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दिल्ली के बाद कटरा में अलर्ट, मां वैष्णो देवी यात्रा पर सुरक्षा कड़ी, हर कदम पर निगरानी

नई दिल्ली देश की राजधानी दिल्ली में हाल ही में हुए आतंकी घटनाक्रमों के बाद अब जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर हैं। खुफिया एजेंसियों को इनपुट मिले हैं कि आतंकी मां वैष्णो देवी के पावन भवन और आधार शिविर कटरा को निशाना बनाने की साजिश रच रहे हैं। इस गंभीर सूचना के बाद माता के दरबार और पूरे कटरा शहर को एक अभेद्य किले में तब्दील कर दिया गया है। आतंकी अलर्ट के बाद कटरा से लेकर भवन तक सुरक्षा व्यवस्था को मल्टी-लेयर कर दिया गया है। आधार शिविर कटरा और यात्रा मार्ग पर भारतीय सेना, सीआरपीएफ और जम्मू-कश्मीर पुलिस के अतिरिक्त जवानों को तैनात किया गया है। किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए यात्रा मार्ग पर विशेष QRT टीमों को तैनात किया गया है जो आधुनिक हथियारों से लैस हैं।जमीन के साथ-साथ आसमान से भी निगरानी रखी जा रही है। चप्पे-चप्पे पर लगे सीसीटीवी कैमरों की मदद से कंट्रोल रूम से हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है। श्रद्धालुओं के लिए कड़े नियम सुरक्षा को देखते हुए यात्रियों के लिए भी जांच प्रक्रिया को और अधिक सख्त कर दिया गया है। RFID कार्ड और वेरिफिकेशन: बिना वैध  RFID कार्ड के किसी भी यात्री को आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी जा रही है।   सघन चेकिंग: कटरा के प्रवेश द्वारों, रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड पर हर वाहन और यात्री की सघन तलाशी ली जा रही है। पहचान पत्र अनिवार्य: प्रशासन ने सभी श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे हर समय अपना मूल पहचान पत्र साथ रखें और सुरक्षाकर्मियों के साथ सहयोग करें। यात्रा पर कोई रोक नहीं, पर सतर्कता जरूरी प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि माता वैष्णो देवी की यात्रा सुचारू रूप से चल रही है और इसे रोका नहीं गया है। हालांकि, श्रद्धालुओं से अनुरोध किया गया है कि वे किसी भी लावारिस वस्तु को न छुएं और किसी भी संदिग्ध गतिविधि या व्यक्ति के दिखने पर तुरंत पुलिस या श्राइन बोर्ड के कर्मचारियों को सूचित करें।

BNP सरकार बनी ‘बिजनेस क्लास’ की कैबिनेट? 70% मंत्री बिजनेसमैन, सांसदों में करोड़पति-अरबपति हावी

ढाका तारिक रहमान (Tarique Rahman) के नेतृत्व में Bangladesh Nationalist Party (BNP) ने 13वें संसदीय चुनाव में निर्णायक जीत के बाद सरकार का गठन किया है। चुनाव आयोग को सौंपे गए शपथपत्रों के अनुसार 50 सदस्यीय कैबिनेट (मंत्री और राज्य मंत्री) में से 35 यानी करीब 70% ने अपने पेशे के रूप में व्यवसाय दर्ज किया है। यह जानकारी Dhaka Tribune की रिपोर्ट में सामने आई। आंकड़ों के मुताबिक 19 कैबिनेट मंत्री और 16 राज्य मंत्री खुद को व्यवसायी बताते हैं। वकील दूसरी सबसे बड़ी पेशेवर श्रेणी हैं, जबकि कई सदस्यों ने एक से अधिक पेशे का उल्लेख किया है। उल्लेखनीय है कि केवल दो सदस्य प्रधानमंत्री तारिक रहमान और शिक्षा मंत्री एएनएम एहसानुल हक मिलन ने “राजनीति” को अपना मुख्य पेशा बताया। 17 फरवरी को नेशनल पार्लियामेंट के साउथ प्लाजा में 25 मंत्रियों, जिनमें दो टेक्नोक्रेट कोटे से थे, ने शपथ ली। भ्रष्टाचार-रोधी संस्था Transparency International Bangladesh (TIB) के कार्यकारी निदेशक इफ्तेखारुज्जमान ने चेतावनी दी कि कैबिनेट में व्यवसायियों की अधिकता से हितों के टकराव की आशंका बढ़ सकती है। उनके अनुसार मंत्रियों को उन फैसलों से दूर रहना चाहिए जिनसे उनके निजी या क्षेत्रीय कारोबारी हित प्रभावित हो सकते हैं।  रिपोर्टों के अनुसार 300 निर्वाचित सांसदों में से 174 (59%) ने व्यवसाय को अपना पेशा बताया है, जिनमें कम से कम 15 परिधान उद्योग से जुड़े हैं। BNP ने 209 सीटें जीतीं, जिनमें 145 विजेता उम्मीदवार व्यवसायी पृष्ठभूमि के हैं। वहीं Bangladesh Jamaat-e-Islami ने 68 सीटें हासिल कीं, जिनमें 20 सांसद व्यवसाय से जुड़े हैं। TIB के अध्ययन के अनुसार 236 सांसद (करीब 79.46%) करोड़पति हैं और 13 अरबपति हैं। BNP के 189 सांसद (90.87%) करोड़पति हैं, जबकि जमात के 38 सांसद (55.07%) इस श्रेणी में आते हैं।  

