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मध्यप्रदेश की सियासत में हलचल तेज, मुलताई नगर पालिका अध्यक्ष की BJP में एंट्री

 मुलताई/ग्वालियर मध्य प्रदेश की राजनीति में  लंबे समय बाद एक बार फिर उलटफेर देखने को मिला। बता दें कि, एक जिले में कांग्रेस को झटका लगा है तो दूसरे जिले में भाजपा को झटका लगा है। पहला राजनीतिक उलटफेर बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के गृह जिले बेतूल में हुआ है। यहां मुलताई नगर पालिका अध्यक्ष नीतू परमार ने एक बार फिर भाजपा का दामन थाम लिया है। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष ने खुद उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाई है। वहीं, दूसरी तरफ सूबे के ग्वालियर जिले में पूर्व पार्षद रहे सिंधिया समर्थक नेता देवेंद्र पाठक ने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। मुलताई नगर पालिका अध्यक्ष फिर से भाजपा में शामिल बैतूल जिले के मुलताई से नगर पालिका अध्यक्ष नीतू परमार ने भाजपा की सदस्यता ले ली है। आपको बता दें कि नीतू परमार का राजनीतिक सफर लंबे समय से चर्चाओं में रहा है। साल 2022 में नगरीय निकाय चुनाव में नीतू परमार भाजपा के रूप में जीत मिली थी। जीत के बाद कांग्रेस के समर्थन से नगर पालिका अध्यक्ष बनी थी। इसके बाद नीतू के निर्वाचन को अदालत में चुनौती दी गई थी। जून 2023 में जिला अदालत ने उनका चुनाव निरस्त कर दिया था। हाईकोर्ट में 3 साल की संघर्ष के बाद दोबारा अध्यक्ष पद बहाल करने का आदेश 2026 में दे दिया। लेकिन, अदालत से राहत के बाद अब वो फिर से भाजपा में लौट गई हैं। पूर्व पार्षद ने दिया बीजेपी से इस्तीफा वहीं, दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी को ग्वालियर में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक नेता माने जाने वाले शहर के वार्ड-25 से पूर्व पार्षद देवेंद्र पाठक ने सोशल मीडिया के जरिए केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, बीजेपी जिला अध्यक्ष जय प्रकाश राजौरिया और संगठन को इस्तीफा भेज दिया है। देवेंद्र पाठक ने अपने इस्तीफे में पार्टी नेतृत्व पर कार्यकर्ताओं की अनदेखी के गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने साफ कहा कि, उनके क्षेत्र में पार्टी पूर्व विधायक मुन्नालाल गोयल के इशारे पर चल रही है। साथ ही, उन्होंने पूर्व विधायक मुन्नालाल पर गंभीर आरोप भी लगाए। देवेंद्र पाठक ने ये भी कहा कि, समर्पित कार्यकर्ताओं को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है, जिससे पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी है। जिला भाजपा में अंदरूनी हलचल देवेंद्र पाठक ने ये संकेत भी दिए कि, उनके साथ ब्राह्मण समाज और उनके समर्थक भी इस्तीफा दे सकते हैं, जिससे ग्वालियर भाजपा की अंदरूनी राजनीति में हलचल बढ़ गई है। हालांकि, इस्तीफे के बावजूद देवेंद्र पाठक ने केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रति अपनी निष्ठा कायम रखने की बात कही है। उन्होंने साफ कहा कि, मैं जीवनभर ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ रहूंगा। बहरहाल अब देखना होगा कि, बीजेपी संगठन इस इस्तीफे को कितनी गंभीरता से लेता है और आने वाले दिनों में ग्वालियर की राजनीति में इसका क्या असर देखने को मिलेगा।

बंगाल की राजनीति में हलचल: शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम छोड़ने का किया ऐलान

