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ज्यादा चीनी और मीठी ड्रिंक्स से लिवर पर बढ़ता खतरा, फैटी लिवर का रिस्क

लिवर में खराबी आते ही आपके पूरे शरीर का काम बिगड़ सकता है। आपके शरीर की अंदरुनी प्राकृतिक सफाई कम हो सकती है, खाना पचना कम हो सकता है, मोटापा बढ़ सकता है और विटामिन-मिनरल्स-हॉर्मोन में गड़बड़ी आ सकती है। लेकिन सबसे अच्छी बात यह है कि आप छोटी-छोटी बातों को फॉलो करके इन सभी समस्याओं से बच सकते है। जिसमें ज्यादा चीनी और मीठी ड्रिंक्स से दूर रहना भी शामिल है। भारत के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) ने 4 मई को मीठे पेय और ज्यादा चीनी को लिवर के लिए नुकसानदायक बताया। ये चीजें आपके लिवर के फंक्शन को प्रभावित कर सकती हैं। MoHFW ने फैटी लिवर से बचाव करने वाले 3 काम भी बताए हैं, जो कि बेहद बेसिक और आसान हैं। लिवर के लिए क्या नुकसानदायक और क्या स्वास्थ्यवर्धक ज्यादा चीनी का लिवर पर प्रभाव चीनी आंतों से गुजरते हुए फ्रुक्टोज और ग्लूकोज के रूप में लिवर तक पहुंचती है। एनसीबीआई पर मौजूद शोध के मुताबिक, जब आप जरूरत से ज्यादा चीनी का सेवन करते हैं तो इंसुलिन का लेवल बहुत हाई हो जाता है। इससे लिवर को संकेत मिलता है कि अब ग्लूकोज और फ्रुक्टोज को अपने भीतर फैट के रूप में स्टोर करने का वक्त आ गया है और जब शरीर को अपर्याप्त ग्लूकोज के दौरान एनर्जी की जरूरत हो तो इस स्टोर फैट को एनर्जी बनाने के लिए इस्तेमाल करना है। लेकिन जब आप लंबे समय तक अत्यधिक चीनी लेते रहते हैं तो शरीर में ग्लूकोज का लेवल कभी नीचे नहीं आ पाता। जिसके कारण लिवर पर फैट इकट्ठा होता रहता है। इस स्थिति से फैटी लिवर की समस्या विकसित होती है और धीरे-धीरे लिवर के कामकाज की गुणवत्ता में गिरावट लाती रहती है। मीठी ड्रिंक्स का लिवर पर असर मीठी ड्रिंक्स में फ्रुक्टोज, ग्लूकोज, आर्टिफिशियल स्वीटनर्स और अन्य एडिक्टिव्स हो सकते हैं। एनसीबीआई पर मौजूद शोध के मुताबिक, मीठी ड्रिंक्स के ग्लूकोज-फ्रुक्टोज चीनी के मुकाबले ज्यादा तेजी से लिवर में अवशोषित होते हैं। साथ ही ड्रिंक्स में एक बार में ज्यादा शुगर लेने का खतरा भी बढ़ जाता है। इसका मतलब है कि मीठी ड्रिंक्स के सेवन से तेजी से फैटी लिवर विकसित हो सकता है। साथ में ड्रिंक्स में मौजूद अन्य केमिकल, एडिक्टिव्स, आर्टिफिशियल कलर या सोडा लिवर को और ज्यादा हानि पहुंचाते हैं। फैटी लिवर से बचने के 3 तरीके MOHFW ने फैटी लिवर से बचाव के लिए संतुलित आहार, ताजे फल और भरपूर पानी को अपनाने की सलाह दी है।     संतुलित डाइट लेने से लिवर पर बोझ बढ़ाए बिना आवश्यक विटामिन व मिनरल मिलते हैं। यह पोषक तत्व लिवर के नेचुरल डिटॉक्सिफिकेशन को सुधारने में मदद करते हैं। इससे इंफ्लामेशन और फैट बिल्ड अप में कमी आती है।     ताजे फलों में एंटीऑक्सीडेंट्स, पोलीफेनोल्स और फाइबर होता है। ये सभी चीजें लिवर को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने में मदद करती हैं, जो कि लिवर डिजीज का बड़ा कारण है।     हाइड्रेशन सही रखने से लिवर की सेल्स व उनका फंक्शन सही रहता है। इसके कारण टॉक्सिन आसानी से बाहर निकलते रहते हैं, बाइल प्रोडक्शन बेहतर रहता है और मेटाबॉलिक स्ट्रेन नहीं होता। ध्यान रखें कि लिवर एक महत्वपूर्ण अंग है, जो खाना पचाने से लेकर हॉर्मोन बनाने, शरीर की सफाई और एनर्जी प्रोडक्शन में सपोर्ट करता है। आप छोटी-छोटी स्वस्थ आदतों से फैटी लिवर, लिवर कैंसर, सिरोसिस आदि का खतरा कम कर सकते हैं। इसके लिए आपको ऐल्कोहॉल से दूरी, पर्याप्त नींद, शारीरिक गतिविधि और स्ट्रेस मैनेजमेंट पर भी ध्यान देना होगा।

