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रिश्ते होंगे और गहरे! जानें कौन-सा रंग लाता है बेडरूम में सकारात्मक ऊर्जा

वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर का हर कोना हमारी भावनाओं और जीवन के हर पहलू पर असर डालता है। खासतौर पर बेडरूम का माहौल हमारे मानसिक संतुलन और दांपत्य जीवन से गहराई से जुड़ा होता है। इसलिए वास्तु में बेडरूम की सजावट, दिशा और रंगों को लेकर खास ध्यान देने की सलाह दी जाती है। अगर आप चाहते हैं कि आपके और आपके जीवनसाथी के बीच प्यार और समझ और भी गहरी हो, तो बेडरूम में इस्तेमाल की जाने वाली चादर के रंगों का चयन बहुत ही सोच-समझकर करें। तो आइए जानते हैं वास्तु के अनुसार, बेडरूम मे कौन से रंग की बेडशीट का इस्तेमाल करना चाहिए। कौन-सा रंग है शुभ? वास्तु के अनुसार गुलाबी या हल्का लाल रंग प्रेम, अपनापन और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है कि चादर का रंग न सिर्फ कमरे की खूबसूरती बढ़ाता है, बल्कि यह पार्टनर के बीच आपसी सामंजस्य और भावनात्मक जुड़ाव को भी मजबूत करता है। वास्तु के अनुसार, गुलाबी, हल्का लाल और क्रीम रंग की बेडशीट कपल्स के लिए बेहद शुभ मानी जाती है। ये रंग प्रेम, सौम्यता और गर्मजोशी का प्रतीक होते हैं, जो रिश्ते में मधुरता बनाए रखते हैं। इन रंगों की चादर बिछाने से रिश्ते में मिठास बढ़ती है और आपसी मतभेद धीरे-धीरे कम होते हैं। ये रंग न केवल कमरे का वातावरण सुकून भरा बनाते हैं बल्कि मानसिक रूप से भी शांति और आकर्षण का एहसास कराते हैं। किन रंगों से करें परहेज़? बहुत गहरे या उदास रंग जैसे काला, ग्रे या भूरा रंग बेडरूम में नेगेटिविटी ला सकते हैं। ये रंग मन को भारी बना देते हैं और कभी-कभी रिश्तों में दूरी बढ़ा सकते हैं। इसलिए कोशिश करें कि चादर और पर्दे हल्के व सौम्य रंगों के ही हों।

छठ पर्व का पहला चरण: खरना पर आम की लकड़ी से बनता है प्रसाद, जानें वजह

छठ पूजा का महापर्व आज से शुरू हो गया है. आज छठ पूजा का पहला दिन है. आज नहाय-खाय है. 28 अक्टूबर को उदयगामी सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही ये महापर्व संपन्न हो जाएगा. छठ के दूसरे दिन को खरना कहा जाता है. ये कल मनाया जाने वाला है. खरना के दिन गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद बनाए जाने की परंपरा है. ये प्रसाद मिट्टी के चूल्हे पर ही बनाया जाता है. इतना ही नहीं प्रसाद बनाने के लिए चूल्हे में लगाने के लिए सिर्फ आम की लकड़ी का उपयोग किया जाता है. किसी दूसरी लकड़ी से यह प्रसाद नहीं बनाया जाता, लेकिन ऐसा करने के पीछे की वजह क्या है? आइए जानते हैं इसके पीछे की परंपरा और धार्मिक कारण. खरना का महत्व छठ का दूसरा यानी खरने के दिन का खास महत्व धर्म शास्त्रों में बताया गया है. खरना का अर्थ होता है. ‘शुद्धता’. खरने के दौरान व्रतियों के द्वारा स्वच्छता और पवित्रता का पूरा ध्यान रखा जाता है. मान्यताओं के अनुसार, वो खरने का दिन होता है, जब छठी का घर में प्रवेश होता है. खरना का दिन पूर्ण रूप से भक्ति और समर्पण का माना जाता है. इस दिन सूर्य देव और छठी मैया का आशीर्वाद मिलता है. प्रसाद बनाने के लिए आम की लकड़ी का उपयोग क्यों? खरना की शाम मिट्टी का चूल्हा बनाया जाता है. इस चूल्हे में आम की लकड़ियां उपयोग की जाती हैं. आम की लकड़ी शुद्ध और सात्विक मानी जाती है. मान्यता है कि आम की लकड़ी छठी मैया को बहुत प्रिय है, इसलिए छठ के अवसर पर प्रसाद बनाने के लिए आम की लकड़ियों का उपयोग होता है. इस लकड़ी से प्रसाद बानने पर घर में सकारात्मक उर्जा आती है. खरना की विधि     खरना के दिन व्रती महिलाओं द्वारा मिट्टी के नए चूल्हे पर गुड़ और चावल की खीर बनाई जाती है.     ये खीर पीतल के बर्तन में गुड़, चावल और दूध से तैयार की जाती है.     साथ ही गेहूं के आटे से बनी रोटी, पूड़ी या ठेकुआ बनाया जाता है.     इस खीर का भोग छठी मैया को लगता है.     इसके बाद इसे सभी लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं.     फिर 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है.  

