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चिप्स-बिस्किट से सावधान! प्रोसेस्ड फूड कैसे चुपचाप बिगाड़ रहा है आपकी सेहत?

आधुनिक जीवनशैली ने मोटापे की ऐसी चुनौती दी है, जिससे पार पार पाना आसान नहीं है। इससे डायबिटीज, हार्ट, लिवर और किडनी जैसी बीमारियों का जोखिम बढ़ रहा है। लांसेट ने इसे लेकर अध्ययन की एक श्रृंखला प्रकाशित की है, जिसमें दो बातें स्पष्ट हैं, पहली प्रसंस्करित भोजन (अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड) की प्रचुरता ने हमारे स्वस्थ भोजन के विकल्पों को सीमित कर दिया है और दूसरी, स्वस्थ आहार के लिए व्यक्तिगत से लेकर नीतिगत स्तर तक जागरूक होने की अब अनिवार्यता बढ़ गई है। यह जानते हुए कि इस तरह के भोजन सेहत के लिए नुकसानदेह हैं, फिर भी चिप्स, बिस्किट, पैकेज्ड पेय, इंस्टैंट नूडल्स जैसे तमाम अल्ट्रा प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ हमारी रसोई में जगह बढ़ाते जा रहे हैं। भारत में मोटापा और डायबिटीज बढ़ाने में अल्ट्रा प्रोसेस्ड भोजन सिर्फ एक वजह भर नहीं है, बल्कि प्रमुख कारण हैं। लांसेट के अनुसार, अगर गैर- संचारी रोगों की चपेट में आने से बचना है, तो अल्ट्रा प्रोसेस्ड भोजन को लेकर तुरंत चेतने की आवश्यकता है। जानें अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड के बारे में इस तरह के खाद्य पदार्थों में पांच से अधिक ऐसे घटक होते हैं, जो रसोई में नहीं पाए जाते, जैसे- प्रिजर्वेटिव एडिटिव, डाइ, स्वीटनर और इमल्सीफायर। बिस्किट, पेस्ट्री, सास, इंस्टैंट सूप, नूडल्स, आइसक्रीम, ब्रेड, फिजी ड्रिंक्स जैसे अल्ट्रा प्रोसेस्ड खाद्य कई सारे घरों में लोग रोज प्रयोग करते हैं। अनेक सर्वे बताते हैं कि बड़ी संख्या में लोग अब फाइबर और प्रोटीन के बजाय अत्यधिक शुगर, नुकसानदेह वसा और नमक का सेवन करने लगे हैं। खास बात हैं कि पैकेटबंद और अत्यधिक कैलोरी वाले इस तरह के भोजन छोटे शहरों और गांवों तक पहुंच चुके हैं। 12 तरह की बीमारियों का कारण है अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड लांसेट में प्रकाशित इस समीक्षात्मक अध्ययन में 43 वैश्विक विशेषज्ञों ने 104 अध्ययनों के आधार पर प्रसंस्करित भोजन के दुष्प्रभावों के बारे में विस्तार से बताया है। इससे 12 तरह की संभावित समस्याओं को चिह्नित किया गया है, जिसमें टाइप-2 डायबिटीज, कार्डियोवैस्कुलर किडनी की बीमारी, डिप्रेशन और असामयिक मौत जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। कुछ विज्ञानियों का मानना है कि आज की जीवनशैली के चलते अल्ट्रा प्रोसेस्ड भोजन से मुक्त हो पाना लगभग असंभव है। वहीं, अध्ययन के आलोचकों की मानें तो इससे पुरानी बीमारियों का जोखिम तो बढ़ता है, पर सभी तरह के यूपीएफ से खतरा बढ़ता है, पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता।     28.6 प्रतिशत भारतीय मोटापे की समस्या से जूझ रहे हैं आइसीएमआर इंडिया डायबिटीज (2023) के अध्ययन के मुताबिक।     11.4 प्रतिशत भारतीयों में डायबिटीज और 15.3 प्रतिशत में प्री-डायबिटीज की स्थिति बन चुकी है वर्तमान में।     40 प्रतिशत भारतीयों में पेट के पास वसा का जमाव (एब्डोमिनल ओबिसिटी) हो चुका है।     3.4 प्रतिशत बच्चों में मोटापे की समस्या चिह्नित की गई एनएचएफएस-5 में, वहीं एनएचएफएस-4 में यह आंकड़ा 2.1 प्रतिशत पर था । कैलोरी और पोषण के बीच बढ़ता असंतुलन अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड में शुगर, वसा, नमक की अधिकता होने के चलते स्वाद बढ़ जाता है, जिससे लोग सेवन के लिए आकर्षित होते हैं। इसमें रिफाइंड कार्ब और शुगर की अधिकता के कारण ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता है, जिससे शरीर का इंसुलिन रिस्पांस प्रभावित होता है। मेटाबोलिज्म प्रभावित होने के चलते टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम रहता है। क्यों जरूरी है पारंपरिक भारतीय भोजन सबसे बड़ी समस्या यही है कि अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड तेजी से पारंपरिक भारतीय भोजन यानी अनाज, दालों और सब्जियों की जगह लेता जा रहा है। सही ढंग से तैयार पारंपरिक भारतीय भोजन में फाइबर और सूक्ष्म पोषक तत्वों की प्रचुरता रहती है । इससे मेटाबोलिक समस्या होने की आशंका भी कम होती है।  

