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जंग में भारी जनहानि का दावा, ईरान ने बताए 1060 मौतें लेकिन सैन्य नुकसान पर साधी चुप्पी

दुबई ईरान की सरकार ने इजरायल के साथ युद्ध में मरने वाले लोगों की नई संख्या जारी करते हुए बताया कि इसमें कम से कम 1,060 लोग मारे गए हैं। साथ ही, उसने चेतावनी दी है कि यह संख्या बढ़ सकती है। ईरान के ‘फाउंडेशन ऑफ मार्टर एंड वेटरंस अफेयर्स’ के प्रमुख सईद ओहादी ने सोमवार देर रात ईरानी सरकारी टेलीविजन पर प्रसारित एक साक्षात्कार में मृतकों की संख्या के बारे में जानकारी दी। ओहादी ने चेतावनी दी कि कुछ लोग जिस तरह से गंभीर रूप से घायल हुए हैं, उसे देखते हुए मरने वालों की संख्या 1,100 तक पहुंच सकती है। ईरान ने युद्ध के दौरान इजरायल की 12 दिनों की बमबारी के प्रभावों को कम करके दिखाया, जबकि इन हमलों ने उसकी वायु रक्षा प्रणाली को तबाह कर दिया है। युद्ध विराम लागू होने के बाद से ईरान धीरे-धीरे विनाश की व्यापकता को स्वीकार कर रहा है। हालांकि, ईरान ने अब तक यह नहीं बताया है कि उसकी सेना को कितना नुकसान पहुंचा है। वाशिंगटन स्थित मानवाधिकार कार्यकर्ता समूह ने कहा कि 436 नागरिक और सुरक्षाबलों के 435 सदस्यों समेत 1,190 लोग मारे गए हैं। हमलों में 4,475 लोग घायल भी हुए हैं। 12 दिनों तक चला था संघर्ष बता दें कि पिछले महीने 13 जून को, इजरायल ने ईरान पर बड़ा हमला बोल दिया था, जिसके बाद दोनों देशों के बीच संघर्ष छिड़ गया था। इस दौरान इजरायल ने ईरान के परमाणु ठिकानों, बैलिस्टिक मिसाइल स्थलों, इसके शीर्ष जनरलों के आवासों और दो दर्जन से अधिक परमाणु वैज्ञानिकों को निशाना बनाया। बाद में अमेरिका भी इस संघर्ष में कूद पड़ा और उसने ईरान के तीन परमाणु ठिकानों पर 30,000 पाउंड के बंकर बस्टर बम गिराए। 12 दिनों के संघर्ष के बाद इजरायल और ईरान के बीच सीजफायर हो गया था।  

भारत ने UN में अफगानिस्तान को दिया समर्थन, पाकिस्तान को परोक्ष संदेश समझा जा रहा

न्यूयॉर्क भारत ने अफगानिस्तान पर संयुक्त राष्ट्र महासभा में लाए गए मसौदा प्रस्ताव पर मतदान में भाग नहीं लिया और कहा कि ‘‘सामान्य तौर-तरीकों के साथ काम करने’’ से शायद वे परिणाम नहीं मिल पाएंगे, जिनकी वैश्विक समुदाय अफगान जनता के लिए अपेक्षा करता है। संयुक्त राष्ट्र की 193 सदस्यीय महासभा ने सोमवार को जर्मनी द्वारा पेश ‘अफगानिस्तान में स्थिति’ पर प्रस्ताव को पारित किया। प्रस्ताव के पक्ष में 116 वोट पड़े, दो ने विरोध किया और 12 देश मतदान से दूर रहे, जिनमें भारत भी शामिल है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि, राजदूत पर्वतनेनी हरीश ने मतदान में भाग न लेने पर कहा कि किसी भी युद्धोत्तर स्थिति से निपटने के लिए एक समेकित नीति में विभिन्न बातें समाहित होनी चाहिए, जिसमें सकारात्मक व्यवहार को प्रोत्साहित करने और हानिकारक कार्यों को हतोत्साहित करने वाले उपाय शामिल हों। हरीश ने कहा, ‘‘हमारे दृष्टिकोण में केवल दंडात्मक उपायों पर केंद्रित एकतरफा रुख नहीं चल सकता। संयुक्त राष्ट्र और व्यापक अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने अन्य युद्धोत्तर परिप्रेक्ष्य में अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाए हैं।’’ उन्होंने कहा कि भारत, अफगानिस्तान में सुरक्षा स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह सुनिश्चित करने के लिए अपने समन्वित प्रयास करने चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा नामित संस्थाएं और व्यक्ति, अलकायदा और उसके सहयोगी संगठन, इस्लामिक स्टेट और उसके सहयोगी संगठन, जिनमें लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद शामिल हैं, तथा उनके क्षेत्रीय प्रायोजक जो उनकी गतिविधियों में सहायता करते हैं, वे अब आतंकवादी गतिविधियों के लिए अफगान क्षेत्र का इस्तेमाल न कर सकें। उन्होंने यह बात पाकिस्तान के संदर्भ में कही। मसौदा प्रस्ताव में क्षेत्रीय सहयोग का उल्लेख करते हुए अफगान लोगों की भलाई के लिए पड़ोसी और क्षेत्रीय साझेदारों तथा क्षेत्रीय संगठनों के योगदान के महत्व पर प्रकाश डाला गया। इसमें भारत, ईरान और तुर्किये जैसे देशों द्वारा प्रदान किए जाने वाले शैक्षिक अवसरों के साथ-साथ कजाखस्तान, किर्गिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान में अफगान छात्रों की उच्च शिक्षा तक पहुंच में मदद करने के लिए क्षेत्रीय कार्यक्रम भी शामिल हैं। हरीश ने कहा कि अफगानिस्तान में भारत की तात्कालिक प्राथमिकताओं में मानवीय सहायता का प्रावधान और अफगान लोगों के लिए क्षमता निर्माण पहलों का कार्यान्वयन शामिल है। उन्होंने कहा, ‘‘हम स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, शिक्षा और खेल जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अफगान लोगों का समर्थन करने के लिए संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए भारत की प्रतिबद्धता सभी प्रांतों में 500 से अधिक विकास साझेदारी परियोजनाओं के माध्यम से प्रदर्शित होती है।’’ उन्होंने बताया कि अगस्त 2021 में जब तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया था, तब से भारत ने लगभग 50,000 मीट्रिक टन गेहूं, 330 मीट्रिक टन से अधिक दवाएं और टीके, 40,000 लीटर कीटनाशक मैलाथियान और 58.6 मीट्रिक टन अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति की है, जिससे मानवीय सहायता की सख्त जरूरत वाले लाखों अफगानों को मदद मिली है। हरीश ने अफगानिस्तान के लोगों के साथ भारत के ऐतिहासिक संबंधों तथा उनकी मानवीय एवं विकासात्मक आवश्यकताओं को पूरा करने के प्रति अपनी स्थायी प्रतिबद्धता दोहराई।  

