2022 के बाद दोनों देशों के आयुक्तों की कोई बैठक नहीं हुई और अगस्त 2023 के बाद कई महत्वपूर्ण संधि संबंधी पत्रों का भी जवाब नहीं आया।  शाह ने यह भी कहा कि किसी भी निचले प्रवाह वाले देश (डाउनस्ट्रीम स्टेट) के लिए जल प्रवाह का नियमित डेटा केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि परिचालन आवश्यकता है. उनके अनुसार यदि जानकारी नहीं मिलेगी तो यह तय करना मुश्किल होगा कि नदी के प्रवाह में बदलाव प्राकृतिक है या फिर ऊपरी हिस्से में किसी परियोजना के संचालन का परिणाम।  पाकिस्तान जता रहा चिंता हाल के महीनों में चिनाब नदी के जल प्रवाह में बदलाव को लेकर पाकिस्तान कई बार चिंता जता चुका है. वहीं भारत के कुछ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि सरकार पाकिस्तान की ओर जाने वाले पानी के अधिकतम उपयोग की दिशा में काम कर रही है. भारत लंबे समय से यह भी कहता रहा है कि संधि के तहत उसे पश्चिमी नदियों पर मिलने वाले अधिकारों का भी पूरा उपयोग नहीं हो पाया है और अब वह अपने वैध अधिकारों के अनुरूप परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर जोर देगा।  पाकिस्तान लगातार मांग कर रहा है कि भारत एकतरफा तरीके से नदी के प्रवाह में बदलाव न करे और संधि के तहत अपनी जिम्मेदारियां निभाए. साथ ही उसने सिंधु जल आयोग की बैठक दोबारा बुलाने, डेटा साझा करने और संयुक्त निरीक्षण शुरू करने की भी अपील की है।  भारत का रुख हालांकि मौजूदा हालात में भारत का रुख बदलता नहीं दिख रहा. नई दिल्ली ने साफ कर दिया है कि जब तक पाकिस्तान अपनी धरती से संचालित होने वाले सीमा पार आतंकवाद पर निर्णायक और स्थायी कार्रवाई नहीं करता, तब तक सिंधु जल संधि पर पहले जैसी व्यवस्था बहाल नहीं होगी. यानी जल सहयोग का भविष्य अब केवल तकनीकी या कूटनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि सीधे तौर पर आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान के रवैये से जुड़ गया है। 

दिल्ली को मिली मेगा टनल परियोजना, यूपी में बनेगा नया हाईवे; जानिए कैबिनेट की अहम मंजूरियां

नई दिल्ली  पीएम नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट मीटिंग में देश के इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर बड़े फैसले हुए हैं. सरकार ने कुल 14,115 करोड़ रुपये के दो प्रमुख हाईवे और टनल प्रोजेक्ट्स पर मुहर लगा दी है. केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने ब्रीफिंग के दौरान इन अहम प्रोजेक्ट्स की पूरी डिटेल शेयर की. दिल्ली में लंबे समय से भयंकर जाम से जूझ रहे लाखों लोगों के लिए यह एक बहुत बड़ी खुशखबरी है. सरकार ने दिल्ली के अंदर 6 लेन वाले आधुनिक द्वारका टनल के निर्माण को अपनी मंजूरी दे दी है. इस बड़े प्रोजेक्ट पर कुल 6,970 करोड़ रुपये का भारी-भरकम खर्च आएगा. इसके अलावा उत्तर प्रदेश राज्य को भी विकास का एक बड़ा तोहफा मिला है. यूपी में कानपुर से कबरई तक एक बिल्कुल नया 4 लेन हाईवे बनाया जाएगा. इस एक्सेस कंट्रोल्ड हाईवे प्रोजेक्ट की कुल लागत 7,145 करोड़ रुपये तय की गई है. अश्विनी वैष्णव ने कहा, ‘ये फैसले देश के इंफ्रास्ट्रक्चर को नई दिशा देंगे’. दोनों प्रोजेक्ट्स को मिलाकर सरकार कुल 14,115 करोड़ रुपये खर्च करने जा रही है।  क्या है दिल्ली के द्वारका टनल प्रोजेक्ट की पूरी डिटेल और खासियत?     दिल्ली के इस नए प्रोजेक्ट के तहत नेशनल हाईवे 148AE पर 6 लेन का टनल बनाया जाएगा. यह शिवमूर्ति इंटरचेंज को वसंत कुंज के नेल्सन मंडेला मार्ग से जोड़ेगा. शिवमूर्ति इंटरचेंज द्वारका एक्सप्रेसवे (NH-248 BB) का एक बहुत अहम हिस्सा है. इस टनल के बनने से वेस्ट और साउथ दिल्ली के बीच सफर काफी तेज हो जाएगा।      इस पूरे प्रोजेक्ट की कुल लंबाई 8.1 किलोमीटर होगी. सबसे खास बात यह है कि इसमें से 3.1 किलोमीटर लंबा टनल साउदर्न रिज फॉरेस्ट के नीचे से गुजरेगा।      सरकार ने इस मेगा प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए 5 साल का समय तय किया है. इसका सीधा मतलब है कि दिल्लीवासियों को अगले कुछ सालों में जाम से बड़ी राहत मिल जाएगी. यह एक आधुनिक ग्रीनफील्ड अलाइनमेंट प्रोजेक्ट है. इसे हाइब्रिड एन्युटी मोड (HAM) के आधार पर डेवलप किया जाएगा।  यूपी वालों की बल्ले-बल्ले: 242 किलोमीटर लंबे हाईवे से फर्राटे भरेंगी गाड़ियां यूपी को मिले 7,145 करोड़ रुपये के नए प्रोजेक्ट से विकास को तेज रफ्तार मिलेगी. सरकार ने कानपुर से कबरई तक 242 किलोमीटर लंबे 4 लेन हाईवे को मंजूरी दे दी है. यह अहम प्रोजेक्ट भोपाल-कानपुर इकोनॉमिक कॉरिडोर का एक बड़ा हिस्सा है. इसे बीओटी मोड यानी टोल के आधार पर डेवलप किया जाएगा।  इस हाईवे के बनने से कानपुर, हमीरपुर और महोबा जैसे जिलों को सीधा फायदा पहुंचेगा. महोबा एक एस्पिरेशनल जिला है और वहां विकास की नई किरण पहुंचेगी. सरकार ने इस पूरे काम को सिर्फ ढाई साल में खत्म करने का लक्ष्य रखा है. कबरई में एग्रीगेट माइनिंग का बड़ा काम होता है. वहां से कानपुर और भोपाल तक माल की सप्लाई के लिए इस हाईवे की सख्त जरूरत थी।  नए हाईवे से कानपुर, घाटमपुर, हमीरपुर और कबरई में ट्रैफिक जाम से बड़ी राहत मिलेगी. सबसे बड़ी बात यह है कि कानपुर से कबरई का सफर अब साढ़े तीन घंटे की बजाय सिर्फ डेढ़ घंटे में पूरा होगा. सफर के समय में सीधे 58 प्रतिशत की भारी कमी आएगी।  इस हाईवे पर गाड़ियां 80 से 100 किलोमीटर प्रति घंटे की शानदार स्पीड से दौड़ सकेंगी. यह प्रोजेक्ट पीएम गति शक्ति के 4 इकोनॉमिक नोड्स और 10 लॉजिस्टिक नोड्स को भी आपस में जोड़ेगा।