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जनसंख्या संतुलन बदलने की ओर: 2030 तक मुस्लिमों की संख्या में तेज़ बढ़ोतरी, हिंदू आबादी घटेगी

मॉस्को  रूस, जो अपनी सैन्य शक्ति और वैश्विक राजनीति में प्रभाव के लिए जाना जाता है, अब एक नए ध्यान केंद्र का हिस्सा बन रहा है: उसकी बदलती जनसंख्या संरचना। Pew Research और कई मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, देश में मुस्लिम आबादी लगातार बढ़ रही है और अनुमान है कि 2030 तक यह कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा बन सकती है। वहीं, हिंदू और अन्य छोटे धार्मिक समुदाय अब भी सीमित संख्या में हैं। इस बदलाव का असर केवल सांख्यिकीय नहीं होगा, बल्कि रूस की सामाजिक और राजनीतिक तस्वीर पर भी पड़ सकता है। मुस्लिम आबादी की मौजूदा स्थिति रूस की कुल आबादी लगभग 14 से 15 करोड़ के बीच आंकी जाती है। इसमें मुस्लिम समुदाय का हिस्सा लगभग 7 से 10 फीसदी के आसपास माना जाता है, यानी करीब 2.5 करोड़ लोग। चूंकि रूस में धर्म के आधार पर नियमित जनगणना नहीं होती, इसलिए ये आंकड़े अलग-अलग रिसर्च और सर्वेक्षणों पर आधारित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस्लाम रूस में तेजी से बढ़ता धर्म बन चुका है और आने वाले वर्षों में इसकी हिस्सेदारी और बढ़ सकती है। भविष्य में संभावित बदलाव कुछ धार्मिक और मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया जा रहा है कि अगले 10-15 साल में रूस की आबादी में मुस्लिम हिस्सेदारी और भी बढ़ सकती है। हालांकि विशेषज्ञ इसे अत्यधिक अनुमान मानते हैं, लेकिन प्रवास और जन्मदर के आधार पर मुस्लिम आबादी की वृद्धि को नकारा नहीं जा सकता। माइग्रेशन: मुस्लिम आबादी बढ़ने का मुख्य कारण रूस में मुस्लिम आबादी में इजाफे का सबसे बड़ा कारण मध्य एशियाई देशों से हो रहे प्रवास को माना जाता है। उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और कजाकिस्तान जैसे देशों से लोग रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में रूस आते हैं। इनमें से कई लंबे समय से रूस में रह रहे हैं और स्थायी रूप से बस चुके हैं। इसके अलावा, रूस के कुछ इलाके जैसे तातारस्तान, चेचन्या और दागेस्तान लंबे समय से मुस्लिम बहुल रहे हैं और वहां जन्मदर अपेक्षाकृत अधिक है, जिससे कुल मुस्लिम संख्या में इजाफा हो रहा है। कहां ज्यादा मुस्लिम आबादी है रूस में मुस्लिम समुदाय की उपस्थिति कुछ क्षेत्रों में विशेष रूप से मजबूत है। तातारस्तान, चेचन्या और दागेस्तान में यह समुदाय पारंपरिक रूप से बड़ा है। वहीं मॉस्को और सेंट पीटर्सबर्ग जैसे बड़े शहरों में प्रवासी मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ रही है।  कुछ रिपोर्ट्स यह अनुमान लगा रही हैं कि 2030 तक मुस्लिम आबादी और अधिक बढ़ सकती है। विशेषज्ञ इस दावे को कुछ हद तक अतिशयोक्ति मानते हैं, क्योंकि कुल आबादी सीमित है। फिर भी यह स्पष्ट है कि आने वाले वर्षों में रूस की जनसंख्या संरचना में बदलाव नजर आएगा। ईसाई धर्म का अब भी प्रभाव वर्तमान में रूस में ईसाई धर्म के अनुयायी सबसे अधिक हैं। लगभग आधी आबादी ईसाई परंपराओं से जुड़ी हुई है। हालांकि कम जन्मदर और घटती जनसंख्या के कारण ईसाई समुदाय का अनुपात धीरे-धीरे कम हो रहा है। हिंदू और अन्य धार्मिक समुदाय रूस में हिंदू और बौद्ध धर्म के अनुयायी बहुत कम हैं। इसके अलावा एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जो किसी धर्म से नहीं जुड़ा, जिसका कारण मुख्य रूप से सोवियत युग का धर्मनिरपेक्ष प्रभाव माना जाता है।  

इस बार गणतंत्र दिवस परेड में दिल्ली की झांकी नहीं, सरकार ने प्रस्ताव नहीं भेजा

नई दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में गणतंत्र दिवस परेड को लेकर राज्य सरकारों द्वारा रक्षा मंत्रालय को प्रस्ताव भेजे जा चुके हैं। रक्षा मंत्रालय ने इस बार हरियाणा की झांकी के प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया है। वहीं, 26 जनवरी की परेड में दिल्ली की झांकी शामिल नहीं होगी, क्योंकि दिल्ली सरकार ने इस वर्ष झांकी के लिए कोई प्रस्ताव भेजा ही नहीं। गौरतलब है कि पिछले वर्ष, यानी 76वें गणतंत्र दिवस परेड में पाँच वर्षों के अंतराल के बाद दिल्ली की झांकी शामिल की गई थी, जो शिक्षा मॉडल पर आधारित थी। दरअसल, गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने के लिए राज्य सरकारें अपने प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय को भेजती हैं। लेकिन इस बार दिल्ली सरकार ने कोई प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया, जिसके कारण 77वें गणतंत्र दिवस की परेड में कर्तव्य पथ पर राजधानी की झांकी नहीं दिखाई देगी। गौर करने वाली बात यह है कि पाँच वर्ष बाद 76वें गणतंत्र दिवस (2025) में शिक्षा मॉडल पर आधारित दिल्ली की झांकी परेड में शामिल हुई थी। इससे पहले 2020 से 2024 तक लगातार परेड में दिल्ली को स्थान नहीं मिल पाया था। इनमें प्रत्येक राज्य की झांकी अपनी संस्कृति, विरासत और जीवनशैली को प्रदर्शित करती नज़र आएगी। उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश की झांकी में बुंदेलखंड स्थित कालिंजर किले का प्रदर्शन किया जाएगा। विंध्य पर्वतमाला पर स्थित यह प्राचीन एवं अभेद्य किला बांदा जिले में है, जिसका निर्माण चंदेल शासकों के काल में हुआ था। यह किला बुंदेलखंड के इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। इस राज्य की भी नहीं दिखेगी झांकी हालांकि दिल्ली के साथ-साथ हरियाणा की झांकी भी इस बार गणतंत्र दिवस परेड में शामिल नहीं होगी। हरियाणा सरकार ने रक्षा मंत्रालय को कुल पाँच प्रस्ताव भेजे थे। प्रारंभिक चरण में हिसार जिले के पुरातात्विक स्थल राखीगढ़ी पर आधारित प्रस्ताव को मंजूरी मिल गई थी, लेकिन बाद में रक्षा मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को भी अस्वीकार कर दिया। कितने राज्यों को मिली स्वीकृति? झांकियों के चयन के लिए गठित विशेषज्ञ समिति ने तीन दौर की बैठकों के बाद 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की झांकियों को गणतंत्र दिवस परेड में शामिल करने की स्वीकृति दे दी है। माना जा रहा है कि इन राज्यों की सूची लगभग अंतिम मानी जा रही है और अब इसमें बदलाव की संभावना बहुत कम है। पश्चिम बंगाल , उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान, पंजाब, पुडुचेरी, ओडिशा, नागालैंड, मणिपुर, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, केरल, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, असम