9 जुलाई को 10 बड़े ट्रेड यूनियनों ने पूरे देश में हड़ताल का ऐलान किया, 25 करोड़ से ज़्यादा कर्मचारी होंगे शामिल

नई दिल्ली  देशभर में कल 9 जुलाई को भारत बंद का ऐलान किया गया है। यह बंद 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने मिलकर बुलाया है। इनमें बैंक, बीमा, डाक, कोयला खदान, हाईवे और कंस्ट्रक्शन जैसे सेक्टरों के 25 करोड़ से ज्यादा कर्मचारियों के शामिल होने की उम्मीद है। इस विरोध प्रदर्शन को ' भारत बंद ' नाम दिया गया है। यूनियनों का कहना है कि सरकार की नीतियां कंपनियों को फायदा पहुंचाने वाली और मजदूरों के खिलाफ हैं। ग्रामीण भारत से किसान और खेतिहर मजदूर भी इस बंद में शामिल होंगे। अडानी ने किसे दिया बिना शर्त 12600 करोड़ रुपये का ऑफर? इस कंपनी को खरीदने का है प्लान बंद में इन ट्रेड यूनियनों का समर्थन इस हड़ताल में कई प्रमुख राष्ट्रीय संगठन शामिल हैं। इनमें ये शामिल हैं:     इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस (INTUC)     ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC)     हिंद मजदूर सभा (HMS)     सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (CITU)     ऑल इंडिया यूनाइटेड ट्रेड यूनियन सेंटर (AIUTUC)     ट्रेड यूनियन कोऑर्डिनेशन सेंटर (TUCC)     सेल्फ एम्प्लॉयड वीमेंस एसोसिएशन (SEWA)     ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियंस (AICCTU)     लेबर प्रोग्रेसिव फेडरेशन (LPF)     यूनाइटेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस (UTUC) क्या खुला है, क्या बंद रहेगा? इस हड़ताल से कई क्षेत्रों पर असर पड़ने की उम्मीद है। इनमें बैंकिंग और वित्तीय सेवाएं, डाक विभाग, कोयला खनन और कारखाने, राज्य परिवहन सेवाएं, सरकारी कार्यालय शामिल हैं। एनएमडीसी और स्टील व खनिज क्षेत्रों की कई सरकारी कंपनियों के कर्मचारियों ने भी हड़ताल में शामिल होने की पुष्टि की है। हिंद मजदूर सभा के हरभजन सिंह सिद्धू ने कहा कि इस विरोध प्रदर्शन में सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों के उद्योगों और सेवाओं में मजबूत भागीदारी देखने को मिलेगी। क्या बैंक बंद रहेंगे? बैंकिंग यूनियनों ने अलग से बंद के कारण सेवाओं में व्यवधान की पुष्टि नहीं की है। लेकिन, बंद आयोजकों के अनुसार वित्तीय सेवाएं प्रभावित होंगी। बंद आयोजकों ने कहा कि हड़ताल में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और सहकारी बैंकिंग क्षेत्रों के कर्मचारी शामिल हैं। इससे कई क्षेत्रों में शाखा सेवाएं, चेक क्लीयरेंस और ग्राहक सहायता जैसी बैंकिंग सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। स्कूल, कॉलेज, ऑफिस का क्या होगा? 9 जुलाई को स्कूल, कॉलेज और प्राइवेट ऑफिस खुले रहने की उम्मीद है। हालांकि, परिवहन संबंधी समस्याओं के कारण कुछ क्षेत्रों में कामकाज प्रभावित हो सकता है। ट्रेड यूनियनों और सहयोगी ग्रुप की ओर से कई शहरों में विरोध मार्च और सड़क प्रदर्शन किए जाने से सार्वजनिक बसें, टैक्सियां और ऐप-आधारित कैब सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। इससे स्थानीय यात्रा और लॉजिस्टिक्स संचालन में देरी या रद्द होने की संभावना है। क्या रेल सेवाएं प्रभावित होंगी? 9 जुलाई को देशव्यापी रेलवे हड़ताल की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। हालांकि, देश के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन और सड़क जाम की आशंका है, जिससे कुछ क्षेत्रों में ट्रेन सेवाएं बाधित हो सकती हैं या उनमें देरी हो सकती है। रेलवे यूनियनों ने औपचारिक रूप से भारत बंद में भाग नहीं लिया है। लेकिन, पहले हुईं इस तरह की हड़तालों में देखा गया है कि प्रदर्शनकारी रेलवे स्टेशनों के पास या पटरियों पर प्रदर्शन करते हैं, खासकर उन राज्यों में जहां यूनियन की मजबूत उपस्थिति है। इससे स्थानीय स्तर पर ट्रेनों में देरी हो सकती है या अधिकारियों द्वारा सुरक्षा उपाय बढ़ाए जा सकते हैं। हड़ताल का कारण क्या है? ट्रेड यूनियनों का दावा है कि उनकी चिंताओं को लगातार नजरअंदाज किया गया है। उन्होंने पिछले साल श्रम मंत्री मनसुख मंडाविया को 17 सूत्रीय मांगों का एक चार्टर सौंपा था, लेकिन उनका कहना है कि इस पर कोई गंभीर प्रतिक्रिया नहीं हुई है। यूनियन फोरम ने कहा कि सरकार ने देश की कल्याणकारी राज्य की स्थिति को त्याग दिया है। यह विदेशी और भारतीय कंपनियों के हित में काम कर रही है। यह उन नीतियों से स्पष्ट है जिनका सख्ती से पालन किया जा रहा है। यूनियन ने ये लगाए सरकार पर आरोप     पिछले दस वर्षों में भारतीय श्रम सम्मेलन आयोजित नहीं किया है।     चार नए श्रम कानूनों को आगे बढ़ा रही है जो यूनियनों को कमजोर करते हैं और काम के घंटे बढ़ाते हैं।     संविदात्मक नौकरियों और निजीकरण को बढ़ावा दे रही है।     अधिक सार्वजनिक क्षेत्र की भर्ती और वेतन वृद्धि की मांगों को नजरअंदाज कर रही है।     युवा बेरोजगारी से निपटने के बिना नियोक्ताओं को प्रोत्साहन दे रही है। किसान और ग्रामीण मजदूर क्यों शामिल? किसानों के ग्रुप और ग्रामीण श्रमिक संगठनों ने भी अपना समर्थन दिया है। संयुक्त किसान मोर्चा और कृषि श्रमिक संघ ग्रामीणों को जुटाने और उन आर्थिक फैसलों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने की योजना बना रहे हैं, जिनके बारे में उनका दावा है कि वे ग्रामीण संकट को बढ़ा रहे हैं। उनका आरोप है कि सरकारी कामों के कारण बेरोजगारी बढ़ रही है। वहीं आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याणकारी खर्चों में कटौती की जा रही है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने 14 देशों पर लगाया टैरिफ, भारत को लेकर क्या बोले ? पास में बैठे थे नेतन्याहू