अगर किसी में दिखें ये 6 लक्षण, तो समझ जाएं — भरोसा करना भारी पड़ेगा

लाइफ में हर किसी को उतार-चढ़ाव देखने पड़ते हैं। अगर आपने कभी किसी इंसान से धोखा खाया है तो फ्यूचर में जरूर आप हर इंसान की पर्सनैलिटी को परखते होंगे। अगर किसी व्यक्ति की पर्सनैलिटी में ये 7 तरह के व्यवहार दिख रहे हैं तो फौरन संभल जाएं। इस तरह का व्यवहार करने वाले लोग खतरनाक प्रवृत्ति के होते हैं और साइकोलॉजी कहती है कि ऐसे इंसानों पर कम भरोसा करना चाहिए। अपने प्लान को सीक्रेट रखने वाले ऐसे इंसान जो अपने प्लान के बारे में किसी को भी नहीं बताते। हमेशा अपने मूव्स और प्लान को सीक्रेट रखते हैं तो इसका मतलब है कि ये दूसरों पर भरोसा नहीं करते। ऐसे इंसान की खुद की प्रवृत्ति दूसरों को धोखा देने वाली होती है। इसलिए दूसरों पर भी भरोसा नहीं करते। अपने इमोशन को कंट्रोल करते हैं ऐसे इंसान जो अपने इमोशन को पूरी तरह से कंट्रोल में करके रखते हैं और सबसे करीबी इंसान को भी इमोशन जाहिर नहीं करते। ऐसे लोगों की पर्सनैलिटी काफी डेंजरस मानी जाती है। ऐसे लोगों पर भरोसा कम करना चाहिए। ये हमेशा खुद के फायदे के बारे में ही सोचते हैं। स्ट्रांग आई कान्टेक्ट ऐसे इंसान सामने वाले से स्ट्रांग आई कान्टेक्ट बनाते हैं और जब तक वो नजरें ना झुका ले खुद का आई कान्टेक्ट नहीं हटाते। ऐसे लोग काफी ज्यादा डेंजरस माने जाते हैं। इनसे दूरी ही अच्छी होती है। अनप्रिडिक्टिबल होते हैं ऐसे लोग ऐसे इंसान जिनके व्यवहार या फिर किसी काम के बारे में ना पता हो। कब क्या करेंगे, क्या बोलेंगे? ऐसे इंसान डेंजरस होते हैं और इन पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए। अटेंशनसीकर होते हैं ऐसे इंसान लोगों का अटेंशन मांगते नहीं है बल्कि कुछ ऐसा करते हैं कि खुदबखुद लोग उन्हें देखें। उनके काम को पूछें और तारीफ करें। ऐसे लोगों पर भरोसा कम किया जा सकता है। बहुत कम बोलते हैं व्यवहार से डेंजरस इंसान बहुत कम बोलते हैं लेकिन अपने आसपास की चीजों को पूरी तरह से ऑब्जर्व करते हैं और खुद को पावरफुल दिखाते हैं।  

