samacharsecretary.com

भारत बना ड्रोन और क्रूज मिसाइलों का काल, दुश्मन आसमान में जलकर राख होंगे

नई दिल्ली भारत की रक्षा ताकत में अब एक और बड़ा और खतरनाक इजाफा हो गया है. रक्षा मंत्रालय ने नई दिल्ली के कर्तव्य भवन-2 में 858 करोड़ रुपए के दो बड़े एग्रीमेंट साइन किए हैं.  इनका सीधा मकसद भारत के आसमान और समंदर की सुरक्षा को पूरी तरह से अभेद्य बनाना है. इंडियन आर्मी को रूस का टुंगुस्का एयर डिफेंस सिस्टम मिलने वाला है।  यह सिस्टम दुश्मन के विमानों, ड्रोन्स और क्रूज मिसाइलों को पलक झपकते ही हवा में खाक कर देगा. इसके साथ ही इंडियन नेवी के P8I एयरक्राफ्ट के मेंटेनेंस के लिए भी एक बड़ी डील हुई है. बोइंग इंडिया डिफेंस प्राइवेट लिमिटेड के साथ यह करार भारत में ही होगा. इससे देश के आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया विजन को एक बहुत बड़ा बूस्ट मिलेगा. भारत अब हर तरह के खतरे से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है।  ‘445 करोड़ में रूस से मिला एयर डिफेंस सिस्टम’ भारतीय सेना को अब टुंगुस्का एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम मिलेगा. इसके लिए रूस की कंपनी के साथ 445 करोड़ रुपए का बड़ा एग्रीमेंट साइन हुआ है. यह आधुनिक मिसाइल सिस्टम भारत की एयर डिफेंस पावर को कई गुना बढ़ा देगा. दुश्मन का कोई भी विमान, ड्रोन या क्रूज मिसाइल अब भारत की सीमा में घुस नहीं पाएगा. इससे रूस और भारत का रक्षा सहयोग भी और ज्यादा मजबूत हुआ है।  ‘नेवी के P8I एयरक्राफ्ट के लिए बोइंग से हुई डील’ भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ाने के लिए भी बड़ा कदम उठाया गया है. नौसेना के P8I विमान की जांच और मेंटेनेंस के लिए एक अहम समझौता हुआ है. यह एग्रीमेंट 413 करोड़ रुपए में बोइंग इंडिया डिफेंस प्राइवेट लिमिटेड के साथ साइन किया गया है. यह काम पूरी तरह से भारत में ही किया जाएगा।  ‘मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत को मिला बूस्ट’ P8I विमानों का मेंटेनेंस देश के अंदर ही होने से बहुत बड़ा फायदा होगा. इससे मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियान को भारी ताकत मिलेगी. देश में ही मेंटेनेंस की आधुनिक सुविधाएं काफी मजबूत होंगी. भारत अब रक्षा उपकरणों के रखरखाव के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर नहीं रहेगा. यह डिफेंस सेक्टर में स्वदेशीकरण की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है। 

उत्तर कोरिया की मिसाइल लॉन्च, अमेरिका ने दक्षिण कोरिया से THAAD हटाने का किया ऐलान

फियोंगयांग ईरान वॉर अभी तक समाप्‍त नहीं हुआ है, पर एक और क्षेत्र में तनाव की आहट ने खलबली मचा दी है. कोरियाई प्रायद्वीप से बड़ी खबर सामने आ रही है. दक्षिण कोरिया का कहना है कि उत्‍तर कोरिया ने मिसाइल दागी है. उत्‍तर और दक्षिण केारिया के बीच तनाव नई बात नहीं है. दोनों देशों के बीच संबंध लंबे समय से तल्‍ख हैं. उत्‍तर कोरिया को चीन और रूस का करीबी माना जाता है, जब‍कि साउथ कोरिया अमेरिका का करीबी सहयोगी है. दक्षिण कोरिया में अमेरिकी सैन्‍य बेस भी स्थित है. किम जॉन्‍ग उन के देश की तरफ से ऐसे समय में मिसाइल दागी गई है, जब अमेरिका दक्षिण कोरिया से अपने कुछ THAAD मिसाइल डिफेंस सिस्‍टम को हटाने पर विचार कर रहा है. ऐसे में उत्‍तर कोरिया के कदम से दक्षिण कोरिया की चिंता बढ़ गई है. रिपोर्ट के अनुसार, नॉर्थ कोरिया ने समंदर की तरफ मिसाइल दागी है. उत्‍तर कोरिया की तरफ से अक्‍सर ही समंदर का रुख कर मिसाइल परीक्षण किए जाते रहे हैं. यह कोई पहला मौका नहीं है, जब किम जोंग उन के देश की तरफ से इस तरह की कार्रवाई की गई है. हालांकि, इस बार की टाइमिंग काफी अहम है. पश्चिम एशिया में हालात पहले से ही खराब है. अमेरिका और इजरायल ने संयुक्‍त रूप से ईरान पर अटैक कर दिया है. तेहरान की तरफ किए गए पलटवार से माहौल पहले ही तनावपूर्ण और गंभीर हो चुके हैं. ऐसे में उत्‍तर कोरिया की ओर से मिसाइल दागने से एशिया के एक और जोन में हालात तनावपूर्ण होने की आशंका बढ़ गई है. चीन की आक्रामक नीतियों की वजह से इस क्षेत्र में ऐसे ही तनाव का आलम है. जापान सतर्क उत्तर कोरिया ने शनिवार को एक संदिग्ध बैलिस्टिक मिसाइल का प्रक्षेपण किया है. जापान