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दिल का दौरा बिना दर्द! साइलेंट हार्ट अटैक की पहचान इन 7 संकेतों से करें

क्या आप जानते हैं हर बार हार्ट अटैक आने पर सीने में दर्द नहीं होता? जी हां, हार्ट अटैक बिना किसी साफ लक्षण के भी आ सकता है, जिसे साइलेंट हार्ट अटैक कहा जाता है। यह और भी ज्यादा खतरनाक होता है, क्योंकि इसमें व्यक्ति को शुरुआत में समझ ही नहीं आता कि उसे हार्ट अटैक आ रहा है। साइलेंट हार्ट अटैक में लक्षण इतने हल्के या असामान्य होते हैं कि व्यक्ति इसे अक्सर नजरअंदाज कर देता है या दूसरी समस्याओं से जोड़ देता है। लेकिन ऐसा करना स्थिति को और ज्यादा गंभीर बना देता है और जान बचाने की संभावना कम हो जाती है। आइए जानें साइलेंट हार्ट अटैक की पहचान कैसे कर सकते हैं। साइलेंट हार्ट अटैक के लक्षण कैसे होते हैं?     हल्की बेचैनी या दबाव- सीने में हल्की जकड़न, दबाव या असहजता जो कुछ मिनटों तक रहे और फिर चली जाए। इसे अक्सर सीने में गैस या अपच समझ लिया जाता है।     असामान्य थकान- अचानक आने वाली बहुत ज्यादा थकान या कमजोरी, खासकर महिलाओं में, जो आराम करने के बाद भी न जाए।     सांस में हल्की तकलीफ- बिना किसी कारण के सांस फूलना या सांस लेने में हल्की दिक्कत होना।     अस्पष्ट दर्द- सीने के बजाय जबड़े, पीठ, गर्दन, बाजू या पेट में हल्का दर्द या असहजता महसूस होना।     पसीना आना- अचानक ठंडा पसीना आना, जो आमतौर पर तनाव या मौसम से जोड़कर देखा जाता है।     चक्कर आना या मतली- हल्का चक्कर आना, सिर हल्का महसूस होना या बिना कारण मतली आना।     नींद में खलल- रात में अचानक नींद खुल जाना या बेचैनी के साथ उठना। खतरे के कारण और रिस्क फैक्टर साइलेंट हार्ट अटैक उन लोगों में ज्यादा होता है जिन्हें डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल, मोटापा या स्मोकिंग की आदत होती है। डायबिटीज के मरीजों में नर्व डैमेज के कारण दर्द का अनुभव कम हो जाता है, जिससे साइलेंट हार्ट अटैक की संभावना बढ़ जाती है। साइलेंट हार्ट अटैक का सबसे बड़ा खतरा इसका सबसे बड़ा खतरा यही है कि व्यक्ति को पता ही नहीं चलता कि उसे हार्ट अटैक आया है। बिना इलाज के, दिल की मांसपेशियों को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है और भविष्य में दिल की गंभीर समस्याओं, हार्ट फेलियर या अचानक कार्डिएक अरेस्ट का खतरा बढ़ जाता है।  

रील बनाने वालों के लिए बड़ा अपडेट: Instagram हैशटैग्स को लेकर क्यों है सतर्क

नई दिल्ली  इंस्टाग्राम  पर रील बनाने वाले सावधान हो जाएं। दरअसल, हम लोग इंस्टाग्राम पर रील या फोटो शेयर करते वक्त काफी सारे हैशटैग्स का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन अब हम ज्यादा हैशटैग्स का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे। यह अभी सिर्फ टेस्टिंग फेज में है बता दें कि एक पोस्ट में 30 हैशटैग लगाने की छूट थी, लेकिन DroidApp की एक रिपोर्ट के मुताबिक अब आप अपनी पोस्ट में तीन से ज़्यादा हैशटैग लगाने की कोशिश करेंगे तो इंस्टाग्राम उन्हें रोक देगा और तय सीमा से ज़्यादा टैग न डालने का मैसेज स्क्रीन पर दिखाई देगा है। फिलहाल यह बदलाव हर किसी के लिए लागू नहीं हुआ है। यह अभी सिर्फ टेस्टिंग फेज में है। इसका मतलब है कि इंस्टाग्राम अभी चुपचाप कुछ चुनिंदा यूज़र्स के साथ यह प्रयोग कर रहा है। अगर यह फीचर सफल होता है तो… बता दें कि सोशल मीडिया कंपनियां अक्सर कोई बड़ा बदलाव करने से पहले इसी तरह टेस्टिंग करती हैं ताकि यूज़र्स का रिएक्शन समझा जा सके। अगर यह फीचर सफल होता है तो इसे सभी के लिए लॉन्च किया जा सकता है।  

Ray-Ban Meta Gen 2 भारत में आया—इन-बिल्ट कैमरा, स्पीकर्स और UPI पेमेंट फीचर से लैस स्मार्ट चश्मा