हेल्दी समझकर रोज पीते हैं ग्रीन टी? ये 7 साइड इफेक्ट्स कर सकते हैं सेहत खराब

ग्रीन टी को हेल्दी रूटीन का हिस्सा माना जाता है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स, कैटेचिन्स और पॉलीफेनॉल्स शरीर को टॉक्सिन्स से बचाते हैं, मेटाबॉलिज्म बढ़ाते हैं और वजन कम करने में मदद करते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ग्रीन टी सभी के लिए सुरक्षित हो सकती है, क्योंकि कुछ हेल्थ कंडीशन्स में इसका सेवन उल्टा नुकसान पहुंचा सकता है। जी हां, यहां ऐसे ही कुछ लोगों की जानकारी दी गई है जिनको ग्रीन टी से परहेज करना चाहिए । आइए जानते हैं। प्रेग्नेंट महिलाएं ग्रीन टी में कैफीन और टैनिन्स मौजूद होते हैं, जो गर्भावस्था में फोलिक एसिड के एब्जॉर्पशन को कम कर सकते हैं। इससे भ्रूण में न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा अधिक कैफीन प्रीमैच्योर डिलीवरी या कम वजन वाले बच्चे का कारण भी बन सकता है। ब्रेस्टफीडन कराने वाली महिलाएं कैफीन मां के दूध में पहुंचकर शिशु में नींद की कमी, चिड़चिड़ापन और पेट की समस्या पैदा कर सकता है। खासकर नवजात शिशुओं के लिए यह असर ज्यादा हानिकारक हो सकता है। कैफीन सेंसिटिव लोग जो लोग कैफीन के प्रति संवेदनशील होते हैं, उन्हें थोड़ी सी मात्रा में भी घबराहट, दिल की धड़कन बढ़ना, कंपकंपी और चक्कर हो सकती है। उनके लिए ग्रीन टी का नियमित सेवन समस्या को बढ़ा सकता है। एनीमिया पेशेंट ग्रीन टी में मौजूद टैनिन्स आहार से मिलने वाले आयरन के एब्जॉर्पशन को बाधित करते हैं। इससे आयरन की कमी और गंभीर हो सकती है, खासकर अगर मरीज पहले से ही हीमोग्लोबिन के लो लेवल से जूझ रहा हो। पेट या लिवर की समस्या वाले लोग खाली पेट ग्रीन टी पीने से पेट में एसिडिटी, गैस, मितली और जलन की समस्या बढ़ सकती है। कुछ मामलों में ज्यादा मात्रा में सेवन लिवर एंजाइम्स पर नकारात्मक असर डालकर लीवर डैमेज का खतरा भी बढ़ा देता है। ब्लड प्रेशर या हार्ट पेशेंट्स ग्रीन टी में मौजूद कैफीन ब्लड प्रेशर और हार्ट रेट को प्रभावित कर सकता है। साथ ही यह कुछ हार्ट डिजीज की दवाओं के असर को भी बदल सकता है, जिससे मरीज की हालत बिगड़ सकती है। ब्लड थिनर दवा लेने वाले लोग ग्रीन टी में मौजूद विटामिन के, ब्लड थिनर दवाओं (जैसे वारफेरिन) के असर को कम कर देता है, जिससे ब्लड क्लोटिंग का खतरा बढ़ सकता है। ग्रीन टी फायदेमंद है, लेकिन सही व्यक्ति और सही मात्रा में। अगर आपको यहां बताई गई समस्याएं या इनमें से एक हैं, तो डॉक्टर से सलाह लिए बिना इसका सेवन न करें। याद रखें, हेल्दी ड्रिंक भी गलत परिस्थिति में हानिकारक बन सकती है।  

