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क्या है DF-5C सिस्टम? US-चीन तनातनी के बीच भारत के लिए क्यों बना खतरे की घंटी

बीजिंग दुनिया की दो आर्थिक महाशक्तियों अमेरिका और चीन के बीच तनातनी और व्यापार प्रतिस्पर्धा से लेकर सामरिक प्रतिस्पर्धा तक की होड़ किसी से छिपी हुई नहीं है। दो दिन पहले चीनी शहर तियनाजिन में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन में जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक-दूसरे का हाथ थामे और हंसते-मुस्कुराते सम्मेलन हॉल में प्रवेश किया तो इस तिकड़ी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समेत पूरी दुनिया को एक नया संदेश दिया था। यह संदेश ऐसे वक्त में आया, जब दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका भारत पर सबसे ज्यादा टैरिफ लगाकर वैश्विक आलोचनाएं झेल रहा है। अब चीन ने द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति की 80वीं वर्षगांठ को मौके पर आयोजित वि क्ट्री परेड में न केवल राजधानी बीजिंग में अमेरिका के कट्टर दुश्मनों को एक मंच पर लाने की कोशिश की बल्कि कुल 26 देशों के राष्ट्राध्यक्षों को इसमें शामिल कर ट्रंप को नई टेंशन दी है। इसी विक्ट्री परेड के जरिए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अमेरिका को तीसरी टेंशन भी दे दी। अमूमन अपने हथियारों का प्रदर्शन नहीं करने वाले चीनी सैनिकों ने इस बार न सिर्फ भव्य परेड किया बल्कि अपने अत्याधुनिक हथियारों का भी प्रदर्शन किया। अत्याधुनिक हथियारों का प्रदर्शन चीन ने बुधवार को अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करते हुए जेट लड़ाकू विमान, मिसाइल और नवीनतम इलेक्ट्रॉनिक युद्ध हार्डवेयर सहित अपने कुछ आधुनिक हथियारों को पहली बार सार्वजनिक रूप से दिखाया है। चीनी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने पहली बार हवाई-प्रक्षेपित परमाणु मिसाइल, जेएल-1, का एक सैन्य ट्रक पर प्रदर्शन किया है। यह मॉडल, मौजूद JL-3 अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल से काफ़ी छोटा है, जो पनडुब्बी से ही प्रक्षेपित हो सकता है। सैन्य विश्लेषकों ने बताया है कि चीन ने इन दो मिसाइलों के अलावा DF-61 और DF-31 मिसाइलों का भी प्रदर्शन किया है, जो चीनी सेना को जल,थल और नभ -तीनों जगहों से दुश्मनों के ठिकानों पर न्यूक्लियर हमला करने में सक्षम बनाता है और चीन को पूरी सुरक्षा कवच उपलब्ध कराता है। इसी परेड में चीनी सेना ने अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल DF-5C का भी प्रदर्शन किया है। इस मिसाइल के प्रदर्शन ने दुनिया को संदेश दिया है कि चीन की रणनीतिक प्रतिरोधक क्षमता विश्वसनीय, भरोसेमंद और पर्याप्त है। क्या है DF-5C मिसाइल सिस्टम? यह डोंग फेंग-5 सीरीज का अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक न्यूक्लियर मिसाइल सिस्टम है। DF-5C लिक्विड-ईंधन से संचालित मिसाइल है। ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मिसाइल की मारक क्षमता 20,000 किलोमीटर से ज्यादा है और यह टारगेट पर निशाना साधने के मामले में सर्वश्रेष्ठ है। इसका सीधा सा मतलब है कि अमेरिका समेत पूरी दुनिया में कहीं भी यह मिसाइल सर्वनाश कर सकता है। एक ही समय में 10 अलग-अलग ठिकानों पर निशाना DF-5C कथित तौर पर 10 स्वतंत्र ठिकानों पर एक साथ हमले कर सकता है। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि एक ही मिसाइल एक ही समय में 10 अलग-अलग स्थानों को निशाना बना सकती है। यह मिसाइल दुश्मन के सैन्य ठिकानों और अन्य अहम ठिकानों को एक बार में ही निशाना बना सकती है, और हमलों के क्रम को एडजस्ट कर सकता है। यह दुनिया के किसी भी हिस्से में परमाणु बम गिरा सकता है लेकिन इसे कोई भी एयर डिफेंस सिस्टम इंटरस्पेट नहीं कर सकता है। भारत की भी बढ़ी चिंता इसका ट्रांसपोर्टेशन तीन अलग-अलग सेक्शन में होता है। इस वजह से इसकी तैनाती गुप्त हो जाकी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि DF-5C की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्पीड है। यह आवाज से भी कई गुणा तेज गति से चल सकती है, इसकी वजह से दुनिया का कोई भी एंटी मिसाइल डिफेंस सिस्टम इसे इंटरसेप्ट कर पाने में नाकाम रह सकता है। चीन के अत्याधुनिक हथियारों के प्रदर्शन ने भारत की भी चिंता बढ़ा दी है क्योंकि हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में चीन एक साझेदार देश के अलावा एक बड़ी चुनौती भी रहा है।  

