samacharsecretary.com

पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ पर बड़ा खुलासा, सांसद की किताब ने मचाई सियासी हलचल

नई दिल्ली शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने अपनी नई किताब 'अनलाइकली पैराडाइज' में देश के पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को लेकर बड़ा दावा किया है। राउत ने दावा किया है कि धनखड़ ने पिछले साल ED के दबाव में इस्तीफा दिया था। धनखड़ ने अपनी इस किताब में अन्य कई विवादित दावे भी किए हैं। बता दें कि यह किताब उन्होंने जेल में रहते हुए लिखी थी। यह किताब 2025 में मराठी भाषा में छपी थी और अब इसके अंग्रेजी अनुवाद का सोमवार को विमोचन हुआ है। किताब में दावा किया गया है कि पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने 2025 में ED के दबाव में आकर पद से इस्तीफा देने का फैसला लिया। राउत के मुताबिक धनखड़ पर यह दबाव इसलिए बनाया गया क्योंकि धनखड़ मोदी सरकार के खिलाफ स्वतंत्र राजनीतिक कदम उठा रहे थे। किताब में कहा गया है कि उस समय यह अफवाह भी थी कि धनखड़ और उनकी पत्नी ने जयपुर का अपना घर बेचकर कुछ रकम विदेश भेजी है। इसी आधार पर ED ने उनके खिलाफ अन्य जांच एजेंसियों के साथ मिलकर एक फाइल तैयार की थी। ED ने फाइल दिखाकर बनाया दबाव राउत के अनुसार, जब धनखड़ के स्वतंत्र राजनीतिक कदमों की चर्चा बढ़ी, तो ED ने उन्हें यह फाइल दिखाकर इस्तीफा देने का दबाव बनाया। दावे के मुताबिक शुरुआत में जगदीप धनखड़ ने इससे इनकार किया, लेकिन इसके बाद जांच का दबाव और बढ़ा दिया गया, जिससे वह असहज नजर आने लगे। गौरतलब है कि धनखड़ ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए बीते 21 जुलाई को उपराष्ट्रपति के पद से इस्तीफा दे दिया था। सरकार पर गंभीर आरोप किताब में पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। राउत का दावा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के कथित चुनावी उल्लंघनों के खिलाफ अलग राय रखने की वजह से लवासा के घर पर छापा पड़ा और उनके परिवार को ED के समन मिले। किताब के मुताबिक, चुनाव आचार संहिता के आठ उल्लंघनों की शिकायत के आधार पर लवासा ने कार्रवाई शुरू की थी और उन्हें चुप रहने की सलाह दी गई थी, लेकिन उन्होंने दबाव के आगे झुकने से इनकार कर दिया। राउत का आरोप है कि इसके बाद लवासा और उनके परिवार को गंभीर परिणाम भुगतने पड़े। किताब में कहा गया है कि 2020 में ED की कार्रवाई ने उन्हें इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया और उसके बाद भी वह एजेंसी की जांच के दायरे में रहे। शरद पवार को लेकर क्या लिखा? किताब में आगे दावा किया गया है कि उस दौर में यह चर्चा थी कि गुजरात दंगों के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को जेल भेजा जा सकता है। हालांकि, उस समय केंद्रीय मंत्री रहे शरद पवार इस कदम के पक्ष में नहीं थे। किताब के मुताबिक, एक कैबिनेट बैठक में पवार ने कहा था कि किसी चुने हुए मुख्यमंत्री को राजनीतिक मतभेद के आधार पर जेल भेजना सही नहीं होगा। राउत के अनुसार, पवार की यह राय कई नेताओं को सही लगी और इससे पीएम मोदी को भी जेल जाने से बचाया गया। किताब में यह भी दावा किया गया है कि शरद पवार और शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे ने अमित शाह को जमानत दिलाने में मदद की थी।  

ट्रंप के बदले रुख से खुला समझौते का रास्ता? अमेरिका-ईरान रिश्तों पर पूर्व राजनयिक का बड़ा बयान