टैरिफ पॉलिसी पर ट्रंप घिरे, बहुमत अमेरिकियों ने जताई नाराजगी और क्षमता पर उठे सवाल

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति अपने कामों से अधिक अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहते हैं। कब क्या कहेंगे, शायद ट्रंप खुद नहीं जानते। यही कारण है कि वे अक्सर चर्चा में बने रहते हैं। इस बीच एक सर्वे रिपोर्ट सामने आया है। इस सर्वे के अनुसार, अधिकतर ट्रंप की नीतियों और देश चलाने के तरीके से खुश नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति अपने कामों से अधिक अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहते हैं। कब क्या कहेंगे, शायद ट्रंप खुद नहीं जानते। यही कारण है कि वे अक्सर चर्चा में बने रहते हैं। इस बीच एक सर्वे रिपोर्ट सामने आया है। इस सर्वे के अनुसार, अधिकतर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों और देश चलाने के तरीके से खुश नहीं है। फरवरी 2026 के सर्वेक्षण में ट्रंप की कुल अस्वीकृति दर (Disapproval Rating) लगभग 60% पहुंच गई है, जो उनके दूसरे कार्यकाल में अब तक की सबसे ऊंची दरों में से एक है और 2021 में पद छोड़ते समय वाली स्थिति के समान है। सर्वे के अनुसार, अधिकतर लोग महंगाई, टैरिफ, विदेश संबंध, आव्रजन और समग्र अर्थव्यवस्था जैसे रोजमर्रा के महत्वपूर्ण मुद्दों पर ट्रंप के तरीके से असहमत हैं। यह सर्वेक्षण इप्सोस द्वारा इप्सोस के नॉलेजपैनल के जरिए किया गया था, और यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रंप के पहले के वैश्विक टैरिफ को रद्द करने से ठीक पहले हुआ था। सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग दो-तिहाई अमेरिकी (करीब 65%) ट्रंप द्वारा महंगाई से निपटने के तरीके से असहमत हैं। आयातित वस्तुओं पर टैरिफ लगाने के उनके तरीके को 64% लोग नापसंद करते हैं, जबकि 62% लोग विदेशी संबंधों को संभालने के तरीके से असहमत हैं। 58% प्रतिभागियों ने आव्रजन (इमिग्रेशन) को संभालने के तरीके का विरोध किया, और 57% ने कहा कि समग्र अर्थव्यवस्था को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है। इनमें से किसी भी मुद्दे पर ट्रंप को जनता से स्पष्ट समर्थन नहीं मिल रहा है। ट्रंप से नाखुश लेकिन डेमोक्रेट्स पर भरोसा नहीं सर्वे के अनुसार, अधिकतर लोग ट्रंप से नाखुश हैं, लेकिन अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेट्स पर भी पूरा भरोसा नहीं है। दरअसल, जब लोगों से पूछा गया कि देश की सबसे बड़ी समस्याओं को सुलझाने के लिए वे किस पर ज्यादा भरोसा करते हैं, तो राय लगभग बराबर बंट गई। ट्रंप (33%), डेमोक्रेट्स (31%), या 'दोनों में से कोई नहीं' (31%)। सर्वे रिपोर्ट से साफ है कि कई अमेरिकी दोनों पक्षों से नाखुश हैं। सर्वे के अनुसार, ट्रंप को सबसे कम समर्थन डेमोक्रेट्स और निर्दलीय (इंडिपेंडेंट) मतदाताओं से मिला, जिन्होंने लगभग हर मुद्दे पर उनसे असहमति जताई। इतना ही नहीं, रिपब्लिकन पार्टी में भी मतभेद हैं। रिपोर्ट के अनुसार, मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (MAGA) आंदोलन के मजबूत समर्थक ज्यादातर ट्रंप के फैसलों से सहमत थे, लेकिन MAGA से खुद को अलग मानने वाले रिपब्लिकन अधिक आलोचनात्मक थे, खासकर महंगाई और विदेश नीति जैसे मुद्दों पर। कुल मिलाकर, ट्रंप की अस्वीकृति दर लगभग 60% है, जो उनके दूसरे कार्यकाल में अब तक की सबसे ऊंची दरों में से एक है और 2021 में पद छोड़ते समय वाली दर के बराबर है। ट्रंप के सत्ता संभालने के हालात और हुए खराब इस बीच, अर्थव्यवस्था को लेकर लोगों का नजरिया भी निराशाजनक है। लगभग आधे अमेरिकियों का कहना है कि ट्रंप के सत्ता संभालने के बाद हालात और खराब हुए हैं। सिर्फ करीब 3% लोगों ने कहा कि अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ है। सर्वेक्षण में शामिल केवल 22% लोगों ने ही आर्थिक रूप से खुद को बेहतर महसूस किया, जबकि अधिकांश ने कहा कि उनकी स्थिति पहले जैसी है या और खराब हो गई है। सर्वेक्षण में ट्रंप की राष्ट्रपति बनने की योग्यता पर भी सवाल उठे। सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, आधे से ज्यादा अमेरिकियों ने कहा कि उनमें राष्ट्रपति बनने के लिए जरूरी मानसिक क्षमता नहीं है, और लगभग आधे ने कहा कि वे शारीरिक रूप से भी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं। रिपब्लिकन इस पर काफी हद तक असहमत थे, लेकिन डेमोक्रेट्स और निर्दलीय मतदाताओं ने इन चिंताओं को मजबूती से साझा किया। भरोसा भी एक बड़ी समस्या है। लगभग 70% अमेरिकियों (दस में से सात) ने कहा कि ट्रंप ईमानदार या भरोसेमंद नहीं हैं। कई लोगों का मानना है कि वे राष्ट्रपति पद का दुरुपयोग अपने निजी फायदे के लिए कर रहे हैं, और अधिकांश को लगता है कि उन्होंने अपनी कानूनी शक्तियों का उल्लंघन किया है। वहीं, खास कार्रवाइयों के बारे में ज्यादातर अमेरिकी बच्चों के लिए अनुशंसित टीकों में कटौती का विरोध करते हैं और अन्य देशों में बदलाव लाने के लिए अमेरिकी सेना के इस्तेमाल का समर्थन नहीं करते। कई लोगों का यह भी मानना है कि प्रशासन जेफरी एपस्टीन फाइलों जैसे संवेदनशील मामलों पर पारदर्शी नहीं रहा है। बता दें कि यह सर्वेक्षण अमेरिका भर में 2500 से ज्यादा वयस्कों पर किया गया है।  