Google Meet अचानक ठप — मीटिंग्स रुकीं, यूजर्स सोशल मीडिया पर जताई नाराज़गी

नई दिल्ली  गूगल का पॉपुलर फ्री वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग प्लेटफॉर्म Google Meet भारत में ठप हो गया है। इसकी शिकायत करने के लिए यूजर्स ने सोशल मीडिया का सहारा लिया। भारत के सैंकड़ों यूजर्स इस आउटेड से प्रभावित हुए हैं। इस आउटेज के कारण कई यूजर्स वीडियो कॉल में शामिल नहीं हो पाए या उसे होस्ट नहीं कर पाए क्योंकि प्लेटफॉर्म में बड़े पैमाने पर आउटेज हुआ। यूजर्स का कहना है कि स्क्रीन पर “502, that’s an error” मैसेज दिखाई दे रहा है।   67% यूजर्स ने वेबसाइट से जुड़ी दिक्कतों को फ्लैग किया आउटेड को ट्रैक करने वाली वेबसाइट डाउनडिटेक्टर ने दोपहर 12:08 बजे तक 1700 आउटेज रिपोर्ट रिकॉर्ड की थीं, जिसमें 67% यूजर्स ने वेबसाइट से जुड़ी दिक्कतों को फ्लैग किया और 32% ने सर्वर से जुड़ी दिक्कतों की रिपोर्ट की, जिससे गूगल मीट के खिलाफ शिकायतों में तेजी से बढ़ोतरी दिखती है। यह एक हफ्ते बाद हुआ जब Cloudflare में एक बड़ी टेक्निकल दिक्कत के बाद इंटरनेट के कई हिस्से डाउन हो गए थे।   एक्स पर शिकायत कर रहे यूजर्स सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर यूजर्स शिकायत कर रहे हैं, जिससे पता चलता है कि यह समस्या बड़े पैमाने पर है। लोग पूछ रहे हैं क्या “Google Meet सबके लिए डाउन है?” और “Google Meet डाउन क्यों है??” कई ट्वीट में @GoogleIndia को टैग करके सफाई मांगी गई। हर बड़ी टेक कंपनी डाउन क्यों हो रही हैं? कई लोगों ने यह भी सवाल किया, “Google meet डाउन है!! इस महीने हर बड़ी टेक कंपनी क्यों डाउन हो रही है?” एक और ने कहा, “इस महीने हर बड़ी टेक कंपनी डाउन हो रही है!!! मैं अभी भी GCP आउटेज का इंतजार कर रहा हूं!!!” एक और ने कमेंट किया, “क्या Google Meet किसी और के लिए भी डाउन है? पहले Cloudflare, फिर AWS… अब GCP भी चाहता है।” पिछले हफ्ते, Cloudflare को लगातार सर्विस में दिक्कतों का सामना करना पड़ा। इन दिक्कतों की वजह से कई इलाकों के सैकड़ों यूजर्स उन वेबसाइट और सर्विस को एक्सेस नहीं कर पाए जो कंपनी के नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर थीं। Cloudflare के यह बताने के बाद कि एक छिपी हुई सॉफ्टवेयर कमी ने उसके सिस्टम पर असर डाला है, सोशल नेटवर्क एक्स और एआई चैटबॉट ChatGPT समेत बड़े प्लेटफॉर्म में बड़े पैमाने पर दिक्कतें आईं।

फर्जी गतिविधियों पर ट्राई का प्रहार: लाखों नंबर किए बंद, तुरंत करें अपना नंबर वेरिफाई

नई दिल्ली स्पैम और फ्रॉड कॉल्स पर बड़ी कार्रवाई करते हुए TRAI ने पिछले एक साल में 21 लाख से ज्यादा मोबाइल नंबरों को ब्लॉक कर दिया है. इसके साथ ही करीब एक लाख एंटिटीज को ब्लैकलिस्ट किया गया है, जो फर्जी कम्युनिकेशन और धोखाधड़ी में शामिल थीं. TRAI ने साफ किया है कि सिर्फ नंबर को ब्लॉक करना समाधान नहीं है, बल्कि यूजर्स को इन नंबरों को DND ऐप पर रिपोर्ट करना चाहिए. रिपोर्ट की मदद से रेगुलेटर और टेलीकॉम कंपनियां नंबरों को ट्रेस कर स्थायी रूप से बंद कर सकती हैं. TRAI की बड़ी कार्रवाई: 21 लाख नंबर किए ब्लॉक TRAI ने बताया कि DND ऐप के जरिए मिली भारी संख्या में शिकायतों के बाद यह कार्रवाई की गई है. यूजर्स द्वारा रिपोर्ट किए गए नंबरों को ट्रेस कर टेलीकॉम कंपनियों ने उनकी जांच की और गलत पाए जाने पर स्थायी रूप से उन्हें डिसकनेक्ट किया. रेगुलेटर ने कहा कि केवल नंबर ब्लॉक करने से समस्या खत्म नहीं होती, क्योंकि स्पैमर नए नंबर लेकर दूसरे यूजर्स को निशाना बनाते रहते हैं. इसलिए रिपोर्ट करना सबसे प्रभावी तरीका है. यूजर्स को TRAI की सलाह TRAI ने मोबाइल यूजर्स को TRAI DND ऐप डाउनलोड करने और स्पैम कॉल्स और मैसेज को वहीं रिपोर्ट करने की अपील की है. रेगुलेटर ने यह भी कहा कि कॉल, मैसेज या सोशल मीडिया पर अपनी पर्सनल और फाइनेंशियल डिटेल्स शेयर न करें. किसी भी संदिग्ध या धमकी भरी कॉल को तुरंत काट दें और साइबर फ्रॉड से जुड़ी घटनाओं को 1930 या cybercrime.gov.in पर जरूर रिपोर्ट करें. यह कदम न सिर्फ खुद को बल्कि बाकी यूजर्स को भी सुरक्षित रखता है. जल्द आएगा MNV प्लेटफॉर्म टेलीकॉम विभाग साइबर फ्रॉड को रोकने के लिए Mobile Number Validation प्लेटफॉर्म लाने की तैयारी कर रहा है. इस सिस्टम की मदद से यह चेक किया जा सकेगा कि किसी नंबर को जिस व्यक्ति ने KYC में दर्ज कराया है, वही उसे उपयोग कर रहा है या नहीं. इससे फर्जी सिम कार्ड और गलत पहचान वाले नंबरों का इस्तेमाल कम होगा. आने वाले महीनों में यह नया प्लेटफॉर्म लॉन्च किया जा सकता है, जिससे फ्रॉड ट्रांसपेरेंसी और मजबूत होगी.  