आतंकी फंडिंग का पर्दाफाश! TRF ने मलेशिया से जुटाए लाखों रुपये, NIA जांच में खुलासा

नई दिल्ली राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने लश्कर-ए-तैयबा के प्रॉक्सी संगठन, द रेसिस्टेंस फ्रंट (TRF) के खिलाफ अपनी जांच में महत्वपूर्ण सबूत जुटाए हैं। एनआईए ने श्रीनगर के एक व्यक्ति के मोबाइल फोन से 450 से अधिक कॉन्टैक्ट लिस्ट हासिल की है, जिससे टीआरएफ को धन मुहैया कराने वालों की पहचान करने में मदद मिली है। बता दें कि यह संगठन 22 अप्रैल को हुए पहलगाम आतंकी हमले की जिम्मेदारी लेने के बाद बाद इससे पीछे हट गया था। जांच के दौरान, एनआईए को मलेशिया के जरिए हवाला मार्ग के संभावित इस्तेमाल का पता चला है जिससे टीआरएफ को फंडिंग की जा रही थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जांच में मलेशिया निवासी सज्जाद अहमद मीर का नाम सामने आया है। एक अन्य संदिग्ध, यासिर हयात के फोन कॉल डिटेल से पता चला कि वह मीर के संपर्क में था और पैसों की व्यवस्था कर रहा था। रिपोर्ट के अनुसार, हयात ने टीआरएफ के लिए धन जुटाने के लिए कई बार मलेशिया की यात्रा की। हयात ने मीर की मदद से टीआरएफ के लिए 9 लाख रुपये जुटाए, जो संगठन के एक अन्य ऑपरेटिव शफात वानी को दिए गए। वानी टीआरएफ का एक प्रमुख ऑपरेटिव है और संगठन की गतिविधियों को संचालित करता है। यह भी पता चला कि वानी ने मलेशिया में एक विश्वविद्यालय में सम्मेलन में भाग लेने के बहाने यात्रा की थी, हालांकि विश्वविद्यालय ने इस यात्रा को स्पॉन्सर नहीं किया था। एनआईए की जांच में यह भी सामने आया कि हयात न केवल मीर के संपर्क में था, बल्कि वह दो पाकिस्तानी नागरिकों के साथ भी संपर्क में था। उसका मुख्य काम विदेशी ऑपरेटिव्स से संपर्क बनाए रखना और आतंकी संगठन के लिए धन जुटाना था। 13 अगस्त को, एनआईए ने कहा था कि उसने विदेशी फंडिंग के एक निशान का पता लगाया है, जिसकी गहन जांच की जा रही है। टीआरएफ को 2019 में लश्कर-ए-तैयबा के प्रॉक्सी के रूप में बनाया गया था, ताकि इसे जम्मू-कश्मीर का स्थानीय संगठन दिखाया जा सके। इसका उद्देश्य हिजबुल मुजाहिदीन को रिप्लेस करना और स्थानीय आतंकी गतिविधियों को नई पहचान देना था। पाकिस्तान और लश्कर-ए-तैयबा को जवाबदेही से बचाने के लिए टीआरएफ को बनाया गया था, ताकि कश्मीर में कथित संघर्ष को स्थानीय दिखाया जा सके। इसके अलावा, पाकिस्तान चाहता था कि आतंकी हमले जारी रहें और साथ ही वह फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की निगरानी से भी बच सके। भारत ने टीआरएफ को एक आतंकी संगठन घोषित किया है और पाकिस्तान पर इसका समर्थन करने का आरोप लगाया है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद, अमेरिका ने टीआरएफ को एक विदेशी आतंकी संगठन और विशेष रूप से नामित वैश्विक आतंकी इकाई घोषित किया, जो पाकिस्तान के लिए एक बड़ा झटका था। इस कदम ने पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क को उजागर कर दिया। एनआईए की जांच अभी भी जारी है, और एजेंसी इस आतंकी संगठन के नेटवर्क को पूरी तरह से खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है।  

