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हरियाणा ने रचा रक्तदान का नया रिकॉर्ड, 92% हुआ स्वैच्छिक रक्तदान; 163 ब्लड सेंटर सक्रिय

चंडीगढ़ रक्तदान में हरियाणवी सबसे आगे हैं। प्रति दस लाख आबादी पर रक्तदान के मामले में हरियाणा लगातार तीसरे साल देश में प्रथम स्थान पर आया है। केंद्र सरकार की ओर से हरियाणा को आगामी एक अक्टूबर को नई दिल्ली स्थित लेडी हार्डिंग मेडिकल काालेज में आयोजित राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस कार्यक्रम में सम्मानित किया जाएगा। ई-रक्तकोष पोर्टल पर दर्ज सत्यापित वार्षिक रक्तदान आंकड़ों के आधार पर मिली उपलब्धि प्रदेश की बड़े पैमाने पर जनभागीदारी के साथ-साथ मजबूत रक्त आधान बुनियादी ढांचे, डिजिटल एकीकरण, बेहतर चिकित्सकीय सुरक्षा और मरीजों को मुफ्त जीवनरक्षक सहायता उपलब्ध कराने की बढ़ती क्षमता को दर्शाती है। वर्ष 2025-26 में प्रदेश में 5.89 लाख यूनिट रक्त एकत्र किया गया और 8,189 रक्तदान शिविर आयोजित किए गए। इससे पहले प्रदेश को वर्ष 2024 और 2025 में भी राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्राप्त हुआ था। ब्लड सेंटरों की संख्या 146 से बढ़कर 163 स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव डा. सुमिता मिश्रा ने बताया कि चरखी दादरी जिला नागरिक अस्पताल में ब्लड सेंटर को लाइसेंस मिलने के साथ अब प्रदेश के 22 जिलों में कम से कम एक कार्यशील लाइसेंस प्राप्त सरकारी ब्लड सेंटर उपलब्ध हो गया है। ब्लड सेंटरों की संख्या 146 से बढ़कर 163 हो गई है। वर्तमान में यहां 34 सरकारी और 129 निजी ब्लड सेंटर हैं, जबकि 150 ब्लड सेंटर (92 प्रतिशत) ब्लड कंपोनेंट सेपरेशन की सुविधा से लैस हैं। इससे मरीजों के लिए विशेष रक्त अवयवों की उपलब्धता मजबूत हुई है। राज्य में स्वैच्छिक रक्तदान की दर 79 प्रतिशत से बढ़कर 92 प्रतिशत हो गई है। यह उपलब्धि ब्लड सेंटरों के साथ सीधे आनलाइन समीक्षा और संचालन संबंधी समस्याओं के समन्वित समाधान के बाद हासिल हुई है। इस प्रगति से हरियाणा 95 प्रतिशत के राष्ट्रीय मानक के और करीब पहुंच गया है। यह जीवनरक्षक अभियान में बढ़ती जनभागीदारी और यह सुनिश्चित करने के राज्य के निरंतर प्रयासों को दर्शाता है कि स्वैच्छिक, बिना पारिश्रमिक वाले रक्तदान पर अधिक निर्भरता हो। 89 ब्लड सेंटर आभा सिस्टम से एकीकृत हरियाणा ने अपनी रक्त आधान सेवाओं को डिजिटल स्वास्थ्य प्रणालियों के साथ एकीकृत करने में भी महत्वपूर्ण प्रगति की है। नए आभा-आधारित डोनर रजिस्ट्रेशन फीचर की शुरुआत के बाद दो महीने के भीतर 89 ब्लड सेंटर आभा सिस्टम से एकीकृत हो गए हैं। यह सुविधा राष्ट्रीय ई-रक्तकोष पोर्टल पर शुरू की गई है। इस समय 134 ब्लड सेंटर ई-रक्तकोष प्लेटफार्म पर लाइव जानकारी सक्रिय रूप से अपडेट कर रहे हैं, जिससे पारदर्शिता मजबूत हो रही है, रियल-टाइम निगरानी में सुधार हो रहा है और रक्त की उपलब्धता तथा सेवाओं के प्रदर्शन की बेहतर जानकारी मिल रही है। रक्त की कम बर्बादी हरियाणा ने महत्वपूर्ण चिकित्सकीय सुरक्षा संकेतकों पर भी बेहतर प्रदर्शन दर्ज किया है। कुल 1305 हाई-रिस्क रिएक्टिव डोनर्स में से 1255 यानी 96.17 प्रतिशत को सफलतापूर्वक ट्रैक किया गया और उपयुक्त स्वास्थ्य कार्यक्रमों से जोड़ा गया, जो 85 प्रतिशत के मानक से अधिक है। रक्त की बर्बादी भी नियंत्रण में रही है। डिस्कार्ड दर 2.69 प्रतिशत दर्ज की गई, जो चार प्रतिशत के मानक से कम है। सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीजों को रक्त और रक्त अवयव मुफ्त उपलब्ध कराए जाते हैं। सरकारी संस्थानों में पात्र बीपीएल और डेंगू मरीजों को फ्री सिंगल डोनर प्लेटलेट्स भी उपलब्ध कराए जाते हैं। थैलेसीमिया, हीमोफीलिया और सिकल सेल एनीमिया जैसे विकारों से पीड़ित उन मरीजों को भी सहायता प्रदान करता है, जिन्हें बार-बार और आजीवन उपचार की आवश्यकता होती है। वर्तमान में जिला नागरिक अस्पतालों में 1443 थैलेसीमिया मरीज और 1018 हीमोफीलिया मरीज पंजीकृत हैं। इन्हें मुफ्त आयरन केलेशन दवाएं और एंटी-हीमोफीलिया फैक्टर्स उपलब्ध कराए जा रहे हैं। एक दिन में 10 हजार 183 लोगों ने किया रक्तदान बड़े पैमाने पर जनसक्रियता ने हरियाणा की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पिछले साल पांच मई को प्रदेशभर में आयोजित रक्तदान अभियान के दौरान एक ही दिन में 10 हजार 183 नागरिकों ने रक्तदान किया। आसपरेशन सिंदूर के दौरान युवाओं ने 51 रक्तदान शिविरों के माध्यम से 2374 यूनिट रक्त एकत्र किया।  

