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भारत को तेल संकट से राहत, सऊदी अरब और UAE से कई टैंकर पहुंचे, सरकार ने क्या कहा?

मुंबई  अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध की वजह से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से भारत सहित कई देशों में ईंधन आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। इस बीच अब भारत के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। जानकारी के मुताबिक UAE से दो LPG कैरियर और सऊदी अरब से एक कच्चे तेल का कैरियर भारत के बंदरगाहों की ओर बढ़ रहे हैं ताकि देश में ऊर्जा आपूर्ति की कमी को पूरा किया जा सके। वहीं नौसेना प्रमुख दिनेश त्रिपाठी ने बढ़ते हुए शिपिंग संकट के चलते ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के अपने आधिकारिक दौरे को रद्द कर दिया है। जानकारी के मुताबिक भारतीय झंडे वाले जहाज पाइन गैस और जग वसंत लगभग एक साथ ही चल रहे थे। दोनों जहाज सोमवार सुबह 6 बजे UAE के बंदरगाहों से भारत के लिए रवाना हुए। ईरान ने इन दोनों LPG जहाजों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने की मंजूरी भी दे दी है। वहीं ओमान की खाड़ी में भारतीय नौसेना के युद्धपोत इन LPG जहाजों को 24 घंटे तक सुरक्षा दे रहे हैं। जहाज में कितना LPG? बंदरगाह, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के विशेष सचिव राजेश कुमार सिन्हा ने सोमवार को एक प्रेस कांफ्रेस में बताया कि दोनों जहाज पर लगभग 92,000 टन एलपीजी है। उन्होंने कहा, ''यात्रा शुरू हो चुकी है।'’ शिपिंग मंत्रालय के अनुसार जग वसंत के 26 मार्च को कांडला बंदरगाह पहुंचने की संभावना है, जबकि पाइन गैस 28 मार्च को न्यू मैंगलोर पहुंच सकता है। इन जहाजों पर क्रमशः 33 और 27 भारतीय नाविक भी सवार हैं। सऊदी से आ रहा तेल टैंकर इसके अलावा, MT Kallista नाम का एक कच्चे तेल का कैरियर सऊदी अरब के यान्बू बंदरगाह पर तेल भर रहा है और मंगलवार को जेद्दा बंदरगाह होते हुए भारत के पारादीप बंदरगाह के लिए रवाना होगा। पेट्रोलियम मंत्रालय के समन्वय से, पनामा के झंडे वाले यह जहाज भी अदन की खाड़ी से गुजरेगा और भारतीय नौसेना इसकी हिफाजत करेगी। भारतीय टैंकरों ने ईरान को दी फीस? भले ही रिपोर्ट्स में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर ईरान द्वारा मोटी फीस लिए जाने की खबरें थीं, लेकिन भारत ने अपने LPG टैंकरों को गुजरने की अनुमति देने के लिए ईरान को कोई पैसा नहीं दिया है। भारत में ईरानी दूतावास ने सोमवार को ऐसी रिपोर्टों का खंडन किया है। इस बीच केंद्र सरकार ने भारतीय नौसेना से कहा है कि वह भारतीय झंडे वाले जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ओमान की खाड़ी और अदन की खाड़ी के आसपास अपने कोलकाता-श्रेणी के विध्वंसक जहाजों को तैनात करे। वहीं भारतीय झंडे वाले सभी जहाज़ों के कप्तानों से लगातार संपर्क किया जा रहा है, ताकि उन्हें बताया जा सके कि भारत संकट के समय उनके साथ खड़ा है। कितने टैंकर फंसे? बता दें कि ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध कुल मिलाकर लगभग 500 टैंकर जहाज फारस की खाड़ी में फंसे हुए हैं। इनमें 108 कच्चे तेल के टैंकर, 166 तेल उत्पाद टैंकर, 104 रासायनिक/उत्पाद टैंकर, 52 रासायनिक टैंकर और 53 अन्य प्रकार के टैंकर शामिल हैं। विश्लेषकों का कहना है कि ईरान संभवत: सत्यापन के बाद चुनिंदा जहाजों को जलडमरूमध्य से जाने की अनुमति दे सकता है।

ईरान का अमेरिका को चेतावनी, युद्ध खत्म करने की दो बड़ी शर्तें, 9 अप्रैल तक होगा युद्ध समाप्त?

