samacharsecretary.com

राधा अष्टमी 2026 कब है? आज या कल, जानें सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

हर साल राधा अष्टमी का पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है. यह दिन भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय और शक्ति स्वरूपा श्री राधा रानी के प्रकटोत्सव के रूप में मनाया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, राधा रानी का जन्म श्री कृष्ण के जन्मोत्सव (जन्माष्टमी) के ठीक 15 दिन बाद मनाया जाता है. इस दिन जो भक्त सच्चे मन से श्री राधा-कृष्ण की पूजा और व्रत करते हैं, उनके जीवन में सुख-समृद्धि, प्रेम और शांति बनी रहती है. ऐसा माना जाता है कि केवल श्रीकृष्ण की पूजा से पूर्ण फल नहीं मिलता, जब तक कि उनके साथ राधा रानी की भी आराधना ना की जाए. इस दिन कई लोग व्रत रखते हैं और खासकर बरसाना और मथुरा-वृंदावन में इस पर्व को बहुत ही भव्य और धूमधाम से मनाया जाता है. वहीं, हर बार की तरह इस बार भी राधा अष्टमी की तिथि को लेकर कंफ्यूजन है. कुछ लोग कह रहे हैं कि राधा अष्टमी कल मनाई जानी चाहिए और कुछ लोग कह रहे हैं आज. तो आइए जानते हैं कि राधा अष्टमी की सही तिथि क्या रहेगी. कब मनाई जाएगी राधा अष्टमी 2026 (Radha Ashtami 2026 Date) द्रिक पंचांग और उदयातिथि के अनुसार, राधा अष्टमी 19 सितंबर 2026, शनिवार यानी कल के दिन मनाने की सलाह दी जा रही है. राधा अष्टमी 2026 तिथि (Radha Ashtami 2026 Tithi) द्रिक पंचांग के अनुसार, राधा अष्टमी की तिथि 18 सितंबर यानी आज दोपहर 1 बजे शुरू होगी और तिथि का समापन 19 सितंबर को दोपहर 3 बजकर 26 मिनट पर होगा. राधा अष्टमी 2026 पूजन शुभ मुहूर्त (Radha Ashtami 2026 Pujan Shubh Muhurat) राधा अष्टमी पर पूजन का सबसे उत्तम समय 19 सितंबर की सुबह 11 बजे से लेकर दोपहर 1 बजकर 28 मिनट तक रहेगा. क्योंकि शास्त्रों के अनुसार श्री राधा रानी का जन्म दोपहर के समय हुआ था, इसलिए इस समयावधि में पूजा करना सबसे श्रेष्ठ माना जाता है. राधा अष्टमी 2026 पूजन विधि (Radha Ashtami 2026 Pujan Vidhi) राधा अष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें. फिर, व्रत का संकल्प लें. फिर, पूजा स्थल पर एक साफ चौकी बिछाकर उस पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं. फिर, चौकी पर तांबे या मिट्टी का कलश स्थापित करें. कलश के पास या चौकी पर श्री राधा-कृष्ण की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें. यदि संभव हो, तो राधा रानी का पंचामृत से अभिषेक करें. राधा रानी को सुंदर वस्त्र और आभूषणों से सजाएं. इसके बाद उन्हें रोली, अक्षत (चावल), चंदन, फूल, धूप, दीप और नैवेद्य (फल और मिठाइयां) अर्पित करें. आखिरी में ऊं श्री राधायै नमः मंत्र का जाप करें, कथा सुनें और अंत में घी का दीपक जलाकर आरती करें. सोलह श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें राधा अष्टमी के दिन पूजा के दौरान श्री राधा रानी को सुहाग की वस्तुएं अर्पित करें. पूजा के बाद इनमें से थोड़ा सा सिंदूर या प्रसाद स्वरूप सुहाग की सामग्री अपने घर की सुहागन महिलाओं को दें या माता रानी के चरणों में अर्पित रहने दें. इससे वैवाहिक जीवन में प्रेम और मधुरता बढ़ती है. राधा-कृष्ण को इत्र और पीले फूल चढ़ाएं राधा रानी और कृष्ण जी को इत्र बेहद प्रिय है. इस दिन राधा-कृष्ण को गुलाब या चमेली का इत्र अर्पित करें. साथ ही, उन्हें पीले या गुलाबी रंग के ताजे फूल (जैसे गेंदे या गुलाब की माला) चढ़ाएं. ऐसा करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आकर्षण बढ़ता है.

राधा रानी की मृत्यु कैसे हुई? अंतिम समय में कृष्ण ने बजाई बांसुरी, जानें पूरी पौराणिक कथा