झारखंड के 7 जिलों में आधे से ज्यादा छोटे प्रतिष्ठान, गिरिडीह सबसे आगे; पाकुड़ में महिला उद्यमिता मजबूत

रांची  अनिगमित (अनइनकॉरपोरेटेड) गैर कृषि क्षेत्र राज्य भर में रोजगार, आजीविका तथा आर्थिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण योगदान देता है। झारखंड में गिरिडीह जिला ऐसा है, जहां राज्य में सबसे अधिक अनिगमित गैर कृषि क्षेत्र के प्रतिष्ठान कार्यरत हैं। यहां के इन प्रतिष्ठानों से 3.20 लाख कामगार जुड़े हैं। राज्य के कुल अनिगमित प्रतिष्ठानों में 10.70 प्रतिशत प्रतिष्ठान इस जिला में हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन द्वारा पहली बार अनिगमित गैर कृषि क्षेत्र पर किए गए जिला स्तरीय आकलन में यह तथ्य सामने आया है। गुरुवार को जारी रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि राज्य के टॉप सात जिले ऐसे हैं, जहां राज्य के 50 प्रतिशत से अधिक ऐसे छोटे प्रतिष्ठान कार्यरत हैं। वहीं, 10 टॉप जिलों में 65 प्रतिशत से अधिक प्रतिष्ठान कार्य कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड में पाकुड़ जिला ऐसा है, जहां सबसे अधिक प्रतिष्ठान महिलाओं के नेतृत्व में संचालित हैं। इतना ही नहीं, यहां सबसे अधिक महिला कामगार भी कार्यरत हैं। पिछड़ा जिला होने के बाद भी अधिक प्रतिष्ठानों में यह राज्य में सातवें स्थान पर है। दूसरी तरफ, रामगढ़ जिले के प्रतिष्ठानों में सबसे अधिक वैसे कामगार कार्यरत हैं, जो किसी न किसी एजेंसी से हायर किए गए हैं। रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई है कि आधे से अधिक प्रतिष्ठान सात जिलों में केंद्रित हैं। रिपोर्ट में महिला उद्यमिता और कार्यबल में उनकी भागीदारी में महत्वपूर्ण क्षेत्रीय भिन्नताओं पर प्रकाश डाला गया है। कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी जिलों के अनुसार काफी भिन्न-भिन्न है। महिला श्रमिकों की सबसे अधिक हिस्सेदारी वाले शीर्ष तीन जिले पाकुड़, साहिबगंज और पश्चिमी सिंहभूम में स्थित हैं। झारखंड के टॉप टेन जिले जहां अधिक अनिगमित प्रतिष्ठान हैं-     गिरिडीह : 2,26,339     धनबाद : 2,18,121     बोकारो : 1,52,123     पलामू : 1,35,295     रांची : 1,29,972     पूर्वी सिंहभूम : 1,14,650     पाकुड़ : 1,10,144     हजारीबाग : 1,06,857     देवघर : 97,763     गढ़वा : 91,553 महिला नेतृत्व वाले सबसे अधिक प्रतिष्ठान वाले टाप तीन जिले (आंकड़े प्रतिशत में)     पाकुड़ : 56.26     साहिबगंज : 41.70     गढ़वा : 37.20 अधिक महिला कामगार वाले प्रतिष्ठान में टाप तीन जिले (आंकड़े प्रतिशत में)     पाकुड़ : 55.30     साहिबगंज : 43.35     पश्चिमी सिंहभूम : 38.35  

घर बैठे मिल रही सरकारी सेवाएं: बिहार के RTPS पोर्टल पर 39 लाख से अधिक आवेदनों का हुआ निष्पादन