नई दिल्ली मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं। भारत के पूर्व राजनयिक अशोक सज्जनहर ने कहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान तनाव कम होने के संकेत दे रहे हैं। सज्जनहर के मुताबिक, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ अभियान शुरू किया था, तब जो लक्ष्य तय किए गए थे, वे पूरी तरह हासिल नहीं हो पाए। इसी वजह से अब अमेरिका अपनी रणनीति बदलता दिख रहा है।  उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका पर अंदरूनी और बाहरी दोनों तरह का दबाव बढ़ रहा है। देश में बढ़ती महंगाई, तेल की कीमतों में उछाल और युद्ध के खिलाफ विरोध जैसे कारण भी फैसलों को प्रभावित कर रहे हैं। इसके अलावा अमेरिका में आने वाले चुनाव भी एक बड़ा फैक्टर हैं। इस बीच, डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा फैसला लेते हुए ईरान के पावर प्लांट्स पर होने वाले हमलों को 5 दिनों के लिए टाल दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच “अच्छी और सकारात्मक बातचीत” चल रही है। यह कदम ऐसे समय में आया है जब दोनों देशों के बीच युद्ध अपने चौथे हफ्ते में पहुंच चुका है और पूरी दुनिया ऊर्जा संकट को लेकर चिंतित है। पहले ट्रंप ने ईरान को सख्त चेतावनी दी थी कि अगर उसने होर्मुज जलडमरूमध्य नहीं खोला, तो अमेरिका कड़े हमले करेगा। इसके जवाब में ईरान ने भी धमकी दी थी कि वह पूरे क्षेत्र के तेल और ऊर्जा ढांचे को निशाना बना सकता है। सज्जनहर ने पाकिस्तान को लेकर भी बयान दिया और कहा कि पाकिस्तान इस मामले में भरोसेमंद मध्यस्थ नहीं है। उनके अनुसार, पारंपरिक मध्यस्थ जैसे ओमान और कतर ज्यादा प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। ट्रंप का रुख नरम होना और हमलों को टालना इस बात का संकेत है कि अब युद्ध से ज्यादा बातचीत पर जोर दिया जा रहा है। अगर यह प्रक्रिया जारी रहती है, तो मिडिल ईस्ट में तनाव कम हो सकता है।  

अब टिकट कैंसिल करना हुआ आसान: भारतीय रेलवे ने बदले नियम, यात्रियों को फायदा

नई दिल्ली भारतीय रेलवे ने यात्रियों को बड़ी राहत देते हुए टिकट कैंसिलेशन और बोर्डिंग पॉइंट बदलने के नियमों में अहम बदलाव किया है। नए नियमों के मुताबिक, अब यात्रियों को यात्रा से पहले ज्यादा लचीलापन मिलेगा, जिससे उनकी प्लानिंग आसान हो जाएगी। रेलवे इन बदलावों को 1 अप्रैल से 15 अप्रैल 2026 के बीच चरणबद्ध तरीके से लागू करेगा। क्या है डिटेल सबसे बड़ा बदलाव टिकट कैंसिलेशन के नियमों में किया गया है। अब अगर कोई यात्री अपनी कन्फर्म टिकट यात्रा से 72 घंटे पहले कैंसिल करता है, तो उसे अधिकतम रिफंड मिलेगा। यानी सिर्फ एक तय फ्लैट कैंसिलेशन चार्ज काटा जाएगा और बाकी पैसा वापस मिल जाएगा। इससे उन लोगों को राहत मिलेगी जो पहले से यात्रा की योजना बदल लेते हैं। वहीं, अगर टिकट 72 घंटे से 24 घंटे के बीच कैंसिल की जाती है, तो यात्री को 25 प्रतिशत किराया काटकर रिफंड दिया जाएगा। यह कटौती न्यूनतम कैंसिलेशन चार्ज के अधीन होगी। यानी जितनी देर से टिकट कैंसिल करेंगे, उतना ज्यादा पैसा कटेगा। रेलवे का कहना है कि इससे सीटों का बेहतर उपयोग हो सकेगा। अगर कोई यात्री यात्रा से 24 घंटे से 8 घंटे पहले टिकट कैंसिल करता है, तो उसे 50 प्रतिशत किराया काटकर ही रिफंड मिलेगा। यानी इस समय सीमा में कैंसिलेशन महंगा पड़ेगा। वहीं सबसे सख्त नियम आखिरी समय के लिए रखा गया है—अगर ट्रेन छूटने से 8 घंटे से कम समय बचा है, तो टिकट कैंसिल करने पर कोई रिफंड नहीं मिलेगा। प्रस्थान से पहले समय के आधार पर टिकट रद्द करने के नियम प्रस्थान से पहले का समय – रद्दीकरण नियम 72 घंटे से अधिक पहले – अधिकतम रिफंड मिलेगा, केवल प्रति यात्री फ्लैट कैंसिलेशन चार्ज कटेगा 72 घंटे से 24 घंटे के बीच – किराए का 25% कटेगा (न्यूनतम चार्ज लागू) 24 घंटे से 8 घंटे के बीच – किराए का 50% कटेगा (न्यूनतम चार्ज लागू) 8 घंटे से कम समय – पहले कोई रिफंड नहीं मिलेगा ये नए नियम 1 अप्रैल से 15 अप्रैल 2026 के बीच चरणबद्ध तरीके से लागू किए जाएंगे। बोर्डिंग प्वाइंट बदलने में बड़ी राहत अब यात्री ट्रेन के निर्धारित प्रस्थान समय से 30 मिनट पहले तक अपना बोर्डिंग स्टेशन बदल सकते हैं। रेलवे मंत्रालय के अनुसार, यह सुविधा खासतौर पर उन बड़े शहरों में उपयोगी होगी जहां एक से अधिक रेलवे स्टेशन हैं। इससे यात्री अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी नजदीकी स्टेशन से यात्रा शुरू कर सकेंगे। फिलहाल, पहले यह सुविधा केवल चार्ट तैयार होने से पहले तक ही सीमित थी। टाउट्स पर लगेगी लगाम रेल मंत्रीअश्विनी वैष्णव ने बताया कि यह फैसला टिकट दलालों (टाउट्स) की गतिविधियों के विश्लेषण के बाद लिया गया है। उन्होंने कहा कि टाउट्स पहले बड़ी संख्या में टिकट बुक कर लेते थे और बाद में अनबिके टिकटों को कैंसिल कराकर रिफंड हासिल कर लेते थे। नए सख्त नियमों से इस तरह की गतिविधियों पर रोक लगेगी। पहले क्या थे कैंसिलेशन नियम? संशोधन से पहले रेलवे के टिकट रद्द करने के नियम कम समय सीमा और क्लास-आधारित फ्लैट चार्ज पर आधारित थे: 48 घंटे से पहले रद्द करने पर – प्रति यात्री फ्लैट चार्ज कटता था एग्जीक्यूटिव क्लास: ₹240 + GST एसी चेयर कार: ₹180 + GST 48 घंटे से 12 घंटे के बीच किराए का 25% कटता था (न्यूनतम चार्ज लागू) 12 घंटे से 4 घंटे के बीच- किराए का 50% कटता था (न्यूनतम चार्ज लागू) 4 घंटे से कम समय पर कोई रिफंड नहीं मिलता था, यदि टिकट रद्द या TDR फाइल नहीं किया गया हो। वेटिंग और आंशिक कन्फर्म टिकट के नियम वेटिंग टिकट 4 घंटे पहले तक कैंसिल करने पर ₹20 + GST प्रति यात्री कटता था। चार्ट बनने के बाद भी टिकट वेटिंग रहने पर ऑटोमेटिक कैंसिल होकर पूरा रिफंड मिलता था आंशिक कन्फर्म टिकट 4 घंटे पहले तक कैंसिल करने पर ₹20 + GST कटता था कुछ मामलों में चार्ट बनने के बाद, यदि कोई यात्री यात्रा नहीं करता, तो पूरा रिफंड मिल सकता था विशेष परिस्थितियों में रिफंड     ट्रेन पूरी तरह रद्द होने पर     ट्रेन 3 घंटे से अधिक देरी से चलने पर इन स्थितियों में पूरा रिफंड दिया जाता था, बशर्ते समय पर TDR फाइल किया गया हो। बता दें कि रेलवे के ये नए बदलाव जहां यात्रियों को अधिक सुविधा देंगे, वहीं टिकट बुकिंग सिस्टम में पारदर्शिता बढ़ाने और दुरुपयोग को रोकने में भी मददगार साबित होंगे।  

ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी डिवाइस चलाने पर लगेगा नया प्रतिबंध

सिडनी   ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड राज्य में नए सुरक्षा कानूनों के तहत 16 साल से कम उम्र के बच्चों को इलेक्ट्रिक मोबिलिटी डिवाइस (जैसे ई-बाइक और ई-स्कूटर) चलाने की अनुमति नहीं होगी। यह फैसला मंगलवार को घोषित किया गया। राज्य सरकार ने बताया कि ई-मोबिलिटी सुरक्षा पर बनी संसदीय समिति की सभी 28 सिफारिशों को पूरी तरह या सिद्धांत रूप में स्वीकार कर लिया गया है। इनमें 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर प्रतिबंध भी शामिल है। क्वींसलैंड के परिवहन मंत्री ब्रेंट मिकेलबर्ग ने कहा कि सरकार जल्द ही इन सिफारिशों को कानून बनाने के लिए संसद में पेश करेगी। नए नियमों के मुताबिक, ई-बाइक और ई-स्कूटर चलाने के लिए कम से कम क्वींसलैंड का लर्नर ड्राइविंग लाइसेंस होना जरूरी होगा। यह लाइसेंस 16 साल की उम्र में मिलता है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि चलाने वाले को ट्रैफिक नियमों की जानकारी हो। जांच में सामने आया कि साल 2025 में क्वींसलैंड में ई-मोबिलिटी से जुड़े हादसों में 12 लोगों की मौत हुई और 6,300 लोग घायल हुए। मिकेलबर्ग ने मंगलवार को कहा, "हम 16 साल से कम उम्र वालों पर इन डिवाइस के इस्तेमाल पर रोक लगा रहे हैं, क्योंकि बच्चों की सुरक्षा सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।" समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार, नए कानूनों के तहत फुटपाथों पर ई-मोबिलिटी डिवाइस के लिए 10 किलोमीटर प्रति घंटे की गति सीमा भी तय की जाएगी। साथ ही, पुलिस को अवैध डिवाइस ज़ब्त करने और नष्ट करने के अतिरिक्त अधिकार दिए जाएंगे, और वे चालकों का अचानक 'ब्रीथ टेस्ट' (सांस की जांच) भी कर सकेंगे। पिछले साल, ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र वालों के लिए सोशल मीडिया पर दुनिया का पहला प्रतिबंध लागू हुआ था। इसके तहत फेसबुक, यूट्यूब, टिकटॉक और एक्स जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स को ऐसे बच्चों के अकाउंट बनाने से रोकना होगा। प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने कहा कि यह कदम उन बच्चों की मदद के लिए उठाया गया है, जो एल्गोरिदम, लगातार चलने वाली सोशल मीडिया फीड और उसके दबाव के बीच बड़े हो रहे हैं। उन्होंने छात्रों से यह भी कहा कि वे छुट्टियों का सही उपयोग करें और पूरा समय मोबाइल पर न बिताएं। ऑस्ट्रेलिया के इस फैसले में दुनिया के कई देशों की दिलचस्पी देखी गई है। डेनमार्क, मलेशिया, ब्राजील, इंडोनेशिया और न्यूजीलैंड जैसे देश भी ऐसे कदम उठाने पर विचार कर रहे हैं।  