घर में धन और समृद्धि लाने के लिए करें ये वास्तु अनुसार काम

लाभ पंचमी का पर्व धन, सफलता और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। वास्तु शास्त्र के अनुसार यदि इस दिन कुछ विशेष उपाय और दिशाओं का ध्यान रखा जाए तो घर, व्यापार और जीवन में लाभ के द्वार खुलते हैं। आइए जानते हैं कि वास्तु के अनुसार लाभ पंचमी पर क्या करना चाहिए: सुबह की शुरुआत सूर्य अर्घ्य से करें लाभ पंचमी के दिन प्रातःकाल स्नान के बाद पूर्व दिशा की ओर मुख करके सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिए। यह वास्तु के अनुसार ऊर्जा और सफलता का आरंभ है। सूर्य देव को अर्घ्य देने से घर में पॉजिटिव एनर्जी आती है और व्यापार में बाधाएं दूर होती हैं। घर और दुकान की दिशा की सफाई घर और दुकान की उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) को साफ-सुथरा रखें। यह दिशा माता लक्ष्मी और कुबेर जी का निवास स्थान मानी गई है। इस कोने में लाल या पीले फूल, दीपक और अगरबत्ती जलाना शुभ रहता है। गणेश-लक्ष्मी की पूजा किस दिशा में करें माता लक्ष्मी की मूर्ति उत्तर दिशा की ओर मुख करके रखें। पूजक (जो व्यक्ति पूजा कर रहा है) का मुख दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए। भगवान गणेश को दाईं ओर और महालक्ष्मी को बाईं ओर बैठाएं। पूजा स्थल पर काले या गहरे रंगों का प्रयोग न करें, केवल हल्के रंगों का उपयोग करें। प्रवेश द्वार पर शुभ प्रतीक बनाएं वास्तु शास्त्र में कहा गया है, “मुखद्वारे शुभलाभ चिह्नं धनं लभते गृहस्थः।” मुख्य दरवाजे पर शुभ लाभ और स्वस्तिक का चिह्न लाल सिंदूर या रोली से बनाएं। द्वार के दोनों ओर आम के पत्तों और बंदनवार लगाएं। इससे घर में देवी लक्ष्मी का आगमन होता है और धनवृद्धि के योग बनते हैं। तिजोरी और धन स्थान का वास्तु तिजोरी या कैश बॉक्स को हमेशा दक्षिण दिशा की दीवार के सहारे रखें और उसका मुख उत्तर दिशा की ओर खुलना चाहिए। यह स्थिति धन के स्थायित्व का संकेत देती है। लाभ पंचमी के दिन तिजोरी में पीली कौड़ी, चांदी का सिक्का या लाल कपड़े में हल्दी रखी सुपारी रखें। व्यापार स्थल के लिए विशेष उपाय दुकान या ऑफिस के मुख्य द्वार के सामने कोई रुकावट (खंभा, पेड़ या दीवार) नहीं होनी चाहिए। प्रवेश द्वार के ऊपर मंगल कलश या नारियल लगाना शुभ होता है। लाभ पंचमी पर नया लेन-देन या बहीखाता शुरू करना अत्यंत फलदायी माना गया है। दीपक जलाने की दिशा सुबह और शाम पूर्व या उत्तर दिशा में घी का दीपक जलाएं। तिल के तेल का दीपक मुख्य द्वार पर जलाना बहुत शुभ माना गया है। दीपक की लौ सदैव पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होनी चाहिए, इससे आर्थिक उन्नति होती है। वास्तु अनुकूल उपाय लाभ पंचमी के दिन घर में कुबेर यंत्र या श्री यंत्र स्थापित करें और उनका पूजन करें। तुलसी पौधे के पास दीपक जलाएं, इससे घर में सुख-शांति बनी रहती है। रसोईघर में पहली रोटी गाय को और मीठा पहला भोजन कन्याओं को दें। दक्षिण दिशा की दीवार पर लाल रंग की पेंटिंग या कपड़ा लगाना निषेध है। रंग और वस्त्र चयन लाभ पंचमी के दिन लाल, पीले या सुनहरे रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना गया है। ये रंग आकर्षण, सौभाग्य और ऊर्जा के प्रतीक हैं। काले या भूरे रंग से बचें क्योंकि यह नकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है। वास्तु के अनुसार शुभ संकेत अगर लाभ पंचमी के दिन पूजा करते समय दीपक की लौ स्थिर रहती है, कपूर आसानी से जल जाता है या पूजा स्थल में सुगंध फैल जाती है तो यह इस बात का संकेत है कि माता लक्ष्मी की कृपा आप पर बनी हुई है। लाभ पंचमी केवल धन की पूजा का दिन नहीं है, यह वास्तु संतुलन और ऊर्जात्मक शुद्धि का पर्व भी है। यदि इस दिन आप वास्तु के इन छोटे-छोटे नियमों का पालन करते हैं तो आपके घर और कार्यस्थल में सकारात्मक ऊर्जा, धनवृद्धि और सौभाग्य का प्रवाह बढ़ता है।