वाशिंगटन/ तेहरान  अमेरिका अब ईरान जंग खत्म करने को रेडी है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने का दावा है कि कि ईरान अब युद्ध नहीं लड़ना चाहता. वह समझौता करना चाहता है. उनकी मानें तो अमेरिका सीजफायर को लेकर ईरानी नेता के साथ बातचीत कर रहा है. डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि ईरान के साथ प्रोडक्टिव बातचीत हो रही है. वहीं ईरान ने ट्रंप के दावों को फेक ही बता दिया है. ईरान का कहना है कि मार्केट को मेनुपुलेट करने के लिए ट्रंप ईरान जंग पर ऐसा दावा कर रहे हैं. अब सवाल है कि क्या सच में ईरान जंग खत्म करने को तैयार नहीं हैं? वह भी तब जब उसके सारे टॉप लीडर्स मारे जा चुके हैं. अब ईरान ने भी अपनी मंशा जाहिर कर दी है. ईरान ने ट्रंप को सीधा जवाब दिया है कि वह भी युद्ध खत्म करने को तैयार है, मगर उसकी कुछ शर्तें हैं।  जी हां, ईरान भी अमेरिका और इजरायल संग युद्ध खत्म करना चाहता है. मगर वह ऐसे ही जंग खत्म नहीं करना चाहता. उसकी कुछ शर्तें हैं. ईरान का कहना है कि युद्ध तब तक जारी रहेगा जब तक सभी प्रतिबंध हटा नहीं दिए जाते और अमेरिका द्वारा युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई नहीं कर दी जाती. जी हां, ईरान अब अमेरिका से युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई चाहता है. साथ ही वह अपने ऊपर लगे सारे सैंक्शन्स हटवाना चाहता है. ये दोनों चीजें अमेरिका मान लेता है तो फिर ईरान इस युद्ध को आगे नहीं बढ़ाएगा और डोनाल्ड ट्रंप की बात मान लेगा।  क्या मानेंगे डोनाल्ड ट्रंप? मगर सवाल है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप ईरान की इन शर्तों को मानेंगे? दरअसल, ईरान के एक सीनियर अधिकारी का कहना है कि युद्ध का अंत ईरान के हाथ में है. ईरान इसे तभी समाप्त मानेगा जब अमेरिका से पूर्ण मुआवजा मिले और भविष्य में हस्तक्षेप न करने की गारंटी हो. यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने युद्ध को ‘समाप्त करने की दिशा में’ विचार करने की बात कही थी. ट्रंप प्रशासन ने तेल की कीमतों में भारी उछाल को नियंत्रित करने के लिए ईरानी तेल पर कुछ प्रतिबंध अस्थायी रूप से हटाए हैं, जिससे लगभग 140 मिलियन बैरल तेल बाजार में आ सकता है. लेकिन ईरान इसे अपनी जीत के रूप में देख रहा है और अपनी शर्तों पर अड़ा हुआ है।  ईरानी विदेश मंत्री ने क्या कहा? ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी दोहराया कि युद्ध अमेरिका द्वारा शुरू किया गया था और इसके सभी परिणामों के लिए वाशिंगटन जिम्मेदार है. उन्होंने मुआवजे, क्षेत्र से अमेरिकी सैन्य अड्डों की वापसी और भविष्य में हमलों की गारंटी की मांग की है. ईरान का कहना है कि बिना इन शर्तों के कोई युद्धविराम स्वीकार नहीं किया जाएगा।  ट्रंप का क्या दावा? वहीं, डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को उस ईरानी नेता का नाम बताने से इनकार कर दिया, जिसके साथ अमेरिका तीन सप्ताह से जारी युद्ध को समाप्त करने के लिए बातचीत कर रहा है. ट्रंप ने कहा कि वार्ताकार एक ‘शीर्ष व्यक्ति’ है, जो उस देश में ‘सबसे सम्मानित’ है. खबरों के मुताबिक, ईरान ने अमेरिका के साथ बातचीत होने से इनकार किया है, लेकिन यह स्वीकार किया है कि क्षेत्र के कुछ देश तनाव कम करने के प्रयास कर रहे हैं।  व्हाइट हाउस का जवाब इधर, समाचार एजेंसी ANI ने व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट से संपर्क किया और पूछा कि क्या अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस शांति मिशन के लिए अमेरिका के विशेष राष्ट्रपति दूत स्टीव विटकॉफ, और व्यवसायी व अमेरिका के राष्ट्रपति के पूर्व वरिष्ठ सलाहकार जेरेड कुशनर इस सप्ताह इस्लामाबाद में ईरानी अधिकारियों से मुलाकात करेंगे? इस पर व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने जवाब दिया, ‘ये संवेदनशील कूटनीतिक चर्चाएं हैं और अमेरिका प्रेस के माध्यम से बातचीत नहीं करेगा. यह एक बदलती हुई स्थिति है और मुलाकातों के बारे में की जा रही अटकलों को तब तक अंतिम नहीं माना जाना चाहिए जब तक कि व्हाइट हाउस द्वारा उनकी औपचारिक घोषणा न कर दी जाए।  9 अप्रैल तक खत्म हो जाएगा युद्ध?  मध्य पूर्व में जारी युद्ध को लेकर एक नई और दिलचस्प जानकारी सामने आ रही है. इजराइली मीडिया आउटलेट वाईनेट ने एक अधिकारी के हवाले से दावा किया है कि अमेरिका ईरान के साथ चल रहे युद्ध को अप्रैल महीने की 9 तारीख तक खत्म करने की योजना बना रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने 9 अप्रैल को युद्ध समाप्त करने की संभावित तारीख तय की है. अगर सब कुछ प्लान के मुताबिक ही चलता है तो इसका मतलब है कि लड़ाई और बातचीत में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है।  रिपोर्ट ये भी कहती है कि ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता इसी हफ्ते के अंत में पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हो सकती है. इसे लेकर न्यूज एजेंसी रॉयटर्स ने भी जानकारी दी है कि दोनों पक्षों में बात के लिए इस्लामाबाद को चुना जा सकता है. हालांकि इजरायली रिपोर्ट में ये भी कहा है कि डोनाल्ड ट्रंप को इजरायल डे के मौके पर नेतन्याहू सम्मानित करने का वादा कर चुके हैं. अगर तब तक ये युद्ध रुका नहीं, तो ये सम्मान समारोह भी टल जाएगा और ट्रंप ऐसा बिल्कुल नहीं चाहते।  क्यों 9 अप्रैल तक खत्म होगा युद्ध? दरअसल दिसंबर, 2025 के अंत में इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने के बाद एक विशेष सम्मान देने का वादा किया था. यदि 9 अप्रैल तक युद्ध खत्म होता है, तो यह ट्रंप के लिए इजराइल के स्वतंत्रता दिवस यानि 21-22 अप्रैल के दौरान वहां यात्रा करने और इजराइल प्राइज लेने का मौका देगा. ये देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इसके बाद भी आने वाले तीन हफ्तों के लिए आगे की योजनाएं बनाई जा रही हैं।  इजरायल-अमेरिका के बीच बात भी नहीं? इजराइल डिफेंस फोर्स के प्रवक्ता एफी डेफ्रिन ने कहा कि उनकी सेना ईरान के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई यहूदी त्योहार पासओवर तक जारी रखेगी, जो इस साल 1 से 8 अप्रैल के बीच पड़ रहा है. उन्होंने यह भी … Read more

