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मध्य प्रदेश में मजदूरों के लिए यूनिक हेल्थ आईडी, सरकारी योजनाओं से बढ़ेगी खुशहाली

भोपाल  मोहन सरकार अब मध्यप्रदेश के लाखों मजदूरों के हेल्थ रेकार्ड तैयार कराएगी। इसका जिम्मा शासन ने अपने श्रम विभाग को सौंप दिया है। रेकार्ड में प्रत्येक मजदूरों के स्वास्थ्य से जुड़ी रिपोर्ट होंगी। इसके लिए उन्हें आभा आइडी की तरह विभाग अलग से एक पहचान संख्या जारी करेगा। यह संख्या यूनिक होगी, जिसके जरिए इनका रेकार्ड कभी भी, कहीं भी देखा जा सकेगा। हेल्थ रिपोर्ट्स का बनेगा ऑनलाइन बैंक यहां तक कि भविष्य में श्रम विभाग मजदूरों के इलाज को लेकर अतिरिक्त सतर्कता संबंधी प्रयास भी करने जा रहा है, जिसमें उनके स्वास्थ्य से जुड़ी रिपोर्टों का ऑनलाइन बैंक भी बनवाया जाएगा। बता दें कि मध्यप्रदेश में असंगठित और निर्माण मजदूरों को संबल 2.0 योजना, ई-श्रम पोर्टल और विभिन्न कल्याणकारी बोर्डों के माध्यम से अनेक योजनाओं का लाभ दिया जाता है। क्यों पड़ी मजदूर हेल्थ रेकॉर्ड की जरूरत     मजदूरों की असमय मौत के बाद सरकार द्वारा दिए जाने वाले हित लाभों के लिए दस्तावेजों के अभाव में परेशानी     हितग्राहियों को भटकना न पड़े।     काम के चलते मजदूर और उनके परिवार के सदस्य शहर बदलते रहते हैं। दुर्घटनाग्रस्त स्थिति में सरकार कई लाभ देती हैं, लेकिन रेकॉर्ड की कमी आड़े आती है।     किसी मजदूर के साथ कोई अप्रिय स्थिति न बने, इसके लिए अतिरिक्त निगरानी करवा रहे हैं। तब भी घटनाएं होती हैं। ऐसे में आसानी से उनकी मदद की जा सकेगी। जो मजदूर पंजीकृत उन्हें मिलते हैं ये लाभ     मुख्यमंत्री जनकल्याण संबल 2.0 योजना:पंजीकृत मजदूरों की सामान्य मौत पर परिजनों को 2 लाख रुपए की आर्थिक सहायता दी जाती है।     दुर्घटना में मौत पर यह सहायता राशि 4 लाख रुपए तय की गई है। इसके अलावा अनुग्रह सहायता भी।     प्रसूति सहायता:महिला श्रमिकों को प्रसव के दौरान एक निश्चित सहायता राशि दी जाती है। ताकि उनके और नवजात शिशु की सेहत का ख्याल रखा जा सके।     शिक्षा सहायता:मजदूरों के बच्चों को श्रमोदय स्कूलों में नि:शुल्क शिक्षा, स्कूल यूनिफॉर्म के साथ ही छात्रवृत्ति का भी प्रावधान किया गया है।     कल्याणी सहायता योजना:मृत मजदूरों की विधवाओं को हर 6 महीने में 6,000 की वित्तीय सहायता दी जाती है। आभा (ABHA) योजना से कनेक्शन बता दें की आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के तहत हर नागरिक को एक यूनिक हेल्थ आईडी दी जाती है। इसे ABHA ID कहा जाता है। इस आई के माध्यम से मेडिकल हिस्ट्री जैसे जांच रिपोर्ट, डॉक्टर की पर्ची और इलाज का रिकॉर्ड डिजिटली सुरक्षित रहता है। अब मध्य प्रदेश सरकार इसी मॉडल पर प्रदेश भर के मजदूरों के लिए अलग यूनिक हेल्थ आईडी नंबर तैयार करवा रही है। ये है फर्क फर्क सिर्फ इतना है कि यह रिकॉर्ड खासतौर पर श्रमिकों की जरूरत के हिसाब से तैयार करवाया जाएगा। इसमें काम के दौरान होने वाली बीमारियों, दुर्घटना और नियमित स्वास्थ्य जांच का पूरा डाटा शामिल होगा। मजदूरों का जीवन होगा आसान मजदूरों का जीवन आसान करने के जितने भी प्रयास हो सकते हैं, वे सभी प्रयास हमारी सरकार कर रही है। श्रम विभाग को विशेष दिशा-निर्देश दिए है कि पंजीकृत मजदूरों और उनके परिवारजनों के स्वास्थ्य संबंधी रेकॉर्ड को संधारित करने की मजबूत व्यवस्था बनाई जाए। -प्रह्लाद पटेल, मंत्री, श्रम एवं पंचायत ग्रामीण विकास विभाग, मध्यप्रदेश

