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सावधान! खतरनाक मोबाइल वायरस बिना OTP बैंक खाते से काट सकता है पैसे—जानें बचाव के तरीके

नई दिल्ली एंड्रॉयड स्मार्टफोन यूजर्स को सावधान हो जाना चाहिए। एक नया Albiriox वायरस उनका बैंक अकाउंट खाली कर सकता है। इस मैलवेयर के जरिए हैकर्स यूजर के बैंकिंग ऐप तक आसानी से पहुंचकर उनका डेटा चुरा रहे हैं। खतरनाक बात तो ये यह है कि वे बिनी ओटीपी के ही लेनदेन भी कर रहे हैं। यह मैलवेयर, हैकर्स को यूजर की पर्सनल डिटेल के बिना ही उनके बैंकिंग ऐप से पैसे ट्रांसफर करने दे रहा है। मैलवेयर नकली ऐप्स और क्लोन किए गए प्ले स्टोर लिस्टिंग के जरिए फैल रहा है। डार्क वेब फोरम पर सब्सक्रिप्शन बेस्ड टूलकिट के तौर पर यह वायरस साइबर अपराधियों को बेचा जा रहा है। बता दें कि एंड्रॉयड बैंकिंग मैलवेयर पर नजर रखने वाली फ्रॉड प्रिवेंशन फर्म क्लीफी (Cleafy) से ये जानकारी मिली है। फैलता ही जा रहा है मैलवेयर इस वायरस को ऐसे बेचा जा रहा है कि यह बढ़ता ही चला जा रहा है। जांचकर्ताओं का कहना है कि इस ट्रोजन को मैलवेयर-एज-ए-सर्विस (Malware-as-a-Service) के रूप में बेचा जा रहा है। यह एक ऐसा मॉडल है, जहां हैकर्स बस सब्सक्रिप्शन लेते हैं, मैलवेयर डाउनलोड करते हैं और उसे काम पर लगा देते हैं। हैकर्स ऐसे इंस्टॉल कराते हैं वायरस Cleafy के रिसर्चर को पहले हुए कुछ हमलों जैसा एक पैटर्न समझ आया, तब उन्हें Albiriox के बार में पता चला। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हैकर्स नुकसान पहुंचाने वाली एपीके (APK) फाइलों को सामान्य ऐप्स के रूप में दिखाते हैं, जिससे यूजर्स उन्हें मैन्युअल रूप से इंस्टॉल करने लग जाते हैं। ये एपीके फाइलें नकली ऐप से लेकर व्हाट्सऐप और टेलीग्राम मैसेज के जरिए शेयर की जाती हैं। यूजर्स को ऑफर का लालच देकर ये फाइल उन्हें अपने जाल में फंसाती हैं। सीधा ऐप पर करता है अटैक सबसे पहले हैकर्स यूजर्स को इतना मजबूर कर देता है कि उसे अननॉन ऐप्स को इंस्टॉल करने की मंजूरी देनी पड़ती है। इसके बाद, बैकग्राउंड में छिपा हुआ इंस्टॉलर असली ट्रोजन को चुपके से डाल देता है। एक्टिव हो जाने के बाद यह पासवर्ड नहीं चुराता है। यह सीधे बैंकिंग, डिजिटल पेमेंट, फिनटेक और यहां तक कि क्रिप्टो ऐप्स की तरह बढ़ता है। यह तरीका साइबर अपराधियों बैंकिंग ऐप का इस्तेमाल यूजर की तरह कर पाते हैं। बिना ओटीपी खाली हो जाता है अकाउंट बैंकिंग ऐप का इस्तेमाल करने के लिए न तो उन्हें लॉगिन क्रेडेंशियल की जरूरत पड़ती है और न ही ओटीपी की। बता दें कि ये सब एंड्रॉयड की एक्सेसिबिलिटी टूल्स का इस्तेमाल करके बैकग्राउंड में होता है। इस कारण लोगों को कुछ भी अजीब नहीं लगता है। पहले ही 400 से ज्यादा ऐप्स पकड़े गए एंड्रॉयड अथॉरिटी की रिपोर्ट के अनुसार, रिसर्चर ने पहले ही 400 से ज्यादा ऐसे नकली ऐप्स को पकड़ा है, जो सभी वित्तीय सेवाओं की तलाश करने वाले लोगों को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किए गए हैं। बचने के लिए ध्यान रखें ये बातें     हमेशा ध्यान रखें कि केवल आधिकारिक प्ले स्टोर से ऐप्स इंस्टॉल करें। लिंक, फॉरवर्ड किए गए मैसेज या वेबसाइटों के जरिए शेयर किए गए APK फाइल डाउनलोड करने से बचें।     अपने फोन की सेटिंग्स में जाकर install unknown apps ऑप्शन को डिसेबल रखें।     अपने स्मार्टफोन पर उन ऐप्स की जांच करें, जिन्हें आप इंस्टॉल करना याद नहीं रखते हैं। खासकर वे जो बैंकिंग या वित्त से संबंधित हों।     गूगल प्ले प्रोटेक्ट का ऑन रखें। यह आपके डिवाइस को मैलवेयर से बचाने में मदद करता है।     जब भी कोई सॉफ्टवेयर अपडेट उपलब्ध हो, तो अपने एंड्रॉयड फोन को अपडेट करें। ​​

