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केंद्रीय कर्मचारियों के लिए बड़ी खबर: 10 साल बाद सरकारी स्वास्थ्य योजना में बदलाव, जानें नए नियम और फायदे

नई दिल्ली केंद्र सरकार ने 10 साल बाद केंद्रीय सरकारी स्वास्थ्य योजना (CGHS) की दरों में बड़ा संशोधन किया है, जो 13 अक्टूबर से लागू होगा। इससे करीब 46 लाख कर्मचारी और पेंशनर्स को राहत मिलेगी। नई दरें अब अस्पताल कैटेगरी, शहर कैटेगरी और वार्ड टाइप के आधार पर तय होंगी। इससे निजी अस्पतालों को भी लाभ होगा, क्योंकि दरें औसतन 25–30% तक बढ़ाई गई हैं। सरकार ने सभी अस्पतालों को नई दरें स्वीकार करने का निर्देश दिया है, वरना उन्हें सूची से हटाया जाएगा। इस कदम से कैशलेस इलाज की सुविधा में सुधार और अस्पतालों की आय दोनों बढ़ने की उम्मीद है। क्यों जरूरी था बदलाव पिछले कई सालों से सरकारी कर्मचारी और पेंशनर्स शिकायत कर रहे थे कि CGHS से जुड़े अस्पताल कैशलेस इलाज देने से इनकार करते हैं। मरीजों को पहले इलाज के पैसे खुद देने पड़ते थे और फिर महीनों बाद रिफंड मिलता था। दूसरी ओर, निजी अस्पतालों का कहना था कि पुरानी दरें बहुत कम थीं और मौजूदा मेडिकल खर्चों के अनुसार नहीं थीं। बता दें कि आखिरी बार CGHS की दरों में बड़ा बदलाव 2014 में किया गया था। तब से अब तक सिर्फ छोटे सुधार हुए थे, कोई व्यापक संशोधन नहीं हुआ था। कर्मचारी यूनियनों की मांग का असर इस साल अगस्त में नेशनल फेडरेशन ऑफ सेंट्रल गवर्नमेंट एम्प्लॉइज यूनियन्स ने सरकार को ज्ञापन सौंपा था। उन्होंने कहा था कि कैशलेस सुविधा न मिलने से कर्मचारियों और पेंशनर्स को आर्थिक कठिनाई हो रही है। इसके बाद सरकार ने यह अहम फैसला लिया। नई CGHS दरें कैसे तय होंगी नई दरें अब चार मुख्य बातों पर आधारित होंगी: 1. अस्पताल का एक्रेडिटेशन (NABH/NABL) 2. अस्पताल का प्रकार (जनरल या सुपर स्पेशियलिटी) 3. शहर की श्रेणी (X, Y, Z) 4. मरीज का वार्ड प्रकार (जनरल, सेमी-प्राइवेट, प्राइवेट) नए नियमों के अनुसार, जो अस्पताल NABH/NABL प्रमाणित नहीं हैं, उन्हें 15% कम दरें मिलेंगी। सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों को 15% अधिक दरें मिलेंगी। शहरों की श्रेणी के अनुसार दरें-     Y (टियर-II) शहर: X शहरों से 10% कम     Z (टियर-III) शहर: X शहरों से 20% कम     पूर्वोत्तर राज्य, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख – Y श्रेणी के अंतर्गत रखे गए हैं। वार्ड के हिसाब से दरें- • जनरल वार्ड: 5% कम • प्राइवेट वार्ड: 5% ज्यादा • ओपीडी, रेडियोथैरेपी, डेकेयर और छोटी प्रक्रियाओं की दरें पहले जैसी रहेंगी। • कैंसर सर्जरी की दरें भी समान रहेंगी, लेकिन कीमोथैरेपी और रेडियोथैरेपी की दरें संशोधित की गई हैं। अस्पतालों के लिए अनिवार्यता स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी अस्पतालों को निर्देश दिया है कि वे 13 अक्टूबर तक नई दरों को स्वीकार करें। जो अस्पताल ऐसा नहीं करेंगे, उन्हें डि-एम्पैनल (CGHS सूची से हटाया) जा सकता है। कैशलेस इलाज में सुधार की उम्मीद नई दरों के बाद उम्मीद है कि अस्पताल अब CGHS मरीजों को आसानी से कैशलेस इलाज देंगे। इससे कर्मचारियों और पेंशनर्स को जेब से पैसे खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ेगी और रिफंड की झंझट खत्म होगी। CGHS पैकेज में क्या-क्या शामिल है CGHS पैकेज में इलाज से जुड़ी लगभग सारी सुविधाएं शामिल हैं-     कमरे और बेड का खर्च     भर्ती शुल्क     एनेस्थीसिया, दवाइयां और मेडिकल सामान     डॉक्टर और विशेषज्ञ की फीस     ICU/ICCU खर्च     ऑक्सीजन, वेंटिलेटर, ऑपरेशन थिएटर शुल्क     फिजियोथेरेपी, टेस्ट, ब्लड ट्रांसफ्यूजन आदि 90 दिन में नई MoA पर साइन जरूरी अस्पतालों को अब 90 दिनों के भीतर नया समझौता (MoA) साइन करना होगा। पुरानी MoA की वैधता 13 अक्टूबर को खत्म हो जाएगी। कुल मिलाकर क्या फायदा होगा यह संशोधन कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए बेहतर और कैशलेस इलाज सुनिश्चित करेगा, जबकि अस्पतालों को उचित दरों पर भुगतान मिलेगा। लगभग एक दशक बाद हुआ यह सुधार CGHS सिस्टम को अधिक व्यवहारिक, पारदर्शी और भरोसेमंद बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।

