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वोट के लिए कत्लेआम? 7 दिन में 500 कुत्ते मारे गए, कई गांवों में मचा हड़कंप

नई दिल्ली चुनावी वादा पूरा करने में नेताओं का रिकॉर्ड भले ही खराब रहता हो, लेकिन हाल ही में तेलंगाना से चुनावी वादा को पूरा करने के लिए कुत्तों की हत्या का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। यहां कुछ गांव के सरपंचों ने लोगों से किया हुआ वादा निभाने के चक्कर में एक सप्ताह में करीब 500 कुत्तों को मार डाला है। घटना सामने आने के बाद हड़कंप मच गया है।   समाचार एजेंसी PTI के मुताबिक पिछले एक हफ्ते में कई गांवों में 500 कुत्तों को जहर देकर मार दिया गया। पशु कल्याण कार्यकर्ता अडुलापुरम गौतम द्वारा 12 जनवरी को दर्ज कराई गई शिकायत में आरोप लगाया गया है कि कामारेड्डी जिले के भवानीपेट, पालवंचा, फरीदपेट, वाडी और बंदारमेश्वरपल्ली सहित कई गांवों में आवारा कुत्तों को योजनाबद्ध तरीके से मारा गया। उन्होंने दावा किया कि पिछले दो-तीन दिनों में ही लगभग 200 कुत्तों को मारा गया है। सरपंचों ने करवाई हत्या शिकायत के मुताबिक गौतम को 12 जनवरी को दोपहर करीब 3 बजे कुत्तों की कथित सामूहिक हत्या को लेकर विश्वसनीय जानकारी मिली। उन्होंने आरोप लगाया कि ये काम गांव के सरपंचों के कहने पर किए गए। हत्याओं को क्रूर बताते हुए गौतम ने इसमें शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। कुत्तों को लगाए गए जहरीले इंजेक्शन वहीं पुलिस के मुताबिक पांच गांव के सरपंचों और किशोर पांडे नाम के एक व्यक्ति सहित छह लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। आरोप है कि कुत्तों को जहरीले इंजेक्शन दिए गए, जिससे उनकी मौत हो गई। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि शवों को गांवों के बाहरी इलाकों में दफना दिया गया था और बाद में पशु चिकित्सा टीमों द्वारा पोस्टमार्टम जांच के लिए उन्हें बाहर निकाला गया। आगे की जांच जारी है। चुनाव से पहले किया था वादा ग्रामीणों के मुताबिक कुछ उम्मीदवारों ने हाल ही में हुए पंचायत चुनावों के दौरान ग्रामीणों से आवारा कुत्तों से निजात दिलाने का वादा किया था। ग्रामीणों ने बताया, "पिछले साल दिसंबर में हुए चुनावों से पहले, कुछ उम्मीदवारों ने ग्रामीणों से वादा किया था कि वे आवारा कुत्तों और बंदरों की समस्या से निपटेंगे। अब वे आवारा कुत्तों को मारकर उन वादों को 'पूरा' कर रहे हैं।"

चिल्लई कलां की शुरुआत से ठिठुरा कश्मीर, माइनस में तापमान, बर्फ की चादर बनी डल लेक

श्रीनगर पूरे उत्तर भारत में हाड़ कंपा देने वाली ठंड के बीच जम्मू कश्मीर में पारा शून्य से बेहद नीचे गिर गया है। बुधवार को कश्मीर में न्यूनतम तापमान गिरने के बाद यहां की प्रसिद्ध डल झील के कुछ हिस्से सहित घाटी में कई जलाशयों का पानी जम गया। बता दें कि कश्मीर घाटी में इस समय ‘चिल्ला-ए-कलां’ यानी चिल्लई कलां का दौर जारी है।   मौसम विभाग के अधिकारियों ने बताया है कि श्रीनगर में मंगलवार रात न्यूनतम तापमान शून्य से 5.2 डिग्री सेल्सियस नीचे दर्ज किया गया, जो पिछली रात के दर्ज किए गए तापमान, शून्य से 4.9 डिग्री सेल्सियस नीचे से भी कम रहा। वहीं, दक्षिण कश्मीर में शोपियां घाटी का सबसे ठंडा स्थान रहा, जहां पारा शून्य से 7.5 डिग्री सेल्सियस नीचे तक पहुंच गया। उत्तरी कश्मीर के बारामूला जिले के गुलमर्ग में रात का तापमान शून्य से 3.8 डिग्री सेल्सियस नीचे रहा, वहीं मध्य कश्मीर के सोनमर्ग में यह शून्य से 2.2 डिग्री सेल्सियस नीचे दर्ज किया गया। वहीं कश्मीर घाटी के प्रवेश द्वार काजीगुंड में न्यूनतम तापमान शून्य से 5.3 डिग्री सेल्सियस नीचे रहा। इसके अलावा कोकेरनाग में शून्य से 2.3 डिग्री सेल्सियस नीचे और कुपवाड़ा में शून्य से 6.2 डिग्री सेल्सियस नीचे तापमान दर्ज किया गया। और बिगड़ सकता है मौसम वार्षिक अमरनाथ यात्रा के आधार शिविरों में से एक, दक्षिण कश्मीर के लोकप्रिय पर्यटन स्थल पहलगाम में तापमान शून्य से छह डिग्री सेल्सियस नीचे दर्ज किया गया। भारत मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक एक पश्चिमी विक्षोभ कश्मीर की ओर बढ़ रहा है जो 16 जनवरी से घाटी के मौसम को प्रभावित कर सकता है और बर्फबारी की संभावना भी है। क्या है चिल्लई कलां? चिल्लई कलां कश्मीर में 40 दिनों की भीषण ठंड की एक अवधि होती है। इस दौरान बर्फबारी की संभावना सबसे अधिक होती है। यह आमतौर पर 21 दिसंबर को शुरू होता है और यह जनवरी के अंत में खत्म होता है। भारी बर्फबारी की सबसे अधिक संभावना इसी समय होती है।