संतरा vs किन्नू: विंटर सीज़न का हेल्थ चैंपियन कौन? पूरी गाइड अंदर

सर्दियां आते ही बाजार में दो फलों की भरमार दिखने लगती है संतरा और किन्नू। देखने में दोनों एक जैसे लगते हैं, स्वाद में भी काफी मिलते-जुलते हैं, लेकिन सेहत की बात आए तो लोग अक्सर उलझ जाते हैं कि आखिर सर्दियों में कौन सा फल ज्यादा फायदेमंद है और किसे ज्यादा तवज्जो देनी चाहिए? विटामिन C से भरपूर ये दोनों फल इम्यूनिटी बढ़ाने, त्वचा को ग्लो देने और सर्दी-खांसी से बचाने में मदद करते हैं, लेकिन फिर भी इनके पोषक तत्वों, स्वाद और शरीर पर असर में थोड़ा फर्क होता है। अगर आप भी यही सोचकर कंफ्यूज रहते हैं कि सुबह जूस में क्या पिएं, बच्चों के टिफिन में क्या रखें या डाइट में कौन सा फल शामिल करें तो आज हम आसान भाषा में समझेंगे कि किन्नू और संतरे में कौन ज्यादा पौष्टिक है, कौन सा किन पोषक तत्वों से भरपूर है, किसे कब खाना चाहिए और सही तरीके से खाने पर इनका फायदा कैसे दोगुना किया जा सकता है। संतरा और किन्नू में अंतर दिखने में एक जैसे होने के बावजूद संतरा और किन्नू में कई अंतर हैं। संतरे का छिलका पतला होता है और इसका स्वाद हल्का खट्टा-मीठा होता है। इसमें फाइबर की मात्रा अधिक पाई जाती है, जिससे यह पाचन को सुधारने और कब्ज की समस्या दूर करने में मदद करता है। वहीं किन्नू का छिलका थोड़ा मोटा होता है और स्वाद अधिक मीठा व रसदार होता है। किन्नू में प्राकृतिक शुगर और जूस की मात्रा अधिक होने के कारण यह शरीर को ऊर्जा और हाइड्रेशन प्रदान करने में विशेष रूप से लाभदायक है। सर्दियों में कौन सा फल ज्यादा फायदेमंद? स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से दोनों फल अपने-अपने तरीके से फायदेमंद हैं। यदि किसी को अक्सर सर्दी-खांसी, कमजोरी या पाचन संबंधी समस्या रहती है तो संतरा बेहतर विकल्प माना जाता है क्योंकि इसमें फाइबर और विटामिन C अधिक पाया जाता है। दूसरी ओर, यदि आप त्वचा की नमी बनाए रखना चाहते हैं, थकान से जूझ रहे हैं या शरीर को प्राकृतिक ऊर्जा देना चाहते हैं तो किन्नू ज्यादा कारगर सिद्ध होता है। इसलिए, सबसे अच्छा विकल्प है कि दोनों को आहार में बारी-बारी शामिल किया जाए ताकि शरीर को संपूर्ण पोषण मिल सके। किसे कौन सा फल चुनना चाहिए हर व्यक्ति के शरीर की जरूरत अलग होती है, इसलिए फल का चयन उसी आधार पर करना चाहिए। डायबिटीज वाले लोगों के लिए संतरा बेहतर माना जाता है, क्योंकि इसमें शुगर की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है। जो लोग वजन घटाने की कोशिश कर रहे हैं, उनके लिए भी संतरा अधिक उपयोगी है, क्योंकि इसमें फाइबर अधिक और कैलोरी कम होती है। वहीं बच्चों, कमजोरी से जूझ रहे लोगों और डिहाइड्रेशन की समस्या वाले व्यक्तियों के लिए किन्नू का सेवन अधिक लाभकारी है, क्योंकि यह अत्यधिक रसदार और ऊर्जा देने वाला होता है। सही समय और सही तरीकासही समय और सही तरीका संतरे खाने के फायदे संतरा विटामिन C से भरपूर होता है, जो शरीर की इम्यूनिटी को मजबूत बनाता है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट त्वचा के लिए बेहद लाभदायक होते हैं और चेहरे पर प्राकृतिक चमक लाते हैं। संतरा फाइबर का बेहतरीन स्रोत है, इसलिए यह पाचन तंत्र को मजबूत करता है और कब्ज की समस्या से राहत देता है। इस फल में पाए जाने वाले पोटेशियम और मैग्नीशियम हाई बीपी को कंट्रोल करने में सहायक होते हैं। संतरे का सेवन किडनी स्टोन और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के जोखिम को भी कम करता है। कम कैलोरी होने की वजह से यह वजन घटाने वालों के लिए एक बेहतरीन विकल्प माना जाता है। किन्नू खाने के फायदे किन्नू भी संतरे की तरह विटामिन C से भरपूर होता है और इम्यूनिटी को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाता है। किन्नू शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करता है और हृदय को स्वस्थ बनाए रखता है। इसमें मौजूद कैल्शियम और अन्य पोषक तत्व हड्डियों को मजबूत बनाते हैं। किन्नू में मौजूद फाइबर पाचन क्रिया को सुधरता है और कब्ज की समस्या से राहत दिलाता है।

सावधान रहें! Kinder Chocolate के बाद बीमारी का कहर, 150+ लोग हुए बीमार

बच्चों में बेहद लोकप्रिय Kinder Chocolates को लेकर एक बड़ी स्वास्थ्य चेतावनी जारी की गई है। यूरोप के कई देशों में इन चॉकलेट्स के सेवन के बाद साल्मोनेला संक्रमण के मामले सामने आए हैं जिसके चलते 150 से ज़्यादा लोग बीमार पड़ गए हैं। बीमार पड़ने वालों में ज़्यादातर छोटे बच्चे शामिल हैं। बेल्जियम की फैक्ट्री से फैला संक्रमण संक्रमण के कारण कुछ बच्चों को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया है हालांकि राहत की बात यह है कि अभी तक किसी की मौत की खबर नहीं है। जांच से पता चला है कि यह संक्रमण बेल्जियम की एक फैक्ट्री से फैला है। उत्पादन के दौरान स्वच्छता और गुणवत्ता जांच में हुई चूक के कारण यह बैक्टीरिया चॉकलेट में फैल गया। नतीजतन, किंडर चॉकलेट बनाने वाली कंपनी ने कई अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों से प्रभावित बैचों को वापस मंगाने का फैसला किया है। भारत में सुरक्षित हैं उपभोक्ता इस अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य चेतावनी के बाद भारत को लेकर भी चिंताएं जताई जा रही थीं लेकिन भारतीय उपभोक्ताओं के लिए एक अच्छी खबर है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने पुष्टि की है कि दूषित बैच भारत में आयातित नहीं किए गए थे। इसका मतलब है कि भारतीय उपभोक्ता इस प्रकोप से पूरी तरह सुरक्षित हैं। डॉक्टरों की सलाह स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि साल्मोनेला संक्रमण बच्चों और बुजुर्गों के लिए विशेष रूप से खतरनाक हो सकता है। यह पेट से जुड़ी गंभीर बीमारियां पैदा करता है। लोगों को वापस बुलाए गए उत्पादों का सेवन करने से बचने की सलाह दी जाती है और अगर इन्हें खाने के बाद दस्त, उल्टी या बुखार जैसे कोई भी लक्षण दिखाई दें तो तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।  