केंद्रीय बलों की तैनाती से मजबूत होगी सुरक्षा, जम्मू-कश्मीर से बिहार पहुँचीं 71 CRPF कंपनियां

नई दिल्ली केंद्र सरकार ने बिहार में विधानसभा चुनाव को निष्पक्ष एवं शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराने के लिए पर्याप्त संख्या में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को तैनात किया है। इस बार के विधानसभा चुनाव में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की फिलहाल 500 कंपनियों को तैनात किया गया है। केंद्रीय बलों की अधिकांश कंपनियां, रविवार को बिहार में पहुंच चुकी हैं। अब इन्हें लोकल पुलिस प्रशासन के साथ विभिन्न क्षेत्रों में तैनात किया जाएगा। निष्पक्ष चुनाव की गारंटी देने के लिए केंद्रीय बलों के जो 50,000 जवान बिहार पहुंचे हैं, उनमें सीआरपीएफ की वे 71 कंपनियां भी शामिल हैं, जिन्हें विशेष तौर पर जम्मू-कश्मीर से बुलाया गया है। चुनावी ड्यूटी पर मोर्चा संभालने वाले केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में बीएसएफ, सीआईएसएफ, एसएसबी और आईटीबीपी भी शामिल हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, बिहार में शांतिपूर्ण तरीके से चुनाव को संपन्न कराने के लिए सीआरपीएफ की 118 कंपनियों को तैनात किया गया है। इनमें से 71 कंपनियां, जम्मू-कश्मीर से बुलाई गई हैं। चुनाव में किसी तरह की कोई हिंसा न हो, इसके लिए केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है। विधानसभा चुनाव के संवेदनशील बूथों पर कोई अप्रिय घटना न हो और बिना किसी भय के लोग चुनाव प्रक्रिया में भाग ले सकें, इसके लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अर्धसैनिक बलों को भारी संख्या में बिहार के लिए रवाना किया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बिहार में निष्पक्ष एवं शांतिपूर्ण चुनाव कराने के लिए विशेष रणनीति तैयार की है। विधानसभा चुनाव में कोई भी आपराधिक या असामाजिक तत्व, किसी तरह की बाधा न पहुंचा सकें, इसके सीएपीएफ की 500 कंपनियों को तैनात किया गया है। आने वाले दिनों में केंद्रीय बलों की संख्या बढ़ भी सकती है। अग्रिम तैनाती के दौरान केंद्रीय बल, बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में एरिया डोमिनेशन, विश्वास निर्माण के उपाय, फ्लैग मार्च और सर्विलांस का काम करेंगे। हालांकि प्रशासन द्वारा डिटेल डेपलॉयमेंट प्लान को अभी अंतिम रूप दिया जा रहा है। बिहार सरकार से आग्रह किया गया है कि वह केंद्रीय बलों के लोकल ट्रांसर्पोटेशन, लॉजिस्टिक, रहने की जगह और दूसरी आवश्यकताओं बाबत त्वरित निर्णय लें। चुनाव के दौरान सीएपीएफ की कंपनियों द्वारा किए गए सभी तरह के मूवमेंट की जानकारी प्रतिदिन, केंद्रीय गृह मंत्रालय को दी जाएगी।  

नमो भारत ट्रेन का भव्य स्टेशन बनेगा 5 एकड़ जमीन पर, जानें क्या खास होगा इसमें?

