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ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी डिवाइस चलाने पर लगेगा नया प्रतिबंध

सिडनी   ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड राज्य में नए सुरक्षा कानूनों के तहत 16 साल से कम उम्र के बच्चों को इलेक्ट्रिक मोबिलिटी डिवाइस (जैसे ई-बाइक और ई-स्कूटर) चलाने की अनुमति नहीं होगी। यह फैसला मंगलवार को घोषित किया गया। राज्य सरकार ने बताया कि ई-मोबिलिटी सुरक्षा पर बनी संसदीय समिति की सभी 28 सिफारिशों को पूरी तरह या सिद्धांत रूप में स्वीकार कर लिया गया है। इनमें 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर प्रतिबंध भी शामिल है। क्वींसलैंड के परिवहन मंत्री ब्रेंट मिकेलबर्ग ने कहा कि सरकार जल्द ही इन सिफारिशों को कानून बनाने के लिए संसद में पेश करेगी। नए नियमों के मुताबिक, ई-बाइक और ई-स्कूटर चलाने के लिए कम से कम क्वींसलैंड का लर्नर ड्राइविंग लाइसेंस होना जरूरी होगा। यह लाइसेंस 16 साल की उम्र में मिलता है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि चलाने वाले को ट्रैफिक नियमों की जानकारी हो। जांच में सामने आया कि साल 2025 में क्वींसलैंड में ई-मोबिलिटी से जुड़े हादसों में 12 लोगों की मौत हुई और 6,300 लोग घायल हुए। मिकेलबर्ग ने मंगलवार को कहा, "हम 16 साल से कम उम्र वालों पर इन डिवाइस के इस्तेमाल पर रोक लगा रहे हैं, क्योंकि बच्चों की सुरक्षा सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।" समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार, नए कानूनों के तहत फुटपाथों पर ई-मोबिलिटी डिवाइस के लिए 10 किलोमीटर प्रति घंटे की गति सीमा भी तय की जाएगी। साथ ही, पुलिस को अवैध डिवाइस ज़ब्त करने और नष्ट करने के अतिरिक्त अधिकार दिए जाएंगे, और वे चालकों का अचानक 'ब्रीथ टेस्ट' (सांस की जांच) भी कर सकेंगे। पिछले साल, ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र वालों के लिए सोशल मीडिया पर दुनिया का पहला प्रतिबंध लागू हुआ था। इसके तहत फेसबुक, यूट्यूब, टिकटॉक और एक्स जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स को ऐसे बच्चों के अकाउंट बनाने से रोकना होगा। प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने कहा कि यह कदम उन बच्चों की मदद के लिए उठाया गया है, जो एल्गोरिदम, लगातार चलने वाली सोशल मीडिया फीड और उसके दबाव के बीच बड़े हो रहे हैं। उन्होंने छात्रों से यह भी कहा कि वे छुट्टियों का सही उपयोग करें और पूरा समय मोबाइल पर न बिताएं। ऑस्ट्रेलिया के इस फैसले में दुनिया के कई देशों की दिलचस्पी देखी गई है। डेनमार्क, मलेशिया, ब्राजील, इंडोनेशिया और न्यूजीलैंड जैसे देश भी ऐसे कदम उठाने पर विचार कर रहे हैं।  

पाकिस्तान की हवा बनी ‘जहर’, प्रदूषण 13 गुना बढ़ा—दुनिया में सबसे खराब हालात

इस्लामाबाद पाकिस्तान को 2025 में दुनिया का सबसे प्रदूषित देश बताया गया है। यह खुलासा स्विट्जरलैंड की एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग कंपनी IQAir की रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में PM2.5 (बहुत छोटे और खतरनाक कण) का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानकों से करीब 13 गुना ज्यादा पाया गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, PM2.5 का सुरक्षित स्तर 5 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर होना चाहिए, लेकिन पाकिस्तान इससे काफी ऊपर रहा। यह छोटे-छोटे कण सांस के जरिए शरीर में जाकर फेफड़ों और दिल से जुड़ी गंभीर बीमारियां पैदा कर सकते हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से जान का खतरा भी बढ़ जाता है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि दुनिया के 143 में से 130 देश WHO के एयर क्वालिटी मानकों को पूरा नहीं कर पाए। यानी साफ हवा का संकट अब वैश्विक समस्या बन चुका है।  सबसे प्रदूषित देशों की सूची में पाकिस्तान के बाद बांग्लादेश दूसरे और ताजिकिस्तान तीसरे स्थान पर रहे। दुनिया के सिर्फ 13 देश ही ऐसे रहे जो WHO के मानकों के भीतर रहे। इनमें ऑस्ट्रेलिया, आइसलैंड, एस्टोनिया और पनामा शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में केवल 14% शहर ही साफ हवा के मानकों पर खरे उतरे, जो 2024 के 17% से कम है। कनाडा में लगी भीषण जंगल की आग का असर अमेरिका और यूरोप तक देखने को मिला, जिससे प्रदूषण स्तर बढ़ गया।हालांकि, कुछ देशों में सुधार भी देखा गया। लाओस, कंबोडिया और इंडोनेशिया में PM2.5 स्तर में कमी आई, जिसका कारण मौसम में बदलाव और ला नीना प्रभाव बताया गया। इसके अलावा, पाकिस्तान की स्थिति सुरक्षा के लिहाज से भी चिंताजनक बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में देश में आतंकवाद से जुड़ी मौतों में बढ़ोतरी हुई और कुल 1,139 लोगों की जान गई। Tehreek-i-Taliban Pakistan (TTP) और Balochistan Liberation Army (BLA) जैसे संगठनों की गतिविधियों ने हालात को और गंभीर बना दिया है। रिपोर्ट साफ बताती है कि पाकिस्तान इस समय दोहरी चुनौती से जूझ रहा है एक तरफ खतरनाक स्तर का प्रदूषण और दूसरी तरफ बढ़ता आतंकवाद। दोनों ही समस्याएं देश के लोगों की सेहत और सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुकी हैं।