के रक्षा मंत्रालय ने यह जानकारी दी है. ‘निक्‍केई एशिया’ के अनुसार, सूत्रों का कहना है कि यह मिसाइल संभवतः जापान के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) के बाहर जाकर गिरी. इस प्रक्षेपण के कारण किसी प्रकार के नुकसान की कोई खबर नहीं है. वहीं, दक्षिण कोरिया की सेना ने बताया कि उत्तर कोरिया ने पूर्व दिशा की ओर कम से कम एक अज्ञात प्रक्षेपास्त्र यानी प्रोजेक्‍टाइल दागा. इससे पहले उत्तर कोरिया ने 27 जनवरी को जापान सागर की ओर दो बैलिस्टिक मिसाइलें दागी थीं, जिनके बारे में भी आकलन किया गया था कि वे जापान के ईईजेड के बाहर गिरी थीं. बढ़ा तनाव, क्या खुलेगा जंग का तीसरा मोर्चा या होगी World WAR 3? दक्षिण कोरिया की सेना के अनुसार, शनिवार को उत्तर कोरिया ने जापान सागर की ओर एक संदिग्ध बैलिस्टिक मिसाइल दागी। इससे पूर्वी एशिया में नया तनाव पैदा हो गया है, जबकि दुनिया के अन्य हिस्सों में चल रहे संघर्ष अभी भी वैश्विक सुरक्षा चिंताओं का मुख्य केंद्र बने हुए हैं। दक्षिण कोरिया के जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ ने बताया कि यह मिसाइल उत्तर कोरिया से उसके पूर्वी जलक्षेत्र की ओर दागी गई थी, जिसे आमतौर पर जापान सागर (पूर्वी सागर) के नाम से जाना जाता है। अधिकारियों ने शुरू में इस हथियार को अज्ञात मिसाइल बताया था, लेकिन माना जा रहा है कि यह एक बैलिस्टिक मिसाइल ही थी। अमेरिका- दक्षिण कोरिया कर रहे सैन्य अभ्यास बता दें कि यह मिसाइल तब दागी गई जब अमेरिका और दक्षिण कोरिया मिलकर अपना सालाना स्प्रिंगटाइम संयुक्त सैन्य अभ्यास कर रहे थे, जिसमें हजारों सैनिक हिस्सा ले रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन ईरान के खिलाफ भी एक बढ़ता हुआ युद्ध लड़ रहा है। हाल ही में इजरायल और अमेरिका ने मिलकर ईरान पर हमला बोल दिया था, जो कि युद्ध हर दिन के साथ बढ़ा और हर जगह तबाही मची हुई है। इसमें ईरान से लेकर इजयारल और अमेरिका तक को नुकसान हो रहा है, क्योंकि ईरान खाड़ी देश में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना रहा है। उत्तर कोरिया ने क्यों की होगी मिसाइल लॉन्च? उत्तरी कोरिया लंबे समय से सहयोगी देशों के सैन्य अभ्यासों को 'आक्रमण का पूर्वाभ्यास' बताता रहा है, और अक्सर इनका इस्तेमाल अपने सैन्य प्रदर्शनों या हथियारों के परीक्षण को तेज करने के बहाने के तौर पर करता है। यह मिसाइल लॉन्च, उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन की प्रभावशाली बहन द्वारा मंगलवार को वॉशिंगटन और सियोल की आलोचना किए जाने के कुछ ही दिनों बाद हुआ। उन्होंने वैश्विक सुरक्षा के लिए एक खतरनाक मोड़ पर अपने सैन्य अभ्यास जारी रखने के लिए इन दोनों देशों की आलोचना की थी, और चेतावनी दी थी कि उत्तर कोरिया की सुरक्षा को दी गई कोई भी चुनौती भयानक परिणामों को जन्म देगी। बता दें कि 11-दिवसीय 'फ्रीडम शील्ड' अभ्यास, जो 19 मार्च तक चलेगा, यह संयुक्त राज्य अमेरिका और दक्षिण कोरिया की सेनाओं द्वारा आयोजित किए जाने वाले दो वार्षिक कमांड पोस्ट अभ्यासों में से एक है।

नया हथियार ‘स्टील्थ’ क्रूज मिसाइल, रेंज 700 KM, आयरन डोम और अन्य डिफेंस सिस्टम भी हैं दुविधा में

बेंगलुरु   21वीं सदी का युद्ध 20वीं सदी के मुकाबले काफी बदल चुका है. अब दुश्‍मन की सरजमीन पर कदम रखे बिना उसे मिट्टी में मिलाया जा सकता है. लॉन्‍ग रेंज मिसाइल किसी भी देश में तबाही लाने में सक्षम है. इसके अलावा स्‍टील्‍थ यानी पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान मॉडर्न रडार सिस्‍टम को धोखा देकर टार्गेट को खत्‍म कर सकता है. अमेरिका के स्‍टील्‍थ बॉम्‍बर ने ईरान में जमकर तबाही मचाई थी, पर तेहरान का रडार सिस्‍टम उसे कैच नहीं कर सका था. इसे देखते हुए तमाम पावरफुल देश टेक्‍नोलॉजिकली एडवांस्‍ड एयर डिफेंस सिस्‍टम डेवलप कर रहा है, ताकि किसी भी तरह के एरियल थ्रेट से निपटा जा सके. अब जरा सोचिए स्‍टील्‍थ फाइटर जेट के साथ ‘स्‍टील्‍थ’ लॉन्‍ग रेंज क्रूज मिसाइल को पेयर किया जाए तो फिर क्‍या होगा? भारत इसी प्रोजेक्‍ट पर काम कर रहा है. भारत ने पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट बनाने के लिए AMCA प्रोजेक्‍ट लॉन्‍च किया है. इसके तहत रडार और एयर डिफेंस सिस्‍टम को चकमा देने वाला स्‍टील्‍थ फाइटर जेट डेवलप किया जा रहा है. साल 2030 के बाद पांचवीं पीढ़ी का देसी लड़ाकू विमान इंडियन एयरफोर्स के बेड़े में शामिल किए जाने की संभावना है. अब रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) स्‍टील्‍थ ऑप्‍टीमाइज्‍ड लॉन्‍ग रेंज लैंड अटैक क्रूज मिसाइल (LR-LACM) डेवलप करने में जुटा है. इस क्रूज मिसाइल को AMCA के तहत डेवलप किए जा रहे पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट के साथ इंटीग्रेट करने की योजना है. 