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PCS अधिकारी राहुल मिश्रा और आकांक्षा बाजपेयी ने की सगाई, अब खजुराहो में होगी शादी

 महोबा उत्तर प्रदेश के महोबा जिले में तैनात दो पीसीएस अधिकारी शादी करने जा रहे हैं. इनमें एक जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी राहुल मिश्रा हैं, जबकि दूसरी जिला सेवायोजन अधिकारी आकांक्षा बाजपेयी हैं. दोनों 30 नवंबर को शादी के बंधन में बंधने जा रहे हैं।  हाल ही में दोनों अधिकारियों ने चित्रकूट के एक निजी होटल में आयोजित सादगीपूर्ण समारोह में एक-दूसरे को अंगूठी पहनाकर सगाई कर ली. दफ्तरों की महज 200 मीटर की दूरी से शुरू हुई यह नजदीकियां दोनों परिवारों की सहमति से अब विवाह के रिश्ते में बदलने जा रही हैं. शादी का यह भव्य समारोह खजुराहो में आयोजित किया जाएगा।  दफ्तरों के बीच 200 मीटर की दूरी से शुरू हुआ रिश्ता दोनों अधिकारियों के दफ्तर एक-दूसरे से महज 200 मीटर की दूरी पर स्थित हैं. काम के सिलसिले में अक्सर आमने-सामने आने के कारण दोनों अधिकारियों के बीच धीरे-धीरे नजदीकियां बढ़ीं. प्रशासनिक हलकों में इस रिश्ते की चर्चा पहले से ही थी, जिस पर अब सगाई के बाद आधिकारिक मुहर लग गई है. चित्रकूट के निजी होटल में हुए इस सगाई कार्यक्रम में केवल दोनों परिवारों के चुनिंदा सदस्य ही शामिल हुए थे।  जानिए दोनों पीसीएस अधिकारियों का परिचय वर्ष 2020 बैच के पीसीएस अधिकारी राहुल मिश्रा मूल रूप से प्रयागराज के रहने वाले हैं. उन्होंने जुलाई 2024 में महोबा के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) के रूप में कार्यभार संभाला था. वहीं, आकांक्षा बाजपेयी मूल रूप से बांदा जिले की निवासी हैं और वे पिछले तीन वर्षों से महोबा में जिला सेवायोजन अधिकारी के पद पर अपनी सेवाएं दे रही हैं।  खजुराहो में 30 नवंबर को होगा भव्य विवाह दोनों परिवारों की रजामंदी के बाद विवाह के लिए 30 नवंबर की तारीख तय की गई है. शादी का यह भव्य समारोह खजुराहो में संपन्न होगा. सोशल मीडिया पर सगाई की तस्वीरें सामने आने के बाद से ही साथी अधिकारियों, शुभचिंतकों और स्थानीय लोगों द्वारा इस जोड़े को लगातार बधाइयां और शुभकामनाएं दी जा रही हैं। 

अरुणाचल में चीन से मुकाबले के लिए ITBP मजबूत करेगी ताकत, ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम पर खास जोर

 नई दिल्ली एक तरफ अरुणाचल प्रदेश में भारत और चीन के सैनिकों के बीच कई स्थानों पर आमने-सामने की स्थिति की खबरें हैं, तो दूसरी तरफ भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) अपनी ऑपरेशनल क्षमता को नए सिरे से मजबूत करने में जुटी है. दुर्गम पहाड़ों में जवानों की तेज आवाजाही से लेकर ड्रोन वॉरफेयर, एंटी-ड्रोन सिस्टम, विशेष कमांडो ट्रेनिंग और भूमिगत बंकरों तक, सीमा सुरक्षा की रणनीति में व्यापक बदलाव की तैयारी है. इसी कड़ी में करीब दो दर्जन क्विक रिस्पांस फाइटिंग व्हीकल (QRFV) खरीदने की योजना अहम मानी जा रही है।  भारत-चीन सीमा पर चुनौती केवल दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने तक सीमित नहीं है. वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के कई हिस्सों में ऊंचे पहाड़, बेहद कम तापमान, बर्फ से ढके रास्ते और सीमित सड़क संपर्क सुरक्षा बलों के सामने अलग तरह की चुनौतियां पैदा करते हैं।  