गूगल सर्च रिपोर्ट 2025: गोवा और कश्मीर को छोड़, इस छोटे शहर को भारतीय यात्रियों ने ज्यादा सर्च किया

 नई दिल्ली आज के दौर में घूमना-फिरना सिर्फ शौक नहीं, बल्कि एक जरूरी हिस्सा बन गया है. सोशल मीडिया खोलिए तो हर कोई दुनिया के किसी न किसी कोने में घूमता दिख जाएगा. साल 2025 खत्म होने को है, गूगल ने अपनी सालाना सर्च रिपोर्ट जारी की है. यह रिपोर्ट बताती है कि भारतीयों के दिल में कौन सी जगह सबसे ज्यादा बसी हुई है. हैरानी की बात यह है कि इस बार न तो गोवा के समुद्र तटों को सबसे ज्यादा खोजा गया और न ही कश्मीर की बर्फ से ढकी चोटियों को. 2025 में भारतीयों ने कुंभ नगरी को सर्च किया. गूगल की यह लिस्ट बताती है कि भारतीय यात्री अब सुकून और अनुभवों की तलाश में हैं, और इसी तलाश ने एक बड़े धार्मिक आयोजन को देश की सबसे बड़ी ट्रैवल सर्च बना दिया. चलिए जानते हैं कि 2025 में किस जगह ने भारतीयों को सबसे ज्यादा आकर्षित किया, और बाकी कौन-कौन से डेस्टिनेशन ट्रेंड में रहे. महाकुंभ बना भारत का सबसे बड़ा ट्रैवल डेस्टिनेशन अगर आप सोचते हैं कि भारतीयों ने सबसे अधिक वियतनाम या मालदीव को खोजा होगा, तो आप गलत हैं. दरअसल 2025 में भारत की सबसे ज्यादा ट्रेंडिंग ट्रैवल सर्च थी महाकुंभ मेला. महाकुंभ ने न सिर्फ घूमने-फिरने वाली जगहों की लिस्ट में पहला स्थान पाया, बल्कि यह पूरे साल की टॉप ट्रेंडिंग न्यूज और सर्च में भी शामिल रहा. महाकुंभ 2025 देश के लिए एक बहुत बड़ा इवेंट साबित हुआ. इसने साफ कर दिया कि भारत में अब आध्यात्मिक पर्यटन कितना मजबूत हो चुका है. ट्रैवल एक्सपर्ट्स का मानना है कि महाकुंभ ने भारत को ग्लोबल आध्यात्मिक नक्शे पर मजबूती से जगह दिलाई है. इस साल की शुरुआत में इंडिया टुडे से बात करते हुए, द विट्स कामट्स ग्रुप के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक डॉ. विक्रम कामत ने 2025 के महाकुंभ को आध्यात्मिक पर्यटन के लिए एक क्रांतिकारी बदलाव बताया था. पहले जहां माना जाता था कि धार्मिक यात्राएं सिर्फ बुजुर्गों के लिए होती हैं, वहीं इस महाकुंभ ने युवा पीढ़ी को भी बड़ी संख्या में अपनी तरफ खींचा है. युवा भी जुड़े जड़ों से यह महाकुंभ सिर्फ एक धार्मिक मेला तक सीमित नहीं रहा, बल्कि युवाओं को भारत की पुरानी आध्यात्मिक पंरपराओं से जुड़ने का मौका दिया. यही वजह है कि वाराणसी, ऋषिकेश और बोधगया जैसी जगहों की यात्रा की खोजों में भी तेज उछाल दिखा. इस साल यात्रा सिर्फ मंदिर तक पहुंचने की बात नहीं रही, बल्कि लोग वहां की सांस्कृतिक कहानियां, आर्ट, संगीत, योग और दर्शन की तरफ भी आकर्षित हुए. इस आध्यात्मिक लहर का असर इतना गहरा था कि सोमनाथ जैसा प्रमुख तीर्थस्थल भी टॉप ट्रेंडिंग सर्च लिस्ट में नौवें नंबर पर जगह बनाने में कामयाब रहा. यह साफ दिखाता है कि भारतीय अब सिर्फ मौज-मस्ती नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने और मन की शांति पाने के लिए भी घूमना चाहते हैं. बीच और द्वीप अभी भी ट्रेंड में हांलाकि ऐसा नहीं है कि लोगों ने समुद्र तटों और छुट्टियों वाले द्वीपों को पूरी तरह से भूल दिया. विदेश घूमने के शौकीन भी लिस्ट में नजर आए. गूगल की सर्च लिस्ट से पता चलता है कि साउथ एशिया में लोगों की रुचि काफी बढ़ी है. टॉप ट्रेंडिंग लिस्ट में फिलीपींस दूसरे नंबर पर रहा, जबकि वियतनाम का फु क्वोक छठा और थाईलैंड का फुकेत सातवें नंबर शामिल रहा. वहीं,  मालदीव लिस्ट के आठवें नंबर पर बना रहा. यूरोप की बात करें तो जॉर्जिया अपनी खूबसूरत वादियों, पुराने मठों और शानदार पाक कला की वजह से अंतरराष्ट्रीय पर्यटन में तीसरा सबसे पसंदीदा डेस्टिनेशन बना रहा. कुछ डेस्टिनेशन जो अपनी जगह बनाए रहे दिलचस्प बात यह है कि जहां कई जगहों की सर्च में उतार-चढ़ाव आया, वहीं कुछ जगहें ऐसी रहीं जिन्होंने लगातार अपनी पकड़ बनाए रखी. देश में कश्मीर (5वां स्थान) और विदेश में जॉर्जिया (3रा स्थान) लगातार दूसरी बार लिस्ट में जगह बनाने में कामयाब रहे. 2024 की सर्च में भी ये क्रमशः छठे और नौवें स्थान पर थे, जो इनकी लगातार बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है. इसके अलावा, भारत से पांडिचेरी ने भी टॉप 10 में अपनी जगह बनाई.