600 से 700 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम यह मिसाइल S-400, THAAD, आयरन डोम जैसे एयर डिफेंस सिस्‍टम को चकमा दे सकती है. भारत के पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम को मजबूती देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए Defence Research and Development Organisation (DRDO) एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) के लिए विशेष रूप से डिजाइन की गई कॉम्पैक्ट और स्टील्थ-ऑप्टिमाइज्ड क्रूज मिसाइल विकसित करने पर काम कर रहा है. इस प्रोजेक्‍ट का उद्देश्य केवल किसी मौजूदा हथियार को नए विमान से जोड़ना नहीं, बल्कि AMCA की स्टील्थ क्षमता को बरकरार रखते हुए उसे लंबी दूरी तक सटीक हमला करने में सक्षम बनाना है. रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह पहल भारत की स्वदेशी सैन्य तकनीक को नई ऊंचाई देने के साथ भविष्य के हवाई युद्ध में रणनीतिक बढ़त सुनिश्चित कर सकती है. यह मिसाइल विशेष रूप से AMCA के आंतरिक हथियार कक्ष (इंटरनल वेपन बे) में फिट होने के लिए तैयार की जा रही है, जिससे विमान की रडार से बचने की क्षमता प्रभावित न हो. स्‍टील्‍थ क्रूज मिसाइल इतना खास क्‍यों?     मिसाइल का वेट: 1000 किलोग्राम (संभावित)     मिसाइल का रेंज: 600 से 700 किलोमीटर     मिसाइल वर्जन: एयर टू लैंड अटैक     AMCA के लिए खासतौर पर किया जाएगा डेवलप     आकार में छोटा, पर बेहतरीन होगी टेक्‍नोलॉजी स्टील्थ डिजाइन और वेपन सिस्‍टम AMCA Aeronautical Development Agency (ADA) द्वारा विकसित किया जा रहा है. यह शुरू से ही स्टील्थ टेक्‍नोलॉजी पर आधारित है. इसमें इंटरनल वेपन बे की व्यवस्था है, जिससे बाहरी यानी आउटर पायलन पर हथियार फिट की जरूरत नहीं पड़ती और विमान की रडार क्रॉस सेक्शन बेहद कम रहती है. इससे दुश्मन के रडार सिस्टम के लिए विमान का पता लगाना कठिन हो जाता है. रडार क्रॉस सेक्‍शन कम होने की वजह से उन्‍नत रडार के साथा ही S-400, THAAD और आयरन डोम जैसे एयर डिफेंस सिस्‍टम के लिए भी इस मिसाइल को इंटरसेप्‍ट कर पाना कठिन होगा. लंबी दूरी की पारंपरिक क्रूज़ मिसाइलें आकार और वजन में बड़ी होती हैं, जिससे उन्हें इंटरनल बे में रखना चुनौतीपूर्ण हो जाता है. मौजूदा लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलों का वजन लगभग 1500 किलोग्राम या उससे अधिक होता है, जो AMCA के डिजाइन और वेपन इंटीग्रेशन में बाधा पैदा कर सकता है. इसी चुनौती से निपटने के लिए DRDO एक छोटे आकार की नई मिसाइल पर काम कर रहा है, जिसका वजन लगभग 1000 किलोग्राम रखने का लक्ष्य है. हल्के वजन के कारण AMCA अपने प्रत्येक इंटरनल वेपन बे में दो मिसाइल तक ले जा सकेगा. साथ ही हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों को भी साथ रखने की क्षमता बनाए रखेगा. 600 से 700 किलोमीटर रेंज नई कॉम्पैक्ट क्रूज मिसाइल की अनुमानित मारक क्षमता लगभग 600 से 700 किलोमीटर तक होगी. भले ही यह दूरी पारंपरिक लंबी दूरी की मिसाइलों से कम हो, लेकिन सामरिक दृष्टि से यह थिएटर लेवल के ऑपरेशन के लिए पर्याप्त मानी जा रही है. इस मिसाइल का उपयोग दुश्मन के कमांड सेंटर, वायु रक्षा प्रणाली और लॉजिस्टिक ठिकानों जैसे हाई वैल्‍यू के लक्ष्यों पर सटीक हमला करने के लिए किया जा सकेगा. एक्‍सपर्ट का मानना है कि यह रेंज AMCA के लगभग 1500 किलोमीटर के कॉम्बैट रेडियस के साथ संतुलन बनाती है, जिससे विमान बिना दुश्मन की सीमा में गहराई तक प्रवेश किए भी प्रभावी हमला कर सकेगा. कम रडार सिग्नेचर इस मिसाइल की सबसे बड़ी विशेषता इसका स्टील्थ सेंट्रिक डिजाइन होगा. इसमें रडार पर कम दिखाई देने वाली संरचना, उन्नत कंपोजिट सामग्री और विशेष आकार का उपयोग किया जा सकता है, जिससे लॉन्च के दौरान भी विमान की स्टील्थ क्षमता प्रभावित न हो. वेपन बे खुलने के दौरान भी मिनिमम रडार सिग्नेचर बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. इसके अलावा मिसाइल में स्वदेशी छोटे टर्बोफैन इंजन तकनीक, अत्याधुनिक मार्गदर्शन प्रणाली और कम ऊंचाई पर उड़ान भरने की क्षमता जैसे फीचर शामिल होने की संभावना है. यह तकनीक दुश्मन के रडार से बचते हुए सटीक लक्ष्य भेदन सुनिश्चित करेगी. स्वदेशी रक्षा क्षमता को बढ़ावा यह परियोजना फिलहाल कॉन्‍सेप्‍ट और डिजाइन चरण में है, लेकिन इसका उद्देश्य स्पष्ट है. 