CBSE फिजिक्स परीक्षा में गड़बड़ी का आरोप, ‘संतुलन’ सवाल पर हाईकोर्ट पहुंचा मामला

नई दिल्ली देशभर में बोर्ड परीक्षाओं के बीच एक नया विवाद खड़ा हो गया है जिसने लाखों विद्यार्थियों और अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। शिक्षक प्रशांत किराड ने सीबीएसई के खिलाफ जनहित याचिका दायर की है। आरोप है कि परीक्षा के अलग अलग प्रश्नपत्रों की कठिनाई का स्तर समान नहीं रखा गया, जिससे छात्रों के साथ न्याय नहीं हुआ और उनके अंक उनकी मेहनत से ज्यादा किस्मत पर निर्भर हो गए। शिक्षक का कहना है कि कुछ विद्यार्थियों को अपेक्षाकृत आसान प्रश्नपत्र मिले, जबकि अन्य को ऐसे प्रश्न हल करने पड़े जिनका स्तर प्रतियोगी परीक्षाओं जैसा बताया जा रहा है। इससे छात्रों में असमानता की भावना पैदा हुई है और पूरे परीक्षा तंत्र की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं। क्या है पूरा मामला रिपोर्ट के मुताबिक, दायर की गई जनहित याचिका में कहा गया है कि वर्षों से बोर्ड अलग अलग प्रश्नपत्र तैयार करता रहा है ताकि नकल जैसी समस्याओं पर रोक लगाई जा सके। लेकिन इस बार प्रश्नपत्रों के बीच कठिनाई का अंतर असामान्य रूप से ज्यादा बताया जा रहा है। आरोप है कि कुछ प्रश्नपत्र सीधे और पाठ्यपुस्तक आधारित थे, जबकि अन्य में अवधारणात्मक और गहराई वाले प्रश्न अधिक थे, जिनके लिए अतिरिक्त तैयारी की जरूरत पड़ी। याचिका में यह भी मांग की गई है कि बोर्ड इस विषय पर आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी करे और यह बताए कि प्रश्नपत्रों के स्तर को संतुलित रखने के लिए कौन सी प्रक्रिया अपनाई गई थी। कई विद्यार्थियों का कहना है कि उन्होंने पूरे वर्ष नियमित पढ़ाई की, लेकिन परीक्षा कक्ष में उन्हें अपेक्षा से कहीं कठिन प्रश्न मिले। दूसरी ओर, कुछ छात्रों को सरल प्रश्न मिलने की बातें सामने आईं। इस स्थिति ने छात्रों के मन में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या समान परीक्षा में भी सभी को समान अवसर मिला। अभिभावकों का भी कहना है कि यदि एक ही विषय की परीक्षा में कठिनाई का स्तर अलग अलग रहा, तो परिणाम वास्तविक योग्यता को नहीं दर्शा पाएंगे। इससे आगे की पढ़ाई और प्रवेश प्रक्रियाओं पर भी असर पड़ सकता है। ग्रेस मार्क और नरम मूल्यांकन की मांग विवाद बढ़ने के साथ ही शिक्षक ने मांग की है कि कठिन प्रश्नपत्र हल करने वाले विद्यार्थियों को ग्रेस मार्क दिए जाएं या उनकी उत्तर पुस्तिकाओं की जांच अधिक उदारता से की जाए। कुछ लोग पुनर्परीक्षा की मांग भी उठा रहे हैं, हालांकि इस पर अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। परीक्षा ढांचे में हाल के बदलाव भी बने चर्चा का कारण हाल के वर्षों में वरिष्ठ कक्षाओं की परीक्षाओं में रटने के बजाय समझ और प्रयोग पर आधारित प्रश्नों की संख्या बढ़ाई गई है। अब प्रश्नों का बड़ा हिस्सा ऐसा होता है जिसमें विद्यार्थियों को अवधारणाओं को वास्तविक जीवन की स्थितियों में लागू करना पड़ता है। इस बदलाव का उद्देश्य विद्यार्थियों में तर्क शक्ति, विश्लेषण क्षमता और विषय की गहरी समझ विकसित करना बताया गया है। हालांकि कई शिक्षकों का कहना है कि बदलाव सही दिशा में है, लेकिन प्रश्नपत्र तैयार करते समय संतुलन बनाए रखना उतना ही जरूरी है, ताकि सभी छात्रों के लिए परीक्षा का अनुभव समान रहे। पहले भी उठ चुके हैं ऐसे सवाल बताया जा रहा है कि इससे पहले भी एक अन्य कक्षा की परीक्षा को लेकर इसी तरह की शिकायतें सामने आई थीं। उस समय भी कुछ प्रश्नपत्र अपेक्षाकृत आसान बताए गए थे, जबकि अन्य को ज्यादा चुनौतीपूर्ण माना गया। उस घटना ने भी छात्रों के बीच बहस छेड़ दी थी, लेकिन इस बार मामला न्यायालय तक पहुंच गया है, जिससे इसकी गंभीरता बढ़ गई है। सामाजिक माध्यमों पर छात्रों की आवाज सामाजिक माध्यमों पर बड़ी संख्या में विद्यार्थी अपने अनुभव साझा कर रहे हैं। कई छात्र लिख रहे हैं कि परीक्षा के बाद जब उन्होंने अन्य साथियों से प्रश्नों की तुलना की, तो उन्हें कठिनाई के स्तर में स्पष्ट अंतर महसूस हुआ। कुछ छात्रों ने इसे मानसिक दबाव बढ़ाने वाला बताया, क्योंकि परीक्षा के बाद भी उन्हें अपने प्रदर्शन का सही अंदाजा नहीं लग पाया। आगे क्या हो सकता है अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि शिक्षा बोर्ड इस मामले में क्या जवाब देता है और क्या किसी तरह का सुधारात्मक कदम उठाया जाएगा। यदि जांच में कठिनाई स्तर का अंतर साबित होता है, तो मूल्यांकन प्रक्रिया में बदलाव, अनुग्रह अंक या अन्य उपायों पर विचार किया जा सकता है।