पाकिस्तान की हवा बनी ‘जहर’, प्रदूषण 13 गुना बढ़ा—दुनिया में सबसे खराब हालात

इस्लामाबाद पाकिस्तान को 2025 में दुनिया का सबसे प्रदूषित देश बताया गया है। यह खुलासा स्विट्जरलैंड की एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग कंपनी IQAir की रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में PM2.5 (बहुत छोटे और खतरनाक कण) का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानकों से करीब 13 गुना ज्यादा पाया गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, PM2.5 का सुरक्षित स्तर 5 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर होना चाहिए, लेकिन पाकिस्तान इससे काफी ऊपर रहा। यह छोटे-छोटे कण सांस के जरिए शरीर में जाकर फेफड़ों और दिल से जुड़ी गंभीर बीमारियां पैदा कर सकते हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से जान का खतरा भी बढ़ जाता है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि दुनिया के 143 में से 130 देश WHO के एयर क्वालिटी मानकों को पूरा नहीं कर पाए। यानी साफ हवा का संकट अब वैश्विक समस्या बन चुका है।  सबसे प्रदूषित देशों की सूची में पाकिस्तान के बाद बांग्लादेश दूसरे और ताजिकिस्तान तीसरे स्थान पर रहे। दुनिया के सिर्फ 13 देश ही ऐसे रहे जो WHO के मानकों के भीतर रहे। इनमें ऑस्ट्रेलिया, आइसलैंड, एस्टोनिया और पनामा शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में केवल 14% शहर ही साफ हवा के मानकों पर खरे उतरे, जो 2024 के 17% से कम है। कनाडा में लगी भीषण जंगल की आग का असर अमेरिका और यूरोप तक देखने को मिला, जिससे प्रदूषण स्तर बढ़ गया।हालांकि, कुछ देशों में सुधार भी देखा गया। लाओस, कंबोडिया और इंडोनेशिया में PM2.5 स्तर में कमी आई, जिसका कारण मौसम में बदलाव और ला नीना प्रभाव बताया गया। इसके अलावा, पाकिस्तान की स्थिति सुरक्षा के लिहाज से भी चिंताजनक बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में देश में आतंकवाद से जुड़ी मौतों में बढ़ोतरी हुई और कुल 1,139 लोगों की जान गई। Tehreek-i-Taliban Pakistan (TTP) और Balochistan Liberation Army (BLA) जैसे संगठनों की गतिविधियों ने हालात को और गंभीर बना दिया है। रिपोर्ट साफ बताती है कि पाकिस्तान इस समय दोहरी चुनौती से जूझ रहा है एक तरफ खतरनाक स्तर का प्रदूषण और दूसरी तरफ बढ़ता आतंकवाद। दोनों ही समस्याएं देश के लोगों की सेहत और सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुकी हैं।