सऊदी अरब ने पाकिस्तानी भिखारियों पर कसा शिकंजा, शहबाज शरीफ की छवि पर सवाल

दुबई  पाकिस्तान अमेरिका और चीन के बल पर चाहे कितनी भी डींगें हांक ले लेकिन आए दिन अंतरराष्ट्रीय बेइज्जती का शिकार होता रहता है. आर्थिक बदहाली झेल रहे पाकिस्तान के लोग सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे मध्य-पूर्व के अमीर इस्लामिक देशों में जाकर भीख मांग रहे हैं. इन देशों की चेतावनियों के बावजूद, पाकिस्तान अपने भिखारियों पर लगाम लगाने में नाकाम रहा है. हाल ही में सऊदी अरब ने भीख मांगने के आरोप में करीब 56,000 पाकिस्तानियों को देश से निर्वासित किया है. सऊदी, यूएई ने पाकिस्तान को बार-बार वॉर्निंग दी है कि वो अपने भिखारियों पर लगाम कसे. दबाव के बीच पाकिस्तान ने हजारों पाकिस्तानियों को नो-फ्लाई लिस्ट में डाल दिया है यानी अब ये पाकिस्तानी देश से बाहर नहीं जा सकेंगे. रिपोर्टों के मुताबिक, संगठित भीख मांगने वाले गिरोहों को विदेश जाने से रोकने के लिए पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी, फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (FIA) ने 2025 में 66,154 यात्रियों को उड़ान भरने से रोक दिया. पिछले महीने ही यूएई ने अधिकांश पाकिस्तानी नागरिकों को वीजा जारी करना रोक दिया था. बताया गया था कि पाकिस्तानी खाड़ी देशों में जाकर आपराधिक गतिविधियों में लिप्त होते हैं और भीख मांगते हैं जिसे देखते हुए यूएई ने यह फैसला लिया. पाकिस्तान ने हजारों नागरिकों को नो-फ्लाई लिस्ट में डाला ये आंकड़े पाकिस्तानी संसद की नेशनल असेंबली की एक समिति ने तब जारी किए, जब पाकिस्तान ने हजारों नागरिकों को एग्जिट कंट्रोल लिस्ट (ECL) या नो-फ्लाई लिस्ट में डाल दिया था. पिछले साल सऊदी अरब ने पाकिस्तान से कहा था कि वो उमराह वीजा का दुरुपयोग कर मक्का और मदीना पहुंचकर भीख मांगने वालों पर रोक लगाए. पाकिस्तान में कई गिरोह उमराह वीजा पर भिखारियों को सऊदी, यूएई जैसे देशों में भेजकर भीख मंगवाते हैं. पाकिस्तानी खाड़ी देशों में जाकर आपराधिक गतिविधियां भी करते पाए गए हैं. इससे पाकिस्तान के तीर्थयात्रियों, कामगारों और छात्रों के लिए मुश्किलें बढ़ी हैं क्योंकि सऊदी, यूएई जैसे देश पाकिस्तानियों को वीजा जारी करने में आनाकानी करने लगे हैं. पाकिस्तान को लगातार मिल रही सऊदी, यूएई जैसे देशों से चेतावनी पाकिस्तान की एजेंसी FIA के प्रमुख रिफ्फत मुख्तार ने कराची स्थित अखबार 'The News International' के हवाले से बताया कि 'हाल ही में सऊदी अरब से संगठित भीख मांगने में शामिल 56,000 पाकिस्तानियों को निर्वासित किया गया.'  वहीं, The Express Tribune के अनुसार, FIA ने इस साल 66,154 यात्रियों को विमान से उतारा है ताकि भीख मांगने वाले गिरोहों और अवैध प्रवासियों को विदेश जाने से रोका जा सके. मुख्तार ने कहा कि अवैध प्रवासन और भीख मांगने के नेटवर्क ने वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया है. सालों से पाकिस्तानी भिखारी तीर्थयात्रा और टूरिस्ट वीजा का दुरुपयोग कर पश्चिम एशिया के शहरों में सड़कों पर भीख मांगते देखे जा रहे हैं. इससे मेजबान देशों में चिंता बढ़ी है और वैध पाकिस्तानी यात्रियों के लिए वीजा जांच सख्त हुई है. मक्का-मदीना में पाकिस्तानी भिखारियों को देख शर्मिंदा हो रहे पाकिस्तानी 2024 में सऊदी अरब के धार्मिक मामलों के मंत्रालय ने चेतावनी दी थी कि हालात काबू में नहीं आए तो इसका असर पाकिस्तानी उमराह और हज यात्रियों पर पड़ सकता है. सऊदी अरब की सड़कों पर पाकिस्तानी भिखारियों की मौजूदगी सबको दिखती है. 2024 में इस्लामाबाद के एक निवासी उस्मान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, 'मैं अभी उमराह करके लौटा हूं और पाकिस्तानी होने पर शर्म महसूस कर रहा हूं. वो (पाकिस्तानी भिखारी) बिन दाऊद स्टोर के अंदर, उमराह के दौरान और सड़कों पर भीख मांग रहे हैं.' खास बात यह है कि इनमें से कई भिखारी पेशेवर तौर पर काम करते हैं. वे वीजा हासिल करने के बाद पाकिस्तान से बाहर चले जाते हैं. पाकिस्तानी अखबार डॉन में लिखे एक लेख में कानूनी विशेषज्ञ राफिया जकारिया ने पहले ही लिखा था कि पाकिस्तानी अपने ही देशवासियों को 'मक्का और मदीना के पवित्र स्थलों के बाहर डेरा जमाए हुए, विदेशी तीर्थयात्रियों को पैसों के लिए परेशान करते' देखते रहे हैं. उन्होंने इन भिखारियों को मास्टर मैनिपुलेटर्स बताया, जो लोगों की अपराधबोध की भावना से खेलकर उनसे पैसे निकलवाते हैं. विदेशों में पकड़े जाने वाले 90% भिखारी पाकिस्तानी यह समस्या सिर्फ इस्लाम के दो सबसे पवित्र स्थलों मक्का और मदीना के देश सऊदी अरब तक सीमित नहीं है. यूएई, कुवैत, अजरबैजान और बहरीन समेत कई पश्चिम एशियाई देशों में पाकिस्तानी भिखारी दिख जाते हैं. 2024 में ओवरसीज पाकिस्तानियों के सचिव जीशान खानजादा ने कहा था कि पश्चिम एशियाई देशों में हिरासत में लिए गए 90% भिखारी पाकिस्तान से थे. जहां इससे विदेशों में पाकिस्तानियों की छवि प्रभावित हुई है, वहीं देश में नौकरी तलाशने वालों को भी नुकसान झेलना पड़ा है. भिखारियों का यह 'निर्यात' न केवल सऊदी अरब जैसे देशों को परेशान कर रहा है, बल्कि कानून का पालन करने वाले पाकिस्तानियों पर भी उल्टा असर डाल रहा है. उन्हें अब सख्त वीजा जांच और वीजा रिजेक्शन का सामना करना पड़ रहा है.