आरक्षण विवाद गहराया: मंत्री नाराज, OBC संगठनों ने महाराष्ट्र सरकार को घेरा

मुंबई  अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) कार्यकर्ता लक्ष्मण हाके ने दावा किया कि महाराष्ट्र सरकार को मराठों को ‘कुनबी’ जाति प्रमाण पत्र प्रदान करने की मांग स्वीकार करने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने चेतावनी दी है कि ओबीसी समुदाय इस फैसले के खिलाफ सड़कों पर उतरेगा। इधर, राज्य सरकार के फैसले पर कैबिनेट मंत्री छगन भुजबल पहले ही नाराजगी दर्ज करा चुके हैं। हाके ओबीसी समूह के तहत मराठों को आरक्षण दिए जाने का विरोध करते रहे हैं। उन्होंने कहा कि नेताओं को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वे अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण को कम करना चाहते हैं। उन्होंने पहले मराठों को ओबीसी श्रेणी के तहत आरक्षण दिए जाने की मनोज जरांगे की मांग के खिलाफ आंदोलन किया था। देवेंद्र फडणवीस सरकार द्वारा पात्र मराठों को ‘कुनबी’ जाति प्रमाण पत्र प्रदान करने सहित अधिकतर मांगों को स्वीकार किए जाने के बाद आरक्षण कार्यकर्ता मनोज जरांगे ने मंगलवार शाम को मुंबई में अपना पांच दिन से जारी अनशन समाप्त कर दिया। महाराष्ट्र सरकार ने मंगलवार को मराठा समुदाय के सदस्यों को उनकी कुनबी विरासत के ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ कुनबी जाति प्रमाण पत्र जारी करने के लिए एक समिति के गठन की घोषणा की। कुनबी राज्य में एक पारंपरिक कृषक समुदाय है और उन्हें नौकरियों एवं शिक्षा में सरकारी आरक्षण का पात्र बनाने के लिए महाराष्ट्र में ओबीसी श्रेणी की सूची में शामिल किया गया है। सामाजिक न्याय और विशेष सहायता विभाग द्वारा जारी सरकारी आदेश (जीआर) में हैदराबाद राजपत्र को लागू करने का भी उल्लेख किया गया है। हाके ने जीआर और वंशावली दस्तावेज वाले पात्र मराठों को ‘कुनबी’ जाति प्रमाण पत्र प्रदान करने के निर्णय पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए दावा किया कि सरकार को आरक्षण के संबंध में इस तरह का जीआर जारी करने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने दावा किया कि राजपत्र में यह नहीं लिखा है कि मराठा सामाजिक रूप से पिछड़े हैं और उन्हें आरक्षण दिया जाना चाहिए। कार्यकर्ता ने पूछा, 'कौन कहता है कि राजपत्र में दर्ज राजस्व रिकॉर्ड उन्हें आरक्षण के योग्य बनाते हैं?' उन्होंने कहा, 'हैदराबाद राजपत्र में बंजारा को अनुसूचित जनजाति बताया गया है। क्या सरकार बंजारों को अनुसूचित जनजाति का आरक्षण देगी? सरकार को एक मुद्दे को सुलझाने के लिए 10 और मुद्दे नहीं पैदा करने चाहिए। ओबीसी और वीजेएनटी (विमुक्त जाति और घुमंतू जनजातियां) अब सड़कों पर उतरेंगे।' उन्होंने कहा कि नेताओं को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वे ओबीसी आरक्षण में कटौती को तैयार हैं।  

दुनिया भर में चर्चा बटोर रही किम जोंग उन की 12 साल की बेटी किम जू, क्यों ले गए थे चीन

बीजिंग उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन की बीजिंग यात्रा की काफी चर्चा है। व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग के साथ उनकी तस्वीरें इंटरनेशनल मीडिया में सुर्खियां बटोर रही हैं। कहा जा रहा है कि किम जोंग उन को इस तरह महत्व मिलना उन्हें दुनिया के एकांतवास से बाहर निकालने वाला है। यही नहीं उनकी 12 साल की बेटी और संभावित उत्तराधिकारी किम जू ए भी चर्चा में हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि किम जोंग उन पहली बार किसी विदेश दौरे पर बेटी को लेकर गए थे। किम जोंग उन के साथ ही उनकी बेटी नजर आईं और उनका परिचय खुद पिता ने पुतिन और शी जिनपिंग जैसे नेताओं से कराया। चीन की राजधानी बीजिंग में हुई विक्ट्री डे परेड में भी वह किम जोंग उन के आसपास ही बनी रहीं। यह पहला मौका था, जब किम जोंग उन की बेटी को दुनिया ने किसी सार्वजनिक आयोजन में देखा। जानकारों का कहना है कि जिस तरह वह पिता के साथ-साथ दिखीं और उनका परिचय वैश्विक नेताओं से कराया गया, इससे संकेत मिलता है कि वही किम जोंग उन की उत्तराधिकारी होंगी। दिलचस्प तथ्य यह भी है कि किम जोंग उन की आयु फिलहाल 41 साल ही है। किम जोंग उन और उनके परिवार को लेकर दुनिया को बहुत कम ही जानकारी ही है। वजह है कि उत्तर कोरिया में मीडिया पर काफी पाबंदियां हैं और वहां से जानकारियां बाहर कम ही आती हैं। किम जोंग उन की बेटी जू ए के बारे में दुनिया को पहली बार पहली बार 2022 में ही जानकारी मिली थी। जब वह अपने पिता के साथ एक बलिस्टिक मिसाइल लॉन्च के कार्यक्रम में गई थीं। पूर्व एनबीए स्टार डेनिस रॉडमैन ने दुनिया को बताया था कि वह किम की बेटी हैं। रॉडमैन ने कहा था कि 2013 में वह प्योंगयांग गए थे और इस दौरान उनकी किम से मुलाकात हुई थी। इस मीटिंग के दौरान किम जोंग उन ने अपनी पत्नी रि सोल जू और एक छोटी बच्ची से भी परिचय कराया था। तब उन्होंने कहा था कि यह मेरी बेटी है। प्योंगयांग का सरकारी मीडिया कभी भी बेटी का नाम नहीं लिखता, लेकिन साउथ कोरिया के खुफिया सूत्रों के अनुसार जू ए किम की बेटी ही हैं। वैश्विक नेताओं से मिलतीं किम जू ए उत्तर कोरिया के नेता की शादी 2009 में हुई थी। बीते कुछ सालों में उत्तर कोरिया के मीडिया में किम जू ए के बारे में रिपोर्टिंग होती रही है, लेकिन उन्हें प्यारी बच्ची या फिर होनहार बच्ची कहके संबोधित किया जाता रहा है। उत्तर कोरिया से आई तस्वीरों में अकसर दिखता है कि बड़ी आयु के लोग भी बच्ची के आगे सिर झुकाते हैं। इससे भी अनुमान लगाया गया कि शायद वही किम जोंग उन की बेटी और सत्ता की वारिस हैं। यही नहीं सार्वजनिक कार्यक्रमों में वह अकसर अपनी बुआ किम यो जोंग और मां से आगे चलती दिखती हैं।