नई दिल्ली नमो भारत का नया स्टेशन धारूहेड़ा में लगभग पांच एकड़ क्षेत्र में बनाया जाएगा। इस संबंध में एनसीआरटीसी ने हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण और हरियाणा राज्य औद्योगिक एवं अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड से जमीन उपलब्ध कराने का आग्रह किया है। यह स्टेशन निर्माण परियोजना क्षेत्र की परिवहन क्षमता और कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगी। एनसीआरटीसी की योजना के तहत, दिल्ली-जयपुर हाईवे पर दोनों तरफ स्टेशन तक पहुंचने के लिए प्रवेश और निकासी की व्यवस्था बनाई जाएगी। जयपुर से दिल्ली की तरफ, अरावली के समीप नमो भारत का स्टेशन स्थित होगा। जहां स्टेशन बनाने का प्रस्ताव है, उस क्षेत्र की भूमि विवरण इस प्रकार है. तीन एकड़ जमीन: औद्योगिक एवं अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड के अधीन दो एकड़ जमीन: हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (HSVP) के अधीन स्टेशन के पूर्व प्लान के मुताबिक हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण की आधा एकड़ जमीन की जरूरत थी, लेकिन नए प्लान के अनुसार अधिक जमीन की आवश्यकता पड़ी है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र परिवहन निगम (एनसीआरटीसी) की योजना के तहत, गुरुग्राम से फरीदाबाद होते हुए ग्रेटर नोएडा तक प्रस्तावित नमो भारत ट्रेन के लिए भू-तकनीकी सर्वेक्षण पूरा हो चुका है। इस कॉरिडोर की डीपीआर (डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट) तैयार करने के लिए एक कंपनी का चयन किया गया है और उसे कार्य सौंपा जा चुका है। प्रस्तावित कॉरिडोर की लंबाई: लगभग 65 किलोमीटर मुख्य स्टेशन: पहला स्टेशन: दिल्ली-जयपुर हाईवे के पास, इफ्को चौक के समीप दूसरा स्टेशन: गुरुग्राम, गोल्फ कोर्स रोड, सेक्टर-54 (मेट्रो स्टेशन के पास) इस योजना से दिल्ली-एनसीआर में यात्री परिवहन और कनेक्टिविटी में सुधार होगा और क्षेत्रीय विकास को गति मिलेगी। स्टेशन के समीप दमकल केंद्र भी बनाया जाएगा नमो भारत स्टेशन के समीप एक दमकल केंद्र का निर्माण किया जाएगा। इसके लिए स्टेशन और दमकल केंद्र के बीच नौ मीटर चौड़ी सड़क बनाई जाएगी। पहले इस स्टेशन के लिए एनसीआरटीसी को लगभग चार एकड़ जमीन की जरूरत थी। अब, स्टेशन को मल्टीमॉडल इंटीग्रेशन के आधार पर तैयार किया जा रहा है, जिसके लिए एक एकड़ अतिरिक्त जमीन की आवश्यकता पड़ी है। स्टेशन की योजना को दोबारा तैयार करके, दोनों विभागों से जमीन उपलब्ध कराने का आग्रह किया गया है, ताकि परियोजना को समय पर और सुचारू रूप से पूरा किया जा सके। नमो भारत ट्रेन के लिए विभिन्न स्टेशनों और सुविधाओं के निर्माण हेतु NCRTC को जमीन की आवश्यकता इस प्रकार है: इफ्को चौक स्टेशन: लगभग 8 एकड़ जमीन मुख्य स्टेशन: 7 एकड़ जमीन प्रवेश और निकासी मार्ग (दूसरी तरफ): 1 एकड़ जमीन झाड़सा: 1.5 एकड़ जमीन सेक्टर-33: 0.5 एकड़ जमीन हीरो होंडा चौक के समीप: लगभग 2 एकड़ जमीन धारूहेड़ा: डिपो निर्माण के लिए अतिरिक्त जमीन का आग्रह इस विस्तृत भूमि आवंटन से नमो भारत परियोजना का निर्माण सुचारू और समयबद्ध तरीके से पूरा किया जा सकेगा, जिससे दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में बेहतर परिवहन सुविधा उपलब्ध होगी। दमकल सेंटर बनेगा नमो भारत स्टेशन के पास एक दमकल सेंटर का निर्माण किया जाएगा। इसके लिए स्टेशन और दमकल सेंटर के बीच 9 मीटर चौड़ी सड़क बनाई जाएगी। पहले इस स्टेशन के लिए NCRTC को लगभग 4 एकड़ जमीन की आवश्यकता थी। अब स्टेशन को मल्टीमॉडल इंटीग्रेशन के आधार पर तैयार किया जाएगा। स्टेशन की योजना को दोबारा तैयार किया गया है और दोनों संबंधित विभागों से जमीन उपलब्ध कराने का आग्रह किया गया है, ताकि परियोजना सुचारू रूप से और समय पर पूरी की जा सके।

Iran Currency Reform: ईरान की करेंसी से 0000 हटाने का फैसला, संसद ने किया विधेयक पारित