 राधा रानी की मृत्यु कैसे हुई थी? इसे लेकर तरह-तरह की कथाएं प्रचलित हैं. अलग-अलग धार्मिक परंपराओं और लोककथाओं में राधा रानी के जीवन के अंतिम समय को अलग-अलग तरीके से बताया गया है. लेकिन आज हम उस कथा को जानेंगे, जो पुराणों और वैष्णव परंपरा से जुड़ी कथाओं में मिलती है. भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी का प्रेम भारतीय भक्ति परंपरा में प्रेम, समर्पण और भक्ति का प्रतीक माना जाता है. दोनों का जन्म एक ही तिथि यानी अष्टमी को हुआ था, लेकिन दोनों के जन्म पक्ष अलग थे. श्री कृष्ण और राधा रानी का जन्म एक ही तिथि पर हुआ था धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था. वहीं राधा जी का प्राकट्य भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को माना जाता है. यानी भगवान कृष्ण के जन्म के करीब 15 दिन बाद राधाष्टमी का पर्व आता है. इसी दिन राधा रानी के प्राकट्य का उत्सव मनाया जाता है. राधा जी के पिता का नाम वृषभानु और माता का नाम कीर्ति बताया जाता है. बरसाना को राधा रानी की जन्मभूमि माना जाता है. उनका लालन-पालन बरसाना में हुआ और वृंदावन से भी उनका गहरा संबंध बताया जाता है. बांसुरी की धुन पर खिंची चली आती थीं गोपियां राधा रानी और श्री कृष्ण के बीच प्रेम को सामान्य सांसारिक प्रेम से अलग दिव्य और आध्यात्मिक प्रेम के रूप में देखा जाता है. मान्यता है कि जब भगवान कृष्ण वृंदावन में अपनी बांसुरी बजाते थे, तो उसकी धुन सुनकर गोपियां सब कुछ भूलकर उनकी ओर खिंची चली आती थीं. काव्य परंपरा में भी कृष्ण की बांसुरी के प्रभाव का बेहद सुंदर वर्णन मिलता है. बांसुरी की धुन कानों में पड़ते ही गोपियां सामाजिक मर्यादाओं और सांसारिक बंधनों को भूलकर कृष्ण की ओर चली आती थीं. इन गोपियों में राधा रानी का स्थान सबसे विशेष माना गया है. राधा और कृष्ण का प्रेम भक्ति परंपरा में आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक भी माना जाता है. क्या राधा-कृष्ण का विवाह हुआ था? राधा और कृष्ण के विवाह को लेकर भी अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में अलग मान्यताएं मिलती हैं. ब्रह्मवैवर्त पुराण से जुड़ी परंपरा में राधा-कृष्ण के विवाह का वर्णन मिलता है. इस कथा के अनुसार, भांडीर वन में ब्रह्मा जी ने राधा और कृष्ण का विवाह कराया था. मान्यता है कि इस विवाह के समय कई देवी-देवता भी साक्षी बने थे. वृंदावन के पास स्थित भांडीर वन आज भी राधा-कृष्ण की इस कथा से जुड़ा महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल माना जाता है. यहां राधा-कृष्ण विवाह की कथा से जुड़े स्थानों और परंपराओं के दर्शन किए जाते हैं. श्री कृष्ण के वृंदावन छोड़ने के बाद क्या हुआ? समय बीतता गया और भगवान कृष्ण वृंदावन छोड़कर मथुरा चले गए. इसके बाद वे द्वारका चले गए. दूसरी ओर राधा रानी का जीवन बरसाना और वृंदावन से जुड़ा रहा. श्री कृष्ण के मथुरा और फिर द्वारका चले जाने के बाद राधा और कृष्ण का मिलना बेहद दुर्लभ हो गया था. कहा जाता है कि एक बार दोनों की मुलाकात कुरुक्षेत्र में हुई थी. उस समय सूर्य ग्रहण के अवसर पर भगवान कृष्ण द्वारका से कुरुक्षेत्र आए थे. नंद बाबा और वृंदावन के कई गोप-गोपिकाएं भी वहां पहुंचे थे. इसी दौरान राधा रानी और भगवान कृष्ण की भी मुलाकात हुई. द्वारका में हुई राधा-कृष्ण की अंतिम मुलाकात राधा-कृष्ण की अंतिम मुलाकात को लेकर एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा द्वारका से जुड़ी है. कथा के अनुसार, अपने जीवन के प्रमुख दायित्वों से मुक्त होने के बाद राधा रानी भगवान कृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचीं. वहां उन्होंने भगवान कृष्ण के महल में जाकर उनसे मुलाकात की. कहा जाता है कि राधा जी को देखकर भगवान कृष्ण बेहद प्रसन्न हुए. राधा रानी के अनुरोध पर कृष्ण ने उन्हें महल में एक जिम्मेदारी भी सौंपी. इसके बाद राधा रानी कुछ समय तक द्वारका में रहकर महल के कार्यों में सहयोग करती रहीं और अवसर मिलने पर भगवान कृष्ण के दर्शन करती थीं. लेकिन द्वारका का राजसी वातावरण राधा रानी को वह आनंद नहीं दे पा रहा था, जो उन्हें वृंदावन में कृष्ण के साथ महसूस होता था. क्यों छोड़ दिया था राधा रानी ने द्वारका का महल? वृंदावन में राधा रानी का जीवन कृष्ण की भक्ति और प्रेम से जुड़ा था. द्वारका में रहते हुए उन्हें महसूस हुआ कि वह पहले जैसा दिव्य प्रेम और अपनापन महसूस नहीं कर पा रही हैं. धीरे-धीरे वह उदास रहने लगीं. आखिरकार उन्होंने द्वारका का महल छोड़ दिया और एकांत स्थान पर चली गईं. समय बीतता गया. राधा रानी कमजोर होती गईं और उनके मन में भगवान कृष्ण की स्मृतियां और भी गहरी होती चली गईं. अंतिम समय में कृष्ण ने दिया राधा को दर्शन कथा के अनुसार, जब राधा रानी ने अपने अंतिम समय में भगवान कृष्ण को याद किया, तब कृष्ण उनके सामने प्रकट हुए. भगवान कृष्ण ने राधा जी से कहा कि वह अपनी कोई इच्छा बताएं. लेकिन राधा रानी ने अपने लिए कुछ नहीं मांगा. भगवान कृष्ण ने जब दोबारा उनसे अपनी इच्छा बताने को कहा, तब राधा रानी ने केवल इतना कहा कि वह कृष्ण की बांसुरी सुनना चाहती हैं. वह वही बांसुरी की धुन सुनना चाहती थीं, जिसे उन्होंने वृंदावन में सुना था. बांसुरी की धुन सुनते-सुनते राधा रानी ने त्यागा था शरीर कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण ने अपनी बांसुरी उठाई और उसी तरह बजाने लगे, जैसे वह वृंदावन में बजाया करते थे. कृष्ण बांसुरी बजाते रहे और राधा रानी उस मधुर धुन को सुनती रहीं. बांसुरी की धुन में खोई राधा रानी ने धीरे-धीरे अपने शरीर का त्याग कर दिया. पौराणिक कथा में आगे कहा जाता है कि राधा रानी की दिव्य आत्मा भगवान कृष्ण में विलीन हो गई. यही वजह है कि राधा-कृष्ण को केवल दो अलग-अलग स्वरूपों के रूप में नहीं, बल्कि एक ही दिव्य प्रेम और चेतना के दो रूपों के तौर पर भी देखा जाता है.