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को 14 देशों पर टैरिफ लागू करने का फैसला किया है। उन्होंने इस संबंध इन सभी देशों को लेटर भी भेजा है जिसमें अमेरिकी सरकार के टैरिफ वाले फैसले के बारे में अवगत कराया गया है। अमेरिका ने एशिया में अपने दो महत्वपूर्ण सहयोगियों जापान और दक्षिण कोरिया से आयातित वस्तुओं पर भी 25 प्रतिशत का टैरिफ लगा दिया। हालांकि भारत पर अभी नए टैरिफ को लेकर कोई फैसला नहीं लिया गया है। ट्रंप ने संकेत दिया है कि भारत के साथ डील जल्द हो सकती है। भारत को लेकर डोनाल्ड ट्रंप ने वाइट हाउस में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मेजबानी के दौरान बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका भारत के साथ एक व्यापारिक समझौते को अंतिम रूप देने के करीब है। यह बयान ऐसे समय में आया है, जब ट्रंप ने 14 देशों को नई टैरिफ दरों से संबंधित पत्र भेजे हैं, जो 1 अगस्त 2025 से लागू होंगी। ट्रंप ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, "हमने यूनाइटेड किंगडम और चीन के साथ समझौते किए हैं। हम भारत के साथ भी डील करने के बहुत करीब हैं।" उन्होंने आगे बताया कि जिन देशों के साथ समझौता संभव नहीं लग रहा, उन्हें पत्र भेजकर टैरिफ दरों की जानकारी दी जा रही है। ट्रंप ने कहा, "हमने अन्य देशों से मुलाकात की और हमें नहीं लगता कि हम कोई सौदा कर पाएंगे, इसलिए हम उन्हें एक पत्र भेज रहे हैं। हम विभिन्न देशों को पत्र भेज रहे हैं, जिसमें उन्हें बताया जा रहा है कि उन्हें कितना टैरिफ देना होगा।" ट्रंप ने जोर देकर कहा, "हम निष्पक्षता के साथ काम कर रहे हैं। कुछ देशों को थोड़ी छूट मिल सकती है, अगर उनके पास कोई उचित कारण होगा।" ट्रंप ने सुझाव दिया कि प्रमुख साझेदारों के साथ प्रगति हुई है, लेकिन जो देश अमेरिकी शर्तों को पूरा करने के लिए तैयार नहीं हैं, उन्हें नए टैरिफ का सामना करना पड़ेगा। 14 देशों को टैरिफ पत्र, 25% से 40% तक की दरें ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर 14 देशों को भेजे गए पत्रों के स्क्रीनशॉट साझा किए। इन देशों में जापान, दक्षिण कोरिया, बांग्लादेश, थाइलैंड, म्यांमार, कम्बोडिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, कजाकिस्तान, लाओस, दक्षिण अफ्रीका, ट्यूनीशिया, बोस्निया और हर्जेगोविना, और सर्बिया शामिल हैं। इन पत्रों में टैरिफ दरें 25% से लेकर 40% तक निर्धारित की गई हैं। उदाहरण के लिए, जापान और दक्षिण कोरिया पर 25%, म्यांमार और लाओस पर 40%, और बांग्लादेश व सर्बिया पर 35% टैरिफ लगाया जाएगा। ट्रंप ने इन पत्रों में चेतावनी भी दी कि अगर ये देश अमेरिकी उत्पादों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाते हैं, तो अमेरिका भी बदले में टैरिफ बढ़ा सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अगर ये देश अपनी व्यापार नीतियों में बदलाव करते हैं, तो टैरिफ दरों में कमी की जा सकती है। 