नामांतरण’ प्रक्रिया में नया नियम, पार्टनरशिप डॉक्यूमेंट्स होंगे अमान्य

भोपाल  भोपाल शहर में नामांतरण कराने वालों के लिए खबर है। अब एमओयू, अनुबंध या पार्टनरशीप के दस्जावेजों को नामांतरण का आधार नहीं बनाया जाएगा। प्रशासन की ओर से तहसील कार्यालयों को इसे लेकर स्पष्ट निर्देश जारी किए गए हैं। रजिस्टर्ड डीड की बजाय अन्य दस्तावेज लगाकर नामांतरण के लिए आ रहे आवेदनों की संख्या व स्थिति देखने के बाद ये निर्देश दिए गए हैं। प्रदेश समेत जिले में नामांतरण के लिए खरीद-बिक्री की रजिस्डर्ट डीड, विरासत दस्तावेज, गिफ्ट डीड, वसीयत, विभाजन, कोर्ट आदेश, पट्टा या अधिकार पत्र को आधार बनाया। इसलिए दिए ये निर्देश दरअसल कंपनियों के आपसी मर्जर एग्रीमेंट से नामांतरण के आवेदन आ रहे हैं। आठ नजूल क्षेत्रों में इस समय 100 से अधिक आवेदन हैं। मर्जर में कंपनी का संचालन तो चल जाता है, लेकिन पुरानी कंपनी के नाम रजिस्टर्ड संपत्ति का हस्तांतरण नहीं होता है। अन्य प्रदेशों की हाइकोर्ट ने कुछ मामलों में मर्जर एग्रीमेंट से नामांतरण के आदेश दिए। जिले में नामांतरण के लिए लगे मामलों में इन्हीं कोर्ट के आदेश का आधार लिया जा रहा है। ऐसे में प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि प्रदेश में भू राजस्व संहिता 1959 में रजिस्टर्ड डीड का ही उल्लेख है। ऐसे में यहां इस तरह के मामलों में अन्य दस्तावेज से किए आवेदनों को अमान्य किया जाए। रोजाना 700 आवेदन, 15% अन्य दस्तावेज वाले इस समय रोजाना 700 आवेदन विभिन्न माध्यमों से नामांतरण के लिए दर्ज होते हैं। 50 फीसदी आवेदन पारिवारिक संपत्ति, बंटवारा, वसीयत के हैं, जबकि 30 फीसदी नई संपत्ति खरीदी-बिक्री वाले हैं। बाकी में अन्य दस्तावेज हैं। इन पर ही सवाल उठ रहा है। प्रशासनिक स्तर पर गलती न हो इसलिए अलर्ट भेजा गया है। गौरतलब है कि हुजूर तहसील में किंगफिशर के विजय माल्या की एक संपत्ति के नामांतरण का काफी विवाद बना था। नामांतरण को लेकर शासन ने दस्तावेज व नियम तय किए हुए हैं। इन्हीं के आधार पर हो। इसे ही सुनिश्चित कराया जा रहा है।- प्रकाश नायक, एडीएम 33 अवैध कालोनी के नामांतरण पर लगी रोक शहर में 70 अवैध कॉलोनियों के खिलाफ एफआइआर दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी, जबकि 63 लोगों पर नामजद एफआइआर दर्ज की है। प्रशासन की ओर से 33 कॉलोनियों में रजिस्ट्री और नामांतरण पर रोक लगा दी गई है। हताईखेड़ा और रोलूखेड़ी जैसे क्षेत्रों में अवैध निर्माणों को जेसीबी मशीनों की मदद से ध्वस्त किया गया है। अवैध कॉलोनियों की अधिकता वाले क्षेत्रों में रातीबड़, नीलबड़, पिपलिया बरखेड़ी, अमरावदकलां, शोभापुर, रोलूखेड़ी, कानासैय्या, कालापानी, पचामा, थुआखेड़ा, छावनी पठार, विदिशा रोड, बैरसिया रोड, सेवनिया ओंकारा, कोलुआ खुर्द, हथाईखेड़ा, रायसेन रोड, बिशनखेड़ी, कलखेड़ा, करोंद, संतनगर, भौंरी आदि शामिल है।

सागर बांध में लगे 1.5 करोड़ पेड़, 65 लाख लोगों को ऑक्सीजन देने का सामर्थ्य

मंदसौर महानगरों में जहां लोग ‘एयर क्वालिटी इंडेक्स' के खतरनाक स्तर और जहरीली हवा से जूझ रहे हैं, वहीं मध्य प्रदेश के मंदसौर और नीमच जिलों की सीमा पर फैला गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य एक विशाल ‘ऑक्सीजन पावर बैंक' बनकर उभरा है। .1984 में अधिसूचित 368.62 वर्ग किमी टर में फैला यह अभयारण्य न केवल वन्यजीवों की सुरक्षित शरणस्थली है, बल्कि यह हर साल लाखों टन शुद्ध ऑक्सीजन का उत्पादन कर पर्यावरण को ‘रिचार्ज' कर रहा है। अभयारण्य में मुख्य रूप से शुष्क पर्णपाती वन और सवाना जैसे घास के मैदान हैं। वानिकी आंकड़ों के अनुसार गांधीसागर और इसके जलग्रहण क्षेत्रों को मिलाकर यहां लगभग 1.5 करोड़ से अधिक पेड़ लगे हैं। खैर, सलाई, पलाश, तेंदू और धावड़ा जैसे पेड़ों से सजा यह जंगल बिना किसी शोरगुल या बिजली की खपत के दिन-रात एक प्राकृतिक कारखाने की तरह काम कर रहा है। अभयारण्य का पारिस्थितिकी तंत्र     कुनी के बाद अब इसे अफ्रीकी चीती के दूमो घर के रूप में चुना गया है। अभी यहा दो नर व मदा चोता है। मई में यहां और भीले आएंगे।     यहां गिद्धों की संख्या तेजी से बढ़ी है। वन विभाग के आंकड़ों 2025-26) के अनुसार यहां 7 विभिन्न प्राहियों के 1054 से अधिक गिद्ध मौजूद हैं।     जलीय क्षेत्रों के ताजा सर्वे में 139 से अधिक प्रकार के जलपधी और प्रवासी पक्षी रिकॉर्ड किए गए हैं, जो इसे एक प्रमुख 'बर्निंग साइट' बनाते हैं।     यहां मीठे पानी के कछुओं की 8 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। इसने 'इंडियन सॉफ्ट शेल' और 'फ्लैप रोल टर्टल' मुख्य हैं।     चंबल नदी का यह हिस्सा मगरमच्छों का गढ़ है। नहां सैकड़ों की संख्या में मगरमच्छ प्राकृतिक रूप से प्रजनन करते और पनपते हैं।     पांचरण की शुद्धता का संकेत देने वाले ड्रैगनफ्लई और हेमसेलस्लाई की 41 प्रजातियां यहां के जलीय किनारों पर खोजी गई हैं।  

मध्यप्रदेश में 23634 पंचायतों और 444 तहसीलों में विंड सिस्टम, सरकार को हर 15 मिनट में मिलेगी मौसम अपडेट