शहबाज शरीफ पर हो रही खिल्ली, पुतिन के सामने 3 साल बाद फिर повтор हुआ हादसा

नई दिल्ली  पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मियां शहबाज शरीफ इन दिनों चीन के दौरे पर हैं। वहां उनकी एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय बेइज्जती हुई है। पाक पीएम को तब शर्मिंदगी झेलनी पड़ी, जब वह शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन से इतर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ एक मीटिंग कर रहे थे। हुआ यूं कि इस बातचीत के दौरान शहबाज शरीफ बार-बार ईयर फोन लगाने की कोशिश करते दिखे, जबकि सामने बैठे रूसी राष्ट्रपति उन्हें इशारों में ईयर फोन लगाने के लिए बताते रहे। बड़ी बात ये है कि राष्ट्रपति पुतिन से सामने पाक पीएम की यह बेइज्जती दूसरी बार हुई है। तीन साल पहले जब उज्बेकिस्तान में दोनों नेता मिले थे, तब उस वक्त भी शहबाज शरीफ को इसी तरह के शर्मनाक वाकये का सामना करना पड़ा था। अब इस वाकये का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। पुतिन इशारों में समझाते रहे वायरल वीडियो में दिख रहा है कि शहबाज शरीफ का ईयरफोन हेडसेट कानों में लगाने की कोशिश करने के बावजूद फिसलकर बार-बार गिर जा रहा है। इस दौरान पुतिन कुछ सेकंड तक जद्दोजहद करते शहबाज़ शरीफ को देखकर मुस्कुराते नजर आए। वैश्विक मंच पर शर्मिंदगी से बचने की कोशिश में, रूसी नेता ने पाकिस्तानी राष्ट्रपति को अपना ईयरफोन उठाकर दिखाया कि उसे कैसे लगाया जाता है। सोशल मीडिया पर उड़ रही खिल्ली सोशल मीडिया यूजर्स इस वाकए पर शहबाज शरीफ की खिल्ली उड़ा रहे हैं। एक एक्स यूज़र ने ईयरफ़ोन में आई गड़बड़ी का वीडियो शेयर करते हुए लिखा, "बीजिंग में शहबाज़ शरीफ़ का ईयरफोन फिसलने पर पुतिन फिर से हँस पड़े।" एक अन्य यूजर ने पूछा, "ये पुराना वीडियो है या फिर से हुआ?" एक अन्य ने पूछा, "पुतिन के सामने वो हमेशा इतना नर्वस क्यों हो जाते हैं?" एक अन्य यूजर ने टिप्पणी की, "पुतिन उसे ईयरफोन लगाना सिखा रहे हैं। हाहा।" अन्य ने लिखा, "बार-बार!" पहले भी इसी तरह का वाकया बहरहाल, यह पहली बार नहीं है जब शरीफ़ को ईयरफ़ोन लगाने में परेशानी हुई हो। उज़्बेकिस्तान में 2022 के शिखर सम्मेलन के दौरान भी उन्हें इसी पुतिन के सामने इसी तरह की परेशानी का सामना करना पड़ा था। जब उनकी बातचीत शुरू होने वाली थी, तभी उनके ईयरफ़ोन बार-बार फिसल रहे थे, और उनके अधिकारियों द्वारा उन्हें ठीक करने की कोशिश के बावजूद यह सिलसिला चलता रहा था। इस वाकये पर विदेशी टिप्पणीकारों के साथ-साथ पाकिस्तान के विपक्षी दलों ने भी इसकी आलोचना की थी। कॉमेडियन जिमी फॉलन ने मज़ाक में कहा था, "आश्चर्यजनक बात यह है कि शहबाज़ शरीफ़ दुनिया की 22 करोड़ आबादी के प्रधानमंत्री हैं।"  