संसद से सावरकर की तस्वीर हटाने की याचिका पर SC भड़का, कहा– ऐसे मामलों से बचें

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को संसद और अन्य सार्वजनिक स्थानों से विनायक दामोदर सावरकर के चित्रों को हटाने के अनुरोध वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिका दायर करने वाले पूर्व अधिकारी को याचिका वापस लेने की अनुमति देने से पहले भारी जुर्माना लगाने की चेतावनी दी। SC ने कहा कि इस तरह की याचिका का कोई तुक नहीं बनता।   मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने सेवानिवृत्त भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी बी बालमुरुगन को इस तरह की याचिका दायर करने के प्रति चेतावनी दी और कहा कि अदालत का समय बर्बाद करने के लिए भारी जुर्माना लगाया जा सकता है। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, ‘‘इस तरह की तुच्छ याचिका… मानसिकता दर्शाती है।’’ 'आप खुद को क्या समझते हैं?' वहीं पीठ याचिकाकर्ता के इस निवेदन से भी नाराज थी कि वह वित्तीय बाधाओं के कारण व्यक्तिगत रूप से मामले की बहस करने नहीं आ सकते। मुख्य न्यायाधीश ने फटकार लगाते हुए कहा, ‘‘आप आईआरएस अधिकारी थे। आप दिल्ली आकर खुद पेश हो सकते हैं और बहस कर सकते हैं। हम आप पर भारी जुर्माना लगाना चाहेंगे। आप खुद को क्या समझते हैं?’’ याचिका में क्या? बता दें कि बालमुरुगन ने अपनी जनहित याचिका में संसद के केंद्रीय कक्ष और अन्य सार्वजनिक स्थानों से सावरकर के चित्रों को हटाने का निर्देश देने का अनुरोध किया था। इसके अलावा याचिका में यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया कि सरकार हत्या या राष्ट्रविरोधी गतिविधियों जैसे जघन्य अपराधों के लिए आरोपित व्यक्तियों को तब तक सम्मानित न करे जब तक कि वे बरी ना हो जाएं। समाज में कुछ रचनात्मक भूमिका निभाएं- SC याचिका को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बताते हुए पीठ ने याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या वह मामला आगे बढ़ाना चाहते हैं या वापस लेना चाहते हैं। प्रधान न्यायाधीश ने टिप्पणी की, ‘‘कृपया इन सब झंझटों में ना पड़ें। अब अपनी सेवानिवृत्ति का आनंद लें। समाज में कुछ रचनात्मक भूमिका निभाएं।’’ इसके बाद परिणाम को भांपते हुए बालमुरुगन ने याचिका वापस लेने की इजाजत मांगी, जिसे स्वीकार कर लिया गया।  

SIR अभियान तेज़: पश्चिम बंगाल में सामने आए हजारों अवैध मतदाता, सरकार ने आंकड़े किए सार्वजनिक