नई दिल्ली फेसबुक की पेरेंटल कंपनी Meta ने भारत में अपना सेकेंड जनरेशन  Ray-Ban Meta Smart Glasses को भारत में लॉन्च किया है. न्यू मॉडल में कंपनी ने Gen 1 मॉडल की तुलना में वीडियो कैपिबिलिटीज को बेहतर किया है. साथ ही बैटरी परफोर्मेंस को बेहतर बनाया गया है और AI फीचर्स को भी अपग्रेड किया है.  इस चश्मे के अंदर कैमरा, स्पीकर्स और आने वाले दिनों में UPI Lite का भी फीचर शामिल किया जा सकेगा. एक बार फीचर शामिल होने के बाद Ray-Ban Meta Smart Glasses से ही पेमेंट संभव हो सकेगी, जिसके लिए यूजर्स को स्मार्ट ग्लासेस पहनकर सिर्फ QR कोड देखने के बाद समांड देनी होगी कि Hey Meta, Scan and Pay. इसके बाद पेमेंट हो जाएगी.  WhatsApp UPI से कनेक्ट करना होगा बैंक  Ray-Ban Meta Smart Glasses से पेमेंट करने के लिए जरूरी है कि यूजर्स को अपने WhatsApp UPI के साथ बैंक को लिंक करना होगा. आने वाले दिनों में इस फीचर्स के बारे में और ज्यादा डिटेल्स शेयर की जाएगी.  Ray-Ban Meta (Gen 2) बेहतर किए फीचर्स और हार्डवेयर  Ray-Ban Meta (Gen 2) ग्लासेस के अंदर हार्डवेयर को बेहतर किया है. न्यू मॉडल के तहत यूजर्स शार्प 3K Ultra HD वीडियो कैप्चर कर सकेंगे और अल्ट्रा वाइड HDR का सपोर्ट मिलेगा, जिससे इमेज और वीडियो क्वालिटी को बेहतर किया है.  Ray-Ban Meta (Gen 2) सिंगल चार्ज में 8 घंटे का बैकअप  बैटरी सिस्टम को बेहतर किया गया है, जिसमें यूजर्स को सिंगल चार्ज में 8 घंटे का बैटरी बैकअप मिलेगा. साथ ही कंपनी ने फास्ट चार्जिंग को शामिल किया है, जिसकी बदौलत सिर्फ 20 मिनट में बैटरी 50 परसेंट तक चार्ज हो जाती है.  Meta AI को किया है बेहतर  न्यू ग्लासेस के अंदर Meta AI असिस्टेंट को और रिफाइन किया गया है, जो डेली यूज में बड़ा ही काम आएगा. यूजर्स को सिर्फ Hey Meta करना होगा, जिसके तुरंत बाद जवाब मिलेगा.  Meta AI में हिंदी सपोर्ट को किया शामिल  भारतीय मार्केट की जरूरत को समझते हुए कंपनी ने फुल हिंदी सपोर्ट शामिल किया गया है. ऐसे में यूजर्स आसानी से हिंदी में Meta AI को कमांड दे सकेंगे और फीचर्स को कंट्रोल कर सकेंगे.  सेलिब्रिटी AI वॉयस इंटिग्रेशन  Meta AI ने हाल ही में सेलिब्रिटी AI वॉयस फीचर को पेश किया था, जिसकी मदद से यूजर्स अपने लोकल सेलिब्रिटी वॉयस के साथ इंट्रैक्शन कर सकेगा. भारत में यूजर्स दीपिका पादुकोण की वॉयस के साथ इंट्रैक्शन कर सकेंगे.  Ray-Ban Meta (Gen 2) की कीमत  Ray-Ban Meta (Gen 2) की भारत में शुरुआती कीमत 39,900 रुये है. इसके टॉप एंड वेरिएंट की कीमत 45,700 रुपये है. 

बच्चों के लिए चेतावनी: 13 साल से पहले स्मार्टफोन से मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ते हैं नकारात्मक असर