कोलकत्ता  पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने विधानसभा चुनावों में नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों ही सीटों पर जीत हासिल की थी, जिसके बाद उन्हें एक सीट खाली करनी थी. उन्होंने नंदीग्राम सीट छोड़ दी है, वह भवानीपुर सीट से ही विधायक रहेंगे. उन्होंने विधानसभा में भवानीपुर विधायक के रूप में शपथ ली है. बता दें कि इस सीट पर उन्होंने बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को हराया था।  दोनों सीटों से जीतने के बाद शुभेंदु अधिकारी ने कहा था कि मैं 10 दिनों के भीतर एक सीट छोड़ दूंगा. हालांकि उन्होंने कहा था कि कौन सी सीट मुझे रखनी है, इसका निर्णय पार्टी करेगी. मेरी अपनी राय जरूर होगी, जिसे मैं नेतृत्व के सामने रखूंगा।  सुवेंदु बोले, नंदीग्राम से किया गया वादा भी पूरा करता रहूंगा विधानसभा परिसर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि नंदीग्राम से अब किसी अन्य उम्मीदवार को उपचुनाव के जरिए विधायक चुना जाएगा. हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नंदीग्राम की जनता को उनकी कमी महसूस नहीं होगी. अधिकारी ने भरोसा दिलाया कि वे मुख्यमंत्री के रूप में पूरे पश्चिम बंगाल के साथ-साथ नंदीग्राम के लोगों से किए गए हर विकास वादे को पूरा करेंगे। सुवेंदु बोले- नंदीग्राम से उनका अलग रिश्ता सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि नंदीग्राम उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय रहा है. उन्होंने 2008 के नंदीग्राम आंदोलन और पुलिस गोलीकांड का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय भी उन्होंने क्षेत्र के लोगों के साथ खड़े होकर संघर्ष किया था. उन्होंने याद दिलाया कि 2009 से 2016 तक तृणमूल कांग्रेस की विधायक रहीं फिरोजा बीबी को उन्होंने लगातार समर्थन दिया था, जबकि वे स्वयं उस सीट के विधायक नहीं थे. इस बार भी, विधायक पद छोड़ने के बावजूद, नंदीग्राम के विकास और जनता की समस्याओं के समाधान के लिए पूरी तरह समर्पित रहेंगे।  ममता बनर्जी को हराकर भवानीपुर से जीते हैं सुवेंदु हालिया चुनाव में सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी के गढ़ भवानीपुर सीट पर उन्हें 15,105 वोटों के अंतर से हराया. वहीं नंदीग्राम में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार पवित्र कर को 9,665 वोटों से पराजित किया. भवानीपुर सीट को बनाए रखने के फैसले को राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह वही सीट है जिसे लंबे समय तक ममता बनर्जी का सबसे सुरक्षित गढ़ माना जाता रहा है. सुवेंदु अधिकारी के इस फैसले से अब नंदीग्राम सीट पर उपचुनाव होना तय है, जिस पर पूरे राज्य की नजरें टिकी रहेंगी।  नंदीग्राम सीट पर कितने वोटों से जीते थे शुभेंदु? शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम सीट पर टीएमसी के पबित्र कर को हराया था. बीजेपी कैंडिडेट अधिकारी को इस सीट पर 127301 वोट मिले थे, जबकि टीएमसी कैंडिडेट पबित्र कर को 117636 वोट मिले थे. वहीं तीसरे नंबर पर सीपीआई के संती गोपाल गिरी थे, जिन्हें करीब तीन हजार वोट मिले थे. जबकि कांग्रेस के उम्मीदवार शेख जरितुल हुसैन 5वें नंबर पर थे और उन्हें सिर्फ 794 वोट मिले थे।  भवानीपुर में शुभेंदु को कितने वोट मिले थे? शुभेंदु अधिकारी ने 2021 के चुनावों में बीजेपी की टिकट पर नंदीग्राम में ममता बनर्जी को हराया था, उनकी पार्टी को राज्य में बहुमत तो मिला था, लेकिन वह खुद चुनाव हार गई थीं, जिसके बाद भवानीपुर सीट को खाली कराया गया और ममता बनर्जी यहां से चुनाव जीतकर विधायक बनीं थीं. 2026 में एक बार फिर शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को चुनाव में पटखनी दे दी. इस चुनाव में शुभेंदु को 73917  वोट मिले थे, जबकि ममता बनर्जी को 58812 वोट मिले. शुभेंदु ने ममता को भवानीपुर में 15105 वोटों से हराया।  नंदीग्राम सीट कितनी महत्वपूर्ण? बंगाल की नंदीग्राम सीट ममता बनर्जी का गढ़ मानी जाती रही है, लेकिन पिछला चुनाव हारने के बाद ममता ने इस सीट की ओर मुड़कर नहीं देखा. इस सीट को शुभेंदु अधिकारी भी अपना गढ़ मानते हैं. ये उनके राजनीतिक करियर का केंद्र रहा है. साल 2007 में भूमि अधिग्रहण कानून के खिलाफ आंदोलन को उन्होंने लीड किया था। 