1 अगस्त तक टैरिफ की No Tension… अमेरिका ने सभी देशों को दी राहत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रेसिप्रोकल टैरिफ को लेकर दुनियाभर के देशों को राहत दी है. ट्रंप ने रेसिप्रोकल टैरिफ बढ़ाने की आखिरी तारीख बढ़ा दी है. ट्रंप ने टैरिफ की आखिरी तारीख नौ जुलाई से बढ़ाकर एक अगस्त कर दी है. इसके साथ ही ट्रंप ने ये भी कहा कि भारत के साथ ट्रेड डील जल्द ही हो सकती है.  व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा कि रेसिप्रोकल टैरिफ पर छूट की अंतिम तारीख नौ जुलाई से बढ़ाकर एक अगस्त करने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर करेंगे. बता दें कि ट्रंप ने दो अप्रैल को भारत सहित कई देशों पर रेसिप्रोकल टैरिफ लगाने का ऐलान किया था लेकिन बाद में विरोध बढ़ने पर इसमें 90 दिनों की छूट दी थी. इस तरह टैरिफ पर यह छूट नौ जुलाई थी.  वहीं, अमेरिका ने बांग्लादेश और जापान समेत 14 देशों पर टैरिफ बढ़ाने का ऐलान भी किया है. ट्रंप सरकार के इस फैसले के तहत कुछ देशों पर 25 फीसदी टैक्स लगाया गया है, जबकि कुछ पर 30 से 40 फीसदी तक का भारी शुल्क लगाया गया है. ट्रंप सरकार ने म्यांमार और लाओस पर सबसे अधिक 40 फीसदी टैरिफ लगाया है. थाईलैंड और कंबोडिया पर 36 फीसदी टैरिफ, बांग्लादेश और सर्बिया पर 35 फीसदी टैरिफ, इंडोनेशिया को 32 फीलदी टैरिफ लगाया गया है. साउथ अफ्रीका और बोस्निया एंड हर्जेगोविना पर 30 फीसदी टैरिफ लगाया है. वहीं, जापान, दक्षिण कोरिया, मलेशिसाय, कजाकिस्तान और ट्यूनीशिया पर 25 फीसदी टैक्स लगाया गया है. इसके साथ ही अमेरिका ने अभी तक ब्रिटेन और वियतनाम के साथ ही डील की है.  भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में प्रगति भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक समझौते को लेकर पिछले कुछ महीनों से गहन वार्ता चल रही है। पिछले महीने भारतीय अधिकारी वाशिंगटन में अमेरिकी प्रतिनिधियों के साथ समझौते को अंतिम रूप देने के लिए चर्चा में जुटे थे। ट्रंप ने अप्रैल में भारतीय सामानों पर 26% का जवाबी टैरिफ लगाने की घोषणा की थी, लेकिन बाद में इसे घटाकर 10% कर दिया गया और 90 दिनों के लिए निलंबित कर दिया गया, जो 9 जुलाई को समाप्त हो रहा है। भारत के लगभग 53 बिलियन डॉलर के निर्यात क्षेत्र को नुकसान से बचाने के लिए दोनों देशों के बीच तीव्र गति से बातचीत चल रही है। ट्रंप ने पहले ही वियतनाम और चीन के साथ समझौते किए हैं, जबकि यूरोपीय संघ और अन्य देशों के साथ भी बातचीत चल रही है। वाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा कि ट्रंप स्वयं टैरिफ दरें निर्धारित कर रहे हैं और प्रत्येक देश के लिए "विशेष रूप से तैयार किए गए व्यापार प्लान" बना रहे हैं। ट्रंप ने यह भी कहा कि जिन देशों का अमेरिका के साथ व्यापार घाटा है, उनके लिए टैरिफ जरूरी हैं। उन्होंने दावा किया, "हमारा देश पहले से कहीं बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। हमारे पास पहले कभी इतना निवेश नहीं था।" नेतन्याहू के साथ मुलाकात के दौरान बयान ट्रंप का यह बयान उस समय आया जब वह वाइट हाउस में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ निजी रात्रिभोज के दौरान पत्रकारों से बात कर रहे थे। इस मुलाकात के दौरान ट्रंप ने वैश्विक व्यापार और अपनी … Read more