नई दिल्ली 13 साल से कम उम्र में स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले बच्चों में युवावस्था में मेंटल हेल्थ संबंधी दिक्कतें पैदा हो सकती हैं. सोमवार को प्रकाशित एक ग्लोबल स्टडी में यह बात सामने आई है, जिसमें एक लाख से ज्यादा युवाओं का डेटा शामिल है. जर्नल ऑफ ह्यूमन डेवलपमेंट एंड कैपेबिलिटीज में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, 18 से 24 साल के उन युवाओं में आत्मघाती विचार, आक्रामकता, भावनात्मक अस्थिरता और कम आत्मसम्मान की शिकायतें ज्यादा देखी गईं, जिन्हें 12 साल या उससे कम उम्र में पहला स्मार्टफोन मिला था. बच्चों को कम उम्र में स्मार्टफोन देना उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है। एक नई ग्लोबल स्टडी में पता चला है कि 13 साल से कम उम्र में पहला स्मार्टफोन पाने वाले युवाओं में बड़े होकर डिप्रेशन, आक्रामकता और खुद को नुकसान पहुंचाने जैसे गंभीर मानसिक स्वास्थ्य जोखिम बढ़ जाते हैं। यह स्टडी 100,000 से ज़्यादा युवा वयस्कों पर की गई है और इसके नतीजे चिंताजनक हैं। यह रिसर्च 'Journal of Human Development and Capabilities' में छपी है। इसमें 18 से 24 साल के 100,000 से ज़्यादा युवाओं के डेटा का विश्लेषण किया गया। रिसर्च में पाया गया कि जिन युवाओं को 12 साल या उससे कम उम्र में पहला स्मार्टफोन मिला, उनमें मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं उन लोगों की तुलना में ज़्यादा थीं जिन्हें बाद में स्मार्टफोन मिला। स्टडी के मुताबिक, 13 साल से पहले स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले युवा वयस्कों में खुद को नुकसान पहुंचाने के विचार, आत्मविश्वास की कमी, भावनाओं को काबू न कर पाना, हकीकत से दूरी और आक्रामक व्यवहार जैसी समस्याएं ज़्यादा पाई गईं। रिसर्च में यह भी सामने आया कि स्मार्टफोन जितनी जल्दी मिला, "माइंड हेल्थ क्वोशेंट" (MHQ) स्कोर उतना ही कम था। उदाहरण के लिए, 13 साल की उम्र में फोन इस्तेमाल करने वालों का औसत स्कोर 30 था, जबकि 5 साल की उम्र में फोन इस्तेमाल करने वालों का औसत स्कोर सिर्फ 1 था। यह नतीजे अलग-अलग देशों और संस्कृतियों में भी देखे गए, जो बताते हैं कि यह सिर्फ सामाजिक प्रभाव नहीं है, बल्कि विकास से जुड़ा एक बड़ा संकेत है। 13 साल की उम्र एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस उम्र में बच्चों का दिमाग तेज़ी से विकसित हो रहा होता है। उनकी पहचान बन रही होती है और वे सामाजिक कौशल सीख रहे होते हैं। ऐसे नाजुक समय में स्मार्टफोन और डिजिटल दुनिया का ज़्यादा इस्तेमाल, असल ज़िंदगी के अनुभवों और मुश्किलों से निपटने के तरीकों पर भारी पड़ सकता है। रिसर्च बताती है कि जितनी जल्दी बच्चे डिजिटल दुनिया में कदम रखते हैं, उतना ही ज़्यादा उनके विकास को खतरा होता है। 13 साल से पहले स्मार्टफोन देने से बच्चों को कई खतरनाक चीज़ों का सामना जल्दी करना पड़ सकता है, जैसे: सोशल मीडिया पर तुलना और दबाव का माहौल। साइबरबुलिंग, उत्पीड़न या गलत कंटेंट का खतरा। देर रात तक स्क्रीन देखने से नींद का डिस्टर्ब होना। बाहरी दुनिया में लोगों से मिलना-जुलना कम होना और परिवार के साथ रिश्ते कमजोर होना। सिर्फ उम्र ही नहीं, लिंग का भी इस पर असर पड़ता है। स्टडी में पाया गया कि जिन लड़कियों को कम उम्र में स्मार्टफोन मिला, उनमें मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं ज़्यादा थीं। 5-6 साल की उम्र में स्मार्टफोन पाने वाली 18-24 साल की 48% लड़कियों ने खुद को नुकसान पहुंचाने के विचार आने की बात कही, जबकि 13 साल की उम्र में फोन पाने वाली ऐसी लड़कियों का प्रतिशत 28% था। लड़कों में यह आंकड़ा 31% से घटकर 20% हो गया। रिसर्च में यह भी पता चला कि जल्दी सोशल मीडिया इस्तेमाल करने की वजह से ही जल्दी स्मार्टफोन मिलने और खराब मानसिक स्वास्थ्य के बीच के लिंक का लगभग 40% हिस्सा समझाया जा सकता है। इसके अलावा, खराब पारिवारिक रिश्ते (13%), नींद की कमी (12%) और साइबरबुलिंग (10%) भी इसके कारण थे। यह स्टडी सिर्फ़ एक अवलोकन (observational) है, यह साबित नहीं करती कि स्मार्टफोन सीधे तौर पर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनते हैं। लेकिन, यह नतीजे आगे और गहरी रिसर्च की ज़रूरत पर ज़ोर देते हैं। हो सकता है कि कुछ बच्चे पहले से ही कुछ मुश्किलों (सामाजिक, पारिवारिक या व्यक्तिगत) का सामना कर रहे हों, जिसकी वजह से उन्हें जल्दी स्मार्टफोन मिल जाता है और बाद में उन्हें ज़्यादा परेशानी होती है। फिर भी, रिसर्चर डिजिटल दुनिया के बच्चों के विकास पर पड़ने वाले असर को समझने और मुश्किलों का सामना कर रहे बच्चों की पहचान करने और मदद करने के तरीके ढूंढ रहे हैं। इस बीच, माता-पिता और स्कूल दोनों ही बच्चों की सुरक्षा में अहम भूमिका निभा सकते हैं। माता-पिता के लिए कुछ सुझाव: स्मार्टफोन देने में देरी करें: रिसर्च के मुताबिक, 13 साल या उससे ज़्यादा उम्र होने तक बच्चों को पर्सनल स्मार्टफोन न देना उनके लंबे समय के मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहतर हो सकता है। स्पष्ट नियम और सीमाएं तय करें: जब भी स्मार्टफोन दें, तो स्क्रीन टाइम, सोशल मीडिया के इस्तेमाल और रात में फोन इस्तेमाल करने पर सीमाएं लगाएं। ऑनलाइन सुरक्षा और व्यवहार के बारे में सिखाएं: बच्चों को बताएं कि ऑनलाइन कैसे व्यवहार करना है, किस तरह के कंटेंट से दूर रहना है, साइबरबुलिंग का जवाब कैसे देना है और असल ज़िंदगी में लोगों से मिलना-जुलना क्यों ज़रूरी है। ऑफलाइन गतिविधियों को बढ़ावा दें: बच्चों को आमने-सामने बातचीत, खेलकूद, हॉबी और पर्याप्त नींद लेने के लिए प्रोत्साहित करें। ये सब चीज़ें मानसिक मजबूती के लिए बहुत ज़रूरी हैं। खुद स्वस्थ फोन इस्तेमाल का उदाहरण पेश करें: बच्चे अपने माता-पिता के व्यवहार से सीखते हैं। अपना स्मार्टफोन इस्तेमाल कम करें और बच्चों के साथ समय बिताएं। इससे एक अच्छा माहौल बनता है। शिक्षकों और स्कूलों के लिए कुछ सुझाव: स्मार्टफोन और सोशल मीडिया की नीतियां लागू करें: स्कूल फोन-फ्री समय या जगहें तय कर सकते हैं, डिजिटल वेलनेस प्रोग्राम चला सकते हैं और छात्रों को ऑनलाइन स्वस्थ व्यवहार के बारे में सिखा सकते हैं। डिजिटल साक्षरता सिखाएं: ऑनलाइन सुरक्षा, खुद को नियंत्रित करना, मीडिया को समझदारी से देखना और सोशल मीडिया के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर के बारे में सबक पढ़ाएं। स्क्रीन-आधारित गतिविधियों के बजाय सामाजिक और सीखने की गतिविधियों को बढ़ावा दें: बच्चों को आमने-सामने बातचीत करने, मिलकर … Read more