तेहरान ईरान की संसद ने एक ऐत‍िहास‍िक बिल पास क‍िया है. और अब उनकी करेंसी रियाल में चार शून्य हट जाएंगे. मतलब, 10,000 पुराने रियाल बराबर अब एक नया रियाल होगा. ये सिर्फ नंबरों का खेल लगता है, लेकिन इसके पीछे महंगाई, पाबंद‍ियां, और इकॉनमी की बदहाली की कहानी है. तो ईरान ऐसा कर क्‍यों रहा है? इससे क्‍या फायदा होगा? और क्‍या इससे पहले क‍िसी और देश ने ऐसा क‍िया है? अगर क‍िया है तो क्‍या उसकी अर्थव्‍यवस्‍था में सुधार आया? सबसे पहले, समझें कि ईरान की करेंसी की हालत इन द‍िनों खराब है. रियाल 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ही जूझ रहा है, यह अब कागज से भी सस्ता हो गया. आप इसे ऐसे समझ‍िए क‍ि एक अमेरिकी डॉलर अगर आपको खरीदना तो 11,50,000 रियाल चाहिए. मतलब, एक रोटी खरीदने के लिए लाखों के नोट गिनने पड़ते हैं. दूसरी बात, महंगाई पिछले कई सालों से 35% से ऊपर है. कभी यह 40%, कभी 50% तक भी पहुंच जाती है. 2022 में इंटरनेशनल मॉन‍िटरी फंड की एक रिपोर्ट आई, जिससे ईरान की खस्‍ता हालत को बयां क‍िया. ईरान तेल निर्यात पर निर्भर है, लेकिन अमेरिका की पाबंदियों की वजह से चीन को छोड़कर कोई उससे तेल नहीं खरीदता. वर्ल्‍ड बैंक कहता है क‍ि तेल एक्‍सपोर्ट न होने से उसके खजाने पर भारी असर पड़ा. नतीजा महंगाई चार साल तक 40% से ऊपर रही. महंगाई चरम पर पीछे मुड़कर देखें तो ये नई बात नहीं. 1979 के बाद से ईरान में महंगाई दर 10 फीसदी से ज्‍यादा ही रही है. इस्‍लामिक क्रांत‍ि के बाद बाहर से मंगाई गई चीजों की कीमतें आसमान छू रही हैं. इंपोर्ट ज्‍यादा है और एक्‍सपोर्ट कम है, इसकी वजह से करेंसी का मूल्‍य ग‍िरता जा रहा है. 2023 में तो रियाल का पतन इस कदर हुआ क‍ि महंगाई ने इतना बुरा था कि मुद्रास्फीति ने मुद्रा अवमूल्यन को पछाड़ दिया. पाबंद‍ियों की वजह से विदेशी मुद्रा आई नहीं, दुन‍िया से संबंध तनावपूर्ण हो गए. राजनीत‍िक अलगाव ने अर्थव्‍यवस्‍था का दम घोट द‍िया. जीरो घटाने से होगा क्‍या? अब सवाल ये कि शून्य हटाने से क्या होगा? ईरान की सरकारी मीडिया IRNA ने बताया क‍ि रियाल वही रहेगा, सिर्फ करेंसी से चार शून्य हटाए जाएंगे. केंद्रीय बैंक को तैयारी के ल‍िए दो साल मिलेंगे. फिर तीन साल का बदलाव दौर होगा, जहां पुराने और नए दोनों नोट चलेंगे. 10,000 पुराना रियाल अब 1 नया रियाल बन जाएगा. इससे लेनदेन आसान हो जाएगा. बिल जमा करने में ग‍िनती में मुश्क‍िल होती थी, वो द‍िक्‍कत खत्‍म हो जाएगी. इसे ऐसे समझें क‍ि पहले रोटी के ल‍िए जहां 10000 रियाल देने पड़ते थे, अब एक रियाल देना होगा. लाखों की बजाय अब सैकड़ों ग‍िनना होगा. दूसरे देशों ने क्या किया     वेनेजुएला: महंगाई चरम पर हुई तो 2018 में 5 शून्य हटाए, फ‍िर 2021 में भी ऐसा क‍िया. लेकिन महंगाई अभी भी ऊंची.     जिम्बाब्वे: 2000 के दशक में ऐसा क‍िया. 10 खरब डॉलर के नोट से जीरो हटाए. लेकिन व्‍यवस्‍था नहीं सुधरी.     तुर्की: सफल कहानी. 2005 में तुर्की ने 6 शून्य हटाए, नया लिरा लाया. विश्वसनीयता लौटी, मुद्रास्फीति नियंत्रण में आई.     ब्राजील: 1994 में रियाल योजना से महंगाई रोकी. नतीजा काफी बदलाव हुआ और ब्राजील कंपटीशन कर रहा है.     घाना: 2007 में सिस्टी हटाई, लेकिन विदेशी निवेश पर मिला-जुला असर रहा. सोशल मीडिया में उड़ा मजाक सोशल मीडिया में लोग इसका मजाक उड़ा रहे हैं. एक शख्‍स ने लिखा, ईरानी रियाल कागज से भी सस्ता है. 1 मिलियन रियाल प्रति डॉलर. सेंट्रल बैंक जीरो हटाने की योजना बना रहा. दूसरे ने तंज कसा, रियाल को बदल दो ‘ईरानी धुंध’ से. जनता का मूड कैसे बदलोगे? यह हताशा है, क्योंकि 80% लोग अब जरूरी चीजों पर ज्‍यादा खर्च कर रहे हैं. उनकी खरीदने की क्षमता कम हो गई है.

अमेरिका को यूरोप का धोखा? स्पेन ने F-35 छोड़ तुर्की के KAAN फाइटर जेट में दिखाई दिलचस्पी