2030 के दशक के मध्य तक AMCA को पूरी तरह स्वदेशी और अत्याधुनिक हथियार प्रणाली से लैस करना. इससे भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता को मजबूत करने के साथ विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी. रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि AMCA और नई स्टील्थ क्रूज मिसाइल का यह संयोजन भारत की वायु शक्ति को नई रणनीतिक क्षमता प्रदान करेगा. यह न केवल देश की सुरक्षा जरूरतों को पूरा करेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत की रक्षा तकनीक की प्रतिष्ठा भी बढ़ाएगा. कुल मिलाकर DRDO का यह प्रयास भारत … Read more

भार्गवास्त्र की ताकत: एक मिसाइल से 64 टारगेट नष्ट, पाकिस्तान के ड्रोन्स पर संकट

नई दिल्‍ली भारत ने रक्षा क्षेत्र में एक ऐसी ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है जिसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है. भार्गवास्त्र के साथ भारत अब दुनिया का एकमात्र ऐसा देश बन गया है जिसके पास एक साथ 60 से अधिक (सटीक क्षमता 64) माइक्रो-मिसाइलें दागने वाला स्वदेशी सिस्टम है. महाराष्ट्र के नागपुर में सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड (SDAL) द्वारा विकसित यह सिस्टम विशेष रूप से ड्रोन झुंड (Swarm Drones) को पलक झपकते ही तबाह करने के लिए बनाया गया है. 19 जनवरी 2026 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस प्रणाली की सफलता की सराहना करते हुए इसे आत्मनिर्भर भारत की एक बड़ी जीत बताया. भार्गवास्त्र: तकनीक, क्षमता और विकास की पूरी कहानी निर्माण और विकास: भार्गवास्त्र को सोलर ग्रुप की सहायक कंपनी ‘इकोनॉमिक एक्सप्लोसिव्स लिमिटेड’ (EEL) ने पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से बनाया है. इसके सफल परीक्षण मई 2025 में गोपालपुर, ओडिशा में किए गए थे. मारने की अभूतपूर्व क्षमता: यह सिस्टम एक साथ 64 माइक्रो-मिसाइलें/रॉकेट मात्र 10 सेकंड में दाग सकता है. इसकी तुलना में दुनिया के अन्य आधुनिक सिस्टम एक बार में अधिकतम 4 मिसाइलें ही दाग पाते हैं. मल्टी-लेयर सुरक्षा: यह दो स्तरों पर काम करता है. पहला स्तर अनगाइडेड रॉकेटों का है जो 20 मीटर के दायरे में ड्रोन झुंड को खत्म करते हैं और दूसरा स्तर सटीक गाइडेड माइक्रो-मिसाइलों का है. रेंज और रडार: यह 6 से 10 किमी दूर से ही दुश्मन के ड्रोन को पहचान लेता है और 2.5 किमी की दूरी तक उन्हें पूरी तरह नष्ट कर देता है. लागत (Cost): पारंपरिक सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों (जैसे S-400) के मुकाबले इसकी लागत बहुत कम है, जिससे यह ड्रोन जैसे सस्ते हमलों को रोकने के लिए एक किफायती समाधान बनता है. भारत ने अपनी रक्षा क्षमताओं को और मजबूत करते हुए स्वदेशी 'भार्गवास्त्र' ड्रोन-रोधी प्रणाली का सफल परीक्षण किया है. सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड द्वारा डिज़ाइन और विकसित यह कम लागत वाली प्रणाली ड्रोन स्वार्म (झुंड) के बढ़ते खतरे से निपटने में एक क्रांतिकारी कदम है. गोपालपुर सीवर्ड फायरिंग रेंज में इस प्रणाली के माइक्रो रॉकेट्स का कठिन परीक्षण किया गया, जिसमें सभी निर्धारित लक्ष्य हासिल किए गए. यह उपलब्धि भारत की आत्मनिर्भर रक्षा नीति और 'मेक इन इंडिया' मिशन की एक और सफलता को दर्शाती है. 