भारत में Meta के स्मार्ट ग्लास की एंट्री, ग्लास से अब कॉल और रिकॉर्डिंग संभव

 नई दिल्ली Meta ने भारत में Oakley AI पावर्ड ग्लासेस लॉन्च कर दिए हैं. इससे पहले तक भारत में सिर्फ MetaRayban Wayfarer 1 ही बेचे जा रहे थे. आपको बता दें कि हाल ही में Meta ने MetaRayban 2 लॉन्च किया है जो फ़िलहाल भारत में एवेलेबल नहीं है.  Oakley Meta HSTN स्मार्ट ग्लासेस की बिक्री भारत में 1 दिसंबर से स्टार्ट हो जाएगी. इसे आज यानी 25 नवंबर से प्री ऑर्डर किया जा सकता है. इसे सन ग्लास हट से ख़रीद सकते हैं. Oakley Meta HSTN की कीमत 41,800 रुपये से शुरू होगी. इस स्मार्ट ग्लासेस को एथलीट और स्पोर्ट्स ऐक्टिविटी करने वाले लोगों के लिए ख़ास तौर पर डिज़ाइन किया गया है.  मेटा के ये नए ग्लासेस IPX4 वॉटर रेजिस्टेंट हैं और कंपनी का दावा है कि ये 8 घंटे तक की बैटरी बैकअप देंगे. केस के साथ एडिशनल 48 घंटे तक का बैकअप मिलेगा.  इस स्मार्ट ग्लासेस से यूजर्स Ultra HD 3K वीडियो रिकॉर्ड कर सकते हैं. इस चश्मे में बिल्ट इन Meta AI दिया गया है जो आपके कमांड सुन कर काम करेगा.  Oakley Meta HSTN में दिया गया MetaAI हिंदी सपोर्ट करता है. Hey Meta बोल कर आप इससे कोई भी सवाल पूछ सकते हैं या कोई टास्क परफॉर्म करने के लिए इससे कह सकते हैं.  हाल ही में Deepika Padukone के साथ Meta ने पार्टनरशिप किया है. इसके तहत अब मेटा स्मार्ट ग्लासेसज में Deepika Padukone की आवाज़ सुनाई देगी. इसके अलावा और भी सेलिब्रिटी वॉयस का ऑप्शन है.  जल्द मिलेगा UPI सपोर्ट  जल्द ही मेटा के स्मार्ट ग्लासेस के ज़रिए UPI पेमेंट कर पाएंगे. वॉयस कमांड के ज़रिए बोलना होगा Hey Meta, scan and pay, इसके बाद मेटा ग्लासेस में लगा हुआ कैमरा QR कोड स्कैन करके पेमेंट कर देगा.  Meta स्मार्ट ग्लासेस इन दिनों दुनिया भर में काफी पॉपुलर हो रहे हैं. इससे कॉलिंग, म्यूज़िक सहित वीडियो और फोटो क्लिक किए जा सकते हैं. दिलचस्प ये है कि ये नॉर्मल चश्मे जैसे ही लगते हैं. 