ब्रिटिश महिला की नस्लभेदी टिप्पणी वायरल, भारतीयों को देश छोड़ने को कहा

लंदन ब्रिटेन की एक महिला के बयान ने सोशल मीडिया पर बवाल मचा दिया है। इस महिला ने भारतीयों और एशियाई समुदाय के ऊपर टिप्पणी की है। महिला का कहना है कि यह लोग अंग्रेजी नहीं बोलते, इन्हें इनके देश वापस भेज देना चाहिए। जानकारी के मुताबिक यह घटना हीथ्रो एयरपोर्ट की है। महिला का नाम लूसी व्हाइट है। उसने एक्स पर इस बारे में पोस्ट लिखी है। महिला की इस पोस्ट पर लोग उसे जमकर खरी-खोटी सुना रहे हैं। महिला ने लिखा है ऐसा लूसी ने एक्स पर लिखा है कि अभी लंदन के हीथ्रो विमान पर लैंड किया है। यहां पर बड़ी संख्या में भारतीय और एशियाई स्टाफ है। यह लोग इंग्लिश का एक शब्द तक नहीं बोलते हैं। जब मैंने उनसे कहाकि अंग्रेजी बोलिए। इस पर उन्होंने मुझे रेसिस्ट कहा। महिला आगे लिखती है कि उन्हें भी पता है कि मैं सही हूं। इसके बावजूद उन्होंने इस रेसिस्ट कार्ड का इस्तेमाल किया। पोस्ट में आगे लूसी लिखती है कि इन सभी को वापस उनके देश भेज देना चाहिए। लोगों ने कैसे किया रिएक्ट इस पोस्ट पर लोगों के रिएक्शन भी आए। कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने व्हाइट की बात का समर्थन किया है। उनका कहना है कि इस वजह से एयरपोर्ट पर पर दिक्कत होती है। वहीं कुछ लोगों ने लूसी की पोस्ट को रेसिस्ट बताया है। एक यूजर ने लिखा है कि आप हिंदी बोलती हैं? अगर एयरपोर्ट स्टाफ ने एक शब्द भी अंग्रेजी में नहीं कहा तो आपको पता कैसे चला कि उनकी प्रतिक्रिया का क्या मतलब था? एक अन्य यूजर ने लिखा कि मैं शर्त लगा सकता हूं कि वहां ऐसा नहीं हुआ होगा। एक अन्य यूजर ने लिखा कि यह पूरी तरह से फैब्रिकेटेड है। हां, हीथ्रो पर बहुत सारा स्टाफ एशियाई है। हालांकि यह सभी अंग्रेजी बोलते हैं। इस यूजर ने आगे लिख कि यह लोग वास्तव में बहुत मददगार और दोस्ताना हैं। हाल ही में एक अन्य वीडियो आया था। इस वीडियो में एक अमेरिकी शख्स भारतीय मूल के व्यक्ति से बहस कर रहा था। वह लोगों के सामने ही उसे ब्राउन मैन कह रहा था और देश वापस जाने के लिए बोल रहा था।  