गर्मियों में ग्लोइंग स्किन के लिए खीरे का फेस मास्क, घर पर बनाएं नेचुरल उपाय

गर्मियों के मौसम में स्किन का खास ख्याल रखना जरूरी होता है. इस मौसम में तेज धूप, पसीना और धूल-मिट्टी के कारण स्किन डल और बेजान नजर आने लगती है. लेकिन अच्छी बात यह है कि किचन में मौजूद कुछ चीजों से आप अपनी स्किन की देखभाल आसानी से कर सकते हैं. खीरे से बना नेचुरल फेस मास्क ऐसा ही एक आसान और असरदार उपाय है जो स्किन से जुड़ी समस्याओं को दूर कर ग्लोइंग स्किन पाने में मदद करता है. यह फेस मास्क त्वचा को सॉफ्ट, फ्रेश और हाइड्रेटेड बनाता है. खास बात यह है कि इसे घर पर आसानी से तैयार किया जा सकता है और इसमें इस्तेमाल होने वाली चीजें भी पूरी तरह नेचुरल होती हैं. आइए जानते हैं कि घर पर खीरे से फेस मास्क कैसे बनाया जा सकता है और इसे बनाने के लिए किन-किन चीजों की जरूरत होती है. इंग्रेडिएंट्स (ingredients) 1 खीरा 2 बड़े चम्मच एलोवेरा जेल 1 चम्मच शहद खीरे से फेस मास्क कैसे बनाएं?     खीरे से फेस मास्क बनाने के लिए सबसे पहले ताजे खीरे को अच्छी तरह धो लें.     इसके बाद खीरे को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें.     अब इन टुकड़ों को मिक्सी में डालकर स्मूद पेस्ट बना लें.     तैयार पेस्ट को एक साफ बाउल में निकाल लें.     इसमें एलोवेरा जेल और शहद डालें और सभी चीजों को अच्छी तरह मिलाकर स्मूद पेस्ट बना लें.     इस तरह से आपका खीरे से बना होममेड फेस मास्क इस्तेमाल के लिए तैयार है. खीरे से बने फेस मास्क को लगाने का सही तरीका सबसे पहले चेहरे को फेस वॉश से अच्छे से धो लें. फिर चेहरा जब सूख जाएं तो हल्के हाथों या ब्रश से तैयार मास्क को पूरे चेहरे और गर्दन पर लगाएं. मास्क को 15-20 मिनट तक चेहरे पर रहने दें फिर ठंडे पानी से धो लें. बेहतर रिजल्ट के लिए इसे हफ्ते में कम से कम 2 बार जरूर लगाएं. वैसे तो खीरे से बना यह फेस मास्क स्किन के लिए काफी हेल्दी होता है. लेकिन आपकी स्किन बहुत सेंसिटिव है तो पहली बार चेहरे पर लगाने से पहले पैच टेस्ट जरूर कर लें.

गर्मी में एनर्जी और ठंडक देने वाला सत्तू शरबत, सोशल मीडिया पर बना ट्रेंड

भारत में पुराने जमाने से ही गर्मी में सत्तू का सेवन किया जाता रहा है. लेकिन जब से सोशल मीडिया पर इंफ्ल्यूएंसर्स और सेलिब्रिटीज ने इसके फायदे बताने शुरू किए हैं, तब से सत्तू इंटरनेट पर गर्मी से राहत दिलाने और एनर्जी देने के तौर पर खूब ट्रेंड कर रहा है. भुने हुए चने से तैयार होने वाले सत्तू की तासीर ठंडी होती है जो चिलचिलाती गर्मी में पेट की जलन और एसिडिटी को कम करने में मदद करता है. सत्तू के फायदे सत्तू में फाइबर की भरपूर मात्रा होती है जो पाचन तंत्र को दुरुस्त रखता है और लंबे समय तक भूख नहीं लगने देता जिससे यह वजन घटाने में भी सहायक है. यह आयरन, मैग्नीशियम और प्रोटीन का एक प्राकृतिक स्रोत है जो शरीर को तुरंत ऊर्जा प्रदान करता है. बिना चीनी और अधिक मसालों के बना यह शरबत डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए भी एक सुरक्षित और अच्छा विकल्प है. सत्तू का खट्टा-मीठा ठंडा शरबत सत्तू दही गुड़ नींबू का रस – 1 बड़ा चम्मच काला नमक और सफेद नमक चाट मसाला, काली मिर्च पाउडर भुना हुआ जीरा पाउडर लाल मिर्च पाउडर ठंडा पानी – 2 गिलास हरे धनिए की ताजी पत्तियां बर्फ के टुकड़े बनाने का तरीका एक बड़े बर्तन या जग में 4 चम्मच सत्तू डालें. इसमें थोड़ा सा ठंडा दही और फिर स्वादानुसार गुड़ डालें. अब पानी डालकर मिक्सर में ग्राइंड कर लें. अब इसमें काला नमक, सफेद नमक, चाट मसाला, काली मिर्च पाउडर, भुना हुआ जीरा पाउडर, लाल मिर्च पाउडर, नींबू का रस और नींबू का रस डालें. इसके बाद इसे अच्छी तरह मिक्स कर लें. अब गिलास में सत्तू का शरबत डालें, इसमें बर्फ के टुकड़े डालें और ऊपर से कटा हुआ ताजा हरा धनिया डालकर ठंडा-ठंडा सर्व करें.

डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 40 लाख की ठगी

मुंबई से एक चौंकाने वाला साइबर क्राइम मामला सामने आया है. स्कैमर्स ने एक रिटायर्ड बैंक मैनेजर को 54 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट रखा. इस दौरान उनसे करीब 40 लाख रुपये ठग लिए गए. रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला मुंबई के भांडुप इलाके का है, जहां एक रिटायर्ड बैंक अधिकारी को साइबर ठगों ने अपना शिकार बनाया. स्कैमर्स ने खुद को एंटी टेरर एजेंसी और जांच एजेंसियों का अधिकारी बताया और पीड़ित को यह कहकर डराया कि उसका नाम एक बड़ा केस है. यहां तक कि विक्टिम को स्कैमर्स ने दिल्ली बम ब्लास्ट और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा बताया और खौफ में डाला. डिजिटल अरेस्ट और दबाव स्कैमर्स ने पीड़ित को लगातार वीडियो कॉल और फोन कॉल पर रखा. उसे कहा गया कि वह किसी को इस बारे में न बताए, वरना तुरंत गिरफ्तारी हो जाएगी. इस दौरान पीड़ित को मानसिक रूप से इतना दबाव में रखा गया कि उसने धीरे-धीरे अपनी जमा पूंजी अलग-अलग खातों में ट्रांसफर कर दी. करीब 54 दिनों तक यह सिलसिला चलता रहा और अंत में वह करीब 40 लाख रुपये गंवा बैठा. यह पहली बार नहीं है जब ऐसा हुआ हो. हाल के दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां बुजुर्ग या रिटायर्ड लोग इस तरह के साइबर जाल में फंस रहे हैं. कई मामलों में लोगों ने करोड़ों रुपये तक गंवा दिए हैं और कुछ मामलों में मानसिक दबाव इतना ज्यादा था कि लोगों की जान तक चली गई. एक कॉल से शुरू हुई पूरी कहानी पूरी कहानी एक फोन कॉल से शुरू होती है. पीड़ित को एक अनजान नंबर से कॉल आता है. कॉल करने वाला खुद को पुलिस या जांच एजेंसी का अधिकारी बताता है. शुरुआत में वह सीधा आरोप नहीं लगाता, बल्कि कहता है कि आपके आधार कार्ड या मोबाइल नंबर का इस्तेमाल किसी बड़े अपराध में हुआ है. इसके बाद कॉल अचानक ट्रांसफर कर दिया जाता है, जैसे किसी बड़े अधिकारी से बात हो रही हो. यहां दूसरा व्यक्ति खुद को मुंबई ATS या NIA का अधिकारी बताता है. यहीं से असली डर शुरू होता है. पीड़ित को बताया गया कि उसका नाम एक गंभीर केस में जुड़ा है. उसे कहा गया कि उसके आधार कार्ड से बैंक खाते खोले गए हैं जो आतंकवादी फंडिंग और बम ब्लास्ट जैसे मामलों से जुड़े हैं. कई मामलों में ठग यह तक कहते हैं कि आपका लिंक दिल्ली बम धमाके या इंटरनेशनल टेरर नेटवर्क से जुड़ा मिला है. इसके बाद उन्हें फर्जी FIR नंबर, केस डिटेल और यहां तक कि नकली सरकारी लेटर दिखाए जाते हैं ताकि कहानी असली लगे. कई बार वीडियो कॉल पर नकली पुलिस स्टेशन या यूनिफॉर्म में लोग भी दिखाए जाते हैं. अब सवाल ये है कि आखिर डिजिटल अरेस्ट होता क्या है? असल में यह एक साइबर फ्रॉड तरीका है, जिसमें स्कैमर्स खुद को पुलिस, CBI, RBI या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं. वे कहते हैं कि आपके खिलाफ केस दर्ज है और आपको डिजिटल तरीके से गिरफ्तार किया गया है. इसके बाद वे नकली दस्तावेज, फर्जी FIR और कोर्ट के कागज दिखाकर भरोसा दिलाते हैं. इसके बाद पीड़ित को लगातार कॉल पर रखा जाता है, ताकि वह किसी से सलाह न ले सके. डर और दबाव में आकर लोग अपने पैसे जांच के लिए या क्लियरेंस के लिए ट्रांसफर कर देते हैं. यही वह ट्रैप है जिसमें लोग फंस जाते हैं. सबसे खतरनाक बात यह है कि इसमें ठग सिर्फ पैसे नहीं लेते, बल्कि इंसान के दिमाग पर कब्जा कर लेते हैं. वे डर, शर्म और कानून का डर दिखाकर शख्स को अकेला कर देते हैं. डिजिटल अरेस्ट नाम की कोई चीज नहीं होती सरकार ने खुद कई बार ये कहा है कि डिजिटल अरेस्ट जैसा कुछ नहीं होता. कोई भी एजेंसी किसी भी जांच के लिए किसी शख्स को इस तरह से अरेस्ट नहीं करती है. पुलिस और साइबर एक्सपर्ट बार-बार यह चेतावनी देते रहे हैं कि कोई भी सरकारी एजेंसी कभी भी फोन या वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी नहीं करती और न ही पैसे मांगती है. अगर कोई ऐसा करता है, तो वह लगभग तय है कि यह धोखाधड़ी है. लेकिन इसके बावजूद लोग फंस रहे हैं, क्योंकि ठग अब पहले से ज्यादा स्मार्ट और टेक्निकल हो चुके हैं. वे असली जैसे आईडी कार्ड, वीडियो कॉल पर नकली ऑफिस और यूनिफॉर्म तक दिखा देते हैं. साइबर अपराध अब सिर्फ टेक्नोलॉजी का नहीं, बल्कि दिमाग का खेल बन चुका है. अगर एक रिटायर्ड बैंक अधिकारी भी इसमें फंस सकता है, तो कोई भी इसका शिकार हो सकता है. ज्यादातर लोग बूढ़े लोगों को टारगेट करते हैं. इसलिए सबसे जरूरी है अवेयर रहना. अगर कोई फोन पर आपको डराकर पैसे मांगता है या गिरफ्तारी की धमकी देता है, तो तुरंत कॉल काटें और पुलिस से संपर्क करें.