5 महत्वपूर्ण सवाल सवाल 1: भार्गवास्त्र को ‘ड्रोन किलर’ क्यों कहा जा रहा है? जवाब: यह सिस्टम विशेष रूप से उन ड्रोन झुंडों को खत्म करने के लिए बनाया गया है जो रडार को चकमा देते हैं. इसकी 64 मिसाइलें एक साथ हमला कर किसी भी बड़े ड्रोन हमले को विफल कर सकती हैं. सवाल 2: क्या यह सिस्टम किसी भी मौसम और इलाके में काम कर सकता है? जवाब: हां, इसे रेगिस्तान से लेकर 5000 मीटर से ऊंचे बर्फीले पहाड़ों तक हर तरह के कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में तैनात किया जा सकता है. सवाल 3: भार्गवास्त्र की सबसे अनोखी बात क्या है? जवाब: इसकी ‘साल्वो मोड’ क्षमता, जिसके तहत यह दुनिया में सबसे ज्यादा (60+) मिसाइलें एक साथ दागने वाला एकमात्र सिस्टम बन गया है. सवाल 4: क्या इसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाना आसान है? जवाब: हां, यह पूरी तरह से एक मोबाइल प्लेटफॉर्म (ऑल-टेरेन व्हीकल) पर आधारित है जिसे युद्ध क्षेत्र में कहीं भी तेजी से तैनात किया जा सकता है. सवाल 5: यह भारतीय सेना के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? जवाब: यह चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों के बढ़ते ड्रोन खतरे को देखते हुए भारत की रक्षा पंक्ति को अभेद्य बनाता है और कीमती मिसाइल डिफेंस सिस्टम को छोटे खतरों से बचाता है. परीक्षण का विवरण गोपालपुर में सेना वायु रक्षा (AAD) के वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति में 'भार्गवास्त्र' के तीन परीक्षण किए गए.  पहले दो परीक्षण: प्रत्येक में एक-एक रॉकेट दागा गया. तीसरा परीक्षण: सैल्वो मोड में दो सेकंड के अंतराल में दो रॉकेट दागे गए. चारों रॉकेट्स ने अपेक्षित प्रदर्शन किया और सभी लॉन्च पैरामीटर हासिल किए. ये परीक्षण ड्रोन हमलों के खिलाफ प्रणाली की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता को साबित करते हैं. 'भार्गवास्त्र' की विशेषताएं 'भार्गवास्त्र' एक बहुस्तरीय ड्रोन-रोधी प्रणाली है, जो छोटे और तेजी से आने वाले ड्रोनों का पता लगाने और उन्हें नष्ट करने में सक्षम है. इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं… उन्नत पहचान और हमला प्रणाली 6 से 10 किमी दूर छोटे ड्रोनों का पता लगा सकती है, जिसमें रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल/इन्फ्रारेड (EO/IR) सेंसर, और RF रिसीवर शामिल हैं. यह 2.5 किमी की दूरी पर ड्रोनों को नष्ट कर सकती है, जिसमें 20 मीटर का घातक दायरा है. अनगाइडेड माइक्रो रॉकेट्स: पहली परत के रूप में ड्रोन झुंड को नष्ट करने के लिए. गाइडेड माइक्रो-मिसाइल: दूसरी परत के रूप में सटीक हमले के लिए (पहले ही परीक्षण किया जा चुका है. सॉफ्ट-किल परत: जैमिंग और स्पूफिंग की वैकल्पिक सुविधा, जो ड्रोनों को बिना नष्ट किए निष्क्रिय कर सकती है. मॉड्यूलर डिज़ाइन प्रणाली को उपयोगकर्ता की आवश्यकताओं के अनुसार अनुकूलित किया जा सकता है. सेंसर और शूटर को एकीकृत कर लंबी दूरी तक लक्ष्यों को भेदने के लिए स्तरित वायु रक्षा कवर प्रदान किया जा सकता है. यह विविध भूभागों, जैसे उच्च ऊंचाई (>5000 मीटर), में काम कर सकती है, जो भारतीय सशस्त्र बलों की अनूठी जरूरतों को पूरा करती है. कमांड-एंड-कंट्रोल सेंटर C4I (कमांड, कंट्रोल, कम्युनिकेशंस, कंप्यूटर्स, और इंटेलिजेंस) तकनीक से लैस, यह प्रणाली एकल ड्रोन या पूरे झुंड का आकलन और मुकाबला करने के लिए व्यापक स्थिति जागरूकता प्रदान करती है. EO/IR सेंसर कम रडार क्रॉस-सेक्शन (LRCS) लक्ष्यों की सटीक पहचान सुनिश्चित करते हैं. नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध 'भार्गवास्त्र' को मौजूदा नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध ढांचे के साथ आसानी से एकीकृत किया जा सकता है, जो इसे सेना, नौसेना और वायुसेना के लिए एक व्यापक रक्षा ढाल बनाता है. वैश्विक स्तर पर अनूठी प्रणाली 'भार्गवास्त्र' को इसके डेवलपर्स ने वैश्विक स्तर पर एक अनूठी प्रणाली बताया है. हालांकि कई उन्नत देश माइक्रो-मिसाइल प्रणालियों पर काम कर रहे हैं, लेकिन बहुस्तरीय, लागत-प्रभावी और ड्रोन झुंड को नष्ट करने में सक्षम कोई स्वदेशी प्रणाली अभी तक विश्व में तैनात नहीं हुई है.      लागत-प्रभावी: पारंपरिक वायु रक्षा प्रणालियों की तुलना में 'भार्गवास्त्र' कम लागत में उच्च प्रभावशीलता प्रदान करता है.     स्वदेशी डिज़ाइन: यह प्रणाली पूरी तरह से भारत … Read more

चीन-पाकिस्तान की मिसाइल फोर्स से भारत को कितनी चुनौती, जानिए सैन्य संतुलन की पूरी तस्वीर