कश्मीर केस में बड़ा फैसला: आसिया अंद्राबी को उम्रकैद, सहयोगियों पर भी कड़ी सजा

नई दिल्ली दिल्ली की एक अदालत ने कश्मीर की अलगाववादी नेता और दुख्तरान-ए-मिल्लत की प्रमुख आसिया अंद्राबी को उम्रकैद और उसकी दो सहयोगियों सोफी फहमीदा और नाहिदा नसरीन को 30-30 साल की सजा सुनाई है। तीनों आरोपियों को जनवरी में UAPA (गैरकानूनी गतिविधियों निवारण अधिनियम) के तहत दोषी ठहराया गया था। दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश चंदर जीत सिंह ने सजा पर दलीलें पूरी होने के बाद अंद्राबी पर यह फैसला सुनाया। इससे पहले इस साल जनवरी में केस का फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा था कि आसिया अंद्राबी और उसकी दो अन्य सहयोगियों ने कश्मीर को भारत से अलग करने की साजिश रची थी। कोर्ट ने 14 जनवरी को अंद्राबी, फहमीदा और नसरीन को UAPA की धारा 20 (आतंकवादी गिरोह या आतंकवादी संगठन का सदस्य होने पर सजा), 38 (आतंकवादी संगठन की सदस्यता से जुड़ा अपराध) और 39 (आतंकवादी संगठन का समर्थन करना) के तहत दोषी ठहराया था।

SC का बड़ा फैसला: हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़ने पर छिन सकता है अनुसूचित जाति का दर्जा

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक ऐतिहासिक फैसले में साफ कर दिया है कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा नहीं मिल सकता. कोर्ट ने कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जाति का दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता है और ऐसे व्यक्ति को SC/ST अत्याचार निवारण कानून का संरक्षण भी नहीं मिलेगा. कोर्ट ने स्पष्ट करते हुए कहा कि ईसाई बने व्यक्ति को SC/ST एक्ट का लाभ नहीं मिलेगा।  दरअसल, आंध्र प्रदेश के रहने वाले एक पादरी चिंथाडा आनंद ने SC/ST एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया था. उन्होंने आरोप लगाया था कि कुछ लोगों ने उन्हें जाति के नाम पर गाली दी, मारपीट की और जान से मारने की धमकी दी. जबकि आरोपी पक्ष ने कहना था कि आनंद ईसाई धर्म अपनाकर पादरी बन गए हैं, इसलिए उन्हें SC का दर्जा नहीं मिल सकता।  आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने इस दलील को सही माना और FIR रद्द कर दी. हाईकोर्ट ने कहा कि ईसाई धर्म अपनाने और सक्रिय रूप से उसका पालन करने वाले व्यक्ति को SC का दर्जा बरकरार नहीं रहता, भले ही उसके पास पुराना SC प्रमाणपत्र क्यों न हो।  आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के इसी फैसले को आनंद ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. इस पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति पी.के. मिश्रा और एन.वी. अंजारिया की पीठ ने हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें कहा गया है कि ईसाई धर्म अपनाने और सक्रिय रूप से उसका पालन करने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्य के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती।  स्वत: खत्म हो जाएगा SC का दर्जा सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि आनंद पिछले एक दशक से रविवार की प्रार्थनाएं आयोजित कर रहे थे और घटना के समय भी वे ईसाई धर्म का पालन कर रहे थे, जिससे उनका एससी दर्जा स्वतः ही खत्म हो गया।  कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पूरी तरह से सही ठहराते हुए कहा कि वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता ये नहीं कह रहा है कि इस मामले में याचिकाकर्ता का ये दावा नहीं है कि उसने ईसाई धर्म से अपने मूल धर्म में पुनः धर्मांतरण किया है या उसे मादिगा समुदाय में पुनः स्वीकार कर लिया गया है. इससे ये सिद्ध होता है कि अपीलकर्ता ईसाई धर्म का पालन करता रहा है और एक दशक से अधिक वक्त से पादरी के रूप में कार्यरत है जो गांव के घरों में नियमित रूप से रविवार की प्रार्थनाएं आयोजित करता है।  'घटना के वक्त नहीं थे SC का कानूनन हिस्सा' कोर्ट ने आगे कहा, 'घटना के वक्त भी वह प्रार्थना सभा चला रहा था. इन तथ्यों से कोई संदेह नहीं रह जाता कि घटना के दिन वह ईसाई धर्म का अनुयायी था. इसलिए घटना की तारीख पर वह कानूनन अनुसूचित जाति का हिस्सा नहीं था और इसलिए उसे SC/ST एक्ट का लाभ नहीं मिल सकता।  सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला उन सभी मामलों पर लागू होगा, जहां अनुसूचित जाति के व्यक्ति ने हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़कर ईसाई या किसी अन्य धर्म को अपना लिया है. कोर्ट ने साफ किया कि SC का दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध तक ही सीमित है। 