ऑपरेशन सिंदूर का सच आया सामने, राफेल को लेकर कंपनी ने बताई असली बात

नई दिल्ली  राफेल को मार गिराने के पाकिस्तान के दावों की पोल खुलती नजर आ रही है। अब लड़ाकू विमान बनाने वाली कंपनी ने भी साफ कर दिया है कि पाकिस्तान ने भारत का कोई राफेल नहीं गिराया है। इससे पहले एक इंटरव्यू के दौरान भारत के रक्षा सचिव भी इस बात की पुष्टि कर चुके हैं। पहलगाम आतंकवादी हमले के जवाब में भारत ने 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था, जिसके तहत पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया था। एक राफेल का नुकसान पर पाकिस्तान ने नहीं गिराया मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, फ्रांस की वेबसाइट Avion De Chasse को दसॉ एविएशन के अध्यक्ष और सीईओ एरिक ट्रैपियर ने बताया है कि एक राफेल जेट ऊंचाई पर जाकर तकनीकी खामी आ गई थी, जिसके चलते वह क्रैश हुआ। संघर्ष के दौरान कोई जेट नहीं गिरा था। भारत ने क्या कहा मीडिया से खास बातचीत में रक्षा सचिव आरके सिंह ने कहा कि यह कहना गलत है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के राफेल विमान गिराए गए थे। उन्होंने कहा, 'आपने राफेल्स का इस्तेमाल बहुवचन में किया है। मैं आपको भरोसा दिला सकता हूं कि यह सच नहीं है। भारत के मुकाबले पाकिस्तान को जान और माल के मामले कई गुना नुकसान हुआ है।' उन्होंने कहा कि 100 से ज्यादा आतंकवादी मारे गए। उन्होंने कहा है कि भारतीय बलों को ऑपरेशन के दौरान पूरी छूट दी गई थी। उन्होंने कहा, 'हमारे सशस्त्र बलों पर कोई राजनीतिक रोक नहीं थी और उनके पास पूरी स्वतंत्रता थी।' चीन पर भड़के फ्रांस के अधिकारी चीन ने मई में भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य संघर्ष के बाद फ्रांस निर्मित राफेल लड़ाकू विमानों के प्रदर्शन के बारे में भ्रम की स्थिति पैदा करने की जिम्मेदारी अपने दूतावासों को दी थी, ताकि इस विमान की प्रतिष्ठा और बिक्री को नुकसान पहुंचाया जा सके। फ्रांसीसी सैन्य और खुफिया अधिकारियों ने यह निष्कर्ष निकाला है। एसोसिएटेड प्रेस द्वारा देखी गई फ्रांसीसी खुफिया सेवा की रिपोर्ट के अनुसार, चीन के दूतावासों में रक्षा अधिकारियों (डिफेंस अताशे) ने राफेल की बिक्री को प्रभावित करने के लिए अभियान चलाया, जिसका उद्देश्य उन देशों को राजी करना था, जिन्होंने पहले से ही फ्रांस निर्मित लड़ाकू विमान का ऑर्डर दे दिया है – विशेष रूप से इंडोनेशिया- कि वे राफेल विमान न खरीदें तथा अन्य संभावित खरीदारों को चीन निर्मित विमान चुनने के लिए प्रोत्साहित किया। फ्रांसीसी सेना के अधिकारी ने पहचान गुप्त रखते हुए रिपोर्ट एपी के साथ साझा की। पाकिस्तान ने दावा किया कि उसकी वायुसेना ने सैन्य संघर्ष के दौरान पांच भारतीय विमानों को मार गिराया, जिनमें तीन राफेल भी शामिल थे। फ्रांसीसी अधिकारियों का कहना है कि इससे उन देशों की ओर से राफेल के प्रदर्शन को लेकर सवाल उठे, जिन्होंने फ्रांसीसी निर्माता दसॉ एविएशन से लड़ाकू विमान खरीदे हैं।  

MNS के मार्च से मचा सियासी घमासान, एकनाथ शिंदे ने भाजपा पर भी साधा निशाना

मुंबई मराठी भाषा पर उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की एकता के चलते शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे को अपना जनाधार खिसकता दिख रहा है। ऐसे में अब उनका दल भी ऐक्टिव हो गया है और मराठी भाषा को लेकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के लोगों पर सख्ती का विरोध किया है। मीरा भायंदर पुलिस ने आज सुबह ही बड़ी संख्या में मनसे के लोगों को हिरासत में लिया है। इसके अलावा विरोध मार्च पर भी रोक लगा दी है। इस पर मनसे और उद्धव सेना के समर्थकों का गुस्सा फूट पड़ा है। इन लोगों का कहना है कि सरकार ने कारोबारियों के विरोध प्रदर्शन पर तो नहीं रोक लगाई, लेकिन हमारे खिलाफ सख्ती दिखाई जा रही है। आखिर मराठी लोगों से सरकार को क्या दिक्कत है। मनसे कार्य़कर्ताओं ने कहा, 'यह सरकार महाराष्ट्र और मराठी लोगों के लिए है या फिर दूसरे राज्य की है? आखिर इन लोगों को मराठी लोगों के मार्च से क्या दिक्कत है?' मराठी बनाम हिंदी विवाद में अपनी जमीन खिसकने के डर से अब एकनाथ शिंदे गुट भी ऐक्टिव हो गया है। भले ही वह सरकार में शामिल है, लेकिन उसने मनसे के लोगों पर सख्ती को लेकर ऐतराज जताया है। फडणवीस सरकार में मंत्री प्रताप सरनाइक ने कहा कि आखिर मराठी लोगों को मार्च की परमिशन क्यों नहीं है। यही नहीं इशारों में ही उन्होंने भाजपा पर भी निशाना साध दिया। सरनाइक ने कहा कि आखिर पुलिस की मंशा क्या है। मराठी लोगों पर ऐसा अत्याचार किस राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने कहा,'मैं मराठी लोगों पर ऐक्शन की निंदा करता हूं। पुलिस को मार्च की परमिशन देनी चाहिए थी। इसके चलते शहर में बेवजह बवाल हो रहा है। गृह मंत्रालय ने ऐसा कोई आदेश भी नहीं दिया है कि आंदोलन की परमिशन नहीं है। फिर लोगों की गिरफ्तारी क्यों की जा रही है। ऐसा लग रहा है कि किसी एक राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाने के लिए ऐसा हो रहा है।' दरअसल मराठा कार्ड पर राजनीति करने वाले अब तीन दल हो गए हैं। उद्धव सेना, मनसे और एकनाश शिंदे की शिवसेना। अब दो गुट एक हो गए हैं तो एकनाथ शिंदे सेना को लग रहा है कि इससे उसके आधार को नुकसान पहुंचेगा। यही कारण है कि उसने अब मनसे के लोगों पर ऐक्शन का विरोध किया है। महाराष्ट्र में भाजपा को बाहरी वोटरों की पार्टी भी माना जाता है। वजह यह है कि वह हिंदु्त्व की राजनीति पर फोकस करती है, जिसके दायरे में दूसरे राज्यों के हिंदू भी आते हैं। भाजपा नेता नितेश राणे ने गैर-मराठी लोगों को पीटने पर ऐतराज भी जताया था और कहा था कि यह गरीब हिंदुओं पर हमला है।  