पटना  बिहार में आरटीपीएस यानी लोक सेवाओं का अधिकार पोर्टल सरकारी सेवाओं को आम लोगों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा रहा है। जाति, आय और निवास प्रमाणपत्र के साथ जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र जैसी जरूरी सेवाओं के लिए लोगों को अब कार्यालयों के चक्कर लगाने की जरूरत कम हुई है। पंचायती राज विभाग के अनुसार, अक्टूबर 2024 से सितंबर 2026 के बीच सिर्फ पंचायत स्तर पर आरटीपीएस पोर्टल के जरिए 39 लाख 78 हजार से अधिक आवेदन प्राप्त हुए। इनमें से 39 लाख 32 हजार से अधिक आवेदनों का सफलतापूर्वक निष्पादन किया जा चुका है। 39 लाख से ज्यादा आवेदनों का निपटारा, डिजिटल व्यवस्था ने पकड़ी रफ्तार आंकड़ों के मुताबिक बड़ी संख्या में आवेदनों का समय पर निपटारा किया गया है। इससे पंचायत स्तर पर सरकारी सेवाओं की ऑनलाइन उपलब्धता और डिजिटल व्यवस्था की पहुंच का अंदाजा लगाया जा सकता है। आरटीपीएस पोर्टल के जरिए नागरिक महत्वपूर्ण प्रमाणपत्रों के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। आवेदन करने के बाद उसकी स्थिति भी ऑनलाइन ट्रैक की जा सकती है और उपलब्ध होने पर प्रमाणपत्र डाउनलोड किया जा सकता है। निपटारे में मधुबनी सबसे आगे, 3.22 लाख से ज्यादा आवेदन हुए निष्पादित आवेदनों के निष्पादन के मामले में मधुबनी की पंचायतें पूरे बिहार में अव्वल रही हैं। जिले की 386 पंचायतों में दो वर्षों के दौरान 3 लाख 24 हजार से अधिक आवेदन प्राप्त हुए इनमें से 3 लाख 22 हजार से अधिक आवेदनों का निपटारा किया जा चुका है। इस प्रदर्शन के साथ मधुबनी पंचायत स्तर पर आरटीपीएस आवेदनों के निष्पादन में राज्य में सबसे आगे है। सिवान दूसरे नंबर पर, करीब 3 लाख आवेदनों का हुआ निपटारा टॉप-5 जिलों की सूची में सिवान दूसरे स्थान पर है। यहां की पंचायतों में दो वर्षों के दौरान 2 लाख 97 हजार से अधिक आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें से 2 लाख 95 हजार से अधिक का निष्पादन किया जा चुका है। वहीं सीतामढ़ी तीसरे स्थान पर है। जिले में 1 लाख 99 हजार से अधिक आवेदन आए, जिनमें से 1 लाख 97 हजार से ज्यादा आवेदन निपटाए जा चुके हैं। सारण और पश्चिम चंपारण भी टॉप-5 में, जानिए कितना हुआ काम आरटीपीएस आवेदनों के निपटारे के मामले में सारण चौथे स्थान पर है। यहां करीब 1 लाख 87 हजार आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें से 1 लाख 84 हजार का निपटारा किया जा चुका है। वहीं पश्चिम चंपारण पांचवें स्थान पर है। जिले में करीब 1 लाख 53 हजार आवेदन आए और इनमें से 1 लाख 52 हजार आवेदनों का निष्पादन हो चुका है। RTPS पोर्टल पर 64 सेवाएं, घर बैठे ट्रैक कर सकते हैं आवेदन आरटीपीएस पोर्टल पर नागरिकों के लिए कुल 64 प्रकार की सेवाएं उपलब्ध हैं। इनमें जाति प्रमाणपत्र, आय प्रमाणपत्र, निवास प्रमाणपत्र और जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र जैसी महत्वपूर्ण सेवाएं शामिल हैं। ऑनलाइन आवेदन के बाद आवेदक अपने लॉग-इन के माध्यम से आवेदन की स्थिति ट्रैक कर सकते हैं। प्रमाणपत्र तैयार होने के बाद उसे ऑनलाइन डाउनलोड करने की सुविधा भी उपलब्ध है। सरकारी सेवाओं में पारदर्शिता बढ़ी, दफ्तरों के चक्कर से राहत आरटीपीएस की ऑनलाइन व्यवस्था का उद्देश्य सरकारी सेवाओं को अधिक सुगम, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से नागरिकों तक पहुंचाना है। पंचायत स्तर पर लाखों आवेदनों का ऑनलाइन निष्पादन इस डिजिटल व्यवस्था की बढ़ती पहुंच को दर्शाता है।  

जमीन-जायदाद के मामलों में बड़ा बदलाव, धारा 116 पोर्टल से ऑनलाइन होगा भूमि बंटवारा

लखनऊ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर जमीन, नामांतरण (म्यूटेशन या दाखिल-खारिज ), पैमाइश, बंटवारे और अन्य राजस्व मामलों का निस्तारण तय समय पर होगा। राजस्व परिषद डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए आवेदन से लेकर निस्तारण तक की प्रक्रिया को ट्रैक करने की व्यवस्था की है। योगी सरकार ने शुक्रवार को धारा 116 पोर्टल, ईडब्ल्यूएस पोर्टल और सरलीकृत खतौनी का शुभारंभ किया है। इस अवसर पर ट्रेनी पीसीएस अधिकारी भी मौजूद रहे। राजस्व परिषद की अध्यक्ष अर्चना अग्रवाल ने बताया कि तीन नए पोर्टल से लोगों को राजस्व से जुड़ी सेवाओं के लिए अनावश्यक भागदौड़ और कागजी प्रक्रिया से राहत मिलेगी। भूमि संबंधी मामलों में पारदर्शिता बढ़ाने, अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और प्रकरणों का समयबद्ध निस्तारण करने पर जोर दिया गया है। उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 116 के तहत भूमि विभाजन से जुड़े मामलों के लिए नया पोर्टल शुरू किया गया है। अब सह-खातेदार भूमि बंटवारे के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगे। इससे लोगों को विभाजन का वाद दाखिल करने के लिए बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने की जरूरत कम होगी। आवेदन के बाद नोटिस और उद्घोषणा की प्रक्रिया भी डिजिटल होगी। लेखपाल की रिपोर्ट भी पोर्टल पर उपलब्ध होगी। पोर्टल में जीआईएस टेक्नोलॉजी की सुविधा जोड़ी गई है। इससे भूमि की वास्तविक भौगोलिक स्थिति देख सकेंगे। धारा 116 के तहत सह-खातेदार द्वारा होल्डिंग के विभाजन का वाद किया जा सकता है। ऐसे मामलों में खतौनी, संबंधित अभिलेख और भूमि के नक्शे की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मामलों के निस्तारण में तेजी आने की उम्मीद नया डिजिटल सिस्टम इन सभी प्रक्रियाओं को तकनीक के माध्यम से अधिक सरल और पारदर्शी बनाने में मदद करेगा। इससे भूमि विभाजन से जुड़े मामलों के निस्तारण में तेजी आने की उम्मीद है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) प्रमाण पत्र के लिए ईडब्ल्यूएस पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगे। लेखपाल और तहसीलदार रिपोर्ट ऑनलाइन भेजेंगे। आवेदन किस स्तर पर है और उसकी प्रगति क्या है, इसकी जानकारी डिजिटल माध्यम से दर्ज और मॉनिटर की जा सकेगी। लोगों को अधिक स्पष्ट जानकारी मिल सकेगी सरलीकृत खतौनी में भूमि का क्षेत्रफल छह दशमलव स्थानों तक प्रदर्शित किया जाएगा। इससे जमीन के क्षेत्रफल की जानकारी अधिक सटीक तरीके से उपलब्ध होगी। विशेष रूप से छोटे भूखंडों और भूमि से जुड़े मामलों में इससे लोगों को अधिक स्पष्ट जानकारी मिल सकेगी। इसके अलावा खतौनी में अभिलेखागार से संबंधित पुराने आदेशों और पुराने बंधक आदेशों की जानकारी भी व्यवस्थित रूप से उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। इससे नागरिकों और राजस्व अधिकारियों को जमीन के पुराने स्वामित्व रिकॉर्ड और उससे जुड़े आदेशों को समझने में सुविधा होगी।  