भोपाल  मध्यप्रदेश सरकार ने खेती-किसानी और प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी को पूरी तरह डिजिटल बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। इसके तहत राज्य की सभी 23,634 ग्राम पंचायतों में ऑटोमैटिक रेन गेज और 444 तहसीलों में ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन लगाए जाएंगे। कृषि विभाग ने इस परियोजना के लिए निविदा जारी कर दी है और कार्यान्वयन भागीदारों से आवेदन मांगे गए हैं। इस सिस्टम की खासियत यह होगी कि मौसम और बारिश से जुड़ा सटीक डेटा हर 15 मिनट में सीधे सरकार के पोर्टल पर अपडेट होगा, जिससे सूखे और अतिवृष्टि जैसी स्थितियों की रियल-टाइम निगरानी संभव हो सकेगी। परियोजना पर 100 से 120 करोड़ रुपये का निवेश केंद्र और राज्य सरकार के संयुक्त सहयोग से इस परियोजना को लागू किया जा रहा है। अनुमान के अनुसार, एक ऑटोमैटिक रेन गेज पर 35,000 से 40,000 रुपये और एक तहसील स्तर के वेदर स्टेशन पर 1.5 से 2 लाख रुपये तक की लागत आएगी। पूरे प्रोजेक्ट पर लगभग 100 से 120 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इसमें केंद्र सरकार ‘वायबिलिटी गैप फंडिंग’ के तहत 50% राशि उपलब्ध कराएगी, जबकि शेष राशि राज्य सरकार और एजेंसियों द्वारा वहन की जाएगी। क्यों जरूरी हुआ यह सिस्टम अभी मौसम की जानकारी जिला या ब्लॉक स्तर पर ही उपलब्ध होती है, जिससे स्थानीय स्तर पर मौसम का सटीक आंकलन नहीं हो पाता। कई बार एक ही तहसील में अलग-अलग गांवों में बारिश और सूखे की स्थिति देखने को मिलती है, जिससे नुकसान का सही आंकलन मुश्किल हो जाता है। इस कमी के कारण प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसानों के क्लेम के निपटान में भी दिक्कत आती थी। नया सिस्टम लागू होने के बाद हर पंचायत का वास्तविक डेटा उपलब्ध होगा, जिससे किसानों को सही मुआवजा मिल सकेगा। ऑटोमैटिक रेन गेज और वेदर स्टेशन की योजना वहीं सरकार की इस योजना के तहत हर ग्राम पंचायत में ऑटोमैटिक रेन गेज लगाए जाएंगे, जो बारिश की मात्रा को मापेंगे। वहीं हर तहसील में ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन लगाया जाएगा, जो तापमान, हवा की गति, नमी और अन्य मौसम से जुड़े आंकड़े रिकॉर्ड करेगा। दरअसल सरकारी आंकड़ों के मुताबिक एक ऑटोमैटिक रेन गेज लगाने में करीब 35 हजार से 40 हजार रुपए का खर्च आएगा। वहीं तहसील स्तर के वेदर स्टेशन की लागत लगभग 1.5 लाख से 2 लाख रुपए तक हो सकती है। पूरे राज्य में 24 हजार से ज्यादा जगहों पर यह सिस्टम लगाने के लिए करीब 100 से 120 करोड़ रुपए का बजट तय किया गया है। दरअसल इस परियोजना में केंद्र और राज्य सरकार दोनों की भागीदारी होगी। भारत सरकार इस प्रोजेक्ट की कुल लागत का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा ‘वायबिलिटी गैप फंडिंग’ के रूप में देगी, जबकि बाकी खर्च राज्य सरकार और चयनित एजेंसियां मिलकर उठाएंगी। वहीं अधिकारियों का मानना है कि यह सिस्टम लागू होने के बाद मौसम की जानकारी पहले से कहीं ज्यादा सटीक और भरोसेमंद होगी। क्या किसानों के लिए होगा फायदेमंद? बता दें कि नया मौसम नेटवर्क लागू होने के बाद किसानों को अपने गांव के हिसाब से सटीक मौसम जानकारी मिल सकेगी। इससे वे बुवाई, सिंचाई और फसल कटाई का सही समय तय कर पाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि मौसम की सही जानकारी मिलने से फसल उत्पादन बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। वहीं इस सिस्टम का एक बड़ा फायदा यह भी होगा कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसानों के नुकसान का आकलन ज्यादा सटीक तरीके से किया जा सकेगा। पहले कई बार डेटा की कमी के कारण बीमा दावों के भुगतान में विवाद या देरी हो जाती थी। अब हर पंचायत से मिलने वाले डेटा के आधार पर बीमा कंपनियां और सरकार नुकसान का सही आंकलन कर पाएंगी। इसके अलावा यह नेटवर्क आपदा प्रबंधन के लिए भी अहम साबित होगा। अचानक आने वाली तेज बारिश, आंधी या बिजली गिरने जैसी घटनाओं की जानकारी पहले मिल सकेगी। इससे प्रशासन समय रहते चेतावनी जारी कर पाएगा और लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाने की व्यवस्था कर सकेगा। दरअसल सरकार ने इस प्रोजेक्ट को तेजी से पूरा करने का लक्ष्य रखा है। अप्रैल 2026 में टेंडर प्रक्रिया शुरू होने के बाद चुनी गई कंपनियों को 6 से 9 महीने के भीतर सभी चिन्हित जगहों पर उपकरण लगाने होंगे। कैसे काम करेगा सिस्टम यह पूरा नेटवर्क सौर ऊर्जा से संचालित होगा और पूरी तरह ऑटोमैटिक होगा। पंचायतों और तहसीलों में लगाए जाने वाले उपकरणों में आधुनिक सेंसर और सिम आधारित टेलीमेट्री सिस्टम होगा। ये डिवाइस हर 15 मिनट में बारिश, तापमान, हवा की गति और नमी का डेटा रिकॉर्ड कर सीधे ‘WINDS’ केंद्रीय सर्वर पर भेजेंगे। इसमें किसी भी तरह के मैनुअल हस्तक्षेप की जरूरत नहीं होगी। किसानों और आम लोगों को मिलेगा बड़ा फायदा इस डिजिटल सिस्टम से कृषि विभाग को बेहतर आपदा प्रबंधन में मदद मिलेगी और किसानों को गांव स्तर पर सटीक मौसम सलाह मिलेगी, जिससे वे फसल की बुवाई और सिंचाई सही समय पर कर सकेंगे।इसके अलावा बीमा कंपनियों और किसानों के बीच डेटा विवाद खत्म होंगे क्योंकि भुगतान पूरी तरह वास्तविक गांव स्तर के डेटा पर आधारित होगा। परियोजना की लागत और बजट इस महत्वाकांक्षी परियोजना को केंद्र और राज्य सरकार के साझा सहयोग से जमीन पर उतारा जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, एक ऑटोमैटिक रेन गेज की स्थापना पर लगभग ₹35,000 से ₹40,000 और तहसील स्तर के वेदर स्टेशन पर ₹1.5 लाख से ₹2 लाख तक का खर्च आने का अनुमान है। प्रदेश की 24,000 से अधिक लोकेशन्स को कवर करने के लिए इस पूरे प्रोजेक्ट पर करीब ₹100 करोड़ से ₹120 करोड़ का निवेश किया जाएगा। भारत सरकार इस कुल लागत का 50% हिस्सा 'वायबिलिटी गैप फंडिंग' (VGF) के रूप में प्रदान करेगी, जबकि बाकी की राशि राज्य सरकार और चयनित एजेंसियां वहन करेंगी। इसकी जरूरत क्यों पड़ी? वर्तमान में मौसम की जानकारी केवल जिला या ब्लॉक स्तर पर उपलब्ध होती है, जो स्थानीय स्तर पर होने वाली प्राकृतिक घटनाओं का सटीक आकलन करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अक्सर देखा गया है कि एक ही तहसील के भीतर किसी एक गांव में भारी बारिश (अतिवृष्टि) होती है, जबकि दूसरे गांव में सूखा रहता है। डेटा के इस अभाव के कारण प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना … Read more