समुद्र की गहराई से घातक हमला: SLBM की प्रचंड स्पीड और विनाशक क्षमता

नई दिल्ली भारत की सीमा पर एक तरफ चीन तो दूसरी तरफ पाकिस्‍तान स्थित है. पूरी दुनिया इन दोनों देशों की करतूत से वाकिफ है. पाकिस्‍तान आतंकवादियों के लिए ऐशगाह है तो चीन की विस्‍तार और हड़प नीति के बारे में हर कोई जानता है. पाक‍िस्‍तान की दशकों से एक ही नीति है- आतंकवादियों के जरिये भारत को अस्थिर किया जाए. हालांकि, अब वक्‍त और हालात दोनों बदल चुके हैं. भारत किसी भी तरह के आतंकवादी हमलों का मुंहतोड़ जवाब देने का ऐलान कर चुका है. पहलगाम अटैक के बाद इंडियन आर्म्‍ड फोर्सेज की ओर से लॉन्‍च ऑपरेशन सिंदूर इसका जीता जागता उदाहरण है. सैन्‍य ऑपरेशन के बाद भारत ने अपनी सुरक्षा व्‍यवस्‍था और पुख्‍ता एवं मजबूत करने की मुहिम शुरू कर दी है. आर्मी के साथ ही एयरफोर्स और नेवी तक को अपग्रेड किया जा रहा है. नेवी की म्‍यान में एक ऐसा वेपन है, जो पलक झपकते ही दुश्‍मनों का खात्‍मा करने में सक्षम है. रेंज और रफ्तार के मामले में इस मिसाइल का कोई सानी नहीं है. सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे ‘पाताल लोक’ से टारगेट पर फायर किया जा सकता है. मतलब यह कि इस अल्‍ट्रा मॉडर्न बैलिस्टिक मिसाइल को सबमरीन (पनडुब्‍बी) से दागा जा सकता है. इस तकनीक के साथ ही भारत उन बिरले देशों की लिस्‍ट में शामिल हो गया है, जिसके पास जल-थल और नभ से फायर की जाने वाली मिसाइल टेक्‍नोलॉजी है. बात हो रही है इंडियन नेवी की महारथी मिसाइल K-4 की. इसे सबमरीन से लॉन्‍च किया जा सकता है. इस वजह से इसे सबमरीन लॉन्‍च्‍ड बैलिस्टिक मिसाइल (submarine-launched ballistic missile-SLBM) कहा जाता है. पानी के अंदर से ही टारगेट को लॉक कर उसे तबाह किया जा सकता है. बता दें कि K-4 मिसाइल का विशाखापत्तनम तट के पास पनडुब्बी INS अरिघात से परीक्षण किया गया था. अफसरों ने बताया कि यह किसी पनडुब्बी से दागी जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइल (एसएलबीएम) का पनडुब्बी से किया गया पहला परीक्षण था. सॉलिड फ्यूल से चलने वाली इस मिसाइल का पिछले कुछ वर्षों में पानी के भीतर से दागे जाने वाले प्लेटफॉर्म से कम से कम पांच बार ट्रायल किया जा चुका है. मिसाइल का परीक्षण लगभग उसकी पूरी मारक क्षमता तक किया गया. अरिहंत कैटेगरी की दूसरी पनडुब्बी INS अरिघात को भारत की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने के उद्देश्य से 29 अगस्त को भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था. K-4 SLBM या ब्रह्मोस…कौन है महाबली K-4 SLBM या ब्रह्मोस…कौन है महाबली K-4 SLBM ब्रह्मोस मिसाइल स्‍पीड: कम से कम 6200 KMPH स्‍पीड: 3700 KMPH रेंज: 3500 किलोमीटर रेंज: 450, 800 और 1500 किलोमीटर कैटेगरी: बैलिस्‍टिक मिसाइल कैटेगरी: क्रूज मिसाइल सबमरीन से लॉन्‍च करने योग्‍य समंदर, हवा और सतह से मार करने में सक्षम हाइपरसोनिक कैटेगरी वाली रफ्तार सुपरसोनिक कैटेगरी वाली रफ्तार ब्रह्मोस मिसाइल से ज्‍यादा रेंज K-4 SLBM मारक क्षमता का पता इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उसकी रेंज ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल की मौजूदा वर्जन की मारक क्षमता से सात गुना ज्‍यादा है. फिलहाल ब्रह्मोस मिसाइल की रेंज 450 से 500 किलोमीटर है. खबरों की मानें तो भारत ने ब्रह्मोस के नए वैरिएंट का परीक्षण किया है, जिसकी रेंज 800 किलोमीटर है. बताया जा रहा है कि ब्रह्मोस मिसाइल के एक और वर्जन पर काम चल रहा है, जिसके बाद इसकी रेंज 1500 किलोमीटर तक हो जाएगी. 800 किलोमीटर मारक क्षमता वाली ब्रह्मोस मिसाइल को विभिन्‍न मोर्चों पर तैनात भी किया जा रहा है. दूसरी तरफ, K-4 SLBM मिसाइल 3500 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम है. यह बैलिस्टिक मिसाइल परमाणु आयुध ले जाने में भी कैपेबल है. इस तरह फिलहाल K-4 SLBM पाकिस्‍तान को घुटनों पर लाने वाली ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल से ज्‍यादा रेंज तक मार करने में सक्षम है. K-4 SLBM: रफ्तार का सौदागर सबमरीन से मार करने में सक्षम K-4 SLBM हाइपरसोनिक रफ्तार से टारगेट की ओर मूव करने में कैपेबल है. हालांकि, K-4 SLBM की स्‍पीड के बारे में जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है, पर माना जा रहा है कि यह मैक 5 या उससे ज्‍यादा की रफ्तार से मूव करने में सक्षम है. इसका मतलब यह हुआ कि K-4 SLBM कम से कम 6200 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से दुश्‍मन पर अटैक कर सकती है. दूसरी तरफ, ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल अधिकतम मैक 3 यानी 3700 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से अटैक कर सकती है. इस तरह K-4 SLBM ब्रह्मोस से रफ्तार के मामले में भी बीस है. K-4 SLBM को इंडियन नेवी की तरकश में एक अचूक ‘ब्रह्मास्‍त्र’ माना जाता है, जो पलक झपकते ही दुश्‍मनों का सीना छलनी कर उसे घुटनों पर लाने में सक्षम है.      