 नई दिल्ली दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में तनाव बढ़ता जा रहा है, जहां पाकिस्तान और चीन अपनी मिसाइल ताकत को तेजी से मजबूत कर रहे हैं. SIPRI 2025, अमेरिकी पेंटागन की 2025 रिपोर्ट, CSIS और अन्य स्रोतों के अनुसार, दोनों देशों की रॉकेट और मिसाइल फोर्स भारत के लिए गंभीर खतरा बनी हुई हैं. ये मिसाइलें परमाणु या सामान्य हथियार ले जा सकती हैं. दो-मोर्चे पर युद्ध की स्थिति में भारत की सुरक्षा को चुनौती दे सकती हैं.  पाकिस्तान की रॉकेट-मिसाइल फोर्स: नई ARFC की शुरुआत पाकिस्तान ने अगस्त 2025 में आर्मी रॉकेट फोर्स कमांड (ARFC) बनाई, जो मुख्य रूप से सामान्य (नॉन-न्यूक्लियर) मिसाइलों और रॉकेट्स पर फोकस करती है. ये फैसला मई 2025 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद लिया गया. जहां पाकिस्तान को लंबी दूरी के सटीक हमलों की कमी महसूस हुई. ARFC चीन की PLARF की तर्ज पर बनाई गई है. इसमें फतह सीरीज की मिसाइलें प्रमुख हैं.  पाकिस्तान की फोर्स छोटी लेकिन तेजी से बढ़ रही है. अनुमानित 100-200 लॉन्चर हैं, जिनमें SRBM और MRBM शामिल हैं. SIPRI 2025 करीब 170 परमाणु वॉरहेड हैं. प्रमुख मिसाइलें…     फतह-1 (140 किमी रेंज), फतह-2 (250-400 किमी), फतह-4 (750 किमी क्रूज मिसाइल, 2025 में टेस्ट) और फतह-5 (2026 में संभावित टेस्ट, 1000 किमी रेंज).     अन्य: गजनवी (290 किमी), शाहीन-3 (2750 किमी, पूरे भारत को कवर). ये मिसाइलें सटीक, मोबाइल और सैचुरेशन अटैक (बहुत सारी एक साथ) के लिए डिजाइन की गई हैं. पाकिस्तान चीन से टेक्नोलॉजी ले रहा है, जैसे PL-15 मिसाइलें. चीन की रॉकेट-मिसाइल फोर्स: दुनिया की सबसे बड़ी और तेजी से बढ़ती चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी रॉकेट फोर्स (PLARF) दुनिया की सबसे शक्तिशाली मिसाइल फोर्स है. पेंटागन 2025 रिपोर्ट के अनुसार, इसमें 1250+ ग्राउंड-बेस्ड बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलें हैं. परमाणु वॉरहेड 600+ हैं, जो 2030 तक 1000+ हो सकते हैं. मुख विशेषताएं 900+ छोटी दूरी (SRBM), 1300 मध्यम दूरी (MRBM), 500 इंटरमीडिएट (IRBM), 400+ ICBM (जैसे DF-41, 12,000+ किमी रेंज). हाइपरसोनिक मिसाइलें (DF-17, 5+ मैक स्पीड), एंटी-शिप और सटीक गाइडेंस वाली. नए साइलो (320+), सबमरीन-लॉन्च JL-3 और स्पेस-बेस्ड अर्ली वॉर्निंग सिस्टम. चीन की फोर्स मात्रा, टेक्नोलॉजी और रेंज में बहुत आगे है, जो भारत के उत्तरी इलाकों को आसानी से निशाना बना सकती है. भारत की मिसाइल फोर्स: स्थिति और तुलना भारत की मिसाइल फोर्स मजबूत है, लेकिन संख्या और कुछ टेक्नोलॉजी में पीछे. SIPRI 2025 के अनुसार परमाणु वॉरहेड 180 हैं. प्रमुख मिसाइलें…     अग्नि सीरीज: अग्नि-1 (700 किमी), अग्नि-5 (5000+ किमी, MIRV क्षमता).     ब्रह्मोस (सुपरसोनिक क्रूज, 290-800 किमी), प्रलय (500 किमी).     कुल लॉन्चर 200-300+. तुलना      पाकिस्तान से: भारत क्वालिटी और रेंज में आगे, लेकिन पाकिस्तान की नई ARFC सैचुरेशन अटैक से चुनौती दे सकती है.     चीन से: चीन की संख्या (हजारों मिसाइलें) और हाइपरसोनिक टेक भारत से बहुत आगे. भारत की अग्नि-5 पूरे चीन को कवर करती है, लेकिन मात्रा में कमी है. भारत के लिए दो-मोर्चे की चुनौती पाकिस्तान पश्चिम से सीधा खतरा है- ARFC और फतह सीरीज सीमा पर तेज हमले कर सकती हैं. 2025 संघर्ष में पाकिस्तान ने मिसाइलों का इस्तेमाल किया. चीन उत्तर से (तिब्बत) पूरे भारत को निशाना बना सकता है. हाइपरसोनिक मिसाइलें S-400 जैसी डिफेंस को बायपास कर सकती हैं. दोनों मिलकर हमला करें तो भारत को दो मोर्चों पर लड़ना पड़ेगा- मिसाइलों की बाढ़ से डिफेंस ओवरलोड हो सकता है. भारतीय सेना प्रमुख ने भी रॉकेट-मिसाइल फोर्स बनाने की जरूरत बताई है. भारत की प्रतिक्रिया और भविष्य भारत अपनी इंडिजेनस मिसाइलों (अग्नि वेरिएंट, हाइपरसोनिक टेस्ट), S-400/S-500 डिफेंस और ब्रह्मोस विस्तार पर काम कर रहा है. रॉकेट-मिसाइल फोर्स बनाने की योजना है. लेकिन पाकिस्तान-चीन की बढ़ती ताकत से मिसकैलकुलेशन का खतरा है, जो छोटे संघर्ष को बड़ा युद्ध बना सकता है. कुल मिलाकर, पाकिस्तान की फोर्स फोकस्ड और सीधी चुनौती है, जबकि चीन की विशाल और एडवांस्ड. भारत को अपनी डिफेंस को लगातार मजबूत करना होगा ताकि रणनीतिक संतुलन बना रहे.