बस्तर में हिंसा के अंत का संकेत, नक्सली पापाराव और 17 साथी करेंगे सरेंडर

जगदलपुर इंद्रावती के घने जंगलों से एक ऐसी खबर सामने आ रही है, जो बस्तर के दशकों पुराने हिंसक अध्याय के अंत का संकेत देती नजर आ रही है। लंबे समय से सक्रिय शीर्ष माओवादी कमांडर पापा राव के आत्मसमर्पण की तैयारी ने सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन को सतर्क कर दिया है। बताया जा रहा है कि पापा राव अपने 17 साथियों के साथ हथियारों सहित समर्पण के लिए जंगल से बाहर निकल चुका है। उसे सुरक्षित लाने के लिए सुरक्षा बलों की विशेष टीम इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान के भीतर रवाना हो चुकी है। यदि यह आत्मसमर्पण सफल होता है, तो इसे बस्तर में माओवादी हिंसा के अंत की निर्णायक शुरुआत माना जा रहा है। पापाराव उर्फ मंगू (56) ये छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले का रहने वाला है। वर्तमान में DKSZCM मेंबर है। साथ ही पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी का इंचार्ज और दक्षिण सब जोनल ब्यूरो का सदस्य है। अपने पास AK-47 राइफल रखता है। बस्तर के जल-जंगल जमीन से वाकिफ है इसलिए कई बार पुलिस की गोलियों से बचकर निकला है। इसने सरेंडर कर दिया या फिर एनकाउंटर में मारा गया तो नक्सलियों की पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी खत्म हो जाएगी। देवा के सरेंडर करने के बाद अब पापाराव ही एक मात्र ऐसा नक्सली बचा है जो फाइटर है। बाकी बचे हुए अन्य टॉप कैडर्स के नक्सली उम्र दराज हो चुके हैं। पापाराव के सरेंडर करते ही बस्तर से माओवाद का सफाया तय माना जा रहा है। पापा राव का समर्पण     करीब 25 लाख रुपये के इनामी पापा राव वेस्ट बस्तर डिवीजन का सचिव और दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी का अहम सदस्य रहा है। लंबे समय तक बस्तर में माओवादी गतिविधियों की कमान उसके हाथों में रही।     ऐसे में उसका आत्मसमर्पण केवल एक व्यक्ति का सरेंडर नहीं, बल्कि पूरे संगठनात्मक ढांचे के कमजोर पड़ने का प्रतीक माना जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इससे शेष कैडर का मनोबल भी टूटेगा और वे भी आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित होंगे। साल भर में ऐसे बिखरा संगठन पिछले साल ही नक्सल संगठन के सबसे खूंखार नक्सली माड़वी हिड़मा, नक्सल संगठन का सचिव बसवाराजू, गणेश उइके समेत 17 बड़े कैडर्स का एनकाउंटर किया गया। भूपति, रूपेश, रामधेर जैसे बड़े नक्सलियों ने अपने सैकड़ों साथियों के साथ हथियार डाल दिए हैं। जबकि मिशिर बेसरा और गणपति ये 2 बड़े टॉप के नक्सली बचे हैं, जो वर्तमान में संगठन चला रहे हैं। बस्तर में बटालियन नंबर 1 का कमांडर देवा ने भी हिंसा का रास्ता छोड़ दिया है। अब केवल पापाराव ही एक ऐसा नक्सली बचा है जो लड़ाकू है। अगर इसका एनकाउंटर होता है या फिर गिरफ्तारी और सरेंडर होता है तो निश्चित ही नक्सल संगठन खत्म है। लगातार ऑपरेशन से टूटा नेटवर्क पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों ने माओवादी नेटवर्क पर लगातार सर्जिकल और रणनीतिक हमले किए हैं। बसव राजू, गुडसा उसेंडी, कोसा, हिड़मा और सुधाकर जैसे बड़े कमांडरों के मारे जाने से संगठन की रीढ़ पहले ही टूट चुकी थी। इसके अलावा भूपति, देवजी, मल्लाजी रेड्डी, रुपेश और सुजाता समेत करीब 2700 माओवादियों के आत्मसमर्पण ने संगठन को बिखेर दिया है। अब बस्तर में करीब 50 माओवादी ही सक्रिय बताए जा रहे हैं, जिनमें कोई बड़ा नेतृत्वकर्ता नहीं बचा है। विकास ने बदली तस्वीर माओवाद के कमजोर होने का सबसे बड़ा कारण ग्रामीणों का घटता समर्थन भी रहा है। जिन क्षेत्रों में कभी ‘जनताना सरकार’ का प्रभाव था, वहां अब सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य सेवाएं और सुरक्षा कैंप स्थापित हो चुके हैं। सरकार की पुनर्वास नीति और रोजगार के अवसरों ने युवाओं को मुख्यधारा की ओर आकर्षित किया है। इससे माओवादियों का सामाजिक आधार लगभग समाप्त हो गया है। झारखंड में बची अंतिम चुनौती हालांकि बस्तर, ओडिशा और तेलंगाना में माओवादी प्रभाव काफी हद तक खत्म हो चुका है, लेकिन झारखंड अब भी एक चुनौती बना हुआ है। वहां पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा अपने 70-80 साथियों के साथ सक्रिय है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, उसकी लोकेशन का पता लगाया जा चुका है, लेकिन उसने अपने ठिकानों के आसपास बारूदी सुरंगों का जाल बिछा रखा है, जिससे ऑपरेशन चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। लक्ष्य के करीब सुरक्षा एजेंसियां केंद्रीय गृहमंत्री द्वारा 31 मार्च 2026 तक माओवादी हिंसा खत्म करने के लक्ष्य के बीच तेजी से बदले हालात सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी उपलब्धि माने जा रहे हैं। पापा राव का संभावित आत्मसमर्पण इस लक्ष्य की दिशा में एक निर्णायक कदम हो सकता है। यदि झारखंड में भी अंतिम अभियान सफल रहता है, तो देश माओवादी हिंसा के लंबे दौर से पूरी तरह मुक्त हो सकता है। जिनके सरेंडर या एनकाउंटर के बाद खत्म होगा एंटी नक्सल ऑपरेशन 1. मुपल्ला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति उर्फ रमन्ना उर्फ राजन्ना, 3.5 करोड़ का इनाम 2. मिशिर बेसरा उर्फ भास्कर उर्फ सर्निमल उर्फ सुनील, 1.30 करोड़ का इनाम 1. मुपल्ला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति, 3.6 करोड़ का इनाम गणपति भाकपा (माओवादी) का पूर्व महासचिव था। 1992 में वो पीपुल्स वॉर ग्रुप (PWG) का महासचिव बना और 2004 में CPI (माओवादी) बनने के बाद 2018 तक इसकी कमान संभाली। पोलित ब्यूरो मेंबर और सेंट्रल कमेटी में एडवाइजर है। 1992 से लेकर 2018 तक जितने नक्सली हमले हुए, सब इसी के नेतृत्व में हुए। गणपति पर छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र सरकार ने 1-1 करोड़ का इनाम रखा है। जबकि आंध्र ने 25 लाख, झारखंड ने 12 लाख और NIA ने 15 लाख का इनाम रखा है। ओडिशा, प. बंगाल और तेलंगाना ने भी गणपति पर इनाम की घोषणा कर रखी है। 2003 में आंध्र प्रदेश के CM रहे चंद्रबाबू नायडू पर हमले का आइडिया और स्ट्रैटजी दोनों गणपति की थी। नक्सलियों के संगठन में मौजूद हमारे सोर्स के मुताबिक, नायडू पर हमले का आइडिया पोलित ब्यूरो के कई मेंबर्स को जोखिम भरा लगा था। कई लोग इसके सपोर्ट में भी नहीं थे। हालांकि गणपति इससे पीछे हटने को राजी नहीं हुआ। नायडू पर हमले ने केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक को बड़ा झटका दिया था। ये सिर्फ अकेली घटना नहीं है, जो गणपति के नेतृत्व में अंजाम दी गई हो। ऐसी 10 बड़ी घटनाएं हैं, गणपति जिनका मास्टरमाइंड रहा। 2. मिशिर बेसरा उर्फ भास्कर, 1.30 करोड़ का इनाम बेसरा झारखंड … Read more