डिजिटल फ्रॉड रोकने का प्रयास, लेकिन सिम बाइंडिंग से यूजर्स पर बढ़ सकती है मुश्किलें

 नई दिल्ली भारत इस वक्त डिजिटल फ्रॉड के ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां हर फोन कॉल, हर मैसेज और हर लिंक शक के घेरे में आ चुका है. डिजिटल अरेस्ट, फर्जी पुलिस कॉल, बैंक इम्पर्सोनेशन और फिशिंग ने टेक्नोलॉजी को सहूलियत से डर में बदल दिया है. ऐसे माहौल में सरकार जब सिम बाइंडिंग जैसे कदम की बात करती है, तो पहली नज़र में ये एक सख्त लेकिन ज़रूरी फैसला लगता है. लेकिन टेक्नोलॉजी की दुनिया में अक्सर वही फैसले सबसे ज़्यादा नुकसान करते हैं जो देखने में बहुत आसान लगते हैं. सिम बाइंडिंग क्या है और क्यों इसकी चर्चा चल रही है. एक तरफ जहां टेलीकॉम कंपनियां सिम बाइंडिंग के सपोर्ट में दिख रही हैं वहीं दूसरी तरफ यूजर्स, एक्सपर्ट्स और बड़ी कंपनियां इससे अलग राय रख रही हैं.  ज्यादातर एक्सपर्ट्स की राय यही है कि सिम बाइंडिग के फायदे तो हैं, लेकिन यूजर्स के लिए डेली ऐप यूज में मुश्किल खड़ा कर सकता है और ये महंगा अफेयर भी हो सकता है.  एक टेक एडिटर के तौर पर, जिसने टेलिकॉम पॉलिसी, साइबर फ्रॉड और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स 10 साल तक करीब से कवर किया है, यह कहना ज़रूरी है कि सिम बाइंडिंग फ्रॉड का इलाज कम और सिस्टम की गलत समझ ज़्यादा दिखाता है. इरादा सही हो सकता है, लेकिन तरीका न तो पूरा है और न ही भविष्य के लिए सुरक्षित. सिम बाइंडिंग और लिमिट्स सिम बाइंडिंग का कॉन्सेप्ट सीधा है. जिस मोबाइल नंबर से WhatsApp, Telegram या कोई भी मैसेजिंग ऐप रजिस्टर हुआ है, वही सिम कार्ड फोन में होना चाहिए. सिम निकली, बदली या डीऐक्टिवेट हुई तो ऐप काम करना बंद. कई बार लोग इंडिया से बाहर जाते हैं और रोमिंग प्लान नहीं लेते हैं और वहां होटल के वाईफाई पर डिपेंडेंट रहते हैं. ऐसी स्थिति में अगर सिम बाइंडिंग आ गया तो वो वॉट्सऐप या कोई दूसरा ऐप जो उस फ़ोन से लिंक है यूज़ नहीं कर पाएंगे. वॉट्सऐप चलाने के लिए भी उन्हें महंगे रोमिंग प्लान की ज़रूरत होगी जो 3000-4000 रुपये से स्टार्ट होता है.  थ्योरी में यह एक मजबूत सिक्योरिटी लेयर लगती है. लेकिन असल दुनिया में फ्रॉड जिस तरह काम करता है, वहां यह थ्योरी जल्दी टूट जाती है. आज के साइबर अपराधी एक फोन, एक सिम या एक अकाउंट पर निर्भर नहीं रहते. वे पूरे नेटवर्क पर काम करते हैं. केवाईसी, सिम, बैंक अकाउंट और कॉल सेंटर सब कुछ अलग-अलग लोगों के नाम पर. ऐसे में सिम को ऐप से बांध देने से अपराधी नहीं रुकते, सिर्फ रास्ता बदलते हैं. फ्रॉड की जड़ कहां है, और सरकार क्या पकड़ रही है डिजिटल फ्रॉड की सबसे बड़ी समस्या सिम नहीं है. असली समस्या है फर्जी या किराए की पहचान. भारत में आज भी सिम म्यूलिंग एक बड़ा नेटवर्क बन चुका है, जहां वैलिड केवाईसी पर सिम लेकर उन्हें अपराधी नेटवर्क को सौंप दिया जाता है.  