बंगाल पश्चिम बंगाल सरकार ने कहा है कि राज्य में जारी मतदाता सूचियों की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया से जुड़ी सुनवाई के दौरान अब तक 11,000 से अधिक 'अवैध' मतदाताओं की पहचान की गई है। इनमें सबसे ज्यादा संख्या नदिया जिले से सामने आई है। वहीं, बांकुड़ा और दक्षिण कोलकाता में कोई अवैध मतदाता नहीं मिला। राज्य सरकार द्वारा मंगलवार को साझा किए गए इन आंकड़ों पर हालांकि निर्वाचन आयोग ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।   आयोग राज्य में एसआईआर के तहत उन जगहों पर सुनवाई कर रहा है, जहां मतदाता सूचियों में तार्किक विसंगतियां पाई गई हैं। राज्य सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, एसआईआर प्रक्रिया में अब तक 9,30,993 मतदाताओं की सुनवाई पूरी हो चुकी है और उनकी जानकारियां ऑनलाइन अपलोड कर दी गई हैं। अधिकारियों ने बताया कि इन सुनवाइयों और दस्तावेजों के सत्यापन के बाद, राज्य सरकार के कर्मचारी निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) अब तक 11,472 मतदाताओं को 'अवैध' घोषित कर चुके हैं, जिनके नाम अंतिम मतदाता सूची से हटाए जाएंगे। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची को शुद्ध करने के उद्देश्य से शुरू की गई एसआईआर प्रक्रिया के तहत अब तक पूरे राज्य में 65,78,058 नोटिस तैयार किए जा चुके हैं, जिनमें से 32,49,091 नोटिस पहले ही जारी किए जा चुके हैं। अधिकारियों ने बताया कि जिन 9,30,993 मतदाताओं को नोटिस मिला था, उनकी सुनवाई पूरी हो चुकी है और इसी प्रक्रिया में अवैध मतदाताओं की पहचान की गई। जिला-वार आंकड़ों के मुताबिक, सुनवाई के बाद नदिया में सबसे अधिक 9,228 अवैध मतदाता पाए गए हैं। इसके विपरीत, दक्षिण कोलकाता और बांकुड़ा में अब तक एक भी अवैध मतदाता नहीं मिला है। दक्षिण कोलकाता में 1,36,561 जबकि बांकुड़ा में 1,63,357 नोटिस जारी किए गए थे। आंकड़ों के अनुसार, कूचबिहार में अब तक 10, जलपाईगुड़ी में चार, दार्जिलिंग में दो, उत्तर दिनाजपुर में दो और दक्षिण दिनाजपुर में 195 अवैध मतदाता पाए गए हैं। इसके अलावा मालदा में 15, मुर्शिदाबाद में 68, उत्तर 24 परगना में 147 और दक्षिण 24 परगना में 69 मतदाता अवैध पाए गए। उत्तर कोलकाता में 54, हावड़ा में 26, हुगली में 989 और पूर्व मेदिनीपुर में दो अवैध मतदाता मिले हैं। पश्चिम मेदिनीपुर में ऐसे 105, पुरुलिया में 44, पूर्व बर्धमान में 167 और बीरभूम में 264 मतदाता चिन्हित किए गए हैं। पहाड़ी और वन क्षेत्रों वाले जिलों में, अलीपुरद्वार में नौ, कालिम्पोंग में 65, झाड़ग्राम में तीन और पश्चिम बर्धमान में चार अवैध मतदाता पाए गए हैं। एसआईआर प्रक्रिया राज्य में एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गई है। विपक्षी दलों का दावा है कि इससे फर्जी मतदाताओं की पहचान होगी, जबकि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने एसआईआर के तरीके पर सवाल उठाए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राज्य सरकार द्वारा जारी ताजा आंकड़े बहस को और तेज करेंगे, क्योंकि अब सबकी नजर इस बात पर है कि अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने पर अवैध मतदाताओं की संख्या में कोई बदलाव होता है या नहीं। ये आंकड़े एसआईआर प्रक्रिया को लेकर बढ़ते राजनीतिक टकराव के बीच सामने आए हैं। एसआईआर के पहले चरण के पूरा होने के बाद 16 दिसंबर को प्रकाशित मसौदा मतदाता सूची में मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.08 करोड़ रह गई, यानी पूरे राज्य में 58 लाख से अधिक नाम हटाए गए। निर्वाचन आयोग के अधिकारियों के अनुसार, पहले चरण में नाम हटाने के कारणों में मृत्यु, स्थायी पलायन, दोहराव और गणना फॉर्म जमा न करना शामिल था। एसआईआर का दूसरा चरण फिलहाल जारी है, जिसमें 1.67 करोड़ मतदाताओं की सुनवाई हो रही है। इनमें 1.36 करोड़ मतदाता तार्किक विसंगतियों के कारण जांच के दायरे में हैं और लगभग 31 लाख ऐसे मतदाता हैं, जिनके रिकॉर्ड की सही ढंग से मैपिंग नहीं हो पाई है।  

अमेरिका-ईरान जंग का साइड इफेक्ट: पाकिस्तान पर मंडराया तिहरा संकट, सेना प्रमुख आसिम मुनीर अलर्ट

नई दिल्ली अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों को यह कहकर और हवा दे दी है कि प्रदर्शनकारी संस्थाओं पर कब्जा करें, मदद पहुंच रही है। अब इस बात को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं कि अमेरिका प्रदर्शनकारियों को किस तरह की मदद पहुंचाने जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका ईरान पर सैन्य कार्रवाई का भी प्लान बना रहा है। दूसरी तरफ, ईरान ने भी अमेरिका को दो टूक कहा है कि वह चुप बैठने वाला नहीं है और किसी भी सैन्य कार्रवाई का मुंहतोड़ जवाब देगा।   इन सबके बीच, पाकिस्तान टेंशन में आ गया है। वह अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव से परेशान है। पाकिस्तान की सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व को अब चिंता सता रही है कि अगर ईरान और अइमेरिका के बीच जंग छिड़ी तो उसकी मुश्किलें और बढ़ जाएंगी। पहले से ही कई मोर्चों पर बदहाली झेल रहे पाकिस्तान में अब नए मोर्चों पर हालात बिगड़ने की आशंका के बीच पाकिस्तान के फील्ड मार्शल और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने आपात बैठक की है। दो सीमाई मोर्चों पर दबाव सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि इस हाई लेवेल मीटिंग में ISI प्रमुख और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जनरल असीम मलिक, साउदर्न कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल राहत नसीम, मिलिट्री इंटेलिजेंस प्रमुख, चीफ ऑफ जनरल स्टाफ और अन्य वरिष्ठ जनरल शामिल हुए। इस बैठक में सबसे बड़ी चिंता पाकिस्तान–ईरान सीमा को लेकर जताई गई है। अधिकारियों ने चेताया कि पाकिस्तान पहले ही अफगानिस्तान के साथ डूरंड लाइन पर तनाव झेल रहा है और ऐसे में ईरान सीमा पर नया संकट देश के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। अमेरिका मांग सकता है पाकिस्तानी ठिकाने? सूत्रों के मुताबिक, बैठक में इस आशंका पर भी गंभीर चर्चा हुई कि अगर अमेरिका ईरान पर सैन्य कार्रवाई करता है, तो वह पाकिस्तान से हवाई क्षेत्र या सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल की मांग कर सकता है। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान के लिए फैसला लेना बेहद मुश्किल होगा, क्योंकि इससे देश के भीतर राजनीतिक विरोध और क्षेत्रीय तनाव, दोनों बढ़ सकते हैं। पाक के अंदर अशांति और विद्रोह का डर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि ईरान-अमेरिका जंग में अगर पाकिस्तान ने अमेरिका का साथ दिया तो उसे आंतरिक समस्या का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि देश की लगभग 30 फीसदी आबादी शिया है, जो ईरान के प्रति सहानुभूति रखती है। ऐसे में अगर ईरान पर अमेरिकी हमला होता है या वहां सत्ता परिवर्तन की कोशिश होगी। इससे पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर शियाओं का विरोध प्रदर्शन शुरू हो सकता है। इसके अलावा, ईरान से शरणार्थियों के आने से सीमा पर दबाव और बढ़ सकता है। हाई अलर्ट पर पाक सेना सूत्रों के अनुसार, जनरल आसिम मुनीर ने सभी वरिष्ठ कमांडरों को हाई अलर्ट पर रहने और हालात पर करीबी नजर रखने के निर्देश दिए हैं। वहीं ISI प्रमुख को ईरान, तुर्की, कतर, यूएई, सऊदी अरब और अमेरिका के साथ राजनयिक और सुरक्षा स्तर की बातचीत तेज करने को कहा गया है, ताकि हालात को बिगड़ने से रोका जा सके। क्षेत्रीय अस्थिरता की चेतावनी खुफिया आकलन में कहा गया है कि पाकिस्तान, सऊदी अरब, कतर और तुर्की पहले ही अमेरिका को यह संदेश दे चुके हैं कि ईरान पर हमला पूरे पश्चिम एशिया को अस्थिर कर सकता है। हालांकि, अधिकारियों ने मानना कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की सरकार आगे बढ़ती है और पाकिस्तान पर सहयोग का दबाव डालती है, तो इस्लामाबाद को गंभीर रणनीतिक और राजनीतिक नुकसान उठाने पड़ सकते हैं। देश के भीतर एकजुटता की कोशिश ऐसे में बाहरी दबावों के बीच पाकिस्तान की सेना ने घरेलू मोर्चे पर भी तैयारी शुरू कर दी है। सूत्रों के मुताबिक, सेना मुख्यालय में नेशनल पैग़ाम-ए-अमन कमेटी के तहत धार्मिक विद्वानों का एक प्रतिनिधिमंडल बुलाया गया है। उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर एकजुट संदेश देने पर ज़ोर दिया गया है। बैठक में यह भी कहा गया कि भारत और सीमा पार सक्रिय आतंकी संगठनों द्वारा चलाए जा रहे कथित मनोवैज्ञानिक युद्ध का जवाब एक साझा राष्ट्रीय नैरेटिव से दिया जाना चाहिए।