रोबोट बना बौद्ध भिक्षु, साउथ कोरिया में अनोखा प्रयोग

रोबोट्स इन दिनों दुनिया में टेक्नोलॉजी हर दिन नई सीमाएं तोड़ रहे हैं. लेकिन साउथ कोरिया में जो हुआ, उसने लोगों को हैरान भी किया और सोचने पर मजबूर भी. यहां पहली बार एक ह्यूमनॉयड रोबोट को बौद्ध भिक्षु (मोंक) बना दिया गया. सियोल के मशहूर जोग्ये मंदिर में एक खास समारोह के दौरान इस रोबोट को आधिकारिक रूप से बौद्ध दीक्षा दी गई. इस रोबोट का नाम गाबी रखा गया है और इसकी ऊंचाई करीब 130 सेंटीमीटर है. असली बौद्ध भिक्षु की तरह मिली ट्रेनिंग यह कोई टेक शो नहीं था, बल्कि बिल्कुल वैसा ही धार्मिक कार्यक्रम था जैसा इंसानों के लिए होता है. इस रोबोट ने पारंपरिक बौद्ध पोशाक पहनी, हाथ जोड़कर प्रार्थना की और बौद्ध धर्म के नियमों को स्वीकार किया. समारोह में मौजूद लोगों के सामने इसने वही सारे सवालों के जवाब दिए, जो एक नए भिक्षु से पूछे जाते हैं. दीक्षा से पहले इस रोबोट ने ट्रेनिंग भी ली. इंसानों की तरह इसे भी नवदीक्षित यानी शुरुआती साधु की तरह तैयार किया गया. इसके बाद इसे आधिकारिक रूप से बौद्ध समुदाय का हिस्सा बनाया गया. ऐसा करने की जरूरत क्यों पड़ी? दरअसल, एशिया के कई देशों में बौद्ध मठों में साधुओं की संख्या धीरे-धीरे कम हो रही है. ऐसे में रोबोट को एक असिस्टेंट के तौर पर देखा जा रहा है. यह रोबोट मंदिर में आने वाले लोगों को जानकारी दे सकता है. लोगों को तौर तरीके भी सिखा सकता है. नई पीढ़ी धार्मिक जीवन में कम दिलचस्पी ले रही है और बुजुर्ग भिक्षुओं की संख्या बढ़ रही है. ऐसे में मंदिरों को चलाना मुश्किल होता जा रहा है. इससे पहले भी जापान और दक्षिण कोरिया में ऐसे एक्सपेरिमेंट्स हो चुके हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बेस्ड रोबोट बौद्ध ग्रंथों पर ट्रेन किए जाते हैं ताकि वे लोगों को आध्यात्मिक सलाह दे सकें. दक्षिण कोरिया में तैयार किए गए इस रोबोट में ऐसी तकनीक डाली गई है जो इंसानों की तरह बात कर सके, सवाल समझ सके और धार्मिक कॉन्टेक्स्ट में जवाब दे सके. बौद्ध ग्रंथों और उपदेशों पर किया गया ट्रेन यह रोबोट बौद्ध ग्रंथों और उपदेशों पर ट्रेन किया गया है. यानी अगर कोई शख्स इससे धर्म या जीवन से जुड़े सवाल पूछता है, तो यह जवाब दे सकता है. यह मंदिर में आने वाले लोगों को प्रार्थना के तरीके समझाता है, बौद्ध परंपराओं के बारे में जानकारी देता है और कुछ मामलों में लोगों को मानसिक शांति या सलाह भी दे सकता है. इतना ही नहीं, इसे सिर्फ बात करने वाला रोबोट नहीं रखा गया है. इसे मंदिर के कामों में मदद के लिए भी तैयार किया गया है. जैसे मंदिर में सफाई, बेसिक काम, सिक्योरिटी मॉनिटरिंग और विजिटर्स को गाइड करना. यानी यह एक तरह से डिजिटल सहायक है, जो असली भिक्षुओं का काम हल्का कर सकता है. गौरतलब है कि जापान में भी बुद्धारॉइड जैसे रोबोट बनाए गए हैं, जो धार्मिक सलाह देते हैं और लोगों से बातचीत करते हैं. वहां यह जरूरत इसलिए पैदा हुई क्योंकि कई मंदिर बंद होने की कगार पर हैं. हालांकि इस रोबोट के डेवलपर्स कहते हैं कि यह रोबोट इंसानों की जगह लेने के लिए नहीं बनाया गया. इसका मकसद सिर्फ मदद करना है, न कि असली भिक्षु बनना.