कश्मीर केस में बड़ा फैसला: आसिया अंद्राबी को उम्रकैद, सहयोगियों पर भी कड़ी सजा

नई दिल्ली दिल्ली की एक अदालत ने कश्मीर की अलगाववादी नेता और दुख्तरान-ए-मिल्लत की प्रमुख आसिया अंद्राबी को उम्रकैद और उसकी दो सहयोगियों सोफी फहमीदा और नाहिदा नसरीन को 30-30 साल की सजा सुनाई है। तीनों आरोपियों को जनवरी में UAPA (गैरकानूनी गतिविधियों निवारण अधिनियम) के तहत दोषी ठहराया गया था। दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश चंदर जीत सिंह ने सजा पर दलीलें पूरी होने के बाद अंद्राबी पर यह फैसला सुनाया। इससे पहले इस साल जनवरी में केस का फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा था कि आसिया अंद्राबी और उसकी दो अन्य सहयोगियों ने कश्मीर को भारत से अलग करने की साजिश रची थी। कोर्ट ने 14 जनवरी को अंद्राबी, फहमीदा और नसरीन को UAPA की धारा 20 (आतंकवादी गिरोह या आतंकवादी संगठन का सदस्य होने पर सजा), 38 (आतंकवादी संगठन की सदस्यता से जुड़ा अपराध) और 39 (आतंकवादी संगठन का समर्थन करना) के तहत दोषी ठहराया था।

SC का बड़ा फैसला: हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़ने पर छिन सकता है अनुसूचित जाति का दर्जा

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक ऐतिहासिक फैसले में साफ कर दिया है कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा नहीं मिल सकता. कोर्ट ने कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जाति का दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता है और ऐसे व्यक्ति को SC/ST अत्याचार निवारण कानून का संरक्षण भी नहीं मिलेगा. कोर्ट ने स्पष्ट करते हुए कहा कि ईसाई बने व्यक्ति को SC/ST एक्ट का लाभ नहीं मिलेगा।  दरअसल, आंध्र प्रदेश के रहने वाले एक पादरी चिंथाडा आनंद ने SC/ST एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया था. उन्होंने आरोप लगाया था कि कुछ लोगों ने उन्हें जाति के नाम पर गाली दी, मारपीट की और जान से मारने की धमकी दी. जबकि आरोपी पक्ष ने कहना था कि आनंद ईसाई धर्म अपनाकर पादरी बन गए हैं, इसलिए उन्हें SC का दर्जा नहीं मिल सकता।  आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने इस दलील को सही माना और FIR रद्द कर दी. हाईकोर्ट ने कहा कि ईसाई धर्म अपनाने और सक्रिय रूप से उसका पालन करने वाले व्यक्ति को SC का दर्जा बरकरार नहीं रहता, भले ही उसके पास पुराना SC प्रमाणपत्र क्यों न हो।  आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के इसी फैसले को आनंद ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. इस पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति पी.के. मिश्रा और एन.वी. अंजारिया की पीठ ने हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें कहा गया है कि ईसाई धर्म अपनाने और सक्रिय रूप से उसका पालन करने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्य के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती।  स्वत: खत्म हो जाएगा SC का दर्जा सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि आनंद पिछले एक दशक से रविवार की प्रार्थनाएं आयोजित कर रहे थे और घटना के समय भी वे ईसाई धर्म का पालन कर रहे थे, जिससे उनका एससी दर्जा स्वतः ही खत्म हो गया।  कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पूरी तरह से सही ठहराते हुए कहा कि वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता ये नहीं कह रहा है कि इस मामले में याचिकाकर्ता का ये दावा नहीं है कि उसने ईसाई धर्म से अपने मूल धर्म में पुनः धर्मांतरण किया है या उसे मादिगा समुदाय में पुनः स्वीकार कर लिया गया है. इससे ये सिद्ध होता है कि अपीलकर्ता ईसाई धर्म का पालन करता रहा है और एक दशक से अधिक वक्त से पादरी के रूप में कार्यरत है जो गांव के घरों में नियमित रूप से रविवार की प्रार्थनाएं आयोजित करता है।  'घटना के वक्त नहीं थे SC का कानूनन हिस्सा' कोर्ट ने आगे कहा, 'घटना के वक्त भी वह प्रार्थना सभा चला रहा था. इन तथ्यों से कोई संदेह नहीं रह जाता कि घटना के दिन वह ईसाई धर्म का अनुयायी था. इसलिए घटना की तारीख पर वह कानूनन अनुसूचित जाति का हिस्सा नहीं था और इसलिए उसे SC/ST एक्ट का लाभ नहीं मिल सकता।  सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला उन सभी मामलों पर लागू होगा, जहां अनुसूचित जाति के व्यक्ति ने हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़कर ईसाई या किसी अन्य धर्म को अपना लिया है. कोर्ट ने साफ किया कि SC का दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध तक ही सीमित है। 