चाणक्य नीति: सुबह की ये 2 गलतियां घर में लाती हैं कंगाली, तुरंत बदलें आदतें आज

आचार्य चाणक्य को भारत के महान नीतिशास्त्रियों और अर्थशास्त्रियों में गिना जाता है. उनकी नीतियां और विचार आज के समय में भी उतने ही सटीक बैठते हैं, जितने सदियों पहले थे. कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि व्यक्ति कड़ी मेहनत करके अच्छी खासी कमाई तो कर लेता है, लेकिन फिर भी उसके पास पैसा टिक नहीं पाता है. सैलरी आते ही हाथ खाली हो जाते हैं , आर्थिक तंगी घेरने लगती है. चाणक्य नीति के अनुसार, हमारी रोजमर्रा की आदतें और खास तौर पर सुबह की शुरुआत का तरीका हमारी आर्थिक स्थिति पर बहुत गहरा असर डालता है. अगर सुबह उठते ही कुछ खास बातों का ध्यान न रखा जाए, तो मां लक्ष्मी रुष्ट हो जाती हैं, घर में कंगाली आने लगती है. आइए जानते हैं कि वे कौन सी दो बड़ी गलतियां हैं जो सुबह के वक्त पैसों के टिकने में रुकावट बनती हैं: 1. सुबह उठते ही घर में कलह या तनाव का माहौल बनाना आचार्य चाणक्य के अनुसार, दिन की शुरुआत हमेशा सकारात्मक और शांत माहौल में होनी चाहिए. जिन घरों में सुबह उठते ही वाद-विवाद, गुस्सा, चीख-चिल्लाहट या पैसों को लेकर बहसबाजी शुरू हो जाती है, वहां कभी भी बरकत नहीं होती. सुबह का तनावपूर्ण माहौल मानसिक स्थिति को तो बिगाड़ता ही है, साथ ही नकारात्मक ऊर्जा को भी बुलावा देता है. इसलिए सुबह के समय घर में शांति बनाए रखें और अनावश्यक तर्कों या कलह से दूर रहें. 2. अन्न और धन का अनादर करना चाणक्य नीति में अन्न और धन दोनों को ही बहुत पवित्र और देवी लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है. कई लोगों की आदत होती है कि वे सुबह के वक्त खाने-पीने की चीजों में कमियां निकालते हैं या जरूरत से ज्यादा खाना थाली में लेकर बर्बाद करते हैं. इसके अलावा, पैसों के लेन-देन या खर्च को लेकर सुबह-सुबह लापरवाह रवैया अपनाना भी भारी पड़ सकता है. अन्न का अपमान या धन का गलत इस्तेमाल करने वालों के पास कभी भी मां लक्ष्मी का वास नहीं टिकता है. आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए अपनाएं ये आसान आदतें: अनुशासित रूटीन: सुबह समय पर उठने की आदत डालें, अपने दिन की शुरुआत एक निश्चित योजना के साथ करें. बचत की आदत: अपनी कमाई में से कुछ हिस्सा हर महीने सेविंग (बचत) के रूप में जरूर अलग रखें. सकारात्मक सोच: सुबह उठकर खुद को शांत रखें, बेवजह के खर्चों पर लगाम लगाने की नीति अपनाएं.