कानपुर के घाटमपुर में बनेगा टेक्सटाइल मशीनरी पार्क, हजारों रोजगार के अवसर मिलने की उम्मीद

 लखनऊ  खादी एवं वस्त्र उद्योग विभाग ने कानपुर के घाटमपुर में एक हजार एकड़ भूमि पर टेक्सटाइल मशीनरी पार्क की स्थापना की तैयारी शुरू कर दी है। इस संदर्भ में विभाग की तरफ से जल्द ही सरकार को प्रस्ताव भेजा जाएगा। घाटमपुर में गन्ना विभाग की एक हजार एकड़ भूमि बेकार पड़ी है। वस्त्र उद्योग विभाग की कोशिश है कि इस भूमि पर टेक्सटाइल उद्योग के लिए मशीनों का निर्माण करने वाली इकाईयों की ही स्थापना की जाए। राज्य में टेक्सटाइल उद्योग को बढ़ावा देने के लिए लखनऊ में एक हजार एकड़ भूमि पर पीएम मित्र वस्त्र पार्क सहित संत कबीर के नाम पर विभिन्न जिलों में 10 वस्त्र पार्कों की स्थापना की जा रही है। इन पार्कों की स्थापना के बाद राज्य के टेक्सटाइल एवं परिधान उद्योग की तस्वीर बदल जाएगी। टेक्निकल टेक्सटाइल की मशीनों को किया जाएगा आयात राज्य में टेक्सटाइल उद्योग सैकड़ों वर्ष पुराना है, लेकिन आज भी कई इकाइयों में पारंपरिक मशीनों से ही टेक्सटाइल उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। हालांकि बड़ी इकाइयों में टेक्सटाइल उत्पादों को तैयार करने के लिए चीन, ताइवान, जर्मनी, वियतनाम व दक्षिण कोरिया से सर्कुलर निटिंग मशीन, फ्लैट निटिंग मशीन सहित टेक्निकल टेक्सटाइल की मशीनों का आयात किया जाता है। कानपुर में टेक्सटाइल मशीनरी उद्योग की स्थापना के बाद उद्योगपतियों को करीब 30 से 40 प्रतिशत तक की कम कीमत पर मशीनें उपलब्ध होंगी। इस पार्क का उद्देश्य टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना है। इससे आयातित मशीनों का निर्माण स्थानीय स्तर पर किया जाएगा। साथ ही स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। वित्तीय वर्ष 2025-26 में वस्त्र, परिधान व हस्तशिल्प का कुल निर्यात लगभग 35 हजार करोड़ रुपये का था। उत्तर प्रदेश देश में टेक्सटाइल उत्पादों का चौथा बड़ा निर्यातक राज्य है। गौतम बुद्ध नगर वस्त्र निर्यात में देश में दूसरे स्थान पर है। वस्त्र उद्योग मंत्री राकेश सचान का कहना है कि सरकार राज्य में टेक्सटाइल को हर प्रकार से बढ़ावा दे रही है।इसी सिलसिले में कानपुर में इस पार्क की स्थापना के प्रयास किए जा रहे हैं।  

हरियाणा के शहरों को मिलेगी ट्रैफिक से राहत: हिसार, कुरुक्षेत्र, जींद समेत 5 बाईपास को मंजूरी