Sanchar Saathi ऐप पर केंद्र की चेतावनी, तुरंत अनइंस्टॉल करने के निर्देश

नई दिल्ली केंद्र सरकार द्वारा 'संचार साथी'  नामक साइबर सुरक्षा ऐप को सभी फोन्स में इंस्टॉल करने के निर्देश के बाद उपजे विवाद पर केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने स्थिति स्पष्ट कर दी है। उन्होंने साफ किया है कि यह ऐप अनिवार्य नहीं है और यूज़र्स इसे अपनी मर्ज़ी से डिलीट कर सकते हैं।  डिलीट करने का विकल्प खुला संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस संबंध में बयान जारी करते हुए कहा- "अगर आप संचार साथी ऐप नहीं चाहते हैं तो आप इसे डिलीट कर सकते हैं। यह ऐप वैकल्पिक है।" उन्होंने कहा कि सरकार का कर्तव्य है कि वह इस ऐप को सभी नागरिकों तक पहुंचाए लेकिन इसे अपने डिवाइस में रखना है या नहीं यह पूरी तरह से यूज़र पर निर्भर करता है। विवाद की शुरुआत क्या थी? विवाद की शुरुआत तब हुई जब केंद्र सरकार ने 28 नवंबर को सभी मोबाइल कंपनियों को एक निर्देश जारी किया था। सरकार ने कंपनियों से कहा था कि वे 90 दिनों के भीतर भारत सरकार की साइबर सुरक्षा से जुड़ी ऐप 'संचार साथी' को सभी फोन्स में इंस्टॉल करें। निर्देशों में इस बात को भी सुनिश्चित करने को कहा गया था कि यूज़र्स इस ऐप को खुद से डिलीट या अनइंस्टॉल न कर सकें। विपक्ष का कड़ा विरोध इस खबर के सामने आते ही विपक्ष और कई नागरिक समूहों ने इसका कड़ा विरोध शुरू कर दिया था। कांग्रेस सहित विपक्ष के कई नेताओं ने सरकार के इस कदम को असंवैधानिक और जनता के आजादी के हक का हनन बताते हुए इसे वापस लेने की मांग की थी। विरोध करने वालों ने नागरिकों की निजता पर संभावित खतरे और सरकारी निगरानीको लेकर चिंता व्यक्त की थी। अब केंद्र सरकार की ओर से यह साफ कर दिया गया है कि यूजर्स चाहें तो इस ऐप को डिलीट कर सकते हैं जिससे इस विवाद पर विराम लगने की उम्मीद है।  