ये सिम पूरी तरह लीगल होते हैं, नंबर भी एक्टिव होते हैं और ट्रैकिंग भी संभव होती है. बावजूद इसके फिर भी फ्रॉड चलता रहता है. सिम बाइंडिंग इन नेटवर्क्स को तोड़ने की बजाय यह मान लेती है कि अपराधी टेक्नोलॉजी की बेसिक लेयर पर अटके हुए हैं. जबकि हकीकत यह है कि वे सिस्टम की कमजोरियों को बहुत गहराई से समझते हैं. यानी सरकार जिस समस्या का इलाज कर रही है, वो बीमारी की जड़ नहीं है. टेक्निकल हकीकत जिसे नीति से बाहर रखा गया यहां एक और अहम पहलू है जिस पर बहुत कम बात हो रही है. जिस तरह की सिम बाइंडिंग की कल्पना की जा रही है, वह मौजूदा मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम्स पर पूरी तरह संभव ही नहीं है. Android और iOS दोनों ही ऐप्स को लगातार सिम डिटेल्स या हार्डवेयर आइडेंटिफायर एक्सेस करने की परमिशन नहीं देते. यह कोई कमी नहीं, बल्कि यूज़र प्राइवेसी की बुनियाद है. इसी वजह से आज तक कोई भी मैसेजिंग ऐप ‘हर समय सिम मौजूद है या नहीं’ जैसी जांच नहीं करता. बैंकिंग ऐप्स यूज़ करते हैं सिम बाइंडिंग बैंकिंग ऐप्स भी जिसे सिम बाइंडिंग कहा जाता है, वह एक सीमित और टाइमली वेरिफिकेशन होता है, न कि स्थायी निगरानी.  सरकार जिस मॉडल को लागू करना चाहती है, वह या तो अधूरा रहेगा या फिर यूज़र एक्सपीरियंस को नुकसान पहुंचाएगा. अगर आप भी किसी बैंक का ऐप यूज़ करते हैं तो आपने ध्यान दिया होगा वो ऐप बिना रजिस्टर्ड सिम के काम नहीं करता. जिस फ़ोन में अकाउंट से लिंक्ड सिम डला है उस फ़ोन में ही बैंक का ऐप काम करता है. अगर सिम बाइंडिंग हुआ तो दूसरे मैसेजिंग ऐप के साथ भी ऐसा ही होगा.  आम यूज़र के लिए बढ़ता डिजिटल फ्रिक्शन अगर सिम बाइंडिंग को सख्ती से लागू किया जाता है, तो इसका सीधा असर आम यूज़र की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ेगा. आज लोग एक ही अकाउंट को फोन, लैपटॉप और टैबलेट पर इस्तेमाल करते हैं. मल्टी-डिवाइस एक्सपीरियंस मॉडर्न डिजिटल जीवन का हिस्सा बन चुका है. सिम बाइंडिंग इस सुविधा को कमजोर कर देगी. बार-बार लॉगआउट, री-वेरिफिकेशन, सिम बदलने पर ऐप बंद होना. ये सब उन लोगों के लिए बड़ी परेशानी बनेंगे जो टेक्नोलॉजी को काम के लिए इस्तेमाल करते हैं.  इंटरनेशनल ट्रैवल करने वाले, ई-सिम यूज़र और फ्रीलांसर सबसे पहले इसकी कीमत चुकाएंगे. फ्रॉड रोकने की कोशिश में सिस्टम ईमानदार यूज़र को सजा देने लगे, तो उस नीति पर सवाल उठना लाज़मी है. प्राइवेसी और भरोसे का बड़ा सवाल सिम बाइंडिंग सिर्फ सुविधा या टेक्नोलॉजी का मामला नहीं है. यह डिजिटल प्राइवेसी और भरोसे का भी सवाल है. हर अकाउंट को स्थायी रूप से एक सिम और पहचान से जोड़ देना अनॉनिमिटी को सीमित करता है. जर्नलिस्ट, व्हिसलब्लोअर्स और संवेदनशील वर्गों के लिए यह जोखिम भरा हो सकता है. हर यूज़र अपराधी नहीं होता, लेकिन सिम बाइंडिंग हर यूज़र को संदिग्ध मानकर सिस्टम डिजाइन करती है. यह सोच लोकतांत्रिक डिजिटल स्पेस के लिए खतरनाक हो सकती है. टेलिकॉम कंपनियां और पावर का बैलेंस यह भी संयोग नहीं है कि सिम बाइंडिंग को टेलिकॉम कंपनियों का समर्थन मिल रहा है. इससे नंबर-सेंट्रिक कंट्रोल मजबूत होता है और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर दबाव बढ़ता है.  सवाल यह है कि क्या यह फ्रॉड रोकने का प्रयास है या फिर डिजिटल इकोसिस्टम में … Read more