Vivo X300 Ultra और X300 FE लॉन्च कैमरा और प्रीमियम फीचर्स के साथ नई फ्लैगशिप सीरीज़

Vivo ने भारत में अपनी नई फ्लैगशिप सीरीज़ X300 को लॉन्च कर दिया है. इस सीरीज़ में दो फोन आए हैं, Vivo X300 Ultra और Vivo X300 FE. कंपनी इस बार कैमरा और प्रीमियम एक्सपीरियंस पर फोकस कर रही है. Vivo X300 Ultra को कंपनी ने अपने सबसे पावरफुल और कैमरा-फोकस्ड फोन के तौर पर पेश किया है. इस फोन में बड़ी 6.82 इंच की AMOLED डिस्प्ले दी गई है, जिसमें 2K रेजोल्यूशन और 120Hz रिफ्रेश रेट मिलता है. स्क्रीन काफी ब्राइट है और HDR कंटेंट देखने का एक्सपीरियंस बेहतर बनाती है. परफॉर्मेंस की बात करें तो इसमें लेटेस्ट Snapdragon 8 Elite प्रोसेसर दिया गया है. इसे अभी के सबसे पावरफुल चिपसेट्स में से एक माना जाता है. इसके साथ 12GB और 16GB RAM के ऑप्शन मिलते हैं और स्टोरेज 256GB से लेकर 1TB तक जाती है. यानी यह फोन गेमिंग, वीडियो एडिटिंग और हैवी यूज के लिए तैयार है. Vivo का कैमरा पर बड़ा दांव Vivo X300 Ultra में क्वाड कैमरा सेटअप मिलता है, जिसमें 50MP का प्राइमरी सेंसर, 200MP का पेरिस्कोप टेलीफोटो कैमरा, एक और टेलीफोटो लेंस और अल्ट्रा-वाइड कैमरा शामिल है. ZEISS के साथ मिलकर इसे ट्यून किया गया है, जिससे फोटो का कलर और डिटेल बेहतर मिलती है. इसमें 8K वीडियो रिकॉर्डिंग और प्रो मोड जैसे फीचर्स भी दिए गए हैं, जिससे यह फोन लगभग कैमरा जैसा एक्सपीरियंस देने की कोशिश करता है. बैटरी भी बड़ी दी गई है, करीब 6600mAh से ज्यादा की, और इसमें 100W फास्ट चार्जिंग और वायरलेस चार्जिंग दोनों का सपोर्ट मिलता है. फोन Android 15 पर बेस्ड Funtouch OS पर चलता है. 40W वायरलेस चार्जिंग का भी सपोर्ट दिया गया है. Vivo X300 FE स्पेसिफिकेशन्स और फीचर्स अब बात करें Vivo X300 FE की, तो यह फोन उन लोगों के लिए है जो फ्लैगशिप फीचर्स चाहते हैं लेकिन Ultra जितना भारी और महंगा फोन नहीं लेना चाहते. इसमें 6.3 इंच की AMOLED डिस्प्ले दी गई है, जो 120Hz रिफ्रेश रेट के साथ आती है. इसमें Snapdragon 8 Gen 3 प्रोसेसर दिया गया है, जो अभी भी काफी पावरफुल माना जाता है. इसके साथ 12GB RAM और 256GB तक स्टोरेज मिलता है. कैमरा सेटअप यहां भी अच्छा है. इसमें 50MP का प्राइमरी कैमरा, टेलीफोटो लेंस और अल्ट्रा-वाइड कैमरा दिया गया है. ZEISS की ब्रांडिंग यहां भी मिलती है, जिससे फोटो क्वालिटी बेहतर रहती है. बैटरी 5000mAh की है और इसमें फास्ट चार्जिंग का सपोर्ट मिलता है. डिजाइन के मामले में यह फोन Ultra के मुकाबले हल्का और कॉम्पैक्ट है, जो रोजमर्रा के इस्तेमाल में ज्यादा आरामदायक लगता है. Vivo X300 Ultra और Vivo X300 FE की कीमत कीमत की बात करें तो Vivo X300 Ultra प्रीमियम सेगमेंट में आता है और इसकी कीमत करीब 1 लाख 60 हजार रुपये से शुरू होती है, जबकि टॉप वेरिएंट फोटॉग्रफी किट के साथ 2 लाख रुपये तक का मिलेगा. वहीं Vivo X300 FE की कीमत लगभग ₹70,000 से ₹90,000 के बीच रखी गई है. Vivo अब सीधे iPhone और Samsung के प्रीमियम फोन्स को टक्कर देना चाहता है. खासकर कैमरा के मामले में कंपनी ने इस बार बड़ा दांव खेला है. अब असली टेस्ट मार्केट में होगा. अगर कैमरा और परफॉर्मेंस लोगों को पसंद आती है, तो यह सीरीज़ प्रीमियम सेगमेंट में बड़ा गेम चेंजर बन सकती है.