ऐसे हालात में किसी संवेदनशील स्थान पर अचानक तनाव बढ़ने पर जवानों को कितनी तेजी से वहां पहुंचाया जा सकता है, यह सुरक्षा तैयारियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है.अरुणाचल प्रदेश में हाल के दिनों में सामने आई फेस-ऑफ की स्थितियों के बीच ITBP की वाहन क्षमता और आधुनिक तैयारियों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. इसका उद्देश्य केवल जवानों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाना नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर उन्हें सुरक्षित, संगठित और प्रभावी तरीके से तैनात करने की क्षमता बढ़ाना।  1. करीब दो दर्जन QRFV से मजबूत होगी त्वरित कार्रवाई की क्षमता ITBP की योजना करीब दो दर्जन क्विक रिस्पांस फाइटिंग व्हीकल खरीदने की है. इन वाहनों का मकसद संवेदनशील परिस्थितियों में जवानों की आवाजाही और त्वरित तैनाती की क्षमता बढ़ाना है. चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) पहले से ही सीमा के निकट सैनिकों की आवाजाही के लिए बेहतर सड़क नेटवर्क और आधुनिक वाहनों का इस्तेमाल करती है. ऐसे में भारतीय पक्ष के लिए भी मजबूत मोबिलिटी एक अहम जरूरत है।  QRFV यानी Quick Response Fighting Vehicle का मूल उद्देश्य है कि जरूरत पड़ने पर सुरक्षा बल कम समय में निर्धारित स्थान तक पहुंच सकें. सामान्य परिवहन वाहन और इस तरह के विशेष सैन्य वाहन के बीच बड़ा अंतर उनकी सुरक्षा, कठिन भूभाग में संचालन और ऑपरेशनल परिस्थितियों के अनुरूप डिजाइन में होता है.यहां सबसे महत्वपूर्ण पहलू है रिएक्शन टाइम यानी प्रतिक्रिया देने में लगने वाला समय. सीमा पर तनाव की स्थिति में बेहतर सड़क संपर्क, उपलब्ध वाहन और प्रशिक्षित जवान मिलकर त्वरित कार्रवाई की क्षमता बढ़ाते हैं. अगर किसी स्थान पर आमने-सामने की स्थिति बनती है, तो वहां तक अतिरिक्त बल पहुंचाने की क्षमता हालात को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।  2. चीन की चुनौती और भारत की बदलती रणनीति भारत और चीन के बीच सीमा विवाद लंबे समय से चला आ रहा है.इसको लेकर कई बार दोनों देशों के बीच बैठकें  भी हो चुकीं है.जून 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प ने यह स्पष्ट कर दिया था कि सीमा पर किसी भी अप्रत्याशित स्थिति से निपटने के लिए केवल पारंपरिक गश्त पर्याप्त नहीं है. बेहतर बुनियादी ढांचा, संचार, निगरानी और तेजी से बल तैनात करने की क्षमता भी जरूरी है।  अरुणाचल प्रदेश में हाल के दिनों में कई स्थानों पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच फेस-ऑफ की स्थिति सामने आने के बाद यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है कि दुर्गम इलाकों में तैनात जवानों को कितनी तेजी से सहायता उपलब्ध कराई जा सकती है.ITBP भारत-चीन सीमा की सुरक्षा करने वाला प्रमुख बल है।  