चंडीगढ़  हरियाणा में एक लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहरों एवं कस्बों के बाहर रिंग रोड और नेशनल हाईवे बनाए जाएंगे। हिसार बाईपास, कुरुक्षेत्र बाईपास, नारनौल सिटी बाईपास, जींद बाईपास तथा सोहना-पलवल बाईपास के निर्माण कार्य को मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने स्वीकृति दे दी है। राष्ट्रीय राजमार्ग से शहरी क्षेत्र में भीड़भाड कम करने के लिए शनिवार को मास्टर प्लान के तहत एडाप्शन आफ फाइनेंशियल माडल फार स्टेट कंट्रीब्यूशन को लेकर आयोजित बैठक में यह निर्णय लिए गए। लोक निर्माण मंत्री रणबीर गंगवा के साथ अधिकारियों की बैठक ले रहे मुख्यमंत्री ने बताया कि हिसार बाईपास हिसार-राजगढ रोड एनएच 52 से हिसार देहली रोड तथा हिसार कैथल रोड से जोड़ने का कार्य करेगा। केंद्र सरकार के अनुसार तैयार होगी पॉलिसी इसी प्रकार कुरुक्षेत्र लाडवा बाईपास की भी डीपीआर तैयार कर ली गई है। जल्द ही इस परियोजना पर भी कार्य आरंभ किया जाएगा। मास्टर प्लान के तहत बाह्य रिंग रोड़ एवं नेशनल हाईवे बनाने के लिए केंद्र सरकार के अनुसार पालिसी तैयार की जाएगी, ताकि शहरों एवं कस्बों में ट्रैफिक के दबाव कम करने के लिए बनाई जाने वाली सड़कों को अमलीजामा पहनाया जा सके। बैठक में केंद्र सरकार के लागत शेयर के लिए वित्त विभाग, लोक निर्माण विभाग तथा शहरी स्थानीय निकाय के अधिकारियों की तीन सदस्यीय कमेटी का गठन भी किया गया। नारनौल सिटी बाईपास बनाया जाएगा। लगभग 11 किलोमीटर लंबे इस बाईपास को स्टेट हाईवे एनएच 148बी से जोड़ा जाएगा। 9700 करोड़ रुपये की लागत आएगी जींद के दूसरी तरफ बाह्य रिंग रोड एवं बाईपास एनएच 352 चार मार्गीय सड़क का निर्माण किया जाएगा। एनएच 919 से पलवल सोहना बाइपास को भी री-डिजाइन कर निर्माण किया जाएगा। यह चार मार्गीय सड़क मार्ग लगभग 24 किलोमीटर लंबा होगा। इन परियोजनाओं पर लगभग 9700 करोड़ रुपये की लागत आएगी। डीएनडी-फरीदाबाद-बल्लभगढ बाईपास केएमपी लिंक से देहली मुंबई एक्सप्रेस वे ग्रीनफिल्ड कनेक्टिविटी जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट से जोड़ने के लिए भी तैयार किया जाएगा। इसके अलावा करनाल रिंग रोड के लिए भी भूमि शेयर जमा करवा दिया गया है। अंबाला शहर एवं अंबाला कैंट को जोड़ने के लिए रिंग रोड का कार्य निर्माणाधीन है, जिसे जल्द पूरा कर लिया जाएगा। अतिरिक्त कार्य को भी मंजूरी बैठक में रेवाड़ी भटिंडा रेलवे लाइन पर सिरसा में सिविल स्टेशन रोड पर रेलवे अंडर ब्रिज के निर्माण तथा कनीना-महेंद्रगढ़ रोड से अनावास, ढाणी राजावास स्कूल से बलाना, खातोद से बुडीन, निम्भेड़ा और बलैचा के लिए लिंक रोड, महेंद्रगढ़ बुचौली रोड, नांगवास से अटेली सड़क के अतिरिक्त कार्य को भी मंजूरी प्रदान की गई।  

राजस्थान में किडनी मरीजों को बड़ी राहत, मुफ्त डायलिसिस योजना के तहत पूरे हुए 1.17 लाख से अधिक सेशन