महाभारत के 7 अनसुने रहस्य, शिखंडी से दुर्योधन तक जानिए पूरी कहानी और रहस्य

महाभारत केवल एक युद्ध की कहानी नहीं है. यह ऐसा महाग्रंथ है, जिसमें धर्म-अधर्म के संघर्ष के साथ-साथ रिश्तों, वचनों, त्याग, बदले और कर्म की कई कहानियां छिपी हुई हैं. कुरुक्षेत्र के इस युद्ध में भाई ने भाई के खिलाफ हथियार उठाया, शिष्य ने अपने गुरु से युद्ध किया और एक ही परिवार के लोग एक-दूसरे के सामने खड़े हो गए. महाभारत की यही खासियत है कि इसे जितनी बार पढ़ा जाए, हर बार कोई न कोई नई कथा या रहस्य सामने आता है. आज हम आपको महाभारत से जुड़े ऐसे ही कुछ प्रसंग बताएंगे, जिनका संबंध सीधे कुरुक्षेत्र युद्ध और उसके प्रमुख पात्रों से है. अंबा की कहानी और शिखंडी का जन्म महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह की मृत्यु के पीछे शिखंडी की महत्वपूर्ण भूमिका थी. लेकिन शिखंडी के पीछे एक ऐसी कहानी थी, जो वर्षों पुराने अपमान और प्रतिशोध से जुड़ी थी. शिखंडी का पूर्वजन्म अंबा के रूप में बताया जाता है. अंबा काशी नरेश की पुत्री थीं. उनके साथ हुई घटनाओं के बाद उनके मन में भीष्म के प्रति गहरा आक्रोश पैदा हुआ. उन्होंने भीष्म के वध का संकल्प लिया और भगवान शिव की कठोर तपस्या की. मान्यता है कि भगवान शिव ने उन्हें वर दिया कि अगले जन्म में वह भीष्म की मृत्यु का कारण बनेंगी. इसके बाद अंबा ने अगले जन्म में शिखंडी के रूप में जन्म लिया था. कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान भीष्म शिखंडी के सामने अस्त्र उठाने से पीछे हट गए, क्योंकि वे शिखंडी को अंबा का पुनर्जन्म मानते थे. इसी परिस्थिति का लाभ उठाकर अर्जुन ने भीष्म पर बाण चलाए और अंततः भीष्म शरशय्या पर जा गिरे थे. अंबिका और अंबालिका के पुत्र कौन थे? अंबा के अलावा काशी नरेश की दो अन्य पुत्रियां थीं, अंबिका और अंबालिका. दोनों का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार विचित्रवीर्य से हुआ था. लेकिन विवाह के कुछ समय बाद ही विचित्रवीर्य की मृत्यु हो गई. उनके कोई संतान नहीं थी. ऐसे में हस्तिनापुर के राजवंश और सिंहासन के भविष्य को लेकर सत्यवती चिंतित हो उठीं. तब सत्यवती ने अपने पुत्र महर्षि वेदव्यास को बुलाया. धार्मिक परंपरा में वर्णित कथा के अनुसार, वंश को आगे बढ़ाने के लिए नियोग की व्यवस्था के तहत अंबिका और अंबालिका से संतान उत्पन्न करने की बात सामने आई. जब अंबिका वेदव्यास के सामने गईं तो भय के कारण उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं. मान्यता है कि इसी वजह से उनके पुत्र धृतराष्ट्र जन्म से नेत्रहीन हुए. वहीं अंबालिका वेदव्यास को देखकर भय से पीली पड़ गईं. उनके पुत्र पांडु के शरीर का वर्ण पीला बताया गया. सत्यवती को जब यह पता चला कि दोनों राजकुमारों में कुछ विशेष शारीरिक परिस्थितियां हैं, तो उन्होंने स्वस्थ संतान की इच्छा से दोबारा प्रयास करने को कहा. लेकिन अंबिका खुद नहीं गईं और उन्होंने अपनी दासी को भेज दिया. उस दासी से विदुर का जन्म हुआ. विदुर आगे चलकर हस्तिनापुर के अत्यंत बुद्धिमान और नीति-कुशल मंत्री बने. यक्ष ने पांडवों से पूछे थे कठिन सवाल महाभारत का एक बेहद प्रसिद्ध प्रसंग पांडवों के वनवास के समय का है. वनवास के दौरान एक दिन पांडवों को बहुत प्यास लगी. पानी की तलाश में नकुल एक सरोवर के पास पहुंचे. वहां उन्हें एक अदृश्य आवाज सुनाई दी. आवाज ने चेतावनी दी कि सरोवर का पानी पीने से पहले उसके सवालों का जवाब देना होगा. लेकिन नकुल ने उस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया और पानी पी लिया. कथा के अनुसार, वह वहीं अचेत होकर गिर पड़े. जब नकुल वापस नहीं लौटे तो सहदेव उन्हें खोजने गए. उनके साथ भी यही हुआ. इसके बाद अर्जुन और भीम वहां पहुंचे, लेकिन उन्होंने भी उस चेतावनी को नजरअंदाज किया और सरोवर का पानी पीते ही अचेत होकर गिर पड़े. अंत में युधिष्ठिर वहां पहुंचे. उन्होंने अपने चारों भाइयों को इस हालत में देखा तो दुखी हुए. जब वह सरोवर का पानी पीने के लिए आगे बढ़े, तो वही आवाज फिर सुनाई दी. युधिष्ठिर ने जल्दबाजी करने के बजाय उस अदृश्य सत्ता की बात मान ली और उसके सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हो गए. यक्ष के सवालों का युधिष्ठिर ने दिया जवाब यक्ष ने युधिष्ठिर से जीवन और धर्म से जुड़े कई कठिन सवाल पूछे. इन सवालों को महाभारत के 'यक्ष प्रश्न' के नाम से जाना जाता है. यक्ष ने पूछा कि हवा से भी तेज क्या चलता है? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया- मन. इसके बाद पूछा गया कि पृथ्वी से भारी क्या है? युधिष्ठिर ने माता को इसका उत्तर बताया. आकाश से ऊंचा क्या है? इस पर उन्होंने पिता को उत्तर दिया. इसी तरह यक्ष ने उनसे धर्म, जीवन, मृत्यु और मनुष्य के आचरण से जुड़े कई प्रश्न पूछे. युधिष्ठिर ने सभी प्रश्नों के संतुलित उत्तर दिए. युधिष्ठिर ने नकुल को ही क्यों चुना? यक्ष युधिष्ठिर के जवाबों से प्रसन्न हुए और उनसे कहा कि वह अपने चारों भाइयों में से किसी एक को जीवित कर सकते हैं. युधिष्ठिर ने नकुल को जीवित करने की इच्छा जताई. यक्ष ने पूछा कि उन्होंने भीम या अर्जुन को क्यों नहीं चुना, जबकि युद्ध के समय उनकी आवश्यकता अधिक थी. युधिष्ठिर ने कहा कि वह माता कुंती के पुत्र हैं और नकुल माता माद्री के. कुंती का एक पुत्र जीवित है, इसलिए माद्री का भी एक पुत्र जीवित रहना चाहिए. युधिष्ठिर की इस बात से यक्ष प्रसन्न हुए. महाभारत की कथा के अनुसार, वह यक्ष वास्तव में धर्मदेव थे. उन्होंने युधिष्ठिर को आशीर्वाद दिया और उनके सभी भाइयों को पुनर्जीवित कर दिया. श्री कृष्ण ने शिशुपाल की 100 गलतियां क्यों माफ कीं? महाभारत में श्रीकृष्ण को केवल योद्धा या अर्जुन के सारथी के रूप में ही नहीं, बल्कि अपने वचन का पालन करने वाले व्यक्ति के रूप में भी देखा जाता है. राजसूय यज्ञ के दौरान युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण को अग्रपूजा के योग्य माना. लेकिन शिशुपाल इससे बेहद नाराज हो गया और भरी सभा में कृष्ण का अपमान करने लगा. शिशुपाल की मां श्रीकृष्ण की बुआ थीं. शिशुपाल के जन्म से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, वह सामान्य बालक की तरह पैदा नहीं हुआ था. उसके तीन नेत्र और चार भुजाएं थीं. भविष्यवाणी की गई थी कि जिस व्यक्ति की गोद में जाने के बाद उसके अतिरिक्त अंग … Read more