नया AI टोल सिस्टम क्या है? FASTag और GPS टोल से जानिए पूरा फर्क

 नई दिल्ली आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) अब टोल गेट पर भी एंट्री करने जा रहा है. अब भारत के हाइवे और टोल गेट पर टोल चार्जेस काटने का काम AI बेस्ड सिस्टम से होगा. केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने बुधवार को राज्यसभा में बताया है कि सेटेलाइट बेस्ड टोल कलेक्शन सिस्टम साल 2026 के अंत तक लागू हो जाएगा.  दरअसल, प्रश्नकाल के दौरान सवालों के जवाब देते हुए मंत्री ने कहा कि न्यू टोल बेस्ड सिस्टम टेक्नोलॉजी सेटेलाइट और AI बेस्ड होगा. इसके लिए कार या अन्य व्हीकल मालिक को टोल गेट पर रुकने की जरूरत नहीं होगी. वह 80 किलोमीटर की स्पीड से भी टोल गेट पार कर सकेंगे.  सरकारी रेवेन्यू को होगा फायदा  मंत्री ने कहा कि AI Toll सिस्टम से 1500 करोड़ रुपये के फ्यूल सेविंग होगी और सरकारी रेवेन्यू में 6,000 करोड़ शामिल होंगे. AI बेस्ड टोल कलेक्शन सिस्टम फास्टैग और जीपीएस बेस्ड टोल सिस्टम से अलग होगा.  AI टोल सिस्टम कैसे काम करेगा? AI बेस्ड टोल कलेक्शन सिस्टम, असल में MLFF (Multi-Lane Free Flow) सिस्टम है. इस सिस्टम के तहत हाइवे पर टोल बूथ नहीं होंगे. इसके लिए एक लोहे का स्ट्रक्चर तैयार होगा, जिसको गैन्ट्री कहा जाता है. गैन्ट्री पर हाई रेजोल्यूशन कैमरा और सेंसर होंगे, जो कार की नंबर प्लेट को डिटेक्ट करेंगे और एनालाइज करेंगे. यह सिस्टम एंट्री और एग्जीट दोनों पर होगा, इसके बाद टोल चार्ज वसूला जाएगा. यह पूरा काम ऑटोमैटिक होगा और कार को टोल टैक्स के लिए कहीं रोकने की जरूरत नहीं होगी.  AI बेस्ड टोल फास्टैग और GPS बेस्ड सिस्टम से कितना अलग है?  सर्विस का नाम               FASTag (मौजूदा)           GPS/GNSS (सैटेलाइट)               AI आधारित (MLFF) टेक्नोलॉजी                  RFID (रेडियो फ्रीक्वेंसी)          सैटेलाइट ट्रैकिंग                           कैमरा और AI विजन रुकने की जरूर             थोड़ा रुकना पड़ता है      नहीं रुकना पड़ेगा                               नहीं रुकना पड़ेगा  डिवाइस                        विंडशील्ड पर स्टिकर     व्हीकल में OBU (डिवाइस)                   सिर्फ नंबर प्लेट हो  टोल रेट                          फिक्स्ड रेट                     जितनी दूरी उतना चार्ज                    जितनी दूरी उतना चार्ज  बैरियर                        टोल गेट लगे होते हैं              गेट फ्री टेक्नोलॉजी                             गेट फ्री टेक्नोलॉजी  मौजूदा FASTag सिस्टम का क्या होगा?  मौजूदा टोल कलेक्शन सिस्टम FASTag बेस्ड है, जिसमें व्हीकल के विंड स्क्रीन पर एक रेडियो फ्रिक्वेंसी (RFID) टैग लगाना होता है. इस सिस्टम के तहत एक छोटी चिप होती है. यह स्टिकर चिप प्रीपेड वॉलेट या बैंक अकाउंट से लिंक होता है.  FASTag बेस्ड स्टिकर वाली कार जैसे ही टोल गेट पर पहुंचती है, गेट के ऊपर लगे सेंसर RFID चिप को डिटेक्ट करते हैं. इसके बाद गेट ओपन हो जाते हैं. हालांकि फास्टैग में बैलेंस माइनस में है तो वह ब्लैक लिस्ट हो जाता है. इसकी वजह से टोल गेट ओपन नहीं होता है. ऐसे में आपको टोल चार्ज कैश में पेमेंट करनी पड़ती है.  AI और GPS टोल अलग-अलग सिस्टम हैं.  GPS आधारित सिस्टम (GNSS) के लिए व्हीकल में एक विशेष ट्रैकिंग डिवाइस (OBU) की जरूरत होगी. वहीं, AI सिस्टम मुख्य रूप से बाहरी कैमरों और आपकी गाड़ी की मौजूदा नंबर प्लेट की मदद से काम करता है. यह AI सिस्टम उन गाड़ियों के लिए भी यूजफुल होगा, जिनके अंदर GPS नहीं लगा है. 

US–वेनेजुएला तनाव चरम पर, शिप अटैक में 4 लोगों की मौत, नेवी अलर्ट

  वाशिंगटन अमेरिका और वेनेजुएला के बीच तनाव उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है. अमेरिकी सेना ने कहा कि उसने पूर्वी प्रशांत महासागर में एक जहाज पर अपने ताजा हमले में चार लोगों को मार गिराया है. अमेरिका का दावा है कि बु पूर्वी प्रशांत महासागर में कथित ड्रग-ट्रैफिकिंग बोट पर हमला किया, जिसमें 4 लोग मारे गए. इस बीच वेनेजुएला ने अपनी नेवी को पोर्ट से पेट्रोलियम प्रोडक्ट ले जाने वाले जहाजों को एस्कॉर्ट करने का आदेश दिया है. इसके साथ ही दोनों देशों के बीच टकराव का खतरा बढ़ गया है. पूर्वी प्रशांत महासागर में हमले की जानकारी देते हुए अमेरिकी सेना ने कहा कि बुधवार को पूर्वी प्रशांत महासागर में ड्रग्स की तस्करी करने वाली एक और नाव पर हमला किया जिसमें 4 लोग मारे गए. अमेरिका सेना ने एक्स पर लिखा, "17 दिसंबर को पीट हेगसेथ के निर्देश पर, जॉइंट टास्क फोर्स सदर्न स्पीयर ने अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में एक नामित आतंकवादी संगठन द्वारा संचालित एक जहाज पर घातक हमला किया." साउथकॉम ने आगे कहा कि इस हमले में कोई भी अमेरिकी सैनिक घायल नहीं हुआ.   हमला इस हफ्ते का दूसरा हमला है, इससे पहले सोमवार को अमेरिका ने पूर्वी प्रशांत महासागर में ड्रग्स तस्करी करने वाली तीन नावों पर हमला किया था जिसमें 8 लोग मारे गए थे.  अमेरिका की यह कार्रवाई ट्रंप प्रशासन के "ऑपरेशन सदर्न स्पीयर" का हिस्सा है, जिसमें सितंबर 2025 से अब तक 26 नावों पर हमले हुए और कम से कम 99 लोग मारे गए.  इस बीच वेनेजुएला की सरकार ने तेल टैंकरों की पूर्ण नाकेबंदी की घोषणा के बाद अपने नेवी को तेल टैंकरों को एस्कॉर्ट करने को कहा है. बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला से तेल लेकर निकलने वाले जहाजों पर टोटल ब्लॉकेड का ऐलान किया है. इससे वेनेजुएला के तेल टैंकरों की आवाजाही लगभग ठप हो जाएगी. लेकिन ट्रंप के फैसले के खिलाफ वेनेजुएला ने अपनी नेवी को ऑयल टैंकरों को एस्कॉर्ट करने को कह दिया है.   इससे पहले  ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की सरकार को एक विदेशी आतंकवादी संगठन (FTO) घोषित किया गया है, जो ड्रग्स तस्करी और मानव तस्करी में भी शामिल था. वेनेजुएला ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से देश के खिलाफ अमेरिका की लगातार आक्रामकता पर चर्चा करने के लिए बैठक करने का अनुरोध किया है. संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने दोनों देशों के बीच तनाव को तुरंत कम करने का आह्वान किया और दोनों देशों से अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपने दायित्वों का सम्मान करने के लिए कहा है.