तमिलनाडु की राजनीति में हलचल: फ्लोर टेस्ट से पहले विजय की पार्टी को DMDK का झटका

चेन्नई तमिलनाडु की थलापति विजय सरकार के लिए बुधवार का दिन बहुत बड़ा साबित होने वाला है. आज उनकी सरकार विधानसभा में बहुमत साबित करेगी. राज्य विधानसभा में 107 सीटें जीतने वाली विजय की पार्टी टीवीके कांग्रेस, वाम दलों और अन्य के समर्थन के साथ सरकार बनाने में सफल हुई है. थलापति विजय ने तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्रे आर्लेकर के समक्ष 120 विधायकों से अधिक विधायकों के समर्थन की सूची पेश की थी तभी उनको सरकार बनाने का मौका मिला. इसके बाद राज्य की दूसरी अहम पार्टी एआईएडीएमके भी दो फाड़ हो गई है. उसके एक धड़े ने थलापति विजय का समर्थन करने का फैसला किया है. ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि थलापति सहज तरीके से बहुमत हासिल करे लेंगे।  डीएमके ने विश्वास मत का बहिष्कार किया  तमिलनाडु विधानसभा में टीवीके सरकार के विश्वास मत को लेकर बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है. विपक्षी दल DMK ने मतदान प्रक्रिया का बहिष्कार करते हुए सदन से वॉकआउट करने का फैसला किया. DMK नेता उदयनिधि स्टालिन ने सदन में कहा कि उनकी पार्टी इस फ्लोर टेस्ट में हिस्सा नहीं लेगी और मतदान से पूरी तरह अलग रहेगी. उन्होंने आरोप लगाया कि जिन लोगों ने सत्ता पक्ष को वोट दिया था, अब उन्हें लगने लगा है कि उन्होंने गंभीर गलती की है. उदयनिधि स्टालिन ने कहा कि हम DMK के सदस्य सदन से वॉकआउट कर रहे हैं और इस वोटिंग प्रक्रिया में भाग नहीं लेंगे. इस फैसले के बाद विधानसभा का राजनीतिक माहौल और अधिक गर्म हो गया है. विपक्ष के बहिष्कार से सरकार के विश्वास मत की वैधता और समर्थन संख्या को लेकर नई बहस शुरू हो गई है. तमिलनाडु की राजनीति में यह घटनाक्रम आने वाले दिनों में और बड़े राजनीतिक बदलावों का संकेत दे सकता है।   थलापति विजय सरकार का विरोध करेंगे AIADMK के सभी विधायक- पलानीस्वामी तमिलनाडु विधानसभा में टीवीके सरकार के खिलाफ राजनीतिक टकराव तेज हो गया है. एआईएडीएमके प्रमुख ई पलानीस्वामी ने स्पष्ट कहा है कि उनकी पार्टी टीवीके के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव और विश्वास मत दोनों का विरोध करेगी. पलानीस्वामी ने कहा कि AIADMK के 47 विधायक पार्टी लाइन पर रहकर एकजुट रूप से टीवीके सरकार के खिलाफ वोट करेंगे. उन्होंने विधानसभा में बढ़ते मतभेदों और राजनीतिक अराजकता पर चिंता जताते हुए कहा कि किसी भी मुख्यमंत्री का एक गुट का समर्थन करना सही नहीं है. उन्होंने आगे सवाल उठाया कि जब सदन में असहमति साफ दिखाई दे रही है, तब सरकार द्वारा एक पक्ष का समर्थन करना लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप नहीं है. पलानीस्वामी ने दोहराया कि हम इस प्रस्ताव का विरोध करते हैं और AIADMK के सभी सदस्य इसके खिलाफ मतदान करेंगे. इस बयान के बाद तमिलनाडु की राजनीति में तनाव और बढ़ गया है, जिससे विधानसभा में निर्णायक वोटिंग का माहौल और भी दिलचस्प हो गया है।  थलापति विजय को किन-किन दलों ने दिया समर्थन  तमिलनाडु विधानसभा में हुए ट्रस्ट वोट के दौरान कई प्रमुख दलों ने टीवीके सरकार को समर्थन देने की घोषणा की है. मतदान प्रक्रिया के दौरान सबसे पहले मुस्लिम लीग ने खुलकर टीवीके के पक्ष में समर्थन की घोषणा की. पार्टी ने कहा कि राज्य में भारतीय जनता पार्टी की गलत रणनीतियों को रोकने और राज्य में गवर्नर शासन की स्थिति बनने से बचाने के लिए यह कदम जरूरी है. इसके अलावा वीसीके ने भी टीवीके को समर्थन दिया और सरकार से महाराष्ट्र व कर्नाटक की तरह राज्य में अंधविश्वास विरोधी कानून लाने की मांग की. वहीं माकपा और कांग्रेस ने भी विधानसभा में टीवीके सरकार के पक्ष में वोट देने की घोषणा की. इन दलों के समर्थन से टीवीके को राजनीतिक मजबूती मिलती दिख रही है और राज्य की सत्ता समीकरणों में महत्वपूर्ण बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। 

सिंधिया समर्थक कृष्णा घाड़गे पर BJP सख्त: केपी यादव पर बिना नाम लिए टिप्पणी पड़ी भारी

भोपाल केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक माने जाने वाले कृष्णा घाड़गे को भाजपा भोपाल शहर अध्यक्ष रविंद्र यति ने कारण बताओ नोटिस जारी किया है। नोटिस एक फेसबुक पोस्ट को लेकर दिया गया, जिसमें पूर्व सांसद केपी यादव का नाम लिए बिना उन्हें “बालक बुद्धि नेता” बताया गया था। भाजपा संगठन की ओर से जारी नोटिस में कृष्णा घाड़गे से तीन दिन के भीतर जवाब मांगा गया है। पार्टी ने सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणी को अनुशासनहीनता की श्रेणी में माना है। केपी यादव के बयान के बाद बढ़ा विवाद दरअसल, नागरिक आपूर्ति निगम के अध्यक्ष पद का कार्यभार संभालने के बाद अशोकनगर पहुंचे केपी यादव ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि उन्हें प्रदेश नेतृत्व ने नई जिम्मेदारी सौंपी है और अब अगले दो वर्षों तक वे हर मंच पर दिखाई देंगे। उन्होंने मंच से कहा कि जनता का स्नेह और समर्थन उन्हें लगातार ऊर्जा देता है और क्षेत्र के विकास के लिए वे हर चुनौती का सामना करने को तैयार हैं। केपी यादव ने यह भी कहा कि अशोकनगर शांतिप्रिय क्षेत्र है, जहां लोग भाईचारे के साथ रहते हैं। “फूट डालकर राज करने वालों” पर साधा निशाना अपने संबोधन में केपी यादव ने बिना किसी का नाम लिए कहा कि कुछ लोग समाज में फूट डालकर राजनीति करने की कोशिश करते हैं। उन्होंने ऐसे लोगों से क्षेत्र के विकास के लिए सकारात्मक राजनीति करने की अपील की। उन्होंने कहा कि 2019 में जनता के आशीर्वाद से उन्हें संसद पहुंचने का अवसर मिला और पांच वर्षों तक उन्होंने क्षेत्र, प्रदेश और देश के विकास के लिए काम किया। साथ ही उन्होंने दावा किया कि उनके कार्यकाल में उन पर किसी प्रकार का आरोप नहीं लगा और उन्होंने बिना भेदभाव के सभी वर्गों के लिए काम किया। केपी यादव के इस बयान के बाद कृष्णा घाड़गे की सोशल मीडिया पोस्ट सामने आई, जिसके बाद भाजपा संगठन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए उन्हें नोटिस जारी कर दिया।

