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धामी सरकार का विजन 2035: इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश और आत्मनिर्भर उत्तराखंड पर फोकस

उत्तराखंड उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मुख्यमंत्री के तौर पर अपने कार्यकाल के 5 साल पूरे कर लिए हैं. इस ऐतिहासिक मील के पत्थर पर उन्होंने राज्य के लिए एक बड़ा विजन सामने रखा है. मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि उनकी सरकार का लक्ष्य साल 2035 तक उत्तराखंड को पूरी तरह से एक विकसित और आत्मनिर्भर राज्य बनाना है. मुख्यमंत्री ने कहा कि पांच साल पहले उन्हें देवभूमि की सेवा का मौका मिला था. तब से उनकी सरकार का सफर जनसेवा, सुशासन और समर्पण के सिद्धांतों पर ही आगे बढ़ रहा है. सीएम धामी ने बताया कि उत्तराखंड को डेवेलप करने के लिए बुनियादी ढांचे, निवेश और चौमुखी विकास पर खास ध्यान दिया जा रहा है. इस खास मौके पर मुख्यमंत्री ने ऋषिकेश में एक विशेष कार्यक्रम की शुरुआत की. इस कार्यक्रम का नाम 'सेवा, सुशासन और समर्पण: जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार' रखा गया है. सीएम धामी ने बनाए कई रिकॉर्ड पुष्कर सिंह धामी ने पहली बार 4 जुलाई 2021 को उत्तराखंड के 10वें मुख्यमंत्री के रूप में कमान संभाली थी. वो राज्य के इतिहास में पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले दूसरे मुख्यमंत्री बन गए हैं. उनसे पहले सिर्फ कांग्रेस के नारायण दत्त तिवारी (2002-07) ही अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा कर पाए थे. इसके साथ ही धामी ने एक और बड़ा रिकॉर्ड अपने नाम किया है. वो उत्तराखंड में बीजेपी के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले मुख्यमंत्री बन गए हैं. इससे पहले बीजेपी का कोई भी मुख्यमंत्री राज्य में पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सका था. धामी साल 2021 में तीरथ सिंह रावत के इस्तीफे के बाद मुख्यमंत्री बने थे. इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बीजेपी को दोबारा शानदार जीत दिलाई और दोबारा मुख्यमंत्री बने. हमारा लक्ष्य सिर्फ कार्यकाल पूरा करना नहीं: मुख्यमंत्री इस खास मौके पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य की जनता का आभार जताया. उन्होंने कहा, 'ये मील का पत्थर सिर्फ उत्सव मनाने का मौका नहीं है. ये उत्तराखंड को देश का बेस्ट स्टेट बनाने के हमारे अटूट संकल्प को और मजबूत करने का क्षण है. हमारा टारगेट सिर्फ सरकार का कार्यकाल पूरा करना नहीं है, बल्कि हमारा मकसद एक आत्मनिर्भर उत्तराखंड बनाना है. हम साल 2035 तक उत्तराखंड को एक पूर्ण विकसित राज्य में बदलने के लक्ष्य के साथ काम कर रहे हैं.' इस बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिए मुख्यमंत्री ने बताया कि सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर, एजुकेशन, हेल्थ, पीने के पानी, सड़कें, कृषि, टूरिज्म, इंडस्ट्री, इन्वेस्टमेंट, स्वरोजगार और सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास पर जोर दे रही है. उत्तराखंड को विकास योजनाओं की सौगात मुख्यमंत्री धामी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सहयोग और मार्गदर्शन के लिए उनका धन्यवाद किया. उन्होंने कहा कि जनता का प्यार और आशीर्वाद ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है. सीएम धामी ने गर्व जताते हुए कहा कि उनकी सरकार ने राजनीति से ऊपर उठकर कई ऐसे ऐतिहासिक फैसले लिए, जिन्हें लेने का साहस पिछली सरकारें नहीं दिखा पाईं. उन्होंने समान नागरिक संहिता (UCC) को लागू करने, मदरसा बोर्ड को खत्म करने, उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की स्थापना की नींव रखने और देश के सबसे सख्त धर्मांतरण विरोधी और नकल विरोधी कानूनों को बनाने का जिक्र किया. सीएम धामी ने इस मौके को और यादगार बनाते हुए राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने देहरादून जिले के लिए 219 करोड़ रुपये से ज्यादा की 51 विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास भी किया.

शहरी आसमान में ड्रोन क्रांति: दवाइयों से पार्सल तक तेज और सस्ती डिलीवरी

नई दिल्ली  भारत के शहरी आसमान में अब ड्रोन सिर्फ एक तकनीकी अजूबा नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक्स का एक विश्वसनीय हिस्सा बन चुके हैं। भारत के शहरी क्षेत्रों में ड्रोन पहले से ही दवाइयां, निदान उपकरण, पार्सल और ई-कॉमर्स शिपमेंट पहुंचा रहे हैं। सरकार के ड्रोन नियम 2021, पीएलआई (PLI) योजना और 'डिजिटल स्काई प्लेटफॉर्म' जैसे कदमों ने इस तकनीक को प्रयोगशाला से निकालकर सीधे कमर्शियल मार्केट में उतार दिया है। लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञों के अनुसार, भारत का क्विक-कॉमर्स (10 मिनट डिलीवरी) बाजार 10 अरब डॉलर को पार कर चुका है। ऐसे में जमीनी ट्रैफिक और डिलीवरी ड्राइवरों के बढ़ते खर्च (ईंधन, रखरखाव, कमीशन) से निपटने के लिए ड्रोन एक गेम-चेंजर साबित हो रहे हैं। दरअसल, ड्रोन को खराब सड़कों या ट्रैफिक की परवाह नहीं होती, इससे डिलीवरी लागत काफी कम हो जाती है। इसका सबसे बड़ा फायदा टियर-2 शहरों और ग्रामीण भारत को मिल रहा है, जहां बुनियादी ढांचे की कमी के कारण दवाइयां और जरूरी सामान समय पर नहीं पहुंच पाते थे। क्या खतरे में है डिलीवरी राइडर्स की नौकरी? विशेषज्ञों के अनुसार, ड्रोन फिलहाल इंसानी कामगारों की जगह नहीं ले सकते। भारत के ई-कॉमर्स सेक्टर को संभालने वाले लाखों गिग वर्कर्स केवल पैकेज नहीं पहुंचाते, वे पते का सत्यापन करते हैं, कैश-ऑन-डिलीवरी संभालते हैं और ग्राहकों की समस्याओं का तुरंत समाधान करते हैं। ड्रोन के आने से एविएशन सेक्टर में नए रोजगार भी पैदा हो रहे हैं, इससे रिमोट पायलट, मेंटेनेंस इंजीनियर और सॉफ्टवेयर डेवलपर। निष्कर्ष यह है कि ड्रोन मानव श्रम को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उसके पूरक बनेंगे। कुल मिलाकर भारत में ड्रोन डिलीवरी का चलन तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह अंतिम मील तक सामान पहुंचाने वाले राइडर की जगह ले सकता है? क्या इससे लाखों डिलीवरी कर्मचारियों की नौकरी जा सकती है। इसका जवाब है नहीं, क्योंकि ड्रोन के प्रचलन में आ जाने से सिर्फ आपके नियमित मेडिकल सप्लाई और गोदामों में सामान का ट्रांसफर ही इससे होगा। जबकि आपके दरवाजे तक सामान पहुंचाने का जिम्मा अभी भी डिलीवरी राइडर्स के पास ही रहेगा। उद्योग के हालिया अनुमानों के अनुसार, भारत का लॉजिस्टिक्स बाजार 2033 तक लगभग दोगुना हो सकता है, जिसमें ड्रोन डिलीवरी विशेष अंतिम-मील संचालन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनने की उम्मीद है। एडजिस्टिफाई के सह-संस्थापक और सीईओ उमंग शुक्ला के अनुसार, सबसे बड़ा बदलाव यह है कि ड्रोन डिलीवरी को अब प्रयोग के रूप में नहीं देखा जा रहा है। उन्होंने कहा, "भारत में ड्रोन डिलीवरी अब जिज्ञासा का विषय नहीं रह गई है, बल्कि लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में एक विश्वसनीय हिस्सा बन गई है।" शुक्ला ने बताया कि नियामकों ने पहले ही चुनिंदा बीवीएलओएस कॉरिडोर को मंजूरी दे दी है, जबकि वाणिज्यिक ऑपरेटर अलग-थलग प्रदर्शनों के बजाय सार्थक पैमाने पर स्वायत्त डिलीवरी चला रहे हैं।