MEA की एडवाइजरी: ईरान में बिगड़ते हालात, भारतीयों को तुरंत देश छोड़ने की सलाह

 नई दिल्ली ईरान में जारी राजनीतिक अस्थिरता, हिंसक प्रदर्शनों और सुरक्षा हालात के मद्देनजर भारत सरकार ने अपने नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी की है. तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने कहा है कि ईरान में मौजूद सभी भारतीय नागरिक-चाहे वे छात्र हों, तीर्थयात्री हों, कारोबारी हों या पर्यटक-उपलब्ध साधनों के जरिए जल्द से जल्द देश छोड़ें. दूतावास की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि यह एडवाइजरी भारत सरकार द्वारा 5 जनवरी 2025 को जारी की गई सलाह का ही विस्तार है. जारी एडवाइजरी में कहा गया, "ईरान में लगातार बदलते हालात को देखते हुए भारतीय नागरिकों को सलाह दी जाती है कि वे कमर्शियल फ्लाइट्स समेत उपलब्ध किसी भी परिवहन माध्यम से ईरान छोड़ दें." भारतीय दूतावास ने यह भी दोहराया है कि ईरान में मौजूद सभी भारतीय नागरिक और पीआईओ (PIOs) पूरी सतर्कता बरतें, किसी भी तरह के विरोध प्रदर्शन या भीड़भाड़ वाले इलाकों से दूर रहें और स्थानीय मीडिया पर नजर बनाए रखें, ताकि हालात से जुड़े ताजा अपडेट मिलते रहें. दूतावास ने भारतीय नागरिकों से अपील की है कि वे अपने यात्रा और इमिग्रेशन से जुड़े सभी दस्तावेज-जैसे पासपोर्ट और पहचान पत्र-हमेशा अपने पास और आसानी से उपलब्ध रखें. साथ ही, किसी भी तरह की सहायता की जरूरत पड़ने पर तुरंत भारतीय दूतावास से संपर्क करने को कहा गया है. आपात स्थिति के लिए भारतीय दूतावास ने नंबर भी जारी किए हैं. दूतावास के अनुसार, भारतीय नागरिक इन मोबाइल नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं: +989128109115, +989128109109, +989128109102 और +98932179359. ईरान में हाल के दिनों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन, हिंसा और सुरक्षा कार्रवाई की खबरें सामने आई हैं, जिसके चलते विदेशी नागरिकों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं. वहीं अमेरिका ईरान को लगातार सैन्य कार्रवाई की धमकी दे रहा है.