लाल या सफेद– किस अमरूद में है ज्यादा न्यूट्रिशन? जानें दोनों के जबरदस्त फायदे

सर्दियों में मिलने वाला अमरूद स्वाद ही नहीं बल्कि सेहत का पावरहाउस माना जाता है। ठंड आते ही मार्किट में अलग-अलग तरह के अमरूद आ जाते हैं। ये खाने में जितने टेस्टी होते हैं उतने ही लाभकारी भी होते हैं। लोग बड़े चटकारे लेकर इन्हें खाते हैं और कुछ तो चाट बना लेते हैं। लेकिन अक्सर लोगों के मन में सवाल रहता है कि लाल अमरूद ज्यादा फायदेमंद है या सफेद अमरूद? दोनों ही तरह के अमरूद पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं, लेकिन उनके गुण और शरीर पर असर में थोड़ा फर्क होता है। ऐसे में लोगों में हमेशा इस बात को लेकर कंफ्यूजन बना रहता है कि आखिर कौन सा अमरूद ज्यादा सेहतमंद है। लाल अमरूद में जहां एंटीऑक्सिडेंट और लाइकोपीन की मात्रा अधिक पाई जाती है, वहीं सफेद अमरूद कैल्शियम, डाइटरी फाइबर और विटामिन C का बेहतर स्रोत है। ऐसे में कौन सा अमरूद आपकी सेहत के लिए बेहतर रहेगा, यह जानना जरूरी है ताकि आप दोनों के फायदे समझकर अपनी डाइट को और भी हेल्दी बना सकें। आइए जान लेते हैं दोनों की तुलना और फायदे विस्तार से। लाल अमरूद के पोषक तत्व और फायदे लाल-लाल अमरूद देखने में जितने सुंदर लगते हैं खाने में भी उतने ही मीठे और टेस्टी होते हैं। आप जान लें कि लाल रंग के अमरूद का रंग इसमें पाए जाने वाले लाइकोपीन (Lycopene) के कारण होता है, जो शरीर को बीमारियों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इनमें लाइकोपीन, विटामिन C और A, एंटीऑक्सिडेंट्स, आयरन और मैग्नीशियम जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। लाल अमरूद के सेहत के लिए लाभ दिल को मजबूत करता है लाल अमरूद में लाइकोपीन पाया जाता है जो हार्ट संबंधी बीमारियों के जोखिम को कम करता है। कैंसर से बचाव में मदद लाल अमरूद में मौजूद एंटीऑक्सिडेंट्स हानिकारक फ्री-रैडिकल्स से बचाते हैं जो कैंसर से बचाव करते हैं। स्किन ग्लो बढ़ाता है लाल अमरूद में मौजूद कोलेजन आपकी स्किन के लिए बहुत लाभकारी होते हैं ये आपके कोलेजन को मजबूत कर त्वचा को चमकदार बनाता है। वजन घटाने में मददगार लाल अमरूद में कम कैलोरी और हाई फाइबर होता है जो वजन घटाने में लाभकारी होता है। सफेद अमरूद के पोषक तत्व और फायदे लाल अमरूद के पोषक तत्वों के बारे में तो आपने जान लिया है अब सफेद अमरूद के पोषक तत्वों के बारे में भी जान लेते हैं। बाजार में सबसे ज्यादा मिलने वाले सफेद अमरूद को पाचन और इम्यून सिस्टम के लिए प्रकृति का अनमोल उपहार माना जाता है। इसमें मुख्य रूप से अत्यधिक विटामिन C, डाइटरी फाइबर, कैल्शियम और पोटैशियम, फोलेट और प्रोटीन जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। सफेद अमरूद के स्वास्थ्य लाभ पाचन तंत्र को मजबूत करता है सफेद अमरूद को खाने से फाइबर कब्ज और बदहजमी में राहत मिलती है। इम्युनिटी बढ़ाता है सफेद अमरूद में विटामिन C भर-भरकर मौजूद होता है जो संक्रमण और जुकाम से बचाता है। हड्डियों को मजबूत बनाता है इसमें कैल्शियम और पोटैशियम की उच्च मात्रा होती है जो हड्डियों को मजबूत बनाने में लाभकारी है। ब्लड शुगर कंट्रोल में मदद डायबिटीज रोगियों के लिए फायदेमंद होता है सफेद अमरूद, आप इन्हें आराम से बिना डरे खा सकते हैं। कौन सा अमरूद सबसे ज्यादा फायदेमंद है? अक्सर लोग पूछते हैं लाल अमरूद खाएं या सफेद कौन से ज्यादा अच्छे होते हैं तो आपने ऊपर आर्टिकल में इनके गुणों के बारे में तो पढ़ लिया है अब ऐसे में ये साफ है कि दोनों ही अमरूद सेहत के लिए लाभकारी हैं। आप अपनी जरूरत के हिसाब से लाल या सफेद अमरूद का सकते हैं।