देवउठनी एकादशी 2025: खुलेंगे विवाह और मांगलिक कार्यों के द्वार, जानिए इसका धार्मिक महत्व

पंचांग के अनुसार, देवउठनी एकादशी यानी देवउथान एकादशी का पर्व हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है. धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं और इसके साथ ही विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण, मुंडन जैसे सभी शुभ और मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है. देवउठनी एकादशी 2025, तिथि और शुभ मुहूर्त पंचांग के अनुसार, इस साल कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 01 नवंबर को सुबह 09 बजकर 11 मिनट पर शुरू होगी और 02 नवंबर को सुबह 07 बजकर 31 मिनट पर समाप्त होगी. ऐसे में देवउठनी एकादशी का पर्व 1 नवंबर 2025 को मनाया जाएगा. पारण (व्रत खोलने) का समय: 02 नवंबर 2025, दोपहर 01 बजकर 11 मिनट से 03 बजकर 23 मिनट तक रहेगा. देवउठनी एकादशी की पूजा विधि एकादशी की सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और पीले रंग के वस्त्र धारण करें. इसके बाद भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें. घर के आंगन या पूजा स्थल को साफ कर, गेरू और आटे से चौक (रंगोली) बनाएँ. इस पर भगवान विष्णु के चरणों की आकृति बनाना शुभ माना जाता है. एक चौकी पर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें. उन्हें गंगाजल से स्नान कराएँ और पीला चंदन, अक्षत, पीले फूल, फल, मिठाई, तुलसी दल और पंचामृत अर्पित करें. धूप-दीप जलाकर पूजा करें. शाम के समय पूजा स्थल पर गन्ने का मंडप बनाएं इस मंडप में भगवान विष्णु की प्रतिमा और तुलसी का पौधा रखें. इस दौरान शंख और घंटी बजाकर, भगवान विष्णु को योगनिद्रा से जागने का आह्वान करें.तुलसी और शालिग्राम का विधिवत विवाह कराया जाता है. तुलसी को चुनरी ओढ़ाकर और शालिग्राम जी को वस्त्र पहनाकर विवाह की रस्में पूरी की जाती हैं. एकादशी व्रत की कथा पढ़ें या सुनें. इसके बाद श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती करें. भगवान को मौसमी फल, बेर, सिंघाड़ा, और गन्ना आदि का भोग लगाएं. इसके बाद जागरण करें और अगले दिन द्वादशी तिथि में शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण करें. देवउठनी एकादशी का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी (देवशयनी एकादशी) पर भगवान विष्णु क्षीर सागर में शयन के लिए चले जाते हैं और कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को जागते हैं. इस चार महीने की अवधि को चातुर्मास कहा जाता है. शुभ कार्यों की शुरुआत: भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागृत होते ही सृष्टि का कार्यभार पुनः उनके हाथों में आ जाता है. इसीलिए इस दिन से विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, और नए कार्यों की शुरुआत जैसे सभी मांगलिक कार्य बिना किसी मुहूर्त के शुरू हो जाते हैं, हालांकि पंचांग के अनुसार शुभ मुहूर्त देखना श्रेष्ठ होता है. तुलसी विवाह: इस दिन तुलसी और शालिग्राम (भगवान विष्णु का पाषाण स्वरूप) का विवाह कराया जाता है. तुलसी को भगवान विष्णु की प्रिय माना जाता है और यह विवाह उनके जाग्रत होने की खुशी में आयोजित किया जाता है. पापों से मुक्ति: मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत और पूजा करने से व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिलती है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. यह व्रत सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य का संचार करता है.