महामारी की तैयारी पर ICMR DG का जोर, देश को सतर्क रहने की सलाह

नई दिल्ली इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के डायरेक्टर जनरल डॉ. राजीव बहल ने भविष्य की महामारियों (Pandemic) से निपटने के लिए सतर्क रहने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि इसके लिए वन हेल्थ अप्रोच अपनाना बेहद जरूरी है। उनका कहना था कि इंसानों, जानवरों और पर्यावरण तीनों की सेहत पर एक साथ ध्यान देना होगा, क्योंकि केवल इंसानों पर ध्यान देने से महामारी को रोकना पर्याप्त नहीं है। महामारियों के पीछे वायरस और जानवर डॉ. राजीव बहल ने न्यूज़ एजेंसी आईएएनएस को बताया कि पिछले 100 साल में ज्यादातर महामारियां वायरस और जानवरों से फैलने वाली बीमारियों के कारण हुई हैं। उन्होंने कोविड-19 महामारी का उदाहरण देते हुए बताया कि पांच साल पहले आई इस वैश्विक महामारी की उत्पत्ति भी जानवरों से ही हुई थी। डॉ. बहल ने वैज्ञानिकों, इंडस्ट्री और बड़े संस्थानों से अपील की कि वे लगातार बीमारियों पर नजर रखें और उनकी दवाइयों और वैक्सीन की तैयारी बनाए रखें। ICMR NIV ने आयोजित किया VIROCON 2025 सम्मेलन डॉ. राजीव बहल ने ये बातें पुणे में आयोजित VIROCON 2025 नामक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान कही। यह सम्मेलन ICMR-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV) पुणे द्वारा आयोजित किया गया था। तीन दिन चले इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में अमेरिका, कनाडा, थाईलैंड और भारत सहित कई देशों से 650 से अधिक विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। सम्मेलन में भारत के प्रमुख संस्थानों जैसे IISc, IITs, IISERs के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। सम्मेलन की थीम और चर्चा सम्मेलन की मुख्य थीम थी: “इंसानों, जानवरों और पौधों के वायरस में बदलते हालात और कैसे बेसिक साइंस, इनोवेशन और पब्लिक हेल्थ को जोड़ा जाए।” इस दौरान विशेषज्ञों ने वन हेल्थ अप्रोच और भविष्य की महामारियों के लिए तैयार रहने के उपायों पर विस्तार से चर्चा की। इसमें शामिल था कि दवाइयां और वैक्सीन कैसे तैयार रखी जाएं, वायरस की बेसिक साइंस यानी फंडामेंटल वायरोलॉजी पर किस तरह रिसर्च बढ़ाई जाए और पब्लिक हेल्थ सिस्टम को मजबूत कैसे किया जाए।

ललित मोदी की आलीशान प्री-बर्थडे पार्टी पर सोशल मीडिया पर ट्रोल, विजय माल्या शामिल

लंदन इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के पूर्व चेयरमैन ललित मोदी ने लंदन में भगोड़ा व्यवसायी विजय माल्या के लिए एक ग्लैमरस प्री-बर्थडे सेलिब्रेशन का आयोजन किया. यह पार्टी बेलग्रेव स्क्वायर स्थित ललित मोदी के आलीशान आवास पर हुई, जिसमें कई बड़े नाम शामिल हुए. इस खास मौके पर बायोकॉन की संस्थापक किरण मजूमदार-शॉ, अभिनेता इदरीस एल्बा और फेशन डिजाइनर मनोविराज खोसला जैसे सेलिब्रिटीज मौजूद थे. पार्टी की तस्वीरों में किरण मजूमदार-शॉ को मनोविराज खोसला के साथ पोज़ देते और इदरीस एल्बा के साथ बातचीत करते देखा जा सकता है. मशहूर फोटोग्राफर जिम राइडेल ने भी इस आयोजन की तस्वीरें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा कीं और ललित मोदी को विजय माल्या के लिए "एक शानदार प्री-70वें जन्मदिन की पार्टी" आयोजित करने के लिए धन्यवाद दिया. ललित मोदी ने भी अपनी पोस्ट में पार्टी में आए सभी मेहमानों को धन्यवाद दिया और विजय माल्या को अपना दोस्त बताते हुए उनकी तारीफ की. इस पार्टी का निमंत्रण कार्ड भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें माल्या को "किंग ऑफ गुड टाइम्स" कहा गया और एक कार्टून चित्र भी था. हालांकि, इस आलीशान पार्टी की तस्वीरों को सोशल मीडिया पर भारी आलोचना का सामना करना पड़ा. कई यूजर्स ने दोनों मोदी और माल्या को निशाना बनाते हुए कहा कि ये लोग सालों तक भारतीय अधिकारियों से बचते हुए इतना आनंद कैसे मना सकते हैं. कुछ ने मजाकिया टिप्पणियों के साथ केंद्र सरकार पर भी तंज कसा. विजय माल्या मार्च 2016 में भारत छोड़कर ब्रिटेन चले गए थे, जहां वे बैंक लोन धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों का सामना कर रहे हैं. वहीं लालित मोदी 2010 में वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के बाद भारत छोड़ चुके हैं. यह पार्टी फिर से इन दोनों विवादास्पद हस्तियों को सुर्खियों में ला दी है, जहां सरकार और जनता के बीच सवाल खड़े हो रहे हैं कि वे अपनी आज़ादी की जश्न मनाते हुए भारत की न्याय व्यवस्था का अपमान कैसे कर सकते हैं.