ईरान का आरोप: ट्रंप और नेतन्याहू को किलर बताया, 2500 मौतों का जिम्मेदार बना अमेरिका और इज़राइल

तेहरान  ईरान की सड़कों पर हंगामा जारी है. कई शहरों में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच भिडंत हो रही है. इस बीच ईरान में चल रहे प्रदर्शनों और टकराव की वजह से मरने वालों की संख्या 2500 को पार कर गई है. कई दिनों के बाद ईरान के लोग दूसरे देशों में अपने रिश्तेदारों को फोन कर पाने में सक्षम हो पा रहे हैं. इसके साथ ही वहीं की खौफनाक हकीकत सामने आ रही है.  ईरान में अबतक मरने वालों की संख्या 2571 हो गई है. अमेरिका की मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार बुधवार सुबह तक मरने वालों की संख्या कम से कम 2,571 हो गई थी. यह आंकड़ा कई दशकों में ईरान में किसी भी दूसरे विरोध प्रदर्शन या अशांति में हुई मौतों की संख्या से कहीं ज़्यादा है. और  देश की 1979 की इस्लामिक क्रांति के दौरान फैली अराजकता की याद दिलाता है. पहला हत्यारा ट्रंप है… हालांकि ईरान का प्रशासन किसी भी कीमत पर झुकने को तैयार नहीं दिखता है. ईरानी अधिकारियों ने एक बार फिर से अमेरिकी ट्रंप को कार्रवाई न करने की चेतावनी दी है. ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सेक्रेटरी अली लारीजानी ने अमेरिकी रवैये पर जवाब देते हुए लिखा, 'हम ईरान के लोगों के मुख्य हत्यारों के नाम बताते हैं: 1- ट्रंप 2- इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू." समाचार एजेंसी एपी के अनुसार ईरान के सरकारी टेलीविजन ने पहली बार आधिकारिक तौर पर मौतों की पुष्टि की. एक अधिकारी के हवाले से सरकारी टीवी ने कहा कि मुल्क में "बहुत सारे लोग शहीद" हुए हैं. विद्रोहियों ने खामेनेई के लिए मौत की सजा मांगी ये प्रदर्शन दिसंबर के आखिर में ईरान की खराब अर्थव्यवस्था के गुस्से में शुरू हुए और जल्द ही यहां की मजहबी शासन प्रणाली इसके निशाने पर आ गई. राजधानी में लोग सर्वोच्च धार्मिक नेता खामेनेई की मौत की मांग करने नारे लगा रहे हैं और तस्वीरें बना रहे हैं. ईरान में इस कथित 'अपराध' के लिए मौत की सजा मुकर्रर की जाती है. इस बीच अमेरिका लगातार प्रदर्शनकारियों के साथ अपना सपोर्ट जता रहा है. मंगलवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ट्रुथ सोशल प्लेटफॉर्म पर लिखा, "ईरानी देशभक्तों, विरोध करते रहो- अपनी संस्थाओं पर कब्जा करो." ट्रंप ने कहा कि था कि उन्होंने सभी ईरानी अधिकारियों के साथ तबतक के लिए बातचीत रोक दी है जबतक इन हत्याओं को रोका नहीं जाता है. उन्होंने कहा कि ईरान को जल्द मदद मिलने वाली है. हालांकि घंटों बाद ट्रंप ने रिपोर्टर्स से कहा कि उनकी सरकार "उसी हिसाब से" कार्रवाई करने से पहले मारे गए प्रदर्शनकारियों की संख्या पर एक सही रिपोर्ट का इंतज़ार कर रही है. ट्रंप की मदद आ रही है ट्रंप ने ईरानी सुरक्षा बलों के बारे में कहा, "मुझे लगता है कि वे बहुत बुरा बर्ताव कर रहे हैं, लेकिन यह कन्फर्म नहीं है." इस बीच ईरानी सत्ता के रुख में कोई नरमी नहीं दिख रही है. ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सेक्रेटरी अली लारीजानी ने अमेरिका के रवैये पर जवाब देते हुए लिखा: "हम ईरान के लोगों के मुख्य हत्यारों के नाम बताते हैं: 1- ट्रंप 2- इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू." ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल देश की सबसे शक्तिशाली और महत्वपूर्ण संस्था है जो राष्ट्रीय सुरक्षा एवं रक्षा नीतियों का निर्धारण करती है. यह 1989 में संविधान के अनुच्छेद 176 के तहत स्थापित हुई. इसके अध्यक्ष ईरान के राष्ट्रपति होते हैं, लेकिन इसके सभी निर्णय सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई लेते हैं. तेहरान के फोन लाइन खुले समाचार एजेंसी एपी के अनुसार लगभग 5 दिनों के बाद फोन लाइन खुलने के बाद तेहरान के लोग मुल्क से बाहर कॉल कर रहे हैं. एक ईरानी चश्मदीद ने सेंट्रल तेहरान में भारी सुरक्षा, जले हुए सरकारी भवन, टूटे हुए ATM और कम राहगीरों के बारे में बताया. इस बीच लोग इस बात को लेकर चिंतित थे कि आगे क्या होगा जिसमें अमेरिका के हमले की संभावना भी शामिल थी. अपनी सुरक्षा की चिंता के कारण सिर्फ़ अपना पहला नाम बताने वाले दुकानदार महमूद ने कहा, "मेरे ग्राहक ट्रंप की प्रतिक्रिया के बारे में बात करते हैं और सोचते हैं कि क्या वह इस्लामिक रिपब्लिक के खिलाफ़ मिलिट्री हमला करने की योजना बना रहे हैं." "मुझे नहीं लगता कि ट्रंप या कोई दूसरा विदेशी देश ईरानियों के हितों की परवाह करता है." रेजा एक टैक्सी ड्राइवर जिसने सिर्फ़ अपना पहला नाम बताया, ने कहा कि कई लोगों के मन में विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं. उन्होंने कहा, "लोग – खासकर युवा निराश हैं, लेकिन वे विरोध प्रदर्शन जारी रखने की बात कर रहे हैं."