भारत ने चीन-पाकिस्तान सीमा पर तैनात किए दो नए ब्रह्मास्त्र, छुटकू मिसाइल-ड्रोन होगा नष्ट

बेंगलुरु  क्या दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की तरफ बढ़ रही है. ईरान की अमेरिका और इजरायल के खिलाफ चल रहे महायुद्ध ने इस चिंता को बढ़ा दिया है. इस वैश्विक तनाव और पाकिस्तान-चीन सीमा पर बढ़ते खतरे के बीच भारतीय सेना ने अपनी रक्षा क्षमता को और मजबूत करने की तैयारी तेज कर दी है. सूत्रों के अनुसार, भारतीय सेना ने एक और पिनाका रॉकेट लॉन्चर रेजिमेंट को ऑपरेशनल कर लिया है और इस साल के अंत तक एक और रेजिमेंट को शामिल करने की तैयारी में है. इससे सेना के पास अब 7 पिनाका रेजिमेंट हो गए हैं, जो पाकिस्तान और चीन सीमा पर तैनात हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट ने रक्षा सूत्रों ने हवाले से बताया गया है कि पिनाका के आठवें रेजिमेंट के लिए अब आधे से ज्यादा उपकरण प्राप्त किए चुके हैं और 2026 के अंत तक पूरी तरह ऑपरेशनल हो जाएगा. अगले साल दो और रेजिमेंट को शामिल करने की योजना है, जिससे कुल संख्या 10 हो जाएगी. भारतीय सेना का लक्ष्य 22 पिनाका रेजिमेंट बनाने का है, जिसमें नई लंबी दूरी वाली गाइडेड मिसाइलों से लैस संस्करण शामिल किए जाएंगे. ये पुरानी सिस्टम की जगह लेंगे और छोटे मिसाइल-ड्रोन के हमलों का मुंहतोड़ जवाब देंगे. चीन-पाक सीमा पर भारत की कैसी सैन्य तैयारी? भारत की पाकिस्तान से सटी पश्चिमी सीमा और चीन से सटी उत्तरी सीमा पर हालात लंबे समय से संवेदनशील रही है. खासतौर पर वर्ष 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद सेना ने अपनी आर्टिलरी ताकत को तेजी से मजबूत करने का फैसला लिया था. भारतीय सेना ने तब भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड, टाटा पॉवर और लार्सन एंड तुबरो के साथ करीब 2,580 करोड़ रुपये के छह पिनाका रेजिमेंट के लिए समझौता किया था. अब इनका तेजी से उत्पादन और तैनाती की जा रही है. ईरान-अमेरिका जंग के दौरान ड्रोन और मिसाइल स्वार्म अटैक की रणनीति देखते हुए सेना ने पिनाका को और महत्वपूर्ण हथियार मान लिया है. इस जंग में बड़े पैमाने पर रॉकेट, ड्रोन और प्रिसिजन स्ट्राइक सिस्टम का इस्तेमाल हो रहा है. यही वजह है कि भारत भी अपनी सेना को ऐसे हथियारों से लैस कर रहा है जो एक साथ कई लक्ष्यों को तेजी से निशाना बना सकें. ‘देसी ब्रह्मास्त्र’ क्यों कहा जाता है पिनाका? पिनाका भारत का स्वदेशी मल्टी-बारेल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम है, जिसे डीआरडीओ ने विकसित किया है. इस भारतीय सेना का ‘देसी ब्रह्मास्त्र’ कहा जाता है, क्योंकि यह कम समय में भारी तबाही मचाने की क्षमता रखता है. यह 122 मिमी रॉकेटों की तुलना में ज्यादा शक्तिशाली और सटीक है. पिनाका 12 रॉकेट एक साथ दाग सकता है, और कुछ ही सेकंड में दुश्मन के बड़े इलाके को निशाना बना सकता है. इसकी रेंज 40 से 75 किलोमीटर तक है, जबकि इसके नए गाइडेड वर्जन इससे भी ज्यादा दूर 120 किमी तक तक सटीक हमला करने में सक्षम हैं.   यह सिस्टम GPS और INS गाइडेंस से लैस है, जिससे सटीकता बहुत बढ़ गई है. यह सिस्टम खासतौर पर दुश्मन के ठिकानों, बंकर, कमांड सेंटर और आर्टिलरी पोजीशन को नष्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है. इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी ‘शूट एंड स्कूट’ क्षमता है… यानी हमला करने के तुरंत बाद अपनी पोजीशन बदल लेना, जिससे दुश्मन के जवाबी हमले से बचा जा सके. ड्रोन और ‘छुटकू मिसाइल’ का भी तोड़ आधुनिक युद्ध में छोटे ड्रोन और लो-कॉस्ट मिसाइलें बड़ा खतरा बनकर उभरी हैं. पिनाका का अपग्रेडेड वर्जन ऐसे लक्ष्यों के खिलाफ भी प्रभावी माना जा रहा है. इसकी एक रेजिमेंट में 18-24 लॉन्चर होते हैं, जो मिनटों में सैकड़ों रॉकेट दाग सकते हैं. यह छोटे ड्रोन और क्रूज मिसाइलों के स्वार्म अटैक का मुंहतोड़ जवाब देने में सक्षम है. ईरान की तरह दुश्मन अगर सस्ते ड्रोन और मिसाइलों से हमला करे तो पिनाका का सैल्वो दुश्मन के लॉन्चर और कमांड सेंटर को पहले ही नष्ट कर सकता है. इसकी लागत भी दूसरी हाईटेक मिसाइलों की तुलना में काफी कम है. इसका एक रॉकेट महज कुछ लाख रुपये में आ जाता है, जबकि दुश्मन की महंगी मिसाइल को रोकने वाले सिस्टम करोड़ों में हैं. ईरान-इजरायल संघर्ष ने यह साफ कर दिया है कि भविष्य के युद्ध पारंपरिक नहीं होंगे, बल्कि टेक्नोलॉजी आधारित होंगे, जहां मिसाइल, ड्रोन और रॉकेट सिस्टम अहम भूमिका निभाएंगे. भारत इसी दिशा में अपनी सेना को तैयार कर रहा है, ताकि किसी भी संभावित खतरे का मुकाबला प्रभावी तरीके से किया जा सके. रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान की रणनीति देखते हुए भारत ने सही समय पर कदम उठाया है. पिनाका की बढ़ती संख्या न सिर्फ रक्षा को मजबूत करेगी, बल्कि दुश्मन को भी संदेश देगी कि भारत अब किसी भी स्वार्म अटैक का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार है. पिनाका की क्या है खूबियां?     मल्टी-बैरल लॉन्च सिस्टम – एक साथ 12 रॉकेट दागने की क्षमता, जिससे बड़े इलाके में एकसाथ हमला संभव.     तेज फायरिंग क्षमता – कुछ ही सेकंड में पूरा सल्वो (12 रॉकेट) फायर कर सकता है, जिससे दुश्मन को संभलने का मौका नहीं मिलता.     लंबी मारक क्षमता – शुरुआती वर्जन की रेंज 40 किमी तक, जबकि आधुनिक गाइडेड वर्जन 70–75 किमी या उससे अधिक दूरी तक सटीक हमला कर सकते हैं.     उच्च सटीकता – नए गाइडेड रॉकेट्स GPS/INS आधारित नेविगेशन से लैस, जिससे टारगेट पर सटीक प्रहार.     शूट एंड स्कूट तकनीक – हमला करने के तुरंत बाद पोजीशन बदल सकता है, जिससे दुश्मन के जवाबी हमले से बचाव.     सैचुरेशन फायर क्षमता – एक बड़े क्षेत्र में भारी मात्रा में रॉकेट बरसाकर दुश्मन के ठिकानों, बंकर और सैनिक जमावड़े को नष्ट कर सकता है.     मोबाइल और ऑल-टेरेन क्षमता – हाई मोबिलिटी व्हीकल पर लगा होने के कारण पहाड़, रेगिस्तान और कठिन इलाकों में भी आसानी से तैनात.     कम समय में तैनाती – सिस्टम को जल्दी से तैयार कर फायर किया जा सकता है, जिससे युद्ध के दौरान तेजी मिलती है.     ड्रोन और हल्के लक्ष्यों के खिलाफ प्रभावी – बड़े पैमाने पर फायरिंग के कारण ड्रोन स्वार्म और छोटे मिसाइल सिस्टम को भी निष्क्रिय करने में सक्षम.     स्वदेशी तकनीक – पूरी … Read more