अमेरिका की टैरिफ नीति पर Moody’s ने दी चेतावनी, आर्थिक मंदी का खतरा बढ़ा

वाशिंगटन  एक ओर जहां अमेरिकी राष्ट्रपति दुनिया के तमाम देशों पर टैरिफ बम फोड़कर हुए बड़े-बड़े दावे करते हुए धौंस दिखा रहे हैं, तो वहीं ग्लोबल रेटिंग एजेंसी मूडीज ने उन्हें बड़ा झटका दिया है. अपनी लेटेस्ट रिपोर्ट में मूडीज ने चेतावनी देते हुए कहा कि अमेरिका गंभीर मंदी की कगार पर पहुंच गया है और यूएस इकोनॉमी का एक तिहाई हिस्सा पहले से ही संकट से जूझ रहा है. ये चेतावनी ट्रंप ही नहीं, बल्कि अमेरिका के लिए एक बुरी खबर है.  मूडीज का ट्रंप को बड़ा अलर्ट मूडीज एनालिटिक्स के मुख्य अर्थशास्त्री मार्क जैंडी ने अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा है कि राज्य-स्तरीय आंकड़े इस ओर इशारा कर रहे हैं, कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था मंदी के कगार पर है. उन्होंने विश्लेषण के आधार पर कहा कि हालात ये हैं कि अमेरिकी सकल घरेलू उत्पाद (यूएस जीडीपी) का लगभग एक-तिहाई हिस्सा बनाने वाले राज्य या तो मंदी की चपेट में हैं या मंदी के हाई रिस्क में पहुंच चुके हैं.  अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जीडीपी ग्रोथ रेट और महंगाई के आंकड़ों को भले ही आर्थिक सफलता का प्रमाण बता रहे हैं और टैरिफ के पॉजिटिव असर के दावे कर रहे हैं, लेकिन मूडीज के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि संयुक्त राज्य अमेरिका एक और मंदी के मुहाने पर खड़ा है, जिससे भारी वित्तीय नुकसान का सामना करना पड़ सकता है.  मंदी के खतरे में राज्य, नौकरियां खत्म  रिपोर्ट में जैंडी के हवाले से कहा गया है कि अमेरिका की जीडीपी का एक तिहाई हिस्सा जिन राज्यों के आता है, वो मंदी से गुजर रहे हैं या मंदी के खतरे में हैं. वहीं एक तिहाई राज्यों की ग्रोथ स्थिर दिख रही है, जबकि बचे हुए एक तिहाई राज्यों में ही वृद्धि दर्ज की जा रही है. मार्क जैंडी के मुताबिक, सरकारी नौकरियों में कटौती के कारण संकट बढ़ता नजर आ रहा है. उन्होंने कहा है कि उत्तर-पूर्व, मध्य-पश्चिम और वाशिंगटन डीसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा असर दिखा है, जहां नौकरियों कम हो रही हैं. ट्रंप के शपथ ग्रहण के बाद जनवरी से मई तक वाशिंगटन डीसी में 22,100 सरकारी नौकरियां खत्म की गई हैं. विनिर्माण पीएमआई में गिरावट  हाल ही में आई रॉयटर्स की रिपोर्ट भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मंदी के खतरे से जुड़े कुछ संकेत शेयर किए गए. इसमें बताया गया कि अगस्त 2025 में अमेरिका का मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई घटकर 48.7 पर आ गया है और कारखानों की स्थिति 'US Great Recession' के समय से भी बदहाल बताई जा रही है.  रिपोर्ट के मुताबिक, जहां अमेरिका दुनियाभर के देशों पर टैरिफ अटैक कर रहा है, तो वहीं अगस्त में अमेरिकी विनिर्माण क्षेत्र में लगातार छठे महीने तेज गिरावट दर्ज की गई है. इसकी वजह बताते हुए कहा गया है कि देश के कारखाने ट्रंप प्रशासन के आयात शुल्कों के दुष्प्रभावों से जूझ रहे हैं. यानी साफ है कि टैरिफ फायदे की जगह नुकसान पहुंचाने वाला साबित हो रहा है. मैन्युफैक्चरर्स ने टैरिफ टेंशन के बीच मौजूदा कारोबारी माहौल को महामंदी से भी बदतर करार दिया है.  आंकड़ों को दरकिनार कर रहे ट्रंप इंस्टीट्यूट फॉर सप्लाई मैनेजमेंट (आईएसएम) के सर्वे का हवाला देते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि कुछ मैन्युफैक्चरर ने ये साफ किया है कि अत्यधिक आयात शुल्कों के कारण अमेरिका में वस्तुओं का निर्माण अब मुश्किल होता जा रहा है.  जबकि दूसरी ओर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तमाम संकेतों और आंकड़ों के बावजूद अपने ट्रेड पॉलिसी का बचाव कर रहे है और टैरिफ के देश के हित में उठाया गया कदम बताते हुए इसे लंबे समय से गिरते अमेरिकी औद्योगिक आधार को पुनर्जीवित करने के लिए जरूरी बताते नजर आ रहे हैं. 