तमिलनाडु राजनीति में बड़ा उलटफेर: फ्लोर टेस्ट से पहले विजय सरकार को AIADMK बागियों और AMMK का समर्थन

चेन्नई तमिलनाडु की सियासत में बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है. अब सीएम विजय की पार्टी टीवीके को दो और पार्टियों का समर्थन मिल गया है. तमिलनाडु विधानसभा में फ्लोर टेस्ट से ठीक एक दिन पहले AIADMK और AMMK के एक विधायक टीवीके को सपोर्ट देने की बात कही। AIADMK के वरिष्ठ नेता सीवी शनमुगम के नेतृत्व में पार्टी के 30 विधायकों ने TVK को अपना समर्थन देने का ऐलान किया है. वहीं, टीटीवी दिनाकरण की पार्टी AMMK के विधायक कामराज ने भी कहा है कि वो विजय सरकार को समर्थन देंगे। मुख्यमंत्री विजय को बुधवार को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करना है. टीवीके ने (107 सीटें) कांग्रेस की 5 सीटों, वामपंथी दलों की दो-दो सीटों, वीसीके और मुस्लिम लीग की दो-दो सीटों के सहयोग से सरकार बनाई है. अब AIADMK के 30 विधायकों के साथ आने से विजय सरकार को मजबूती मिल गई है और ये पूरी तरह सुरक्षित नजर आ रही है। AIADMK में दो फाड़? टीवीके को समर्थन देने को लेकर सीवी शनमुगम ने बताया कि उनका इरादा पार्टी को तोड़ने का नहीं है, बल्कि वो 'जनता के जनादेश' का सम्मान कर रहे हैं. उन्होंने कहा, 'जनता ने विजय को मुख्यमंत्री बनाने के लिए वोट दिया है, और हम उस जनादेश का सम्मान करते हैं। बता दें कि हालिया चुनावों में AIADMK को सिर्फ 47 सीटें मिली थीं. अब 30 विधायकों के टीवीके को सहयोग देने के बाद पार्टी प्रमुख एडप्पादी के. पलानीस्वामी के पास सिर्फ 17 विधायक रह गए हैं. शनमुगम ने  बताया कि विधायकों ने एस.पी. वेलुमणि को विधायक दल का नेता और जी. हरि को उपनेता चुना है। डीएमके के साथ जाने के प्रस्ताव का विरोध शनमुगम ने बताया कि EPS गुट DMK के साथ गठबंधन कर सरकार बनाने की कोशिश कर रहा था. उन्होंने कहा, 'AIADMK की स्थापना ही DMK जैसी बुरी शक्ति को खत्म करने के लिए हुई थी. अगर हम DMK के साथ हाथ मिलाते, तो हमारी पार्टी खत्म हो जाती. हमारे विधायक और कार्यकर्ता इसके सख्त खिलाफ हैं।