गंगा नदी बेसिन में 1300 साल का सबसे भयंकर सूखा, स्थिति हुई भयावह

बनारस भारत में सूखे की समस्या अब बहुत गंभीर हो गई है. गंगा के मैदानी इलाके के कुछ हिस्से 2009 से ही सूखे के बड़े हॉटस्पॉट बन चुके हैं. दिसंबर 2025 में जारी एक अध्ययन ने 1971 से 2020 तक छह बड़े क्षेत्रों – पश्चिमी और मध्य भारत, हिमालय, गंगा के मैदान, प्रायद्वीपीय और उत्तर-पूर्व भारत में सूखा बढ़ा है।  DTE की रिपोर्ट के मुताबिक स्टैंडर्डाइज्ड प्रेसिपिटेशन इवैपोट्रांसपिरेशन इंडेक्स जैसे साधारण मौसम सूचक का इस्तेमाल किया गया. नतीजा चौंकाने वाला है – गंगा के मैदान, हिमालय और उत्तर-पूर्व भारत में सूखे की रफ्तार बहुत तेज बढ़ रही है. कमजोर मानसून और बढ़ते तापमान ने इस समस्या को और गहरा कर दिया है।  क्यों हो रहा है इतना सूखा? मानसून के समय बारिश कम हो रही है, जबकि गर्मी के मौसम में भाप बनने की रफ्तार बढ़ गई है. दिन और रात दोनों समय तापमान बढ़ रहा है. भूजल का ज्यादा दोहन और खेतों में ज्यादा पानी वाली फसलें लगाने से पानी की कमी और तेज हो रही है. उत्तर-पूर्व भारत में पहले बहुत बारिश होती थी, लेकिन अब वहां भी कमजोर मानसून और गर्मी ने पानी की समस्या पैदा कर दी है।  सितंबर 2025 में जारी एक और अध्ययन ने दिखाया कि गंगा नदी घाटी ने 1991-2020 के बीच पिछले 1300 सालों का सबसे तेज सूखा देखा. पेड़ों की छल्लों से पता चला कि यह सूखा 16वीं सदी के सूखों से भी 76% ज्यादा तीव्र था. यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना के वैज्ञानिक कहते हैं कि यह सूखा सिर्फ प्राकृतिक नहीं, बल्कि इंसानी गतिविधियों का नतीजा है।  पानी का दिवालियापन सूखा अब सिर्फ पानी की समस्या नहीं रह गया. यह पानी का दिवालियापन कहलाता है. यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट कहती है कि पानी अब राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बन गया है. अगर सही प्रबंधन नहीं हुआ तो देशों के बीच भी पानी पर लड़ाई हो सकती है. रिपोर्ट चेतावनी देती है कि पानी का संकट तब तक रहेगा जब तक पृथ्वी पर इंसान और दूसरे जीव हैं।  समाधान क्या हैं? वैज्ञानिक कहते हैं कि सिर्फ नई तकनीक काफी नहीं. ड्रिप इरिगेशन, सौर पंप, पानी को साफ करके दोबारा इस्तेमाल और खारे पानी से नमक हटाने वाले प्लांट मदद कर सकते हैं. लेकिन हर उपाय के साथ खतरा भी जुड़ा है. ज्यादा पानी वाली फसलें लगाने से भूजल और तेज खत्म हो सकता है।  इजरायल और कैलिफोर्निया के उदाहरण से सीख सकते हैं. दोनों ने सूखे के बावजूद अपनी अर्थव्यवस्था को पानी पर कम निर्भर बनाया. इजरायल ने खेती के अलावा सर्विस और उद्योग क्षेत्र को मजबूत किया. कैलिफोर्निया में 2014 के सूखे में भी अर्थव्यवस्था ज्यादा प्रभावित नहीं हुई क्योंकि कृषि का हिस्सा कम था. क्या करना चाहिए? भारत में कृषि में 85% पानी इस्तेमाल होता है. इसलिए सबसे पहले खेती के तरीके बदलने चाहिए. बिजली सब्सिडी में सुधार करके भूजल का अंधाधुंध निकालना रोकना जरूरी है. सीधी बुवाई, मिट्टी में नमी बचाने की तकनीक और जल प्रबंधन को आम बनाना होगा।   प्राचीन प्रणालियां भी मदद कर सकती हैं, लेकिन उन्हें आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ना पड़ेगा. वैज्ञानिक कहते हैं कि डेटा की बहुत कमी है. ज्यादा कुओं में नियमित मॉनिटरिंग जरूरी है। 