दिल्ली से तमिलनाडु तक मौसम बिगड़ा: कई राज्यों में आंधी-तूफान और बारिश का खतरा

नई दिल्ली दिल्ली से लेकर तमिलनाडु तक बारिश का सिलसिला शुरू हो गया है। इस बीच मौसम विभाग ने 15 राज्यों में अगले 10 घंटे के अंदर भीषण बारिश, आंधी और तूफान का अलर्ट जारी किया है। इन राज्यों में बारिश के दौरान तेज हवाएं भी चल सकती हैं, जिसकी रफ्तार 60 किलोमीटर प्रति घंटे तक रह सकती है। इसलिए लोगों से अलर्ट रहने के लिए कहा गया है। इन हवाओं से किसानों की फसलों को भी नुकसान पहुंच सकता है। आइए बताते हैं कि किन 15 राज्यों के लिए मौसम विभाग ने अलर्ट जारी किया है। इन 15 राज्यों में अलर्ट     दिल्ली     उत्तर प्रदेश     बिहार     राजस्थान     महाराष्ट्र     मध्य प्रदेश     पश्चिम बंगाल     तमिलनाडु     हिमाचल प्रदेश     उत्तराखंड     झारखंड     छत्तीसगढ़     ओडिशा     असम     त्रिपुरा दिल्ली-एनसीआर में कल कैसा रहेगा मौसम     दिल्ली-NCR (6 जुलाई- भारी बारिश का अलर्ट): सिविल लाइंस, दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) कैंपस क्षेत्र, कमला नगर , मुखर्जी नगर, मॉडल टाउन, आजादपुर , सदर बाजार, कश्मीरी गेट सहित पूरे उत्तरी दिल्ली और ग्रेटर कैलाश, वसंत कुंज, वसंत विहार, डिफेंस कॉलोनी, हौज खास, पंचशील पार्क, आनंद लोक सहित दक्षिणी दिल्ली के कई इलाकों में कल यानी 6 जुलाई को बारिश और आंधी तूफान का अलर्ट है। इसके साथ ही लक्ष्मी नगर, पटपड़गंज, मयूर विहार, प्रीत विहार, आनंद विहार, कृष्णा नगर, गांधी नगर, शाहदरा, सीलमपुर, त्रिलोकपुरी, कोंडली, मंडावली, पांडव नगर, वसुंधरा एन्क्लेव और दिलशाद गार्डन सहित पूर्वी दिल्ली में भी झमाझम की चेतावनी है। इस दौरान 40 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से हवाएं चल सकती हैं। दिल्ली में कल अधिकतम तापमान 37 डिग्री तो वहीं न्यूनतम तापमान 29 डिग्री सेल्सियस रह सकता है। उत्तर प्रदेश में कल कैसा रहेगा     यूपी (6 जुलाई- तेज हवाएं, बारिश): देवरिया, मऊ, बलिया, गाजीपुर, चंदौली, बरेली, पीलीभीत, बहराइच और श्रावस्ती में भारी बारिश की चेतावनी है। मौसम विभाग ने बिजनौर, मेरठ, अमरोहा, हापुड़, मोरादाबाद, अलीगढ़, मथुरा, आगरा, इटावा, ओरैया, कन्नौज, हरदोई, उन्नाव, कानपुर में भी भीषण बारिश को लेकर अलर्ट जारी किया है। इन जिलों में 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवा चल सकती है। इसके साथ ही गौतमबुद्ध नगर, शामली, शाहजहांपुर, सीतापुर, लखनऊ, बाराबंकी, रायबरेली, अमेठी, सुल्तानपुर, आजमगढ़, जौनपुर, कौशांबी सहित यूपी के कई जिलों में हल्की बारिश का अलर्ट है। राजधानी लखनऊ में कल अधिकतम तापमान 36 डिग्री सेल्सियस तो वहीं न्यूनतम तापमान 30 डिग्री सेल्सियस रहने का अनुमान है। बिहार में कल कैसा रहेगा मौसम     बिहार (6 जुलाई- रेड अलर्ट जारी): गया, नालंदा, शेखपुरा, नवादा, जहानाबाद, रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, गया, बांका, जमुई, लखीसराय, अरवल में भारी बारिश का अलर्ट है। वहीं, पटना, बक्सर, भोजपुर, बेगुसराय, सहरसा, मुंगेर, भागलपुर, मधेपुरा, कटिहार, पूर्णिया, सुपौल, अररिया, किशनगंज में भी हल्की बारिश की चेतावनी है। इस दौरान तेज हवाएं भी चल सकती हैं। राजधानी पटना में कल अधिकतम तापमान 32 डिग्री सेल्सियस तो वहीं न्यूनतम तापमान 28 डिग्री सेल्सियस के आसपास रह सकता है। महाराष्ट्र में कल कैसा रहेगा मौसम     महाराष्ट्र (6 जुलाई- रेड अलर्ट जारी): एक तरफ मुंबई के अंधेरी, मरीन ड्राइव, वसई-विरार, विवा कॉलेज रोड, आचोले रोड, सेंट्रल पार्क, विजय नगर–नागिनदास पाड़ा, गाला नगर, तुलिंज ब्रिज के आसपास भारी बारिश का अलर्ट है तो वहीं महाराष्ट्र के दूसरे जिले सतारा, रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग, कोल्हापुर, पुणे, अहमदनगर, ठाणे, पालघर, रायगढ़, भिवंडी, नागपुर, भंडारा-गोंदिया, चंदरपुर, गढ़चिरौली में भी बारिश का रेड अलर्ट जारी किया गया है। इस दौरान 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चल सकती हैं। मुंबई में कल अधिकतम और न्यूनतमा तापमान 27 डिग्री सेल्सियस रहेगा। राजस्थान में कल कैसा रहेगा मौसम     राजस्थान (6 से 11 जुलाई- आंधी-बारिश तूफान): अगले 5 से 7 दिनों तक जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर, श्री गंगानगर में भारी बारिश और आंधी-तूफान का अलर्ट है। वही, जयपुर, भरतपुर, कोटा, उदयपुर, अजमेर, झुंझुनूं, चुरू, हनुमानगढ़, अलवर, भरतपुर, दौसा, धोलपुर, सवाईं माधोपुर, टोंक, भीलवाड़ा, बूंदी, झालावाड़, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, सिरोही में भी जमकर बारिश होगी। इन जिलों में 41 से 61 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से हवाएं चल सकती हैं। राजधानी जयपुर में कल अधिकतम तापमान 36 डिग्री तो वहीं न्यूनतम तापमान 28 डिग्री सेल्सियस रह सकता है। मध्य प्रदेश में कल कैसा रहेगा मौसम     मध्य प्रदेश (6 से 10 जुलाई- भारी बारिश की संभावना): धार, झाबुआ, खंडवा, खरगोन, बड़वानी, अलीराजपुर, बुरहानपुर में भारी बारिश के साथ आंधी-तूफान का अलर्ट है। वहीं, भोपाल, विदिशा, रायसेन, मंदसौर, नीमच, राजगढ़, गुना, नरसिंहपुर, सागर, अशोकनगर, शिवपुरी, ग्वालियर, भिंड, मुरैना, दतिया, जबलपुर, मंडला, छिंदवाड़ा, सिवनी, डिंडोरी, दमोह, पन्ना, रीवा, सतना में भी झमाझम की चेतावनी है। इन जिलों में 41 से 61 किलोमीटर की रफ्तार से हवाएं चल सकती हैं। राजधानी भोपाल में अधिकतम तापमान 30 डिग्री तो वहीं, न्यूनतम तापमान 25 डिग्री सेल्सियस रह सकता है। पश्चिम बंगाल में कल कैसा रहेगा मौसम     पश्चिम बंगाल (6 जुलाई- हल्की बारिश होगी): कोलकाता, हावड़ा, हुगली, उत्तर 24 परगना, पूर्व और पश्चिम बर्दवान दक्षिण 24 परगना, पूर्वी मेदिनीपुर, पश्चिम मेदिनीपुर, मालदा, झाड़ग्राम, बांकुरा, पुरुलिया, दार्जिलिंग, कलिम्पोंग, जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार,कूच-बिहार, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, मुर्शिदाबाद, बीरभूम, नादिया, पूर्वी बर्धमान, पश्चिमी बर्धमान और हुगली में हल्की बारिश को लेकर अलर्ट जारी किया गया है। कोलकाता में कल न्यूनतम तापमान 28 और अधिकतम तापमान 30 डिग्री रहने का अनुमान है। तमिलनाडु में कल कैसा रहेगा मौसम     तमिलनाडु (6 से 10 जुलाई- भारी बारिश के आसार): तमिलनाडु, पुडुचेरी और कराईकल में अगले छह दिनों तक बारिश होने की संभावना है। मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने अपने ताजा मौसम बुलेटिन में कहा है कि 10 जुलाई तक राज्य के कई हिस्सों में अलग-अलग स्थानों पर मध्यम बारिश हो सकती है। चेन्नई के लिए मौसम विभाग ने आंशिक रूप से बादल छाए रहने और शहर के कुछ हिस्सों में हल्की बारिश की संभावना जताई है। कल चेन्नई का अधिकतम तापमान 37 डिग्री तो वहीं न्यूनतम तापमान 29 डिग्री सेल्सियस के आसपास रह सकता है।