इसका दायित्व ऐसे इलाकों में गश्त करना, सीमा पर निगरानी रखना और प्रतिकूल परिस्थितियों में चौकियों की सुरक्षा करना है, जहां ऊंचाई और मौसम दोनों बड़ी चुनौतियां हैं.QRFV जैसी गाड़ियों की खरीद इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है. इसका उद्देश्य केवल वाहनों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि जवानों की सुरक्षित आवाजाही और कठिन परिस्थितियों में कार्रवाई की क्षमता को बेहतर बनाना है।  3. पहाड़ों में गाड़ी चलाना ही सबसे बड़ी चुनौती मैदानी इलाकों में किसी स्थान तक पहुंचने और ऊंचाई वाले सीमावर्ती क्षेत्र में पहुंचने के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है. पहाड़ों में संकरी सड़कें, तीखे मोड़, ढलान, भूस्खलन, बर्फबारी और कम तापमान वाहनों की परिचालन क्षमता को प्रभावित करते हैं.कई सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़क संपर्क सीमित है. कुछ जगहों पर अंतिम चौकी तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है. मौसम खराब होने पर यात्रा का समय और बढ़ सकता है।  ऐसे में ITBP के लिए केवल अधिक वाहन खरीदना पर्याप्त नहीं होगा. वाहनों का पहाड़ी भूभाग के अनुकूल होना, नियमित रखरखाव, चालकों का विशेष प्रशिक्षण और ईंधन तथा स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता भी जरूरी होगी.QRFV जैसी गाड़ियों से मिलने वाला वास्तविक लाभ इसी बात पर निर्भर करेगा कि उन्हें किन इलाकों में तैनात किया जाता है और वहां की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार उनकी क्षमता कितनी प्रभावी रहती है।  4. बख्तरबंद वाहनों की खासियत क्या होती है? क्विक रिएक्शन फाइटिंग व्हीकल श्रेणी के कई आधुनिक सैन्य वाहनों में सुरक्षा और गतिशीलता को ध्यान में रखकर डिजाइन तैयार किया जाता है. वाहन के मॉडल के आधार पर इनमें बख्तरबंद बॉडी, चार पहियों से चलने वाली ड्राइव प्रणाली, विशेष टायर और कठिन परिस्थितियों में संचालन की सुविधाएं हो सकती हैं।  कुछ बख्तरबंद वाहनों में गोलीबारी और विस्फोट से सुरक्षा देने वाली संरचना भी होती है. कुछ में भीतर बैठे जवानों को सुरक्षा के साथ जवाबी कार्रवाई करने में मदद देने वाली सुविधाएं दी जाती हैं. लेकिन इन क्षमताओं का स्तर हर मॉडल में अलग होता है.यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि QRFV एक व्यापक श्रेणी का नाम भी है।  भारतीय सेना के लिए विकसित किसी खास वाहन की सीटिंग क्षमता, इंजन की शक्ति, ऊंचाई पर संचालन की सीमा या सुरक्षा स्तर को ITBP की प्रस्तावित खरीद पर स्वतः लागू नहीं किया जा सकता.ITBP के लिए सबसे महत्वपूर्ण जरूरत ऐसी गाड़ियों की होगी, जो उसके परिचालन क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुकूल हों और जरूरत पड़ने पर जवानों को तेजी से उनके निर्धारित स्थान तक पहुंचा सकें।    5. ड्रोन से लेकर एंटी-ड्रोन सिस्टम तक, ITBP का आधुनिकीकरण वाहनों की खरीद ITBP की व्यापक आधुनिकीकरण योजना का केवल एक हिस्सा है. बल की तैयारियों में ड्रोन, एंटी-ड्रोन तकनीक, विशेष प्रशिक्षण और सीमा पर बेहतर सुरक्षा ढांचे पर भी जोर दिया जा रहा … Read more

भोपाल मेट्रो को नहीं मिल रहे पर्याप्त यात्री, हर हफ्ते ₹50 लाख खर्च; कमाई बढ़ाने के दूसरे रास्ते भी नाकाम