दीपिंदर गोयल ने किया ऐलान, लॉन्च होने वाला है टेंपल जो पढ़ सकेगा दिमाग

नई दिल्ली जोमैटो के को-फाउंडर दीपिंदर गोयल ने अपने नए हेल्थ-टेक प्रोजेक्ट Temple को लेकर बड़ा ऐलान कर दिया है. अब इस वियरेबल डिवाइस का अर्ली ऐक्सेस ओपन कर दिया गया है और कंपनी ने बताया है कि पहले 100 युनिट तैयार हैं, जिन्हें जल्द यूजर्स तक भेजा जाएगा।  Temple को लेकर पिछले कुछ समय से चर्चा थी, लेकिन अब पहली बार इसे इस्तेमाल करने का मौका लोगों को मिलने जा रहा है. हालांकि यह अभी पूरी तरह से आम लोगों के लिए लॉन्च नहीं हुआ है. फिलहाल इसे सिर्फ चुनिंदा यूजर्स को दिया जा रहा है ताकि असली इस्तेमाल में इसका टेस्ट हो सके और फीडबैक लिया जा सके।  गौरतलब है कि पिछले साल दीपिंदर गोयल को टेंपल डिवाइस अपने माथे के साइड में लगाए हुए एक पॉडकास्ट में देखा गया. तब से इसके बारे में चर्चा शुरू हुई थी. लोगों के मन में सवाल था कि आखिर ये छोटा सा डिवाइस क्या करता है? क्या करता है टेंपल डिवाइस? यह डिवाइस बाकी फिटनेस बैंड या स्मार्टवॉच से काफी अलग है. टेंपल को सिर की कनपटी पर लगाया जाता है और इसका फोकस बॉडी नहीं, बल्कि दिमाग पर है।  कंपनी का दावा है कि यह दिमाग में ब्लड फ्लो को ट्रैक करता है. इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि इंसान का फोकस कैसा है, थकान कितनी है और उसकी मेंटल परफॉर्मेंस किस लेवल पर है।  आज तक ज्यादातर वियरेबल डिवाइस हार्ट रेट, स्टेप्स या नींद जैसी चीजें ट्रैक करते थे. लेकिन टेंपल सीधे दिमाग से जुड़ी एक्टिविटी को समझने की कोशिश कर रहा है. यही वजह है कि इसे एक नए तरह का ह्यूमन परफॉर्मेंस वियरेलबल कहा जा रहा है।  आइए जानते हैं कि ऐसी डिवाइस काम कैसे करती है. इसका जवाब जुड़ा है ब्रेन साइंस और सेंसर टेक्नोलॉजी से. ये दुनिया का पहला डिवाइस नहीं है जो ये काम करता है।  दिमाग नहीं पढ़ता है ये डिवाइस चूंकि इसे माथे के साइड में लगाया जाता है, इसलिए एक परसेप्शन ऐसा बनता है कि ये दिमाग पढ़ने वाला डिवाइस है. लेकिन ऐसा नहीं है. ये डिवाइस आपके दिमाग को नहीं पढ़ता.  टेंपल जैसे वियरेबल आमतौर पर ऑप्टिकल सेंसर्स का इस्तेमाल करते हैं, जो स्किन के अंदर ब्लड फ्लो को मेजर हैं. इसमें हल्की इंफ्रारेड या नजदीकी रोशनी नियर इंफ्रारेड लाइट स्किन में भेजी जाती है।  जब ये लाइट अंदर जाती है, तो खून उसमें मौजूद ऑक्सीजन के हिसाब से अलग-अलग तरीके से उसे एब्जॉर्ब करता है. सेंसर इस बदलाव को पढ़ते हैं और अंदाजा लगाते हैं कि उस जगह पर ब्लड फ्लो कितना है।  इस टेक्नोलॉजी को आसान भाषा में समझें तो यह कुछ-कुछ उसी तरह काम करती है जैसे स्मार्टवॉच में हार्ट रेट सेंसर काम करता है, लेकिन यहां फोकस दिमाग के पास की नसों पर होता है।  नियर इंफ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कॉपी  इस तरह की तकनीक को मेडिकल दुनिया में NIRS (Near-Infrared Spectroscopy) कहा जाता है, जिसका इस्तेमाल पहले से रिसर्च और अस्पतालों में किया जाता रहा है।  जब दिमाग ज्यादा एक्टिव होता है, तो वहां खून का बहाव बढ़ जाता है क्योंकि उसे ज्यादा ऑक्सीजन की जरूरत होती है. टेंपल जैसे डिवाइस इसी बदलाव को पकड़ने की कोशिश करते हैं. इसी डेटा के आधार पर यह अंदाजा लगाया जाता है कि व्यक्ति फोकस्ड है, थका हुआ है या उसकी मेंटल एनर्जी कैसी है।  हालांकि यह टेक्नोलॉजी नई नहीं है, लेकिन इसे छोटे वियरेबल डिवाइस में फिट करना और रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए आसान बनाना एक बड़ी चुनौती रही है. यही वजह है कि अभी इसे पूरी तरह परफेक्ट नहीं माना जा रहा और एक्सपर्ट्स भी इसकी सटीकता को लेकर सवाल उठा रहे हैं।  दीपिंदर गोयल पहले भी इस डिवाइस को पहनकर नजर आ चुके हैं, जिससे इसकी झलक पहले मिल चुकी थी. अब कंपनी इसे धीरे-धीरे लोगों तक पहुंचाने की तैयारी में है. बताया जा रहा है कि इसके लिए पहले से एक वेटलिस्ट बनाई गई थी और उसी के आधार पर यूजर्स को एक्सेस दिया जा रहा है।  फिलहाल टेंपल शुरुआती स्टेज में है, लेकिन अगर यह सफल होता है, तो वियरेबल टेक्नोलॉजी का अगला बड़ा ट्रेंड बन सकता है. आने वाले समय में सिर्फ फिटनेस नहीं, बल्कि दिमाग की परफॉर्मेंस को ट्रैक करना भी आम बात हो सकती है। 