हिंद महासागर तक निगरानी बढ़ी: चीन का नया रडार बना भारत के लिए रणनीतिक चिंता

नई दिल्ली भारत और चीन के बीच तनाव के बीच चीन ने म्यांमार सीमा से लगे अपने यूनान प्रांत में लार्ज फेस्ड एरे रडार (LPAR) चालू कर दिया है. इस रडार की रेंज 5,000 किलोमीटर से ज्यादा है. दावा है कि यह भारत के मिसाइल टेस्टों  को ट्रैक करने और हिंद महासागर के बड़े हिस्से पर नजर रखने में सक्षम है. ऐसे में इसे भारत की सुरक्षा के लिहाज से अहम माना जा रहा है. चीन पिछले कुछ वर्षों से अपनी निगरानी व्यवस्था लगातार मजबूत कर रहा है. इसी कड़ी में यूनान में लगाया गया यह नया LPAR रडार भी अहम माना जा रहा है. यह रडार दूर से ही बैलिस्टिक मिसाइल का पता लगा सकता है, उसकी उड़ान पर नजर रख सकता है और उसकी जानकारी जुटा सकता है. इसकी रेंज 5,000 किलोमीटर से ज्यादा है. चीन भारत के पूर्वी हिस्से, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर के बड़े इलाके पर नजर रख सकता है. यह रडार ओडिशा के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से होने वाले मिसाइल टेस्टों को भी ट्रैक कर सकता है. भारत यहीं से अग्नि-5, K-4 और दूसरी आधुनिक मिसाइलों का टेस्ट करता है. अगर किसी देश को इन मिसाइलों की उड़ान और दूसरी तकनीकी जानकारी मिल जाए, तो वह अपनी रक्षा तैयारियों को उसी हिसाब से मजबूत कर सकता है. भारत के लिए चिंता की बात क्यों है? रक्षा एक्सपर्ट्स का कहना है कि मिसाइल टेस्ट के दौरान मिलने वाला डेटा किसी भी देश के लिए काफी अहम होता है. इससे मिसाइल की क्षमता का अंदाजा लगाया जा सकता है और उसके खिलाफ नई रक्षा सिस्टम तैयार करने में मदद मिल सकती है. यही वजह है कि चीन के इस नए रडार को भारत के लिए एक नई रणनीतिक चुनौती माना जा रहा है. हिंद महासागर पर भी रख सकेगा नजर यूनान में इस रडार की लोकेशन ऐसी है कि चीन बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर के बड़े हिस्से की निगरानी भी कर सकता है. हिंद महासागर भारत के लिए बेहद अहम है. यहां भारतीय नौसेना की मजबूत मौजूदगी है. दुनिया के कई बड़े समुद्री व्यापार मार्ग भी यहीं से गुजरते हैं. ऐसे में इस इलाके में चीन की बढ़ती निगरानी भारत की चिंता बढ़ा सकती है. चीन का निगरानी नेटवर्क और मजबूत हुआ चीन के पास पहले से ही शिनजियांग और कोरला में ऐसे लंबी दूरी के रडार मौजूद हैं. अब यूनान में नया LPAR रडार चालू होने के बाद उसकी निगरानी क्षमता और बढ़ गई है. हालांकि, इस तैनाती पर भारत और चीन, दोनों की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है. लेकिन रक्षा मामलों के जानकार मानते हैं कि आने वाले समय में भारत को अपनी एंटी-सर्विलांस तकनीक और रक्षा तैयारियों को और मजबूत करना पड़ सकता है.