CAA : केंद्र ने लिया महत्वपूर्ण निर्णय, अल्पसंख्यक नागरिकों की भारत में रहने की अवधि बढ़ी

नई दिल्ली केंद्र सरकार ने धार्मिक उत्पीड़न से बचकर भारत आए अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के अल्पसंख्यक समुदायों को बड़ी राहत दी है. गृह मंत्रालय ने एक आदेश में कहा कि हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के वे लोग, जो 31 दिसंबर 2024 तक भारत आए हैं, उन्हें पासपोर्ट या अन्य ट्रैवल डॉक्यूमेंट्स के बिना भी देश में रहने की अनुमति दी जाएगी. यह आदेश इमीग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्टर, 2025 के तहत जारी किया गया है. इसके तहत उन लोगों को राहत मिलेगी जो मान्य पासपोर्ट और वीजा के बिना भारत में आए या जिनके डॉक्यूमेंट्स की वैधता खत्म हो चुकी है. गृह मंत्रालय के आदेश में कहा गया है कि ऐसे लोग जो धार्मिक उत्पीड़न या उसके भय से भारत आए और 31 दिसंबर 2024 तक देश में दाखिल हुए, उन्हें पासपोर्ट और वीजा रखने के नियम से छूट दी जाएगी. पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से भारत आए अल्पसंख्यकों के पासपोर्ट नियमों में बदलाव किया गया है। गृह मंत्रालय ने आदेश जारी करते हुए कहा कि 31 दिसंबर 2024 से पहले इन तीन देशों से भारत आने वाले अल्पसंख्यकों को पासपोर्ट दिखाने की जरूरत नहीं है। वो बिना पासपोर्ट के भी देश में रह सकते हैं। यह आदेश पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए 6 अल्पसंख्यकों – हिंदू, ईसाई, सिक्ख, बौद्ध, जैन और पारसी समुदाय के लोगों पर लागू होगा। अगर यह लोग 21 दिसंबर 2024 से पहले भारत में आए हैं, तो ये बिना पासपोर्ट के यहां रह सके हैं। नेपाल-भूटान के नागरिकों पर भी लागू होगा नियम गृह मंत्रालय ने  Immigration and Foreigners (Exemption) Order 2025 जारी किया है। इस आदेश के अनुसार, 1959 से 30 मई 2003 तक नेपाल, भूटान और तिब्बत से भारत आए लोगों को विदेशी रजिस्ट्रेशन ऑफिसर के पास अपना नाम रजिस्टर करवाना होगा, जिसके बाद वो भी बिना पासपोर्ट के भारत में रह सकते हैं। हालांकि, चीन, मकाउ, हांगकांग और पाकिस्तान से भारत आने वाले नेपाली और भूटानी नागरिकों पर यह नियम लागू नहीं होंगे। गौरतलब है कि सीएए, पिछले साल लागू हुआ था. इसके तहत अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के अल्पसंख्यक समुदायों – हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई – को, अगर वे 31 दिसंबर 2014 तक भारत आ चुके हैं, तो भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है. कई लोग 2014 के बाद भी धार्मिक उत्पीड़न से बचकर भारत आए थे. इनमें खासतौर पर पाकिस्तान से आए हिंदुओं की संख्या अधिक है. ऐसे लोगों के लिए यह आदेश बड़ी राहत लेकर आया है क्योंकि अब उन्हें देश में रहने के लिए पासपोर्ट या वीजा की वैधता दिखाने की जरूरत नहीं होगी. गृह मंत्रालय ने आदेश में क्या कहा?     31 दिसंबर 2024 तक भारत आए अल्पसंख्यक समुदायों को पासपोर्ट और वीजा की अनिवार्यता से छूट दी जाएगी.     चाहे वे लोग बिना डॉक्यूमेंट्स आए हों या वैध डॉक्यूमेंट्स लेकर आए हों जिनकी अब वैधता समाप्त हो चुकी है.     यह छूट विशेष रूप से उन लोगों को दी गई है जिन्हें धार्मिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है. क्यों अहम है यह फैसला? यह कदम हजारों लोगों की चिंता दूर करेगा, खासकर पाकिस्तान से आने वाले हिंदू परिवारों को राहत मिलेगी. अब वे देश में बिना किसी कानूनी डर के रह सकेंगे. हालांकि, नागरिकता का अधिकार फिलहाल CAA के प्रावधानों के अनुसार 2014 तक आने वालों को ही मिलेगा, लेकिन 2014 के बाद आए लोगों के लिए यह आदेश भारत में रहने को लेकर एक बड़ी सुरक्षा कवच साबित होगा.