पीएम नेतन्याहू के साथ डिनर के दौरान ट्रंप ने तीखे शब्दों में ममदानी को दी चेतावनी

वॉशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने न्यूयॉर्क सिटी के मेयर उम्मीदवार जोहरान ममदानी पर फिर से निशाना साधा है। उन्होंने जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि वह एक सोशलिस्ट नहीं बल्कि कम्युनिस्ट हैं। पहले वह डेमोक्रेट नेताओं को सोशलिस्ट कहते थे, लेकिन अब कम्युनिस्ट ही कह रहे हैं। अमेरिका में कम्युनिस्ट विचारधारा के लोगों को बहुत सकारात्मक तरीके से नहीं देखा जाता। इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू के साथ डिनर के दौरान ट्रंप ने तीखे शब्दों में ममदानी को चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि ममदानी को अपने व्यवहार में सुधार लाना होगा वरना बड़ी परेशानियों में घिर जाएंगे। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, 'ममदानी सोशलिस्ट नहीं है बल्कि कम्युनिस्ट है। उसने यहूदी लोगों के बारे में बहुत सी गलत बातें कही हैं। इसके अलावा बहुत से लोगों के बारे में कई गलत बातें कही हैं। मुझे लगता है कि अभी उसका हनीमून चल रहा है।' इसके आगे ट्रंप ने कहा कि ऐसा हमेशा नहीं चल सकता। उन्हें अपने व्यवहार में सुधार करना होगा या फिर वह कुछ बड़ी परेशानियों में घिर सकते हैं। ऐसा पहली बार नहीं है, जब डोनाल्ड ट्रंप ने जोहरान ममदानी पर हमला बोला है। वह पहले भी कह चुके हैं कि ममदानी को अपने रुख में सुधार लाना होगा। इस बार नेतन्याहू के साथ बैठकर एक मेयर कैंडिडेट पर इस तरह निजी हमला करना और महत्वपूर्ण है। इससे पहले ट्रंप ने यह भी कहा था कि यदि जोहरान ममदानी मेयर बने और अपने रवैये में सुधार नहीं किया तो फिर न्यूयॉर्क सिटी के फंड में कटौती कर दी जाएगी। न्यूयॉर्क में नवंबर में मेयर का चुनाव होना है। यही नहीं ट्रंप ने तो यहां तक कहा था कि जोहरान ममदानी के पास शायद अमेरिका की नागरिकता भी नहीं है। वह देखेंगे कि अमेरिका में वह कानूनी रूप से हैं या फिर अवैध तौर पर यहां रह रहे हैं। ट्रंप ने कहा, 'ऐसे काफी लोग हैं, जो कहते हैं कि वह अवैध रूप से यहां हैं। हम हर चीज देख रहे हैं। उन्हें खुद को कम्युनिस्ट पहचान से अलग होना होगा, लेकिन फिलहाल वह एक कम्युनिस्ट हैं।' बता दें कि 1 जुलाई को जोहरान ममदानी ने मेयर चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी के प्राइमरी चुनाव में जीत हासिल की है। अब उनका मुकाबला एरिक एडम्स से होगा। नवंबर में न्यूयॉर्क सिटी का चुनाव होगा और जोहरान ममदानी पहले ऐसे मुस्लिम नेता हैं, जो मेयर चुनाव में उतरे हैं।  

जनगणना के लिए घर-घर जाने वाले कर्मचारी भी मोबाइल से ही डेटा जुटाएंगे और उसे रियलटाइम अपलोड करेँगे

नई दिल्ली भारत में हर 10 साल पर जनगणना की परंपरा रही है, लेकिन इस बार 16 साल के लंबे गैप के बाद 2027 में जनगणना शुरू होगी। यह जनगणना भले ही देर से आई है, लेकिन इसके प्रावधान पहले के मुकाबले काफी दुरुस्त हैं। इनमें से एक प्रावधान यह है कि लोग अपने घर से ही ऑनलाइन माध्यम से जनगणना पोर्टल पर अपनी जानकारी दे सकेंगे। इस संबंध में जल्दी ही एक पोर्टल लॉन्च किया जाएगा। इस पोर्टल पर लोग अपना रजिस्ट्रेशन करा सकेंगे। फिर अपने और परिवार के बारे में पूरी जानकारी दे सकेंगे। यहीं पर लोग जनगणना में शामिल सभी सवालों के जवाब भर के सबमिट कर देंगे तो यह जानकारी दर्ज हो जाएगी। इसके माध्यम से ऐसे लोगों की शिकायतें दूर हो जाएंगी, जो अकसर कहते हैं कि जनगणना वाले तो उनके घर तक आए ही नहीं। ऐसे में जनगणना में शामिल कर्मचारियों का इंतजार किए बिना ही लोग अपने बारे में जानकारी भर सकेंगे। यही नहीं जनगणना के लिए घर-घर जाने वाले कर्मचारी भी मोबाइल से ही डेटा जुटाएंगे और उसे रियलटाइम अपलोड कर देंगे। सरकार का कहना है कि इससे डेटा हासिल करने में आसानी होगी और उसका विश्लेषण भी जल्दी ही किया जा सकेगा। जनगणना का पूरा डेटा जल्दी उपलब्ध होगा। इसके अलावा अलग-अलग मानकों पर उसका विश्लेषण भी किया जा सकेगा। सूत्रों का कहना है कि जनगणना के लिए रजिस्ट्रेशन कमोबेश ऐसे ही होगा, जैसे वोटर आईडी बनवाने के लिए ऑनलाइन सुविधा है। संभावना है कि इसे आधार कार्ड से भी जोड़ा जा सकता है। पोर्टल पर पहले लोगों को रजिस्ट्रेशन करके प्रोफाइल बनानी होगी। इसके बाद जनगणना के लिए दिए गए फॉर्म में पूरी डिटेल भरकर सबमिट करना होगा। यही नहीं यह सुविधा भी दो चरणों में मिलेगी। दोनों राउंड में जानकारी देने का रहेगा विकल्प पहले राउंड में हाउस लिस्टिंग होगी। पहले उसके संबंध में लोग जानकारी दे सकेंगे। इसके बाद दोबारा जनगणना के दौरान अपने और परिवार के बारे में डिटेल दे सकेंगे। ऐसा पहली बार हो रहा है, जब देश भर में जाति जनगणना कराई जाएगी।