लैपटॉप यूज़ की ये 5 गलतियां बन सकती हैं महंगी, बिस्तर पर इस्तेमाल सबसे खतरनाक

क्या आप भी ज्यादातर लोगों की तरह अपने लैपटॉप को बेड पर रखकर इस्तेमाल करते हैं? अगर हां, तो इस गलती को तुरंत सुधार लें। दरअसल लैपटॉप इस्तेमाल करते समय लोग चंद जरूरी बातों का ध्यान रखना भूल जाते हैं, जिसकी वजह से लैपटॉप में मदर बोर्ड खराब होने से लेकर बैटरी जल्द खराब होने जैसी तमाम समस्याएं आती रहती हैं। आज हम आपको ऐसी ही 5 बड़ी गलतियों के बारे में बताएंगे, जो लोग आमतौर पर लैपटॉप को इस्तेमाल करते हुए अनजाने में करते हैं और अपना भारी नुकसान करा बैठते हैं। लैपटॉप को कहां रखकर इस्तेमाल नहीं करना चाहिए लैपटॉप असल में डेस्कटॉप कंप्यूटर का मिनी वर्जन ही है। कहने का मतलब है कि पहले टेबल पर रखकर इस्तेमाल होने वाले पर्सनल कंप्यूटर का छोटा रूप ही लैपटॉप है। एक बड़े पीसी के मुकाबले लैपटॉप में हीट निकलने की जगह कम होती है। इसके लिए आमतौर पर लैपटॉप के पीछे वेंड्स दिए होते हैं। लैपटॉप इस्तेमाल करते हुए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि लैपटॉप के हीट वेंड्स बिलकुल भी ब्लॉक ना हों। इस वजह से लैपटॉप को बेड या किसी ऐसी जगह पर रखकर इस्तेमाल नहीं करना चाहिए जिससे हीट वेंड्स से गर्मी बाहर ना निकल पाए। अगर आपको बेड पर लैपटॉप इस्तेमाल करना ही है, तो एक बेड टेबल या फ्लैट सरफेस का इंतजाम करके लैपटॉप इस्तेमाल करना चाहिए। याद रहे कि लैपटॉप से अगर बाहर ना निकल पाए वह जरूरत से ज्यादा गर्म हो जाए, तो उसका मदरबोर्ड जल भी सकता है। क्या लैपटॉप बंद करते ही तुरंत बैग में डाल देना चाहिए लैपटॉप को बंद करते ही बैग में रख देना खतरनाक साबित हो सकता है। दरअसल लैपटॉप को शटडाउन करने के बाद कुछ देर टेबल पर खुले में छोड़ देना चाहिए। अगर आप लैपटॉप को ऑफ करते ही उसे बैग में रख लेते हैं, तो यह लंबे समय में लैपटॉप को बुरी तरह से नुकसान पहुंचाता है। लैपटॉप के लिए बैग एक तंग जगह होती है। ऐसे में तुरंत बंद हुआ लैपटॉप पूरी तरह से ठंडा नहीं हुआ होता और बैग में वह अपनी ही गर्मी में बंद पड़ा रहता है। इससे लैपटॉप की बैटरी, रैम, मदरबोर्ज और एसएसडी के खराब होने के चांस बढ़ जाते हैं। ऐसे में लैपटॉप को ऑफ करने के बाद कम से कम क्या लैपटॉप को शटडाउन नहीं करते आप अगर आप अपने लैपटॉप को इस्तेमाल के बाद शटडाउन करे बिना सिर्फ उसकी लिड को गिरा देते हैं और लंबे समय से लैपटॉप को इसी तरह से इस्तेमाल करते आ रहा हैं, तो आपका लैपटॉप स्लो होने के साथ-साथ खराब भी हो सकता है। दरअसल लैपटॉप को कभी-कभी शटडाउन किए बिना सिर्फ लिड को बंद करके रख देने में कोई नुकसान नहीं है लेकिन ऐसा लंबे समय तक करना खतरनाक साबित हो सकता है। इससे लैपटॉप का स्लो हो जाना तो तय है और इस वजह से लैपटॉप की स्टोरेज ड्राइव भी करप्ट हो सकती है। ऐसे में हमेशा इस्तेमाल के बाद लैपटॉप को शटडाउन कर देना चाहिए। अगर आप कुछ देर में लैपटॉप दोबारा इस्तेमाल करने वाले हैं, तो उस सूरत में आप लैपटॉप की लिड गिराकर छोड़ सकते हैं। क्या लैपटॉप को चार्जिंग पर लगाए रखना ठीक है आजकल के कुछ मॉडर्न लैपटॉप जैसे कि मैकबुक आदि पास थ्रू चार्जिंग टेक्नोलॉजी को सपोर्ट करते हैं और उन्हें लगातार चार्जिंग पर लगाकर रखने में कोई नुकसान नहीं होता। वो नए लैपटॉप चार्जिंग के समय लैपटॉप को इस्तेमाल करते समस पावर सीधा मदरबोर्ड और प्रोसेसर तक पहुंचाते हैं, जिससे बैटरी को ओवरचार्जिंग का खतरा नहीं रहता। हालांकि ये टेक्नोलॉजी नई है और ज्यादातर पुराने लैपटॉप में यह नहीं आती थी। अगर आपका लैपटॉप भी पास थ्रू चार्जिंग को सपोर्ट नहीं करता, तो उसे घंटों चार्जिंग पर लगाए रखना सही नहीं होता। इससे लैपटॉप की बैटरी तेजी से खराब होती है और आपको बार-बार बैटरी बदलवाने पर खर्च करना पड़ सकता है। भारी चीजें लैपटॉप पर रख देना भले आजकल लैपटॉप मेटल बिल्ड के साथ भी आते हैं लेकिन एक बात का ध्यान रखें कि लैपटॉप आखिर में एक नाजुक गैजेट ही होता है। लैपटॉप को रफ-टफ तरीके से इस्तेमाल करना खर्चीला साबित हो सकता है। अकसर देखा गया है कि लोग लैपटॉप पर कई तरह का भारी सामान रख देते हैं। इससे लैपटॉप की स्क्रीन क्रैक होने का खतरा बराबर बना रहता है। दरअसल आजकल लैपटॉप काफी स्लिम हो गए हैं। ऐसे में जब लैपटॉप को बंद किया जाता है, तो स्क्रीन और इसके कीबोर्ड के बीच ज्यादा गैप नहीं रहता। ऐसे में लैपटॉप के ऊपर से आने वाला किसी भी तरह का दबाव स्क्रीन के क्रैक होने की वजह बन सकता है।

Gemini पर सैम अल्टमैन का बयान: क्या गूगल का AI चैटजीपीटी की रफ्तार का मुकाबला कर पाएगा?