भोपाल  मेट्रो की शुरुआत को अब करीब एक साल भोपाल में होने वाला है। लेकिन अभी भी भोपाल मेट्रो के पास यात्रियों का टोटा है। मेट्रो ट्रेन को चलाने में एक सप्ताह में करीब 50 लाख रुपए खर्च हो रहे हैं। इसे रिकवर करने में 100 दिन का समय लग सकता है। यात्री नहीं मिल रहे दरअसल, भोपाल में मेट्रो के पहले चरण की शुरुआत हुई है। सात किमी लंबे प्रॉयोरिटी कॉरिडोर पर मेट्रो यात्रियों को आकर्षित करने के लिए संघर्ष कर रही है, जबकि टिकट के अलावा अन्य तरीकों से कमाई करने की कोशिशें अभी भी जारी हैं। सलाना 20-25 करोड़ रुपए खर्च का अनुमान मध्य प्रदेश मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड के प्रबंध निदेशक एस कृष्णा चैतन्य के अनुसार, सलाना परिचालन और रखरखाव का खर्च 20-25 करोड़ रुपए रहने का अनुमान है। इसका सीधा मतलब है कि हर दिन साढ़े पांच से लगभग लाख रुपए का खर्च आएगा। सप्ताह के हिसाब से देखें तो 38 से 48 लाख रुपए तक जाएगा। 150-500 तक पहुंचती है यात्रियों की संख्या वहीं, सामान्य दिनों में यात्रियों की अनुमानित संख्या 150 से 500 के बीच में होती है। वीकेंड पर यह संख्या 1500 तक जाती है। अगर औसत किराया 50 रुपए मान लिया जाए तो टिकट से होने वाली कमाई खर्च की तुलना में बहुत कम है। ये आंकड़े केवल एक अनुमान हैं, न कि ऑडिट किए राजस्व के आंकड़े हैं। यात्रियों की संख्या के बारे में कोई जानकारी नहीं भोपाल मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन के जनसंपर्क अधिकारी ने यात्रियों की मौजूदा संख्या के बारे में कोई जानकारी नहीं दी। जुलाई के बाद रोजाना होने वाली ट्रिप की संख्या 9 से बढ़कर लगभग 20 हो गई है। लेकिन यह डेटा उपलब्ध नहीं है कि यात्रियों की संख्या कितनी बढ़ी है। इन अतिरिक्त सेवाओं से यात्रियों की संख्या में कोई बढ़ोतरी हुई है। दिसंबर 2025 में हुई थी शुरुआत अभी भोपाल मेट्रो का परिचालन एम्स से सुभाष नगर के बीच में हो रहा है। आठ स्टेशनों वाला यह कॉरिडोर दिसंबर 2025 में खोला गया था। इसकी सीमित पहुंच के कारण, रोजाना सफर करने वालों की इसकी उपयोगिता कम है। मेट्रो रेल के एमडी ने कहा कि 2028 तक ही नेटवर्क का दायरा बढ़ने की उम्मीद है। वीकेंड पर मिलता है अच्छा रिस्पांस शुरुआती आंकड़ों से पता चलता है कि वीकेंड पर लोगों का रिस्पॉन्स अच्छा मिलता है। 15 जनवरी को यात्रियों की संख्या 275 थी लेकिन रविवार 18 जनवरी को यह आंकड़ा 1000 पहुंच गया था। 13-20 जनवरी के बीच ट्रेनों में कुल 3350 यात्रियों ने सफर किया था। ये आंकड़े शुरुआती परिचालन अवधि के हैं, न कि मौजूदा उपयोग के। कमाई के लिए अन्य तरीके अपनाए कॉर्पोरेशन टिकट से होने वाली कमाई को बढ़ाने के लिए विज्ञापन, सेमी-गेमिंग राइट्स, कमर्शियल लीग, कोचिंग स्पेस और निजी कार्यक्रमों जैसे विकल्पों पर विचार कर रहा है। बीते दिनों मेट्रो में किटी और बर्थडे पार्टी की बुकिंग शुरू हुई थी लेकिन परवान नहीं चढ़ा। नवंबर 2025 में 700 से अधिक एलिवेटेड लाइन पिलरों पर विज्ञापन के लिए जगह किराए पर देने हेतु एक टेंडर जारी किया गया था। भोपाल में एक बुकिंग मिली सेलिब्रेशन ऑन व्हील्स सुविधा के तहत, जन्मदिन, प्री वेडिंग शूट, फिल्म शूट और अन्य