मंगल का नीच गोचर आज से, 12 नवंबर तक इन राशियों की चमकेगी किस्मत

वैदिक ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों के सेनापति और ऊर्जा, साहस व पराक्रम के कारक मंगल ग्रह का गोचर बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है. ग्रहों की चाल बदलते ही सभी 12 राशियों के जातकों के जीवन पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है. ज्योतिषीय गणना के अनुसार, 18 सितंबर 2026 को शाम 04:44 बजे मंगल ग्रह अपनी नीच राशि यानी चंद्रमा के स्वामित्व वाली कर्क राशि में प्रवेश करने जा रहे हैं. कर्क राशि में मंगल को कमजोर (नीच का) माना जाता है, हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि इसके परिणाम पूरी तरह नकारात्मक ही होंगे. यह गोचर 12 नवंबर 2026 तक रहेगा. इस दौरान कुछ राशियों को विशेष सावधानी बरतनी होगी, तो वहीं कुछ राशि के जातकों को करियर और कारोबार में जबरदस्त लाभ के योग बनेंगे. आइए विस्तार से जानते हैं कि मंगल का यह नीच गोचर सभी 12 राशियों के जीवन पर कैसा प्रभाव डालेगा. मंगल गोचर का मुख्य प्रभाव और क्या करें-क्या न करें? गुस्से पर नियंत्रण रखें: चूंकि मंगल उग्रता और एक्शन के प्रतीक हैं, इसलिए कर्क राशि में जाकर इनके प्रभाव से लोगों में जल्दबाजी या आक्रामक निर्णय लेने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है. ऐसे में अपने गुस्से और वाणी पर संयम रखना बेहद जरूरी है. आर्थिक फैसले सोच-समझकर लें: इस अवधि में बड़े निवेश या वित्तीय निर्णय लेने से पहले किसी विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें या पूरी गणना कर लें. रुके हुए कार्यों को गति मिलेगी: हालांकि यह गोचर कुछ मामलों में देरी ला सकता है, लेकिन यह आपके लंबे समय से अटके हुए साहसिक कार्यों को पूरा करने की प्रेरणा भी देगा. 12 राशियों पर मंगल गोचर का विस्तृत राशिफल: मेष राशि: संपत्ति की खरीद-फरोख्त से जुड़े मामलों में सावधानी बरतें. पारिवारिक जीवन में संबंधों के बीच तनाव उत्पन्न हो सकता है. माता-पिता के स्वास्थ्य को लेकर विशेष चिंता बनी रह सकती है. वृषभ राशि: छोटे भाई-बहनों के साथ संबंधों में उतार-चढ़ाव आ सकता है. कार्यक्षेत्र में कड़ा संघर्ष करना पड़ेगा, जिसके बाद ही आपको सफलता और तरक्की के योग मिलेंगे. मिथुन राशि: महत्वपूर्ण कार्यों में अचानक रुकावटें आ सकती हैं. स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं परेशान कर सकती हैं. कोई भी गलत फैसला आपको आर्थिक नुकसान दे सकता है, इसलिए वाहन चलाते समय और हर कदम पर सतर्क रहें. कर्क राशि: चूंकि मंगल इसी राशि में गोचर कर रहे हैं, इसलिए सेहत और रिश्तों के मामले में बाधाएं आ सकती हैं. गुप्त शत्रुओं से सतर्क रहें. घर की मरम्मत या नई खरीदारी पर धन खर्च हो सकता है, लेकिन साथ ही आर्थिक लाभ के भी योग हैं. सिंह राशि: नजदीकी मित्रों और संबंधियों के साथ वैचारिक मतभेद उभर सकते हैं. खर्चों की अधिकता से बजट बिगड़ सकता है. पारिवारिक अशांति से बचने का प्रयास करें और यात्रा के दौरान दुर्घटनाओं से सावधान रहें. कन्या राशि: इस राशि के जातकों के लिए मंगल का गोचर बेहद शुभ परिणाम लेकर आ रहा है. आपके रुके हुए सारे काम तेजी से पूरे होंगे. करियर में तरक्की के नए रास्ते खुलेंगे, मान-सम्मान में वृद्धि होगी और जीवन में सकारात्मक बदलाव आएंगे. तुला राशि: आर्थिक दृष्टि से लाभ तो मिलेगा, लेकिन साथ ही खर्चों का ग्राफ भी काफी ऊंचा रहेगा. मन में थोड़ी अशांति बनी रह सकती है. निवास स्थान या कार्यस्थल में परिवर्तन की संभावना बन रही है. वृश्चिक राशि: पिता के स्वास्थ्य को लेकर चिंता बढ़ सकती है. महत्वपूर्ण कार्यों में अड़चनें आने से मानसिक तनाव हो सकता है. सेहत को लेकर किसी भी प्रकार की लापरवाही न बरतें. धनु राशि: स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां आपको घेर सकती हैं. परिवार में किसी सदस्य की सर्जरी या स्वास्थ्य दुर्घटना की स्थिति बन सकती है. विरोधी वर्ग आप पर हावी होने की कोशिश करेंगे, हालांकि कुछ गुप्त लाभ भी मिल सकते हैं. मकर राशि: नए लोगों से मेल-जोल बढ़ेगा और नए व्यावसायिक संपर्क बनेंगे. नया कार्य शुरू करने या पूंजी निवेश करने के लिए समय अच्छा है, हालांकि किसी भी तरह की नई साझेदारी या कानूनी विवाद में बेहद सतर्क रहें. कुंभ राशि: संघर्ष के बाद अंततः आपको सफलता हासिल होगी. लंबे समय से चली आ रही किसी पुरानी स्वास्थ्य समस्या से राहत मिल सकती है. कुछ पुराने कर्जों या देनदारियों का निपटारा संभव है. घर या कार्यक्षेत्र में बदलाव आ सकता है. मीन राशि: कार्यक्षेत्र में आपकी मेहनत रंग लाएगी और तरक्की के योग बनेंगे. आय के नए स्रोत हाथ लग सकते हैं. पुराने किए गए अच्छे कार्यों के लिए आपको सम्मान मिल सकता है. हालांकि, कार्यस्थल पर जल्दबाजी या गुस्से में कोई गलत निर्णय लेने से बचें, अन्यथा हानि उठानी पड़ सकती है.

आज का राशिफल 18 सितंबर: इन राशियों पर बरसेगी मां लक्ष्मी की कृपा, बढ़ेगा धन

मेष राशि- आपका दिन काफी बेहतरीन साबित हो सकता है। करियर के मामले में महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी आपको दी जा सकती है। आर्थिक स्थिति भी मजबूत रहने वाली है। वृषभ राशि- सेहत के मामले में लापरवाही न बरतें। दिन रोमांटिक रहेगा। आज का आपका दिन पॉजिटिव एनर्जी से भरपूर रहने वाला है। इन्वेस्टमेंट को लेकर स्ट्रेटजी बनाने पर ध्यान दें। मिथुन राशि- लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशन वालों को आज ही प्रेम जीवन में आ रही दिक्कतों पर फोकस करना चाहिए। फिट रहने पर फोकस रखें। आज का दिन आलस भरा साबित हो सकता है। कर्क राशि- काम को समय पर पूरा करने पर फोकस रखें। सेहत के मामले में भाग्य साथ देगा। अपने पार्टनर के साथ रोमांटिक डेट प्लान करें। खर्च को इस वक्त कंट्रोल करने की जरूरत है। सिंह राशि- आपको सेल्फ लव पर फोकस करना चाहिए। करियर में अपनी जगह बनाने के लिए मेहनत ज्यादा करनी पड़ेगी। किसी पुराने इन्वेस्टमेंट से मनचाहा रिटर्न नहीं मिलेगा। कन्या राशि- अपनी बॉडी को फिट रखने के लिए योग ट्राई करें। एक शानदार दिन के लिए तैयार हो जाएं। हाल ही में हुई किसी डील से भारी मात्रा में धन-लाभ हो सकता है। प्रेम जीवन में चल रही दिक्कतें सॉल्व हो जाएंगी। तुला राशि- घर में टेंशन का माहौल रहेगा। विदेश यात्रा के योग बन रहे हैं। आज का दिन थोड़ा सा स्ट्रेस भरा साबित हो सकता है। समय पर काम ना पूरा होने से सीनियर्स या मैनेजमेंट की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है। वृश्चिक राशि- धन का आगमन होगा लेकिन खर्च बढ़ने की संभावना भी ज्यादा है। बाहर के खाने से परहेज करें। आज के दिन बदलावों से भरपूर रहने वाला है। काम के सिलसिले में विदेश की यात्रा के योग बन रहे हैं। धनु राशि- व्यापार, सेहत, पैसों का मामला या हो लव लाइफ बड़े चेंज के लिए तैयार हो जाएं। तनाव दूर करने के लिए मेडिटेशन करें। आज का दिन आप लोगों के लिए काफी बिजी साबित हो सकता है। मकर राशि– कार्यालय में अतिरिक्त जिम्मेदारियां मिल सकती हैं। बहुत ज्यादा प्रेशर न लें। वर्क लाइफ बैलेंस मेंटेन करके आगे बढ़ें। समय-समय पर ब्रेक जरूर लेते रहें। पार्टनर से सलाह लें। कुंभ राशि- दिन उतार-चढ़ाव से भरपूर रहने वाला है। ऑफिस की पॉलिटिक्स आपके लिए नेगेटिव साबित हो सकती है। पॉजिटिव सोच बनाकर रखें। अपने काम पर फोकस करें। गॉसिप से दूर रहें। मीन राशि- जरूरत पड़ने पर फैमिली से सलाह लें। आपके रुके हुए काम अपनी रफ्तार पकड़ेंगे। सिंगल लोग रिलेशनशिप में आ सकते हैं। अपनी हेल्थ का ध्यान रखें और स्ट्रेस से बचें।