नई दिल्ली सैम ऑल्टमैन ने हाल ही में एक इंटरनल मेमो में स्वीकार किया कि गूगल अभी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दौड़ में आगे दिखाई दे रहा है। Gemini 3 मॉडल की सफलता ने डेवलपर्स और क्रिएटर्स के बीच गूगल की लोकप्रियता बढ़ा दी है। हालांकि, ऑल्टमैन ने इस बढ़त को केवल “अस्थायी” बताया और दावा किया कि OpenAI बेहद तेजी से गैप को कम कर रहा है। गूगल का नया Gemini 3 मॉडल कोडिंग, डिजाइन और प्रोटोटाइप जेनरेशन में शानदार प्रदर्शन कर रहा है। यह मॉडल गूगल के सर्च, प्रोडक्टिविटी ऐप्स और क्रिएटिव टूल्स में गहराई से इंटीग्रेट किया गया है, जिससे इसे बड़े पैमाने पर यूजर विजिबिलिटी मिल रही है। क्या Gemini से पिछड़ रही ChatGPT? डेवलपर्स का कहना है कि Gemini 3 वेबसाइट डिजाइन, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और टेक्स्ट-टू-प्रोटोटाइप जैसे काम बेहद तेजी और सटीकता से कर रहा है। ये वो क्षेत्र हैं जहां पहले OpenAI का दबदबा था। ऑल्टमैन ने स्वीकार किया कि यह बड़ी चुनौती है, लेकिन साथ ही कहा कि कंपनी का असली फोकस सुपरइंटेलिजेंस बनाने पर है, जो भविष्य में गूगल समेत हर प्रतिद्वंद्वी को पीछे छोड़ देगी। Anthropic का उभरता खतरा गूगल के अलावा, ऑल्टमैन ने Anthropic का भी जिक्र किया, जिसकी Claude AI कोडिंग और डीबगिंग में तेजी से लोकप्रिय हो रही है। Claude सीधे OpenAI के Codex और Copilot जैसे सिस्टमों की टक्कर में खड़ी है। AI इंडस्ट्री में कई मोर्चों पर चुनौतियां हैं, और OpenAI को अब एक साथ कई स्तरों पर मुकाबला करना पड़ रहा है। गूगल की तगड़ी आर्थिक ताकत भी है बड़ी चुनौती तकनीकी क्षमता के साथ-साथ गूगल की आर्थिक मजबूती भी उसे इस दौड़ में बढ़त देती है। कंपनी का मार्केट वैल्यू 3.5 ट्रिलियन डॉलर है और वह हर साल 70 बिलियन डॉलर से अधिक फ्री कैश फ्लो जनरेट करती है। विडंबना यह है कि इसी क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग OpenAI और Anthropic जैसी कंपनियां भी करती हैं, यानी प्रतिस्पर्धियों पर गूगल का अप्रत्यक्ष आर्थिक लाभ भी बना रहता है। सुपरइंटेलिजेंस की ओर तेजी से कदम बढ़ा रही OpenAI ऑल्टमैन के अनुसार, OpenAI अभी मजबूत स्थिति में है और AI रेस की चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है। कंपनी इस साल लगभग 13 बिलियन डॉलर की कमाई की ओर बढ़ रही है, हालांकि रिसर्च और कंप्यूटिंग पर भारी खर्च उसकी वित्तीय रणनीति को चुनौती देते हो सकते हैं। ऑल्टमैन ने कहा कि कंपनी को एक साथ कई मुश्किल काम करने हैं। बेहतरीन रिसर्च लैब, AI इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रोडक्ट प्लेटफॉर्म बनना कंपनी के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है। ChatGPT की एंगेजमेंट घटी, पर वित्तीय स्थिति मजबूत कंपनी की सीएफओ सारा फ्रायर ने बताया कि ChatGPT की यूजर्स के बीच एंगेजमेंट भले स्थिर हो गई हो, लेकिन कंपनी आर्थिक रूप से सेफ जोन में है। यह बयान उन चिंताओं को कम करने की कोशिश है जो पिछले कुछ महीनों में OpenAI की धीमी गति को लेकर उठ रही थीं।  