कार्यक्रमों के लिए कोच और कुछ चुनिंदा स्टेशनों के हिस्सों को किराए पर लिया जा सकता है। इससे बहुत कम प्रतिक्रिया मिली। चार हफ्तों में इंदौर में केवल दो बुकिंग हुई, जबकि भोपाल में एक बुकिंग जून की शुरुआत तक रद्द हो गई। कमाई का भरोसेमंद जरिया नहीं बना 7 जून को भोपाल में एक फिटनेस ग्रुप का कार्यक्रम आयोजित हुआ था लेकिन इस तरह की बुकिंग से अभी तक कमाई का कोई भरोसेमंद जरिया नहीं बन पाया है। जून में ही कमर्शियल लीजिंग के लिए बोर्ड ऑफिस चौराहे पर लगभग 620 वर्ग मीटर और सुभाष नगर में लगभग 2470 वर्ग मीट जगह उपलब्ध कराई गई थी। अक्टूर में भी कमाई बढ़ाने के प्रयास जारी रहे हैं। गौरतलब है कि मेट्रो को अपना नेटवर्क बड़ा होने, यात्रियों की संख्या बढ़ने और लगातार आमदनी शुरू होने का इंतजार करते हुए अपनी सेवाएं चालू रखनी होंगी।

₹350 करोड़ के जेट के बाद अब ₹225 करोड़ का हेलीकॉप्टर, MP सरकार की नई खरीद चर्चा में

भोपाल मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री और वीवीआईपी दौरों के लिए नया हेलीकॉप्टर लाने की तैयारी है। राज्य सरकार Airbus ACH160 हेलीकॉप्टर खरीद रही है। इसके नवंबर के आखिरी सप्ताह तक भोपाल पहुंचने की उम्मीद जताई जा रही है। हेलीकॉप्टर की मूल कीमत करीब 125 करोड़ रुपये बताई गई है, लेकिन टैक्स और इंटीरियर सहित इसकी कुल लागत लगभग 225 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगी। टैक्स और इंटीरियर के बाद 225 करोड़ रुपये का खर्च हेलीकॉप्टर की खरीद पर होने वाला खर्च उसकी मूल कीमत से काफी अधिक है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, एयरबस ACH160 की बेस प्राइस लगभग 125 करोड़ रुपये है। टैक्स और इंटीरियर को शामिल करने के बाद कुल खर्च करीब 225 करोड़ रुपये होने का अनुमान है। दो पायलट और नौ यात्री कर सकेंगे सफर Airbus ACH160 में दो पायलटों के साथ नौ यात्रियों के बैठने की क्षमता बताई गई है। इसका उपयोग मुख्यमंत्री के दौरे और अन्य वीवीआईपी यात्राओं के लिए किया जाएगा। हेलीकॉप्टर उड़ाने वाले दोनों पायलट फ्रांस में विशेष प्रशिक्षण ले चुके हैं। 155 नॉटिकल मील प्रति घंटा और उड़ान तकनीकि जानकारी अनुसार, इसमें दो पायलटों सहित कुल नौ लोगों के बैठने की व्यवस्था होगी। इसकी अधिकतम क्रूज गति करीब 155 नॉटिकल मील प्रति घंटा और उड़ान अवधि लगभग साढ़े चार घंटे बताई गई है। सरकार इसके साथ राज्य में हवाई संपर्क मजबूत करने की योजना पर भी काम कर रही है।     एयरबस ACH160 हेलीकॉप्टर पर कुल करीब 225 करोड़ रुपये खर्च होंगे।     इसमें दो पायलटों के अलावा नौ यात्रियों के बैठने की व्यवस्था होगी।     मुख्यमंत्री और वीवीआईपी दौरों में किया जाएगा इस्तेमाल। पहले ही भोपाल पहुंच चुका है 350 करोड़ का विमान हेलीकॉप्टर से पहले मध्य प्रदेश सरकार का Bombardier Challenger 3500 विमान भी भोपाल पहुंच चुका है। इसकी कीमत करीब 350 करोड़ रुपये बताई गई है। अब Airbus ACH160 के आने से राज्य सरकार के हवाई परिवहन बेड़े में एक और नया विमानन साधन जुड़ने की उम्मीद है।  

T-72 से T-90 तक टैंकों को आधुनिक बनाने की तैयारी, भारत कैसे डिकोड कर रहा सोवियत दौर की तकनीक?