ईरान में युवा विद्रोह तेज, अमेरिका विवाद के बीच Gen Z ने खोला मोर्चा

ईरान ईरान में हुए बड़े पैमाने पर सरकार विरोधी प्रदर्शनों को क्रूर दमन के बाद कुचल दिया गया था, जिसमें हजारों लोगों की मौत हुई। अब 40वें दिन (चेहलम) पर शनिवार को छात्रों ( Gen Z) ने फिर से सड़कों और विश्वविद्यालयों में उतरकर मौलवी शासन के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किया। रिपोर्ट के अनुसार, तेहरान के शरीफ प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, अमीर कबीर और बेहेश्ती जैसे प्रमुख कैंपसों में सैकड़ों छात्रों ने 'तानाशाह मुर्दाबाद', 'खामेनेई मुर्दाबाद', 'हत्यारा नेता' और 'बी शराफ' (शर्मनाक) जैसे नारे लगाए। ये प्रदर्शन दिसंबर 2025 से शुरू हुए आर्थिक संकट, महंगाई और असंतोष से उपजे बड़े आंदोलन की निरंतरता हैं, जो जनवरी 2026 में चरम पर पहुंचे थे। सुरक्षा बलों और बसिज मिलिशिया ने इन नए प्रदर्शनों को भी बलपूर्वक दबाने की कोशिश की, जिससे झड़पें हुईं और घायलों की खबरें आईं। वायरल हो रहे वीडियो सोशल मीडिया पर हो रहे वीडियो में तेहरान के प्रमुख इंजीनियरिंग विश्वविद्यालय में भारी भीड़ को एक भरे हुए इलाके में आपस में भिड़ते हुए देखा जा सकता है। कथित तौर पर लोगों को फारसी में बी शराफ यानी शर्मनाक चिल्लाते हुए सुना गया। ईरान इंटरनेशनल द्वारा साझा किए गए फुटेज में तेहरान के शरीफ प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में सरकार विरोधी नारे लगाते हुए बड़ी भीड़ दिखाई दी। समाचार एजेंसी ने बताया कि प्रदर्शनकारियों को दबाने के लिए इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) से जुड़ी अर्धसैनिक इकाइयों को भेजा गया, जिसके कारण विरोध प्रदर्शनों को बलपूर्वक कुचल दिया गया। बाद में फार्स समाचार एजेंसी ने विश्वविद्यालय में हुई झड़पों में घायलों की सूचना दी। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, एक वीडियो में कथित तौर पर शरीफ विश्वविद्यालय में प्रदर्शनकारियों की कतारें दिखाई दे रही हैं, जो सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को 'हत्यारा नेता' बताकर उनकी निंदा कर रहे हैं और ईरान के अपदस्थ शाह के निर्वासित पुत्र रजा पहलवी से नया सम्राट बनने का आग्रह कर रहे हैं। मानवाधिकार समूह HAALVSH द्वारा जारी वीडियो के अनुसार, तेहरान में बेहेश्ती और अमीर कबीर विश्वविद्यालयों तथा पूर्वोत्तर में मशहद विश्वविद्यालय में भी प्रदर्शनों की खबरें आईं। देश के पश्चिमी शहर अब्दानन में, जो विरोध प्रदर्शनों का गढ़ माना जाता है, मानवाधिकार समूह हेंगाव और सोशल मीडिया पोस्ट के अनुसार, एक कार्यकर्ता शिक्षक की गिरफ्तारी के बाद प्रदर्शनकारियों ने 'खामेनेई मुर्दाबाद' और 'तानाशाह मुर्दाबाद' के नारे लगाए। ईरान में विरोध प्रदर्शन और अमेरिका के साथ तनाव आर्थिक दबाव के लंबे दौर के कारण दिसंबर में अशांति शुरू हुई, लेकिन यह बड़े पैमाने पर सरकार विरोधी प्रदर्शनों में बदल गई, जिसे सुरक्षा बलों ने हिंसक कार्रवाई से दबा दिया। धार्मिक नेतृत्व का कहना है कि 3000 से अधिक लोग मारे गए, लेकिन उनका दावा है कि हिंसा ईरान के दुश्मनों द्वारा किए गए 'आतंकवादी कृत्यों' का परिणाम थी। हालांकि, अमेरिका स्थित मानवाधिकार कार्यकर्ता समाचार एजेंसी (एचआरएएनए) ने इस दमनकारी कार्रवाई में 7000 से अधिक लोगों की मौत हुई है, जिनमें से अधिकांश प्रदर्शनकारी थे, हालांकि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है। वहीं, ईरानी अधिकारियों ने पहले प्रदर्शनकारियों की आर्थिक चिंताओं की वैधता को स्वीकार किया, लेकिन जैसे ही प्रदर्शन खुले तौर पर सरकार के खिलाफ हो