पर्स गिफ्ट करते समय न करें ये गलतियां, खाली वॉलेट देना माना जाता है अशुभ

किसी खास मौके पर अपनों को पर्स या वॉलेट गिफ्ट करना आम बात है. यह ऐसा तोहफा है जो खूबसूरत होने के साथ रोजमर्रा के इस्तेमाल में भी आता है. लेकिन वास्तु से जुड़ी मान्यताओं में पर्स को केवल एक सामान नहीं माना जाता, क्योंकि इसका सीधा संबंध धन और आर्थिक स्थिति से जोड़ा जाता है. यही वजह है कि किसी को पर्स देते समय कुछ बातों का ध्यान रखने की सलाह दी जाती है. मान्यता है कि छोटी-सी गलती भी इस तोहफे के शुभ प्रभाव को कम कर सकती है. खाली पर्स देकर न करें शुरुआत अगर आप किसी को पर्स गिफ्ट कर रहे हैं तो उसे बिल्कुल खाली न देने की सलाह दी जाती है. मान्यता के अनुसार पर्स में एक सिक्का या नोट रखकर देना शुभ माना जाता है. ऐसा करने के पीछे यह विचार है कि नए पर्स के साथ धन और समृद्धि की शुरुआत हो. रंग चुनते समय रखें ध्यान पर्स खरीदते समय उसका रंग भी महत्वपूर्ण माना जाता है. वास्तु की मान्यताओं में लाल, हरा, भूरा और सुनहरा जैसे रंग शुभ माने जाते हैं. वहीं बहुत गहरे रंग के पर्स को गिफ्ट करने से बचने की सलाह दी जाती है. इसलिए तोहफा खरीदते समय सिर्फ पसंद ही नहीं, रंग का भी ध्यान रखा जा सकता है. खराब या टूटा पर्स गिफ्ट न करें किसी को उपहार में देने वाला सामान साफ-सुथरा और अच्छी स्थिति में होना चाहिए. खासतौर पर पर्स के मामले में पुराने, फटे, कटे या खराब क्वालिटी वाले पर्स को गिफ्ट करने से बचना चाहिए. धार्मिक मान्यताओं में खराब और अस्त-व्यस्त वस्तुओं को सकारात्मकता के लिए अच्छा नहीं माना जाता. उधार के पैसों से गिफ्ट करने से बचें वास्तु से जुड़ी मान्यताओं में यह भी कहा जाता है कि किसी को पर्स गिफ्ट करने के लिए उधार लेकर पैसा खर्च नहीं करना चाहिए. माना जाता है कि उपहार अपनी क्षमता के अनुसार देना बेहतर होता है. इसलिए अगर बजट कम है तो महंगा पर्स खरीदने के लिए कर्ज या उधार लेने के बजाय अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार ही तोहफा चुनें. पर्स गिफ्ट करते समय एक बात जरूर याद रखें पर्स को धन रखने की जगह माना जाता है, इसलिए इसे गिफ्ट करते समय साफ-सफाई, गुणवत्ता और उसके अंदर कुछ धन रखने जैसी बातों का ध्यान रखा जाता है. हालांकि ये बातें वास्तु और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं, इनका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है.

चाणक्य नीति: ये 4 आदतें इंसान को बना सकती हैं कंगाल, आज ही इनसे बना लें दूरी

आचार्य चाणक्य को महान कूटनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री और नीतिार माना जाता है. उनकी नीतियां आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी उस काल में थीं. चाणक्य नीति में धन के संचय, उसके सदुपयोग और उन कारणों का विस्तार से जिक्र किया गया है जो इंसान को फर्श से अर्श या इसके विपरीत ला सकते हैं.  कई बार व्यक्ति की लाख कोशिशों के बावजूद उसके पास पैसे टिक नहीं पाते और अचानक जेब खाली होने लगती है.  इसके पीछे कई बार हमारे अपने कुछ गलत व्यवहार और आदतें होती हैं. चाणक्य नीति के अनुसार, आइए जानते हैं वे 4 प्रमुख बातें या आदतें जो व्यक्ति को आर्थिक तंगी और कंगाली की ओर धकेल सकती हैं. 1. फिजूलखर्च और धन का अनादर आचार्य चाणक्य का मानना था कि जो व्यक्ति बिना सोचे-समझे पानी की तरह पैसा बहाता है, उसके पास मां लक्ष्मी कभी नहीं टिकतीं. पैसों का अपमान करना, जरूरत से ज्यादा दिखावा करना या बिना किसी वजह के विलासिता पर धन लुटाना बहुत जल्दी तिजोरी खाली कर देता है.  धन वही सुरक्षित रहता है जहां उसका सदुपयोग और उचित प्रबंधन किया जाता है. 2. अनुचित कार्यों से धन कमाना गलत तरीकों, भ्रष्टाचार, झूठ या दूसरों का हक मारकर कमाया गया धन कभी भी स्थायी नहीं होता.  चाणक्य के अनुसार, अधर्म के मार्ग से आया हुआ पैसा बहुत जल्दी और उतनी ही तेजी से वापस चला जाता है.  ऐसा धन व्यक्ति को आर्थिक रूप से तो बर्बाद करता ही है, साथ ही उसके जीवन में मानसिक अशांति और बड़े संकट भी लेकर आता है. 3. धन संचय और बचत की कमी भविष्य की अनिश्चितताओं से निपटने के लिए धन की बचत करना बेहद जरूरी है.  जो लोग आज की कमाई आज ही खर्च कर देते हैं और बुरे वक्त या आपातकाल के लिए कुछ भी नहीं बचाते, वे बहुत जल्द बड़े संकट में फंस जाते हैं.  चाणक्य कहते हैं कि संकट के समय ही सच्चे मित्र और धन की असली पहचान होती है, इसलिए समझदारी इसी में है कि आय का कुछ हिस्सा हमेशा बचाकर रखा जाए. 4. अहंकार और दान-धर्म से दूरी पैसा आने पर इंसान को कभी घमंड नहीं करना चाहिए. जो लोग धन के नशे में चूर होकर दूसरों का अनादर करते हैं.  अपनी कमाई में से जरूरतमंदों की मदद (दान) करना बंद कर देते हैं, उनका वैभव लंबे समय तक नहीं टिकता. समाज और जरूरतमंदों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भूल जाना भी कंगाली का एक बड़ा कारण बनता है.  