हिंदू धर्म मानव धर्म है, हर पंथ को अपनाने की आज़ादी: दत्तात्रेय होसबाले

गोरखपुर गोरखपुर में आयोजित हिंदू सम्मेलन के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले के बयान को लेकर चर्चा तेज हो गई है. खोराबार के मालवीय नगर में संबोधन के दौरान उन्होंने हिंदू धर्म को मानव धर्म बताते हुए कहा कि भारत में हर व्यक्ति अपने-अपने पंथ का पालन कर सकता है. 'हिंदू धर्म का अर्थ मानव धर्म' दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि जब हम हिंदू धर्म कहते हैं तो उसका अर्थ मानव धर्म होता है. दुनिया के किसी भी देश के लोग यहां आकर अपने विश्वास और परंपराओं के अनुसार जीवन जी सकते हैं. उन्होंने कहा कि अगर नमाज पढ़ने वाले हमारे मुस्लिम भाई पर्यावरण की दृष्टि से नदी की पूजा कर लें तो इसमें क्या बिगड़ जाता है.  गोरखपुर के खोराबार स्थित खेल मैदान में बोलते हुए उन्‍होंने अपनी बात के समर्थन में सऊदी अरब और रुस का उदाहरण दिया। उन्‍होंने कहा, सऊदी अरब में मुसलमान भाइयों ने जमीन देकर मंदिर बनवाया है। रूस में चर्च के लोगों ने मंदिर बनवाने के लिए जगह दी है। अब हमको भी भारत में यह समझाना होगा। होसबाले ने कहा, अंग्रेजों ने यहां फूट डालो, राज करो की राजनीति की। लेकिन अब हमारे एकजुट होने का समय आ गया है। हिंदू जागेगा तो विश्व जागेगा। मानव का विश्वास जागेगा। हमें बच्चों को हनुमान चालीसा, गीता सिखाने की जरूरत है। उन्‍होंने कहा, हम कहते हैं कि हम लोगों को विश्व गुरु बनना है। लेकिन अगर हम ही गिरे हुए हैं तो हम दूसरे गिरे हुए आदमी को कैसे खड़ा करेंगे? हम जब खड़े होते हैं, तभी हम गिरे हुए आदमी को उठा सकते हैं। इस सम्मेलन में गोरखपुर और आसपास के जिलों से करीब 5 हजार लोग पहुंचे थे। ‘सूर्य नमस्कार से मुस्लिमों को क्या दिक्कत?’ योग और सूर्य नमस्कार का जिक्र करते हुए दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि इसे संकीर्ण धार्मिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा, ‘सूर्य नमस्कार एक वैज्ञानिक और स्वास्थ्य-उन्मुख अभ्यास है. इससे किसी को कोई नुकसान नहीं होता है, और इसे करने से कुछ भी नहीं खोता है. सूर्य नमस्कार से मुस्लिमों का क्या बिगड़ जाएगा? नमाज पढ़ने वाले प्राणायाम करेंगे तो गलत है क्या? नहीं है. हम ये नहीं कहेंगे कि तुम ये करो तो वो पूजा छोड़ दो, नमाज़ छोड़ दो. ये तो हम नहीं कहेंगे.’ दत्तात्रेय होसबाले के बयान को प्वाइंटर्स में समझिए     नमाज़ पढ़ने वाले मुस्लिम बंधु पर्यावरण की दृष्टि से नदी की पूजा करें तो क्या गलत है.     नमाज पढ़ने वाले मुस्लिम लोग सूर्य नमस्कार करें तो क्या गलत है.     नमाज पढ़ने वाले प्राणायाम करेंगे तो गलत है क्या? नहीं है.     हम ये नहीं कहेंगे कि तुम ये करो तो वो पूजा छोड़ दो, नमाज़ छोड़ दो. ये तो हम नहीं कहेंगे ‘राष्ट्र निर्माण केवल चरित्र निर्माण से ही संभव’ सांस्कृतिक एकता पर जोर देते हुए दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि भारतीय संस्कृति धार्मिक सीमाओं से परे सह-अस्तित्व और प्रकृति के प्रति सम्मान को बढ़ावा देती है. उन्होंने जोर देकर कहा कि आरएसएस समाज के सभी वर्गों के बीच आपसी सम्मान और सद्भाव में विश्वास करता है. ‘हिंदू-हिंदुत्व’, ‘राष्ट्र-राष्ट्रीयता’, और ‘भारत-भारतीयता’ जैसे विषयों पर बोलते हुए दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि राष्ट्र निर्माण केवल चरित्र निर्माण से ही संभव है. ‘पूजा के तरीके अलग पर धर्म एक है’ दत्तात्रेय होसबाले ने कहा, ‘भारतीय सांस्कृतिक जड़ें एक हैं. पूजा के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन धर्म एक है- सनातन. धर्म जीवन जीने की कला है.’ उन्होंने कहा कि सनातन धर्म के अनुयायियों की जिम्मेदारी है कि वे न केवल अपने लिए बल्कि दुनिया भर में मानवता के कल्याण के लिए मानवीय मूल्यों को बनाए रखें. उन्होंने कहा, ‘हमारे पूर्वजों ने हिंदू धर्म को मानव धर्म बताया है. किसी भी देश के लोग इसका पालन कर सकते हैं. 21 जून को दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का उत्सव इसका एक स्पष्ट उदाहरण है.’ 'कोई सूर्य नमस्कार करता है तो इसमें गलत क्या' होसबाले ने कहा कि अगर कोई सूर्य नमस्कार करता है या प्राणायाम करता है तो इसमें गलत क्या है. उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ किसी से यह नहीं कहता कि वह अपनी पूजा, नमाज या धार्मिक परंपराएं छोड़ दे. संघ का कहना सिर्फ इतना है कि मानव धर्म और हिंदू धर्म को समझा जाए.  उन्होंने कहा कि यही वह हिंदू धर्म है, जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने हजारों वर्षों तक संघर्ष किया और तमाम आक्रांताओं के सामने भी टिके रहे. इस हिंदू सम्मेलन में बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे.