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यूथ कांग्रेस का सदस्यता अभियान ऐतिहासिक, मप्र में पार किए 15 लाख सदस्यता के आंकड़े

भोपाल   मध्यप्रदेश युवा कांग्रेस की चुनावी प्रक्रिया पूरी हो गई है। पूरे प्रदेश से लगभग 16 लाख युवाओं ने कांग्रेस की सदस्यता ली है। युवा कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के लिए 18 प्रत्याशी मैदान में है। प्रदेश महासचिव पद के लिए 182 दावेदार है। संगठन का दावा है कि करीब दो महीने बाद नई कार्यकारिणी मिल जाएगी।युवा कांग्रेस के चुनाव में सबसे ज्यादा घमासान नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के गृह जिले धार में देखने को मिला है। धार में युवा कांग्रेस के जिला अध्यक्ष के लिए सबसे ज्यादा 15 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा है। नए सदस्यों के दस्तावेजों की होगी जांच एमपी कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता विवेक त्रिपाठी ने बताया कि यूथ कांग्रेस के महासचिव के अलावा ब्लॉक अध्यक्ष, विधानसभा अध्यक्ष, जिला अध्यक्ष के दावेदारों को वोट किया। अब 16 लाख के करीब बनाए गए सदस्यों के दस्तावेजों की जांच होगी। दस्तावेजों में त्रुटि पाए जाने पर सदस्यता निरस्त की जाएगी। इस प्रक्रिया को अंतिम रूप देने में करीब दो माह का समय लगेगा। करीब 2 महीने के बाद यूथ कांग्रेस को नया अध्यक्ष और नई कार्यकारिणी मिलेगी। प्रदेश अध्यक्ष पद पर प्रथम तीन उम्मीदवारों को इंटरव्यू के लिए आलाकमान दिल्ली बुलाएगा। इसके बाद नाम का ऐलान किया जाएगा। एक सदस्य ने छह वोट किए मध्य प्रदेश में युवा कांग्रेस संगठन चुनाव के लिए सदस्यता लेने और मतदान की प्रक्रिया पूरी हो चुकी हैं। एमपी में 20 जून की सुबह 9 बजे से मतदान और सदस्यता प्रक्रिया शुरू हुई, जो 19 जुलाई की शाम तक चली। युवा कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष, प्रदेश महासचिव, विधानसभा अध्यक्ष, जिला अध्यक्ष, ब्लॉक अध्यक्ष, जिला महासचिव के पद पर वोटिंग हुई। एक सदस्य ने छह वोट किए। प्रदेश अध्यक्ष के लिए ये दावेदार  युवा कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए कुल 18 प्रत्याशी चुनावी मैदान में हैं। जिनमें जावेद पटेल, योगिता सिंह, नीरज पटेल, गीता कड़वे, अभिषेक परमार, विश्वजीत सिंह चौहान, विनय पांडे, प्रमोद सिंह, प्रियेश चौकड़े, राजवीर कुड़िया, अब्दुल करीम सिद्दीकी, शुभंगाना राजे, आशीष चौबे, यश घनघोरिया, स्वीटी पाटिल, देवेंद्र सिंह दादू, शिवराज यादव, मोनिका मांडरे चुनावी मैदान में हैं। कमलनाथ के जिले में मुकाबला नहीं पूर्व सीएम कमलनाथ के गृह जिले छिंदवाड़ा और पांढुर्णा ेमें युवा कांग्रेस जिलाध्यक्ष के लिए कोई मुकाबला नजर नहीं आया। दोनों जिलों में सिर्फ एक-एक उम्मीदवार ने चुनाव लड़ा। हरदा में भी सिंगल केंडिडेट रहा। इन तीनों जिलों में निर्विरोध अध्यक्ष चुने जाएंगे। दो महीने तक चलेगी स्क्रूटनी युवा कांग्रेस के चुनाव के लिए चलाए गए सदस्यता अभियान में नए मेंबर्स ने सदस्यता लेने के बाद 6 पदों के लिए मतदान किया है। ब्लॉक अध्यक्ष, विधानसभा अध्यक्ष, जिला अध्यक्ष, जिला महासचिव, प्रदेश महासचिव और प्रदेश अध्यक्ष का वोट डाले हैं। अब दो महीनों तक सभी वोटों की स्क्रूटनी होगी। इसमें ये देखा जाएगा कि वोट देने वाले ने अपने दस्तावेज अपलोड किए हैं या नहीं, मतदान के बाद वीडियो अपलोड किया है या नहीं। यदि मेंबरशिप फीस अदा नहीं की है तो वोट रिजेक्ट माना जाएगा। प्रदेश अध्यक्ष के लिए त्रिकोणीय जंग युवा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में त्रिकोणीय मुकाबला नजर आ रहा है। सबसे ज्यादा वोटिंग जबलपुर, भोपाल और ग्वालियर में हुई है। जबलपुर के विधायक और पूर्व मंत्री लखन घनघोरिया के बेटे यश घनघोरिया प्रदेश अध्यक्ष की रेस में सबसे आगे नजर आ रहे हैं। वहीं भोपाल के अभिषेक परमार और ग्वालियर के शिवराज यादव ने भी चुनाव जीतने के लिए पूरा दम लगाया है। युवा कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के 19 उम्मीदवार     योगिता सिंह     जावेद पटेल     अभिषेक परमार     नीरज पटेल     गीता कडवे     प्रमोद सिंह     विश्वजीत सिंह चौहान     विनय पांडेय     राजवीर कुड़िया     प्रियेश चौकड़े     अब्दुल करीम कुरैशी     शुभांगना राजे जामनिया     आशीष चौबे     यश घनघोरिया     देवेंद्रसिंह दादू     स्वीटी पाटिल     शिवराज यादव     मोनिका मंडरे     राजीव सिंह प्रदेश महासचिव के लिए सबसे ज्यादा घमासान युवा कांग्रेस के प्रदेश महासचिव के लिए सबसे ज्यादा घमासान मचा है। महासचिव के लिए 182 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा है। प्रदेश कार्यकारिणी में अध्यक्ष के साथ नौ उपाध्यक्ष होंगे। इनमें एसटी, एससी, ओबीसी, महिला, अल्पसंख्यक और एक दिव्यांग उपाध्यक्ष होगा। ,48 प्रदेश महासचिव बनेंगे युवा कांग्रेस की प्रदेश कार्यकारिणी में 48 प्रदेश महासचिव बनाए जाएंगे। इनमें 17 महासचिव अनारक्षित वर्ग से होंगे। 3 एसटी, एससी, 5 ओबीसी, 5 अल्पसंख्यक, 11 महिला, 2 ओबीसी महिला, एक अल्पसंख्यक महिला, एक दिव्यांग और एक ट्रांसजेंडर को महासचिव बनाया जाएगा।  

यूथ कांग्रेस का सदस्यता अभियान ऐतिहासिक, मप्र में पार किए 15 लाख सदस्यता के आंकड़े

भोपाल   मध्यप्रदेश युवा कांग्रेस की चुनावी प्रक्रिया पूरी हो गई है। पूरे प्रदेश से लगभग 16 लाख युवाओं ने कांग्रेस की सदस्यता ली है। युवा कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के लिए 18 प्रत्याशी मैदान में है। प्रदेश महासचिव पद के लिए 182 दावेदार है। संगठन का दावा है कि करीब दो महीने बाद नई कार्यकारिणी मिल जाएगी।युवा कांग्रेस के चुनाव में सबसे ज्यादा घमासान नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के गृह जिले धार में देखने को मिला है। धार में युवा कांग्रेस के जिला अध्यक्ष के लिए सबसे ज्यादा 15 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा है। नए सदस्यों के दस्तावेजों की होगी जांच एमपी कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता विवेक त्रिपाठी ने बताया कि यूथ कांग्रेस के महासचिव के अलावा ब्लॉक अध्यक्ष, विधानसभा अध्यक्ष, जिला अध्यक्ष के दावेदारों को वोट किया। अब 16 लाख के करीब बनाए गए सदस्यों के दस्तावेजों की जांच होगी। दस्तावेजों में त्रुटि पाए जाने पर सदस्यता निरस्त की जाएगी। इस प्रक्रिया को अंतिम रूप देने में करीब दो माह का समय लगेगा। करीब 2 महीने के बाद यूथ कांग्रेस को नया अध्यक्ष और नई कार्यकारिणी मिलेगी। प्रदेश अध्यक्ष पद पर प्रथम तीन उम्मीदवारों को इंटरव्यू के लिए आलाकमान दिल्ली बुलाएगा। इसके बाद नाम का ऐलान किया जाएगा। एक सदस्य ने छह वोट किए मध्य प्रदेश में युवा कांग्रेस संगठन चुनाव के लिए सदस्यता लेने और मतदान की प्रक्रिया पूरी हो चुकी हैं। एमपी में 20 जून की सुबह 9 बजे से मतदान और सदस्यता प्रक्रिया शुरू हुई, जो 19 जुलाई की शाम तक चली। युवा कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष, प्रदेश महासचिव, विधानसभा अध्यक्ष, जिला अध्यक्ष, ब्लॉक अध्यक्ष, जिला महासचिव के पद पर वोटिंग हुई। एक सदस्य ने छह वोट किए। प्रदेश अध्यक्ष के लिए ये दावेदार  युवा कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए कुल 18 प्रत्याशी चुनावी मैदान में हैं। जिनमें जावेद पटेल, योगिता सिंह, नीरज पटेल, गीता कड़वे, अभिषेक परमार, विश्वजीत सिंह चौहान, विनय पांडे, प्रमोद सिंह, प्रियेश चौकड़े, राजवीर कुड़िया, अब्दुल करीम सिद्दीकी, शुभंगाना राजे, आशीष चौबे, यश घनघोरिया, स्वीटी पाटिल, देवेंद्र सिंह दादू, शिवराज यादव, मोनिका मांडरे चुनावी मैदान में हैं। कमलनाथ के जिले में मुकाबला नहीं पूर्व सीएम कमलनाथ के गृह जिले छिंदवाड़ा और पांढुर्णा ेमें युवा कांग्रेस जिलाध्यक्ष के लिए कोई मुकाबला नजर नहीं आया। दोनों जिलों में सिर्फ एक-एक उम्मीदवार ने चुनाव लड़ा। हरदा में भी सिंगल केंडिडेट रहा। इन तीनों जिलों में निर्विरोध अध्यक्ष चुने जाएंगे। दो महीने तक चलेगी स्क्रूटनी युवा कांग्रेस के चुनाव के लिए चलाए गए सदस्यता अभियान में नए मेंबर्स ने सदस्यता लेने के बाद 6 पदों के लिए मतदान किया है। ब्लॉक अध्यक्ष, विधानसभा अध्यक्ष, जिला अध्यक्ष, जिला महासचिव, प्रदेश महासचिव और प्रदेश अध्यक्ष का वोट डाले हैं। अब दो महीनों तक सभी वोटों की स्क्रूटनी होगी। इसमें ये देखा जाएगा कि वोट देने वाले ने अपने दस्तावेज अपलोड किए हैं या नहीं, मतदान के बाद वीडियो अपलोड किया है या नहीं। यदि मेंबरशिप फीस अदा नहीं की है तो वोट रिजेक्ट माना जाएगा। प्रदेश अध्यक्ष के लिए त्रिकोणीय जंग युवा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में त्रिकोणीय मुकाबला नजर आ रहा है। सबसे ज्यादा वोटिंग जबलपुर, भोपाल और ग्वालियर में हुई है। जबलपुर के विधायक और पूर्व मंत्री लखन घनघोरिया के बेटे यश घनघोरिया प्रदेश अध्यक्ष की रेस में सबसे आगे नजर आ रहे हैं। वहीं भोपाल के अभिषेक परमार और ग्वालियर के शिवराज यादव ने भी चुनाव जीतने के लिए पूरा दम लगाया है। युवा कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के 19 उम्मीदवार     योगिता सिंह     जावेद पटेल     अभिषेक परमार     नीरज पटेल     गीता कडवे     प्रमोद सिंह     विश्वजीत सिंह चौहान     विनय पांडेय     राजवीर कुड़िया     प्रियेश चौकड़े     अब्दुल करीम कुरैशी     शुभांगना राजे जामनिया     आशीष चौबे     यश घनघोरिया     देवेंद्रसिंह दादू     स्वीटी पाटिल     शिवराज यादव     मोनिका मंडरे     राजीव सिंह प्रदेश महासचिव के लिए सबसे ज्यादा घमासान युवा कांग्रेस के प्रदेश महासचिव के लिए सबसे ज्यादा घमासान मचा है। महासचिव के लिए 182 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा है। प्रदेश कार्यकारिणी में अध्यक्ष के साथ नौ उपाध्यक्ष होंगे। इनमें एसटी, एससी, ओबीसी, महिला, अल्पसंख्यक और एक दिव्यांग उपाध्यक्ष होगा। ,48 प्रदेश महासचिव बनेंगे युवा कांग्रेस की प्रदेश कार्यकारिणी में 48 प्रदेश महासचिव बनाए जाएंगे। इनमें 17 महासचिव अनारक्षित वर्ग से होंगे। 3 एसटी, एससी, 5 ओबीसी, 5 अल्पसंख्यक, 11 महिला, 2 ओबीसी महिला, एक अल्पसंख्यक महिला, एक दिव्यांग और एक ट्रांसजेंडर को महासचिव बनाया जाएगा।  

OBC मुद्दे पर राहुल गांधी का आत्मस्वीकृति बयान: गलती मानी, सुधार का वादा किया

नई दिल्ली लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा है कि वह ओबीसी हितों की उतनी रक्षा नहीं कर पाए, जितनी उन्हें करनी चाहिए थी। राजधानी दिल्ली में आयोजित 'भागीदारी न्याय महासम्मेलन' में संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा, जातिगत जनगणना ना करवा पाना मेरी गलती है। मैं अब इसे सुधारना चाहता हूं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस शासित सभी राज्यों में जातिगत जनगणना करवाई जाएगी। राहुल गांधी ने कहा, मेरा उद्देश्य देश की उत्पादक शक्ति को सम्मान दिलाना है। ओबीसी, दलित, आदिवासी देश की उत्पादक शक्ति हैं, लेकिन उन्हें अपने श्रम का फल नहीं मिल रहा है। उन्होंने कहा कि आरएसएस और बीजेपी ने जानबूझकर ओबीसी का इतिहास मिटाने की कोशिश की है। इससे पहले तेलंगाना में भी प्रदेश नेतृत्व की बैठक में राहुल गांधी ने कहा था कि दलितों, आदिवासियों और मिलाओं के मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी ट्रैक पर थी लेकिन बीते 10-15 सालों में ओबीसी वर्ग को लेकर हमारी प्रतिक्रिया वैसी नहीं रही , जैसी रहनी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि हमने जिस जगह को खाली छोड़ दिया, बीजेपी ने वहीं कब्जा कर लिया। राहुल गांधी ने कहा, मैं जब पीछे देखता हूं तो मुझे लगता है कि एक चीज में कमी रह गई। वह गलती थी जो ओबीसी वर्ग था उसका जिस प्रकार से प्रोटेक्शन करना था, वह मैं नहीं कर पाया। उन्होंने कहा कि आप आदिवासियों के इलाके में जाते हैं तो जंगल, जल, जमीन सब सामने दिखाई देता है। लेकिन ओबीसी की दिक्कतें छिपी हुई हैं। मेरा पछतावा यही है कि अगर मुझे आपके इतिहास के बारे में थोड़ा सा भी ज्यादा मालूम होता तो मैं तभी इसका समाधान करता। मैं स्टेज से कह रहा हूं कि ये मेरी गलती है। यह कांग्रेस पार्टी की नहीं बल्कि मेरी गलती है। मैं इसे ठीक करने जा रहा हूं। अच्छा यह है कि अगर उस समय मैंने जातीय जनगणना करवा दी होती तो अब जैसी जनगणना करवानी है, वैसी नहीं हो पाती। मैंने एक गलती की, ओबीसी को नहीं समझ सका: राहुल गांधी लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने स्वीकार किया कि ओबीसी समुदाय की समस्याओं को वो समय रहते नहीं समझ पाए, और ये उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूलों में से एक रही. उन्होंने कहा, 'अगर मैंने ओबीसी की पीड़ा UPA शासन के दौरान समझ ली होती, तो उसी वक्त जातीय जनगणना करा दी होती.  उन्होंने कहा कि उन्हें दलितों, आदिवासियों और महिलाओं के मुद्दों को समझने में समय लगा, लेकिन ओबीसी की स्थिति को उन्होंने देर से पहचाना. मैंने MGNREGA, खाद्य सुरक्षा कानून, वन अधिकार कानून जैसे मुद्दों पर ठीक काम किया, लेकिन ओबीसी को लेकर मैं चूक गया. अब OBC की लड़ाई मेरी प्राथमिकता राहुल गांधी ने साफ कहा कि अब वे इस मोर्चे पर पीछे नहीं हटेंगे, और जातीय जनगणना से लेकर आरक्षण विस्तार तक, वो OBC के अधिकारों की लड़ाई को निर्णायक मोड़ तक ले जाएंगे. उन्होंने कहा, 'PGV (प्रियंका गांधी वाड्रा) से पूछिए, अगर राहुल गांधी कुछ ठान ले, तो क्या वो पीछे हटते हैं?' तेलंगाना की जातीय गणना सुनामी जैसी राहुल गांधी ने कांग्रेस शासित तेलंगाना सरकार की जातीय जनगणना को 'तूफान' बताया और कहा कि उसके आंकड़े चौंकाने वाले हैं. तेलंगाना के कॉर्पोरेट दफ्तरों में कितने ओबीसी, दलित, आदिवासी हैं – यह एक मिनट में सामने आ जाता है. नरेंद्र मोदी कोई बड़ी समस्या नहीं हैं प्रधानमंत्री पर तीखा हमला करते हुए राहुल गांधी ने कहा, 'नरेंद्र मोदी कोई बड़ी समस्या नहीं हैं. वो तो बस अपने प्रचार का एक शो हैं. उनके पास असली ताकत नहीं है." वो हमारे सिर पर चढ़ गए हैं, असल समस्या RSS है.' RSS OBC का सबसे बड़ा दुश्मन राहुल गांधी ने OBC समुदाय से सीधे कहा कि उनका असली विरोधी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) है. 50% आरक्षण की सीमा टूटेगी उन्होंने दावा किया कि जातीय जनगणना के बाद आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा खुद-ब-खुद टूट जाएगी. उन्होंने उदाहरण दिया कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने पहले ही यह दीवार तोड़ दी है. आइए जानते हैं कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस महासम्मेलन में क्या-क्या कहा? सभा को संबोधित करते हुए कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा, 'यह भागीदारी न्याय सम्मेलन न केवल एक राजनीतिक सभा है, बल्कि यह भारत की पिछड़ी और वंचित जातियों की एक सामूहिक पुकार है. डॉ. अंबेडकर ने कहा था — "न्याय ही राष्ट्र की आत्मा है." आज यह वंचित लोग समाज में हो रही असमानता के खिलाफ आवाज उठाने के लिए पुकार रही है'. उन्होंने कहा कि हमें यह स्वीकार करना होगा कि भारत का सामाजिक ढांचा न्याय पर नहीं, बल्कि बहिष्करण पर आधारित था.  जिन्होंने यह देश बनाया — हमारे उत्पादक वर्ग, जिनमें अधिकांश पिछड़े वर्गों से हैं — उन्हें शिक्षा, भूमि और नेतृत्व से वंचित रखा गया. उनकी मेहनत का सम्मान नहीं, बल्कि सामाजिक जंजीरों में जकड़ दिया गया. यह कोई संयोग नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित व्यवस्था थी. बीजेपी-आरएसएस की विचारधारा इस व्यवस्था को खत्म नहीं करना चाहती, बल्कि उसे महिमामंडित करती है.  राहुल गांधी ने कहा कि तेलंगाना में जो जातीय जनगणना हुई उसका असर आपको अब दिखाई देगा। जैसे सुनामी जब आई थी तब 1 हजार किलोमीटर लंबा क्रैक जमीन में आ गया था। किसी ने नहीं देखा लेकिन दो तीन घंटे बाद उसका असर दिखाई दिया। वहीं तेलंगाना में भी हुआ है। राहुल गांधी ने कहा कि तेलंगाना में जो जातीय जनगणना हुई उसका असर आपको अब दिखाई देगा। जैसे सुनामी जब आई थी तब 1 हजार किलोमीटर लंबा क्रैक जमीन में आ गया था। किसी ने नहीं देखा लेकिन दो तीन घंटे बाद उसका असर दिखाई दिया। वहीं तेलंगाना में भी हुआ है। पीएम मोदी पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा, प्रधानमंत्री जी कहते हैं डेटा, डेटा, डेटा, 3जी, 4जी, 5 जी। 50 साल पहले जिसके पास तेल था उसी के पास ताकत थी। लेकिन आज का तेल डेटा है। डेटा कंपनियों के पास होता है। आप रिलायंस या ऐमजॉन के पास जाएंगेतो वे आपको डेटा दिखा देंगे। अस्पताल में जाएंगे तो डेटा दिखा देंगे। लेकिन जो डेटा तेलंगाना सरकार के पास है उसकी देश में कोई तुलना नहीं है। हम आपको एक मिनट में बता सकते हैं कि तेलंगाना के सारे … Read more

धनखड़ ने अचानक छोड़ा पद, क्या अगले दिन सामने आने वाला था कोई बड़ा तूफ़ान?

नई दिल्ली जगदीप धनखड़ को इस्तीफा दिए 4 दिन हो गए, मगर हलचल कम नहीं हुई है. जगदीप धनखड़ ने सेहत का हवाला देकर सोमवार यानी 21 जुलाई को इस्तीफा दिया. मगर उनके इस्तीफे की कहानी अब सामने आने लगी हैं. ऐसा लग रहा है कि सेहत बहाना था. उन्हें फ्यूचर की भनक लग गई थी. इसलिए आनन-फानन में मानसून सत्र के पहले दिन ही रात को अपना इस्तीफा सौंपा. जी हां, सूत्रों का दावा है कि राज्यसभा में खुद जगदीप धनखड़ को हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी थी.  जगदीप धनखड़ के पास इस्तीफा देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था क्योंकि भाजपा और उसके सहयोगी उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहे थे. जगदीप धनखड़ के खिलाफ अगले ही दिन अविश्वास प्रस्ताव आना था. यह फैसला तब हुआ जब सरकार को पता चला कि उन्होंने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ 63 विपक्षी सांसदों की ओर से साइन किए महाभियोग वाले नोटिस को स्वीकार कर लिया. अब क्या है स्थिति इधर, सरकार नए उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार की तलाश तेज कर चुकी है। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश यात्रा से लौटने के बाद नाम की घोषणा की जा सकती है। धनखड़ के लिए सरकारी अधिकारी टाइप 8 बंगले की तलाश कर रहे हैं। माना जा रहा है कि उनका अचानक इस्तीफा इस बात के संकेत देता है कि उनके पास कोई और विकल्प नहीं बचा था, क्योंकि सरकार जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ लाए गए विपक्ष के प्रस्ताव को स्वीकारने के अगले दिन अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रही थी। अगर ऐसा होता तो धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आसानी से पास हो जता, क्योंकि NDA के पास जरूरी आंकड़े हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, सूत्र बताते हैं कि राज्यसभा सचिवालय के एक पदाधिकारी के जरिए सोमवार को धनखड़ को संदेश पहुंचाया गया था कि 'तुरंत पद छोड़ दें या अगले दिन अविश्वास प्रस्ताव का सामना करें।' इसे चुनौती देने के बजाए धनखड़ राष्ट्रपति भवन पहुंचे और इस्तीफा सौंप दिया। रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस वर्मा के खिलाफ विपक्ष का पत्र स्वीकार करने के बाद धनखड़ से सरकार के वरिष्ठ पदाधिकारी संपर्क नहीं कर पा रहे थे, जिसके चलते उन्होंने सोमवार शाम हुई BAC यानी बिजनेस एडवाइजरी मीटिंग से दूरी बना ली। विपक्ष से कौन होगा उम्मीदवार पीटीआई भाषा के अनुसार, सूत्र बताते हैं कि विपक्षी INDIA गठबंधन उपराष्ट्रपति के चुनाव में साझा उम्मीदवार उतार सकता है, हालांकि सभी घटक दलों से विचार-विमर्श के बाद ही इस पर अंतिम निर्णय किया जाएगा। विपक्षी गठबंधन के एक वरिष्ठ नेता ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ‘‘उपराष्ट्रपति चुनाव को लेकर यह भावना है कि इसमें उम्मीदवार उतारा जाए, चाहे नतीजे कुछ भी हों क्योंकि ऐसा करने से राजनीतिक संदेश जाएगा।’’ जगदीप धनखड़ ने बीते सोमवार शाम स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया था, हालांकि उनके इस्तीफे के पीछे के कारणों को लेकर लगातार अटकलों का दौर जारी है। क्या था अंदरखाने वाला प्लान सूत्रों की मानें तो जगदीप धनखड़ का कदम सरकार के लिए चौंकाने वाला था. जगदीप धनखड़ ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ विपक्ष के नोटिस स्वीकार किया था. जबकि सरकार लोकसभा में प्रस्ताव लाना चाहती थी. उसके पास सभी दलों के सदस्यों के हस्ताक्षर भी थे. सरकार के कई मंत्री इसी बात से परेशान और नाराज थे. जगदीप धनखड़ के इस कदम से एनडीए सांसदों और मंत्रियों को ऐसा आघात लगा कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के संसद कार्यालय में सांसदों के हस्ताक्षर एकत्र करने के लिए दौड़ लगाई ताकि अगले दिन राज्यसभा में जगदीप धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सके. धनखड़ को मिली थी सीक्रेट सूचना जगदीप धनखड़ को इस बात की भनक लग गई थी कि उपराष्ट्रपति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव साधारण बहुमत से पारित किया जा सकता है और एनडीए के पास आवश्यक संख्या से अधिक है. सूत्रों ने दावा दिया कि सोमवार को राज्यसभा सचिवालय के एक अधिकारी ने जगदीप धनखड़ को संदेश दिया कि या तो तुरंत इस्तीफा दें वरना अगले दिन अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना होगा. ऐसी स्थिति से बचने के लिए ही उसी रात को आनन-फानन में जगदीप धनखड़ राष्ट्रपति भवन पहुंचे. उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा सौंपा. इसके बाद की तस्वीर पूरी दुनिया को पता है. 25 मिनट तक किया इंतजार दरअसल, जगदीप धनखड़ ने अपने इस्तीफे में सेहत का हवाला दिया. उन्होंने कहा कि वह अपनी सेहत को अब प्राथमिकता देना चाहते हैं. मगर कांग्रेस को शुरू से ही दाल में काला नजर आ रहा था. अब तस्वीर साफ हो गई है. सूत्रों का कहना है कि जगदीप धनखड़ को करीब 25 मिनट तक राष्ट्रपति भवन में इंतजार करना पड़ा था. उनके लिए विदाई भाषण का भी आयोजन नहीं किया गया. कांग्रेस ने सरकार से उनके इस्तीफे की वजह की मांग की. मंत्रियों संग अच्छा नहीं था धनखड़ का व्यवहार सूत्रों का कहना है कि जगदीप धनखड़ का केंद्रीय मंत्रियों संग व्यवहार अच्छा नहीं था. अक्सर वह उन लोगों के साथ कठोरता से पेश आते थे. बैठकों के दौरान डांट-डपट देते थे और अपमानित करते थे. इससे सीनियर मंत्री सब नाराज थे. शिवराज सिंह चौहान को तो जगदीप धनखड़ ने सार्वजनिक तौर पर अपमानित किया था. सूत्रों का यह भी कहना है कि जगदीप धनखड़ विपक्ष पर खूब बरसते थे, मगर विपक्ष की ओर से लाए गए महाभियोग वाले प्रस्ताव के बाद उनका विपक्ष के प्रति रवैया थोड़ा बदला था.

चुनाव आयोग सख्त: ‘बेबुनियाद आरोप न लगाएं’, राहुल गांधी को दी चेतावनी

बंगलूरू राहुल गांधी के कर्नाटक चुनाव संबंधी आरोपों पर भारत निर्वाचन आयोग करारा जवाब दिया है। चुनाव आयोग ने कहा कि अगर चुनाव याचिका दायर की गई है तो माननीय उच्च न्यायालय के फैसले का इंतजार करना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हो पा रहा, तो अब बेबुनियाद आरोप क्यों लगा रहे हैं? इससे पहले राहुल गांधी ने गुरुवार को दावा किया कि कांग्रेस के पास इस बात के 100 फीसदी सबूत हैं कि चुनाव आयोग ने कर्नाटक के एक निर्वाचन क्षेत्र में धांधली होने दी। उन्होंने चुनाव आयोग को चेतावनी दी कि वह इससे बच नहीं पाएंगे, क्योंकि हम ऐसा होने देंगे और आपके पीछे आएंगे। इस पर चुनाव आयोग ने जवाब देते हुए कहा कि अगर चुनाव याचिका दायर की गई है, तो माननीय उच्च न्यायालय के फैसले का इंतजार करें। अगर नहीं, तो अब बेबुनियाद आरोप क्यों लगा रहे हैं? 'भारत के चुनाव आयोग की तरह काम नहीं कर रहा ECI' दरअसल, चुनाव परिणाम घोषित होने के 45 दिनों के अंदर फैसले से असंतुष्ट कोई भी व्यक्ति चुनाव याचिका दायर कर सकता है। ऐसी याचिकाएं संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के राज्य के उच्च न्यायालयों में दायर की जा सकती हैं। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग भारत के चुनाव आयोग की तरह काम नहीं कर रहा है। वह अपना काम ही नहीं कर रहा है। '100 प्रतिशत ठोस सबूत' जब राहुल से बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण और राजद नेता तेजस्वी यादव की बिहार विधानसभा चुनावों का बहिष्कार करने के विकल्प वाली टिप्पणी के बारे में पूछा गया उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि उनकी पार्टी के पास कर्नाटक की एक सीट पर चुनाव आयोग की ओर से धोखाधड़ी की अनुमति देने के 100 प्रतिशत ठोस सबूत हैं। विपक्ष क्यों कर रहा SIR का विरोध? कांग्रेस और समाजवादी पार्टी सहित विपक्षी दल मतदाता सूची पुनरीक्षण का विरोध कर रहे हैं। उनका आरोप है कि यह मतदाताओं, खासकर हाशिए पर पड़े समुदायों के लोगों को मताधिकार से वंचित करने का प्रयास है। उनका दावा है कि इस प्रक्रिया का इस्तेमाल मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए किया जा रहा है, जिसका असर आगामी विधानसभा चुनावों के नतीजों पर पड़ सकता है।

नई पीढ़ी के संस्कारों पर सवाल: स्पीकर बिरला ने कांग्रेस सांसद को लिया निशाने पर

नई दिल्ली लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने गुरुवार को सदन में हंगामा करने के लिए कांग्रेस सदस्यों को आड़े-हाथों लिया और कहा कि देश की सबसे पुरानी पार्टी के संस्कार सदन में नारेबाजी करने, तख्तियां लाने और मेजें ठोंकने के लिए नहीं रहे हैं, लेकिन इस दल के मौजूदा सांसदों का आचरण पूरा देश देख रहा है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के सदस्यों ने सदन की कार्यवाही आरंभ होते ही बिहार में जारी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के विषय पर हंगामा किया जिससे कार्यवाही बाधित हुई। बिरला ने कहा, 'आपसे पहले भी कहा गया है कि प्रश्नकाल महत्वपूर्ण समय होता है। इसमें जनता के महत्वपूर्ण सवाल होते हैं और सरकार की जवाबदेही होती है…कई सांसदों ने कहा कि उनका प्रश्नकाल के दौरान मुश्किल से प्रश्न आता है, लेकिन आप लोगों का जिस तरह का व्यवहार होता है, वो संसद की गरिमा के अनुकूल नहीं है।' उन्होंने कांग्रेस का नाम लिए बगैर कहा, 'आप लोग इतने पुराने राजनीतिक दल के संसद सदस्य हो, जिसका इस सदन के अंदर गरिमा और मर्यादा का बहुत बड़ा योगदान रहा है। लेकिन लोग देखेंगे कि आप किस तरह से सदन में व्यवहार करते हैं, तख्तियां लेकर आते हैं और मेजें ठोकते हैं।' लोकसभा अध्यक्ष ने विपक्षी सदस्यों का आह्वान किया कि वे संसद की गरिमा और मर्यादा को बनाए रखें। उनका कहना था, 'यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतंत्र के अंदर हमारी पारदर्शिता और जवाबदेही को दुनिया जानती है। आप इस तरह का आचरण करेंगे तो इसका लोकतांत्रिक संस्थाओं में क्या संदेश जाएगा।' बिरला ने कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल से कहा, 'वेणुगोपाल जी, क्या आप अपने सांसदों को यही सिखाते हो। नारेबाजी करना, तख्तियां लाना, मेज थपथपाना आपकी पार्टी के संस्कार नहीं रहे हैं, लेकिन नई पीढ़ी जिस तरह का संस्कार पेश कर रही है वो पूरा देश देख रहा है।' उन्होंने कहा, 'आप लोग माननीय हैं, लाखों लोगों ने आपको चुनकर भेजा है…तख्तियां लेकर मेजें तोड़ने के लिए नहीं भेजा है।' बिरला ने इस बात पर जोर दिया कि तख्तियां लेकर आने पर सदन नहीं चलेगा। लोकसभा अध्यक्ष ने इस बात का उल्लेख किया कि संसद पर जनता के करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। उन्होंने कहा कि प्रश्नकाल के बाद नियमों के तहत हर मुद्दे पर चर्चा का अवसर दिया जाएगा। हंगामा नहीं थमने पर उन्होंने कार्यवाही अपराह्न दो बजे तक स्थगित कर दी। इससे पहले 21 जुलाई से शुरू हुए मॉनसून सत्र के पहले तीन दिन भी सदन में विपक्ष के हंगामे के कारण कामकाज बाधित रहा।

राजनीतिक समीकरणों के बीच मप्र में नियुक्तियां तेज, ओबीसी आयोग में कुसमारिया-मौसम बिसेन को बड़ी भूमिका

भोपाल  हेमंत खंडेलवाल के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनने के 21 दिन के भीतर ही मध्य प्रदेश में राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर बड़ा निर्णय हुआ है। बुधवार को डॉ. रामकृष्ण कुसमारिया को ओबीसी कल्याण आयोग का अध्यक्ष और मौसम बिसेन को सदस्य बनाने का आदेश जारी हुआ है। इसके साथ ही पार्टी ने राजनीतिक नियुक्तियों की शुरुआत के संकेत दे दिए हैं। मौसम बिसेन पूर्व मंत्री गौरी शंकर बिसेन की बेटी हैं, जो वर्ष 2021 में आयोग के गठन के साथ अगस्त 2023 तक इसके अध्यक्ष रहे। अब उनकी जगह ओबीसी आयोग के अध्यक्ष कुसमारिया को कल्याण बोर्ड का भी अध्यक्ष नियुक्त करने के साथ ही संतुलन की दृष्टि से मौसम को सदस्य बनाया गया है। बालाघाट से टिकट दिया था बता दें कि पार्टी ने मौसम बिसेन को विधानसभा चुनाव में भी बालाघाट से टिकट दिया था। बाद में इसे बदलकर गौरी शंकर बिसेन को लड़ाया था, जिसमें वह हार गए थे। मौसम की नियुक्ति के साथ उन नेताओं में भी निगम, मंडल और आयोग में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य बनने की आस जगी है, जो लंबे समय से प्रतीक्षा में हैं। इसमें विधानसभा चुनाव हार चुके तो कुछ कांग्रेस से आए नेता भी शामिल हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने लोकसभा चुनाव के पहले 13 फरवरी 2024 को 46 निगम, मंडल और आयोगों में नियुक्तियां रद कर दी थीं। सभी नियुक्तियां शिवराज सरकार में हुई थीं। 25 पदों पर 2021 में नियुक्तियां हुई थीं। शैलेन्द्र बरुआ, जितेन्द्र लिटोरिया और आशुतोष तिवारी जैसे भाजपा के संगठन मंत्रियों को भी निगम मंडलों में जगह मिली थी। विधानसभा चुनाव के ठीक पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 14 सामाजिक कल्याण बोर्ड भी बनाए थे। हालांकि, इनकी नियुक्तियां रद नहीं की गई थीं। नए प्रदेश अध्यक्ष की प्रतीक्षा में टलती रहीं नियुक्तियां माना जा रहा था कि लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा का नया प्रदेश अध्यक्ष बनने के साथ ही राजनीतिक नियुक्तियां प्रारंभ होंगी, पर अध्यक्ष का निर्वाचन दो जुलाई 2025 को पूरा हो पाया। अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य नहीं होने से कामकाज भी प्रभावित हो रहा है। नीतिगत निर्णय नहीं हो पा रहे हैं। ऐसे में माना जा रहा है अब चरणबद्ध तरीके सभी निगम मंडल और प्राधिकरणों में नियुक्तियां शीघ्र होंगी। सबसे पहले उन्हें लिया जा सकता है, जिनके लिए दावेदार कम हैं और नियुक्ति में अंदरूनी विरोध होने की संभावना नहीं है। सत्ता-संगठन के सामंजस्य से सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण को देखते हुए नियुक्तियां की जाएंगी। प्रदेश में वर्ष 2028 में विधानसभा चुनाव होने हैं, इस कारण पार्टी का पूरा जोर संतुलन पर रहेगा, जिससे कोई नाराज नहीं होने पाए। अगले चरण में कैबिनेट विस्तार की संभावना राजनीतिक नियुक्तियों के बाद अगली कड़ी में सरकार मंत्रिमंडल में रिक्त तीन पदों को भरने के लिए कैबिनेट का विस्तार भी कर सकती है। कई महीने से विस्तार की अटकलें चल रही हैं।

‘मस्जिद या पार्टी दफ्तर?’— सपा सांसदों की मीटिंग पर BJP ने खड़ा किया सवाल

नई दिल्ली समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव के दिल्ली में संसद भवन के बगल वाली मस्जिद में कथित तौर पर बैठक करने को लेकर बीजेपी ने सवाल उठाए हैं. बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा ने आरोप लगाया कि अखिलेश ने इस मस्जिद को सपा का दफ्तर बना दिया है. जिसपर अब सपा मुखिया ने जवाब दिया है. उन्होंने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा है कि वो लोगों में दूरियां देखना चाहती है, इसीलिए मेरे मस्जिद जाने पर विवाद खड़ा कर रही है. आस्था जोड़ती है…हालांकि, बीजेपी चाहती है कि लोग एकजुट न होकर बंटे रहें. हमारी सभी धर्मों में आस्था है. न्यूज एजेंसी से बात करते हुए अखिलेश यादव ने कहा- मीडिया भी बीजेपी के चक्कर में फंस गई. आस्था जोड़ती है. किसी भी धर्म में कोई भी आस्था हो वो जोड़ती है. बीजेपी को तकलीफ है कि कोई आपस में जुड़े नहीं. बीजेपी लोगों में दूरियां देखना चाहती है. बीजेपी को तकलीफ है तो हम क्या करें. बीजेपी के हथकंडे को लोग जानते हैं. बीजेपी का हथियार ही धर्म है. वहीं, अखिलेश यादव द्वारा कथित तौर पर मस्जिद के अंदर बैठक करने पर समाजवादी पार्टी के सांसद राजीव राय ने कहा- "क्या अब हमें मंदिर और मस्जिद जाने के लिए भाजपा से लाइसेंस लेना होगा…" दरअसल, बीते दिन अखिलेश यादव संसद भवन के बगल की मस्जिद में सपा नेताओं के साथ बैठे थे. जैसे ही उनकी तस्वीर सामने आई, इसको लेकर बीजेपी ने मुद्दा बनाना शुरू कर दिया. बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा ने तस्वीर शेयर करते हुए आरोप लगाया कि अखिलेश ने इस मस्जिद को सपा कार्यालय बना दिया है. बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा ने इसको लेकर कड़ी आपत्ति जताई. साथ ही इसके खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करने का ऐलान भी किया. तस्वीर में आप देख सकते हैं कि कई सपा सांसद मस्जिद के अंदर अखिलेश यादव के साथ मौजूद हैं. इसमें रामपुर के सांसद मोहिबुल्लाह नदवी भी नजर आ रहे हैं. वह इस मस्जिद के इमाम हैं. फिलहाल, बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष जमाल सिद्दकी ने ऐलान किया है कि 25 जुलाई को जुमे की नमाज के बाद इसी मस्जिद में अखिलेश और उनके सांसद द्वारा की गई कथित बैठक का विरोध करेंगे. उधर, इस पूरे मामले में उत्तराखंड वक्फ बोर्ड ने भी विरोध जताया है. बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स ने मस्जिद के अंदर हुई कथित पॉलिटिकल मीटिंग को मुसलमानों की भावनाओं को आहत करने वाला बताया है. उन्होंने अखिलेश से माफी की मांग की है. शादाब शम्स के मुताबिक, मस्जिदें आस्था का केंद्र होती हैं और वहां पर नमाज पढ़ी जाती है, ना कि सियासी बैठक की जाती है.  

कांग्रेस को बड़ा झटका! टैक्स अपील खारिज, अब 199 करोड़ पर लगेगा भारी टैक्स

नई दिल्ली मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को टैक्स विवाद में जोरदार झटका लगा है। इनकम टैक्स अपील ट्रिब्यूनल ने 199 करोड़ रुपये की आय पर टैक्स डिमांड मामले में कांग्रेस की अपील खारिज कर दी है। इसके साथ ही ट्रिब्यूनल ने कहा है कि कांग्रेस को वित्त वर्ष 2017-18 और असेसमेंट ईयर 2018-19 से लंबित 199 करोड़ रुपये की आय पर टैक्स डिमांड में कोई राहत नहीं मिलेगी। आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) ने आयकर रिटर्न देर से दाखिल करने और नकद दान सीमा के उल्लंघन के कारण पार्टी के छूट के दावे को खारिज कर दिया है। अपने फैसले में ट्रिब्यूनल ने कहा, "करदाता द्वारा 02.02.2019 को दाखिल किया गया रिटर्न, उसे विवादित छूट के लिए पात्र नहीं बनाता है क्योंकि यह दावा नियत तिथि के भीतर नहीं किया गया है।" नियत तिथि ते बाद दाखिल किया गया रिटर्न बता दें कि कांग्रेस ने 2 फरवरी, 2019 को अपना आयकर रिटर्न दाखिल किया था, जो 31 दिसंबर, 2018 की नियत तारीख से काफी विलंब था। इस रिटर्न में कांग्रेस की तरफ से शून्य आय घोषित की गई थी और उसमें 199.15 करोड़ रुपये की आय पर कर छूट का दावा किया गया था लेकिन सितंबर 2019 में, कर निर्धारण अधिकारी को जाँच के दौरान पता चला कि पार्टी ने 14.49 लाख रुपये नकद दान स्वीकार किए थे – जिनमें से कई दान कानून के तहत प्रति दानदाता 2,000 रुपये की सीमा से अधिक थे। आयकर आयुक्त (अपील) ने पहले खारिज की थी अपील 2000 रुपये से अधिक का दान नियमानुसार चेक या बैंक हस्तांतरण जैसे बैंकिंग माध्यमों से दिया जाना है। तदनुसार पूरी राशि पर कर लगाया गया। जब कांग्रेस ने छूट मांगी, तो आयकर विभाग ने 2021 में उसके दावे को अस्वीकार कर दिया। मार्च 2023 में, आयकर आयुक्त (अपील) ने इस फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद कांग्रेस ने इस फैसले के खिलाफ पिछले साल ट्रिब्यूनल में अपील की थी। अब वहां से भी कांग्रेस को निराशा हाथ लगी है।  

‘सभी के लिए अनिवार्य हेल्थ चेकअप हो कानूनी अधिकार’ – राघव चड्ढा की संसद में मांग

नई दिल्ली  आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने सरकार से मांग की है कि प्रत्येक नागरिक को हर साल स्वास्थ्य जांच का कानूनी अधिकार दिया जाए। राज्यसभा के मानसून सत्र में राघव चड्ढा ने कहा कि कोविड-19 महामारी के बाद देश में हार्ट अटैक और अन्य बीमारियों के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, ''मैंने संसद में यह मांग रखी कि हर नागरिक को हर साल हेल्थ चेकअप कराने का कानूनी अधिकार मिलना चाहिए।'' ''कोविड के बाद दिल की बीमारियां और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं बहुत बढ़ गई हैं। अगर बीमारियों का समय रहते पता चल जाए, तो कई लोगों की जान बचाई जा सकती है।'' उन्होंने कहा कि कई विकसित देश अपने नागरिकों को हर साल मुफ्त हेल्थ चेकअप की सुविधा देते हैं, जिसका खर्च सरकार उठाती है। फिर भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? राघव चड्ढा ने कहा, ''इलाज और स्वास्थ्य सेवाएं सिर्फ अमीरों के लिए नहीं होनी चाहिए। सभी लोगों को नियमित जांच की सुविधा मिलनी चाहिए, चाहे वे गरीब हों या अमीर।'' उन्होंने एक नारा दिया—''जांच है तो जान है।'' उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय पर आई है, जब हाल ही में कई युवा और स्वस्थ दिखने वाले लोगों में भी अचानक दिल का दौरा, स्ट्रोक और अन्य गंभीर बीमारियां देखी गई हैं। हर साल होने वाली 70 प्रतिशत से ज्यादा मौतें दिल से जुड़ी बीमारी, कैंसर, डायबिटीज, ब्लड प्रेशर और फेफड़ों की बीमारी आदि जैसी गैर-संचारी बीमारियों के कारण होती हैं। अगर इन बीमारियों की नियमित जांच हो, तो देश की स्वास्थ्य समस्याओं को काफी हद तक रोका जा सकता है। सरकार ने इस साल की शुरुआत में एक राष्ट्रव्यापी एनसीडी जांच अभियान शुरू किया था, जिसका उद्देश्य डायबिटीज और ब्लड प्रेशर के साथ-साथ ओरल, ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर जैसे गैर-संचारी रोगों के उपचार के लिए 30 साल और उससे ज्यादा की उम्र के सभी लोगों की जांच करना है। यह जांच अभियान आयुष्मान आरोग्य मंदिर और अन्य स्वास्थ्य केंद्रों पर चलाया गया और इसने अपने 89.7 प्रतिशत लक्ष्य को पूरा भी किया।