गए, उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वियों, संयुक्त राज्य अमेरिका और इजरायल पर 'दंगों' को भड़काने का आरोप लगाया। इस कार्रवाई के चलते अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सैन्य कार्रवाई की धमकी दी, हालांकि बाद में उनका ध्यान ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर केंद्रित हो गया, जिससे पश्चिमी सरकारों को डर है कि इसका उद्देश्य बम बनाना है। अमेरिका और ईरान ने हाल ही में ओमान की मध्यस्थता में संभावित समझौते पर बातचीत फिर से शुरू की है, लेकिन वाशिंगटन ने क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति भी बढ़ा दी है, और दो विमानवाहक पोत, जेट और हथियार भेजे हैं।

‘नक्सलवाद का अंत करीब’, शाहनवाज हुसैन का बड़ा दावा

नई दिल्ली केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नक्सलवाद के खात्‍मे संबंधी बयान का समर्थन करते हुए भाजपा नेता सैयद शाहनवाज हुसैन ने कहा कि देश में नक्सलवाद अब अपने अंतिम दौर में है और केंद्र सरकार की सख्त नीति के चलते यह जल्द पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। उन्होंने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत के दौरान कहा कि गृह मंत्री ने स्पष्ट किया है कि घुसपैठियों के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई की जाएगी और उन्हें भारत की धरती पर रहने की अनुमति नहीं दी जाएगी। शाहनवाज हुसैन ने कहा कि घुसपैठियों को अपने देश वापस लौट जाना चाहिए, क्योंकि भारत की सुरक्षा और संप्रभुता से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि असम में भाजपा सरकार बनने के बाद नक्सलवाद को पांच साल के एजेंडे में शामिल कर निर्णायक रूप से समाप्त करने की दिशा में काम किया जाएगा। इंडिया एआई समिट के दौरान यूथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शन पर प्रतिक्रिया देते हुए सैयद शाहनवाज हुसैन ने कहा कि दिल्ली में आयोजित एआई समिट अत्यंत सफल रहा और ‘एआई फॉर ऑल’ के नारे के साथ संपन्न हुआ। उनके अनुसार, इस कार्यक्रम में दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों के सीईओ और विभिन्न देशों के प्रमुखों ने भाग लिया, जिससे वैश्विक स्तर पर भारत की मजबूत उपस्थिति दर्ज हुई। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने इस महत्वपूर्ण आयोजन को विफल करने की कोशिश की। पहले राहुल गांधी विदेशों में जाकर भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास करते थे और अब देश के भीतर भी ऐसा ही कर रहे हैं। शाहनवाज हुसैन ने कहा कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए और यहां तक कि एनएसए लगाने पर भी विचार किया जाना चाहिए। विपक्ष के नेता का अर्थ देश का विरोध करना नहीं होता। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस के इस रवैये की समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे विपक्षी दलों के नेताओं ने भी निंदा की है और कांग्रेस को इस मामले में देश से माफी मांगनी चाहिए। एसआईआर प्रक्रिया पर बोलते हुए भाजपा नेता ने कहा कि यह एक आवश्यक और पारदर्शी प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से मतदाता सूची को शुद्ध किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पहले कई ऐसे लोगों के नाम मतदाता सूची में बने रहते थे जिनका निधन हो चुका था, जिससे फर्जी मतदान की आशंका रहती थी। एसआईआर के जरिए ऐसी गड़बड़ियों को दूर किया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया में किसी भी वैध मतदाता का नाम नहीं हटाया गया है और इसका उद्देश्य केवल चुनावी प्रणाली को अधिक निष्पक्ष और पारदर्शी बनाना है।