चंदखुरी में श्रीराम की विशाल मूर्ति स्थापना की तैयारी तेज, मगर भुगतान बाधा बना रोड़ा

 ग्वालियर  छत्तीसगढ़ के चंद्रखुरी स्थित कौशल्या माता मंदिर में एक बार फिर भगवान श्रीराम की ग्वालियर में तैयार की गई 51 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापना की कवायद तेज हो गई है। ऐसा इसलिए क्योंकि ठेकेदार द्वारा राष्ट्रपति सम्मानित मूर्तिकार दीपक विश्वकर्मा से संपर्क किया गया है। ठेकेदार ने 8 दिसंबर तक उनकी मेहनत की शेष राशि का भुगतान करने की बात दीपक विश्वकर्मा से कही है। हालांकि भुगतान के आश्वासन के बावजूद मूर्तिकार ने ठेकेदार के सामने जो शर्त रखी है उससे एक बार फिर इस मूर्ति की स्थापना में अड़चनें आ सकती है। मुरैना जिले के शनिधाम मन्दिर में स्थापित करना तय दरअसल छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा श्री राम वन पथ गमन तैयार कराया जा रहा है, जहां भगवान श्री राम के वनवासी स्वरूप की मूर्ति को स्थापित किया जाना है। छत्तीसगढ़ सरकार के निर्देश पर ठेकेदार द्वारा राष्ट्रपति सम्मानित ग्वालियर के प्रसिद्ध मूर्तिकार दीपक विश्वकर्मा को भगवान श्रीराम की 51 फीट ऊंची मूर्ति निर्माण करने के निर्देश दिए थे। जिसके बाद ग्वालियर सेंड स्टोन आर्ट एंड क्राफ्ट सेंटर पर मूर्ति का निर्माण कार्य शुरू हुआ जो अब पूरा हो गया। 05 महीने से यह प्रतिमा ठेकेदार के भुगतान न करने से यही रखी रही। ऐसे में मूर्ति के रखरखाव और मूर्तिकार की टीम द्वारा भुगतान की मांग के दबाब के बाद इस प्रतिमा को मुरैना जिले के शनिधाम मन्दिर में स्थापित करना तय किया गया। बकाया 70 लाख 08 दिसम्बर तक भुगतान की बात जिसके कारण छत्तीसगढ़ सरकार के श्री राम वन पथ गमन प्रोजेक्ट में और ज्यादा देरी होने की सम्भवना की स्थिति बनी। इन हालात को देखते हुए मूर्तिकार दीपक विश्वकर्मा से छत्तीसगढ़ के ठेकेदार द्वारा 10 लाख का एडवांस के अलावा बकाया 70 लाख के एमाउंट 08 दिसम्बर तक करने की बात कही है। लेकिन उन्होंने ठेकेदार के सामने शर्त रखी है कि भले ही भुगतान पूरा हो जाये पर उन्हें चंद्रखुरी स्थित कौशल्या मन्दिर में मूर्ति स्थापना की जगह पूरी तरह साफ चाहिए। ठेकेदार को बताया गया है कि मौके पर स्थापित भगवान श्रीराम की मूर्ति को हटाकर ही वनवासी स्वरूप वाली इस मूर्ति को स्थापित किया जा सकेगा। ऐसे में यदि पुरानी मूर्ति नहीं हटाई गई तो यह नई मूर्ति स्थापित होने में देरी होगी। प्रतिमा को चंदखुरी में वर्तमान में स्थापित प्रस्तावित बता दें कि इस प्रतिमा को चंदखुरी में वर्तमान में स्थापित भगवान श्रीराम की प्रतिमा की जगह पर ही स्थापित किया जाना है।वर्तमान में वहां स्थापित भगवान श्रीराम की प्रतिमा का स्ट्रक्चर पूरी तरह से गलत है। उसके निर्माण कार्य में बहुत सारी खामियां सामने आ चुकी है। प्रतिमा के चेहरे से लेकर शरीर के आकार पर गौर किया जाए तो उसमें भगवान श्रीराम के स्वरूप की छवि ही नहीं आती है। शिवरीनारायण और सीता रसोई में स्थापित की जा चुकी छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा पहले भी दो मूर्तियों के ऑर्डर ग्वालियर को दिए जा चुके हैं जो कि श्रीराम वन पथ गमन के लिए शिवरीनारायण और सीता रसोई में स्थापित की जा चुकी है। उन मूर्ति के स्वरूप को देखकर ही ग्वालियर को 51 फीट ऊंची प्रतिमा का आर्डर मिला था। प्रतिमा को ग्वालियर के सेंड स्टोन से तैयार किया गया है, जो अपने आप में देश के अंदर मजबूत पत्थर के रूप में ख्याति प्राप्त है। इसकी तराशी गई प्रतिमा बहुत मजबूत और सुंदर होती है।