लुटियंस दिल्ली का ऐतिहासिक नेहरू बंगला अब नया मालिक पा चुका है

नई दिल्ली देश की राजधानी के बेहद वीवीआईपी इलाके लुटियंस बंगलो ज़ोन में स्थित एक बंगला इन दिनों खूब सुर्खियों में है. यह बंगला देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का पहला आधिकारिक आवास था. लुटियंस दिल्ली के 17 मोतीलाल नेहरू मार्ग (पहले यॉर्क रोड) पर स्थित यह बंगला इस 14,973 वर्ग मीटर (करीब 3.7 एकड़) में फैला है. इस बंगले को अब बेच दिया गया है. यह सौदा देश की अब तक की सबसे महंगी प्रॉपर्टी डील बताई जा रही है. 1100 करोड़ में हुई डील अंग्रेजी अखबार इकोनॉमिक टाइम्स ने सूत्रों के हवाले से बताया, इस बंगले के मालिकों ने 1,400 करोड़ रुपये मांगे थे. हालांकि भारतीय पेय उद्योग (beverage industry) से जुड़े एक बड़े कारोबारी ने लगभग 1,100 करोड़ रुपये में डील को फाइनल कर दिया है. कौन हैं इस बंगले के मालिक? राजकुमारी कक्कड़ और बीना रानी इस बंगले की मौजूदा मालिक है. ये दोनों राजस्थान के एक शाही परिवार से ताल्लुक रखते हैं. अखबार के मुताबिक, कानूनी प्रक्रिया के अंतिम चरण के तहत एक नामी लॉ फर्म ने सार्वजनिक नोटिस जारी किया है. नोटिस में कहा गया है, ‘हमारे क्लाइंट इस संपत्ति (प्लॉट नंबर 5, ब्लॉक नंबर 14, 17, मोतीलाल नेहरू मार्ग) को खरीदने के इच्छुक हैं. इस संपत्ति के मौजूदा मालिक राजकुमारी कक्कड़ और बीना रानी हैं. अगर किसी अन्य व्यक्ति का इस संपत्ति पर कोई हक या दावा है तो वह सात दिनों के भीतर दस्तावेज़ी सबूत के साथ हमें सूचित करें. वरना यह माना जाएगा कि इस संपत्ति पर किसी का कोई विरोधी दावा नहीं है.’ साल भर से चल रही थी बात करीब 24,000 वर्ग फुट में बनी इस विशाल संपत्ति को बेचने को लेकर साल भर से बातचीत चल रही थी. एक जानकार के अनुसार, ‘इसकी लोकेशन, वीवीआईपी स्टेटस और आकार को देखते हुए यह बेहद कीमती संपत्ति है. लेकिन कीमत के चलते सिर्फ अरबपति खरीदार ही इसमें रुचि दिखा सकते थे.’ यह संपत्ति लुटियंस बंगलो ज़ोन में स्थित है, जिसे ब्रिटिश आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस ने 1912 से 1930 के बीच डिजाइन किया था. करीब 28 वर्ग किलोमीटर में फैले इस क्षेत्र में लगभग 3,000 बंगले हैं, जिनमें ज्यादातर मंत्री, जज और वरिष्ठ सरकारी अधिकारी रहते हैं. यहां लगभग 600 निजी संपत्तियां भी हैं, जो भारत के सबसे अमीर लोगों की झोली में हैं. इस डील के पूरा होने के बाद 17 मोतीलाल नेहरू मार्ग स्थित यह बंगला देश की सबसे महंगी आवासीय प्रॉपर्टी बिक्री का नया रिकॉर्ड कायम करेगा.

असम के आदिवासी बहुल जिले में जमीन विवाद, हाईकोर्ट ने पूछा: निजी कंपनी इतनी बड़ी जमीन कैसे खरीद सकती है?