कार्यपालिका के पदाधिकारी की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश की भी भागीदारी होती है, क्यों देते हैं राय?: उपराष्ट्रपति

नई दिल्ली  भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने CBI निदेशक की नियुक्ति में CJI की भूमिका पर आपत्ति जाहिर की है। उन्होंने सवाल उठाए हैं कि क्या ऐसा दुनिया में कहीं और हो रहा है? इसके अलावा उन्होंने जज के घर से नकदी मिलने पर भी खुलकर बात की। उपराष्ट्रपति ने कहा है कि हर अपराध की जांच होनी चाहिए। साथ ही कहा कि अगर पैसा मिला है, तो उसके स्त्रोत का भी पता लगाया जाना चाहिए। उपराष्ट्रपति धनखड़ ने कहा, 'मैं इस बात से पूरी तरह हैरान हूं कि CBI निदेशक जैसे कार्यपालिका के पदाधिकारी की नियुक्ति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की भी भागीदारी होती है। कार्यपालिका की नियुक्ति कार्यपालिका के अलावा किसी और की तरफ से क्यों होनी चाहिए? क्या ऐसा संविधान के तहत होता है? क्या ऐसा दुनिया में कहीं और हो रहा है?' दरअसल, DSPE एक्ट के तहत सीबीआई निदेशक की नियुक्ति एक हाई पावर कमेटी करती है, जिसके सदस्य प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष, भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनकी तरफ से नॉमिनेट किया हुआ कोई जज शामिल होते हैं। कोच्चि में कानूनी की पढ़ाई कर रहे छात्रों से बातचीत में उन्होंने न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका को अलग करने वाली सीमा कमजोर होने पर चिंता जाहिर की। नकदी मिलने पर क्या बोले नखड़ ने सोमवार को कहा कि उन्हें उम्मीद है कि नई दिल्ली में एक न्यायाधीश के आधिकारिक आवास से भारी मात्रा में नकदी मिलने के मामले की आपराधिक जांच शुरू की जाएगी। धनखड़ ने इस घटना की तुलना शेक्सपीयर के नाटक जूलियस सीजर के एक संदर्भ 'इडस ऑफ मार्च' से की, जिसे आने वाले संकट का प्रतीक माना जाता है। रोमन कलैंडर में इडस का अर्थ होता है, किसी महीने की बीच की तारीख। मार्च, मई, जुलाई और अक्टूबर में इडस 15 तारीख को पड़ता है। उपराष्ट्रपति ने इस घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि अब मुद्दा यह है कि यदि नकदी बरामद हुई थी तो शासन व्यवस्था को तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए थी और पहली प्रक्रिया यह होनी चाहिए थी कि इससे आपराधिक कृत्य के रूप में निपटा जाता, दोषी लोगों का पता लगाया जाता और उन्हें कठघरे में खड़ा किया जाता। उपराष्ट्रपति ने कहा कि 14-15 मार्च की रात को न्यायपालिका को अपने खुदे के 'इडस ऑफ मार्च' का सामना करना पड़ा, जब बड़ी मात्रा में नकदी मिलने की बात सार्वजनिक रूप से स्वीकार की गई थी, लेकिन अब तक कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई। धनखड़ ने कहा कि इस मामले से शुरुआत से ही एक आपराधिक मामले के तौर पर निपटा जाना चाहिए था, लेकिन उच्चतम न्यायालय के 90 के दशक के एक फैसले के कारण केंद्र सरकार के हाथ बंधे हुए हैं। उन्होंने कहा, 'अगर इतना अधिक मात्रा में पैसा है, तो हमें पता लगाना होगा: क्या यह दागी पैसा है? इस पैसे का स्रोत क्या है? यह एक न्यायाधीश के आधिकारिक आवास में यह कैसे पहुंचा? यह किसका था? इस प्रक्रिया में कई दंड प्रावधानों का उल्लंघन किया गया है। मुझे उम्मीद है कि प्राथमिकी दर्ज की जाएगी।'