एरियर भुगतान टला! मार्च वेतन में नहीं जुड़ेंगे पैसे, कर्मचारियों को करना होगा इंतजार

नई दिल्ली केंद्र सरकार के लाखों कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए अप्रैल का महीना बड़ी सौगात लेकर आ सकता है। महंगाई के आंकड़ों और पिछले सालों के ट्रेंड को देखते हुए यह कयास लगाए जा रहे हैं कि सरकार जल्द ही महंगाई भत्ते (DA) में बढ़ोतरी का आधिकारिक ऐलान कर सकती है। हालांकि, मार्च की सैलरी आने में अब कुछ ही दिन शेष हैं, ऐसे में कर्मचारियों को बढ़े हुए भत्ते और एरियर के लिए अप्रैल के वेतन का इंतजार करना होगा। 60 फीसदी तक पहुंच सकता है आंकड़ा वर्तमान में केंद्रीय कर्मचारियों को उनकी बेसिक पे (मूल वेतन) का 58 प्रतिशत डीए मिल रहा है। AICPI इंडेक्स के ताजा आंकड़ों और महंगाई की गणना के आधार पर इस बार 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी की उम्मीद जताई जा रही है। यदि सरकार इस पर मुहर लगाती है, तो कुल डीए बढ़कर 60 प्रतिशत हो जाएगा। कैलकुलेशन का गणित: उदाहरण: यदि किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी 18,000 रुपये है। वर्तमान (58%): 10,440 रुपये डीए। बढ़ोतरी के बाद (60%): 10,800 रुपये डीए। सीधा लाभ: हर महीने सैलरी में 360 रुपये की अतिरिक्त वृद्धि। अप्रैल में मिलेगा एरियर का पैसा भले ही सरकार अगले हफ्ते डीए का ऐलान कर दे, लेकिन तकनीकी प्रक्रियाओं के कारण यह पैसा मार्च की सैलरी में जुड़कर नहीं आएगा। कैबिनेट की मंजूरी के बाद संबंधित विभाग और बैंक डेटा अपडेट करेंगे, जिसमें समय लगता है। ऐसे में उम्मीद है कि कर्मचारियों और पेंशनर्स को अप्रैल की सैलरी के साथ जनवरी से मार्च तक का एरियर भी मिल जाएगा। 8वें वेतन आयोग पर टिकी नजरें गौरतलब है कि 31 दिसंबर 2025 को 7वें वित्त आयोग का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और 1 जनवरी 2026 से 8वां वेतन आयोग प्रभावी माना जा रहा है। हालांकि, नए वेतन आयोग की विस्तृत रिपोर्ट आने में अभी 14 से 18 महीने का समय लग सकता है, तब तक कर्मचारी अंतरिम राहत के रूप में डीए बढ़ोतरी का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

मिडिल ईस्ट संकट पर भारत-जर्मनी की चिंता, जयशंकर ने जर्मन विदेश मंत्री से की बातचीत