घर में मधुकामिनी का पौधा लगाने से मिलेंगे ये फायदे, जानें सही दिशा और वास्तु नियम

मधुकामिनी (Madhu Kamini / Orange Jasmine) का पौधा अपनी खूबसूरत हरी पत्तियों और सफेद, भीनी-भीनी खुशबू वाले फूलों के लिए जाना जाता है. बागवानी और सौंदर्य के अलावा, वास्तु शास्त्र और ज्योतिष में भी इस पौधे का बहुत ऊंचा स्थान है.  इसे घर में लगाने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है और जीवन के कई वास्तु दोष दूर होते हैं. आइए विस्तार से जानते हैं मधुकामिनी के पौधे से जुड़े वास्तु नियम, इसके लाभ और रख-रखाव के सही तरीकों के बारे में. 1. पौधे को लगाने की सही दिशा वास्तु शास्त्र में दिशाओं का बहुत महत्व होता है.  किसी भी पौधे का शुभ फल तभी मिलता है जब उसे सही दिशा में लगाया जाए. उत्तर और पूर्व दिशा (ईशान्य कोण): मधुकामिनी के पौधे को हमेशा घर की उत्तर, पूर्व या उत्तर-पूर्व (ईशान्य कोण) दिशा में लगाना सबसे उत्तम माना जाता है.  यह दिशाएं देवताओं और सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र मानी जाती हैं.  इस दिशा में यह पौधा तेजी से सकारात्मक परिणाम देता है. किन दिशाओं में रखने से बचें: इस पौधे को घर की दक्षिण या पश्चिम दिशा में रखने से बचना चाहिए, क्योंकि ये दिशाएं इसकी ऊर्जा के अनुकूल नहीं मानी जातीं. 2. मुख्य वास्तु लाभ सकारात्मक ऊर्जा का संचार: इस पौधे के फूलों की प्राकृतिक और भीनी खुशबू घर के वातावरण को तरोताजा रखती है. यह मानसिक तनाव को कम कर घर में शांति और सुकून भरा माहौल बनाती है. आर्थिक समृद्धि: वास्तु के जानकारों के अनुसार, यह पौधा घर में धन और बरकत को आकर्षित करता है.  इसे घर के मुख्य द्वार के पास या बालकनी में सही दिशा में रखने से आर्थिक स्थिति मजबूत होती है. पारिवारिक रिश्तों में मिठास: इसके नाम की तरह ही इसके प्रभाव से परिवार के सदस्यों के बीच आपसी प्रेम, अपनापन और मधुर संबंध बने रहते हैं.  यह वैवाहिक जीवन में भी मिठास घोलने में मदद करता है. 3. रख-रखाव और वास्तु से जुड़े जरूरी नियम स्वच्छता का विशेष ध्यान: पौधे के आसपास का स्थान हमेशा साफ-सुथरा होना चाहिए.  गमले के पास किसी भी प्रकार का कड़ा-कचरा या गंदगी जमा न होने दें. सूखे पत्तों और शाखाओं को हटाएं: यदि पौधे की कोई टहनी या पत्तियां सूख जाएं, तो उन्हें तुरंत काटकर अलग कर दें.  वास्तु के अनुसार, घर में सूखा या मुरझाया हुआ पौधा नकारात्मक ऊर्जा का कारण बनता है. नियमित सिंचाई और देखभाल: पौधे को पर्याप्त धूप और पानी दें ताकि उसकी ताजगी बनी रहे. हरा-भरा और स्वस्थ पौधा घर में हमेशा सकारात्मकता और तरक्की लेकर आता है.