जयपुर  मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा एवं चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री गजेन्द्र सिंह खींवसर के निर्देशन में प्रदेश में किडनी रोगियों को आसानी से और निःशुल्क डायलिसिस सुविधा उपलब्ध कराने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। प्रदेश में अब तक 16,003 मरीजों को कुल 1,17,258 डायलिसिस सेशन की निःशुल्क सुविधा उपलब्ध कराई गई है। इन सेवाओं के तहत मरीजों को उपलब्ध कराई गई उपचार सुविधा का कुल अनुमानित मूल्य करीब 21.11 करोड़ रुपए है। प्रधानमंत्री नेशनल डायलिसिस कार्यक्रम के तहत प्रदेश के 35 जिला चिकित्सालयों में 149 डायलिसिस मशीनें संचालित हैं। प्रमुख शासन सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य गायत्री राठौड़ ने कहा कि वित्तीय वर्ष 2026-27 में अप्रैल से अगस्त 2026 तक प्रदेश में 4,265 मरीजों को 31,675 डायलिसिस सेशन की निःशुल्क सुविधा दी जा चुकी है। इनमें प्रधानमंत्री नेशनल डायलिसिस कार्यक्रम के तहत 35 केंद्रों पर 3,489 मरीजों के 25,860 सेशन तथा बजट घोषणा के तहत चिन्हित चिकित्सा संस्थानों में 776 मरीजों के 5,815 सेशन शामिल हैं। उन्होंने बताया कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में 11,738 मरीजों को 85,583 डायलिसिस सेशन की निःशुल्क सुविधा उपलब्ध कराई गई। इनमें प्रधानमंत्री नेशनल डायलिसिस कार्यक्रम के 35 केंद्रों पर 8,507 मरीजों के 65,148 सेशन तथा बजट घोषणा के तहत चिन्हित चिकित्सा संस्थानों में 3,198 मरीजों के 19,187 सेशन शामिल हैं। राठौड़ ने कहा कि राज्य बजट घोषणा वर्ष 2022-23 की अनुपालना में प्रदेश के 182 चिकित्सा संस्थानों में हीमोडायलिसिस सुविधा उपलब्ध कराने की दिशा में काम किया जा रहा है। इनमें से 102 चिकित्सा संस्थानों में सुविधा उपलब्ध है। शेष संस्थानों में चिकित्सकों एवं कार्मिकों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है तथा 30 सितम्बर 2026 तक सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। प्रमुख शासन सचिव ने बताया कि सरकारी व्यवस्था के साथ सीएसआर के माध्यम से भी निःशुल्क डायलिसिस सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। जिला चिकित्सालय नदबई (भरतपुर) एवं उपजिला चिकित्सालय सिवाना (बालोतरा) में हंस फाउंडेशन, गुरुग्राम के सहयोग से यह सुविधा संचालित है। सिवाना में 3 मशीनों के माध्यम से 12 मरीजों के 575 सेशन तथा नदबई में 3 मशीनों के माध्यम से 21 मरीजों के 673 सेशन आयोजित किए गए हैं। राठौड़ ने कहा कि सरकार का प्रयास है कि डायलिसिस की जरूरत वाले मरीजों को उपचार के लिए दूर नहीं जाना पड़े। इसी उद्देश्य से जिला चिकित्सालयों के साथ अन्य चिकित्सा संस्थानों में भी डायलिसिस सेवाओं का विस्तार किया जा रहा है। भविष्य में सीएचसी स्तर तक डायलिसिस सेवाओं की पहुंच बढ़ाने पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि डायलिसिस किडनी रोगियों के लिए नियमित और जीवनरक्षक उपचार है। इसलिए स्वास्थ्य विभाग का प्रयास है कि जरूरतमंद मरीजों को समय पर, उनके नजदीक ही पूरी तरह निःशुल्क डायलिसिस सुविधा मिले। सरकारी व्यवस्था के साथ निजी जनसहभागिता और सीएसआर के सहयोग से इन सेवाओं को लगातार और मजबूत किया जा रहा है।

Delhi Teachers Transfer Policy: शिक्षकों के तबादले को लेकर नई नीति लाएगी सरकार, जल्द हो सकती है घोषणा

नई दिल्ली दिल्ली की रेखा गुप्ता सरकार 17 सितंबर से शुरू होने वाले 'सेवा पखवाड़े' के दौरान सरकारी स्कूलों के टीचर्स के नई ट्रांसफर पॉलिसी की घोषणा कर सकती है। सरकार इसके लिए एक अलग पोर्टल भी बना सकती है, जिसमें पॉइंट्स-बेस्ड सिस्टम को शामिल किया जा सकता है। अधिकारियों ने शुक्रवार को इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि सरकार की योजना इस प्रस्तावित पॉलिसी के जरिये सरकारी स्कूलों में टीचर्स के ट्रांसफर की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और टेक्नोलॉजी पर आधारित बनाना है। एचटी की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में टीचर्स के लिए पहले से ही ट्रांसफर पॉलिसी मौजूद है, लेकिन इसे सही ढंग से और पूरी तरह लागू नहीं किया गया है। हालांकि, ऐसा माना जा रहा है कि नई पॉलिसी के जरिये पूरे प्रोसेस को एक सेंट्रलाइज्ड ऑनलाइन प्लैटफॉर्म बनाकर इन खामियों को दूर किया जाएगा। टीचर्स को मिलेगी यूनिक आईडी प्रस्तावित पॉलिसी में सभी टीचर्स को एक यूनिक आईडी देने पर विचार किया जा सकता है, जिसके जरिये उनके सर्विस रिकॉर्ड, पोस्टिंग हिस्ट्री, टेन्योर और दूसरी जरूरी जानकारियां एक सेंट्रल डेटाबेस में रखी जा सकेंगी। अधिकारियों ने बताया कि टीचर अपनी जानकारी देख सकेंगे और जब ट्रांसफर विंडो खुलेगी तो पोर्टल के जरिये इस प्रक्रिया में हिस्सा ले सकेंगे। एक अधिकारी ने कहा कि अभी ट्रांसफर का ऑनलाइन प्रोसेस शिक्षा निदेशालय के पोर्टल के जरिये किया जाता है, लेकिन नई पॉलिसी को लागू करने के लिए सरकार एक अलग पोर्टल बनाया सकता है। ट्रांसफर में इन बातों का रखा जाएगा ध्यान इस प्रस्तावित पॉलिसी की एक मुख्य विशेषता पॉइंट्स-बेस्ड सिस्टम होने की उम्मीद है। अधिकारी ने बताया कि टीचर्स को अलग-अलग कैटेगरी में पॉइंट्स दिए जाएंगे और उनके कुल स्कोर के आधार पर और खाली जगहों के हिसाब से ट्रांसफर की प्राथमिकता तय होगी।इसमें सर्विस की अवधि, मौजूदा स्कूल में कार्यकाल और व्यक्तिगत या पारिवारिक परिस्थितियों जैसी बातों को भी ध्यान में रखा जाएगा। दिल्ली ने टीचर्स ट्रांसफर पॉलिसी बनाते समय हरियाणा के ऑनलाइन ट्रांसफर मॉडल के कुछ पहलुओं का भी ध्यान रखा है। हरियाणा में उम्र के हिसाब से पॉइंट और महिला कर्मचारियों के लिए अलग से प्रावधान शामिल हैं। अधिकारियों ने कहा कि दिल्ली सरकार हरियाणा के ट्रांसफर फॉर्मूले को हूबहू अपनाने के बजाय इस सिस्टम के कुछ हिस्सों को अपना सकती है। दिल्ली का सिस्टम उन टीचर्स को अतिरिक्त वेटेज दे सकता है, जिन्होंने एक ही स्कूल में लंबा समय बिताया है। साथ ही इसमें महिला टीचर, सिंगल पेरेंट, विधवा या विधुर, दिव्यांग टीचर और गंभीर बीमारी या परिवार से जुड़ी मुश्किल स्थितियों का सामना कर रहे टीचर्स को भी ध्यान में रखा जा सकता है। अधिकारियों ने बताया कि ऐसे जोड़ों को भी अतिरिक्त पॉइंट देने पर विचार किया जा सकता है, जिनमें पति-पत्नी दोनों सरकारी कर्मचारी हों।