मोदी सरकार की नेम चेंज पॉलिसी: PMO को ‘सेवा तीर्थ’, राजपथ को ‘कर्तव्य पथ’ बनाने की घोषणा

नई दिल्ली पिछले कुछ सालों में भारत में कई सड़कों, सरकारी इमारतों, संस्थानों और शहरों के नाम बदले गए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने इन बदलावों को भारतीय संस्कृति, लोक भावना और कर्तव्य और सेवा की सोच को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम बताया है. राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ करने से लेकर योजना आयोग को नीति आयोग बनाने तक, देशभर में नाम परिवर्तन की यह प्रक्रिया लगातार चर्चा का विषय रही है. अब इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक बदलाव यह हुआ है कि प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और उसके आसपास के प्रशासनिक ब्लॉक का नाम ‘सेवा तीर्थ’ रखा गया है.  यह नया परिसर पहले Executive Enclave के नाम से जाना जाता था और सेंट्रल विस्टा परियोजना के तहत बनाया गया है. इसी नए भवन परिसर में प्रधानमंत्री कार्यालय, कैबिनेट सचिवालय और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय स्थित होंगे. नया नाम सेवा तीर्थ इसलिए चुना गया है क्योंकि यह सरकार के कामकाज में 'सेवा की भावना' को प्राथमिकता देने का प्रतीक है. यानी शासन केवल सत्ता और अधिकार के लिए नहीं, बल्कि जनता की सेवा और कल्याण के लिए है. चर्चा में रहा नाम परिवर्तन पिछले कुछ वर्षों में भारत में कई सड़कों, सरकारी इमारतों, संस्थानों और शहरों के नाम बदले गए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने इन बदलावों को गुलामी के दौर की पहचान से बाहर निकलने और भारतीय संस्कृति, लोक भावना और कर्तव्य की सोच को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम बताया है. राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ करने से लेकर योजना आयोग को नीति आयोग बनाने तक, देशभर में नाम परिवर्तन की यह प्रक्रिया लगातार चर्चा में रही है. सड़कें, सरकारी इमारतें, शहर या संस्थान कई जगहों पर पुराने नामों की जगह नए नाम रखे गए हैं. 1. राजपथ- कर्तव्य पथ (2022) दिल्ली का ऐतिहासिक राजपथ अब कर्तव्य पथ कहलाता है. यह बदलाव जनसेवा और कर्तव्य को प्राथमिकता देने के विचार से किया गया. 2. 7 रेस कोर्स रोड – लोक कल्याण मार्ग (2016) प्रधानमंत्री का आधिकारिक आवास अब लोक कल्याण मार्ग के नाम से जाना जाता है. यह नाम जनता के कल्याण का प्रतीक माना गया. 3. योजना आयोग – नीति आयोग (2015) आजादी के बाद बना योजना आयोग समाप्त कर नीति आयोग बनाया गया. इसका उद्देश्य राज्यों को साथ लेकर नीति बनाना है. 4. प्रधानमंत्री कार्यालय परिसर- सेवातीर्थ (2025–26) पीएमओ के नए कॉम्प्लेक्स का नाम सेवातीर्थ (Seva Teerth) रखा गया. यह नाम सेवा भावना और सार्वजनिक जिम्मेदारी को दर्शाता है. 5. केंद्रीय सचिवालय- कर्तव्य भवन सेंट्रल विस्टा परियोजना के तहत नए सचिवालय भवनों को कर्तव्य भवन कहा गया. यह बदलाव सरकारी कर्मचारियों के कर्तव्य बोध को दर्शाने के लिए किया गया. 6. दलहौजी रोड- दारा शिकोह रोड ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी के नाम पर बनी सड़क का नाम बदलकर मुगल राजकुमार दारा शिकोह के नाम पर रखा गया. दारा शिकोह को भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक माना जाता है. 7. राजभवन- लोकभवन (कई राज्य) कई राज्यों में राज्यपाल के आवास राजभवन को लोकभवन कहा जाने लगा. यह बदलाव पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम जैसे राज्यों में लागू हुआ. 8. राज निवास- लोक निवास लद्दाख जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में राज निवास का नाम बदलकर लोक निवास किया गया. शहरों और स्थानों के बड़े नाम परिवर्तन 9. इलाहाबाद- प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान को ध्यान में रखते हुए नाम बदला गया. 10. फैजाबाद जिला- अयोध्या जिला राम जन्मभूमि से जुड़ी धार्मिक पहचान को प्रमुखता दी गई. 11. मुगलसराय स्टेशन- पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन एक प्रमुख रेलवे स्टेशन का नाम बदला गया. 12. औरंगाबाद- संभाजीनगर (महाराष्ट्र) छत्रपति संभाजी महाराज के सम्मान में नाम बदला गया. 13. उस्मानाबाद- धाराशिव (महाराष्ट्र) प्राचीन भारतीय नाम को फिर से अपनाया गया. Indian Penal Code का भी बदला नाम भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) का नाम बदल चुका है, लेकिन यह सिर्फ नाम नहीं बदलकर पूरी तरह नई संहिता में बदल गया है. पुरानी Indian Penal Code (IPC), 1860 जिसे ब्रिटिश शासन के समय बनाया गया था और आजादी के बाद भी लागू रहा. अब 1 जुलाई 2024 से यह हटकर नई संहिता में बदल गया है. नया नाम क्या है? Indian Penal Code (IPC) की जगह अब Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS), 2023 लागू हो गया है. New criminal law (Bharatiya Nyaya Sanhita) 1 जुलाई 2024 से लागू हो गया है और इससे IPC पूरी तरह बदल गया है. सरकार का कहना है कि पुराने IPC को आधुनिक समय के अनुसार बदलने और भारत की पहचान के हिसाब से नया नाम देने की जरूरत थी.  सरकार का तर्क क्या है? केंद्र सरकार का कहना है कि देश में सड़कों, शहरों, सरकारी इमारतों और संस्थानों के नाम बदलने का निर्णय सिर्फ एक नाम बदलने तक सीमित नहीं है. इसके पीछे तीन बड़े उद्देश्य हैं.  1.  गुलामी के प्रतीकों से मुक्ति कई पुरानी सड़कों, भवनों और संस्थानों के नाम ब्रिटिश शास अधिकारी के नाम पर थे. जैसे राजपथ, डलहौजी रोड, कुछ रेलवे स्टेशन आदि. सरकार का कहना है कि इन नामों से भारत की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय पहचान को ठीक तरह से नहीं दिखाया जाता था. नाम बदलकर अब ये स्वदेशी और भारतीय प्रतीकों से जुड़े हुए हैं. जैसे- राजपथ का नाम कर्तव्य पथ, डलहौजी रोड का नाम दारा शिकोह रोड. 2. भारतीय इतिहास और संस्कृति का सम्मान नाम बदलने का दूसरा उद्देश्य यह है कि इतिहास और संस्कृति को सही सम्मान मिले. पुराने नाम अक्सर उपनिवेशिक काल या विदेशी प्रभाव को दर्शाते थे. नए नाम ऐसे चुने गए हैं जो भारतीय संस्कृति, वीरता, लोककथा और राष्ट्रीय नेताओं को समर्पित हैं. जैसे-औरंगाबाद- छत्रपति संभाजीनगर, इलाहाबाद-प्रयागराज. 3. लोककल्याण और सेवा की भावना को बढ़ावा देना सिर्फ जगह का नाम बदलना ही नहीं, बल्कि सरकारी संस्थानों और भवनों के नाम बदलकर कर्तव्य और सेवा का संदेश दिया गया. जैसे 7 रेस कोर्स रोड का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग, राजभवन  का नाम बदलकर लोक भवन, राज निवास का नाम बदलकर लोक निवास हो गया.