नई दिल्ली भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वेडफुल के साथ बातचीत की। दोनों नेताओं के बीच वर्तमान समय में जारी पश्चिम एशियाई तनाव पर बातचीत हुई। दोनों पक्ष बदलते घटनाक्रम के बीच करीबी संपर्क में रहने पर सहमत हुए। डॉ. जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बातचीत की जानकारी साझा कर लिखा, "कल रात जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वाडेफुल के साथ पश्चिम एशिया विवाद पर काम की बातचीत हुई। संपर्क में रहने पर सहमत हुए।" यह नई बातचीत हाल के हफ्तों में दोनों नेताओं के बीच कई डिप्लोमैटिक मुलाकातों के बीच हुई है। विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर ने ब्रसेल्स में 16 मार्च को वाडेफुल से खुद मुलाकात की। इस दौरान भी दोनों नेताओं ने "पश्चिम एशिया में विवाद पर विचार साझा" किया और साथ ही दोनों देशों के बीच सहयोग के अलग-अलग पहलुओं की भी समीक्षा की। इससे पहले, 10 मार्च को, दोनों मंत्रियों ने लगातार बातचीत के हिस्से के तौर पर पश्चिम एशिया के हालात पर भी चर्चा की थी, जो ऊर्जा सुरक्षा और इलाके की स्थिरता पर विवाद के असर को लेकर बढ़ती अंतरराष्ट्रीय चिंता को दिखाता है। हाल के हफ्तों में, डॉ. जयशंकर कई ग्लोबल साझेदारों के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं, क्योंकि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता जा रहा है। भारत के विदेश मंत्री ईरानी समकक्ष अब्बास अराघची समेत कई खास स्टेकहोल्डर्स के साथ भी लगातार संपर्क में बने हुए हैं। ईरान के अलावा, विदेश मंत्री ने कई खाड़ी देशों के विदेश मंत्रियों के साथ बातचीत जारी रखी है, जिससे इस संकट में शामिल सभी पक्षों के साथ डिप्लोमैटिक रूप से जुड़े रहने की भारत की कोशिशों पर जोर दिया गया है। पश्चिम एशिया में संघर्ष 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल की तरफ से ईरान पर किए गए हमलों के बाद शुरू हुआ, जिसके नतीजे में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई। तब से स्थिति और बिगड़ गई है, जिसमें खाड़ी क्षेत्र के कई देश शामिल हो गए हैं और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अहम स्ट्रेटेजिक कॉरिडोर को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। इस संकट पर भारत का नजरिया एक सोची-समझी और संतुलित डिप्लोमैटिक स्ट्रैटेजी दिखाता है। भारतीय नेतृत्व 28 फरवरी से सभी क्षेत्रीय नेतृत्व के साथ बातचीत बनाए हुए है। भारत जिस तरह से इस पूरी स्थिति से निपट रहा है, वह देश के किसी खास पक्ष के साथ जुड़े बिना संकट से निपटने की लगातार कोशिश का संकेत देता है।

तनाव के बीच भारत को राहत: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरेंगे दो LPG जहाज

नई दिल्ली कुकिंग गैस ले जा रहे दो भारतीय जहाज स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरते हुए अगले कुछ दिनों में भारत पहुंचेगे। जिससे उम्मीद बंधी है कि भारत में एलपीजी संकट कम होगा। शिप-ट्रैकिंग डेटा से पता चला है कि जहाज, जग वसंत और पाइन गैस, सुरक्षित रास्ते की मंजूरी मिलने के बाद, रणनीतिक रूप से अहम होर्मुज स्ट्रेट से गुजर रहे हैं। जहाज लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) ले जा रहे हैं, जिसका इस्तेमाल भारत में खाना पकाने के लिए बड़े पैमाने पर होता है। दोनों जहाजों ने सोमवार सुबह अपनी यात्रा शुरू की, यूएई तट से रवाना हुए और केशम और लारक द्वीपों के पास ईरान के तट के पास पहुंचे। जहाजों ने अपने ट्रैकिंग सिस्टम के जरिए भारतीय मालिकाना हक का संकेत दिया, जो कई जहाजों द्वारा इस सेंसिटिव रास्ते पर चलने के लिए उठाया गया एक एहतियाती कदम था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर जहाजों की यात्रा बिना किसी रुकावट के जारी रहती है, तो उनके सोमवार शाम तक ओमान की खाड़ी पहुंचने की उम्मीद है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, होर्मुज स्ट्रेट से पूरा रास्ता तय करने में लगभग 14 घंटे लगते हैं। यह सब कुछ ऐसे समय में हुआ है जब स्ट्रेट, जो तेल और गैस शिपमेंट के लिए एक अहम ग्लोबल रास्ता है, फरवरी के आखिर में इस इलाके में यूएस और इजरायली हमलों के बाद बढ़ते तनाव से बुरी तरह प्रभावित हुआ है। तब से, ईरान ने पानी के रास्ते से आने-जाने पर काफी हद तक रोक लगा दी है, और बातचीत के बाद सिर्फ भारत समेत कुछ देशों से जुड़े चुनिंदा जहाजों को ही गुजरने की इजाजत दी है। शिपिंग पैटर्न से पता चलता है कि ईरान जहाजों को अपने समुद्र तट के किनारे से गुजरने का निर्देश देकर ट्रैफिक को कंट्रोल कर रहा है। इसके उलट, ओमान के पास के आम रास्ते में जोखिम देखा गया है; इस महीने की शुरुआत में एक जहाज पर हमला होने की खबर है। 'जग वसंत' और 'पाइन गैस' दोनों ने फरवरी के आखिर में, लड़ाई बढ़ने से ठीक पहले, फारस की खाड़ी में एंट्री की थी। जग वसंत ने कुवैत से एलपीजी लोड की, जबकि पाइन गैस ने यूएई के रुवाइस से अपना माल उठाया। तनाव की वजह से इस इलाके में फंसे हुए थे। इस महीने की शुरुआत में, भारतीय झंडे वाले दो और एलपीजी कैरियर ने भी इसी तरह की यात्राएं सफलतापूर्वक पूरी की थीं।