2 दिसंबर को ही क्यों मनाया जाता है राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस? कारण, इतिहास और महत्व

हर साल 2 दिसंबर को भारत में राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस 2025 के रूप में मनाया जाता है। आपको बता दें कि इसी दिन साल 1984 में भोपाल में गैस त्रासदी हुई थी, जिसमेंजहरीली गैस के कारण हजारों लोगों की जान चली गई थी। तभी से इस दिन को लोगों को प्रदूषण के खतरों के बारे में जागरूकता फैलाना और स्वच्छ एवं स्वस्थ पर्यावरण के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से भारत में राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस के रूप में मनाया जाता है। ऐसे में, आइए आज राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस के मौके पर जानते हैं इससे जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें – क्यों मनाते हैं राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस? भोपाल गैस त्रासदी में अपनी जान गवांने वाले लोगों की याद में हर साल 2 दिसंबर को भारत में राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस के रूप में मनाया जाता है। साल 1984 में इस दिन मध्य प्रदेश के भोपाल में एक बहुत बड़ी औद्योगिक त्रासदी हुई थी। आपको बता दें कि 2 दिसंबर 1984 को भोपाल में यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से निकली जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस ने हजारों लोगों की जान ले ली थी। इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य लोगों को प्रदूषण के खतरों के प्रति जागरूक करना है। राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस का महत्व राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस हमें याद दिलाता है कि प्रदूषण एक व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए कितना हानिकारक हो सकता है। ऐसे में, हर व्यक्ति को इसके महत्व के बारे में पता होना चाहिए। राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य लोगों को प्रदूषण के से होने वाले खतरनाक दुष्प्रभाव के लिए पहले से ही जागरूक करना है। ताकि वह स्वच्छता व पर्यावरण प्रेरित हो सके। यही नहीं लोगों को सरकारी नीतियों से भी अवगत करवाना है, ताकि वह जान सके कि प्रदूषण को कम करने व नियंत्रित करने के लिए सरकार ने इसके लिए क्या-क्या नीति व योजना बनाई है। इसके अलावा, उद्योगों में सुरक्षा मानकों को सुनिश्चित करने के लिए जागरूकता फैलाना भी इस दिन का एक उद्देश्य है। प्रदूषण से बचने के तरीके भारत में प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में अगर आप भी इस प्रदूषण से खुद को स्वस्थ रखना चाहते हैं, तो नीचे बताए उपाय की मदद ले सकते हैं – प्रदूषण से बचने के लिए आपको निजी वाहनों का उपयोग कम करना चाहिए। साथ ही, पब्लिक ट्रांसपोर्ट जैसे मेट्रो व बस आदि का सहारा लेना चाहिए। इससे प्रदूषण भी कम होगा और आप स्वस्थ भी रहेंगे। प्रदूषण से बचने के लिए अपने घर के आसपास ज्यादा से ज्यादा पेड़-पौधे लगाएं। यह कार्बन डाइऑक्साइड को ऑब्जर्व करके ऑक्सीजन छोड़ने में मदद करता है, जिससे प्रदूषण कम होता है और आप स्वस्थ हवा में सांस भी ले सकते हैं। प्रदूषण सिर्फ हवा में नहीं बल्कि पानी में भी होता है। ऐसे, में आप पानी का काम दुरुपयोग करें और अधिक से अधिक पानी को बचाने की कोशिश करें।