शशि थरूर का दावा अलग, लेकिन SIR माना कांग्रेस की जीत का मुख्य कारण

तिरुवनंतपुरम कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने केरल चुनाव के नतीजों को लेकर एक ऐसा दावा कर दिया है, जिससे सियासी भूचाल आ सकता है। शशि थरूर ने हाल ही में एक कार्यक्रम में कहा है कि उनका मानना है कि केरल में कांग्रेस SIR की वजह से जीत गई। थरूर यहां SIR की आलोचना कर रहे थे लेकिन उन्होंने दावा किया कि SIR यानी मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन ने केरल में कांग्रेस की जीत में अहम रोल निभाया है। स्टैनफोर्ड इंडिया कॉन्फ्रेंस में एक राउंडटेबल चर्चा के दौरान शशि थरूर ने केरल के साथ-साथ पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों पर भी बात की। थरूर ने दावा किया कि बंगाल में वोटर लिस्ट से करीब 91 लाख नाम हटा दिए गए थे जिनमें से कई लाख वैध वोटर्स हैं। उन्होंने कहा, "SIR के मामले में, मैंने जो कहा है वह एक जायज सवाल है। बंगाल को देखें तो यहां 91 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए। उनमें से 34 लाख लोगों ने अपील की है और उन्हें वोट देने का पूरा अधिकार है।” शशि थरूर ने कहा, “नियमों के मुताबिक हर मामले का अलग-अलग निपटारा होना जरूरी था, इसलिए वोटिंग से पहले सिर्फ कुछ सौ मामलों का ही निपटारा हो पाया। आज भी लगभग 31-32 लाख लोग ऐसे हैं जो शायद आने वाले सालों में वैध वोटर पाए जाएंगे, लेकिन वे वोट देने का मौका गवां चुके हैं।" थरूर ने कहा कि भाजपा ने बंगाल चुनाव 30 लाख वोटों के अंतर से जीता है, जो कि पेंडिंग अपीलों के बराबर है। उन्होंने पूछा, "ऐसे में क्या यह पूरी तरह से निष्पक्ष और लोकतांत्रिक है?" केरल में कांग्रेस की जीत पर भी बोले शशि थरूर ने आगे स्वीकार किया कि SIR प्रक्रिया से केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF को भी फायदा हुआ है। थरूर के मुताबिक, केरल में वामपंथी दल (CPM) 'डबल और ट्रिपल एनरोलमेंट' (एक ही व्यक्ति का कई जगह नाम) के मास्टर रहे हैं और इन डुप्लीकेट नामों को हटाने से वोटर लिस्ट साफ हो गई, जिससे कांग्रेस को फायदा मिला। उन्होंने कहा, "केरल में मुझे लगता है कि कांग्रेस को नाम हटाने से फायदा हुआ, क्योंकि CPM लंबे समय से डबल एनरोलमेंट, ट्रिपल एनरोलमेंट, मल्टी एनरोलमेंट, यानी एक ही व्यक्ति का चार अलग-अलग बूथों पर नाम होना, जैसी चीजों में माहिर थी। ऐसा पहले होता था। SIR ने ऐसे नामों को हटा दिया। हालांकि उन्होंने कहा कि बंगाल की तरह केरल में तमिलनाडु में इतनी अपीलें नहीं की गईं जितनी बंगाल में। उन्होंने कहा, “आपने देखा कि केरल और तमिलनाडु में, बहुत कम अपीलें की गईं। लेकिन बंगाल में, इसमें कोई शक नहीं कि 34 लाख अपीलें की गईं। और ये 34 लाख फॉर्म 34 लाख अलग-अलग लोगों ने भरे थे। उनमें से, सिर्फ कुछ सौ अपीलों पर ही सुनवाई हुई है। गौरतलब है कि हाल ही में पांच राज्यों में हुए चुनावों के नतीजे सामने आए हैं। पश्चिम बंगाल और केरल दोनों में ही सत्ता परिवर्तन देखने को मिला। जहां पश्चिम बंगाल में भाजपा ने 294 में से 207 सीटें जीत कर राज्य में पहली बार सरकार बनाई। वहीं केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF ने 140 में से 102 सीटें जीत कर वामपंथियों का किला ढहा दिया।