रायपुर: बस्तर के लिए वैश्विक मार्ग, 4 घंटे में समंदर तक पहुंच

रायपुर : बस्तर के लिए खुलेगा वैश्विक द्वार, 4 घंटे में पूरा होगा समंदर तक का सफर रायपुर-विशाखापट्टनम कॉरिडोर से बस्तर को मिलेगा वैश्विक कनेक्शन बस्तर से बंदरगाह तक सीधी राह, इकोनॉमिक कॉरिडोर से विकास को मिलेगी नई दिशा रायपुर बस्तर की प्रगति को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए रायपुर-विशाखापट्टनम इकोनॉमिक कॉरिडोर (NH-130 CD) एक क्रांतिकारी कदम साबित होने जा रहा है। भारतमाला परियोजना के तहत बन रहा यह 6-लेन ग्रीनफील्ड कॉरिडोर न केवल दूरियों को कम करेगा, बल्कि बस्तर के स्थानीय उत्पादों को सीधे अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों तक पहुँच प्रदान कर लैंड-लॉक्ड क्षेत्र की बाधाओं को समाप्त करेगा। दुर्गम घाटों से मुक्ति और समय की बड़ी बचत वर्तमान में जगदलपुर से विशाखापट्टनम की यात्रा ओडिशा के कोरापुट और जयपुर के कठिन घाटों से होकर गुजरती है, जिसमें 7 से 9 घंटे का समय लगता है। भारी वाहनों के लिए यह मार्ग न केवल थकाऊ है, बल्कि डीजल की खपत और मेंटेनेंस के लिहाज से भी खर्चीला है। नया कॉरिडोर इस यात्रा को मात्र 3.5 से 4 घंटे में समेट देगा। सीधा और घाट-मुक्त रास्ता होने के कारण वाहनों का परिचालन खर्च काफी कम हो जाएगा, जिससे परिवहन क्षेत्र को बड़ी राहत मिलेगी। नबरंगपुर इंटरचेंज: बस्तर का प्रवेश द्वार रायपुर-विशाखापट्टनम इकोनॉमिक कॉरिडोर (NH-130 CD) छत्तीसगढ़ के रायपुर, धमतरी, कांकेर और कोंडागांव जिलों से गुजर रहा है। जगदलपुर मुख्यालय को इस कॉरिडोर से जोड़ने के लिए ओडिशा के नबरंगपुर का दासपुर इंटरचेंज महत्वपूर्ण कड़ी साबित होगा। जगदलपुर का ट्रैफिक मात्र 50-60 किमी का सफर तय कर नबरंगपुर इंटरचेंज के माध्यम से रायपुर-विशाखापट्टनम इकोनॉमिक कॉरिडोर में शामिल हो सकेगा, जिससे बस्तर सीधे विशाखापट्टनम पोर्ट और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक नेटवर्क से जुड़ जाएगा। बस्तरिया ब्रांड का अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रवेश इस कॉरिडोर का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव बस्तर की स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। अब बस्तर की अरेबिका कॉफी, जैविक इमली, महुआ उत्पाद और प्रसिद्ध ढोकरा शिल्प को विशाखापट्टनम पोर्ट तक पहुँचाना सुगम होगा। कम लॉजिस्टिक लागत के कारण ये उत्पाद वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी दरों पर उपलब्ध होंगे, जिससे स्थानीय किसानों, संग्रहकर्ताओं और शिल्पकारों को उनकी उपज का बेहतर अंतरराष्ट्रीय मूल्य मिल सकेगा। सामाजिक और आर्थिक उत्थान बस्तर, कांकेर और कोंडागांव जैसे आकांक्षी जिलों को इस परियोजना से सीधा लाभ मिलेगा। बेहतर सड़क संपर्क से शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाएं इन सुदूर क्षेत्रों तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंच सकेंगी। इस राजमार्ग के माध्यम से बस्तर का कृषि उत्पाद और इस्पात सीधे रायपुर, दुर्ग-भिलाई और विशाखापट्टनम जैसे औद्योगिक केंद्रों से जुड़ जाएगा। इससे स्थानीय युवाओं के लिए तकनीकी, प्रबंधन, लॉजिस्टिक्स, रियल एस्टेट और सर्विस सेक्टर में हजारों नए रोजगार के अवसर सृजित होंगे। यह कॉरिडोर बस्तर में औद्योगिक विकास की एक नई लहर लाने के लिए तैयार है। औद्योगिक और खनिज विकास बस्तर क्षेत्र लौह अयस्क और अन्य खनिजों से समृद्ध है। यह कॉरिडोर इन खनिजों को विशाखापत्तनम पोर्ट तक तेजी से पहुंचाने में मदद करेगा, जिससे निर्यात और व्यापार में भारी उछाल आएगा। कॉरिडोर के किनारे नए औद्योगिक क्लस्टर विकसित होने की संभावना है, जिससे स्थानीय स्तर पर विनिर्माण को बढ़ावा मिलेगा। पर्यटन और सांस्कृतिक पहचान का विस्तार कनेक्टिविटी में सुधार होने से अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की आमद बढ़ेगी। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा, दंतेश्वरी मंदिर, ढोलकल गणेश, कुतुमसर गुफा और चित्रकोट-तीरथगढ़ जैसे जलप्रपातों तक पहुंच आसान होगी। इससे न केवल पर्यटन राजस्व बढ़ेगा, बल्कि आदिम संस्कृति और लोक कलाओं को भी वैश्विक मंच पर नई पहचान मिलेगी। पर्यावरण और इंजीनियरिंग का तालमेल कांकेर जिले के बासनवाही के मंझिनगढ़ पहाड़ी (केशकाल) को चीरकर 2.79 किमी लंबी छत्तीसगढ़ की पहली ट्विन-ट्यूब टनल बनाई जा रही है। यह टनल उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के इको-सेंसिटिव जोन से गुजरती है, जिसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि वन्यजीवों का आवागमन बाधित न हो। साथ ही पूरे राजमार्ग में मंकी कैनोपी, एनिमल अंडरपास और ओवरपास बनाए जा रहे हैं ताकि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बना रहे। रायपुर-विशाखापत्तनम इकोनॉमिक कॉरिडोर रायपुर-विशाखापत्तनम इकोनॉमिक कॉरिडोर (NH 130CD) बस्तर संभाग और पूरे छत्तीसगढ़ के आर्थिक परिदृश्य को बदलने वाली एक महत्वाकांक्षी परियोजना है। लगभग 16,491 करोड़ रुपये की लागत से बन रहा यह 464 किमी लंबा ग्रीनफील्ड एक्सेस कंट्रोल  कॉरिडोर न केवल दूरी कम करेगा, बल्कि बस्तर जैसे जनजातीय क्षेत्रों को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ने में सेतु का काम करेगा। यह कॉरिडोर बस्तर को विश्व व्यापार की मुख्यधारा से जोड़ने का मार्ग प्रशस्त करेगा। यह परियोजना सही मायने में बस्तर की आत्मनिर्भरता और वैश्विक पहचान का आधार बनेगी। "रायपुर-विशाखापट्टनम इकोनॉमिक कॉरिडोर बस्तर सहित पूरे छत्तीसगढ़ के लिए विकास का नया द्वार खोलने जा रहा है। केंद्र सरकार के सहयोग से हम राज्य में आधुनिक और मजबूत अधोसंरचना का तेजी से विस्तार कर रहे हैं। इससे न केवल यात्रा समय कम होगा, बल्कि स्थानीय उत्पादों को वैश्विक बाजार तक सीधी पहुंच मिलेगी। हमारी सरकार का लक्ष्य है कि बस्तर जैसे क्षेत्रों को मुख्य धारा की अर्थव्यवस्था से जोड़कर समावेशी और संतुलित विकास सुनिश्चित किया जाए। यह परियोजना आत्मनिर्भर छत्तीसगढ़ की दिशा में एक मजबूत कदम है।" – मुख्यमंत्री विष्णु देव साय "रायपुर-विशाखापट्टनम इकोनॉमिक कॉरिडोर प्रदेश में कनेक्टिविटी और औद्योगिक विकास को नई गति देगा। विश्वस्तरीय सड़क नेटवर्क तैयार कर नागरिकों और माल परिवहन को सुगम, सुरक्षित और तेज बनाया जा रहा है। इस कॉरिडोर से बस्तर सीधे बंदरगाह से जुड़कर व्यापार और रोजगार के नए अवसर पैदा करेगा। हमारी प्राथमिकता है कि हर क्षेत्र तक बेहतर सड़क और बुनियादी सुविधाएं पहुंचें, जिससे प्रदेश का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित हो सके।" – उप मुख्यमंत्री तथा लोक निर्माण मंत्री अरुण साव