मैड्रिड अमेरिका के सुपर एडवांस्ड F-35 स्टील्थ फाइटर जेट को लेकर यूरोप का भरोसा अब डगमगा गया है. बढ़ती लागत, सॉफ्टवेयर देरी और लगातार हो रही तकनीकी गड़बड़ियों के बीच स्पेन ने अमेरिकी F-35 को ठुकरा दिया है. अब खबर है कि यूरोप का यह अहम देश तुर्की के KAAN फाइटर जेट को खरीदने पर गंभीरता से विचार कर रहा है. यह कदम न केवल यूरोप की रक्षा रणनीति को नया मोड़ देगा बल्कि अमेरिका के वर्चस्व पर भी सीधा झटका माना जा रहा है. स्पेन का यह फैसला ऐसे वक्त में आया है जब कई अन्य देश कनाडा, पुर्तगाल और स्विट्ज़रलैंड भी F-35 प्रोग्राम से दूरी बना रहे हैं. वजह वही: बढ़ते खर्चे, लगातार सॉफ्टवेयर फेलियर और अमेरिकी नियंत्रण को लेकर उठे सवाल. दरअसल, अमेरिका पर आरोप है कि F-35 का सोर्स कोड वह खुद तक सीमित रखता है. इससे यह जेट इस्तेमाल करने वाले देशों की डिजिटल निर्भरता उसी पर बनी रहती है. अब यूरोप ने “Rearm Europe Program” के तहत अमेरिका पर अपनी रक्षा निर्भरता घटाने का फैसला किया है. F-35 छोड़ अब स्पेन की नजर तुर्की के KAAN पर स्पेन ने अपने 2023 के रक्षा बजट में 6.25 बिलियन यूरो (करीब 7.24 अरब डॉलर) नए फाइटर जेट्स के लिए रखे थे. शुरुआत में माना जा रहा था कि स्पेन Eurofighter Typhoon या फिर Future Combat Air System (FCAS) में से किसी एक को चुनेगा. लेकिन अब स्पेनिश बिज़नेस डेली “El Economista” के मुताबिक मैड्रिड सरकार तुर्की के KAAN फाइटर जेट को खरीदने पर विचार कर रही है. जो फिलहाल विकास के दौर में है और 2030 के शुरुआती दशक में सेवा में आने की उम्मीद है. क्यों डगमगा रहा है यूरोप का FCAS प्रोजेक्ट? यूरोप का महत्वाकांक्षी Future Combat Air System (FCAS) प्रोजेक्ट अब गंभीर संकट में है. फ्रांस की Dassault Aviation और जर्मनी की Airbus Defence के बीच नियंत्रण को लेकर खींचतान ने इस कार्यक्रम की रफ्तार लगभग रोक दी है. पहले इसका परीक्षण उड़ान 2027-29 के बीच होने की उम्मीद थी, लेकिन अब यह टाइमलाइन पूरी तरह बिगड़ चुकी है. ब्रिटिश मीडिया द इकोनॉमिक टाइम्स और फाइनेंशियल टाइम्स ने रिपोर्ट किया है कि FCAS “पूरी तरह ध्वस्त” भी हो सकता है. इस बीच स्पेन को अगले दशक में अपने पुराने F-18 और F-5 विमानों को बदलने की जरूरत है. ऐसे में तुर्की का KAAN एक व्यावहारिक और तेजी से उपलब्ध विकल्प बन रहा है. स्पेन-तुर्की रक्षा साझेदारी गहराती दिख रही है स्पेन और तुर्की के बीच रक्षा सहयोग पिछले कुछ वर्षों में काफी मजबूत हुआ है. दिसंबर 2024 में दोनों देशों ने 24 Hürjet एडवांस्ड जेट ट्रेनर विमानों के लिए समझौता किया था. सितंबर 2025 में स्पेन के मंत्रिमंडल ने 45 Hürjet विमान खरीदने को मंजूरी दे दी. जिनकी कीमत 3.68 अरब यूरो बताई जा रही है. अब KAAN की संभावित डील इस रिश्ते को और आगे बढ़ाएगी. KAAN की ताकत- F-35 को टक्कर देने वाला जेट तुर्की का KAAN फाइटर जेट फरवरी 2024 में अपनी पहली उड़ान भर चुका है. इसे Turkish Aerospace Industries (TUSAŞ) ने तैयार किया है. तुर्की ने घोषणा की है कि 2028 तक 20 ऐसे विमान उसकी वायुसेना में शामिल हो जाएंगे. KAAN को “पांचवीं पीढ़ी” का जेट माना जाता है, जिसमें स्टील्थ डिजाइन, एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड कॉम्बैट क्षमता, और हाई-स्पीड एवियोनिक्स सिस्टम शामिल हैं. TUSAŞ के सीईओ Temel Kotil ने मई 2024 में दावा किया था, “KAAN, F-35 से बेहतर विमान है.” इंडोनेशिया बना पहला ग्राहक, स्पेन हो सकता है दूसरा इंडोनेशिया पहले ही 48 KAAN जेट्स खरीदने का करार कर चुका है, जिसकी डिलीवरी 10 साल में पूरी होगी. वहीं, अज़रबैजान, पाकिस्तान, सऊदी अरब और यूएई भी इसमें दिलचस्पी दिखा चुके हैं. अगर स्पेन यह डील साइन करता है, तो वह KAAN का दूसरा अंतरराष्ट्रीय ग्राहक बन जाएगा जो तुर्की की रक्षा क्षमता के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी.  

मच्छरों की पसंद-नापसंद का खुलासा, रिसर्च में पता चला—बियर पीने वालों पर ज्यादा हमला करते हैं