ममता की मुश्किलें बढ़ीं: कांग्रेस और लेफ्ट ने BJP विरोधी सहयोग से किया इनकार

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में 15 साल बाद सत्ता गंवाने वालीं ममता बनर्जी ने भाजपा के खिलाफ विपक्ष की एकता का आह्वान किया था। लेकिन अब उनके इस आह्वान को कांग्रेस और वाम दलों ने सिरे से खारिज कर दिया है। सीपीआई (एम) ने साफ किया है कि वह किसी भी ऐसी पार्टी के साथ मंच साझा नहीं करेंगे, जो कि अपराध, जबरन वसूली और भ्रष्ट हों। वहीं कांग्रेस ने ममता बनर्जी द्वारा अति-वामपंथियों के साथ जाने वाली बात पर निशाना साधा है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस प्रवक्ता सौम्य आइच राय ने ममता बनर्जी के विपक्षी एकता के आह्वान पर सबसे पहले प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, "हमें अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा है। आपने (ममता बनर्जी ने) राष्ट्रीय दलों को, कांग्रेस और वाम और अति-वामपंथियों को एक साथ शामिल होने का निमंत्रण दिया है। अति वामपंथियों से आपका क्या तात्पर्य है? क्या आपका मतलब माओवादियों से है, जिन्होंने 25 मई, 2013 को छत्तीसगढ़ में 18 कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी थी?” सीपीआई (एल) का भी इनकार कांग्रेस के बाद सीपीआई (एल) के सचिव मोहम्मद सलीम बनर्जी ने ममता बनर्जी के प्रस्ताव को पूरी तरह से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, "ममता बनर्जी के साथ हम बिलकुल नहीं जाएंगे। हम ऐसी किसी भी अपराधी, जबरन वसूली करने वाली भ्रष्ट और सांप्रदायिक व्यक्ति को स्वीकार नहीं करेंगे। हम जनता और हाशिए पर खड़े लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहेंगे।" आपको बता दें, अपनी पूरी राजनीति कांग्रेस और वामपंथियों के विरोध पर खड़ी करने वाली ममता बनर्जी ने इसी दम पर बंगाल में 15 साल तक शासन चलाया है। लेकिन विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद टीएमसी प्रमुख ने इन सभी दलों को भाजपा के खिलाफ एकजुट होने का आह्वान दे दिया। ममता ने किया था एकता का आह्वान शनिवार को बंगाल में सुभेंदु अधिकारी की सत्ता आने के बाद ममता बनर्जी ने वीडियो संदेश जारी करके विपक्षी एकता का आह्वान किया था। उन्होंने कहा, "मैं बंगाल के सभी विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और गैर सरकारी संगठनों से भाजपा के खिलाफ एकजुट होने का आग्रह करती हूं। भाजपा का विरोध करने वाले सभी राजनीतिक दलों के साथ एक संयुक्त मंच बनाया जा सकता है।" उन्होंने कहा, "राष्ट्रीय दलों के साथ-साथ, मैं वामपंथियों और अति-वामपंथियों से भी बंगाल और दिल्ली में एकजुट होने का आग्रह करती हूं। अगर कोई राजनीतिक दल मुझसे बात करना चाहता है, तो मैं उपलब्ध हूं। यह याद रखना चाहिए कि हमारा पहला दुश्मन भाजपा है।" पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा विपक्षी एकता का यह आह्वान राज्य की सच्चाई को प्रदर्शित करता है। पिछले एक दशक में भाजपा के उदय ने ममता बनर्जी को उन्हीं वाम दलों से सहयोग मांगने के लिए मजबूर कर दिया, जिनका तीन दशक पुराना ढहाकर उन्होंने सत्ता हासिल की थी। भले ही ममता ऊपरी स्तर पर इस विपक्षी एकता के सपने देख रही हैं, लेकिन ऐसा होना आसान नहीं है। क्योंकि न तो कांग्रेस और न ही वाम दल ममता सरकार से खुश नजर आए थे। पश्चिम बंगाल में निचले स्तर पर वाम दलों के कार्यकर्ताओं और टीएमसी के कार्यकर्ताओं का खूनी संघर्ष अभी भी लोगों को याद है। ऐसे में भले ही ममता बनर्जी भाजपा के हिंदुत्व कार्ड का जवाब देने के लिए तृणमूल और लाल झंडे को एक साथ लाने का प्रयास कर रही हैं, लेकिन ऐसा होना आसान नहीं है, क्योंकि वह ममता ही थीं, जिन्होंने बंगाल से वामपंथ को उखाड़ फेंका था। विधानसभा चुनाव में वामपंथ ज्यादातर सीटों पर अपनी जमानत भी नहीं बचा पाया है।

ब्रिगेड ग्राउंड में ऐतिहासिक शपथ समारोह, दुर्गा छवि और गेरुआ प्रतीकों से सजा मंच

 नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 90 साल के एक बीजेपी सदस्य के पैर छूना फिर ब्रिगेड ग्राउंड में उमड़ी भीड़ के सामने आभार जताते हुए घुटनों के बल बैठ जाना, मंच के बैकग्राउंड में देवी दुर्गा की तस्वीर और मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी का गेरुआ (भगवा) कुर्ता पहने होना… पश्चिम बंगाल में बीजेपी की पहली सरकार का शपथ ग्रहण समारोह कई तरह के प्रतीकों से भरा हुआ था। अगर बंगाल विधानसभा चुनावों ने इतिहास रचा तो बीजेपी ने अपनी पहली सरकार के शपथ ग्रहण के मौके पर इस इतिहास को बनाने में योगदान देने वाले हर पहलू को खास तौर पर सम्मान दिया। भावनात्मक पहलू इस पल का भावनात्मक महत्व साफ झलक रहा था। शपथ लेने के बाद सीएम सुवेंदु ने पीएम मोदी के सामने सिर झुकाया और कुछ देर तक उसी झुकी हुई मुद्रा में रहे, जबकि पीएम ने एक हाथ से उनके जुड़े हुए हाथों को थाम लिया और दूसरे हाथ से मुस्कुराते हुए उनकी पीठ थपथपाई। फिर भीड़ के शोर के बीच उन्होंने सुवेंदु को कसकर गले लगा लिया। सुवेंदु ने गणमान्य व्यक्तियों की कतार के बीच गृह मंत्री अमित शाह के प्रति भी ऐसा ही सम्मान दिखाया। सुवेंदु पर शाह का भरोसा 2020 में शाह की मौजूदगी में टीएमसी छोड़कर बीजेपी में शामिल होने के बाद से गृह मंत्री ने ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ बीजेपी के जमीनी विरोध का नेतृत्व करने के लिए सुवेंदु का पूरा समर्थन किया। यह एक ऐसा भरोसा था जिसका फल मिला। लेकिन यह ऐतिहासिक अवसर उन पुराने और अनुभवी नेताओं की लंबी मेहनत को स्वीकार करने का भी एक मौका था। दिलीप घोष को मौका आरएसएस के पूर्व प्रचारक और बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष और जिन्हें नए नेताओं के उभरने के दौर में कभी-कभी उपेक्षित महसूस हुआ था सुवेंदु के बाद शपथ लेने वाले पहले मंत्री बने। यह उनके दशकों लंबे भगवा विचारधारा के प्रति समर्पण का एक सम्मान था। राजनीतिक हिंसा में मारे गए बीजेपी सदस्यों के परिवार से मुलाकात पीएम मोदी ने बीजेपी के कुछ ऐसे सदस्यों के परिवार वालों से भी मुलाकात की, जिनकी कथित तौर पर पिछले कुछ दशकों में हुई राजनीतिक हिंसा में जान चली गई। बीजेपी ने जिन पांच मंत्रियों को चुना उससे यह साबित होता है कि चुनावों में पार्टी को अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय वर्गों का समर्थन मिला है। जहां सुवेंदु ब्राह्मण हैं, वहीं घोष ओबीसी हैं; जबकि अशोक कीर्तनिया, खुदीराम टुडू और निशित प्रमाणिक मतुआ, आदिवासी और राजबंशी समुदायों से आते हैं। एकमात्र महिला सदस्य अग्निमित्रा पॉल, कायस्थ समुदाय से हैं। मुस्लिम समुदाय को जगह नहीं चूंकि बीजेपी का कोई भी विधायक मुस्लिम नहीं है और राज्य में कोई विधान परिषद भी नहीं है, इसलिए सरकार में किसी मुस्लिम को जगह मिलने की संभावना बहुत कम नजर आती है। यह शायद पहला ऐसा मौका होगा जब बंगाल की किसी सरकार में मुस्लिम समुदाय को कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा। टीएमसी ने बीजेपी पर यह आरोप लगाया था कि वे बाहरी लोग हैं और उन्हें बंगाली संस्कृति की कोई परवाह नहीं है। इन आरोपों का जवाब देने के लिए बीजेपी ने खास तौर पर इस कार्यक्रम का आयोजन टैगोर की जयंती के अवसर पर किया और मंच पर इस महान बंगाली विद्वान की तस्वीर भी लगाई गई थी।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में नया मोड़: टीएमसी-वामपंथी संभावित एकता से बदले समीकरण