जल गंगा संवर्धन अभियान से जल संरक्षण की दिशा में हुआ अभूतपूर्व कार्य

विभिन्न जिलों से मिल रहे है सकारात्मक परिणाम जल प्रबंधन से कृषि, पर्यावरण एवं आजीविका में आया उल्लेखनीय सुधार भोपाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में प्रदेश में संचालित जल गंगा संवर्धन अभियान जल संरक्षण, पर्यावरण संवर्धन और ग्रामीण विकास का प्रभावी माध्यम बनकर उभरा है। अभियान के तहत जल स्रोतों के पुनर्जीवन और नई जल संरचनाओं के निर्माण को गति मिली है। जनभागीदारी से जल प्रबंधन सशक्त हुआ है। इसके परिणामस्वरूप प्रदेश के विभिन्न जिलों में जल उपलब्धता में वृद्धि हुई है, कृषि उत्पादन में सुधार हुआ है और जैव विविधता को संरक्षण मिला है। साथ ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी सुदृढ़ हुई है और लोगों की आजीविका में सकारात्मक परिवर्तन आया है। छिंदवाड़ा: पालाचौरई में तालाब निर्माण से बढ़ी कृषि उत्पादकता छिंदवाड़ा जिले के विकासखंड जुन्नारदेव का ग्राम पालाचौरई हरियाली और समृद्धि की मिसाल बनकर उभरा है। अभियान में ग्राम में जल संरचनाओं के निर्माण और पुराने जल स्रोतों के पुनर्जीवन को प्राथमिकता दी गई। मत्स्य पालन तथा पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के समन्वित प्रयासों से आधा एकड़ से लेकर ढाई एकड़ तक के तालाबों का निर्माण किया गया, जिससे वर्षभर जल उपलब्धता सुनिश्चित हुई है। जल स्तर में वृद्धि का सीधा लाभ कृषि क्षेत्र को मिला है। पूर्व में वर्षा पर निर्भर रहने वाले किसान अब सिंचित खेती कर रहे हैं। वर्तमान में किसान 3 फसलें लेकर उत्पादन और आय दोनों में वृद्धि कर रहे हैं। रबी सीजन में गेहूं, चना, मसूर, सरसों, मटर का उत्पादन बढ़ा है। जायद सीजन में मूंग एवं उड़द की खेती भी संभव हो पाई है। इसके अतिरिक्त किसानों ने मछली पालन, मोती उत्पादन एवं सिंघाड़ा जैसी गतिविधियों से आय के वैकल्पिक स्रोत विकसित किए हैं। ग्राम की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है, पलायन में कमी आई है और युवा कृषि से जुड़कर आत्मनिर्भर बन रहे हैं। ग्वालियर: पृथ्वी ताल पुनर्जीवन से हुआ पर्यावरण संरक्षण और पर्यटन विकास ग्वालियर जिले में जल गंगा संवर्धन अभियान में ऐतिहासिक पृथ्वी ताल का कायाकल्प किया गया है। इसे आधुनिक, उपयोगी और आकर्षक जलाशय के रूप में विकसित किया गया है। लगभग 7.27 हैक्टेयर में फैला यह तालाब पहले गाद, जलकुंभी और अतिक्रमण से प्रभावित था। इसकी उपयोगिता लगभग समाप्त हो गई थी। अब यह पुनर्जीवित होकर जल संरक्षण का प्रभावी केंद्र बन गया है। अभियान के तहत व्यापक स्तर पर गाद निकासी, गहरीकरण और सफाई कार्य किए गए, जिससे जल संग्रहण क्षमता बढ़ी। निकाली गई उपजाऊ मिट्टी का उपयोग आसपास के खेतों में किया गया,जिससे कृषि को भी लाभ मिला। सौंदर्यीकरण कार्यों के बाद यह स्थल अब नागरिकों के लिए प्रमुख पिकनिक स्पॉट और स्वास्थ्यवर्धक गतिविधियों का केंद्र बन गया है। सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि जैव विविधता का पुनरुद्धार है। वर्तमान में 120 से अधिक देशी-विदेशी पक्षियों की प्रजातियां यहां निवास कर रही हैं। कछुए और अन्य जलीय जीव भी यहां पाए जा रहे हैं,जिससे यह क्षेत्र एक जीवंत पारिस्थितिक तंत्र के रूप में विकसित हुआ है। मंदसौर: थडोद की ऐतिहासिक बावड़ी के पुनरुद्धार से मिला स्थायी जल स्रोत मंदसौर जिले के ग्राम थडोद में