बस्तर में हिंसा के अंत का संकेत, नक्सली पापाराव और 17 साथी करेंगे सरेंडर

जगदलपुर इंद्रावती के घने जंगलों से एक ऐसी खबर सामने आ रही है, जो बस्तर के दशकों पुराने हिंसक अध्याय के अंत का संकेत देती नजर आ रही है। लंबे समय से सक्रिय शीर्ष माओवादी कमांडर पापा राव के आत्मसमर्पण की तैयारी ने सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन को सतर्क कर दिया है। बताया जा रहा है कि पापा राव अपने 17 साथियों के साथ हथियारों सहित समर्पण के लिए जंगल से बाहर निकल चुका है। उसे सुरक्षित लाने के लिए सुरक्षा बलों की विशेष टीम इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान के भीतर रवाना हो चुकी है। यदि यह आत्मसमर्पण सफल होता है, तो इसे बस्तर में माओवादी हिंसा के अंत की निर्णायक शुरुआत माना जा रहा है। पापाराव उर्फ मंगू (56) ये छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले का रहने वाला है। वर्तमान में DKSZCM मेंबर है। साथ ही पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी का इंचार्ज और दक्षिण सब जोनल ब्यूरो का सदस्य है। अपने पास AK-47 राइफल रखता है। बस्तर के जल-जंगल जमीन से वाकिफ है इसलिए कई बार पुलिस की गोलियों से बचकर निकला है। इसने सरेंडर कर दिया या फिर एनकाउंटर में मारा गया तो नक्सलियों की पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी खत्म हो जाएगी। देवा के सरेंडर करने के बाद अब पापाराव ही एक मात्र ऐसा नक्सली बचा है जो फाइटर है। बाकी बचे हुए अन्य टॉप कैडर्स के नक्सली उम्र दराज हो चुके हैं। पापाराव के सरेंडर करते ही बस्तर से माओवाद का सफाया तय माना जा रहा है। पापा राव का समर्पण     करीब 25 लाख रुपये के इनामी पापा राव वेस्ट बस्तर डिवीजन का सचिव और दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी का अहम सदस्य रहा है। लंबे समय तक बस्तर में माओवादी गतिविधियों की कमान उसके हाथों में रही।     ऐसे में उसका आत्मसमर्पण केवल एक व्यक्ति का सरेंडर नहीं, बल्कि पूरे संगठनात्मक ढांचे के कमजोर पड़ने का प्रतीक माना जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इससे शेष कैडर का मनोबल भी टूटेगा और वे भी आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित होंगे। साल भर में ऐसे बिखरा संगठन पिछले साल ही नक्सल संगठन के सबसे खूंखार नक्सली माड़वी हिड़मा, नक्सल संगठन का सचिव बसवाराजू, गणेश उइके समेत 17 बड़े कैडर्स का एनकाउंटर किया गया। भूपति, रूपेश, रामधेर जैसे बड़े नक्सलियों ने अपने सैकड़ों साथियों के साथ हथियार डाल दिए हैं। जबकि मिशिर बेसरा और गणपति ये 2 बड़े टॉप के नक्सली बचे हैं, जो वर्तमान में संगठन चला रहे हैं। बस्तर में बटालियन नंबर 1 का कमांडर देवा ने भी हिंसा का रास्ता छोड़ दिया है। अब केवल पापाराव ही एक ऐसा नक्सली बचा है जो लड़ाकू है। अगर इसका एनकाउंटर होता है या फिर गिरफ्तारी और सरेंडर होता है तो निश्चित ही नक्सल संगठन खत्म है। लगातार ऑपरेशन से टूटा नेटवर्क पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों ने माओवादी नेटवर्क पर लगातार सर्जिकल और रणनीतिक हमले किए हैं। बसव राजू, गुडसा उसेंडी, कोसा, हिड़मा और सुधाकर जैसे बड़े कमांडरों के मारे जाने से संगठन की रीढ़ पहले ही टूट चुकी थी। इसके अलावा भूपति, देवजी, मल्लाजी रेड्डी, रुपेश और सुजाता समेत करीब 2700 माओवादियों के आत्मसमर्पण ने संगठन को बिखेर दिया है। अब बस्तर में करीब 50 माओवादी ही सक्रिय बताए जा रहे हैं, जिनमें कोई बड़ा नेतृत्वकर्ता नहीं बचा है। विकास ने बदली तस्वीर माओवाद के कमजोर होने का सबसे बड़ा कारण ग्रामीणों का घटता समर्थन भी रहा है। जिन क्षेत्रों में कभी ‘जनताना सरकार’ का प्रभाव था, वहां अब सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य सेवाएं और सुरक्षा कैंप स्थापित हो चुके हैं। सरकार की पुनर्वास नीति और रोजगार के अवसरों ने युवाओं को मुख्यधारा की ओर आकर्षित किया है। इससे माओवादियों का सामाजिक आधार लगभग समाप्त हो गया है। झारखंड में बची अंतिम चुनौती हालांकि बस्तर, ओडिशा और तेलंगाना में माओवादी प्रभाव काफी हद तक खत्म हो चुका है, लेकिन झारखंड अब भी एक चुनौती बना हुआ है। वहां पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा अपने 70-80 साथियों के साथ सक्रिय है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, उसकी लोकेशन का पता लगाया जा चुका है, लेकिन उसने अपने ठिकानों के आसपास बारूदी सुरंगों का जाल बिछा रखा है, जिससे ऑपरेशन चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। लक्ष्य के करीब सुरक्षा एजेंसियां केंद्रीय गृहमंत्री द्वारा 31 मार्च 2026 तक माओवादी हिंसा खत्म करने के लक्ष्य के बीच तेजी से बदले हालात सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी उपलब्धि माने जा रहे हैं। पापा राव का संभावित आत्मसमर्पण इस लक्ष्य की दिशा में एक निर्णायक कदम हो सकता है। यदि झारखंड में भी अंतिम अभियान सफल रहता है, तो देश माओवादी हिंसा के लंबे दौर से पूरी तरह मुक्त हो सकता है। जिनके सरेंडर या एनकाउंटर के बाद खत्म होगा एंटी नक्सल ऑपरेशन 1. मुपल्ला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति उर्फ रमन्ना उर्फ राजन्ना, 3.5 करोड़ का इनाम 2. मिशिर बेसरा उर्फ भास्कर उर्फ सर्निमल उर्फ सुनील, 1.30 करोड़ का इनाम 1. मुपल्ला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति, 3.6 करोड़ का इनाम गणपति भाकपा (माओवादी) का पूर्व महासचिव था। 1992 में वो पीपुल्स वॉर ग्रुप (PWG) का महासचिव बना और 2004 में CPI (माओवादी) बनने के बाद 2018 तक इसकी कमान संभाली। पोलित ब्यूरो मेंबर और सेंट्रल कमेटी में एडवाइजर है। 1992 से लेकर 2018 तक जितने नक्सली हमले हुए, सब इसी के नेतृत्व में हुए। गणपति पर छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र सरकार ने 1-1 करोड़ का इनाम रखा है। जबकि आंध्र ने 25 लाख, झारखंड ने 12 लाख और NIA ने 15 लाख का इनाम रखा है। ओडिशा, प. बंगाल और तेलंगाना ने भी गणपति पर इनाम की घोषणा कर रखी है। 2003 में आंध्र प्रदेश के CM रहे चंद्रबाबू नायडू पर हमले का आइडिया और स्ट्रैटजी दोनों गणपति की थी। नक्सलियों के संगठन में मौजूद हमारे सोर्स के मुताबिक, नायडू पर हमले का आइडिया पोलित ब्यूरो के कई मेंबर्स को जोखिम भरा लगा था। कई लोग इसके सपोर्ट में भी नहीं थे। हालांकि गणपति इससे पीछे हटने को राजी नहीं हुआ। नायडू पर हमले ने केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक को बड़ा झटका दिया था। ये सिर्फ अकेली घटना नहीं है, जो गणपति के नेतृत्व में अंजाम दी गई हो। ऐसी 10 बड़ी घटनाएं हैं, गणपति जिनका मास्टरमाइंड रहा। 2. मिशिर बेसरा उर्फ भास्कर, 1.30 करोड़ का इनाम बेसरा झारखंड … Read more