नई दिल्ली पश्चिम बंगाल में कभी वामपंथ की सबसे बड़ी विरोधी मानी जाने वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सुर अब विधानसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद बदलते नजर आ रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ने भाजपा को रोकने के इराने से विपक्षी दलों से साथ आने की अपील की है। ममता ने संकेत दिए हैं कि भाजपा के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए उन्हें वामदलों और यहां तक कि धुर-वामपंथियों से भी परहेज नहीं है। उनका यह बयान न केवल बंगाल बल्कि देश की राजनीति में एक बड़ी हलचल पैदा कर रहा है। जिस ममता बनर्जी ने तीन दशक पुराने वामपंथी किले को ढहाया था, आज वही उनके साथ मंच साझा करने की बात कह रही हैं। ममता बनर्जी की राजनीति की नींव ही वामपंथ के विरोध पर टिकी थी। 1970 और 80 के दशक में जब पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा अभेद्य माना जाता था, तब ममता बनर्जी एक आक्रामक युवा नेता के रूप में उभरीं। सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन से बनाई पहचान साल 2006-2008 के दौरान सिंगूर में टाटा नैनो प्लांट के खिलाफ भूमि अधिग्रहण आंदोलन और नंदीग्राम में पुलिस फायरिंग की घटनाओं ने ममता बनर्जी को बंगाल की जनमानस का मसीहा बना दिया। उन्होंने 'मां, माटी, मानुष' का नारा दिया, जिसने वामपंथ के उस सर्वहारा वर्ग को अपनी ओर खींच लिया जो कभी माकपा (CPIM) का आधार था। साल 2011 के विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी ने वह कर दिखाया जो असंभव माना जाता था। उन्होंने 34 साल पुराने वामपंथी शासन को उखाड़ फेंका। बुद्धदेव भट्टाचार्य की हार और राइटर्स बिल्डिंग से लाल झंडे का हटना भारतीय राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक थी। उस समय ममता ने कसम खाई थी कि वह बंगाल से वामपंथ का नामोनिशान मिटा देंगी। आज की मजबूरी या रणनीति? पिछले एक दशक में बंगाल की राजनीतिक जमीन पूरी तरह बदल चुकी है। वामदल हाशिए पर चले गए हैं और भाजपा मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी है। ममता बनर्जी अब महसूस कर रही हैं कि मतों का बिखराव अंततः भाजपा को फायदा पहुंचाता है। हालिया बयानों में ममता ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय स्तर पर और विशेष रूप से बंगाल में भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए विपक्ष की एकता अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि यदि देश को बचाना है और धर्मनिरपेक्षता को कायम रखना है तो सभी गैर-भाजपाई ताकतों को एक साथ आना होगा। इसमें उन्होंने विशेष रूप से 'वाम' और 'घोर वामपंथी' विचारधारा वाले समूहों का नाम लेकर सबको चौंका दिया है। जमीनी कार्यकर्ताओं का टकराव बंगाल के गांवों में आज भी टीएमसी और वामपंथी कार्यकर्ताओं के बीच खूनी संघर्ष का इतिहास रहा है। क्या शीर्ष नेतृत्व के हाथ मिलाने से जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता एक-दूसरे को स्वीकार करेंगे? वामदलों के लिए ममता बनर्जी आज भी उनकी सत्ता छीनने वाली नेता हैं। माकपा के कई नेता ममता पर ही भाजपा को बंगाल में जगह देने का आरोप लगाते रहे हैं। धुर-वामपंथी समूह अक्सर संसदीय राजनीति से दूरी बनाकर रखते हैं या बेहद कट्टर रुख अपनाते हैं। ममता का उन्हें साथ आने का न्योता देना यह दर्शाता है कि वह भाजपा के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। ममता बनर्जी का यह हृदय परिवर्तन राजनीति की उस कड़वी सच्चाई को दर्शाता है जहां "दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है।" 2011 में जिस वामपंथ को उन्होंने अपना सबसे बड़ा शत्रु माना था, 2026 की दहलीज पर खड़े बंगाल में वह उसे एक संभावित सहयोगी के रूप में देख रही हैं। भाजपा के 'हिंदुत्व कार्ड' की बढ़ती स्वीकार्यता ममता बनर्जी अब एक व्यापक छतरी तैयार करना चाहती हैं। यदि यह गठबंधन आकार लेता है तो यह भारतीय लोकतंत्र के सबसे दिलचस्प और विरोधाभासी गठबंधनों में से एक होगा। जहां 'तृणमूल' और 'लाल सितारा' एक ही झंडे के नीचे भाजपा को चुनौती देते नजर आएंगे।  