ईरान की नई साजिश? एक्स-RAW अधिकारी की चेतावनी—मिसाइल से भी घातक हमला तैयार

ईरान पश्चिम एशिया में जारी अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच युद्ध अब एक नए और खतरनाक चरण में पहुंच गया है। यह संघर्ष केवल मिसाइल हमलों या एयर स्ट्राइक तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब यह प्रॉक्सी वॉर और हाइब्रिड वॉरफेयर में बदलता दिख रहा है। अपने अधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर पूर्व RAW एजेंट व NSG कमांडो लकी बिष्ट ने एक वीडियो में   "हाइब्रिड वॉर" को लेकर चेतावनी जारी की है।  हाइब्रिड वॉर: बदलता युद्ध का चेहरा यह जंग अब “अनरिस्ट्रिक्टेड वॉरफेयर” यानी हर क्षेत्र में फैलती लड़ाई बनती जा रही है।  साइबर हमले (बैंकिंग, बिजली, डेटा सिस्टम), तेल और गैस सप्लाई पर हमले (जैसे होर्मुज संकट),  प्रॉक्सी ग्रुप्स के जरिए हमले,  प्रचार और मनोवैज्ञानिक युद्ध शामिल हैं। कैसे शुरू हुई यह जंग? यह युद्ध 28 फरवरी 2026 को तब शुरू हुआ जब अमेरिका और इजराइल ने संयुक्त सैन्य अभियान चलाकर ईरान के ठिकानों और नेतृत्व को निशाना बनाया।इसके जवाब में ईरान ने इजराइल पर मिसाइल हमले किए और खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया। इसके लिए ईरान ने अपने प्रॉक्सी नेटवर्क को सक्रिय किया। अब यह संघर्ष मल्टी-फ्रंट वॉर बन चुका है, जिसमें लेबनान, खाड़ी देश और समुद्री मार्ग भी शामिल हो चुके हैं। प्रॉक्सी वॉर: ईरान की सबसे बड़ी ताकत ईरान लंबे समय से सीधे युद्ध के बजाय “प्रॉक्सी रणनीति” अपनाता रहा है। इसमें वह क्षेत्रीय संगठनों (जैसे लेबनान, इराक, यमन के समूह) के जरिए हमला करता है और अपने विरोधियों को कई मोर्चों पर उलझाए रखता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह रणनीति ईरान को कम संसाधनों में भी बड़े देशों को चुनौती देने की ताकत देती है।  ईरान की पहले की प्रॉक्सी वॉर रणनीति (इतिहास) रहा है।  लेबनान-हिजबुल्लाह     हिजबुल्लाह को ईरान का सबसे मजबूत प्रॉक्सी माना जाता है     इजराइल के खिलाफ कई बार संघर्ष में इस्तेमाल इराक-शिया मिलिशिया     इराक में कई शिया समूह ईरान समर्थित माने जाते हैं     अमेरिकी ठिकानों पर हमलों में इनकी भूमिका बताई जाती रही है यमन-हूती विद्रोही     हूती आंदोलन को ईरान का समर्थन मिलता रहा है     सऊदी अरब और खाड़ी देशों पर हमले सीरिया-असद सरकार समर्थन     सीरिया में ईरान ने सरकार का समर्थन किया     वहां भी प्रॉक्सी और मिलिशिया नेटवर्क सक्रिय रहे इन उदाहरणों से साफ है कि ईरान सीधे युद्ध से ज्यादा “अप्रत्यक्ष युद्ध” में माहिर रहा है। स्लीपर सेल और छिपे नेटवर्क का डर जैसे-जैसे युद्ध बढ़ रहा है, “स्लीपर सेल” यानी छिपे नेटवर्क की चर्चा भी तेज हो रही है। हालांकि अभी तक अमेरिका या यूरोप में बड़े पैमाने पर ऐसे नेटवर्क के सक्रिय होने का ठोस प्रमाण नहीं है लेकिन सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि  अगर युद्ध लंबा चला, तो छोटे स्तर के हमले या गुप्त नेटवर्क सक्रिय हो सकते हैं और यह खतरा पारंपरिक युद्ध से ज्यादा अप्रत्याशित होता है हाइब्रिड वॉर: बदलता युद्ध का चेहरा यह जंग अब “अनरिस्ट्रिक्टेड वॉरफेयर” यानी हर क्षेत्र में फैलती लड़ाई बनती जा रही है।  साइबर हमले (बैंकिंग, बिजली, डेटा सिस्टम), तेल और गैस सप्लाई पर हमले (जैसे होर्मुज संकट),  प्रॉक्सी ग्रुप्स के जरिए हमले,  प्रचार और मनोवैज्ञानिक युद्ध शामिल हैं।  तेल और होर्मुज: जंग का सबसे बड़ा दांव इस युद्ध का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है होर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया का करीब 20% तेल गुजरता है। ईरान ने इस रास्ते को बाधित किया  और अमेरिका ने इसे खोलने की चेतावनी दी है। इस जंग के कारण तेल और गैस सप्लाई पर असर पड़ेगा, वैश्विक अर्थव्यवस्था में अस्थिरता आएगी।यह संकट 1970 के दशक के तेल संकट जैसा बड़ा आर्थिक झटका दे सकता है।