मंगल का महागोचर 27 अक्टूबर को, इन 5 राशियों के लिए है सतर्क रहने का समय

27 अक्टूबर को मंगल का गोचर वृश्चिक राशि में होने जा रहा है. मंगल का यह परिवर्तन बहुत ही खास माना जा रहा है क्योंकि वह अपनी ही राशि में प्रवेश करने वाले हैं. ज्योतिष शास्त्र में मंगल देवता को सभी ग्रहों का सेनापति माना जाता है. साथ ही, इनको साहस, पराक्रम, ऊर्जा, शक्ति, भूमि, संपत्ति और युद्ध जैसे विषयों का कारक भी माना जाता है.  जब कुंडली में मंगल की स्थिति शुभ होती है, तो व्यक्ति निडर और साहसी होता है. वहीं, मंगल की अशुभ स्थिति होने पर व्यक्ति को रक्त संबंधी समस्याएं और जीवन में कठिनाइयां आ सकती हैं. तो चलिए जानते हैं कि 27 अक्टूबर को होने जा रहे मंगल के गोचर से किन राशियों को सावधान रहने की जरूरत है. 1. मेष मंगल का गोचर मेष राशि वालों का आत्मविश्वास बढ़ाने के साथ-साथ अहंकार भी बढ़ा सकता है. इस समय गुस्से पर नियंत्रण रखना जरूरी है. किसी विवाद या कानूनी मामले में न उलझें. कार्यक्षेत्र में झगड़े की स्थिति बन सकती है. वाहन चलाते समय सावधानी रखें और दुर्घटना की आशंका है. 2. वृषभ इस गोचर के दौरान खर्चो में अचानक बढ़ोतरी संभव है. कुछ पुराने निवेश नुकसान दे सकते हैं. पारिवारिक रिश्तों में टकराव या संवाद की कमी से मानसिक तनाव रह सकता है. सेहत के लिहाज से भी यह समय ठीक नहीं माना जा रहा है. धैर्य और संयम बनाए रखें. यात्रा के दौरान सावधानी रखें. जल्दबाजी में कोई निर्णय न लें. व्यवसाय में पार्टनरशिप टूटने या झगड़े की स्थिति बन सकती है. 3. कर्क मंगल के गोचर से कार्यस्थल का माहौल आपके खिलाफ हो सकता है. सहकर्मियों से विवाद या बॉस से मतभेद संभव है. मानसिक दबाव बढ़ सकता है, जिससे नींद और स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होंगे. घरेलू जिम्मेदारियां भी बढ़ेंगी, इसलिए खुद पर नियंत्रण रखना जरूरी है. पैसों से जुड़े नुकसान का भी सामना करना पड़ सकता है. 4. तुला मंगल का गोचर तुला राशि वालों के धन और आत्मसम्मान पर नकारात्मक प्रभाव डालेगा. खर्च बढ़ेंगे और आय में रुकावट आएगी. क्रोध से निर्णय गलत हो सकता है. व्यापार में उतार-चढ़ाव रहेगा. घर के लोगों के साथ मतभेद संभव हैं. संयम और बचत से ही राहत मिलेगी. गुस्से में कोई कदम न उठाएं, वरना स्थिति बिगड़ सकती है.  5. धनु   इस गोचर से आपके खर्च और मानसिक शांति दोनों प्रभावित हो सकते हैं. धन से जुड़ी योजनाएं बिगड़ सकती हैं. और फालतू खर्चो में इजाफा होगा. कोई पुराना निवेश नुकसान दे सकता है. परिवार में भी किसी छोटी बात को लेकर मतभेद हो सकता है.

25 अक्टूबर 2025 का राशिफल: मकर राशि पर किस्मत मेहरबान, जानें सभी 12 राशियों का भविष्यफल