नई दिल्ली नीदरलैंड के साइंटिस्ट ने एक रिसर्च किया जिसमें सामने आया कि जो लोग शराब पीते हैं, उन्हें मच्छर सबसे ज्यादा काटते हैं. इस रिसर्च को  म्यूजिक फेस्टिवल में शामिल होने वाले 500 लोगों में किया गया. इस दौरान 500 लोगों के हाथ मच्छर से भरे डब्बे में डलवाया और इसे कैमरे में रिकॉर्ड किया. इस रिसर्च में पाया गया कि जिन लोगों ने शराब पी रखी थी, उन्हें 34 फीसदी ज्यादा मच्छर काट रहे थे. वहीं, जिन लोनों ने नहाया नहीं था, या सनस्क्रीन लगा कर नहीं गए थे या पिछले रात किसी के साथ सोए थे. उनलोगों को भी मच्छर ने ज्यादा काटा. इस रिसर्च में पता लगा कि शराब पीने वाले इंसान को मच्छर सबसे ज्यादा काटते हैं.  म्यूजिक फेस्टिवल में किया अनोखा रिसर्च नीदरलैंड के सबसे मशहूर म्यूजिक फेस्टिवल लोलैंड्स (Lowlands) में सिर्फ म्यूजिक ही नहीं, बल्कि मच्छरों का भी धमाल देखने को मिला. साल 2023 में जब बिली इलिश और फ्लोरेंस + द मशीन ( Billie Eilish and Florence + The Machine) जैसे बड़े कलाकार स्टेज पर परफॉर्म कर रहे थे, उसी फेस्टिवल में रैडबाउड यूनिवर्सिटी, निजमेगेन के कुछ साइंटिस्ट भी पहुंचे थे, लेकिन वे गाने सुनने नहीं, बल्कि मच्छरों के रहस्य जानने आए थे.   इस रिसर्च टीम को फेलिक्स होल नाम की साइंटिस्ट लीड कर रही थीं, यह पता लगाना चाहती थी कि कुछ लोगों को मच्छर ज्यादा क्यों काटते हैं और कुछ को कम. इसके लिए उन्होंने फेस्टिवल में आए लोगों को एक खास एक्सपेरिमेंट में शामिल किया. वहां आए लोगों से कहा गया कि वे अपना हाथ मच्छरों से भरे एक डिब्बे में डालें,  लेकिन घबराइए नहीं. उनके हाथ एक सुरक्षित कपड़ों से ढके थे, जिससे मच्छर सूंघ तो सकते थे, पर काट नहीं सकते थे. तीन दिन तक चले इस फेस्टिवल में करीब 60,000 लोग शामिल हुए.  मच्छरों को बियर पसंद है, लेकिन नहाने से नफरत लोलैंड्स म्यूजिक फेस्टिवल में किए गए इस मजेदार रिसर्च से वैज्ञानिकों को कुछ दिलचस्प नतीजे मिले. फेस्टिवल के दौरान करीब 500 लोगों ने अपने हाथ मच्छरों से भरे जाल में डाली. हर एक्सपेरिमेंट को वीडियो में रिकॉर्ड किया गया ताकि बाद में देखा जा सके कि किसके हाथ पर कितने मच्छर बैठे और कितनी देर तक रहे. इसके साथ ही, सभी लोगों से एक प्रश्नावली (Questionnaire) भी भरवाई गई, जिसमें पूछा गया कि उन्होंने क्या खाया, क्या पिया या कैसे रहे. मच्छरों को पसंद आए ये लोग जब वैज्ञानिकों ने इन जवाबों को वीडियो से जोड़ा, तो सामने आया कि बीयर पीने वाले, मारिजुआना (गांजा) इस्तेमाल करने वाले, और दूसरों के साथ बिस्तर शेयर करने वाले लोग मच्छरों को सबसे ज्यादा पसंद आए! रिसर्ट टीम ने मजाकिया अंदाज में लिखा- मच्छरों को हमारे बीच के मौज-मस्ती करने वालों का स्वाद ज्यादा पसंद आता है. वहीं, जो लोग सनस्क्रीन लगाते थे या हाल ही में नहाए थे, उन्हें मच्छरों ने कम तवज्जो दी यानी की मच्छरों ने उन्हें ज्यादा नहीं काटा.  मच्छर ऐसे तय करते हैं अपना शिकार जब मच्छरों को लोगों का एक ग्रूप मिलता है, तो वे यह तय करने के लिए सबसे पहले लोगों को सूंघते हैं कि किसे काटना है और किसे नहीं. लेकिन अभी तक यह पूरी तरह पता नहीं चला कि उन्हें कौन-सी गंध सबसे ज्यादा पसंद आती है. हालांकि, रिसर्च में ये सामने आया कि मच्छरों को बीयर पीने वाले लोग ज्यादा पसंद आते हैं, लेकिन साइंटिस्ट फेलिक्स होल का कहना है कि शायद ऐसा शराब की वजह से नहीं,  बल्कि उनके व्यवहार में आने वाले बदलाव की वजह से होता है. उन्होंने बताया कि, “जो लोग शराब पीते हैं, वे ज्यादा जोश से नाचते हैं, जिससे उनके शरीर का तापमान और पसीने की गंध बदल जाती है और यही बात मच्छरों को आकर्षित कर सकती है.  हालांकि, म्यूजिक फेस्टिवल बीयर पीने वाले लोगों को ढूंढने की एक अच्छी जगह है. जो खुशी-खुशी अपने हाथ मच्छरों वाले डिब्बे में डालने को तैयार हो जाते हैं.  लेकिन ऐसी जगह पर रिसर्च करने के कुछ नुकसान भी होते हैं. सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि फेस्टिवल में आने वाले लोग ज्यादातर युवा और सेहतमंद होते हैं, जबकि आम आबादी में हर उम्र और स्वास्थ्य वाले लोग शामिल होते हैं. इसलिए यह समझने के लिए कि मच्छर असल में किन लोगों को ज्यादा काटते हैं, साइंटिस्ट को फेस्टिवल के बाहर भी ऐसे स्टडी करने होंगे. 

भारत में एस-400 का निर्माण शुरू, चीन-पाक के लिए चिंता की खबर, 10 रूसी रक्षा कवच से बढ़ेगी ताकत