रहस्यमयी I-52 सबमरीन की कहानी, 50 साल बाद मिला मलबा लेकिन खजाना अब भी रहस्य

टोक्यो  साल 1944 की गर्मियों में एक पनडुब्बी अटलांटिक महासागर में उतरी और फिर किसी जादुई कहानी की तरह गायब हो गई। इसके बाद कई दशक तक इसके सही ठिकाने का पता नहीं चल पाया। I-52 नाम की इस जापानी पनडुब्बी I-52 में क्रू के अलावा जर्मनी भेजा जा रहा सोना, दूसरे सामान और मेडिकल सप्लाई थी। इसमें दो टन सोना लदे होने का अनुमान था। ऐसे में इसे गोल्ड सबमरीन कहा गया। आखिरकार खोजकर्ता 1995 में समुद्र के 3 मील नीचे उस जगह पहुंचे, जहां इसका मलबा था। खोजकर्ताओं ने देखा कि 50 साल से ज्यादा समय बाद पनडुब्बी का ज्यादातर हिस्सा सीधा खड़ा था। इससे दूसरे विश्व युद्ध की सबसे अनोखी समुद्री कहानियों में से एक सुरक्षित रही और अंदर मौजूद खजाने के बारे में बिना जवाब वाले सवाल पीछे छूट गए। हालांकि यह अभी एक रहस्य बना हुआ है कि क्या कीमती सोना आज भी इस मबले के भीतर है या नहीं। I-52 कैसे जापान की कीमती पनडुब्बी द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, 1944 तक जापान और जर्मनी के बीच व्यापारिक जहाजों का आना-जाना बहुत मुश्किल हो गया था। दूसरे विश्व युद्ध में मित्र देशों की नौसेना के दबदबे की वजह से सतह पर चलने वाले जहाजों के यूरोप पहुंचने से पहले पकड़े जाने का खतरा था। ऐसे में दोनों देश लंबी दूरी तक जाने वाली पनडुब्बियों पर निर्भर हुए, जो हजारों मील के खतरनाक पानी में कीमती सामान ले जाती थीं। I-52 को बड़ी ट्रांसपोर्ट पनडुब्बी के तौर पर बनाया गया था। यह गायब होने से पहले जापान से निकली और अपना सामान लोड करने के लिए सिंगापुर रुकी। सामान में टिन, टंगस्टन और मोलिब्डेनम जैसी धातुएं, प्राकृतिक रबर, कुनैन और अफीम शामिल थे, जिनका इस्तेमाल सेना के लिए किया जाना था। इसके सबसे कीमती सामान में करीब दो टन सोना था, जिसे 146 बार (ईंटों) में पैक किया गया था। वे मैसेज जिनसे I-52 का पता चला I-52 सबमरीन काअटलांटिक में घुसने से पहले ही ब्रिटिश और अमेरिकी कोडब्रेकर्स जर्मन और जापानी नेवल कम्युनिकेशन को पढ़ने में कामयाब रहे थे। उनको पता चल गया कि I-52 के जर्मन सबमरीन U-530 से कहां मिलेगी और ट्रांसफर कब होगा। 23 जून 1944 की देर शाम I-52 अटलांटिक के बीच में U-530 से मिलने के लिए सतह पर आई इसी दौरान बोग के एयरक्राफ्ट ऊपर पहुंच गए। इसके बाद जापानी सबमरीन पर भीषण हमला हुआ। अगले दिन तक अमेरिकी जहाजों को समुद्र में तैरता हुआ मलबा और बड़ी मात्रा में रबर मिला, जिससे पुष्टि हुई कि सबमरीन नष्ट हो गई थी। U-530 बिना पकड़े गए बच निकला। I-52 पर सवार सभी 109 लोग मारे गए। पनडुब्बी पर बना रहा रहस्य युद्ध के समय यह तो पक्का था कि पनडुब्बी डूब गई है लेकिन किसी को ठीक-ठीक नहीं पता था कि वह कहां है। हमला रात में, खराब मौसम में और किसी भी तट से बहुत दूर हुआ था, जिससे ये पनडुब्बी दुनिया की नजरों से गायब रही। दशकों तक इसे खोजने की कोशिश हुई और आखिर में 2 मई 1995 को पाया गया कि समुद्र की सतह से 17,000 फीट से ज्यादा नीचे समुद्र तल पर सीधी खड़ी एक बड़ी पनडुब्बी का मलबा है। एक रिमोट से चलने वाले कैमरे को मलबे के ऊपर ले जाया गया, जिसने पिछले हिस्से (स्टर्न) के आस-पास की ऐसी डिटेल्स रिकॉर्ड कीं जो जापानी टाइप C3 ट्रांसपोर्ट पनडुब्बियों के खास डिजाइन से मेल खाती थीं। जहाज की हालत ने जांचकर्ताओं को हैरान कर दिया। टॉरपीडो से हुए नुकसान से ढांचा धीरे-धीरे पानी से भरा। इससे उसका बड़ा हिस्सा नीचे जाते समय सही-सलामत रहा। ऐसे में माना गया कि सोना इसके अंदर है। पनडुब्बी खींचती है ध्यान समुद्र की तलहटी से मिले मलबे के टुकड़ों ने कानूनी तौर पर सामान निकालने के अधिकारों का समर्थन किया लेकिन शुरुआती अभियान के दौरान सोना निकालने की कोई कोशिश नहीं की गई। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह कीमती धातु पनडुब्बी के अगले हिस्से में रखी गई थी, जो 1944 से अछूता रहा है। अटलांटिक में I-52 के गायब होने के अस्सी साल से ज्यादा समय बाद भी यह पनडुब्बी ना केवल इसलिए ध्यान खींचती है कि इसमें खजाना होने का अनुमान है। बल्कि इसलिए भी कि इसकी खोज ने दिखाया कि कैसे युद्ध के समय कोड तोड़ने, पुराने रिकॉर्ड की जांच और आधुनिक तकनीक से एक ऐसे रहस्य को सुलझाया जा सकता है जिसे कई पीढ़ियों के जांचकर्ता नहीं सुलझा पाए थे। सोना अभी भी वहीं हो सकता है! एक ऐसे ढांचे के अंदर, जो अस्सी साल से तीन मील पानी के नीचे है और उस दबाव से सुरक्षित है, जिसने उसे कुचल दिया होता। I-52 की कहानी यह दिखाती है कि समुद्र की तलहटी में वह सोना हो सकता है, जो पर दशकों की खोज के बावजूद अभी नहीं मिल पाया है। सोने का रहस्य अभी भी बरकरार है