नॉर्थ कोरिया की कमान दोबारा Kim Jong-un के हाथ, Vladimir Putin का खास संदेश

सोल रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन को राज्य मामलों के आयोग का अध्यक्ष पुनः चुने जाने पर बधाई दी। उन्होंने उम्मीद जताई कि दोनों देशों के रिश्तों का भविष्य उज्जवल होगा। क्रेमलिन ने सोमवार को यह जानकारी दी। नॉर्थ की कोरियन सेंट्रल न्यूज एजेंसी के मुताबिक, रविवार को हुए सुप्रीम पीपल्स असेंबली के पहले सत्र में किम को आयोग के सबसे ऊंचे पद पर फिर से नियुक्त किया गया। 2016 में देश की टॉप पॉलिसी गाइडेंस बॉडी के तौर पर कमीशन बनने के बाद से यह उनका लगातार तीसरा कार्यकाल है। क्रेमलिन के टेलीग्राम चैनल पर पोस्ट किए गए एक मैसेज में पुतिन ने कहा, "प्रिय कॉमरेड किम जोंग उन, डेमोक्रेटिक पीपल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया के स्टेट अफेयर्स के चेयरमैन के तौर पर आपके पुनः चुने जाने पर मेरी दिल से बधाई स्वीकार करें।" उन्होंने आगे कहा, "रूस हमारे देशों के बीच दोस्ताना, सहयोगी रिश्तों को मजबूत करने में आपके निजी योगदान को बहुत महत्व देता है। हम स्वाभाविक रूप से मॉस्को और प्योंगयांग के बीच बड़ी स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप को और बढ़ाने के लिए अपना करीबी सहयोग जारी रखेंगे। यह बेशक हमारे दोनों देशों के बुनियादी हितों को पूरा करता है।" रूस और नॉर्थ कोरिया हाल के वर्षों में अपने रिश्तों को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़े हैं। 2024 में एक रक्षा संधि की। न्यूज एजेंसी ने बताया कि नॉर्थ कोरिया ने यूक्रेन के खिलाफ अपनी लड़ाई में रूस का साथ देने के लिए सेना भी भेजी। इससे पहले, नॉर्थ कोरिया के लीडर किम जोंग-उन को पिछले महीने हुई रूलिंग पार्टी कांग्रेस के बाद सुप्रीम पीपल्स असेंबली (एसपीए) के पहले सेशन में 'स्टेट अफेयर्स कमीशन' का प्रेसिडेंट फिर से नियुक्त किया गया, यह जानकारी सरकारी मीडिया ने दी। कोरियन सेंट्रल न्यू एजेंसी (केसीएनए) ने बताया कि किम को 15वें एसपीए के पहले सत्र के पहले दिन स्टेट अफेयर्स कमीशन का प्रेसिडेंट फिर से अपॉइंट किया गया। केसीएनए के मुताबिक, बैठक के दौरान, जो योंग-वोन, जिन्हें किम के सबसे करीबी सहयोगियों में से एक माना जाता है, को भी एसपीए स्टैंडिंग कमेटी का चेयरमैन चुना गया, जो संसद का सबसे बड़ा पद है, और उन्होंने चोई रयोंग-हे की जगह ली। नॉर्थ कोरिया आमतौर पर पार्टी कांग्रेस के बाद रबर-स्टैम्प पार्लियामेंट का एक सत्र बुलाता है ताकि कांग्रेस में लिए गए फैसलों को लागू करने के लिए जरूरी कानून बनाए जा सकें। यह नियुक्ति रविवार को एसपीए के पहले सत्र में की गई, जो इसके 15वें टर्म की पहली स्टेट अफेयर्स एक्टिविटी थी। प्रीमियर पाक थाए-सोंग ने अपना पद बरकरार रखा, जबकि पूर्व प्रीमियर किम टोक-हुन को पहला वाइस प्रीमियर नियुक्त किया गया, यह पद हाल ही में हुई बैठक में बनाया गया था। इस फेरबदल में, जो को स्टेट अफेयर्स कमीशन का उपाध्यक्ष भी नियुक्त किया गया, जबकि किम की ताकतवर बहन किम यो-जोंग को आयोग के सदस्य के पद से हटा दिया गया। किम की ताकतवर बहन, किम यो जोंग, देश की सबसे बड़ी लीडरशिप बॉडी, स्टेट अफेयर्स कमीशन के सदस्यों की केसीएनए लिस्ट से गायब थीं, जिस पर वह 2021 से काबिज थीं। उत्तर कोरिया के तीसरी पीढ़ी के नेता के तौर पर, किम ने 2011 में अपने पिता के निधन के बाद से न्यूक्लियर हथियारों से लैस देश पर शासन किया है। देश की स्थापना 1948 में उनके दादा, किम इल सुंग ने की थी।

311.95 करोड़ की मदद से वंचित रहा केरल, केंद्र ने आवेदन न करने पर उठाए सवाल

नई दिल्ली केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केरल द्वारा राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण कोष के तहत 311.95 करोड़ रुपये हासिल करने के लिए आवेदन नहीं किए जाने का उल्लेख करते हुए सोमवार को लोकसभा में कहा कि केंद्रीय अनुदानों के लिए मंजूरी मिलना एक बात है और राज्यों द्वारा उस राशि को प्राप्त करने के लिए आवेदन करना दूसरी बात है। केंद्र सरकार की ओर से केरल का अनुदान लंबित रहने संबंधी कांग्रेस सदस्य मणिकम टैगोर के पूरक प्रश्न का उत्तर देते हुए सीतारमण ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि किसी भी राज्य को उपयोगिता प्रमाणपत्र देना होता है ताकि आगे की राशि उसे जारी की जा सके। सीतारमण ने कहा कि उदाहरण के लिए केरल से संबंधित एक विषय था जिसमें आवंटन किए जाने के बावजूद केरल सरकार ने राशि प्राप्त नहीं की। उन्होंने कहा कि केरल को राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण कोष के तहत 311.95 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई थी, जिसमें वायनाड के भूस्खलन प्रभावित इलाकों में जोखिम प्रबंधन की परियोजना के लिए 72 करोड़ रुपये शामिल हैं। सीतारमण ने कहा, ''जिन 311.95 करोड़ रुपये के लिए स्वीकृति दी गई, उसमें एक भी पैसा जारी नहीं किया गया है। मैं इस राशि को तभी जारी करूंगी जब राज्य इसके लिए आवेदन करेगा, मांगेगा। इसलिए मंजूरी देना एक बात है, उसके लिए आवेदन करना और मांगना दूसरी बात है।'' केरल में वायनाड आपदा प्रबंधन के लिए वित्तीय सहायता के संबंध में केंद्र और राज्य सरकार के बीच कुछ गतिरोध की स्थिति है। केरल में अगले महीने विधानसभा चुनाव होने हैं।