राधा या रुक्मिणी, कौन हैं कृष्ण के सबसे करीब? जानें दोनों से जुड़े पौराणिक रहस्य

 भगवान श्रीकृष्ण का नाम आते ही सबसे पहले राधा रानी का स्मरण होता है. राधा को जहां कृष्ण की प्रेम और भक्ति का प्रतीक माना जाता है, वहीं रुक्मिणी को उनकी अर्धांगिनी के रूप में पूजा जाता है. भगवान कृष्ण इन दोनों से अलग-अलग रूपों में प्रेम करते थे. लेकिन क्या आपको पता है कि राधा और रुक्मिणी से जुड़े कई ऐसे पौराणिक रहस्य हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं? क्या राधा और रुक्मिणी को देवी लक्ष्मी के ही अलग-अलग स्वरूप माना जाता है? और क्या राधा-कृष्ण का विवाह वास्तव में हुआ था? आइए, आज जानते हैं राधा, रुक्मिणी और भगवान कृष्ण से जुड़ी इन पौराणिक कथाओं को. रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण को बनाया था अपना पति पौराणिक कथा के अनुसार, रुक्मिणी विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री थीं. वह भगवान श्रीकृष्ण के गुणों और व्यक्तित्व से प्रभावित थीं और मन ही मन उन्हें अपना पति मान चुकी थीं. लेकिन रुक्मिणी के भाई रुक्मी उनका विवाह शिशुपाल से कराना चाहते थे. जब रुक्मिणी को इस बात का पता चला, तो उन्होंने भगवान कृष्ण को संदेश भेजकर अपनी इच्छा बताई. कथा के अनुसार, विवाह से पहले ही भगवान कृष्ण रुक्मिणी को लेकर चले गए और बाद में दोनों का विवाह हुआ. इसी वजह से रुक्मिणी को भगवान कृष्ण की प्रमुख पत्नियों में सबसे प्रमुख स्थान प्राप्त है. राधा और रुक्मिणी को लक्ष्मी का स्वरूप क्यों माना जाता है? वैष्णव परंपरा में भगवान कृष्ण को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है. इसी परंपरा में रुक्मिणी को देवी लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है. राधा रानी के स्वरूप को लेकर अलग-अलग वैष्णव परंपराओं में अलग व्याख्याएं मिलती हैं. गौड़ीय वैष्णव परंपरा में राधा को कृष्ण की ह्लादिनी शक्ति यानी उनकी दिव्य आनंद-शक्ति माना जाता है. इसी वजह से राधा रानी और श्रीकृष्ण का संबंध केवल सांसारिक प्रेम के रूप में नहीं, बल्कि ईश्वर और उनकी शक्ति के आध्यात्मिक संबंध के रूप में भी समझाया जाता है. क्या राधा और कृष्ण का विवाह हुआ था? राधा-कृष्ण के विवाह को लेकर अलग-अलग धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में अलग-अलग कथाएं मिलती हैं. ब्रह्मवैवर्त पुराण और गर्ग संहिता से जुड़ी परंपराओं में राधा-कृष्ण विवाह का वर्णन मिलता है. एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, ब्रज के भांडीर वन में ब्रह्मा जी ने राधा और कृष्ण का विवाह कराया था. इस मान्यता से जुड़ा भांडीर वन आज भी ब्रज क्षेत्र में धार्मिक आस्था का प्रमुख स्थान माना जाता है. इसलिए यह कहना उचित होगा कि राधा-कृष्ण के विवाह की कथा कुछ धार्मिक परंपराओं में स्वीकार की गई है, जबकि सभी प्रमुख ग्रंथों में इसका एक जैसा वर्णन नहीं मिलता. सीता और रुक्मिणी के संबंध की कथा राधा और रुक्मिणी को देवी लक्ष्मी के स्वरूप से जोड़ने वाली मान्यताओं के साथ रामायण की कुछ कथाएं भी जोड़ी जाती हैं. एक प्रचलित कथा के अनुसार, भगवान राम के अश्वमेध यज्ञ के दौरान माता सीता की अनुपस्थिति में उनके स्थान पर उनकी स्वर्ण प्रतिमा स्थापित की गई थी. यह कथा भगवान राम की पत्नी के रूप में सीता के महत्व को दर्शाती है. बाद की पौराणिक परंपराओं में सीता, रुक्मिणी और लक्ष्मी के स्वरूपों को एक-दूसरे से जोड़कर भी देखा गया है. हालांकि, इन कथाओं के स्रोत और विवरण अलग-अलग ग्रंथों में अलग मिलते हैं. राधा-कृष्ण का प्रेम संबंध और रुक्मिणी का वैवाहिक संबंध राधा रानी और रुक्मिणी को समझने के लिए उनके संबंधों को एक ही दृष्टि से देखना जरूरी नहीं है. राधा-कृष्ण का संबंध भक्ति, प्रेम और आध्यात्मिक समर्पण का प्रतीक माना जाता है. वहीं रुक्मिणी-कृष्ण का संबंध पति-पत्नी के वैवाहिक रिश्ते के रूप में सामने आता है. इसलिए कृष्ण के जीवन में राधा और रुक्मिणी की भूमिकाएं अलग होते हुए भी दोनों का धार्मिक महत्व बहुत बड़ा है. कृष्ण और राधा के वियोग की कथाएं राधा और कृष्ण के वियोग को लेकर भी कई पौराणिक और भक्तिपरक कथाएं प्रचलित हैं. श्री कृष्ण के वृंदावन छोड़कर मथुरा और फिर द्वारका चले जाने के बाद दोनों के अलग होने की कथा भक्ति साहित्य में बेहद महत्वपूर्ण बन गई. कुछ परंपराओं में श्रीकृष्ण के वियोग को अलग-अलग श्रापों और पौराणिक घटनाओं से जोड़कर समझाया गया है. हालांकि, इन कथाओं के विवरण सभी ग्रंथों में समान नहीं हैं. राधा-कृष्ण का यह वियोग भक्त और भगवान के बीच उस प्रेम का प्रतीक माना जाता है, जिसमें मिलने से ज्यादा भगवान की स्मृति और भक्ति को महत्व दिया जाता है. रुक्मिणी और श्री कृष्ण के अलग होने की कथा रुक्मिणी और श्रीकृष्ण से जुड़ी एक अन्य कथा ऋषि दुर्वासा से संबंधित है. विभिन्न पुराणिक परंपराओं में इस प्रसंग के अलग-अलग रूप मिलते हैं. इस कथा में ऋषि दुर्वासा के आतिथ्य और उनके साथ हुए व्यवहार को लेकर भगवान कृष्ण और रुक्मिणी से जुड़ी घटनाओं का वर्णन मिलता है. कुछ लोककथाओं में इसी प्रसंग को दोनों के लंबे समय तक अलग रहने से भी जोड़ा जाता है. हालांकि, इस कथा के अलग-अलग संस्करणों में घटनाओं और अवधि को लेकर अंतर मिलता है, इसलिए इसे एक निश्चित ऐतिहासिक घटना की तरह नहीं, बल्कि पौराणिक परंपरा के रूप में देखना चाहिए. राधा रानी और रुक्मिणी, दोनों का अपना अलग महत्व भगवान कृष्ण के साथ राधा और रुक्मिणी के संबंधों को भारतीय धार्मिक परंपरा में अलग-अलग भावों से समझाया गया है. राधा को प्रेम, भक्ति और कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक माना जाता है. वहीं रुक्मिणी को पत्नी, गृहस्थ धर्म और देवी लक्ष्मी के स्वरूप से जोड़ा जाता है. इसलिए राधा और रुक्मिणी की तुलना करने के बजाय दोनों के धार्मिक स्वरूप और उनसे जुड़ी अलग-अलग परंपराओं को समझना अधिक महत्वपूर्ण है. भगवान श्रीकृष्ण की कथाओं में प्रेम, भक्ति, त्याग और समर्पण के कई रूप दिखाई देते हैं. यही वजह है कि आज भी राधा-कृष्ण और रुक्मिणी-कृष्ण की पूजा करोड़ों भक्त श्रद्धा के साथ करते हैं.