मेष राशि- आज के दिन आप कई कार्य करने में सक्षम हो सकते हैं, लेकिन खुद की देखभाल को प्राथमिकता देना आवश्यक है। धैर्य और क्रिएटिविटी पर जोर देना महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि सभी योजनाएं उम्मीद के मुताबिक सामने नहीं आएंगी। वृषभ राशि- आज के दिन आज सफलता के अर्थ पर विचार कर सकते हैं। अपनी इच्छाओं को प्राप्त करना संतुष्टि देता है। आज इस बात पर गौर करें की आपके लक्ष्य आपकी वास्तविक जरूरतों और इच्छाओं के साथ संरेखित हो रहे या नहीं। मिथुन राशि- आज के दिन याद रखें कि संतुष्टि ऐसे विकल्प चुनने से आती है, जो आपके लक्ष्य के अनुरूप हों। आप वास्तव में जो चाहते हैं उस पर ध्यान देकर आप जीवन के नए अवसरों से गुजरने के लिए बेहतर ढंग से तैयार होंगे। कर्क राशि- आज के दिन याद रखें अपने रिश्ते को मजबूत करना उतना ही आवश्यक है जितना कि अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करना। अपने गोल्स पर फोकस करने के लिए समय निकालें और उस पर ध्यान केंद्रित करें, जो वास्तव में आपके लिए मायने रखता है। सिंह राशि- आज के दिन अपने इंट्यूशन पर भरोसा करें और उन रिस्क के बारे में क्लियर रहें जिन्हें आप लेना चाहते हैं। अगर कुछ ज्यादा रिस्की लगता है तो दूसरों को काम सौंपने या हेल्प लेने में संकोच न करें। कन्या राशि- आज के दिन आपके रोमांटिक जीवन में शांति की हल्की हवा बहेगी। अगर आप इसे अकेले महसूस कर रहे हैं, तो उस व्यक्ति को अपनी भावनाओं को जाहिर क्यों न करें जिसका ध्यान आप चाहते हैं? तुला राशि- आज के दिन रोमांस को जीवित रखने के लिए अपनी फीलिंग्स जाहिर करें। चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। कुछ बदलाव आपको परेशान कर सकते हैं, लेकिन सावधानी से आगे बढ़ना और अपने टास्क में समझदारी बरतना महत्वपूर्ण है। वृश्चिक राशि- आज के दिन रोमांचक जीवन जिएं, पार्टियों में जाएं, कोई नया शौक आजमाएं या ऑनलाइन डेटिंग के लिए साइन अप करें। खुद से प्यार करने पर ज्यादा ध्यान दें। काम पर फोकस करें। धनु राशि- आज के दिन काम और प्यार पर फोकस रहेगा। व्यस्त कार्यक्रम का सामना करते हुए एक साथ क्वालिटी टाइम बिताने पर फोकस करें। अपने कार्यभार के बारे में खुले रहें। एक-दूसरे के लक्ष्य को समझने से चीजें आसान हो जाएंगी। मकर राशि- आज के दिन तनाव कम लें। अगर कमिटेड हैं, तो अपना समय रिश्ते में निवेश करें ताकि चुनौतियों से निपटना आसान हो जाए। साथ में बिताए गए कुछ पल भी रिश्ते को मजबूत बना सकते हैं। कुंभ राशि- आज के दिन आप विलासिता की इच्छा महसूस कर सकते हैं। किसी अजनबी के साथ आपकी बात-चीत रोमांचकारी हो सकती है। तुरंत डीसीजन लेने से बचने के लिए सावधानी बरतें। मीन राशि- आज के दिन आपके प्रेम जीवन में बदलाव लाएगा। ब्रह्मांड आपको अपने बाहर निकलने और किसी आकर्षक व्यक्ति को खोजने का संकेत दे रहा है। अगर कमिटेड हैं, तो आपका रिश्ता तब मजबूत बनेगा, जब आप खुद को पैटर्न से मुक्त कर लेंगे

डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य: छठ व्रत के समय पूजा का महत्व