YouTube Recap फीचर आया भारत में, देखें सालभर की आपकी वॉच हिस्ट्री का पूरा सार

नई दिल्ली YouTube ने पहली बार Recap फीचर को लॉन्च किया है. ये फीचर काफी हद तक Spotify Wrapped से मिलता है. इसमें यूजर्स को ऐनुअल यूज की एक झलक मिलेगी. यानी पूरे साल आपने क्या देखा या सुना उसकी जानकारी आपको YouTube Recap के जरिए मिलेगी. YouTube Music पर ये फीचर लंबे समय तक मिलता था, लेकिन YouTube ऐप पर ये पहली बार आया है. ये हर यूजर के लिए अलग एक्सपीरियंस के साथ आएगा. इसमें एंड-ऑफ-ईयर पर्सनलाइज्ड समरी मिलेगी. आसान भाषा में कहें, तो YouTube का ये फीचर आपको बताएगा कि आपने पूरे साल उस प्लेटफॉर्म पर क्या देखा है. कंपनी ने बताया, 'YouTube Recap यूनिक तरीके से यूजर के इंटरेस्ट, डीप ड्राइव और मोमेंट्स की जानकारी उनकी यूट्यूब हिस्ट्री के आधार पर देगा.' इस फीचर को आप भारत में भी यूट्यूब ऐप या उसके वेब वर्जन पर एक्सेस कर सकते हैं. इसे रोलआउट कर दिया गया है. अगर आपको ये फीचर अभी नजर नहीं आ रहा है, तो आने वाले दिनों में दिखेगा. इसे एक्सेस करने के लिए आपको बहुत ही सिंपल प्रॉसेस फॉलो करना होगा. सबसे पहले आपको YouTube ओपन करना होगा. आप फोन, टीवी या डेस्कटॉप किसी भी प्लेटफॉर्म पर इसके ऐप या वेब वर्जन को एक्सेस कर सकते हैं.    इसके बाद आपको अपना YouTube Account लॉगइन करना होगा. वैसे ज्यादातर लोगों के फोन पर ये पहले से लॉगइन होगा. यहां आपको होम पेज पर You टैब मिलेगा, उस पर आपको क्लिक करना होगा. यहां आपको हिस्ट्री के ऊपर Recap दिखेगा. इस पर क्लिक करते ही मल्टीपल स्लाइड्स वाली एक वेब स्टोरी प्ले होगी. ये वेब स्टोरी बताएगी कि आपने पूरे साल कौन-सा कंटेंट देखा और किन चैनल्स को ज्यादा एक्सेस किया. आपने कितने चैनल देखें और किस चैनल के कंटेंट को आपने बार-बार देखा है. आप किस तरह के कंटेंट को देखना पसंद करते हैं. इन सब के आधार पर यूट्यूब ये भी बता रहा है कि आप किस तरह के इंसान हैं.

दिखते हैं फिट, लेकिन नसें हो रही हैं ब्लॉक! पहचानें कोलेस्ट्रॉल के ये 5 संकेत

नई दिल्ली कोलेस्ट्रॉल हमारे शरीर के लिए जरूरी होता है, लेकिन यह परेशानी तब बनता है, जब ब्लड में इसकी मात्रा बढ़ जाती है। कोलेस्ट्रॉल लेवल बढ़ने पर यह धीरे-धीरे आर्टरीज में जमा होने लगता है और ब्लॉकेज कर देता है। आमतौर पर हाई कोलेस्ट्रॉल के शुरुआती स्टेज में कोई साफ लक्षण नजर नहीं आते, लेकिन जब स्तर लगातार बढ़ा रहे, तो शरीर कुछ संकेत देने लगता है। आइए जानते हैं हाई कोलेस्ट्रॉल के इन्हीं संकेतों के बारे में। पैरों में दर्द या ऐंठन जब कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है, तो यह पैरों की आर्टरीज में प्लाक जमा कर सकता है, जिससे ब्लड का फ्लो प्रभावित होता है। इस स्थिति को पेरिफेरल आर्टरी डिजीज कहते हैं। इसके कारण चलने-फिरने या सीढ़ियां चढ़ने पर पैरों में दर्द, ऐंठन, भारीपन या सुन्नता महसूस हो सकती है। आराम करने पर यह दर्द कम हो जाता है, लेकिन काम करते वक्त फिर लौट आता है। सीने में दर्द या भारीपन हाई कोलेस्ट्रॉल के कारण दिल तक ब्लड पहुंचाने वाली आर्टरी संकरी हो सकती हैं। इससे सीने में दबाव, जकड़न, भारीपन या दर्द की शिकायत हो सकती है, जिसे एनजाइना कहते हैं। यह दर्द आमतौर पर शारीरिक या भावनात्मक तनाव के समय महसूस होता है और आराम करने पर कम हो जाता है। इसे हल्के में न लें, यह हार्ट अटैक का संकेत भी हो सकता है। सांस लेने में तकलीफ जब कोलेस्ट्रॉल जमाव के कारण दिल की काम करने की प्रभावित होती है, तो शरीर को सही मात्रा में ऑक्सीजनेटेड ब्लड नहीं मिल पाता। इससे सामान्य गतिविधियों जैसे चलने, घर के काम करने या थोड़ी सी मेहनत में भी सांस फूलने लगती है। यह लक्षण हार्ट डिजीज या हार्ट फेल्योर का संकेत भी हो सकता है। त्वचा पर पीले रंग के उभार कई बार हाई कोलेस्ट्रॉल त्वचा पर दिखाई देने लगता है। खासतौर से आंखों के आसपास की त्वचा पर पीले रंग के नरम उभार दिखाई दे सकते हैं, जिन्हें जैंथोमास कहा जाता है। यह चर्बी और कोलेस्ट्रॉल का जमाव होता है और अक्सर हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया वाले लोगों में देखा जाता है। चक्कर आना या संतुलन खोना हाई कोलेस्ट्रॉल दिमाग तक ब्लड पहुंचाने वाली आर्टरीज को प्रभावित कर सकता है। इससे दिमाग को सही मात्रा में  ऑक्सीजन नहीं मिल पाती, जिसके कारण चक्कर आना, सिर हल्का महसूस होना, अचानक संतुलन खोने जैसी स्थिति हो सकती है। ये लक्षण ट्रांजिएंट इस्केमिक अटैक का संकेत भी हो सकते हैं।  