साबांग पोर्ट से हिंद महासागर में भारत की बढ़ी ताकत? 6-8 जुलाई के दौरे से पहले PM मोदी की बड़ी चाल

जकार्ता  पीएम मोदी  6 से 8 जुलाई तक इंडोनेशिया की यात्रा पर रहेंगे. ये दौरा समंदर सिक्योरिटी सिस्टम के लिए बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित होने वाला है. उनकी इस यात्रा के पीछे सिर्फ दो देशों के पुराने रिश्ते नहीं हैं, बल्कि भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ का वो सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक है, जिसकी स्क्रिप्ट पिछले कुछ सालों से लिखी जा रही थी. भारत और इंडोनेशिया के बीच वैसे तो कई समझौतों पर बातचीत चल रही है, लेकिन डिफेंस एक्सपर्ट्स से लेकर चीन तक, हर किसी की नजर सिर्फ एक ही प्रोजेक्ट पर टिकी है और वो है इंडोनेशिया का ‘साबांग पोर्ट’. जिससे समंदर का पूरा खेल ही पलट जाएगा।  साबांग पोर्ट: आखिर क्या है इस बंदरगाह की पूरी कहानी? इंडोनेशिया के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी पिछले कुछ सालों में बहुत ज्यादा गहरी हुई है लेकिन इस पूरी पार्टनरशिप का जो सबसे कीमती ‘हीरा’ है, वो है साबांग पोर्ट प्रोजेक्ट. सबांग इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप के बिल्कुल उत्तरी छोर पर स्थित एक छोटा सा बंदरगाह है. दिखने में ये जगह बहुत शांत और साधारण लग सकती है, लेकिन जब आप इसे दुनिया के नक्शे पर देखेंगे तो आपको समझ आएगा कि ये कोई मामूली बंदरगाह नहीं है. ये ठीक उसी जगह पर मौजूद है जहां से दुनिया का सबसे अहम समुद्री रास्ता ‘मलक्का स्ट्रेट’ शुरू होता है।  भारत की अंडमान और निकोबार द्वीप श्रृंखला से साबांग पोर्ट की दूरी महज 150 किलोमीटर के आसपास है. यानी भारत के अपने नेवल बेस से ये जगह इतनी पास है कि भारतीय नौसेना बहुत ही कम समय में यहां अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकती है. पीएम मोदी की इस यात्रा के दौरान साबांग पोर्ट के कमर्शियल और मिलिट्री इस्तेमाल को लेकर जो ब्लूप्रिंट फाइनल हो रहा है, उसने चीन की रातों की नींद उड़ा दी है. भारत यहां केवल पैसे नहीं लगा रहा है, बल्कि वो इस पूरे इलाके की सुरक्षा का जिम्मा अपने हाथों में लेने की तैयारी कर रहा है।  मलक्का स्ट्रेट का वो सच, जिससे चीन को आते हैं बुरे सपने अब सवाल ये उठता है कि आखिर इस साबांग पोर्ट और मलक्का स्ट्रेट से चीन का क्या लेना-देना है और वो इससे इतना क्यों घबरा रहा है? इस बात को समझने के लिए हमें चीन की सबसे बड़ी कमजोरी को जानना होगा. चीन आज भले ही दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और अपनी सेना के दम पर पूरी दुनिया को आंखें दिखाता है, लेकिन उसकी लाइफलाइन एक बहुत ही संकरे समुद्री रास्ते के भरोसे टिकी है, जिसे मलक्का जलडमरूमध्य या चीन का ‘मलक्का डिलेमा’ कहते हैं. यs इंडोनेशिया और मलेशिया के बीच स्थित एक बेहद पतली समुद्री पट्टी है।  चीन जितना भी कच्चा तेल खाड़ी देशों और अफ्रीका से खरीदता है, उसका लगभग 80% हिस्सा इसी मलक्का स्ट्रेट से होकर चीन के बंदरगाहों तक पहुंचता है. इसके अलावा चीन दुनिया भर में जो अपना माल एक्सपोर्ट करता है, उसका भी एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. आप इसे ऐसे समझ सकते हैं कि अगर मलक्का स्ट्रेट चीन के लिए एक गले की नली की तरह है, जिसके बिना न तो उसे खाना मिल सकता है और न ही वो सांस ले सकता है. अगर कभी ये रास्ता बंद हो गया, तो चीन की पूरी इंडस्ट्री और उसकी अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी।  चीन का ‘मलक्का डिलेमा’ और साबांग पोर्ट पर भारत का पहरा चीन के पूर्व राष्ट्रपति हू जिंताओ ने सालों पहले एक शब्द का इस्तेमाल किया था- ‘मलक्का डिलेमा’ (मलक्का का धर्मसंकट). चीन को हमेशा से ये डर सताता रहा है कि अगर कभी भारत या अमेरिका के साथ उसका कोई बड़ा युद्ध या विवाद होता है तो भारतीय नौसेना अपनी भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाकर मलक्का स्ट्रेट के मुहाने को पूरी तरह ब्लॉक कर देगी. अगर ऐसा हुआ तो चीन का पूरा व्यापार ठप हो जाएगा और उसकी सेना बिना तेल के कमजोर पड़ जाएगी. चीन का यही सबसे बड़ा डर है जिसे ‘मलक्का डिलेमा’ कहा जाता है।  अब सोचिए इसी मलक्का स्ट्रेट के ठीक एंट्री पॉइंट पर स्थित साबांग पोर्ट को जब भारत डेवलप कर रहा है, तो इसका क्या मतलब हुआ? इसका सीधा सा मतलब यह है कि साबांग पोर्ट पर भारत की मजबूत मौजूदगी सीधे तौर पर चीन की इस सबसे बड़ी कमजोरी पर भारत का एक पक्का पहरा बिठा देती है. इस बंदरगाह के पूरी तरह एक्टिव होने के बाद भारतीय नौसेना मलक्का स्ट्रेट से गुजरने वाले चीन के हर एक जहाज, हर एक सबमरीन और हर एक हरकत पर चौबीसों घंटे सीधी नजर रख पाएगी. ये चीन के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है क्योंकि अब तक वो हिंद महासागर में भारत को घेरने की कोशिश कर रहा था, लेकिन पीएम मोदी ने इंडोनेशिया के साथ मिलकर चीन को उसी के रास्ते पर घेर लिया है।  पीएम मोदी की इंडोनेशिया यात्रा जियोपॉलिटिक्स की नई स्क्रिप्ट पीएम मोदी की इस इंडोनेशिया यात्रा के दौरान जब साबांग पोर्ट पर अंतिम मुहर लग रही है तो ये पूरी दुनिया को एक बहुत बड़ा मैसेज दे रहा है. अब तक चीन ये सोचता था कि वो अपनी आर्थिक ताकत के दम पर एशिया के छोटे देशों को डराकर रख सकता है लेकिन इंडोनेशिया जैसे बड़े और प्रभावशाली मुस्लिम बहुल देश ने भारत के साथ हाथ मिलाकर ये साफ कर दिया है कि वो इस इलाके में किसी एक देश की दादागिरी को स्वीकार नहीं करेगा. भारत और इंडोनेशिया का ये साथ ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ की असली ताकत को दिखाता है।  इस यात्रा के जरिए भारत न केवल साबांग पोर्ट के इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत कर रहा है, बल्कि दोनों देशों के बीच मैरीटाइम कोऑपरेशन को एक नए लेवल पर ले जा रहा है. आने वाले समय में अगर भारतीय नौसेना के जहाजों को साबांग पोर्ट पर लॉजिस्टिक सपोर्ट और रीफ्यूलिंग की सुविधा मिल जाती है तो चीन के लिए हिंद महासागर और मलक्का स्ट्रेट के आसपास मनमानी करना नामुमकिन हो जाएगा. पीएम मोदी की ये चाल बताती है कि भारत अब डिफेंसिव नहीं, बल्कि ऑफेंसिव कूटनीति पर चल रहा है और चीन की हर चाल का जवाब उसके अपने ही इलाके में जाकर दे … Read more