ईरान से व्यापार पर ट्रंप का 25% टैरिफ ऐलान, भारत सरकार ने कहा— चिंता की बात नहीं

 नई दिल्ली डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने ईरान को घेरने के लिए उसके व्यापारिक साझेदार देशों पर 25% टैरिफ (US 25% Iran Tariff) लगाने का ऐलान किया है. इसका बड़ा असर चीन, यूएई समेत भारत पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है, क्योंकि ईरान के पांच सबसे बड़े बिजनेस पार्टनर्स में भारत भी शामिल है. लेकिन, ट्रंप के इस 25% Iran Tariff का भारत पर कितना और क्या असर होगा, इसे लेकर मोदी सरकार (Modi Govt On Trump Tariff) की ओर से बयान आ गया है और केंद्र सरकार की ओर से भारतीय निर्यातकों को भरोसा दिलाते हुए कहा गया है कि अमेरिका के इस कदम का देश के निर्यात पर बेहद सीमित असर होगा.  'ट्रंप टैरिफ से भारत पर ज्यादा असर नहीं' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने Trump 25% Tariff Bomb के भारत पर असर को लेकर अपना बयान जारी किया है और इसमें ट्रेड से जुड़े तमाम आंकड़े भी शेयर किए हैं. सरकार ने भारतीय निर्यातकों को आश्वस्त किया है कि ईरान को लेकर अमेरिकी टैरिफ अटैक का भारत पर सीमित प्रभाव पड़ेगा. बयान में कहा गया है कि भारत के अपेक्षाकृत सीमित व्यापारिक संबंधों और विविध निर्यात संबंधों को देखते हुए इस कदम का भारत पर बहुत ज्यादा असर पड़ने की संभावना नहीं है.  ये आंकड़े क्या कर रहे इशारा?  भारत पर ट्रंप के ईरान टैरिफ के असर का एक अंदाजा वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों से भी लगाया जा सकता है. FY2024-25 में ईरान को भारतीय निर्यात 1.24 अरब डॉलर और आयात 440 मिलियन डॉलर रहा यानी कुल द्विपक्षीय व्यापार 1.68 अरब डॉलर का था. इस हिसाब से भारत के व्यापारिक साझेदारों की लंबी लिस्ट में ईरान बहुत नीचे 63वें स्थान पर आता है. ट्रेड आंकड़ों के मुताबिक, भारत का ईरान के साथ कारोबार तंजानिया, अंगोला, टोगो, मोजाम्बिक, सेनेगल, घाना जैसी बेहद छोटी अर्थव्यवस्थाओं से भी पीछे है. तेहरान स्थित भारतीय दूतावास के अनुसार, भारत बासमती चावल, चाय, चीनी और दवाइयां निर्यात करता है, जबकि ईरान से सेब, पिस्ता, खजूर और कीवी के अलावा कांच के बर्तनों का आयात करता है. भारत के सबसे बड़े ट्रेड पार्टनर भारत के साथ तमाम देशों के व्यापार की बात करें तो देश के सबसे बड़े ट्रेड पार्टनर्स में अमेरिका ही टॉप पर है. US के साथ 132 अरब डॉलर से अधिक के कुल द्विपक्षीय व्यापार है, जबकि China 127 अरब डॉलर से अधिक, UAE 100 अरब डॉलर से अधिक, Russia 68 अरब डॉलर से अधिक और सऊदी अरब 41 अरब डॉलर से अधिक के व्यापार के साथ लिस्ट में आगे हैं.  सरकार का आश्वासन, फिर भी यहां बड़ी चिंता सरकार ने हालांकि, ईरान टैरिफ के सीमित असर की बात कहते हुए Indian Exporters को नो-टेंशन बोला है. इसके बावजूद कुछ सेक्टर्स में निर्यातकों में चिंता है. खासतौर पर बासमती चावल का निर्यात करने वालों में, बता दें कि पारंपरिक रूप से ईरान Indian Basmati Rice के सबसे बड़े खरीदारों की लिस्ट में शामिल रहा है. आंकड़े देखें, तो सालाना 12 लाख टन (करीब 12000 करोड़ रुपये) का निर्यात किया जाता है. ऐसे में भारत ईरान के कुल चावल आयात का करीब दो-तिहाई हिस्सा पहुंचाता है.  सरकार ने बताया- क्यों होगा कम असर? सरकारी अधिकारियों ने US Iran Tariff के असर को लेकर साफ कहा है कि भले ही इसका कुछ निर्यात क्षेत्रों को शॉर्ट टर्म प्रेशर का सामना करना पड़े, लेकिन भारत पर इसका व्यापक आर्थिक प्रभाव सीमित ही रहेगा. उन्होंने इस तथ्य की ओर इशारा किया कि भारतीय निर्यातकों ने पिछले एक दशक में पश्चिम एशिया, अफ्रीका और साउथ-ईस्ट एशिया में अपने बाजारों का लगातार विस्तार किया है, जिससे किसी एक देश पर हमारी निर्भरता काफी कम हुई है.