गौहाटी  गौहाटी हाई कोर्ट ने असम के आदिवासी बहुल दीमा हसाओ जिले में एक प्राइवेट सीमेंट कंपनी को 3,000 बीघा (करीब 1,000 एकड़) जमीन आवंटित किए जाने पर नाराजगी जाहिर की है और पूछा है कि एक निजी कंपनी 3,000 बीघा जमीन कैसे खरीद सकती है। हाई कोर्ट ने छठी अनुसूची के तहत आने वाले इस क्षेत्र के 22 निवासियों की एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि एक निजी कंपनी द्वारा इतने बड़े भू-भाग की खरीद से ‘परेशान और स्तब्ध’ हैं। सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पूछा कि क्या इस परियोजना के लिए पर्यावरण मंजूरी ली गई है। रिट याचिका की सुनवाई के दौरान जस्टिस संजय कुमार मेधी और राज्य के महाधिवक्ता देबोजीत सैकिया के बीच इस बात पर लंबी बहस हुई कि क्या छठी अनुसूची क्षेत्र के उमरंगसो में कारखाना स्थापित करने के लिए महाबल सीमेंट को इतनी अधिक जमीन दी जानी चाहिए। सुनवाई का यूट्यूब चैनल पर सीधा प्रसारण इस सुनवाई का हाई कोर्ट के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर सीधा प्रसारण किया गया। सुनवाई के दौरान जस्टिस मेधी ने कहा, "अदालत 3,000 बीघा जमीन के आवंटन से परेशान है। हम सिर्फ़ यह रिकॉर्ड देखना चाहते हैं कि नीति कैसे बनाई गई।" इस दौरान असम के महाधिवक्ता सैकिया ने अदालत को बताया कि एक सीमेंट कंपनी ने 2 लाख रुपये प्रति बीघा की दर से जमीन खरीदी है। महाधिवक्ता के बार-बार अनुरोध के बाद, अदालत ने सरकार से 3 सितंबर को अपना हलफनामा दाखिल करने को कहा। जज बोले- मैं तो हैरान-परेशान सुनवाई के दौरान जस्टिस संजय कुमार मेधी 3,000 बीघा की बात सुनकर हैरान रह गए! "पूरा जिला? क्या हो रहा है? एक निजी कंपनी को 3,000 बीघा जमीन दी जा रही है।" इस दौरान एनसी हिल्स स्वायत्त परिषद (NCHAC) के वकील, जिनके पास भूमि का अधिकार क्षेत्र है, ने दीमा हसाओ में एक सीमेंट कारखाने को 3,000 बीघा भूमि के आवंटन से संबंधित कुछ कागजात प्रस्तुत किए, लेकिन कोर्ट ने उन्हें पूरी फाइल पेश करने का निर्देश दिया, जिसमें छठी अनुसूची क्षेत्र में भूमि के बड़े हिस्से को निजी फर्म को आवंटित करने का निर्णय शामिल है। पूरी फाइल पेश करने का आदेश रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस मेधी ने कहा, "NCHAC के वकील ने कुछ कागजात पेश किए। पिछले आदेश का उद्देश्य कुछ कागजात देखना नहीं था, बल्कि उस फाइल को देखना था जिसमें जमीन के बड़े हिस्से को आवंटित करने का निर्णय शामिल है।" उन्होंने NCHAC को अगली सुनवाई में फाइल पेश करने का निर्देश दिया। महाधिवक्ता ने कहा कि राज्य सरकार ने मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की थी और उसने रिपोर्ट सौंप दी है।

वेनेजुएला जहाज पर अमेरिकी हमला, ड्रग तस्करी के आरोप में 11 की हुई जान

कैरेकस अमेरिका ने वेनेजुएला के जहाज पोत पर सैन्य हमला कर दिया है. इस हमले में 11 की मौत हो गई है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पोस्ट कर खुद इसकी जानकारी दी. ट्रंप ने कहा कि आज सुबह मेरे आदेश पर अमेरिकी सैन्यबलों ने SOUTHCOM क्षेत्र में Tren de Aragua नार्को गैंग पर सैन्य कार्रवाई की. टीडीए एक विदेशी आतंकी संगठन है, जो निकोलस मादुरो के नियंत्रण में काम करता है और जिसने सामूहिक हत्याओं, नशीले पदार्थों की तस्करी, मानव तस्करी और अमेरिका एवं पूरे पश्चिमी गोलार्ध में हिंसा व आतंक की घटनाओं को अंजाम दिया है. ट्रंप ने बताया कि ये सैन्य कार्रवाई उस समय की गई, जब आतंकी अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में नशीले पदार्थों की खेप लेकर अमेरिका की ओर जा रहे थे. इस हमले में 11 आतंकियों को मार गिराया गया है. इस कार्रवाई में अमेरिकी सेना को किसी तरह की क्षति नहीं पहुंची. यह संदेश हर उस व्यक्ति के लिए चेतावनी है, जो अमेरिका में ड्रग्स लाने के बारे में सोच भी रहा है. सावधान हो जाइए! इस मामले पर आपका ध्यान देने के लिए धन्यवाद. बता दें कि मौजूदा समय में अमेरिकी नौसेना की एक बड़ी टुकड़ी कैरीबिया में तैनात है, जो उस जगह के पास है, जहां से वेनेजुएला के जहाज पर स्ट्राइक की गई. 4500 नौसैनिकों के साथ चार विध्वंसक और टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों को तैनात किया गया है. मादुरो पर अमेरिका सरकार पर आरोप वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो ने अमेरिका पर उनकी सरकार के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने का आरोप लगाया है. उन्होंने एक सितंबर को कहा था कि ट्रंप सरकार सैन्य धमकियों के जरिए वेनेजुएला में सरकार बदलना चाहती है. मादुरो ने कहा था कि हम अमेरिका के किसी भी तरह के हमले का मुकाबा करने के लिए तैयार हैं.