कोलंबिया का मिलिट्री प्लेन पेरू बॉर्डर के पास क्रैश, 66 सैनिकों की जान चली गई

बोगोटा कोलंबिया के दक्षिणी अमेजन इलाके में बीते दिन सोमवार को सेना का एक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इसमें सवार 125 लोगों में से कम से कम 66 लोगों की मौत हो गई है। यह घटना कोलंबियाई वायु सेना के हाल के इतिहास की सबसे घातक दुर्घटनाओं में से एक थी। दुर्घटना के मलबे और राख के बीच अभी भी लगभग दो दर्जन लोग लापता हैं। पुटुमायो विभाग के गवर्नर जॉन गैब्रियल मोलिना ने स्थानीय समाचार आउटलेट को बताया कि 66 लोग मारे गए, कई लोग घायल हुए और 21 लोग लापता हैं। कब और कैसे हुई दुर्घटना? रक्षा मंत्री पेड्रो सांचेज ने एक्स पर बताया कि यह दुर्घटना तब हुई, जब लॉकहीड मार्टिन द्वारा निर्मित हरक्यूलिस C-130 परिवहन विमान पेरू की सीमा पर स्थित प्यूर्टो लेगुइजामो से उड़ान भर रहा था। उन्होंने यह भी कहा कि मरने वालों और घायल लोगों के आंकड़े बदल भी सकते हैं। फायरफाइटर एडुआर्डो सैन जुआन कैलेजास ने बताया कि माना जा रहा है कि जब विमान उड़ान भर रहा था तो रनवे के आखिर के पास उसे किसी चीज से टक्कर लगी। इसके बाद जब विमान नीचे गिर रहा था तो उसका एक पंख एक पेड़ से टकरा गया। उन्होंने आगे बताया कि इस दुर्घटना के कारण विमान में आग लग गई और उसमें रखे कुछ विस्फोटक उपकरण फट गए। घटना का वीडियो वायरल इस घटना से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें दूरदराज के इस इलाके के रहने वाले लोग सबसे पहले बचाव कार्य के लिए आगे आते हुए और कुछ लोग अपनी मोटरसाइकिलों पर घायल सैनिकों को बिठाकर कच्ची सड़क पर तेजी से दौड़ते हुए देखे जा सकते हैं। बाद में सेना के वाहन भी वहां पहुंचे, लेकिन अधिकारियों ने बताया कि दुर्घटनास्थल तक पहुंचना काफी मुश्किल था और इसकी वजह से बचाव कार्यों में बाधा आ रही थी।