भोपाल मेट्रो कॉरिडोर के 500 मीटर क्षेत्र में लागू होगी TDR व्यवस्था, संपत्तियों की कीमतों पर पड़ेगा असर?

भोपाल  भोपाल में मेट्रो रेल परियोजना के आसपास विकास व्यवस्था को लेकर एक अहम बदलाव की तैयारी चल रही है। भोपाल विकास योजना 2005 के तहत मेट्रो कॉरिडोर के दोनों ओर 500-500 मीटर के क्षेत्र को ‘रीसिविंग एरिया’ के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव सामने आया है। इस व्यवस्था का सीधा संबंध हस्तांतरणीय विकास अधिकार यानी TDR से है। प्रस्ताव को लेकर आपत्तियां और चिंताएं सामने आई हैं, क्योंकि इसके लागू होने से मेट्रो कॉरिडोर के आसपास निर्माण क्षमता, व्यावसायिक गतिविधियों और जमीन-मकान के मूल्य पर असर पड़ सकता है। मेट्रो के आसपास होगा रीसिविंग एरिया विकसित प्रस्ताव के अनुसार मेट्रो लाइन के दोनों तरफ 500 मीटर तक के क्षेत्र को रीसिविंग एरिया के रूप में विकसित किया जा सकता है। इसके तहत संबंधित क्षेत्रों में अतिरिक्त विकास अधिकार का उपयोग करके भवन निर्माण की क्षमता बढ़ाई जा सकेगी। मौजूदा विकास व्यवस्था की तुलना में अतिरिक्त एफएआर उपलब्ध होने से मेट्रो के आसपास अधिक घनत्व वाला आवासीय और व्यावसायिक विकास संभव होगा। भोपाल की विकास योजना में भी मेट्रो के दोनों ओर 500 मीटर क्षेत्र को ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट से जोड़ने की अवधारणा पहले से मौजूद है। इस व्यवस्था का उद्देश्य मेट्रो के आसपास ऐसी शहरी संरचना तैयार करना है, जहां आवास, कारोबार और अन्य सुविधाएं सार्वजनिक परिवहन के करीब विकसित हों। इससे मेट्रो का उपयोग बढ़ाने और निजी वाहनों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है। केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत भोपाल मेट्रो परियोजना में भी TDR और ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट को परियोजना से जुड़े मूल्य संवर्धन और शहरी विकास के साधन के रूप में शामिल किया गया था। रहवासियों के लिए चिंता का कारण हालांकि, प्रस्तावित बदलाव को लेकर रहवासियों की चिंताएं भी सामने आ रही हैं। मेट्रो कॉरिडोर के आसपास निर्माण की अनुमति और एफएआर बढ़ने से जमीन तथा संपत्तियों की कीमतों में तेजी आ सकती है। इसका असर उन मध्यम और निम्न-मध्यम आय वर्ग के परिवारों पर पड़ने की आशंका है, जो इन क्षेत्रों में पहले से रह रहे हैं। अधिक निर्माण क्षमता के कारण क्षेत्र में आबादी और व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ने पर यातायात, पार्किंग और बुनियादी सुविधाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ने का मुद्दा भी महत्वपूर्ण रहेगा। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत अतिरिक्त विकास अधिकार खरीदने के बाद निर्माण क्षमता में कई गुना वृद्धि संभव होने की बात सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार मौजूदा एफएआर की तुलना में यह क्षमता तीन से पांच गुना तक पहुंच सकती है। ऐसे में मेट्रो स्टेशनों के आसपास ऊंची इमारतों, अधिक आवासीय इकाइयों और व्यावसायिक परियोजनाओं के विकास का रास्ता खुल सकता है। TDR व्यवस्था नई नहीं भोपाल में TDR की अवधारणा नई नहीं है। मध्यप्रदेश में हस्तांतरणीय विकास अधिकारों के लिए 2018 में नियम बनाए गए थे और भोपाल मेट्रो परियोजना के लिए उत्पादन क्षेत्र तथा TDR व्यवस्था से संबंधित अधिसूचनाएं पहले भी जारी की जा चुकी हैं। राज्य के नगर तथा ग्राम निवेश विभाग के रिकॉर्ड में भोपाल मेट्रो के लिए TDR नियमों के तहत उत्पादन क्षेत्र अधिसूचित किए जाने की प्रक्रिया का उल्लेख मौजूद है। मेट्रो परियोजना से जुड़े भूमि और पुनर्वासन के मामलों पर भी प्रशासन की प्रक्रिया जारी है। जिला भोपाल की आधिकारिक वेबसाइट पर अगस्त 2026 में ऑरेंज लाइन के स्वीकृत मेट्रो मार्ग से जुड़े भूमि अधिग्रहण संबंधी नोटिस प्रकाशित किए गए हैं। इससे स्पष्ट है कि परियोजना के विभिन्न हिस्सों में भूमि और विकास से जुड़ी प्रशासनिक प्रक्रियाएं अभी भी आगे बढ़ रही हैं। आपत्तियों और सुझावों पर हो सकती है सुनवाई अब प्रस्तावित रीसिविंग एरिया को लेकर नगर तथा ग्राम निवेश विभाग में आपत्तियों और सुझावों पर सुनवाई की प्रक्रिया महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार सुनवाई के बाद प्राप्त आपत्तियों का निराकरण किया जाएगा और उसके आधार पर मास्टर प्लान में संशोधन का अधिसूचना प्रस्ताव आगे बढ़ सकता है। यदि संशोधन लागू होता है तो भोपाल मेट्रो कॉरिडोर के आसपास भविष्य के निर्माण और भूमि उपयोग की तस्वीर में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