कोलंबिया का मिलिट्री प्लेन पेरू बॉर्डर के पास क्रैश, 66 सैनिकों की जान चली गई

बोगोटा कोलंबिया के दक्षिणी अमेजन इलाके में बीते दिन सोमवार को सेना का एक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इसमें सवार 125 लोगों में से कम से कम 66 लोगों की मौत हो गई है। यह घटना कोलंबियाई वायु सेना के हाल के इतिहास की सबसे घातक दुर्घटनाओं में से एक थी। दुर्घटना के मलबे और राख के बीच अभी भी लगभग दो दर्जन लोग लापता हैं। पुटुमायो विभाग के गवर्नर जॉन गैब्रियल मोलिना ने स्थानीय समाचार आउटलेट को बताया कि 66 लोग मारे गए, कई लोग घायल हुए और 21 लोग लापता हैं। कब और कैसे हुई दुर्घटना? रक्षा मंत्री पेड्रो सांचेज ने एक्स पर बताया कि यह दुर्घटना तब हुई, जब लॉकहीड मार्टिन द्वारा निर्मित हरक्यूलिस C-130 परिवहन विमान पेरू की सीमा पर स्थित प्यूर्टो लेगुइजामो से उड़ान भर रहा था। उन्होंने यह भी कहा कि मरने वालों और घायल लोगों के आंकड़े बदल भी सकते हैं। फायरफाइटर एडुआर्डो सैन जुआन कैलेजास ने बताया कि माना जा रहा है कि जब विमान उड़ान भर रहा था तो रनवे के आखिर के पास उसे किसी चीज से टक्कर लगी। इसके बाद जब विमान नीचे गिर रहा था तो उसका एक पंख एक पेड़ से टकरा गया। उन्होंने आगे बताया कि इस दुर्घटना के कारण विमान में आग लग गई और उसमें रखे कुछ विस्फोटक उपकरण फट गए। घटना का वीडियो वायरल इस घटना से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें दूरदराज के इस इलाके के रहने वाले लोग सबसे पहले बचाव कार्य के लिए आगे आते हुए और कुछ लोग अपनी मोटरसाइकिलों पर घायल सैनिकों को बिठाकर कच्ची सड़क पर तेजी से दौड़ते हुए देखे जा सकते हैं। बाद में सेना के वाहन भी वहां पहुंचे, लेकिन अधिकारियों ने बताया कि दुर्घटनास्थल तक पहुंचना काफी मुश्किल था और इसकी वजह से बचाव कार्यों में बाधा आ रही थी।

भारत को तेल संकट से राहत, सऊदी अरब और UAE से कई टैंकर पहुंचे, सरकार ने क्या कहा?