प्राचीन हजरत गालिब की बावड़ी का पुनर्जीवन एक प्रेरणादायक उपलब्धि के रूप में सामने आया है। वर्षों से उपेक्षित यह बावड़ी गंदगी, मलबे और अव्यवस्था के कारण अनुपयोगी हो गई थी। अभियान में प्रशासन और ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी से इस बावड़ी का व्यापक जीर्णोद्धार किया गया। श्रमदान कर मलबा हटाया गया, जल स्रोत की सफाई की गई और आसपास के क्षेत्र को व्यवस्थित किया गया। इससे यह बावड़ी पुनः स्वच्छ, सुरक्षित और उपयोगी जल स्रोत के रूप में स्थापित हुई है। अभियान से न केवल एक ऐतिहासिक धरोहर का संरक्षण हुआ है, बल्कि ग्रामवासियों को एक स्थायी जल स्रोत भी उपलब्ध हुआ है। भू-जल स्तर में सुधार की संभावनाएं बढ़ी हैं और यह प्रयास अन्य ग्रामों के लिए प्रेरणा बनकर उभरा है। सतत विकास की दिशा में प्रभावी पहल प्रदेश में जल गंगा संवर्धन अभियान के अंतर्गत किए जा रहे प्रयास जल संसाधनों के संरक्षण और उपयोग में ठोस परिवर्तन ला रहे हैं। छिंदवाड़ा, ग्वालियर और मंदसौर के उदाहरण यह दर्शाते हैं कि योजनाबद्ध क्रियान्वयन और जनसहभागिता से स्थानीय स्तर पर स्थायी परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। यह पहल वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ भविष्य के लिए जल सुरक्षा की मजबूत नींव भी तैयार कर रही है और प्रदेश में संतुलित एवं दीर्घकालिक विकास को गति दे रही है।  

सीएम हेल्पलाइन की शिकायतों के निराकरण में ऊर्जा विभाग बना नबंर-1 : ऊर्जा मंत्री तोमर

आमजनों के प्रति संवेदनशील ऊर्जा विभाग भोपाल ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने बताया है कि लोक सेवा प्रबंधन विभाग द्वारा सीएम हेल्पलाइन पोर्टल पर प्राप्त शिकायतों के निराकरण की स्थिति के आधार पर जारी ग्रेडिंग में ऊर्जा विभाग को प्रथम स्थान हासिल हुआ है।  एक मार्च से 31 मार्च की जारी ग्रेडिंग (20 अप्रैल 2026 की स्थिति में) में शिकायतों के निराकरण में ऊर्जा विभाग नम्बर-1 है। दूसरे नम्बर पर खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग है। इस ग्रेडिंग से सिद्ध होता है कि ऊर्जा विभाग की आमजनों के बीच लगातार संवेदनशील छवि बनी हुई है। सीएम हेल्पलाइन पोर्टल पर ऊर्जा विभाग से संबंधित शिकायतों के निराकरण के लिये एल-1 अधिकारी के रूप में कनिष्ठ अभियंता/सहायक अभियंता, एल-2 अधिकारी के रूप में कार्यपालन अभियंता, एल-3 अधिकारी के रूप में अधीक्षण अभियंता एवं एल-4 अधिकारी के रूप में मुख्य अभियंता सीएम हेल्पलाइन पोर्टल पर दर्ज हैं और उक्त सभी अधिकारियों द्वारा आमजन की शिकायतों का संवेदनापूर्वक निराकरण किया जाता है। प्रत्येक स्तर पर शिकायत के निराकरण के लिये 7 दिन का समय निर्धारित किया गया है। शिकायतों के निराकरण के बाद सीएम हेल्पलाइन कॉल सेंटर द्वारा शिकायतकर्ता से दूरभाष पर निराकरण के संबंध में संतोषजनक जवाब प्राप्त करने के बाद ही शिकायतों को बंद किया जाता है। राज्य शासन द्वारा नागरिकों को दी जा रही विभिन्न सेवाओं के संबंध में प्राप्त शिकायतों के निराकरण की पुख्ता व्यवस्था के लिये लोक सेवा प्रबंधन विभाग द्वारा सीएम हेल्पलाइन पोर्टल का निर्माण वर्ष 2014 में किया गया है। इस पोर्टल पर प्राप्त शिकायतों को विभाग के संबंधित अधिकारियों को अग्रेषित किया जाता है।

मध्यप्रदेश पुलिस की अवैध मादक पदार्थों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई

विगत एक सप्‍ताह में 2 करोड़ 29 लाख से अधिक के मादक पदार्थ एवं वाहन जब्त भोपाल मध्यप्रदेश पुलिस द्वारा प्रदेशभर में अवैध मादक पदार्थों की तस्करी, भंडारण एवं बिक्री के विरुद्ध लगातार कार्रवाई की जा रही हैं। इसी कार्यवाही के दौरान विभिन्‍न जिलों की पुलिस टीमों ने विगत एक सप्‍ताह में 2 करोड़ 29 लाख रूपए के मादक पदार्थ व तस्करी में प्रयुक्त वाहन जब्त करते हुए आरोपियों को गिरफ्तार किया है। नीमच: पुलिस थाना जीरन ने एक ट्रक में परिवहन किया जा रहा 06 क्विंटल 10 किलोग्राम अवैध डोडाचूरा जब्त कर लगभग 1 करोड़ रूपए से अधिक का डोडाचूरा एवं ट्रक जब्‍त किया है। मंदसौर: पुलिस थाना नाहरगढ़ ने अवैध मादक पदार्थ के विरूद्ध कार्रवाई कर 01 क्विंटल डोडाचूरा सहित 28 लाख रूपए की संपत्ति जब्‍त की है। वहीं थाना शामगढ़ पुलिस ने 63 किलोग्राम अवैध डोडाचूरा (कीमत 1 लाख 26 हजार रुपये) और तस्करी में प्रयुक्त एक मोटरसाइकिल सहित 1 लाख 76 हजार रूपए की संपत्ति जब्‍त की है। भिंड: थाना देहात पुलिस ने गांजे के बड़े नेटवर्क का भंडाफोड़ करते हुए 138 किलो गांजा बरामद किया है। इस कार्यवाही में 2 तस्करों को गिरफ्तार कर लगभग 28 लाख रुपये की संपत्ति जब्‍त की है। शहडोल: थाना जैतपुर पुलिस ने एक दुर्घटनाग्रस्त वाहन से उड़ीसा से लाया गया लगभग 200 किलो गांजा के साथ 2 आरोपियों को गिरफ्तार कर 20 लाख रुपये से अधिक की संपत्ति जब्‍त की है। इसी प्रकार एक अन्‍य कार्यवाही में जयसिंहनगर पुलिस ने बस स्टैंड पर कार्रवाई कर 12.98 ग्राम अवैध स्मैक (हेरोइन) (कीमत लगभग 30 हजार रुपये) के साथ महिला सहित 4 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। जबलपुर: क्राइम ब्रांच एवं सिहोरा पुलिस की संयुक्त कार्यवाही में गांजे के कारोबार में लिप्त 3 महिलाओं सहित 6 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। इनके कब्जे से 26 किलो 978 ग्राम गांजा सहित 13 लाख 48 हजार 900 रुपए से अधिक की संपत्ति जब्‍त की है। इसी प्रकार एक अन्‍य कार्यवाही में तिलवारा पुलिस ने मादक पदार्थ गांजा के कारोबार में लिप्त 03 आरोपियों को गिरफ्तार कर उनके कब्जे से 09 किलो 781 ग्राम गांजा जब्त किया है, जिसकी कीमत 04 लाख 89 हजार रुपये है। इंदौर: क्राइम ब्रांच इंदौर ने मादक पदार्थों के विरूद्ध कार्यवाही करते हुए एक आरोपी को गिरफ्तार कर उसके कब्जे से 121 ग्राम अवैध "MD" ड्रग्स जब्त की है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय कीमत लगभग 12 लाख 10 हजार रूपए है। शिवपुरी: थाना करैरा पुलिस ने दो अलग-अलग कार्यवाहियों में 37.93 ग्राम स्‍मैक के साथ दो आरोपियों को गिरफ्तार कर 7 लाख 70 हजार रूपए की संपत्ति जब्‍त की है। ग्वालियर: थाना डबरा क्षेत्र के टेकनपुर से 9.58 किलो अवैध गांजा (1 लाख रुपये) के साथ 1 तस्कर को गिरफ्तार किया है। इसी प्रकार एक अन्‍य कार्यवाही में क्राइम ब्रांच व थाना जनकगंज की संयुक्त टीम ने 5 स्मैक तस्करों को पकड़कर उनके पास से 35.42 ग्राम स्मैक, एक मारुति स्विफ्ट कार व मोबाइल सहित लगभग 4 लाख 15 हजार रूपए की संपत्ति जब्त की है। आगर मालवा: थाना बड़ौद पुलिस ने नाकाबंदी के दौरान 41.12 ग्राम अवैध एमडी (MD) ड्रग्स और मोबाइल जब्त कर एक आरोपी को गिरफ्तार किया है। जब्‍त संपत्ति की कीमत लगभग 4 लाख 20 हजार रूपए है। भोपाल: थाना अयोध्या नगर पुलिस ने उड़ीसा से गांजा लाकर स्कूल, कॉलेज और स्लम एरिया में तस्‍करी करने वाले गिरोह को पकड़ा है। इस कार्यवाही में 2 युवतियों सहित 3 आरोपियों को गिरफ्तार कर 6.285 किलोग्राम गांजा और मोटरसाइकिल सहित लगभग 2 लाख 70 हजार रुपये की संपत्ति जब्त की है। गुना: थाना धरनावदा पुलिस ने 9.941 किलोग्राम गांजे (कीमत 1 लाख 20 हजार रूपए) के साथ 2 तस्करों को गिरफ्तार किया है। नर्मदापुरम: जिले की पिपरिया पुलिस ने ग्राम उंटिया किशोर में गांजे की खेती करने वाले आरोपी को 10 किलो 700 ग्राम अवैध गांजे के साथ गिरफ्तार किया है। जिसकी अनुमानित कीमत लगभग 40 हजार रुपये है। मध्यप्रदेश पुलिस द्वारा मादक पदार्थों के विरुद्ध इस प्रकार की सख्त कार्रवाई निरंतर जारी रहेगी। आमजन से अपील है कि नशे से दूर रहें एवं किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तत्काल पुलिस को दें।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कृषि मंत्री के निवास पर पहुंचकर वर-वधू को दिया आशीर्वाद

भोपाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सोमवार को मुरैना में किसान कल्याण एवं कृषि विकास मंत्री ऐदल सिंह कंषाना के निवास पहुंचकर उनकी नातिनी आयुष्मति दीपिका (पुत्री स्वर्गीय भूरा सिंह कंषाना) एवं आयुष्मान यतेन्द्र (पुत्र राव राजेश्वर सिंह, निवासी सिरसौद दयेली, ग्वालियर) को विवाह अवसर पर आशीर्वाद प्रदान किया। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने नवदंपति को शुभाशीष देते हुए उन्हें उपहार भी भेंट किए और उनके सुखद एवं समृद्ध वैवाहिक जीवन की कामना की। इस अवसर पर वरिष्ठ विधायक एवं प्रदेशाध्यक्ष श्री हेमंत खंडेलवाल, सांसद शिव मंगल सिंह तोमर, महापौर श्रीमती शारदा सोलंकी सहित जनप्रतिनिधि एवं परिजन उपस्थित थे।  

