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150 साल पूरे होने पर वंदे मातरम का भव्य आयोजन, पीएम की मौजूदगी में उठा इस्लाम से जुड़ा मुद्दा

 नई दिल्ली भारत के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के 150 साल पूरे हो रहे हैं। इस मौके पर केंद्र सरकार ने देश भर के 150 स्थानों पर आयोजन का फैसला लिया है। इसके तहत सामूहिक रूप से वंदे मातरम गाया जाएगा। यही नहीं सभी आयोजनों में मुख्य अतिथि के तौर पर कोई वरिष्ठ नेता, मंत्री या अधिकारी भी शामिल होगा। खुद पीएम नरेंद्र मोदी शुक्रवार को दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में ऐसे ही एक कार्यक्रम में भाग लेंगे। संस्कृति मंत्रालय के अनुसार, ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री हिस्सा लेंगे। इस बीच जम्मू-कश्मीर में इन आयोजनों को लेकर इस्लाम वाला सवाल उठ गया है। मीरवाइज उमर फारूक के नेतृत्व वाले मुत्ताहिदा मजलिस-ए-उलेमा ने केंद्र शासित प्रदेश की सरकार पर सवाल उठाए हैं। सरकार ने सभी स्कूलों को यह आदेश दिए जाने पर आपत्ति जताई है कि वे वंदे मातरम पर संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम करें। इस्लामिक संस्था का कहना है कि वंदे मातरम के आयोजन में शामिल होने के लिए कहना गैर-इस्लामी है। यह मुस्लिम बहुल इलाके पर आरएसएस की हिंदुत्व वाली विचारधारा को थोपने का प्रयास है। बता दें कि 7 नवंबर को होने वाले आयोजनों में स्कूली बच्चों, कॉलेज के छात्रों, अधिकारियों, निर्वाचित प्रतिनिधियों, पुलिसकर्मियों और डॉक्टरों सहित नागरिकों की भागीदारी रहेगी। इन आयोजनों में वंदे मातरम का सामूहिक गान होगा। अधिकारियों ने बताया कि दिल्ली में होने वाले उद्घाटन समारोह में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम, वंदे मातरम के 150 वर्षों के इतिहास पर एक प्रदर्शनी, एक लघु वृत्तचित्र फिल्म का प्रदर्शन और एक स्मारक डाक टिकट और सिक्का जारी किया जाएगा। भाजपा भी इस उपलब्धि को एक उत्सव के रूप में मनाने की योजना बना रही है। नई दिल्ली में पार्टी मुख्यालय में भाजपा के महासचिव तरुण चुघ ने कहा, 'इस अवसर को मनाने के लिए सात नवंबर से 26 नवंबर (संविधान दिवस) तक देश भर में कई कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। ’ इन प्रमुख स्थानों पर भी होगा वंदे मातरम का गायन उन्होंने बताया कि सात नवंबर को 150 महत्वपूर्ण स्थानों पर वंदे मातरम गाया जाएगा, जिसके बाद स्वदेशी उत्पादों के उपयोग की शपथ ली जाएगी। इस दौरान कविता लेखन, पाठन और चित्रकला जैसे कई अन्य कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे। जिन स्थानों पर सात नवंबर को वंदे मातरम का गायन आयोजित किया जाएगा उनमें कारगिल युद्ध स्मारक, अंडमान और निकोबार सेलुलर जेल, ओडिशा का स्वराज आश्रम, आगरा में शहीद स्मारक पार्क और वाराणसी में नमो घाट शामिल हैं। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव ने कहा कि वंदे मातरम अंग्रेजों से भारत की मुक्ति के लिए एक प्रमुख मंत्र के रूप में उभरा। क्या है इस्लाम वाली दलील और जम्मू-कश्मीर से सरकार से क्या अपील संस्कृति मंत्रालय के अनुसार ऐसा माना जाता है कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इस गीत की रचना सात नवंबर 1875 को अक्षय नवमी के अवसर पर की थी। मातृभूमि की वंदना में गाए गए इस गीत को 1950 में राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया गया था। वहीं मुत्ताहिदा मजलिस-ए-उलेमा ने एक लेटर लिखकर जम्मू-कश्मीर की सरकार और एलजी से मांग की है कि वंदे मातरम के आयोजन में भाग लेने की अनिवार्यता खत्म की जाए। ऐसा करना गैर-इस्लामिक है और हिंदुत्व की विचारधारा को थोपने वाला है।