सिंहस्थ 2028 से पहले उज्जैन में बड़ा फैसला, शाही मस्जिद हटाएगा नगर निगम; हाईकोर्ट से मिली मंजूरी

उज्जैन उज्जैन में सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के बीच गोपाल मंदिर रोड चौड़ीकरण परियोजना को लेकर एक बड़ा फैसला सामने आया है. करीब 100 साल पुरानी शाही मस्जिद को हटाने के खिलाफ दायर दोनों याचिकाओं को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने खारिज कर दिया है. इस फैसले के बाद नगर निगम के लिए सड़क चौड़ीकरण की राह आसान हो गई है. हालांकि मस्जिद प्रबंधन और मुस्लिम समाज ने फैसले पर असहमति जताते हुए ऊपरी अदालत में अपील करने की बात कही है।    हाईकोर्ट ने खारिज की दोनों याचिकाएं सिंहस्थ महापर्व 2028 को ध्यान में रखते हुए उज्जैन में कई विकास कार्य किए जा रहे हैं. इसी क्रम में गोपाल मंदिर रोड के चौड़ीकरण की योजना बनाई गई है. इस परियोजना की जद में आने वाली शाही मस्जिद को हटाने के खिलाफ दायर दो अलग-अलग याचिकाओं पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ में सुनवाई हुई. जस्टिस संदीप एन. भट्ट की एकल पीठ ने दोनों मामलों की एक साथ सुनवाई करने के बाद याचिकाएं खारिज कर दीं।  निगम की कार्रवाई का रास्ता हुआ साफ हाईकोर्ट का विस्तृत लिखित आदेश अभी जारी होना बाकी है, लेकिन याचिकाएं खारिज होने के बाद नगर निगम के लिए आगे की कार्रवाई का रास्ता खुल गया है. माना जा रहा है कि अब निगम सड़क चौड़ीकरण परियोजना के तहत मस्जिद को हटाने या विस्थापन की प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकता है।  मुस्लिम समाज ने जताई आपत्ति नगर निगम की ओर से मस्जिद को हटाने का नोटिस जारी होने के बाद से ही मुस्लिम समाज इसका विरोध कर रहा है. समाज के लोगों का कहना है कि शाही मस्जिद केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक महत्व भी रखती है. इसी आधार पर इसे यथास्थान बनाए रखने की मांग की जा रही थी।  याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता सैय्यद अशहर अली वारसी ने कहा कि अदालत का विस्तृत आदेश अभी आना बाकी है. आदेश का अध्ययन करने के बाद कानूनी विकल्पों पर विचार किया जाएगा. उन्होंने संकेत दिए हैं कि मामले को डबल बेंच या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।  सिंहस्थ के लिए अहम माना जा रहा मार्ग प्रशासन का कहना है कि सिंहस्थ 2028 के दौरान लाखों श्रद्धालुओं के उज्जैन पहुंचने की संभावना है. ऐसे में शहर के प्रमुख मार्गों को चौड़ा करना जरूरी माना जा रहा है. गोपाल मंदिर रोड शहर के सबसे व्यस्त और अपेक्षाकृत संकरे रास्तों में शामिल है. प्रशासन का तर्क है कि सड़क चौड़ी होने से यातायात व्यवस्था बेहतर होगी और भीड़ प्रबंधन में मदद मिलेगी।  इन लोगों ने दायर की थीं याचिकाएं पहली याचिका शाही मस्जिद वक्फ पंचायत मोचियान और शाही मस्जिद इंतजामिया कमेटी की ओर से दायर की गई थी. इसमें मध्य प्रदेश शासन, नगर निगम उज्जैन, कलेक्टर और अन्य अधिकारियों को पक्षकार बनाया गया था. दूसरी याचिका शाही मस्जिद वक्फ पंच मोचियान के अध्यक्ष अरशान हुसैन की ओर से दाखिल की गई थी, जिसमें शासन, नगर निगम और वक्फ बोर्ड को पक्षकार बनाया गया था।  पुराने दस्तावेजों का दिया गया हवाला मस्जिद प्रबंधन की ओर से अदालत में दावा किया गया कि शाही मस्जिद 100 वर्ष से अधिक पुरानी और ऐतिहासिक महत्व की है. याचिकाकर्ताओं ने 17 मार्च 1925 से जुड़े दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि उस समय जारी एक पत्र में भूमि अधिग्रहण के बाद मस्जिद के शेष हिस्से को यथावत बनाए रखने का उल्लेख किया गया था. इसी आधार पर मस्जिद को संरक्षित रखने की मांग की गई थी।