जंग के आसार और भारत की भूमिका: क्या होगा अगला कदम?

इस्लामाबाद पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया है। पाकिस्तान की वायुसेना ने सीमा पार अफगानिस्तान के अंदर कई आतंकी ठिकानों पर भीषण हवाई हमले किए। पाकिस्तान ने इसे खुफिया जानकारी पर आधारित सटीक ऑपरेशन बताया है, वहीं अफगानिस्तान की तालिबान सरकार का दावा है कि इन हमलों में महिलाओं और बच्चों सहित दर्जनों निर्दोष नागरिक मारे गए हैं। इस सबके बीच सबकी निगाहें भारत पर भी टिकी हैं। पाकिस्तान के सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने रविवार तड़के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी दी कि पाकिस्तानी सेना ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और उसके सहयोगी संगठनों के सात कैंपों पर टारगेट हमले किए हैं। उन्होंने बताया कि सीमावर्ती क्षेत्रों में सक्रिय इस्लामिक स्टेट (IS) के गुर्गों को भी निशाना बनाया गया है। दूसरी ओर, काबुल में अफगान सरकार के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने इन हमलों की कड़ी निंदा की। उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तानी विमानों ने नंगरहार और पक्तिका प्रांतों में नागरिक बस्तियों को निशाना बनाया। मुजाहिद ने कहा कि पाकिस्तान अपनी आंतरिक सुरक्षा की विफलता और कमजोरी को छिपाने के लिए अफगानिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन कर रहा है। बाजौर हमला: हाल ही में उत्तर-पश्चिमी खैबर पख्तूनख्वा के बाजौर में एक आत्मघाती हमलावर ने बारूद से लदे वाहन को सुरक्षा चौकी से टकरा दिया था, जिसमें 11 सैनिक और एक बच्चे की मौत हो गई थी। हमलावर अफगान नागरिक बताया गया। बन्नू और इस्लामाबाद: शनिवार को ही बन्नू में एक सैन्य काफिले पर हमला हुआ जिसमें दो जवान शहीद हुए। इससे पहले इस्लामाबाद की एक शिया मस्जिद में हुए धमाके में 31 लोगों की जान चली गई थी। इस हमले के लिए पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने भारत को भी जिम्मेदार ठहराया था। पाकिस्तान का दावा है कि इन सभी हमलों के तार अफगानिस्तान में बैठे टीटीपी कमांडरों से जुड़े हैं और उनके पास इसके ठोस सबूत हैं। पाकिस्तान की सेना ने चेतावनी दी है कि वह अब किसी भी प्रकार का संयम नहीं बरतेगी। सेना के बयान के अनुसार, पाकिस्तान के नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि है और वह आतंकियों का पीछा उनके ठिकानों तक करेगा, चाहे वे कहीं भी हों। पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी अपील की है कि वे तालिबान सरकार पर दबाव डालें ताकि अफगान धरती का इस्तेमाल दूसरे देशों के खिलाफ न हो। अक्टूबर 2025 में भी पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के अंदर इसी तरह के हमले किए थे। हालांकि कतर और तुर्की की मध्यस्थता में शांति वार्ता की कोशिशें की गईं, लेकिन वे विफल रहीं। 2021 में अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद से इस्लामाबाद को उम्मीद थी कि सीमा पर शांति रहेगी, लेकिन इसके विपरीत टीटीपी के हमलों में भारी वृद्धि हुई है। भारत का क्या रहेगा स्टैंड? दक्षिण एशिया में बढ़ते कूटनीतिक और सैन्य तनाव के बीच भारत ने एक बार फिर अपना रुख स्पष्ट किया है। विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान कहा था कि पाकिस्तान के साथ भारत की एकमात्र और सबसे बड़ी समस्या 'सीमा पार आतंकवाद' है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब तक इस जड़ को नहीं काटा जाता, तब तक संबंधों में सुधार की गुंजाइश सीमित है। रणधीर जायसवाल का यह बयान पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ की उस धमकी के संदर्भ में आया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर काबुल अपनी जमीन पर पनप रहे आतंकवाद को नहीं रोकता तो इस्लामाबाद अफगानिस्तान के अंदर हवाई हमले करने से पीछे नहीं हटेगा। जब जायसवाल से इस संबंध में भारत की स्थिति के बारे में पूछा गया तो उन्होंने सधे हुए शब्दों में कहा, "आप जानते हैं कि अफगानिस्तान के साथ हमारे संबंध किस स्तर पर हैं और पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्तों की क्या स्थिति है। मैं इसे यहीं छोड़ूंगा। जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, हमारे बीच असली समस्या सीमा पार आतंकवाद है, जिसे संबोधित किया जाना अनिवार्य है।" विशेषज्ञों का मानना है कि रणधीर जायसवाल का बयान यह दर्शाता है कि भारत इस क्षेत्र में हो रही सैन्य हलचलों पर पैनी नजर रखे हुए है। भारत ने हमेशा इस बात की वकालत की है कि आतंकवाद किसी भी रूप में हो, वह क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा है। हालांकि, भारत ने अफगानिस्तान में तालिबान शासन के साथ अपने संबंधों को मानवीय और रणनीतिक स्तर पर संतुलित रखा है, जो पाकिस्तान की तुलना में कहीं अधिक स्थिर नजर आते हैं।  