स्टडी में दावा: शुगर के मरीजों की बॉडी में कैंसर सेल्स को मिलती है अतिरिक्त ऊर्जा

लखनऊ डायबिटीज में कैंसर कोशिकाओं को अनुकूल माहौल मिल जाता है। केजीएमयू के अध्ययन में देखा गया कि डायबिटीज और प्रोस्टेट कैंसर से एक साथ पीड़ित व्यक्तियों में इंसुलिन और आइजीएफ- 1 का स्तर सामान्य कैंसर रोगियों की तुलना में लगभग दोगुणा होता है। एचबीएसी का बढ़ा हुआ स्तर सीधे तौर पर कैंसर की गंभीरता से जुड़ा पाया गया। लिपिड प्रोफाइल (कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड) में गड़बड़ी भी कैंसर की आशंका बढ़ा देती है । 300 मरीजों पर अध्ययन शोध में शामिल 100 पुरुष बिनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया (बीपीएच) से, 100 केवल प्रोस्टेट कैंसर से और 100 डायबिटीज के साथ प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित थे। इन सभी के हार्मोनल और मेटाबोलिक प्रोफाइल से निष्कर्ष निकाला गया कि डायबिटीज, प्रोस्टेट कैंसर को अधिक आक्रामक बना देता है। कैंसर को बढ़ावा देने वाले तत्व की अधिकता शोधकर्ताओं ने पाया कि डायबिटीज में इंसुलिन, आइजीएफ – 1, एचबीए | सी और पीएसए का स्तर सामान्य पुरुषों से अत्यधिक ऊंचा रहता है। इंसुलिन और आइजीएफ-1 दोनों ही ऐसे हार्मोन हैं, जो कोशिका वृद्धि को उत्तेजित करते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि सभी मधुमेह रोगियों को प्रोस्टेट कैंसर नहीं होता, परंतु जोखिम सामान्य पुरुषों की तुलना में काफी अधिक रहता है। यह तभी कम हो सकता है, जब शुगर नियंत्रित रखी जाए, वजन सामान्य हो, भोजन संतुलित हो और जीवनशैली सक्रिय हो। प्रोस्टेट के समस्या लक्षण     बार-बार पेशाब लगना     रात में कई बार उठकर पेशाब जाना     पेशाब का फ्लो धीमा होना     पेशाब रुक-रुक कर आना     पेशाब में जलन     निचले पेट या पेल्विस में भारीपन कई बार प्रोस्टेट कैंसर शुरुआती अवस्था में बिल्कुल लक्षणहीन भी रहता है, इसलिए नियमित जांच सबसे महत्त्वपूर्ण है। कब कराएं प्रोस्टेट की जांच     सामान्य पुरुषों को 50 वर्ष के बाद     डायबिटिक वालों को 45 की उम्र के बाद     जिनके परिवार में इसका इतिहास है, उन्हें 40 वर्ष के बाद     पीएसए टेस्ट और डिजिटल रेक्टल एग्जाम (डीआरई) साल में एक बार जरूर कराना चाहिए। यदि शुगर अधिक समय से अनियंत्रित हो या मोटापा अधिक हो तो यह जांच 6-12 महीने में दोहरानी चाहिए। बचाव के आसान तरीके     रोज 30-45 मिनट तेज चाल से चलना     वजन (बीएमआई) के अनुसार रखना     मीठे, तले और प्रोसेस्ड फूड से बचना     फाइबर युक्त भोजन- सलाद, सब्जियां     नियमित ब्लड शुगर और पीएसए जांच विशेषज्ञों का कहना है कि इन उपायों से प्रोस्टेट कैंसर का खतरा कम होता है। सही जीनवशैली और समय पर जांच जरूरी हर डायबिटिक पुरुष को 50 वर्ष की उम्र के बाद प्रोस्टेट की नियमित जांच करानी चाहिए भले ही कोई लक्षण न हों। डायबिटीज के चलते होने वाली सूजन कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती है और डीएनए की मरम्मत प्रणाली को कमजोर करती है। ऐसे में कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने आसानी होती है। डायबिटीज और प्रोस्टेट कैंसर का मेल कैंसर को अधिक खतरनाक बना देता है। मोटे पुरुषों में एस्ट्रोजन बढ़ता है, टेस्टोस्टेरोन घटता है और इंसुलिन प्रतिरोध बढ़ जाता है । इस स्थिति को ही 'मेटाबोलिक सिंड्रोम' कहा जाता है। पेट की चर्बी, हाइ ब्लड प्रेशर, हाइ ट्राइग्लिसराइड, कम एचडीएल (अच्छा कोलेस्ट्राल) और हाइ ब्लड शुगर प्रोस्टेट कोशिकाओं के कैंसर में बदलने की आशंका बढ़ाते हैं। कुछ शोधों में पाया गया है कि मेटफार्मिन जैसी दवाएं कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि धीमा कर सकती है। हालांकि जीवनशैली पर नियंत्रण, वजन प्रबंधन और नियमित जांच सेहतमंद रहने के लिए जरूरी है।  

नॉर्दर्न वर्जीनिया का एशबर्न दुनिया के इंटरनेट ट्रैफिक का 70% संभालता है, AI बिल्डिंग से और तेज़ी