भारत को तेल संकट से राहत, सऊदी अरब और UAE से कई टैंकर पहुंचे, सरकार ने क्या कहा?

मुंबई  अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध की वजह से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से भारत सहित कई देशों में ईंधन आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। इस बीच अब भारत के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। जानकारी के मुताबिक UAE से दो LPG कैरियर और सऊदी अरब से एक कच्चे तेल का कैरियर भारत के बंदरगाहों की ओर बढ़ रहे हैं ताकि देश में ऊर्जा आपूर्ति की कमी को पूरा किया जा सके। वहीं नौसेना प्रमुख दिनेश त्रिपाठी ने बढ़ते हुए शिपिंग संकट के चलते ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के अपने आधिकारिक दौरे को रद्द कर दिया है। जानकारी के मुताबिक भारतीय झंडे वाले जहाज पाइन गैस और जग वसंत लगभग एक साथ ही चल रहे थे। दोनों जहाज सोमवार सुबह 6 बजे UAE के बंदरगाहों से भारत के लिए रवाना हुए। ईरान ने इन दोनों LPG जहाजों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने की मंजूरी भी दे दी है। वहीं ओमान की खाड़ी में भारतीय नौसेना के युद्धपोत इन LPG जहाजों को 24 घंटे तक सुरक्षा दे रहे हैं। जहाज में कितना LPG? बंदरगाह, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के विशेष सचिव राजेश कुमार सिन्हा ने सोमवार को एक प्रेस कांफ्रेस में बताया कि दोनों जहाज पर लगभग 92,000 टन एलपीजी है। उन्होंने कहा, ''यात्रा शुरू हो चुकी है।'’ शिपिंग मंत्रालय के अनुसार जग वसंत के 26 मार्च को कांडला बंदरगाह पहुंचने की संभावना है, जबकि पाइन गैस 28 मार्च को न्यू मैंगलोर पहुंच सकता है। इन जहाजों पर क्रमशः 33 और 27 भारतीय नाविक भी सवार हैं। सऊदी से आ रहा तेल टैंकर इसके अलावा, MT Kallista नाम का एक कच्चे तेल का कैरियर सऊदी अरब के यान्बू बंदरगाह पर तेल भर रहा है और मंगलवार को जेद्दा बंदरगाह होते हुए भारत के पारादीप बंदरगाह के लिए रवाना होगा। पेट्रोलियम मंत्रालय के समन्वय से, पनामा के झंडे वाले यह जहाज भी अदन की खाड़ी से गुजरेगा और भारतीय नौसेना इसकी हिफाजत करेगी। भारतीय टैंकरों ने ईरान को दी फीस? भले ही रिपोर्ट्स में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर ईरान द्वारा मोटी फीस लिए जाने की खबरें थीं, लेकिन भारत ने अपने LPG टैंकरों को गुजरने की अनुमति देने के लिए ईरान को कोई पैसा नहीं दिया है। भारत में ईरानी दूतावास ने सोमवार को ऐसी रिपोर्टों का खंडन किया है। इस बीच केंद्र सरकार ने भारतीय नौसेना से कहा है कि वह भारतीय झंडे वाले जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ओमान की खाड़ी और अदन की खाड़ी के आसपास अपने कोलकाता-श्रेणी के विध्वंसक जहाजों को तैनात करे। वहीं भारतीय झंडे वाले सभी जहाज़ों के कप्तानों से लगातार संपर्क किया जा रहा है, ताकि उन्हें बताया जा सके कि भारत संकट के समय उनके साथ खड़ा है। कितने टैंकर फंसे? बता दें कि ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध कुल मिलाकर लगभग 500 टैंकर जहाज फारस की खाड़ी में फंसे हुए हैं। इनमें 108 कच्चे तेल के टैंकर, 166 तेल उत्पाद टैंकर, 104 रासायनिक/उत्पाद टैंकर, 52 रासायनिक टैंकर और 53 अन्य प्रकार के टैंकर शामिल हैं। विश्लेषकों का कहना है कि ईरान संभवत: सत्यापन के बाद चुनिंदा जहाजों को जलडमरूमध्य से जाने की अनुमति दे सकता है।