जबलपुर  मध्य प्रदेश स्थित व्हीकल फैक्ट्री जबलपुर (वीएफजे) के इंजीनियर दशकों पुराने उन तकनीकी दस्तावेजों और डिजाइनों को डिकोड कर रहे हैं, जो रूसी भाषा में लिखे गए हैं। ये दस्तावेज कभी केवल मूल कार्यक्रम से जुड़े लोगों के इस्तेमाल के लिए तैयार किए गए थे। तमिलनाडु के अवाडी स्थित हेवी व्हीकल्स फैक्ट्री (एचवीएफ) के सहयोग से वीएफजे ने टैंकों को खोलने और दोबारा असेंबल करने वाले विशेष उपकरणों के लगभग 70% सोवियत-कालीन रेखाचित्रों को सफलतापूर्वक डिकोड कर लिया है। जिन उपकरणों के मूल चित्र उपलब्ध नहीं हैं, उनके लिए फैक्ट्री स्वदेशी स्तर पर नए डिजाइन विकसित कर रही है। इस परियोजना का लक्ष्य अप्रैल 2028 से हर साल भारतीय सेना के 80 टैंकों का पूरी तरह कायाकल्प करना है। क्या है भारतीय बख्तरबंद बेड़े का इतिहास? भारतीय सेना के मुख्य युद्धक बेड़े में सोवियत मूल के T-72 अजेय और रूसी डिजाइन वाले T-90 भीष्म टैंक शामिल हैं। भारत ने पहले 310 T-90 टैंक खरीदने का समझौता किया था, जिसमें टेक्निकल ट्रांसफर की शर्त शामिल थी। इसके बाद वर्ष 2001 में अवाडी कारखाने में 1000 T-90 टैंकों के लाइसेंस प्राप्त उत्पादन के लिए एक बड़ा अनुबंध हुआ। उस दौरान उत्पादन तकनीक स्थापित करने के लिए रूसी विशेषज्ञों ने भारत का दौरा किया था और भारतीय इंजीनियरों को विशेष प्रशिक्षण के लिए रूस भेजा गया था। अवाडी के बाद जबलपुर बनेगा देश का दूसरा बड़ा कायाकल्प केंद्र दो T-72 टैंकों से जुड़े एक पायलट प्रोजेक्ट को सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद व्हीकल फैक्ट्री जबलपुर को यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई। अब जबलपुर को अवाडी के साथ देश के दूसरे मुख्य टैंक ओवरहाल केंद्र के तौर पर तैयार किया जा रहा है। अवाडी और जबलपुर दोनों इकाइयां रक्षा सार्वजनिक उपक्रम (पीएसयू) आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड (एवीएनएल) के अंतर्गत आती हैं। VFJ के उप महाप्रबंधक हर्ष भटनागर ने बताया कि चूंकि कई मूल डिजाइन दशकों पुराने और रूसी भाषा में हैं, इसलिए विशेष फिक्स्चर, मशीनरी और प्लांट लेआउट का गहन अध्ययन किया गया है। दोनों इकाइयों के विशेषज्ञ मिलकर काम कर रहे हैं और परियोजना समय पर आगे बढ़ रही है। क्या होता है टैंक का कायाकल्प? टैंक का ओवरहाल उसकी सामान्य सर्विसिंग से बिल्कुल अलग और बेहद जटिल प्रक्रिया है। इसमें पूरे टैंक को पूरी तरह खोला जाता है, उसके एक-एक पुर्जे और तकनीकी प्रणाली की गहन जांच की जाती है, घिसे या खराब घटकों की मरम्मत की जाती है या उन्हें बदला जाता है, फिर पूरे टैंक को दोबारा जोड़कर कड़े परीक्षणों से गुजारा जाता है। एक टैंक के संपूर्ण ओवरहाल में लगभग चार महीने का समय लगता है। वर्तमान में इस परियोजना पर करीब 80 विशेषज्ञ काम कर रहे हैं, जो मुख्य रूप से टैंक के हल यानी निचले ढांचे और बुर्ज यानी टॉवर पर केंद्रित हैं। अगले चरण में आंतरिक प्रणालियों पर काम शुरू होगा। पूरी क्षमता से काम करने के लिए VFJ को लगभग 650 प्रशिक्षित कर्मियों की आवश्यकता होगी, जिसके लिए दो साल से प्रशिक्षण जारी है। इस पूरी परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 462 करोड़ रुपये है।