लोक आस्था का महापर्व छठ  25 अक्टूबर से ‘नहाय-खाय’ के साथ शुरू हो रहा है और 28 अक्टूबर को ‘उषा अर्घ्य’ के साथ इसका समापन होगा. चार दिनों तक चलने वाले इस कठिन व्रत में सूर्य देव और छठी मैया की उपासना की जाती है. इस पर्व की सबसे अनूठी और महत्वपूर्ण रीत है डूबते हुए सूर्य (संध्या अर्घ्य) और उगते हुए सूर्य (उषा अर्घ्य) को अर्घ्य देना. हिंदू धर्म में आमतौर पर उगते सूर्य को ही जल चढ़ाया जाता है, लेकिन छठ ही एकमात्र ऐसा पर्व है, जिसमें पहले अस्ताचलगामी (डूबते) सूर्य और फिर उदयगामी (उगते) सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. आइए जानते हैं छठ पूजा में सुबह और शाम की पूजा में क्या अंतर है. छठ पूजा: शाम की पूजा (डूबते सूर्य को अर्घ्य) तीसरा दिन छठ पर्व के तीसरे दिन, यानी कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. इसे संध्या अर्घ्य भी कहते हैं. मान्यता है कि शाम के समय सूर्य देव अपनी पत्नी प्रत्यूषा के साथ होते हैं, जो सूर्य की अंतिम किरण हैं. इसलिए इस अर्घ्य को प्रत्यूषा अर्घ्य भी कहा जाता है. डूबते सूर्य को अर्घ्य देना इस बात का प्रतीक है कि जीवन में हर उत्थान (उगने) के बाद पतन (डूबना) निश्चित है और हमें अपने जीवन के उतार-चढ़ावों को स्वीकार करना चाहिए. इस अर्घ्य से भक्तों के जीवन से अंधकार दूर होता है. इस दिन व्रती महिलाएं और पुरुष कमर तक पानी में खड़े होकर, बांस के सूप या पीतल की टोकरी में फल, ठेकुआ, गन्ना आदि पूजा सामग्री रखकर अर्घ्य देते हैं. छठ पूजा: सुबह की पूजा (उगते सूर्य को अर्घ्य) चौथा दिन छठ पर्व के चौथे और अंतिम दिन, यानी सप्तमी तिथि को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. इसे उषा अर्घ्य कहा जाता है. धार्मिक मान्यता है कि सूर्योदय के समय सूर्य देव अपनी पत्नी ऊषा के साथ होते हैं, जो सूर्य की पहली किरण हैं और जिन्हें भोर की देवी भी कहा जाता है. इसलिए इसे उदयगामी अर्घ्य या ऊषा अर्घ्य कहते हैं. उगते सूर्य को अर्घ्य देना नवजीवन, वर्तमान और सुनहरे भविष्य का प्रतीक है. व्रती सूर्य देव से शक्ति, स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और संतान के दीर्घायु होने का आशीर्वाद मांगते हैं. उदयगामी अर्घ्य देने के बाद ही छठ महापर्व का विधिवत समापन होता है और व्रती अपना 36 घंटे का निर्जला व्रत खोलते हैं. इस दिन व्रती फिर से नदी या तालाब में खड़े होकर, सूर्य की पहली किरण को दूध और जल से अर्घ्य देकर छठी मैया और सूर्य देव की आराधना करते हैं. डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने का महत्व माना जाता है कि संध्या अर्घ्य जहां जीवन की कठिनाइयों को दूर करने की प्रार्थना है, वहीं उषा अर्घ्य सभी मनोकामनाओं की पूर्ति और नए जीवन के आरंभ का प्रतीक है. इस प्रकार, छठ महापर्व न केवल सूर्य की उपासना का त्योहार है, बल्कि यह पवित्रता, अनुशासन, और जीवन के हर पड़ाव को सम्मान देने की भारतीय संस्कृति के गहरे मूल्यों को भी दर्शाता है.

घर और ऑफिस में तांबे का सूरज लगाएं, करें करियर और मान-सम्मान की वृद्धि

वास्तु के अनुसार घर की सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने के लिए हम कई तरह के उपायों को आजमाना पसंद करते हैं। घर के हर एक कोने में हम वास्तु के अनुसार ही चीजों का प्लेसमेंट करते हैं, जिससे समृद्धि बनी रहे। ऐसी ही चीजों में से एक है घर में तांबे का सूरज लगाना। वास्तुशास्त्र के अनुसार, तांबे का सूरज घर में लगाना न केवल सौंदर्य बढ़ाता है बल्कि यह एक सकारात्मक और सशक्त वातावरण भी प्रदान करता है। तांबे का सूरज घर में लगाने के कई फायदे होते हैं। तांबा एक महत्वपूर्ण धातु है, जिसे सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। तांबे का सूरज घर के उत्तर-पूर्व दिशा में स्थापित करने से विशेष लाभ मिलता है। तांबा सूर्य का प्रतीक है, जो जीवन और ऊर्जा का स्रोत है। इसे घर में लगाने से घर में सकारात्मकता और जीवन शक्ति का संचार होता है। इससे परिवार के सदस्यों में स्वास्थ्य, खुशी और समृद्धि बढ़ती है। तांबा गर्मी को संतुलित करता है। यह घर के वातावरण को शुद्ध करता है और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है। इस प्रकार घर में ताजगी और शांति बनी रहती है। तांबे का सूरज व्यक्ति की मनोबल को भी बढ़ाता है। यह आत्मविश्वास और ऊर्जा को बढ़ाने में सहायक होता है, जिससे व्यक्ति अपने लक्ष्यों को बेहतर तरीके से प्राप्त कर सकता है। वास्तु की मानें तो घर में तांबे का सूर्य पूरे घर के लिए ऊर्जा का एक उत्कृष्ट स्रोत माना जाता है। यदि आप सूर्य की ऊर्जा का प्रतीक तांबे का सूरज घर में लगाते हैं तो आपके घर के चारों तरफ यश, र्कीति और खुशहाली बनी रहती है। तांबे को एक प्रभावशाली धातु के रूप में जाना जाता है और मान्यता है कि इस तरह का सूरज घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। यह घर के लोगों के बीच सामंजस्य बनाए रखने में मदद करता है और इससे निकलने वाली ऊर्जा वातावरण में समृद्धि जोड़ती है, जिससे पारिवारिक कलह से मुक्ति मिलती है। यदि आप लोकप्रियता हासिल करना चाहते हैं तो अपने घर में तांबे का सूर्य अवश्य लगाना चाहिए। यदि आप किसी कार्यस्थल पर इसे लगाते हैं तो यह सफलता दिलाने में मदद करता है।