रेलवे का सख्त नियम: इलेक्ट्रिक केतली ले गए तो लगेगा जुर्माना, होगी कड़ी कार्रवाई

नई दिल्ली भारत में रोज लाखों लोग ट्रेन से सफर करते हैं और कुछ यात्री अपनी सुविधाओं के लिए अजीब-ओ-गरीब चीजें साथ लेकर आते हैं। हाल ही में एक महिला यात्री कोच में इलेक्ट्रिक केतली लगाकर मैगी बनाती दिखी, जिसके बाद रेलवे ने कार्रवाई की। यह पहली घटना नहीं है, लेकिन इसे गंभीरता से लिया गया है क्योंकि ट्रेन कोई निजी जगह नहीं बल्कि पब्लिक सर्विस है। ट्रेन में हाई-वॉटेज उपकरण क्यों खतरनाक हैं? भारतीय रेलवे ने तय किया है कि यात्रियों को कोच में केवल मोबाइल, लैपटॉप या पावर बैंक जैसे लो-वॉटेज डिवाइस इस्तेमाल करने की अनुमति है। ट्रेन की पावर सप्लाई घरेलू सिस्टम जैसी नहीं होती, इसका लोड फिक्स होता है और कोच की वायरिंग उसी हिसाब से बनी होती है। इलेक्ट्रिक केतली, इंडक्शन, हीटर या अन्य हाई-वॉटेज उपकरण ज्यादा लोड खींचते हैं। इससे ओवरलोडिंग, शॉर्ट सर्किट, धुआं फैलना और आग जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। कोच में सैंकड़ों लोग सफर कर रहे होते हैं, इसलिए रेलवे इसे गंभीर सुरक्षा खतरे के रूप में देखता है। जुर्माना और सजा रेलवे एक्ट के सेक्शन 153 के तहत किसी भी हाई-वॉटेज उपकरण का उपयोग करने पर जुर्माना और छह महीने तक की सजा हो सकती है। अगर इस हरकत से कोच में आग या धुआं फैलता है, तो सेक्शन 154 लागू होता है, जिसमें जुर्माना और दो साल तक की सजा का प्रावधान है। रेलवे का संदेश साफ है: ट्रेन में केवल सुरक्षित उपकरण ही इस्तेमाल करें। किसी भी नियम का उल्लंघन यात्रियों और ट्रेन की सुरक्षा दोनों के लिए खतरा है।

अध्ययन में चौंकाने वाली बात, क्यों बढ़ा रहा मोटापा, जाने

नई दिल्ली अधिक वजन और मोटापे को स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जाता रहा है, सभी उम्र के लोग इसका शिकार हो रहे हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि गड़बड़ खानपान, तनाव, व्यस्त दिनचर्या और शारीरिक रूप से कम मेहनत करना मोटापे को बढ़ाने वाली मुख्य वजहें हैं। मोटापा न केवल शरीर के लुक को खराब करता है बल्कि डायबिटीज, हृदय रोग, ब्लड प्रेशर, फैटी लिवर जैसी समस्याओं के खतरे को भी कई गुना बढ़ा देता है। अध्ययनकर्ता कहते हैं, लाइफस्टाइल और खानपान की गड़बड़ी तो बढ़ते वजन का प्रमुख कारण है ही, इसके साथ कुछ अन्य स्थितियों के बारे में भी पता चला है जो बड़ा जोखिम कारक हो सकती हैं। हालिया अध्ययन से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण भी वजन बढ़ने की समस्या बढ़ती जा रही है जिसको लेकर सभी लोगों को अलर्ट रहने की आवश्यकता है। अगर आपने भी हाल के वर्षों में कुछ किलो वजन बढ़ा लिया है, तो संभव है कि ये जलवायु परिवर्तन का भी परिणाम हो सकता है। कार्बन डाइऑक्साइड का खाद्य पदार्थों पर असर नीदरलैंड के वैज्ञानिकों ने एक हालिया शोध में पाया है कि वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का बढ़ता स्तर चावल और जौ जैसी महत्वपूर्ण फसलों को अधिक कैलोरी और कम पौष्टिकता वाला बना रहा है। CO2 प्रकाश संश्लेषण को बढ़ाकर कैलोरी बढ़ाता है, जिससे फसलों में शर्करा और स्टार्च की मात्रा पहले की तुलना में बढ़ रही है। इतना ही नहीं इसके कारण प्रोटीन और पोषक तत्वों की मात्रा भी अनाजों से कम होती देखी गई है जिसके चलते आप जो भोजन आप खाते हैं वो हाई कैलोरी और लो न्यूट्रिशन वाले हो जाते हैं, जो सीधे तौर पर वजन बढ़ाने वाले हो सकते हैं। नीदरलैंड्स की लेडेन यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों की टीम ने लोकप्रिय खाद्य पदार्थों के पौधों में 'व्यापक रूप से पोषक तत्वों में परिवर्तन' की चेतावनी दी है। विशेषज्ञों ने कहा, 'भले ही खाद्य सुरक्षा पर्याप्त रहे, पर इनमें मौजूद पोषक तत्व सुरक्षा खतरे में है। भोजन अधिक कैलोरी वाला और कम पौष्टिक होता जा रहा है। नतीजतन, जलवायु परिवर्तन के कारण इंसानों में मोटापा, कमजोर प्रतिरक्षा प्रणलाी और क्रॉनिक बीमारियों का खतरा बढ़ता जा रहा है। अध्ययन में क्या पता चला? जलवायु परिवर्तन का भोजन पर होने वाले असर और इसके स्वास्थ्य संबंधित दुष्प्रभावों को समझने के लिए वैज्ञानिकों की टीम ने उन रिपोर्ट्स का विश्लेषण किया जिनमें  फसलें अलग-अलग CO2 लेवल पर उगाई गई थीं। इसमें कुल 43 खाने लायक फसलों जैसे चावल, जौ, आलू, टमाटर, गेहूं, सोयाबीन, मूंगफली पर अध्ययन किया गया। विशेषज्ञों ने पाया कि जिन स्थानों पर CO2 का स्तर अधिक था वहां की फसलों के पोषक तत्वों पर बुरा असर पड़ा। ऐसे फसलों में आमतौर पर जिंक, आयरन और प्रोटीन जैसे जरूरी न्यूट्रिएंट्स में  4.4% तक की कमी, जबकि कुछ में 38% तक की कमी देखी गई। चने में पाए जाने वाले जिंक पर सबसे ज्यादा असर देखा गया  जबकि गेहूं और चावल भी इससे प्रभावित होती हैं। मोटापे का बढ़ता संकट टीम ने चेतावनी दी है कि चावल दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी के लिए मुख्य खाद्य पदार्थ है और बाकी लोग गेहूं पर निर्भर हैं। इन दोनों में प्रोटीन, जिंक और आयरन जैसे जरूरी पोषक तत्वों में काफी कमी दिखती है। साथ ही, हर सैंपल में कैलोरी की मात्रा बढ़ रही है, जिससे पता चलता है कि इनके सेवन से पहले की तुलना में लोगों में मोटापे का स्तर भी बढ़ता जा रहा है। विशेषज्ञों ने कहा, अगर इस दिशा में सुधार के उपाय न किए गए तो खाद्य पदार्थ भी सुरक्षित नहीं रह जाएंगे और हम कई तरह की बीमारियों की चपेट में आ सकते हैं।