मुंबई  अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध की वजह से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से भारत सहित कई देशों में ईंधन आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। इस बीच अब भारत के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। जानकारी के मुताबिक UAE से दो LPG कैरियर और सऊदी अरब से एक कच्चे तेल का कैरियर भारत के बंदरगाहों की ओर बढ़ रहे हैं ताकि देश में ऊर्जा आपूर्ति की कमी को पूरा किया जा सके। वहीं नौसेना प्रमुख दिनेश त्रिपाठी ने बढ़ते हुए शिपिंग संकट के चलते ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के अपने आधिकारिक दौरे को रद्द कर दिया है। जानकारी के मुताबिक भारतीय झंडे वाले जहाज पाइन गैस और जग वसंत लगभग एक साथ ही चल रहे थे। दोनों जहाज सोमवार सुबह 6 बजे UAE के बंदरगाहों से भारत के लिए रवाना हुए। ईरान ने इन दोनों LPG जहाजों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने की मंजूरी भी दे दी है। वहीं ओमान की खाड़ी में भारतीय नौसेना के युद्धपोत इन LPG जहाजों को 24 घंटे तक सुरक्षा दे रहे हैं। जहाज में कितना LPG? बंदरगाह, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के विशेष सचिव राजेश कुमार सिन्हा ने सोमवार को एक प्रेस कांफ्रेस में बताया कि दोनों जहाज पर लगभग 92,000 टन एलपीजी है। उन्होंने कहा, ''यात्रा शुरू हो चुकी है।'’ शिपिंग मंत्रालय के अनुसार जग वसंत के 26 मार्च को कांडला बंदरगाह पहुंचने की संभावना है, जबकि पाइन गैस 28 मार्च को न्यू मैंगलोर पहुंच सकता है। इन जहाजों पर क्रमशः 33 और 27 भारतीय नाविक भी सवार हैं। सऊदी से आ रहा तेल टैंकर इसके अलावा, MT Kallista नाम का एक कच्चे तेल का कैरियर सऊदी अरब के यान्बू बंदरगाह पर तेल भर रहा है और मंगलवार को जेद्दा बंदरगाह होते हुए भारत के पारादीप बंदरगाह के लिए रवाना होगा। पेट्रोलियम मंत्रालय के समन्वय से, पनामा के झंडे वाले यह जहाज भी अदन की खाड़ी से गुजरेगा और भारतीय नौसेना इसकी हिफाजत करेगी। भारतीय टैंकरों ने ईरान को दी फीस? भले ही रिपोर्ट्स में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर ईरान द्वारा मोटी फीस लिए जाने की खबरें थीं, लेकिन भारत ने अपने LPG टैंकरों को गुजरने की अनुमति देने के लिए ईरान को कोई पैसा नहीं दिया है। भारत में ईरानी दूतावास ने सोमवार को ऐसी रिपोर्टों का खंडन किया है। इस बीच केंद्र सरकार ने भारतीय नौसेना से कहा है कि वह भारतीय झंडे वाले जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ओमान की खाड़ी और अदन की खाड़ी के आसपास अपने कोलकाता-श्रेणी के विध्वंसक जहाजों को तैनात करे। वहीं भारतीय झंडे वाले सभी जहाज़ों के कप्तानों से लगातार संपर्क किया जा रहा है, ताकि उन्हें बताया जा सके कि भारत संकट के समय उनके साथ खड़ा है। कितने टैंकर फंसे? बता दें कि ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध कुल मिलाकर लगभग 500 टैंकर जहाज फारस की खाड़ी में फंसे हुए हैं। इनमें 108 कच्चे तेल के टैंकर, 166 तेल उत्पाद टैंकर, 104 रासायनिक/उत्पाद टैंकर, 52 रासायनिक टैंकर और 53 अन्य प्रकार के टैंकर शामिल हैं। विश्लेषकों का कहना है कि ईरान संभवत: सत्यापन के बाद चुनिंदा जहाजों को जलडमरूमध्य से जाने की अनुमति दे सकता है।

ईरान का अमेरिका को चेतावनी, युद्ध खत्म करने की दो बड़ी शर्तें, 9 अप्रैल तक होगा युद्ध समाप्त?