युगों पुरानी छठ परंपरा की कहानी: जानें इसका आरंभ कहाँ हुआ

लोक आस्था का महापर्व छठ पूजा कल से शुरू हो रही है. छठ पूजा छठी मैया और भगवान सूर्य को समर्पित की गई है. छठ पूजा में भगवान सूर्य और छठी मैया की पूजा की जाती है. ये महापर्व चार दिनों तक चलता. कल से शुरू होने वाली छठ पूजा का समापन 28 अक्टूबर को होगा. कल नहाय-खाय से ये महापर्व शुरू होगा. 28 अक्टूबर को उदयगामी सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही महापर्व का समापन हो जाएगा. छठ पूजा वर्तमान में नहीं, बल्कि युगों से होती हुई चली आ रही है. छठ पूजा की उत्पत्ति को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. छठ पूजा की शुरुआत बिहार एक जिले से हुई थी. आइए जानते हैं कि बिहार का वो कौनसा जिला है, जहां से छठ महापर्व की शुरुआत हुई? मुंगेर से हुई थी छठ पूजा की शुरुआत छठ पूजा की शुरुआत सबसे पहले बिहार के मुंगेर से हुई थी.धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता सीता ने सबसे पहला छठ पूजन बिहार के मुंगेर में गंगा तट पर किया था. इसके बाद छठ महापर्व की शुरुआत हुई. वाल्मीकि और आनंद रामायण के अनुसार मुंगेर में माता सीता ने छह दिनों तक रहकर छठ पूजन किया था. दरअसल, भगवान राम को रावण वध का पाप लगा था. इस पाप से मुक्त होने के लिए ऋषि-मुनियों के कहने पर प्रभु ने फैसला किया वो राजसूय यज्ञ कराएंगे. इसके बाद मुग्दल ऋषि को आमंत्रण भेजा गया, लेकिन मुग्दल ऋषि ने भगवान राम और माता सीता आदेश दिया कि वो दोनों ही उनके आश्रम में आएं. इसके बाद बाद मुग्दल ऋषि ने माता सीता को सूर्य की अराधना करने की सलाह दी. मुग्दल ऋषि के कहने पर माता सीता ने व्रत किया. माता सीता ने की थी सूर्य देव की अराधना ऋषि के आदेश पर माता सीता ने कार्तिक मास की षष्ठी तिथि पर मुंगेर के बबुआ गंगा घाट के पश्चिमी तट पर भगवान सूर्य की अराधना की. सूर्य देव की अराधना के दौरान माता सीता ने अस्ताचलगामी सूर्य को पश्चिम दिशा की ओर उदयगामी सूर्य को पूर्व दिशा की ओर अर्घ्य दिया था. जिस जगह पर माता सीता ने व्रत किया, वह सीता चारण मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है. इतना ही नहीं मंदिर के गर्भ गृह में पश्चिम और पूर्व दिशा की ओर माता सीता के चरणों के निशान आज भी मौजूद हैं. साथ ही शिलापट्ट पर सूप, डाला और लोटा के निशान हैं.