UP News: उत्तर प्रदेश के 3,192 गांवों में चकबंदी पूरी, 8 वर्षों में 21.12 लाख मामलों का हुआ निस्तारण

 लखनऊ  योगी सरकार में उत्तर प्रदेश में चकबंदी व्यवस्था को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और समयबद्ध बनाने पर जोर दिया गया है। चकबंदी निदेशालय के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2017 की तुलना में वर्ष 2025 तक चकबंदी प्रक्रिया पूरी करने वाले गांवों की संख्या में बड़े स्तर पर वृद्धि हुई है। साथ ही चकबंदी न्यायालयों के कंप्यूटरीकरण और वादों के निस्तारण में भी प्रगति दर्ज की गई है। इन प्रयासों का उद्देश्य किसानों की भूमि से जुड़े मामलों को व्यवस्थित करना और राजस्व अभिलेखों को समय से संबंधित तहसीलों तक पहुंचाना है। आठ वर्षों में 3,192 गांवों में चकबंदी पूरी चकबंदी निदेशालय के मुताबिक वर्ष 2017 में प्रदेश के 1,925 गांवों में चकबंदी प्रक्रिया पूरी हुई थी। वर्ष 2025 तक यह संख्या बढ़कर 3,192 गांव हो गई। इन गांवों में चकबंदी की प्रक्रिया पूरी कर अभिलेख संबंधित तहसीलों को वापस किए गए। इससे भूमि संबंधी अभिलेखों को व्यवस्थित करने और किसानों से जुड़े राजस्व कार्यों को आगे बढ़ाने में मदद मिली है। 21 लाख से अधिक वादों का निस्तारण चकबंदी न्यायालयों में वादों के निस्तारण के मामले में भी प्रगति हुई है। वर्ष 2017 में 12.55 लाख से अधिक वादों के निस्तारण की स्थिति थी, जबकि वर्ष 2025 तक यह संख्या बढ़कर 21.12 लाख से अधिक हो गई। निदेशालय के मुताबिक, विगत आठ वर्षों में कुल 21 लाख 12 हजार 784 वादों का निस्तारण किया गया। भूमि विवादों के समाधान की दिशा में यह महत्वपूर्ण उपलब्धि है। 531 न्यायालयों का कंप्यूटरीकरण चकबंदी व्यवस्था को तकनीक से जोड़ने के लिए न्यायालयों के कंप्यूटरीकरण पर विशेष ध्यान दिया गया। वर्ष 2017 में इस मद में स्थिति शून्य थी, जबकि वर्ष 2025 तक 531 न्यायालयों का कंप्यूटरीकरण किया गया। इसमें उप संचालक चकबंदी, बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी और चकबंदी अधिकारी के न्यायालयों के साथ 180 सहायक चकबंदी अधिकारी न्यायालय भी शामिल हैं। इससे न्यायालय संबंधी कामकाज को अधिक व्यवस्थित बनाने की दिशा में मदद मिली है। नवप्रसार के तहत 1,302 गांव शामिल चकबंदी प्रक्रिया के नवप्रसार के अंतर्गत विगत आठ वर्षों में कुल 1,302 गांवों को शामिल किया गया। वर्ष 2017 में इस श्रेणी में 2,468 गांवों की स्थिति दर्ज थी, जबकि वर्ष 2025 में यह संख्या 1,302 रही। विभागीय आंकड़ों में इसे आठ वर्षों के दौरान चकबंदी क्रियाओं में शामिल किए गए गांवों के रूप में दर्शाया गया है।