वाशिंगटन/ तेहरान  अमेरिका अब ईरान जंग खत्म करने को रेडी है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने का दावा है कि कि ईरान अब युद्ध नहीं लड़ना चाहता. वह समझौता करना चाहता है. उनकी मानें तो अमेरिका सीजफायर को लेकर ईरानी नेता के साथ बातचीत कर रहा है. डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि ईरान के साथ प्रोडक्टिव बातचीत हो रही है. वहीं ईरान ने ट्रंप के दावों को फेक ही बता दिया है. ईरान का कहना है कि मार्केट को मेनुपुलेट करने के लिए ट्रंप ईरान जंग पर ऐसा दावा कर रहे हैं. अब सवाल है कि क्या सच में ईरान जंग खत्म करने को तैयार नहीं हैं? वह भी तब जब उसके सारे टॉप लीडर्स मारे जा चुके हैं. अब ईरान ने भी अपनी मंशा जाहिर कर दी है. ईरान ने ट्रंप को सीधा जवाब दिया है कि वह भी युद्ध खत्म करने को तैयार है, मगर उसकी कुछ शर्तें हैं।  जी हां, ईरान भी अमेरिका और इजरायल संग युद्ध खत्म करना चाहता है. मगर वह ऐसे ही जंग खत्म नहीं करना चाहता. उसकी कुछ शर्तें हैं. ईरान का कहना है कि युद्ध तब तक जारी रहेगा जब तक सभी प्रतिबंध हटा नहीं दिए जाते और अमेरिका द्वारा युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई नहीं कर दी जाती. जी हां, ईरान अब अमेरिका से युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई चाहता है. साथ ही वह अपने ऊपर लगे सारे सैंक्शन्स हटवाना चाहता है. ये दोनों चीजें अमेरिका मान लेता है तो फिर ईरान इस युद्ध को आगे नहीं बढ़ाएगा और डोनाल्ड ट्रंप की बात मान लेगा।  क्या मानेंगे डोनाल्ड ट्रंप? मगर सवाल है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप ईरान की इन शर्तों को मानेंगे? दरअसल, ईरान के एक सीनियर अधिकारी का कहना है कि युद्ध का अंत ईरान के हाथ में है. ईरान इसे तभी समाप्त मानेगा जब अमेरिका से पूर्ण मुआवजा मिले और भविष्य में हस्तक्षेप न करने की गारंटी हो. यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने युद्ध को ‘समाप्त करने की दिशा में’ विचार करने की बात कही थी. ट्रंप प्रशासन ने तेल की कीमतों में भारी उछाल को नियंत्रित करने के लिए ईरानी तेल पर कुछ प्रतिबंध अस्थायी रूप से हटाए हैं, जिससे लगभग 140 मिलियन बैरल तेल बाजार में आ सकता है. लेकिन ईरान इसे अपनी जीत के रूप में देख रहा है और अपनी शर्तों पर अड़ा हुआ है।  ईरानी विदेश मंत्री ने क्या कहा? ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी दोहराया कि युद्ध अमेरिका द्वारा शुरू किया गया था और इसके सभी परिणामों के लिए वाशिंगटन जिम्मेदार है. उन्होंने मुआवजे, क्षेत्र से अमेरिकी सैन्य अड्डों की वापसी और भविष्य में हमलों की गारंटी की मांग की है. ईरान का कहना है कि बिना इन शर्तों के कोई युद्धविराम स्वीकार नहीं किया जाएगा।  ट्रंप का क्या दावा? वहीं, डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को उस ईरानी नेता का नाम बताने से इनकार कर दिया, जिसके साथ अमेरिका तीन सप्ताह से जारी युद्ध को समाप्त करने के लिए बातचीत कर रहा है. ट्रंप ने कहा कि वार्ताकार एक ‘शीर्ष व्यक्ति’ है, जो उस देश में ‘सबसे सम्मानित’ है. खबरों के मुताबिक, ईरान ने अमेरिका के साथ बातचीत होने से इनकार किया है, लेकिन यह स्वीकार किया है कि क्षेत्र के कुछ देश तनाव कम करने के प्रयास कर रहे हैं।  व्हाइट हाउस का जवाब इधर, समाचार एजेंसी ANI ने व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट से संपर्क किया और पूछा कि क्या अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस शांति मिशन के लिए अमेरिका के विशेष राष्ट्रपति दूत स्टीव विटकॉफ, और व्यवसायी व अमेरिका के राष्ट्रपति के पूर्व वरिष्ठ सलाहकार जेरेड कुशनर इस सप्ताह इस्लामाबाद में ईरानी अधिकारियों से मुलाकात करेंगे? इस पर व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने जवाब दिया, ‘ये संवेदनशील कूटनीतिक चर्चाएं हैं और अमेरिका प्रेस के माध्यम से बातचीत नहीं करेगा. यह एक बदलती हुई स्थिति है और मुलाकातों के बारे में की जा रही अटकलों को तब तक अंतिम नहीं माना जाना चाहिए जब तक कि व्हाइट हाउस द्वारा उनकी औपचारिक घोषणा न कर दी जाए।  9 अप्रैल तक खत्म हो जाएगा युद्ध?  मध्य पूर्व में जारी युद्ध को लेकर एक नई और दिलचस्प जानकारी सामने आ रही है. इजराइली मीडिया आउटलेट वाईनेट ने एक अधिकारी के हवाले से दावा किया है कि अमेरिका ईरान के साथ चल रहे युद्ध को अप्रैल महीने की 9 तारीख तक खत्म करने की योजना बना रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने 9 अप्रैल को युद्ध समाप्त करने की संभावित तारीख तय की है. अगर सब कुछ प्लान के मुताबिक ही चलता है तो इसका मतलब है कि लड़ाई और बातचीत में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है।  रिपोर्ट ये भी कहती है कि ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता इसी हफ्ते के अंत में पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हो सकती है. इसे लेकर न्यूज एजेंसी रॉयटर्स ने भी जानकारी दी है कि दोनों पक्षों में बात के लिए इस्लामाबाद को चुना जा सकता है. हालांकि इजरायली रिपोर्ट में ये भी कहा है कि डोनाल्ड ट्रंप को इजरायल डे के मौके पर नेतन्याहू सम्मानित करने का वादा कर चुके हैं. अगर तब तक ये युद्ध रुका नहीं, तो ये सम्मान समारोह भी टल जाएगा और ट्रंप ऐसा बिल्कुल नहीं चाहते।  क्यों 9 अप्रैल तक खत्म होगा युद्ध? दरअसल दिसंबर, 2025 के अंत में इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने के बाद एक विशेष सम्मान देने का वादा किया था. यदि 9 अप्रैल तक युद्ध खत्म होता है, तो यह ट्रंप के लिए इजराइल के स्वतंत्रता दिवस यानि 21-22 अप्रैल के दौरान वहां यात्रा करने और इजराइल प्राइज लेने का मौका देगा. ये देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इसके बाद भी आने वाले तीन हफ्तों के लिए आगे की योजनाएं बनाई जा रही हैं।  इजरायल-अमेरिका के बीच बात भी नहीं? इजराइल डिफेंस फोर्स के प्रवक्ता एफी डेफ्रिन ने कहा कि उनकी सेना ईरान के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई यहूदी त्योहार पासओवर तक जारी रखेगी, जो इस साल 1 से 8 अप्रैल के बीच पड़ रहा है. उन्होंने यह भी … Read more

भारत ने चीन-पाकिस्तान सीमा पर तैनात किए दो नए ब्रह्मास्त्र, छुटकू मिसाइल-ड्रोन होगा नष्ट