BrahMos का नया वेरिएंट: भारत-रूस की साझेदारी से बनेगी Mach 4.5 रफ्तार की मिसाइल, रक्षा क्षमता में वृद्धि

नई दिल्ली भारत और रूस की रक्षा साझेदारी एक नए मुकाम पर पहुंच गई है. दोनों के बीच हुई 800 मिलियन डॉलर की ‘घातक’ डील अब दुनिया के हथियार बाजार में हलचल मचा रही है. दोनों देशों की ज्वाइंट प्रोजेक्ट ब्रह्मोस एयरोस्पेस अब ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल को और भी घातक और तेज बनाने पर काम कर रही है. मौजूदा ब्रह्मोस की स्पीड जहां मैक-3 है, वहीं नए वेरिएंट को मैक-4.5 (Mach 4.5) की रफ्तार से उड़ने के लिए तैयार किया जा रहा है. यह अपग्रेड आने वाले दशकों तक भारत को विश्व स्तर पर बढ़त दिलाने वाला साबित हो सकता है. बताया जा रहा है कि यह अपग्रेड मिसाइल के रैमजेट इंजन (Ramjet Engine) को और शक्तिशाली बनाकर किया जाएगा. इससे इसकी मारक क्षमता 450 से 800 किलोमीटर तक बनी रहेगी. लेकिन रफ्तार दुश्मन के किसी भी एयर डिफेंस सिस्टम को मात देने वाली होगी. यही नहीं इस मिसाइल की अंतरराष्ट्रीय मांग भी और अधिक बढ़ने की उम्मीद है. रैमजेट इंजन होगा और ताकतवर इस प्रोजेक्ट में रूस के वैज्ञानिक और भारत की DRDO (Defence Research and Development Organisation) मिलकर काम कर रहे हैं. इसका फोकस नए हाई-टेम्परेचर अलॉय और स्पेशल फ्यूल पर है, ताकि इतनी तेज गति पर भी इंजन और एयरफ्रेम सही तरह से काम करता रहे. मौजूदा एयरफ्रेम रहेगा कारगर विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा ब्रह्मोस का एयरफ्रेम इतना मजबूत है कि वह बिना बड़े बदलाव के मैक-4.5 की रफ्तार झेल सकता है. हालांकि इतनी रफ्तार पर तापमान और दबाव से निपटने के लिए नई सामग्री का इस्तेमाल करना होगा. 2030 तक होगा तैयार जानकारी के मुताबिक, अपग्रेडेड ब्रह्मोस का ग्राउंड टेस्ट अगले तीन साल में शुरू हो सकता है. इसके बाद उड़ान परीक्षण और इंटीग्रेशन किया जाएगा. अनुमान है कि यह नया वेरिएंट 2030 की शुरुआत तक तैनाती के लिए तैयार हो जाएगा. दुश्मनों के पास नहीं होगा जवाब मैक-4.5 स्पीड हासिल करने के बाद दुश्मन देशों के पास मिसाइल को इंटरसेप्ट करने का वक्त नहीं बचेगा. यह किसी भी एयर डिफेंस सिस्टम के लिए चुनौती होगी. साथ ही, इसकी हिट एनर्जी इतनी ज्यादा होगी कि यह अंडरग्राउंड बंकर, नौसैनिक जहाज और कमांड सेंटर्स तक को तबाह कर सकेगी. फिलहाल ब्रह्मोस मिसाइल को फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देशों ने खरीदा है. लेकिन नए वेरिएंट के आने के बाद अन्य देशों से भी बड़े ऑर्डर मिलने की संभावना है. यह भारत को हथियारों के वैश्विक बाजार में और मजबूत करेगा.  

रेल लॉन्चर से अग्नि-प्राइम का पहला परीक्षण सफल, भारत की मारक क्षमता को नई उड़ान

नईदिल्ली  भारत ने एक बड़ा कदम उठाया है. डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (डीआरडीओ) ने इंटरमीडिएट रेंज अग्नि-प्राइम मिसाइल का सफल परीक्षण किया. यह नई पीढ़ी की मिसाइल रेल आधारित मोबाइल लॉन्चर से छोड़ी गई. परीक्षण पूरी तरह सफल रहा. यह पहली बार है जब खास डिजाइन वाली रेल लॉन्चर से मिसाइल दागी गई. इससे भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया, जिनके पास 'कैनिस्टराइज्ड' लॉन्च सिस्टम है, जो रेल नेटवर्क पर चलते हुए मिसाइल छोड़ सकता है.      मिसाइल के सफल टेस्ट की डिटेल्स पर नजर डालें तो यह लॉन्च विशेष रूप से डिजाइन किए गए रेल-बेस्ड मोबाइल लॉन्चर सिस्टम से किया गया. इस सिस्टम की खासियत है कि यह बिना किसी पूर्व शर्त के देश के रेल नेटवर्क पर कहीं भी मूवमेंट कर सकता है. इससे लॉन्च में कम समय लगता है और दुश्मन की नजर से बचाव आसान होता है. डीआरडीओ यानी डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन, स्ट्रैटेजिक फोर्सेस कमांड (एसएफसी) और सशस्त्र बलों की टीम ने इस परीक्षण को अंजाम दिया है. हालांकि, परीक्षण का सटीक स्थान सार्वजनिक नहीं किया गया, लेकिन यह रेल नेटवर्क की मोबिलिटी पर फोकस करता है, जो युद्धकाल में मिसाइल की सरवाइवेबिलिटी बढ़ाता है. क्या है अग्नि प्राइम मिसाइल की खासियत अग्नि प्राइम मिसाइल की विशेषताएं इसे और भी खास बनाती हैं. यह इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल है. यह 2000 किलोमीटर तक के टारगेट को हिट कर सकती है. इसमें एडवांस्ड टेक्नोलॉजी शामिल हैं. मसलन बेहतर एक्यूरेसी, कैनिस्टराइज्ड कॉन्फिगरेशन और फास्ट