WhatsApp बड़ा फैसला: 2026 से इन पुराने फोन में बंद हो जाएगा ऐप

दुनिया का सबसे पॉपुलर इंस्टैंट मैसेजिंग ऐप WhatsApp ने ऐलान किया है कि ऐप कुछ स्मार्टफोन्स में काम करना बंद कर सकता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2026 में कंपनी अपने सिस्टम को अपडेट कर रही है, जिसके बाद कई पुराने एंड्रॉयड फोन WhatsApp सपोर्ट से बाहर हो जाएंगे. गौरतलब है कि WhatsApp 8 सितंबर 2026 से उन स्मार्टफोन्स पर काम नहीं करेगा जो Android 6.0 से पुराने वर्जन पर चलते हैं. यानी जिन फोन में Android 5.0 या 5.1 है, उनमें WhatsApp पूरी तरह बंद हो जाएगा. यह फैसला अचानक नहीं है. समय-समय पर पुराने डिवाइस का सपोर्ट खत्म करता रहता है, ताकि नए फीचर्स और बेहतर सिक्योरिटी को बनाए रखा जा सके. पुराने फोन में अक्सर नए अपडेट सपोर्ट नहीं करते और उनमें सिक्योरिटी का खतरा भी ज्यादा होता है. किन यूजर्स का WhatsApp बंद होगा? इस बदलाव का असर खास तौर पर उन देशों में ज्यादा देखने को मिल सकता है जहां लोग लंबे समय तक पुराने फोन इस्तेमाल करते हैं, जैसे भारत. कई यूजर्स अभी भी 8-10 साल पुराने स्मार्टफोन चला रहे हैं, जिनमें लेटेस्ट अपडेट नहीं आता. रिपोर्ट्स के मुताबिक, दुनिया भर में लाखों यूजर्स ऐसे हैं जो अभी भी पुराने एंड्रॉयड वर्जन पर हैं और उन्हें वॉट्सऐप इस्तेमाल करने के लिए नया फोन लेना पड़ सकता है. कुछ पुराने फोन जैसे Samsung Galaxy S4, Nexus 4, LG G2 जैसे मॉडल पहले ही अपडेट से बाहर हो चुके हैं या जल्द हो जाएंगे. कंपनी की तरफ से वॉट्सऐप यूजर्स को नोटिफिकेशन भी भेजा जा रहा है. ऐप ओपन करते ही एक डायलॉग बॉक्स ओपन हो रहा है. इसमें लिखा है कि इस खास वर्जन के एंड्रॉयड पर 8 सितंबर से वॉट्सऐप काम करना बंद कर देगा. क्यों लिया गया यह फैसला WhatsApp का कहना है कि ऐप को सिक्योर और फास्ट बनाए रखने के लिए यह जरूरी कदम है. पुराने ऑपरेटिंग सिस्टम में नए फीचर्स ठीक से काम नहीं करते. साथ ही, उनमें सिक्योरिटी अपडेट भी नहीं आते, जिससे हैकिंग या डेटा चोरी का खतरा बढ़ जाता है. इसी वजह से कंपनी अब सिर्फ उन डिवाइस को सपोर्ट करेगी जो Android 6.0 या उससे ऊपर के हैं. इससे ऐप की परफॉर्मेंस बेहतर होगी और यूजर्स को नए फीचर्स भी मिलते रहेंगे. यूजर्स क्या करें? अगर आपका फोन पुराना है, तो आपको जल्द ही WhatsApp की तरफ से नोटिफिकेशन मिल सकता है. इसमें आपको बताया जाएगा कि आपका डिवाइस अब सपोर्टेड नहीं रहेगा. ऐसे में आपके पास दो ही रास्ते हैं. पहला, अगर आपके फोन में अपडेट का ऑप्शन है तो उसे Android 6 या उससे ऊपर के वर्जन पर अपडेट करें. दूसरा, अगर अपडेट संभव नहीं है तो नया फोन लेना ही पड़ेगा. साथ ही, अपने WhatsApp चैट्स का बैकअप लेना बेहद जरूरी है, ताकि डेटा सेफ और सिक्योर रहे.