बेंगलुरु  क्या दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की तरफ बढ़ रही है. ईरान की अमेरिका और इजरायल के खिलाफ चल रहे महायुद्ध ने इस चिंता को बढ़ा दिया है. इस वैश्विक तनाव और पाकिस्तान-चीन सीमा पर बढ़ते खतरे के बीच भारतीय सेना ने अपनी रक्षा क्षमता को और मजबूत करने की तैयारी तेज कर दी है. सूत्रों के अनुसार, भारतीय सेना ने एक और पिनाका रॉकेट लॉन्चर रेजिमेंट को ऑपरेशनल कर लिया है और इस साल के अंत तक एक और रेजिमेंट को शामिल करने की तैयारी में है. इससे सेना के पास अब 7 पिनाका रेजिमेंट हो गए हैं, जो पाकिस्तान और चीन सीमा पर तैनात हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट ने रक्षा सूत्रों ने हवाले से बताया गया है कि पिनाका के आठवें रेजिमेंट के लिए अब आधे से ज्यादा उपकरण प्राप्त किए चुके हैं और 2026 के अंत तक पूरी तरह ऑपरेशनल हो जाएगा. अगले साल दो और रेजिमेंट को शामिल करने की योजना है, जिससे कुल संख्या 10 हो जाएगी. भारतीय सेना का लक्ष्य 22 पिनाका रेजिमेंट बनाने का है, जिसमें नई लंबी दूरी वाली गाइडेड मिसाइलों से लैस संस्करण शामिल किए जाएंगे. ये पुरानी सिस्टम की जगह लेंगे और छोटे मिसाइल-ड्रोन के हमलों का मुंहतोड़ जवाब देंगे. चीन-पाक सीमा पर भारत की कैसी सैन्य तैयारी? भारत की पाकिस्तान से सटी पश्चिमी सीमा और चीन से सटी उत्तरी सीमा पर हालात लंबे समय से संवेदनशील रही है. खासतौर पर वर्ष 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद सेना ने अपनी आर्टिलरी ताकत को तेजी से मजबूत करने का फैसला लिया था. भारतीय सेना ने तब भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड, टाटा पॉवर और लार्सन एंड तुबरो के साथ करीब 2,580 करोड़ रुपये के छह पिनाका रेजिमेंट के लिए समझौता किया था. अब इनका तेजी से उत्पादन और तैनाती की जा रही है. ईरान-अमेरिका जंग के दौरान ड्रोन और मिसाइल स्वार्म अटैक की रणनीति देखते हुए सेना ने पिनाका को और महत्वपूर्ण हथियार मान लिया है. इस जंग में बड़े पैमाने पर रॉकेट, ड्रोन और प्रिसिजन स्ट्राइक सिस्टम का इस्तेमाल हो रहा है. यही वजह है कि भारत भी अपनी सेना को ऐसे हथियारों से लैस कर रहा है जो एक साथ कई लक्ष्यों को तेजी से निशाना बना सकें. ‘देसी ब्रह्मास्त्र’ क्यों कहा जाता है पिनाका? पिनाका भारत का स्वदेशी मल्टी-बारेल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम है, जिसे डीआरडीओ ने विकसित किया है. इस भारतीय सेना का ‘देसी ब्रह्मास्त्र’ कहा जाता है, क्योंकि यह कम समय में भारी तबाही मचाने की क्षमता रखता है. यह 122 मिमी रॉकेटों की तुलना में ज्यादा शक्तिशाली और सटीक है. पिनाका 12 रॉकेट एक साथ दाग सकता है, और कुछ ही सेकंड में दुश्मन के बड़े इलाके को निशाना बना सकता है. इसकी रेंज 40 से 75 किलोमीटर तक है, जबकि इसके नए गाइडेड वर्जन इससे भी ज्यादा दूर 120 किमी तक तक सटीक हमला करने में सक्षम हैं.   यह सिस्टम GPS और INS गाइडेंस से लैस है, जिससे सटीकता बहुत बढ़ गई है. यह सिस्टम खासतौर पर दुश्मन के ठिकानों, बंकर, कमांड सेंटर और आर्टिलरी पोजीशन को नष्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है. इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी ‘शूट एंड स्कूट’ क्षमता है… यानी हमला करने के तुरंत बाद अपनी पोजीशन बदल लेना, जिससे दुश्मन के जवाबी हमले से बचा जा सके. ड्रोन और ‘छुटकू मिसाइल’ का भी तोड़ आधुनिक युद्ध में छोटे ड्रोन और लो-कॉस्ट मिसाइलें बड़ा खतरा बनकर उभरी हैं. पिनाका का अपग्रेडेड वर्जन ऐसे लक्ष्यों के खिलाफ भी प्रभावी माना जा रहा है. इसकी एक रेजिमेंट में 18-24 लॉन्चर होते हैं, जो मिनटों में सैकड़ों रॉकेट दाग सकते हैं. यह छोटे ड्रोन और क्रूज मिसाइलों के स्वार्म अटैक का मुंहतोड़ जवाब देने में सक्षम है. ईरान की तरह दुश्मन अगर सस्ते ड्रोन और मिसाइलों से हमला करे तो पिनाका का सैल्वो दुश्मन के लॉन्चर और कमांड सेंटर को पहले ही नष्ट कर सकता है. इसकी लागत भी दूसरी हाईटेक मिसाइलों की तुलना में काफी कम है. इसका एक रॉकेट महज कुछ लाख रुपये में आ जाता है, जबकि दुश्मन की महंगी मिसाइल को रोकने वाले सिस्टम करोड़ों में हैं. ईरान-इजरायल संघर्ष ने यह साफ कर दिया है कि भविष्य के युद्ध पारंपरिक नहीं होंगे, बल्कि टेक्नोलॉजी आधारित होंगे, जहां मिसाइल, ड्रोन और रॉकेट सिस्टम अहम भूमिका निभाएंगे. भारत इसी दिशा में अपनी सेना को तैयार कर रहा है, ताकि किसी भी संभावित खतरे का मुकाबला प्रभावी तरीके से किया जा सके. रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान की रणनीति देखते हुए भारत ने सही समय पर कदम उठाया है. पिनाका की बढ़ती संख्या न सिर्फ रक्षा को मजबूत करेगी, बल्कि दुश्मन को भी संदेश देगी कि भारत अब किसी भी स्वार्म अटैक का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार है. पिनाका की क्या है खूबियां?     मल्टी-बैरल लॉन्च सिस्टम – एक साथ 12 रॉकेट दागने की क्षमता, जिससे बड़े इलाके में एकसाथ हमला संभव.     तेज फायरिंग क्षमता – कुछ ही सेकंड में पूरा सल्वो (12 रॉकेट) फायर कर सकता है, जिससे दुश्मन को संभलने का मौका नहीं मिलता.     लंबी मारक क्षमता – शुरुआती वर्जन की रेंज 40 किमी तक, जबकि आधुनिक गाइडेड वर्जन 70–75 किमी या उससे अधिक दूरी तक सटीक हमला कर सकते हैं.     उच्च सटीकता – नए गाइडेड रॉकेट्स GPS/INS आधारित नेविगेशन से लैस, जिससे टारगेट पर सटीक प्रहार.     शूट एंड स्कूट तकनीक – हमला करने के तुरंत बाद पोजीशन बदल सकता है, जिससे दुश्मन के जवाबी हमले से बचाव.     सैचुरेशन फायर क्षमता – एक बड़े क्षेत्र में भारी मात्रा में रॉकेट बरसाकर दुश्मन के ठिकानों, बंकर और सैनिक जमावड़े को नष्ट कर सकता है.     मोबाइल और ऑल-टेरेन क्षमता – हाई मोबिलिटी व्हीकल पर लगा होने के कारण पहाड़, रेगिस्तान और कठिन इलाकों में भी आसानी से तैनात.     कम समय में तैनाती – सिस्टम को जल्दी से तैयार कर फायर किया जा सकता है, जिससे युद्ध के दौरान तेजी मिलती है.     ड्रोन और हल्के लक्ष्यों के खिलाफ प्रभावी – बड़े पैमाने पर फायरिंग के कारण ड्रोन स्वार्म और छोटे मिसाइल सिस्टम को भी निष्क्रिय करने में सक्षम.     स्वदेशी तकनीक – पूरी … Read more