ऑपरेशनल रेडीनेस. यह अग्नि सीरीज की नई पीढ़ी की मिसाइल है, जो पुरानी अग्नि-1 और अग्नि-2 को रिप्लेस करने के लिए डिजाइन की गई है. कैनिस्टराइज्ड सिस्टम से मिसाइल को लंबे समय तक स्टोर किया जा सकता है और लॉन्च के लिए तैयार रखा जा सकता है, जो इसे रोड-मोबाइल, सबमरीन-लॉन्च और साइलो-बेस्ड सिस्टम्स के साथ कंप्लीमेंट करता है. इसकी हाई मोबिलिटी और लो विजिबिलिटी दुश्मन के लिए चुनौतीपूर्ण साबित होगी. अब सवाल है कि आखिर यह टेस्ट क्यों खास है? सबसे बड़ा कमाल यह है कि भारत ने पहली बार रेल से मिसाइल लॉन्च की क्षमता हासिल की है. यह दुनियाभर में अपने आप में दुर्लभ कारनामा है. रेल नेटवर्क की विशालता का फायदा उठाते हुए यह सिस्टम मिसाइल को तेजी से डिप्लॉय करने की अनुमति देता है. इससे स्ट्रैटेजिक सरप्राइज एलिमेंट बढ़ता है. यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ विजन से जुड़ा है, क्योंकि पूरा सिस्टम स्वदेशी रूप से विकसित है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देशों के लिए सिग्नल है, जहां बॉर्डर टेंशन के बीच भारत अपनी मिसाइल क्षमताओं को मजबूत कर रहा है. रेल-बेस्ड लॉन्च से न्यूक्लियर डिटरेंस गेम चेंजर साबित होगा, क्योंकि यह दुश्मन की सैटेलाइट मॉनिटरिंग से बचाव प्रदान करता है. यह टेस्ट इसलिए भी खास है क्योंकि ट्रेन से मिसाइल दागी जाएगी और फिर आगे बढ़ जाएगी. इससे दुश्मन ट्रैक नहीं कर पाएगा. राजनाथ सिंह ने क्या कहा? रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक्स पर पोस्ट कर कहा, ‘भारत ने इंटरमीडिएट रेंज अग्नि प्राइम मिसाइल का सफल लॉन्च रेल-बेस्ड मोबाइल लॉन्चर सिस्टम से किया है. यह नेक्स्ट जेनरेशन मिसाइल 2000 किमी तक की रेंज कवर करती है और विभिन्न एडवांस्ड फीचर्स से लैस है. उन्होंने डीआरडीओ, एसएफसी और सशस्त्र बलों को बधाई दी, साथ ही कहा कि यह भारत को रेल नेटवर्क से कैनिस्टराइज्ड लॉन्च सिस्टम विकसित करने वाले चुनिंदा देशों में शामिल करता है. यह उपलब्धि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. इस तरह से देखा जाए तो यह परीक्षण भारत की मिसाइल टेक्नोलॉजी में मील का पत्थर है. अग्नि-प्राइम क्या है? नई पीढ़ी की सुपर मिसाइल अग्नि-प्राइम अग्नि सीरीज की सबसे आधुनिक मिसाइल है. यह इंटरमीडिएट रेंज (मध्यम दूरी) वाली है, जो 2000 किलोमीटर तक निशाना साध सकती है. इसमें कई एडवांस्ड फीचर्स हैं…     सटीक निशाना: उन्नत नेविगेशन सिस्टम से दुश्मन के ठिकाने को सटीक मार सकती है.     तेज रिएक्शन: छोटे समय में लॉन्च हो सकती है, भले ही कम दिखाई दे.     मजबूत डिजाइन: कैनिस्टर (बंद बॉक्स) में रखी जाती है, जो इसे बारिश, धूल या गर्मी से बचाता है. यह मिसाइल भारत की स्ट्रेटेजिक फोर्सेस कमांड (एसएफसी) के लिए बनी है. परीक्षण ओडिशा के चांदीपुर इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज से किया गया. रेल लॉन्चर की खासियत: कहीं भी, कभी भी हमला इस परीक्षण की सबसे बड़ी बात रेल आधारित मोबाइल लॉन्चर है. यह खास डिजाइन वाला सिस्टम है, जो…     रेल नेटवर्क पर बिना किसी तैयारी के चल सकता है.     क्रॉस कंट्री मोबिलिटी देता है, यानी जंगल, पहाड़ या मैदान में आसानी से ले जाया जा सकता है.     कम समय में लॉन्च: रुकते ही मिसाइल दाग सकता है.     कम विजिबिलिटी में काम: धुंध या रात में भी सुरक्षित. पहले मिसाइलें फिक्स्ड साइट्स से दागी जाती थीं, लेकिन यह लॉन्चर दुश्मन को चकमा दे सकता है. रेल पर चलते हुए लॉन्च करने की क्षमता से भारत की मिसाइल ताकत कई गुना बढ़ गई. परीक्षण की सफलता: भारत का गौरव डीआरडीओ, एसएफसी और भारतीय सेनाओं ने मिलकर यह परीक्षण किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर बधाई दी. उन्होंने कहा कि अग्नि-प्राइम के सफल टेस्ट से भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया, जिनके पास रेल नेटवर्क पर चलते हुए कैनिस्टर लॉन्च सिस्टम है. यह परीक्षण भारत की 'आत्मनिर्भर भारत' योजना का हिस्सा है. अग्नि सीरीज की यह छठी मिसाइल है, जो पहले से ही सेना में तैनात हैं. क्यों महत्वपूर्ण है यह परीक्षण?     रणनीतिक ताकत: दुश्मन को कहीं भी, कभी भी जवाब देने की क्षमता.     सुरक्षा बढ़ेगी: सीमाओं पर तेज रिएक्शन, घुसपैठ रोकेगी.     वैश्विक स्तर: अमेरिका, रूस जैसे देशों के साथ भारत की बराबरी.     भविष्य: अग्नि-प्राइम को जल्द सेना में शामिल किया जाएगा.