हार्ट डिज़ीज़ अलर्ट! अध्ययन में सामने आए भारत के सबसे जोखिम वाले राज्य

भारत में दिल की बीमारी लंबे समय से सबसे बड़ा स्वास्थ्य संकट बनी हुई है, लेकिन बेंगलुरु में हुई एक ताज़ा रिसर्च ने ऐसा सच सामने रखा है जिसने डॉक्टरों और हेल्थ एक्सपर्ट्स को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। देश के अलग-अलग हिस्सों में हार्ट डिज़ीज़ का खतरा समान नहीं है—और दक्षिण भारत इस मामले में ज्यादा संवेदनशील दिखाई दे रहा है। यह बात सिर्फ जीवनशैली या खान-पान तक सीमित नहीं है, बल्कि शरीर के अंदर छिपे उन जेनेटिक बदलावों से जुड़ी है जो सामान्य टेस्ट में भी पकड़ में नहीं आते। रिसर्च में क्या मिला? पीयर-रिव्यूड राष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार, दक्षिण भारत के कई राज्यों में हार्ट डिज़ीज़ से मौतों का जोखिम उत्तर और मध्य भारत की तुलना में अधिक पाया गया। बेंगलुरु की इस स्टडी ने बताया कि दक्षिण भारतीयों में दिल से जुड़ी कुछ गंभीर बीमारियों से जुड़े जेनेटिक वेरिएंट ज्यादा मिलते हैं, जैसे Hypertrophic Cardiomyopathy (HCM)—एक ऐसी स्थिति जिसमें दिल की मांसपेशियां मोटी हो जाती हैं और अचानक हृदयगति रुकने का खतरा बढ़ जाता है। सबसे चिंताजनक बात यह कि ये जेनेटिक बदलाव अक्सर आम जांच में दिखाई नहीं देते। दक्षिण भारत में जोखिम ज्यादा क्यों? स्टडी ने कई कारण बताए— जेनेटिक म्यूटेशन का अधिक पाया जाना दक्षिण भारतीय समुदायों में कुछ विशेष जीन वेरिएंट ज़्यादा मिलते हैं जो दिल की बीमारियों के खतरे को बढ़ाते हैं। शरीर की मेटाबॉलिक बनावट दक्षिण एशियाई लोगों में–     इंसुलिन रेसिस्टेंस जल्दी बढ़ता है     पेट की चर्बी तेजी से जमा होती है     खराब कोलेस्ट्रॉल जल्दी बढ़ जाता है ये सभी हार्ट डिज़ीज़ के बड़े कारण हैं। लाइफस्टाइल का प्रभाव लंबे समय तक बैठना, स्ट्रेस, बाहर का खाना और कम एक्सरसाइज जोखिम को और बढ़ाते हैं। पश्चिमी देशों की टेस्टिंग गाइडलाइन भारत पर फिट नहीं बैठती यूरोप-अमेरिका के आधार पर बनाए टेस्ट भारतीय जीन को पूरी तरह पहचान नहीं पाते, इसलिए कई लोग जोखिम में होने के बावजूद अनजान रहते हैं। भारत के लिए संदेश क्या है? यह रिसर्च साफ कहती है कि पूरे देश के लिए एक समान हेल्थ गाइडलाइन अब काफी नहीं है। हर क्षेत्र की जेनेटिक और लाइफस्टाइल अलग है, इसलिए—     जोखिम पहचानने का तरीका भी अलग होना चाहिए     परिवार में शुरुआती उम्र में हार्ट की बीमारी हो तो जेनेटिक स्क्रीनिंग जरूरी है     ब्लैकआउट, बेहोशी या अचानक चक्कर जैसे सिम्पटम्स को हल्के में न लें दिल को सुरक्षित रखने के आसान उपाय     तैलीय और रिफाइंड फूड कम करें     रोज 30–45 मिनट वॉक या एक्सरसाइज     BP, शुगर और कोलेस्ट्रॉल की नियमित जांच     स्ट्रेस कम करें और 7–8 घंटे की नींद     धूम्रपान और शराब से दूरी     डॉक्टर को फैमिली हिस्ट्री ज़रूर बताएं क्या दक्षिण भारतीयों में खतरा तय है? नहीं— यह सिर्फ रिस्क फैक्टर है, बीमारी की गारंटी नहीं। सही जांच, समय पर स्क्रीनिंग और थोड़े से लाइफस्टाइल बदलाव दिल को लंबे समय तक सुरक्षित रख सकते हैं।