आधुनिक युद्ध में टैंक बेकार या अब भी सबसे बड़ा हथियार? जानिए विशेषज्ञों की राय

नई दिल्ली पहले रूस-यूक्रेन और फिर ईरान बनाम इजरायल-अमेरिका। पिछले कुछ सालों में दुनिया दो बड़ी जंगें देख चुकी है। हालांकि, भारत-पाकिस्तान के बीच भी इस दौरान एक छोटा युद्ध हुआ, लेकिन लंबे कालखंड में रूस-यूक्रेन और ईरान-इजरायल की जंग ही चली। इन दोनों जंगों में दुनिया ने देखा कि कैसे आधुनिक युद्ध का मैदान पूरी तरह से बदल चुका है। पैदल सैनिकों, बंदूकों और तोप की जगह अब मिसाइल, एयरक्राफ्ट और ड्रोन ने ले ली है। तो सवाल उठता है कि क्या थल सेना और तोपों की अहमियत अब खत्म हो गई है? इसका जवाब है-नहीं। डिफेंस एक्सपर्ट से जानें सब दरअसल, सैन्य एक्सपर्ट्स का तर्क है कि चाहे ड्रोन हों या फाइटर जेट ये दोनों ही जंग के असली मकसद को हासिल नहीं कर सकते, यानी किसी इलाके पर कब्जा नहीं कर सकते। आइए, यूक्रेन से मिले सबक और डिफेंस एक्सपर्ट की राय के आधार पर इस बात का विश्लेषण करते हैं कि युद्ध के तरीकों में तेजी से बदलाव के बावजूद टैंक और जमीनी सेना क्यों अब भी बेहद जरूरी हैं। टैंक अब भी जरूरी क्यों? जब 500 डॉलर का ड्रोन और 30,000 डॉलर की एंटी-टैंक मिसाइल करोड़ों की कीमत वाले टैंक को तबाह कर सकती है तो यह सवाल पूछा जा सकता है कि टैंकों पर निवेश क्यों करना चाहिए? ये सवाल इसलिए भी खड़ा हो रहा है, क्योंकि सोशल मीडिया पर यूक्रेन की सड़कों पर जलते हुए टैंकों के वीडियो भरे पड़े हैं। इससे लोगों को लगने लगा है कि टैंक अब बेकार हो चुके हैं। लेकिन कई सेनाएं बख्तरबंद युद्ध (आर्मर्ड वॉरफेयर) को छोड़ नहीं रही हैं। असल में कुछ सेनाएं तो इस पर और ज्यादा जोर दे रही हैं। टैंक में आज भी ये खूबियां वर्तमान स्थिति में टैंकों को छोड़ना नहीं, बल्कि उनके इस्तेमाल के तरीके पर फिर से सोचना ही समझदारी का काम है। दरअसल, टैंकों में आज भी ऐसी खूबियां हैं जिनका मुकाबला शायद ही कोई और हथियार कर सके। इसमें तेजी से चलने की क्षमता (मोबिलिटी), सुरक्षा और जबरदस्त मारक क्षमता (फायरपावर) एक अनोखा मेल है। टैंक की खासियत     ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चल सकते हैं     ऐसे हमले झेल सकते हैं, जिनसे गाड़ियां तबाह हो जाएं     मजबूत ठिकानों पर जबरदस्त हमला कर सकते हैं     टैंक कॉम्बिनेशन 'शॉक इफेक्ट' पैदा करता है घुटने टेकने पर करते हैं मजबूर टैंकों से एक ऐसा मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक फायदा मिलता है, जो बिना तैयारी वाले बचाव करने वालों को घुटने टेकने पर मजबूर कर सकता है। आधुनिक युद्ध अब सिर्फ टैंकों के अकेले काम करने तक सीमित नहीं है। आज के जमाने में अलग-अलग तरह की सेनाओं को एक साथ मिलाकर काम करना ही सबसे बेहतर माना जाता है। 'कंबाइंड आर्म्स ऑपरेशन्स' में टैंक पैदल सेना (इन्फैंट्री), UAV, इंजीनियर और आर्टिलरी के साथ मिलकर बहुत अच्छी तरह से तालमेल बिठाकर हमले करते हैं। टैंकों को बचाती है पैदल सेना हमने हाल ही में देखा है कि गाजा या दक्षिणी लेबनान में इजरायली सेना शायद ही कभी पैदल सेना की सुरक्षा और लगातार ड्रोन की निगरानी के बिना मर्कावा टैंक तैनात करती है। पैदल सेना टैंकों को RPG जैसे करीबी खतरों से बचाती है, ड्रोन आगे जाकर जानकारी जुटाते हैं और आर्टिलरी दुश्मन के मजबूत ठिकानों को दबाती है। जब यह तालमेल सही तरीके से किया जाता है तो अकेले काम करने पर टैंकों को जिन खतरों का सामना करना पड़ता है, वे काफी कम हो जाते हैं।  