गर्मी में एसी का सही इस्तेमाल,6–8 घंटे चलाना सुरक्षित, 24–26°C तापमान सबसे बेहतर

अप्रैल में ही गर्मी इस बार रिकॉर्डतोड़ रही है. गर्मियों ने अपना ऐसा रंग दिखाया कि ज्यादातर घरों में लगातार एसी चलने लगे हैं. बाहर की तपिश में एसी की ठंडी हवा न केवल सुकून देती है, बल्कि भट्टी जैसे गर्म हो रहे घर को जीने के लायक भी बनाती है. हालांकि, एसी से गर्मी से छुटकारा तो मिल जाता है, लेकिन इसका ज्यादा इस्तेमाल बिजली के बिल को भी तेजी से बढ़ाता है. इतना ही नहीं हर समय एसी की हवा खाने से सेहत पर भी असर पड़ सकता है. ऐसे में एसी को समझदारी से चलाना बहुत जरूरी है, ताकि ठंडक भी मिले और नुकसान भी न हो. ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या इस भीषण गर्मी में बिना अपनी जेब और सेहत को नुकसान पहुंचाए चैन की नींद ली जा सकती है? इसके साथ ही आखिर दिन में कितने घंटे एसी चलाना सही रहता है? आइए जानते हैं कि एक दिन में कितने घंटे एसी चलाना चाहिए. कितनी देर तक एसी चलाना सही है? अगर आप अपने कमरे को ठंडा करने के लिए लगातार एसी चलाए रखते हैं, तो आप बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं. लंबे समय तक एसी चलाना सही नहीं माना जाता है. क्योंकि एसी की हवा में ज्यादा देर बैठने से स्किन रूखी होती है और इसके साथ ही कई हेल्थ समस्याएं भी हो सकती है. ऐसे में कोशिश करें कि एसी को एक बार में करीब 6–8 घंटे तक ही इस्तेमाल करें. जब कमरा अच्छी तरह ठंडा हो जाए, तो कुछ देर के लिए एसी बंद कर दें या फिर पंखा चला लें. इससे तीन फायदे होते हैं. पहला एसी पर ज्यादा दबाव नहीं पड़ता और उसके खराब होने के चांस घट जाते हैं, दूसरा आपकी स्किन/ सेहत सही बनी रहती है और साथ ही बिजली की खपत भी कम होती है. इस हिसाब से आप एसी को एक दिन में 12-14 घंटे चला सकते हैं. ज्यादा एसी में रहने के नुकसान हर समय एसी में बैठे रहना भी सेहत के लिए सही नहीं माना जाता. इस पर कई तरह की रिसर्च की गई हैं जिनके अनुसार, जब आप लगातार ठंडी जगह पर रहते हैं तो शरीर कम कैलोरी बर्न करता है, क्योंकि उसे अपने टेंपरेचर को बैलेंस रखने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती. इसका असर धीरे-धीरे शरीर पर दिखने लगता है. इससे वजन बढ़ने का खतरा रहता है, स्किन सूखने लगती है और सिर दर्द या थकान भी महसूस हो सकती है. इसलिए जरूरी है कि आप बीच-बीच में एसी से बाहर निकलें और नेचुरल हवा में रहें. किस टेंपरेचर पर चलाना होता है बेस्ट? अगर आप चाहते हैं कि आपका एसी कमरे को अच्छे से ठंडा भी करे और बिजली का बिल भी ज्यादा न आए, तो इसे सही टेंपरेचर पर चलाना बहुत जरूरी है. एक्स्पर्ट की मानें तो एसी के टेंपरेचर को 24°C से 26°C के बीच रखना सबसे बढ़िया माना जाता है. इस टेंपरेचर पर कमरा ठंडा भी रहता है और बिजली की खपत भी कम होती है. 16°C या 18°C पर एसी चलाने से बिजली की खपत ज्यादा होती है.  

10,000 स्टेप्स का नियम हर किसी के लिए जरूरी नहीं, डॉक्टरों ने दी चेतावनी

 आज के समय में फिटनेस फ्रीक और फिटनेस के लिए अवेयर रहने वाले लोग अक्सर पैदल चलने को भी महत्व देते हैं. अगर किसी से भी पूछो कि वह दिन में कितने स्टेप्स चलता है तो हर किसी का जवाब होता है, 10 हजार कदम. ऐसे में हर कोई अपनी स्मार्टवॉच में 10,000 कदम का आंकड़ा ही सिलेक्ट करता है और दिनभर उसके मुताबिक ही चलता है. डॉक्टर्स की मानें तो यह 'जादुई नंबर' हर किसी के लिए सुरक्षित नहीं है. बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार, ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बिना अपनी शारीरिक क्षमता को समझे इतना ज्यादा पैदल चलना आपके जोड़ों के लिए मुसीबत बन सकता है. खासकर उन लोगों के लिए जो पहले से ही किसी फिजिकल समस्या से जूझ रहे हैं. 10,000 स्टेप्स का चलना कितना जरूरी? पीडी हिंदुजा हॉस्पिटल और एमआरसी सेंटर के ऑर्थोपेडिक्स डॉ. प्रदीप मूनोट का कहना है, अधिकतर लोग मानते हैं कि जितना अधिक चलेंगे, उतने फिट रहेंगे. लेकिन मेडिकल साइंस के अनुसार, 10,000 कदम का कोई ठोस वैज्ञानिक आधार नहीं है. डॉक्टर का कहना है कि यह केवल एक मार्केटिंग स्ट्रेटजी के तौर पर शुरू हुआ था कि सबको 10 हजार कदम चलना चाहिए. ओवरवेट लोगों या बुजुर्गों के लिए अचानक से इतने कदम चलने से एक्स्ट्रा लोड पड़ सकता है जिससे घुटने के कार्टिलेज (हड्डियों के बीच की कुशनिंग) घिसने लगती है.   जोड़ों पर कैसे पड़ता है असर? डॉ. प्रदीम का कहना है, जब हम चलते हैं तो हमारे शरीर के वजन का पूरा भार घुटनों पर आता है. अगर कोई व्यक्ति गलत जूतों में या कठोर जगह पर 10 हजार कदम चलता है तो उसे ओवरयूज़ इंजरी हो सकती है. यदि आपको वॉक के समय घुटनों में सूजन, दर्द या कटकट की आवाज आने लगे तो समझ लीजिए कि आपके जोड़ों पर लोड आ रहा है और और तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए. जबरदस्ती 10 हजार कदम चलने का गोलपूरा करना ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है. वॉकिंग का क्या है सही तरीका? फिट रहने के लिए केवल कदमों की गिनती काफी नहीं है. डॉक्टरों का सुझाव है कि 7,000 से 8,000 कदम भी सेहत के लिए पर्याप्त होते हैं. पैदल चलने के साथ-साथ स्ट्रेंथ ट्रेनिंग भी जरूरी है ताकि मसल्स भी मजबूत बने रहें और जोड़ों पर अधिक लोड न पड़े. चलने के लिए हमेशा अच्छे कुशन वाले जूतों का चुनाव करें और कंक्रीट की जगह घास या नरम सतह पर टहलें.