पानी बचाना हमारी जरूरत भी है और जिम्मेदारी भी : मुख्यमंत्री डॉ. यादव

‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ से प्रदेश में जल संरक्षण को मिली नई गति राष्ट्रीय स्तर पर तीसरे स्थान पर पहुंचा मध्यप्रदेश भोपाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि प्रदेश में जल संरक्षण को जन-आंदोलन बनाया जा रहा है। पानी बचाना बेहद जरूरी है। यह हमारी सामाजिक जिम्मेदारी भी है, जिससे हमारी आने वाली पीढ़ियां प्रकृति के इस अनमोल वरदान से कभी भी कमी महसूस नहीं करें। इसके लिए हमें अपने वर्तमान जल स्रोतों के साथ सूख चुके जल स्रोतों को संरक्षित करना ही होगा। उन्होंने कहा कि पानी बचाने के लिए प्रदेश में जल गंगा संवर्धन अभियान चलाया जा रहा है। सरकार और समाज के साझा प्रयासों से हो रहे इस अभियान में बीते एक माह में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने प्रदेश के सभी नागरिकों से इस अभियान में सक्रिय सहभागिता का आह्वान किया है। प्रदेश में संचालित ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ ने अल्प समय में ही उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। विगत 19 मार्च 2026 से प्रारंभ हुआ यह अभियान जल संरक्षण, जल संरचनाओं के संवर्धन और जनभागीदारी का एक व्यापक जन-आंदोलन बनता जा रहा है। इस अभियान के प्रभाव से ही मध्यप्रदेश राष्ट्रीय स्तर पर अपनी रैंकिंग सुधारकर अब तीसरे स्थान पर आ गया है। अभियान से पहले मध्यप्रदेश नेशनल रैंकिंग में छठवें स्थान पर था। राज्य सरकार द्वारा आगामी 30 जून तक चलाए जा रहे इस अभियान में 16 विभागों की 58 गतिविधियां नियत की गई हैं। इसके लिए लगभग 6 हजार 278 करोड़ रुपये का वित्तीय लक्ष्य तय किया गया है। इस अभियान में कुल 2 लाख 44 हजार से अधिक जल संरक्षण एवं संवर्धन कार्यों को चिन्हित कर लगभग 6 हजार 236 करोड़ रुपये की लागत से विकास कार्यों का क्रियान्वयन किया जा रहा है। अभियान की मॉनिटरिंग एकीकृत डैश बोर्ड से आयुक्त, मनरेगा ने बताया कि अभियान की एक ही प्लेटफार्म पर नियमित मॉनिटरिंग के लिए एक एकीकृत डैश बोर्ड तैयार किया गया है, जिससे सभी विभाग अपनी-अपनी विभागीय गतिविधियों की प्रगति दर्ज कर रहे हैं। इस डैश बोर्ड से जिलेवार रैंकिंग भी सुनिश्चित की जा रही है। इस डैश बोर्ड से प्रशासनिक एवं विभागीय पारदर्शिता और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को भी बढ़ावा मिल रहा है। प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। अभियान अंतर्गत 39 हज़ार 977 खेत तालाबों का निर्माण, 59 हज़ार 577 कूप-रीचार्ज संरचनाओं तथा 21 हज़ार 950 से अधिक पहले से निर्मित जल संरचनाओं को पुनर्जीवित भी किया गया है। इसके साथ ही अमृत सरोवरों के निर्माण और उनके उपयोग को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। नगरीय क्षेत्रों में जल संरक्षण नगरीय क्षेत्रों में भी जल संरक्षण को लेकर व्यापक कार्य किए जा रहे हैं। नगरीय विकास एवं आवास विभाग द्वारा तालाब, कुएं और पुरानी बावड़ियों के संवर्धन, नालों की सफाई और सौंदर्यीकरण तथा रैन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम की स्थापना जैसे कार्य तेजी से किए जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त तेज़ गर्मी को देखते हुए नगरीय निकायों द्वारा विभिन्न स्थानों पर प्याऊ की स्थापना भी की गई है। म.प्र. जन अभियान परिषद चला रही जनजागरूकता गतिविधियाँ म.प्र. जन अभियान परिषद के माध्यम से राज्य में जल संरक्षण को लेकर व्यापक जन जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए। इन कार्यक्रमों में 5 लाख 25 हजार से अधिक व्यक्तियों की सक्रिय सहभागिता दर्ज की गई। साथ ही प्रदेश के विभिन्न विकासखंडों में 2 हज़ार 682 जल मंदिर (प्याऊ) स्थापित किए गए हैं। स्कूलों में जागरूकता गतिविधियां स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा भी इस अभियान में व्यापक तौर पर भागीदारी की जा रही है। राज्य के हजारों विद्यालयों में जल रैलियां, निबंध, पोस्टर प्रतियोगिताएं और संवाद कार्यक्रम आयोजित कर विद्यार्थियों और अभिभावकों को जल संरक्षण के प्रति जागरूक किया गया है। तकनीकी नवाचार अंतर्गत वॉटरशेड विकास कार्यों की रियल टाइम मॉनिटरिंग, ऑनलाइन स्वीकृति और मोबाइल ऐप आधारित ट्रैकिंग प्रणाली लागू की गई है, जिससे कार्यों की गुणवत्ता और प्रशासनिक पारदर्शिता भी सुनिश्चित हो रही है। वन और पर्यावरण विभाग द्वारा भी जल संरक्षण के साथ पारिस्थितिकीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए विभिन्न फील्ड गतिविधियां की जा रही हैं। नदियों के जल की गुणवत्ता का परीक्षण, जल संरचनाओं का निर्माण तथा पौधरोपण की तैयारी जैसे कार्य इसमें शामिल किए गए हैं। राज्य सरकार द्वारा सतत् मॉनिटरिंग और नियमित रूप से समीक्षा की जा रही है। इससे धरातल पर मौजूद व्यावहारिक कमियों को दूर करने में भी मदद मिल रही है। ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ से मध्यप्रदेश में जल संरक्षण की दिशा में ठोस परिणाम मिलने शुरू हो गए है। मध्यप्रदेश सरकार की यह पहल देश के दूसरे राज्यों के लिए एक अनुकरणीय मॉडल बनती जा रही है।