सेशेल्स सम्मान पर पाकिस्तान के बयान का भारत ने किया तीखा पलटवार

नई दिल्ली सेशेल्स के नए राष्ट्रपति सम्मान को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर टिप्पणी करना पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ को भारी पड़ गया है। भारत सरकार ने उनके इस बयान पर बेहद तीखा और कड़ा पलटवार किया है। सरकारी सूत्रों ने ख्वाजा आसिफ की मानसिक स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा है कि उनके पास कोई काम धंधा नहीं है और वे उन मामलों पर बचकाने कमेंट करके अपना वक्त काट रहे हैं, जिनकी उन्हें रत्ती भर भी समझ नहीं है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों ने पाकिस्तानी रक्षा मंत्री को आड़े हाथों लिया। सूत्रों ने तंज कसते हुए कहा कि ख्वाजा आसिफ को रक्षा मंत्रालय जैसी बड़ी जिम्मेदारी मिलना ही आज के पाकिस्तान के बदतर हालात को बयां करता है। भारत सरकार के सूत्रों ने कहा, "यह हर कोई जानता है कि ख्वाजा आसिफ मानसिक रूप से अस्थिर हैं। उन्हें मौजूदा जिम्मेदारी सौंपा जाना आज के पाकिस्तान के बारे में बहुत कुछ बताता है। साफ है कि उनके पास दिन भर करने के लिए कोई काम नहीं है। वे उन चीजों पर फालतू की टिप्पणी करके समय बर्बाद करते हैं, जिनका उन्हें कोई ज्ञान नहीं है। नफरत से भरे किसी व्यक्ति के भीतर से जब ईर्ष्या (जलन) बाहर आती है, तो वह बहुत ही घटिया लगती है।" यह तीखी प्रतिक्रिया तब आई जब आसिफ ने पीएम मोदी को मिले सेशेल्स के सम्मान का मजाक उड़ाया था और इसे 'पहले से सेटिंग करके' तैयार किया गया सम्मान बताया था। पीएम मोदी को मिला है सेशेल्स का सर्वोच्च सम्मान दरअसल, पिछले हफ्ते सेशेल्स के दौरे पर गए पीएम मोदी को वहां के नए राष्ट्रपति सम्मान 'गार्जियन ऑफ द ब्लू होराइजन' से नवाजा गया था। पर्यावरण संरक्षण और छोटे द्वीपीय देशों के विकास में उनके योगदान के लिए उन्हें यह सम्मान दिया गया। पीएम मोदी इस पुरस्कार को पाने वाले दुनिया के पहले नेता बने हैं। दिलचस्प बात यह है कि सेशेल्स सरकार ने पीएम मोदी के दौरे से कुछ हफ्ते पहले ही अपनी पुरानी पुरस्कार प्रणाली को बदलकर इस नए राष्ट्रीय सम्मान की शुरुआत की थी। अवॉर्ड पर क्यों हुआ विवाद? इस अवॉर्ड को लेकर भारत के भीतर भी सियासी घमासान मचा हुआ है। विपक्षी दलों ने सोशल मीडिया पर इस अवॉर्ड के ऑफिशियल साइटेशन (प्रशस्ति पत्र) की एक तस्वीर शेयर करते हुए दावा किया था कि इसमें स्पेलिंग और टाइपिंग की कई गलतियां हैं। विपक्ष का यह भी आरोप था कि इस सर्टिफिकेट को AI टूल्स की मदद से जल्दबाजी में तैयार किया गया है। विवाद बढ़ता देख सेशेल्स सरकार ने खुद सामने आकर सफाई दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह सम्मान पूरी तरह असली और प्रामाणिक है। उन्होंने बताया कि देश में पुराना अवॉर्ड सिस्टम राजनीतिक विवादों के कारण रद्द कर दिया गया था और नया सिस्टम बनाया जा रहा था। इस नए सम्मान को वहां की कैबिनेट ने 24 जून को ही मंजूरी दी थी, यानी पीएम मोदी के पहुंचने से महज कुछ दिन पहले। गलतियों के मुद्दे पर सेशेल्स ने माना कि जो तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई, वह दरअसल एक 'वर्किंग ड्राफ्ट' थी जो गलती से बाहर आ गई। अब असली और पूरी तरह जांचा हुआ सर्टिफिकेट जारी कर दिया गया है। समय की कमी के कारण इस सर्टिफिकेट को बनाने में डिजिटल डिजाइन टूल्स (AI) की मदद ली गई थी। इस बीच, सत्ताधारी भाजपा ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि पीएम मोदी को उनकी 'ग्रीन लीडरशिप' के लिए यह सम्मान मिलना पूरे देश के लिए एक बेहद गर्व का क्षण है।