 वर्जीनिया  जैसे ही प्लेन यूएस की राजधानी वॉशिंगटन DC के डलेस एयरपोर्ट के पास पहुंचते हैं, ठीक नीचे एशबर्न है, जिसे डेटा सेंटर एली के नाम से भी जाना जाता है. जहां किसी भी समय दुनिया भर के इंटरनेट ट्रैफिक का लगभग 70 परसेंट आता है. दशकों पहले, उत्तरी वर्जीनिया के इस कोने में खाली प्लॉट, जंगल और खेत अब धीरे-धीरे सबअर्बन डेवलपमेंट से भर गए थे. फिर इंटरनेट आया और डेटा सेंटर बनाने वालों की बाढ़ आ गई. वे टैक्स रेवेन्यू और इन्वेस्टमेंट के वादे के साथ आए, बदले में ऐसे स्ट्रक्चर बनाए गए, जो देखने में भले ही अच्छे न लगें, लेकिन डिजिटली कनेक्टेड दुनिया की रीढ़ थे. यहां क्यों? स्ट्रेटेजिक लोकेशन, मजबूत इंफ्रॉस्ट्रक्चर, बिजनेस के पक्ष में पॉलिसी और सस्ती एनर्जी का कॉम्बिनेशन इसे समझाने में मदद करता है. पेंटागन और अमेरिकी सरकार बस यहीं हैं, साथ ही AOL का हेडक्वॉर्टर भी था, जो शुरुआती वेब जायंट था, जिसने कभी ऑनलाइन होने को डिफाइन किया था. पिछले दो दशकों में इन गुमनाम बिल्डिंगों से एशबर्न को जो फायदे हुए हैं, उन्हें नकारा नहीं जा सकता. डेटा सेंटर के फैलाव के बीच नए स्टोर, रेजिडेंशियल पड़ोस, एक आइस स्केटिंग रिंक और पब्लिक फैसिलिटी है, जो साबित करते हैं कि इस शहर में पैसे की कोई कमी नहीं है. एशबर्न, लाउडाउन काउंटी में है, जो अमेरिका में प्रति व्यक्ति सबसे अमीर काउंटी है. दुनिया भर के शहर वॉशिंगटन के इस उपनगर को भविष्य जीतने के तरीके के तौर पर देख रहे हैं. भले ही दूसरे इसे एक चेतावनी वाली कहानी के तौर पर देखें. अपने 40,000 लोगों में से, अकेले एशबर्न में अभी 40 स्क्वॉयर किलोमीटर (15.4 स्क्वॉयर मील) में 152 डेटा सेंटर चल रहे हैं, और जमीन से और भी बन रहे हैं, यह AI इन्वेस्टमेंट बूम का हिस्सा है, जिससे और भी बड़े स्ट्रक्चर बनाने की होड़ मची हुई है. US सेंसस ब्यूरो के मुताबिक, 2025 में, प्राइवेट कंपनियाँ यूनाइटेड स्टेट्स में डेटा सेंटर बनाने पर हर महीने लगभग $40 बिलियन खर्च कर रही हैं. इसमें से ज़्यादातर बड़े AI प्लेयर्स: Google, Amazon, Microsoft और OpenAI के मेगाप्रोजेक्ट्स पर खर्च हो रहा है. इसकी तुलना में एक दशक पहले यह सिर्फ $1.8 बिलियन था. AFP रिपोर्टर्स को डिजिटल रियल्टी ने एक आम डेटा सेंटर फैसिलिटी का टूर कराया. डिजिटल रियल्टी एक खास रियल एस्टेट कंपनी है जो एशबर्न में 13 डेटा सेंटर चलाती है.     डिजिटल रियल्टी के चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर क्रिस शार्प ने कहा, "हम न सिर्फ वह जगह देते हैं जो आप यहां देख रहे हैं, बल्कि पावर, कूलिंग और कनेक्टिविटी भी देते हैं." किसी भी डेटा सेंटर में सर्वर असल में हमारे ऑनलाइन किए जाने वाले हर काम को जिंदा कर देते हैं. यहां के कंप्यूटर रूम, जो बाहर के लोगों के लिए पूरी तरह ऑफ लिमिट्स हैं. एक क्लाइंट के लिए सर्वर के रैक से भरे होते हैं या छोटे क्लाइंट्स को सर्विस देने के लिए अलग-अलग "केज" में बंटे होते हैं. AI के आने से इंडस्ट्री एक अलग ही लेवल पर पहुंच गई है, जिससे नई चुनौतियां पैदा हो रही हैं, क्योंकि टेक की बड़ी कंपनियां, जो AI के बीच कड़ी टक्कर में फंसी हुई हैं, तेजी से AI-कैपेबल डेटा सेंटर बनाने के लिए दुनिया भर में छानबीन कर रही हैं. इन नई जेनरेशन की बिल्डिंग्स को बहुत ज़्यादा पावर, कूलिंग टेक्नोलॉजी और इंजीनियरिंग की जरूरत होती है. Nvidia के ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स चलाने वाले सर्वर, जो AI की ट्रेनिंग के लिए जरूरी हैं, बहुत ज़्यादा भारी होते हैं, और इनके लिए बड़े और मजबूत स्ट्रक्चर की ज़रूरत होती है, जिन्हें बहुत ज़्यादा बिजली की जरूरत होती है. सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज में एनर्जी सिक्योरिटी एंड क्लाइमेट चेंज प्रोग्राम की डिप्टी डायरेक्टर लेस्ली अब्राहम्स ने कहा, "अगर हम सिर्फ वर्जीनिया के बारे में सोचें, तो पिछले साल सिर्फ डेटा सेंटर्स ने लगभग उतनी ही बिजली इस्तेमाल की जितनी पूरे न्यूयॉर्क शहर में होती है." ChatGPT जैसी टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करने वाले डेटा सर्वर बहुत गर्म होते हैं और उन्हें नई जेनरेशन की लिक्विड कूलिंग की जरूरत होती है. एयर कंडीशनिंग अब यह काम नहीं करेगी और ज़्यादातर मामलों में इसका मतलब है लोकल पानी तक पहुंच। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि नई जरूरतों ने नए कंस्ट्रक्शन को बेचना मुश्किल बना दिया है. एशबर्न में पली-बढ़ी 24 साल की मकेला एडमंड्स ने कहा, "बड़े होते हुए, हमने कुछ डेटा सेंटर देखना शुरू किया, लेकिन सच कहूं तो, इतनी तेजी से नहीं, वे बस हर जगह खुल रहे हैं." उनके परिवार का घर एक सबअर्बन डेवलपमेंट का हिस्सा है जो एक बड़े कंस्ट्रक्शन साइट से सटा हुआ है. एक और दिक्कत यह है कि डेटा सेंटर्स में नौकरियां ज़्यादातर कंस्ट्रक्शन के समय मिलती हैं. हार्ड हैट पहनी टीमें अक्सर चौबीसों घंटे साइट्स पर काम करती हैं. लेकिन एक बार चालू होने के बाद, कई साइट्स पर इंसानी एक्टिविटी बहुत कम होती है. अब्राहम्स ने कहा, "डेटा सेंटर के फायदे लोकल से ज़्यादा रीजनल, नेशनल और ग्लोबल होते हैं." एक बड़े बदलाव में, उत्तरी वर्जीनिया के लोकल नेता अब ज़्यादा कंस्ट्रक्शन लाने का वादा करने के बजाय, एक्सपेंशन को धीमा करने के लिए कैंपेन चला रहे हैं. डिजिटल रियल्टी जैसी कंपनियों के लिए, चुनौती कम्युनिटी के साथ मिलकर उन्हें डेटा सेंटर लाने के लिए तैयार करना है. किसी भी शक के बावजूद, डिमांड कम नहीं हो रही है. शार्प ने कहा, "इस मार्केट में ग्रोथ और डिमांड जबरदस्त है."