एआई फॉर संस्कृति इंटरनेशनल समिट: देसंविवि का जिनेवा स्थित ग्लोबलेथिक्स व इरोज इंटरनेशलन के साथ हुआ एमओयू

हरिद्वार देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार में आयोजित ‘एआई फॉर संस्कृति इंटरनेशनल समिट’ ने तकनीक और मानवीय मूल्यों के समन्वय की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल की। इस समिट का सबसे महत्वपूर्ण क्षण देसंविवि और जिनेवा स्थित अंतरराष्ट्रीय संस्था ग्लोबेथिक्स के बीच हुए समझौता ज्ञापन पर औपचारिक हस्ताक्षर रहा। इस अवसर पर देसंविवि के प्रतिकुलपति डॉ चिन्मय पण्ड्या एवं ग्लोबलेथिक्स के कार्यकारी निदेशक डॉ फादी दाऊ ने एमओयू पर हस्ताक्षर किया। यह साझेदारी वैश्विक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) परिदृश्य में नैतिकता, सांस्कृतिक संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों के संस्थागत समावेश की दिशा में एक युगांतरकारी कदम मानी जा रही है। समझौते का उद्देश्य केवल शैक्षणिक सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उच्च-स्तरीय अनुसंधान, नीतिगत विमर्श और मूल्य-आधारित तकनीकी ढांचे के विकास पर केंद्रित है—ऐसा ढांचा जो मशीनी बुद्धिमत्ता को मानवीय संवेदनाओं से जोड़े। वहीं समिट के दौरान वैश्विक पहल को और विस्तार देते हुए इरोज इंटरनेशनल के साथ एक महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किया गया। इसके अंतर्गत संस्कृति जीपीटी और धर्म जीपीटी जैसे अभिनव, मूल्य-संचालित डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित करने पर सहमति बनी। इस समझौते पर देसंविवि के प्रतिकुलपति डॉ चिन्मय पण्ड्या एवं इरोज इंटरनेशनल की सीईओ डॉ शिल्पा देसाई ने हस्ताक्षर किया। उल्लेखनीय है कि इरोज इंटरनेशनल को 12000 से अधिक छोटी बडी फिल्मों को निर्माण का श्रेय जाता है। इन प्रस्तावित समझौते का लक्ष्य भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक विमर्श और नैतिक दृष्टिकोण को एआई तकनीक के माध्यम से वैश्विक मंच तक पहुँचाना है। यह पहल इस विचार को पुष्ट करती है कि आधुनिक तकनीक केवल गणनात्मक उपकरण नहीं, बल्कि सभ्यताओं के मध्य संवाद, वैश्विक सद्भाव और लोक-कल्याण का सशक्त माध्यम बन सकती है। हरिद्वार की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से प्रारंभ हुआ यह अंतरराष्ट्रीय अभियान डिजिटल क्रांति को ‘संस्कार’ और ‘संस्कृति’ की गरिमा से मंडित करने का प्रयास है। यह समझौता एक प्रतीक है—कि भविष्य की एआई नीतियाँ केवल एल्गोरिदम और डेटा पर नहीं, बल्कि नैतिक चेतना और मानवीय संवेदनशीलता पर भी आधारित होंगी। हरिद्वार से जिनेवा तक जुड़ा यह नैतिकता का सूत्र वैश्विक एआई विमर्श को एक नई दिशा देने की क्षमता रखता है—जहाँ तकनीक और मानवता परस्पर पूरक बनकर विश्व-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करें।