हवा में ज़हर! प्रदूषण बढ़ा रहा गंभीर बीमारियों का खतरा, डॉक्टर ने बताए शुरुआती संकेत

नवंबर लंग कैंसर अवेयरनेस महीने के रूप में मनाया जाता है। यह मौका है लोगों को याद दिलाने का कि फेफड़ों का कैंसर सिर्फ़ स्मोकिंग करने वालों की बीमारी नहीं है। डॉक्टरों का कहना है कि एयर पॉल्यूशन, सेकंड हैंड स्मोक और जेनेटिक कारणों से गैर-स्मोकर्स में भी इसका खतरा बढ़ता है। शुरुआती लक्षणों पर ध्यान दें ➤ लंग कैंसर के शुरुआती लक्षण अक्सर हल्के लगते हैं, जैसे: ➤ लंबे समय तक खांसी ➤ सांस लेने में तकलीफ़ या घरघराहट ➤ बार-बार थकान महसूस होना ➤ सीने या पीठ में दर्द ➤ थूक में खून या बार-बार इन्फेक्शन स्मोकिंग न करने वाले भी सुरक्षित नहीं मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के डॉ. अनादि पचौरी और एंड्रोमेडा कैंसर हॉस्पिटल के डॉ. अरुण कुमार गोयल के अनुसार, स्मोकिंग न करने वालों में भी प्रदूषण, सेकंड हैंड स्मोक और जेनेटिक कारणों से फेफड़ों का कैंसर हो सकता है। ये दोनों विशेषज्ञ बताते हैं कि धुएँ में मौजूद हज़ारों केमिकल DNA को नुकसान पहुँचाते हैं और कैंसर का कारण बन सकते हैं। कैसे कम करें जोखिम ➤ स्मोकिंग पूरी तरह छोड़ें। ➤ सेकंड हैंड स्मोकिंग से बचें। ➤ एयर पॉल्यूशन वाले दिनों में मास्क पहनें और घर में एयर प्यूरीफायर इस्तेमाल करें। ➤ ज्यादा प्रदूषण वाले इलाकों में कम समय बिताएँ। ➤ रेगुलर हेल्थ चेकअप और फ्लू/निमोनिया वैक्सीनेशन कराएँ। ➤ उच्च जोखिम वाले लोग कम डोज़ वाले CT स्कैन के लिए डॉक्टर से संपर्क करें। हेल्दी लाइफस्टाइल और फेफड़ों की सुरक्षा डॉ. पचौरी और डॉ. गोयल के अनुसार, स्वस्थ भोजन और एक्सरसाइज फेफड़ों को मजबूत रखते हैं। ➤ हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ, फल और नट्स खाएँ। ➤ जंक फूड और तले-भुने खाने से बचें। ➤ रोजाना 30–45 मिनट एक्सरसाइज करें। ➤ प्राणायाम और गहरी सांस लेने की प्रैक्टिस फेफड़ों के लिए लाभकारी है। स्मोकिंग छोड़ चुके लोगों के लिए सलाह जो लोग स्मोकिंग छोड़ चुके हैं, उन्हें: ➤ कभी भी दोबारा स्मोकिंग न शुरू करें। ➤ सालाना फेफड़ों की जांच करवाएँ। ➤ 50–80 साल के भारी स्मोकर्स कम डोज़ वाले CT स्कैन कराएँ। ➤ स्वस्थ भोजन और एक्टिव लाइफस्टाइल अपनाएँ।