नई दिल्ली पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर के दौरान S-400 ने पूरी दुनिया को अपना लोहा मनवाया. इस रूसी एयर डिफेंस सिस्टम ने भारतीय सेना को अपना कायल बना दिया है. एस-400 ने ऑपरेशन सिंदूर में न केवल दुश्मन पर हमले में अपनी ताकत दिखाई, बल्कि पाकिस्तान की हवाई हमले की क्षमता को भी पंगु कर दिया था. यहीं वजह से भारत अब रूस से 5 और एस-400 खरीदने की तैयारी कर रहा है. भारत ने रूस के साथ 2018 में ही पांच एस-400 सिस्टम के लिए 5.43 अरब डॉलर की डील की थी. इसके तहत अगले साल के अंत तक दो S-400 की सप्लाई होनी है. इसके साथ ही अब पांच और एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने पर बातचीत चल रही है. रक्षा मंत्रालय के शीर्ष अधिकारी इसके लेकर इस हफ्ते रूसी अधिकारियों से मुलाकात करने वाले हैं. इस मुलाकात में इस रूसी रक्षा कवच को मिलकर बनाने पर चर्चा किया जाएगा. माना जा रहा है कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की 5 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ होने वाली वार्षिक शिखर वार्ता से पहले इस सौदे को हरी झंडी मिल सकती है. भारत में भी बनेंगे S-400 हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के मुताबिक, भारत और रूस के बीच अतिरिक्त पांच सिस्टम की कीमत पर सहमति बन चुकी है. दोनों देश के बीच अब इस पर बातचीत चल रही है कि इनमें से तीन सिस्टम सीधे खरीदे जाएंगे और बाकी के दो S-400 टेक्नॉलजी ट्रांसफर के तहत निर्मित होंगे. यह सौदा सरकार-से-सरकार के बीच होगा और रखरखाव, मरम्मत और ओवरहॉल सुविधाएं भारतीय प्राइवेट सेक्टर की मदद से स्थापित की जाएंगी. Su-30 में लगेगा घातक हथियार वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह ने रूस की पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान Su-57 को लेने पर विचार की बात कही थी. हालांकि सरकार ने अब तक न Su-57 और न अमेरिकी F-35 लड़ाकू विमान को लेकर कोई निर्णय लिया है. उधर खबर है कि भारत रूस से 200 KM से अधिक रेंज वाली एयर-टू-एयर मिसाइल आरवीवी-बीडी (R-37) भी हासिल करना चाहता है, जिससे Su-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों की मारक क्षमता बढ़ाई जा सके. पाकिस्तान पहले ही चीन निर्मित 200 किमी रेंज वाली PL-15 मिसाइल का इस्तेमाल कर रहा है और इसे ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान भारत के खिलाफ भी तैनात किया था. R-37 मिसाइल को Su-30 एमकेआई में एकीकृत करने के लिए उसके ऑनबोर्ड रडार को अपग्रेड करना होगा. S-400 का ऑपरेशन सिंदूर में कमाल बता दें कि ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान एस-400 ट्रायम्फ सिस्टम ने पाकिस्तान के खिलाफ अपनी जबरदस्त क्षमता साबित की थी. पाकिस्तान ने 7 मई के हमले के बाद आदमपुर और भुज एयरबेस पर तैनात एस-400 को निशाना बनाने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हो पाया. इसके बाद 10 मई तक पाकिस्तान को अपने सभी एयर एसेट्स को भारतीय सीमा से 300 किमी दूर ले जाना पड़ा और मुश्किल से ही कोई विमान उड़ान भर सका. एस-400 की लंबी दूरी की मिसाइलों ने पाकिस्तान के एक विमान को पंजाब में 314 किमी की दूरी पर मार गिराया था और उत्तर में एफ-16 व जेएफ-17 लड़ाकू विमानों को भी ढेर किया था.  

यात्रा बन गई मौत का सफर: इटली में हादसे में 4 भारतीयों की गई जान

मटेरा दक्षिणी इटली के मटेरा शहर में एक सड़क दुर्घटना में चार भारतीय नागरिकों की मौत हो गई। रोम स्थित भारतीय दूतावास ने सोमवार को यह जानकारी दी। इटली की समाचार एजेंसी एएनएसए ने रविवार को यह जानकारी देते हुए बताया कि पीड़ित सात सीटों वाली रेनॉल्ट सीनिक कार में छह अन्य लोगों के साथ सवार थे। उनकी कार शनिवार को एग्री घाटी के मटेरा शहर के स्कैनजानो जोनिको नगरपालिका क्षेत्र में एक ट्रक से टकरा गई। समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक मृतकों की पहचान 34 वर्षीय कुमार मनोज, 33 वर्षीय सिंह सुरजीत, 31 वर्षीय सिंह हरविंदर और 20 वर्षीय सिंह जसकरण के रूप में की गयी है। भारतीय दूतावास ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘भारतीय दूतावास दक्षिणी इटली के मटेरा में एक सड़क दुर्घटना में चार भारतीय नागरिकों की दुखद मृत्यु पर गहरा शोक व्यक्त करता है।'' भारतीय दूतावास ने कहा, ‘‘हम विवरण प्राप्त करने के लिए स्थानीय इतालवी अधिकारियों के संपर्क में हैं। दूतावास संबंधित परिवारों को हर संभव कांसुलर सहायता प्रदान करेगा।'' एएनएसए ने बताया कि पांच घायलों को पोलिकोरो (माटेरा) के अस्पताल में स्थानांतरित किया गया, जबकि छठे और गंभीर रूप से घायल व्यक्ति को पोटेंजा के सैन कार्लो अस्पताल में स्थानांतरित किया गया।  