सीएम धामी ने स्कूल के बच्चों के साथ सुनी पीएम मोदी के मन की बात

देहरादून सीएम धामी ने कहा कि प्रधानमंत्री ने इस एपिसोड में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) पर वैश्विक शिखर सम्मेलन, अंगदान की प्रेरणादायक कहानियां तथा डिजिटल अरेस्ट जैसी धोखाधड़ी से सावधानी बरतने पर जोर दिया। मुख्यमंत्री  पुष्कर सिंह धामी ने आज मुख्यमंत्री आवास में जन प्रतिनिधियों और संस्कृति स्कूल के बच्चों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात कार्यक्रम के 131वें एपिसोड को सुना। मुख्यमंत्री  ने कहा कि मन की बात कार्यक्रम जन-जन को प्रेरित करने वाला माध्यम है, जो नवाचारों, सामाजिक एकता और राष्ट्र निर्माण में योगदान को प्रोत्साहित करता है।  

जम्मू-कश्मीर: किश्तवाड़ एनकाउंटर में जैश-ए-मोहम्मद के दो आतंकियों का अंत

किश्तवाड़ जम्मू-कश्मीर पुलिस, आईबी (इंटेलिजेंस ब्यूरो) और अपने इंटेलिजेंस सोर्स से मिली भरोसेमंद इंटेलिजेंस इनपुट के आधार पर, किश्तवाड़ इलाके में ऑपरेशन त्राशी-I के तहत एक सोचा-समझा जॉइंट ऑपरेशन शुरू किया गया ताकि इलाके में एक्टिव आतंकवादियों को ट्रैक और न्यूट्रलाइज किया जा सके। जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले के एक दूर-दराज के इलाके में रविवार को सुरक्षाबलों के साथ एनकाउंटर में पाकिस्तान के जैश-ए-मोहम्मद (JeM) से जुड़े दो आतंकवादी मारे गए। सेना ने कहा कि आतंकवादी चटरू बेल्ट के पासेरकुट इलाके में 'त्राशी-I' ऑपरेशन के दौरान मारे गए और उनके पास से हथियार और गोला-बारूद बरामद किया गया, जिसमें दो एके-47 राइफलें भी शामिल हैं। जम्मू-कश्मीर पुलिस, आईबी (इंटेलिजेंस ब्यूरो) और अपने इंटेलिजेंस सोर्स से मिली भरोसेमंद इंटेलिजेंस इनपुट के आधार पर, किश्तवाड़ इलाके में ऑपरेशन त्राशी-I के तहत एक सोचा-समझा जॉइंट ऑपरेशन शुरू किया गया ताकि इलाके में एक्टिव आतंकवादियों को ट्रैक और न्यूट्रलाइज किया जा सके। सेना की व्हाइट नाइट कोर ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, "पहले हुए सफल कॉन्टैक्ट के बाद, CIF (काउंटर-इंटेलिजेंस फोर्स) डेल्टा की टुकड़ियों ने पुलिस और सीआरपीएफ के साथ मिलकर आज सुबह लगभग 11 बजे मुश्किल इलाके में आतंकवादियों से फिर से भिड़ंत हुई।" सेना ने कहा कि टैक्टिकल सटीकता, बिना रुकावट तालमेल और पक्के इरादे का परिचय देते हुए, टुकड़ियों ने एनकाउंटर साइट पर कब्ज़ा कर लिया, जहाँ दो आतंकवादियों को सफलतापूर्वक न्यूट्रलाइज़ कर दिया गया है। इसमें कहा गया, "शिकार जारी है – जो लोग शांति भंग करना चाहते हैं, उन्हें कोई पनाह नहीं मिलेगी।" शुरुआती जानकारी का हवाला देते हुए, अधिकारियों ने कहा कि मारे गए दोनों आतंकवादी पाकिस्तानी नागरिक हैं और प्रतिबंधित जैश के सदस्य हैं। आतंकवादी पहाड़ियों की तलहटी में एक मिट्टी के घर के अंदर छिपे हुए पाए गए। उन्होंने बताया कि एक पहाड़ी पर हमला किया और पास आ रही सर्च पार्टी पर गोलियां चला दीं, जिससे जोरदार गोलीबारी हुई। अधिकारियों ने बताया कि इलाके में सर्च ऑपरेशन अभी भी जारी है। पिछले महीने चटरू जंगल इलाके में आतंकवादियों और सुरक्षा बलों के बीच करीब आधा दर्जन बार गोलीबारी हुई, जिसमें एक सैनिक और एक आतंकवादी मारा गया। रविवार को दो आतंकवादियों के मारे जाने के साथ, इस साल जम्मू इलाके में अलग-अलग मुठभेड़ों में सुरक्षा बलों ने कुल छह JeM आतंकवादियों को मार गिराया है। इससे पहले, उधमपुर में दो और कठुआ जिले में एक आतंकवादी मारा गया था।