गंगा नदी बेसिन में 1300 साल का सबसे भयंकर सूखा, स्थिति हुई भयावह

बनारस भारत में सूखे की समस्या अब बहुत गंभीर हो गई है. गंगा के मैदानी इलाके के कुछ हिस्से 2009 से ही सूखे के बड़े हॉटस्पॉट बन चुके हैं. दिसंबर 2025 में जारी एक अध्ययन ने 1971 से 2020 तक छह बड़े क्षेत्रों – पश्चिमी और मध्य भारत, हिमालय, गंगा के मैदान, प्रायद्वीपीय और उत्तर-पूर्व भारत में सूखा बढ़ा है।  DTE की रिपोर्ट के मुताबिक स्टैंडर्डाइज्ड प्रेसिपिटेशन इवैपोट्रांसपिरेशन इंडेक्स जैसे साधारण मौसम सूचक का इस्तेमाल किया गया. नतीजा चौंकाने वाला है – गंगा के मैदान, हिमालय और उत्तर-पूर्व भारत में सूखे की रफ्तार बहुत तेज बढ़ रही है. कमजोर मानसून और बढ़ते तापमान ने इस समस्या को और गहरा कर दिया है।  क्यों हो रहा है इतना सूखा? मानसून के समय बारिश कम हो रही है, जबकि गर्मी के मौसम में भाप बनने की रफ्तार बढ़ गई है. दिन और रात दोनों समय तापमान बढ़ रहा है. भूजल का ज्यादा दोहन और खेतों में ज्यादा पानी वाली फसलें लगाने से पानी की कमी और तेज हो रही है. उत्तर-पूर्व भारत में पहले बहुत बारिश होती थी, लेकिन अब वहां भी कमजोर मानसून और गर्मी ने पानी की समस्या पैदा कर दी है।  सितंबर 2025 में जारी एक और अध्ययन ने दिखाया कि गंगा नदी घाटी ने 1991-2020 के बीच पिछले 1300 सालों का सबसे तेज सूखा देखा. पेड़ों की छल्लों से पता चला कि यह सूखा 16वीं सदी के सूखों से भी 76% ज्यादा तीव्र था. यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना के वैज्ञानिक कहते हैं कि यह सूखा सिर्फ प्राकृतिक नहीं, बल्कि इंसानी गतिविधियों का नतीजा है।  पानी का दिवालियापन सूखा अब सिर्फ पानी की समस्या नहीं रह गया. यह पानी का दिवालियापन कहलाता है. यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट कहती है कि पानी अब राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बन गया है. अगर सही प्रबंधन नहीं हुआ तो देशों के बीच भी पानी पर लड़ाई हो सकती है. रिपोर्ट चेतावनी देती है कि पानी का संकट तब तक रहेगा जब तक पृथ्वी पर इंसान और दूसरे जीव हैं।  समाधान क्या हैं? वैज्ञानिक कहते हैं कि सिर्फ नई तकनीक काफी नहीं. ड्रिप इरिगेशन, सौर पंप, पानी को साफ करके दोबारा इस्तेमाल और खारे पानी से नमक हटाने वाले प्लांट मदद कर सकते हैं. लेकिन हर उपाय के साथ खतरा भी जुड़ा है. ज्यादा पानी वाली फसलें लगाने से भूजल और तेज खत्म हो सकता है।  इजरायल और कैलिफोर्निया के उदाहरण से सीख सकते हैं. दोनों ने सूखे के बावजूद अपनी अर्थव्यवस्था को पानी पर कम निर्भर बनाया. इजरायल ने खेती के अलावा सर्विस और उद्योग क्षेत्र को मजबूत किया. कैलिफोर्निया में 2014 के सूखे में भी अर्थव्यवस्था ज्यादा प्रभावित नहीं हुई क्योंकि कृषि का हिस्सा कम था. क्या करना चाहिए? भारत में कृषि में 85% पानी इस्तेमाल होता है. इसलिए सबसे पहले खेती के तरीके बदलने चाहिए. बिजली सब्सिडी में सुधार करके भूजल का अंधाधुंध निकालना रोकना जरूरी है. सीधी बुवाई, मिट्टी में नमी बचाने की तकनीक और जल प्रबंधन को आम बनाना होगा।   प्राचीन प्रणालियां भी मदद कर सकती हैं, लेकिन उन्हें आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ना पड़ेगा. वैज्ञानिक कहते हैं कि डेटा की बहुत कमी है. ज्यादा कुओं में नियमित मॉनिटरिंग जरूरी है।