शुगर-फ्री प्रोडक्ट्स में मौजूद सोर्बिटोल लिवर को नुकसान पहुंचा सकता है, स्टडी में चेतावनी

 नई दिल्ली आइसक्रीम, डाइट सोडा, च्युइंग गम और अन्य शुगर-फ्री प्रोडक्ट ऐसे होते हैं जो हर उम्र के लोगों को पसंद होती हैं. मार्केट में हों या फिर मॉल में, ये चीजें काफी आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं. एक नई स्टडी के मुताबिक, इन  शुगर-फ्री आइटम्स में कृत्रिम मिठास के लिए सोर्बिटोल का उपयोग होता है जो लिवर के लिए खतरनाक होता है और फैटी लिवर डिजीज का जोखिम बढ़ा सकता है. इस स्टडी ने इन चीजों का इस्तेमाल करने वाले लोगों के मन में सवाल पैदा कर दिया है. क्या कहती है स्टडी? European Medical Journal में पब्लिश हुई स्टडी के मुताबिक, शुगर-फ्री या डाइट प्रोडक्ट में जो सोर्बिटोल होता है, उस स्वीटनर को छोटी आंत में ठीक से तोड़ नहीं पाती जिससे यह लिवर में जाकर फैट जमने की प्रोसेस को बढ़ा देता है और लिवर की कार्यक्षमता को प्रभावित करता है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि ये स्वीटनर सीधे तौर पर तो नहीं लेकिन लंबे समय तक सेवन करने पर नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) का खतरा बढ़ा सकते हैं. रिसर्च कहती है जो रोजाना लगभग 1 कैन डाइट सोडा या शुगर-स्वीटेड ड्रिंक पीने से नॉन-अल्कोहॉल फैटी लिवर डिजीज को जोखिम बढ़ जाता है. ये खतरा डाइट सोडा से लगभग 60% और शुगर ड्रिंक से 50% अधिक होता है. इसलिए एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि पानी या बिना स्वीटनर वाले लिक्विड्स का सेवन करना अधिक सुरक्षित और हेल्दी होता है. सोर्बिटोल और लिवर डिजीज का संबंध रिसर्च में सामने आया है कि हेल्दी आंतों के बैक्टीरिया सोर्बिटोल को तोड़ते हैं लेकिन जब ये बैक्टीरिया कम हो जाते हैं या संक्रमित हो जाते हैं, तब सोर्बिटोल का शरीर में जमाव होना शुरू हो जाता है. यह सोर्बिटोल सीधे लिवर तक पहुंचकर वहां फैट के जमाव का कारण बनता है जिससे नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज का खतरा बढ़ जाता है. इससे पहले की यह बीमारी आमतौर पर शराब से जुड़ी जानी जाती थी, लेकिन अब यह नॉन-अल्कोहॉल फैटी लिवर डिजीज के रूप में अधिक सामान्य हो गई है. डाइट सोडा और शुगर फ्री चीजों से कैसे खतरा? डाइट सोडा और अन्य कम चीनी या शुगर-फ्री ड्रिंक्स के सेवन से भी लिवर की समस्याएं हो सकती हैं क्योंकि इनमें इस्तेमाल होने वाले आर्टिफिशियल स्वीटनर्स और सोर्बिटोल, आंत के बैक्टीरिया के संतुलन को बिगाड़ सकते हैं. यह न केवल लिवर फैट को बढ़ाता है बल्कि मेटाबोलिक सिंड्रोम, टाइप 2 डायबिटीज और दिल की बीमारियों के जोखिम को भी बढ़ा सकता है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि शुगर-फ्री ऑपशंस हमेशा हेल्दी नहीं होते, बल्कि इनसे लिवर डिजीज का जोखिम भी हो सकता है. आइसक्रीम, डाइट सोडा और च्युइंग गम जैसी चीजों में उपयोग हो रहे सोर्बिटोल और अन्य आर्टिफिशियल स्वीटनर्स लिवर की हेल्थ के लिए हानिकारक हो सकते हैं, जिससे इनके सेवन को सीमित करना चाहिए.