भारत की नई दवा ने बढ़ाई उम्मीदें, कैंसर उपचार होगा और भी प्रभावी

नई दिल्ली लाइफस्टाइल और खानपान की गड़बड़ी ने कई प्रकार की क्रॉनिक बीमारियों का जोखिम बढ़ा दिया है। डायबिटीज, हृदय रोग, हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं अब काफी आम हो गई हैं। कैंसर के मामले भी तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। आंकड़ों से पता चलता है कि कैंसर के कारण हर साल लाखों लोगों की मौत हो जाती है। साल 2022 के आंकड़ों के अनुसार दुनियाभर में कैंसर से लगभग 9.7 मिलियन (97 लाख) मौतें हुईं। विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि साल 2050 तक यह आंकड़ा बढ़कर 18.2 मिलियन (1.82 करोड़) होने का अनुमान है। अध्ययनों से पता चलता है कि कैंसर से होने वाली लगभग एक-तिहाई मौतें तंबाकू-शराब के सेवन, हाई बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) और शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण होती हैं। 2022 में फेफड़े, ब्रेस्ट और कोलोरेक्टल कैंसर के कारण सबसे ज्यादा मौतें हुईं। एक-दो दशकों पहले की तुलना में मेडिकल साइंस में हुई प्रगति और आधुनिक उपचार विधियों ने कैंसर के इलाज को काफी आसान बना दिया है। इसी क्रम में दवा बनाने वाली कंपनी ल्यूपिन को इलाज के लिए असदार मानी जानी वाली दवा के लिए मंजूरी मिल गई है। इससे कैंसर के इलाज की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। कैंसर की दवा को मिली मंजूरी दवा बनाने वाली कंपनी ल्यूपिन ने सोमवार (1 दिसंबर 2025) को बताया कि उसे कैंसर के मरीजों में न्यूट्रोपेनिया के इलाज की बायोसिमिलर दवा के लिए यूएस हेल्थ रेगुलेटर से मंज़ूरी मिल गई है। मुंबई स्थित इस कंपनी ने एक बयान में कहा कि यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने आर्मलुपेग (पेगफिलग्रास्टिम-उन्ने) 6 mg/0.6 mL इंजेक्शन को मंजूरी दे दी है। न्यूलास्टा (पेगफिलग्रास्टिम) इंजेक्शन के बायोसिमिलर के तौर पर इस सिंगल-डोज प्रीफिल्ड सिरिंज से कैंसर के इलाज में मदद मिलने की उम्मीद है। कैंसर का इलाज होगा सस्ता और आसान ल्यूपिन की सीईओ विनीता गुप्ता ने कहा, "यह कदम मरीजों को ज्यादी सस्ती और आसानी से मिलने वाली दवाएं देने के ल्यूपिन के उद्देश्य की दिशा में एक अहम कदम है। हम अगले कुछ वर्षों में बायोसिमिलर का एक मजबूत पोर्टफोलियो लाने की उम्मीद कर रहे हैं, जिससे मरीजो की देखभाल की क्वालिटी बेहतर करने में मदद मिलेगी।  

पलकें, आंखें और गर्दन हिलाने वाला रोबोट: IIT दिल्ली के स्टूडेंट्स की शानदार क्रिएशन

नई दिल्ली  आईआईटी दिल्ली के स्टूडेंट्स ने कमाल कर दिया है. स्टूडेंट ने एक इंसानों जैसा रोबोट बना दिया है, जो रोबोट बड़े-बड़े एक्सपर्ट बनाते हैं. वैसे ही रोबोट को सिर्फ तीन महीने की कड़ी मेहनत के बाद ही दिल्ली आईआईटी के मैथमेटिक्स के स्टूडेंट शिवांश गुप्ता और उनकी टीम द्वारा बनाया गया है. इस रोबोट का एक-एक अंग आपको इंसानों जैसा लगेगा और तो और आगे चलकर जिन लोगों के हाथ पैर कट जाते हैं. उनके लिए भी ये रोबोट के अंग वरदान बन सकते हैं. यह रोबोट देखने में बिल्कुल इंसानों जैसा लगता है. इसकी पलके भी छपकती है. आंखें भी घूमती है. हाथ भी खुलता और बंद होता है. गर्दन भी घूमती है. आईआईटी दिल्ली के स्टूडेंट्स द्वारा इसे सिर्फ तीन महीने में ही तैयार किया गया है. इस तरह काम करता है ये रोबोट स्टूडेंट शिवांश गुप्ता ने बताया कि मैथमेटिक्स प्रथम वर्ष के छात्र-छात्राओं ने मिलकर से बनाया है. 3 महीने लगे इस रोबोट को बनाने में. इसका हाथ इंसानों जैसा ही काम करता है. आंखें भी इंसानों जैसी लगती हैं. गर्दन भी घूमती है. उसका सिर भी है. उन्होंने बताया कि इसे बनाने का उद्देश्य था एक इंसानों जैसा रोबोट बनाना, जो आगे चलकर इंसानों के काम को आसान करे. उसमें इंसानों जैसे फीचर्स हो और जब किसी का घटना दुर्घटना में हाथ कट फट जाता है तो इस इंसानों जैसे दिखने वाले रोबोट का इस्तेमाल कर हम उनके हाथों के अलग-अलग पार्ट्स भी बना सकते हैं, जिससे कोई भी दिव्यांग ना हो. उन्होंने बताया कि अभी यह सिर्फ एक पीस बनाया गया है. अभी इसमें बहुत सुधार की जरूरत है. अभी इसे पूरी तरह से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से भी जोड़ा जाएगा. अभी अलग-अलग टीमों ने मिलकर अलग-अलग चीजों का इस्तेमाल करके इसे बनाया है. इतनी रखी गई है कीमत शिवांश गुप्ता ने बताया कि इसे बनाने में काफी खर्चा आया है. इसलिए इसकी कीमत 10 हजार रुपये रखी जाएगी. मार्केट में जब भी यह मार्केट में आएगा, तो इसको जो भी खरीदना चाहेगा. वो 10 हजार रुपए में खरीदेगा. उन्होंने बताया कि अभी शुरुआती दौर है, आगे चलकर हो सकता है कि कोई बड़ी कंपनी भी से ले ले या हमारे आइडिया को कोई बड़ी कंपनी लेना पसंद करेगी, तो उस हिसाब से इसे बेचा जाएगा.