पोंगल समारोह में पीएम मोदी ने की भागीदारी, कहा- यह त्योहार तमिलनाडु तक सीमित नहीं, पूरे देश का हिस्सा है

नई दिल्ली  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज बुधवार को केंद्रीय मंत्री एल मुरुगन के सरकारी आवास पर आयोजित हुए पोंगल समारोह में शामिल हुए. उन्होंने वहां मौजूद सभी लोगों को हार्दिक शुभकामनाएं दीं और उसके बाद गौसेवा भी की. उन्होंने तमिल संस्कृति की समृद्ध विरासत पर जोर देते हुए कहा कि यह सिर्फ तमिलनाडु तक ही सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश की साझा विरासत है. राष्ट्रीय राजधानी में एल मुरुगन के आवास पर पोंगल उत्सव कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि पोंगल जैसे त्योहार 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की भावना को मजबूत करते हैं. वहीं, इससे पहले उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट करके सभी देशवासियों को मकर संक्रांति, भोगली बिहू और पोंगल की शुभकामनाएं भी दीं. उन्होंने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि ये पर्व आप सबके साथ मनाना मेरे लिए काफी सौभाग्य की बात है. प्रधानमंत्री ने कहा कि पोंगल अब एक वैश्विक त्योहार बन गया है और कहा कि उन्हें इसके जश्न का हिस्सा बनकर खुशी हुई. उन्होंने कहा कि यह त्योहार किसानों की कड़ी मेहनत को दिखाता है और प्रकृति, पृथ्वी और सूरज के प्रति आभार जताता है. पूरी दुनिया में तमिल समुदाय और तमिल संस्कृति को पसंद करने वाले लोग इसे बहुत उत्साह से मनाते हैं, और मैं भी उनमें से एक हूं. आप सभी के साथ यह खास त्योहार मनाना मेरे लिए सौभाग्य की बात है. हमारी जिंदगी में पोंगल एक सुखद अनुभव की तरह है. इसके साथ ही, यह त्योहार हमें प्रकृति, परिवार और समाज के बीच संतुलन बनाए रखने का रास्ता दिखाता है. प्रधानमंत्री मोदी ने इस दौरान लोहड़ी, मकर संक्रांति और माघ बिहू जैसे त्योहारों के लिए देश भर में बड़े उत्साह का भी जिक्र किया. पीएम मोदी ने कहा कि इस समय देश के अलग-अलग हिस्सों में लोहड़ी, मकर संक्रांति, माघ बिहू और कई दूसरे त्योहारों को लेकर भी बहुत उत्साह है. मैं भारत और दुनिया भर में रहने वाले तमिल भाइयों और बहनों को पोंगल और इन सभी त्योहारों की दिल से बधाई देता हूं. बता दें, पोंगल, दुनिया भर में तमिल लोगों के लिए सबसे खास त्योहारों में से एक है. यह प्रकृति, सूरज, खेत के जानवरों और किसानों को धन्यवाद देने का त्योहार है. इसे पारंपरिक रूप से परिवार के त्योहार के तौर पर मनाया जाता है, जो खुशहाली, शुक्रिया और साथ रहने का प्रतीक है. इस त्योहार को आसान बनाने के लिए, तमिलनाडु सरकार ने पहले सभी योग्य लाभार्थियों के लिए एक किलो कच्चा चावल, एक किलो चीनी और एक पूरा गन्ना वाला पोंगल गिफ्ट पैकेज देने की घोषणा की थी. पीएम मोदी ने इस संबंध में देशवासियों के नाम एक लेटर भी लिखा. जिसमें उन्होंने लिखा कि फसल से जुड़े यह पर्व आशा, सकारात्मकता और कृतज्ञता के प्रतीक हैं. मकर संक्रांति देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नामों और परंपराओं से मनाई जाती है, लेकिन इसके पीछे की भावना और उत्साह सबका एक ही है.