तमिलनाडु की इस विधायक की संपत्ति ने सबको चौंकाया, थलापति विजय से भी कई गुना ज्यादा दौलत

तमिलनाडु   तमिलनाडु की राजनीति में इस वक्त एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है। वजह चुनावी जीत नहीं, बल्कि हजारों करोड़ रुपये की दौलत है। AIADMK की विधायक लीमा रोज मार्टिन को राज्य का सबसे अमीर विधायक बताया गया है। उनकी घोषित कुल संपत्ति इतनी ज्यादा है कि बड़े-बड़े उद्योगपति भी पीछे छूट जाएं। ADR यानी एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट के मुताबिक, लीमा रोज मार्टिन ने चुनावी हलफनामे में करीब 5,863 करोड़ रुपये की नेटवर्थ घोषित की है। वह तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले की ललगुड़ी सीट से AIADMK के टिकट पर चुनाव जीतकर पहली बार विधायक बनी हैं। लीमा रोज ने इस चुनाव में करीब 60 हजार से ज्यादा वोट हासिल किए और अपने प्रतिद्वंद्वी को 2739 वोटों से हराया। दिलचस्प बात यह है कि यह उनका पहला चुनाव था और पहली ही बार में वह राज्य की सबसे चर्चित नेताओं में शामिल हो गईं। कौन हैं लीमा रोज मार्टिन? लीमा रोज तमिलनाडु के कोयंबटूर की रहने वाली हैं। उनके पति सैंटियागो मार्टिन देशभर में “लॉटरी किंग” के नाम से मशहूर हैं। परिवार की संपत्ति का बड़ा हिस्सा उनके कारोबारी साम्राज्य से जुड़ा हुआ बताया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, लीमा रोज की घोषित संपत्ति अभिनेता विजय से भी करीब 9 गुना ज्यादा है। विजय की पार्टी TVK ने इस चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन संपत्ति के मामले में लीमा रोज उनसे काफी आगे निकल गईं। विजय ने अपनी कुल संपत्ति करीब 648 करोड़ रुपये बताई है।   परिवार के पास कितनी संपत्ति? हलफनामे के मुताबिक, लीमा रोज के नाम पर करीब 139 करोड़ रुपये की चल संपत्ति और लगभग 910 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति है। वहीं, उनके पति सैंटियागो मार्टिन ने 3262 करोड़ रुपये की चल संपत्ति और 887 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति घोषित की है। उनके बेटे जोस डेसन मार्टिन के पास भी सैकड़ों करोड़ की संपत्ति है। बेटे ने करीब 225 करोड़ रुपये की चल संपत्ति और 439 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति घोषित की है। सोना, चांदी और हीरे का बड़ा कलेक्शन लीमा रोज के पास भारी मात्रा में सोना, चांदी और हीरे भी हैं। हलफनामे के अनुसार, उनके पास 19 हजार ग्राम से ज्यादा सोना, 1.31 लाख ग्राम से ज्यादा चांदी और 1217 कैरेट हीरे हैं। इसके अलावा प्लैटिनम भी घोषित किया गया है। परिवार के पास लग्जरी गाड़ियों का भी बड़ा बेड़ा है। लीमा रोज ने अपने नाम पर 10 गाड़ियां बताई हैं, जबकि उनके पति के पास BMW, Lexus जैसी महंगी गाड़ियों समेत कई वाहन हैं। सिर्फ छठी पास हैं लीमा रोज सबसे दिलचस्प बात यह है कि करोड़ों-अरबों की मालकिन लीमा रोज की शैक्षणिक योग्यता सिर्फ छठी पास बताई गई है। चुनावी हलफनामे में उन्होंने अपनी शिक्षा Class 6 तक बताई है। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजों ने इस बार राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव दिखाया है। अभिनेता विजय की पार्टी TVK पहली बार चुनाव लड़कर सबसे बड़ी पार्टी बन गई, लेकिन बहुमत से अभी दूर है। ऐसे माहौल में लीमा रोज मार्टिन की संपत्ति ने राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक हलचल मचा दी है।