7 राज्यों में उपचुनाव: बिहार के चुनाव के साथ होगा मतदान

नई दिल्ली भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने सोमवार को बिहार विधानसभा चुनावों के अलावा जम्मू-कश्मीर, झारखंड, मिजोरम व राजस्थान सहित सात राज्यों की आठ विधानसभा सीटों पर उपचुनाव आयोजित करने की घोषणा की है। आयोग ने इन विधानसभा क्षेत्रों के लिए उपचुनाव की तिथियों का भी ऐलान कर दिया है। इन सभी सीटों पर 11 नवंबर को वोटिंग और 14 नवंबर को मतों की गिनती होगी। जम्मू-कश्मीर की दो सीटें बडगाम और नगरोटा में भी चुनाव होगा। ये दोनों सीटें पिछले एक साल से रिक्त पड़ी हैं। बडगाम उमर अब्दुल्ला के इस्तीफे के कारण खाली हुई, जबकि नगरोटा देवेंद्र राणा के निधन से। नगरोटा सीट पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) तथा नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के नेतृत्व वाले गठबंधन के बीच कड़ा मुकाबला तय है। इसके अलावा पंजाब की तरनतरण, झारखंड की घाटशिला तथा राजस्थान की अंता विधानसभा सीटों पर भी उपचुनाव आयोजित होंगे। उधर, तेलंगाना की जयंती हिल्स, मिजोरम की दम्पा और ओडिशा की नुआपाड़ा में भी चुनाव संपन्न होंगे।  

Nobel Prize 2025: मेडिसिन श्रेणी में मैरी ब्रंकॉ, रैम्सडेल और साकागुची को मिला सम्मान

 नईदिल्ली  नोबेल पुरस्कार की घोषणा ने दुनिया को एक बार फिर चमत्कार से रूबरू करा दिया. 2025 का नोबेल पुरस्कार फिजियोलॉजी या मेडिसिन (चिकित्सा) में अमेरिका की मैरी ई. ब्रंकॉ, अमेरिका के फ्रेड राम्सडेल और जापान के शिमोन सकागुची को दिया गया है. यह पुरस्कार उनकी 'पेरिफेरल इम्यून टॉलरेंस' (शरीर के बाहरी हिस्सों में इम्यून सिस्टम की सहनशीलता) से जुड़ी खोजों के लिए है. यह खोज शरीर की रक्षा प्रणाली को समझने में क्रांति लाई है, जो ऑटोइम्यून बीमारियों जैसे रूमेटॉइड आर्थराइटिस, टाइप-1 डायबिटीज और ल्यूपस के इलाज का रास्ता खोलेगी. स्टॉकहोम के कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट ने सोमवार को घोषणा की. इम्यून टॉलरेंस क्या है? शरीर की रक्षा प्रणाली का रहस्य हमारा शरीर इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता) से हमेशा खतरे से लड़ता है – जैसे वायरस या बैक्टीरिया से. लेकिन कभी-कभी यह सिस्टम गलती से अपने ही अंगों पर हमला कर देता है, जिसे ऑटोइम्यून बीमारी कहते हैं. पुराने वैज्ञानिकों को लगता था कि इम्यून सेल्स (रोगाणु से लड़ने वाली कोशिकाएं) शरीर के अंदर ही 'सहिष्णु' (टॉलरेंट) बन जाती हैं, जिसे सेंट्रल इम्यून टॉलरेंस कहते हैं. लेकिन विजेताओं ने दिखाया कि शरीर के बाहरी हिस्सों (पेरिफेरल) में भी एक खास तंत्र काम करता है, जो इम्यून सिस्टम को नियंत्रित रखता है. इससे शरीर के अंग सुरक्षित रहते हैं. यह खोज 1990 के दशक से शुरू हुई. विजेताओं ने पाया कि 'रेगुलेटरी टी सेल्स' (Tregs) नामक कोशिकाएं इम्यून सिस्टम को ब्रेक लगाती हैं. अगर ये कोशिकाएं कमजोर हों, तो शरीर के अंगों पर हमला होता है. यह खोज कैंसर, ट्रांसप्लांट और एलर्जी के इलाज में भी मदद करेगी. तीन वैज्ञानिकों की टीम वर्क शिमोन सकागुची (जापान) शिमोन सकागुची को रेगुलेटरी टी सेल्स की खोज के लिए जाना जाता है. 1995 में उन्होंने दिखाया कि CD4+ CD25+ कोशिकाएं इम्यून सिस्टम को दबाती हैं. यह कोशिकाएं शरीर को अपने ही ऊतकों से लड़ने से रोकती हैं. सकागुची की खोज से पता चला कि Tregs इम्यून टॉलरेंस बनाए रखने में मुख्य भूमिका निभाती हैं. उनके काम ने ऑटोइम्यून रोगों की समझ बदल दी. आज Tregs को इंजीनियर करके दवाएं बन रही हैं. मैरी ई. ब्रंकॉ और फ्रेड राम्सडेल (अमेरिका) मैरी ब्रंकॉ और फ्रेड राम्सडेल ने फॉक्सपी3 (FOXP3) जीन की खोज की, जो Tregs कोशिकाओं का 'मास्टर स्विच' है. 2001 में उन्होंने पाया कि FOXP3 में म्यूटेशन से IPEX सिंड्रोम होता है – एक दुर्लभ बीमारी जहां बच्चे का इम्यून सिस्टम अपने ही शरीर पर हमला करता है. इससे बाल रोग, डायबिटीज और आंतों की समस्या होती है. उनके काम ने साबित किया कि FOXP3 Tregs कोशिकाओं को सक्रिय रखता है. यह खोज पेरिफेरल इम्यून टॉलरेंस को समझने में मील का पत्थर साबित हुई. तीनों ने मिलकर दिखाया कि सेंट्रल टॉलरेंस के अलावा पेरिफेरल टॉलरेंस भी जरूरी है. उनकी खोजें अब दवाओं में इस्तेमाल हो रही हैं, जैसे ऑटोइम्यून बीमारियों के लिए Tregs थेरेपी.