ड्रोन और क्रूज मिसाइल का घातक कॉम्बो बनी S8000 बांडेरोल, जानिए कारण

नई दिल्ली रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध में तकनीक और हथियारों का स्तर लगातार बदल रहा है. इस कड़ी में रूस द्वारा तैनात की गई नई S8000 बांडेरोल (Banderol) क्रूज मिसाइल ने यूक्रेन की एयर डिफेंस सिस्टम के सामने एक गंभीर संकट खड़ा कर दिया है. यह हथियार पारंपरिक क्रूज मिसाइल और सुसाइड ड्रोन का एक घातक मिश्रण है, जिसका इस्तेमाल हाल ही में कीव पर हुए बड़े हमलों में बड़े पैमाने पर देखा गया है. सुरक्षा विशेषज्ञों और यूक्रेनी खुफिया एजेंसियों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस मिसाइल को मार गिराना इतना कठिन क्यों है? मशीन गन की पहुंच से बाहर बांडेरोल मिसाइल को मार गिराने में सबसे बड़ी चुनौती इसकी गति और इसका इंजन है. यूक्रेनी रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इस मिसाइल की क्रूज गति 520 से 560 किमी/घंटा है, जो अधिकतम 650 किमी/घंटा तक पहुंच सकती है. यूक्रेन की सेना अक्सर मिसाइलों और ड्रोनों को रोकने के लिए मोबाइल फायर टीमों का उपयोग करती है, जो जमीन पर मौजूद भारी मशीन गन से हवाई टारगेट्स पर निशाना साधती हैं. बांडेरोल की जेट इंजन की वजह से गति इतनी अधिक है कि ये मैन्युअल मशीन गन टीमें इसका पीछा करने और सटीक निशाना लगाने में पूरी तरह बेकार साबित हो रही हैं. इसे रोकने के लिए 'गेपार्ड' जैसी अत्यधिक एडवांस और ऑटोमैटिक एंटी-एयरक्राफ्ट प्रणालियों की आवश्यकता होती है, जो तेज गति से चलने वाले लक्ष्यों को ट्रैक कर सकें.   छोटा आकार और बेजोड़ चालाकी पारंपरिक रूसी क्रूज मिसाइलों (जैसे Kh-101 या कैलिबर) की तुलना में बांडेरोल का आकार काफी छोटा है. लगभग 5 मीटर लंबाई और 2.2 मीटर विंगस्पैन के साथ यह रडार की नजरों से आसानी से बच निकलती है. यूक्रेनी सैन्य खुफिया विभाग (HUR) की रिपोर्ट से पता चलता है कि यह मिसाइल बेहद कम जगह में मुड़ने के साथ हवा में तेजी से मैन्यूवर कर सकती है. इसकी यही चालकी इसे यूक्रेन के हवाई सुरक्षा रडार और मिसाइल डिफेंस सिस्टम को चकमा देती है, क्योंकि इसके फ्लाइट पाथ का अनुमान लगाना बेहद कठिन होता है. जैमिंग-रोधी 'कोमेटा' एंटीना तकनीक हवाई सुरक्षा को भेदने के लिए इस मिसाइल में रूस की एडवांस कोमेटा (Kometa) डिजिटल सैटेलाइट नेविगेशन एंटीना प्रणाली का उपयोग किया गया है. यह तकनीक यूक्रेन के इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर यानी जैमिंग सिस्टम को पूरी तरह से बेअसर कर देती है. जब यूक्रेन की सेना मिसाइल के जीपीएस या नेविगेशन को बाधित करने की कोशिश करती है, तो यह जैमिंग-रोधी एंटीना मिसाइल को सुरक्षित रूप से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने में मदद करता है. इस वजह से इसे बिना भौतिक रूप से नष्ट किए, केवल सिग्नल ब्लॉक करके रोकना लगभग असंभव हो जाता है.    रूस की बेहतरीन ई-कॉमर्स वाली चालाकी इस मिसाइल का सबसे चौंकाने वाला पहलू इसका निर्माण और सप्लाई चेन है. यूक्रेन के 'वॉर एंड सैंक्शंस' पोर्टल के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद इस मिसाइल में 30 अलग-अलग विदेशी कंपनियों के 20 से अधिक मुख्य पार्ट्स और लगभग 20 माइक्रोचिप्स लगाए गए हैं. इसमें सबसे महत्वपूर्ण है इसका इंजन- चीन का Swiwin SW800Pro जेट इंजन, जो आमतौर पर रिमोट-कंट्रोल विमानों के लिए उपयोग किया जाता है. यह ई-कॉमर्स वेबसाइट 'AliExpress' पर मात्र $16,000 में आसानी से मौजूद है. इसके अलावा, इसमें जापान की मुराता बैटरियां, साउथ कोरिया के डायनामिक्सल सर्वो मोटर्स और अमेरिकी तथा स्विस मूल के वोल्टेज रेगुलेटर और माइक्रोकंट्रोलर्स शामिल हैं. प्रतिबंधों से बचने के लिए रूस ने आर्मेनिया, कजाकिस्तान, चीन, तुर्की और यूएई जैसे देशों के मध्यस्थों और शेल कंपनियों का एक जटिल नेटवर्क तैयार किया है, जिसके माध्यम से ये कलपुर्जे रूसी वितरकों तक पहुंच जाते हैं.    बड़े हमलों में रणनीति का हिस्सा रूस इस मिसाइल का उपयोग स्वतंत्र रूप से करने के बजाय एक सोची-समझी रणनीति के तहत कर रहा है. इसे बड़े पैमाने पर 'शहीद' ड्रोनों और भारी बैलिस्टिक मिसाइल के साथ मिलाकर दागा जाता है. जब सैकड़ों हथियार एक साथ यूक्रेन के हवाई क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, तो वहां की हवाई सुरक्षा प्रणाली पूरी तरह व्यस्त हो जाती है. ऐसे समय में अपनी गति, छोटे आकार और चपलता के कारण बांडेरोल मिसाइलें सुरक्षा घेरे को तोड़कर नागरिक और बुनियादी ढांचों पर भारी तबाही मचाने में सफल हो जाती हैं.

गुजरात कार्यक्रम में पीएम मोदी ने कहावतों और मीम डायलॉग से बांधा माहौल

 साणंद  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शनिवार को गुजरात के साणंद में सेमीकंडक्टर असेंबलिंग एंड टेस्टिंग प्लांट का उद्घाटन करते हुए अपने संबोधन में लोकप्रिय संवाद "सुन रहे हो न विनोद" का इस्तेमाल किया, जिस पर वहां मौजूद लोगों ने तालियां बजाईं और ठहाके लगाए। दरअसल, उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए "सीजी पावर एंड इंडस्ट्रियल साल्यूशंस" के चेयरमैन वेल्लायन सुबैया ने गुजराती की दो कहावतों का इस्तेमाल किया। जब पीएम मोदी बोलने आए, तो उन्होंने भी इन कहावतों का जिक्र किया। पीएम मोदी ने क्या कहा? पीएम ने कहा-सुबैया जी ने गुजराती की एक कहावत कही-निशान चूक माफ, पण नहीं माफ नीचू निशान (ऊंचा लक्ष्य चूकना माफ है, लेकिन कम लक्ष्य तय करना नहीं)। मैं कभी छोटे लक्ष्य नहीं रखता, न ही छोटा सोच रखता हूं। यदि मुझे कोई प्रतिमा बनानी हो, तो मैं उसे दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा बनाऊंगा। प्रधानमंत्री का यह बयान स्पष्ट रूप से सरदार वल्लभभाई पटेल की "स्टेच्यू आफ यूनिटी" के संदर्भ में था। पंचायत वेब सीरीज का फेमस डायलॉग इसके बाद मोदी ने कहा- और सुबैया जी ने "काम बोले छे" भी कहा…। "सुन रहे हो न विनोद"… काम बोलता है। यह सुनते ही सभा में मौजूद लोग और मंच पर उपस्थित अन्य लोग ठहाके लगाने लगे। उल्लेखनीय है कि "सुन रहे हो न विनोद" (या "देख रहा है विनोद") लोकप्रिय वेब सीरीज पंचायत का एक प्रसिद्ध डायलॉग है। इंटरनेट पर यह संवाद बहुत बड़ा मीम बन गया है।