रूसी कंपनियों पर US प्रतिबंध विफल, भारत कर रहा है फीडस्टॉक की बड़ी खरीद: अलीपोव

नई दिल्ली  अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और रूस के बीच तेल व्यापार रोकने की भरपूर कोशिश की है, फिर चाहे वह रूसी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाना हो या फिर भारत के ऊपर टैरिफ के जरिए दबाव बनाना। इस बीच भारत में रूसी राजदूत डेनिस अलीपोव ने कहा है कि मॉस्को की दो सबसे बड़ी तेल कंपनियों पर अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद भारत 'भारी मात्रा में' फीडस्टॉक खरीद रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कई बार इस बात का दावा किया है कि भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया या कम कर दिया है। हालांकि, भारत ने इन दावों से इनकार किया। बता दें, हाल ही में अमेरिका ने दो रूसी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध भी लगाए हैं। वहीं, रूसी मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में, अलीपोव ने कहा कि अक्टूबर 2025 के अनुमान के अनुसार, भारत द्वारा रूसी फीडस्टॉक की खरीद लगभग 1.75 मिलियन बैरल प्रतिदिन के स्तर पर ही रहेगी। अलीपोव ने आगे कहा, "यह आंकड़ा पहले भी उछला था, अब भी उछल रहा है। कुछ महीनों में ज्यादा और कुछ में कम, औसतन लगभग उसी स्तर पर रहा है।" पिछले महीने, ट्रंप ने रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर मॉस्को की सबसे बड़ी तेल कंपनियों, रोसनेफ्ट और लुकोइल, पर प्रतिबंधों की घोषणा की थी। प्रतिबंधों की घोषणा करते समय स्कॉट बेसेंट ने कहा था, "अब समय आ गया है कि हत्याएं रोकी जाएं और तत्काल युद्धविराम किया जाए।" अमेरिका का कहना है कि रूस व्यापार से मिलने वाले पैसों का इस्तेमाल यूक्रेन के खिलाफ हमले करने में खर्च करता है। ऐसे में आर्थिक रूप से रूस को तोड़ने की कोशिशों में ट्रंप सरकार लगातार दबाव बनाने की कोशिश कर रही है। भारत में सूरजमुखी के तेल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। पिछले चार वर्षों में रूसी सूरजमुखी तेल की आपूर्ति यूक्रेन की तुलना में भारत में बारह गुना ज्यादा हो गई है। 2022 में रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध छिड़ने के बाद से, कीव का सूरजमुखी तेल निर्यात बड़े पैमाने पर यूरोप की ओर मुड़ गया है। इससे रूस को भारत के विशाल बाजार में प्रवेश करने का मौका मिला है।

नवंबर का सवेरा जिसने पाकिस्तान के इतिहास को मोड़ दिया

नई दिल्ली गुलाबी ठंड दस्तक दे चुकी थी। सुबह की ठंडी हवा में धुंध तैरने लगी थी। रावलपिंडी स्थित गॉर्डन कॉलेज के गेट के बाहर सैकड़ों छात्र इकट्ठा थे। हाथों में तख्तियां थीं। इनमें लिखा था- रोटी, आजादी और इन्साफ! और दिलों में उबाल। कोई एक बोलता – 'अय्यूब खान हाय-हाय!', तो बाकी भीड़ एक स्वर में जवाब देती 'जम्हूरियत जिंदाबाद!' यह 7 नवंबर 1968 की सुबह थी, जब पाकिस्तान की गलियों में पहली बार सत्ता के खिलाफ एक जनसैलाब उमड़ा था।  महज गुस्से की आवाज नहीं थे, बल्कि एक पूरे युग के बदलाव का संकेत थे। यह वही आंदोलन था जिसने पाकिस्तान की राजनीति की दिशा मोड़ दी, और आने वाले वर्षों में जुल्फिकार अली भुट्टो जैसे नेताओं को जनता की आवाज बना दिया। उस समय पाकिस्तान में जनरल अय्यूब खान का शासन था, जिन्होंने 1958 में सेना के जरिए सत्ता पर कब्जा किया था। शुरुआत में उन्हें 'विकास का प्रतीक' कहा गया, लेकिन 1960 के दशक के अंत तक उनकी आर्थिक नीतियों ने असमानता बढ़ा दी। शहरों में उद्योगपतियों की अमीरी और गांवों में बढ़ती गरीबी ने जनता को भीतर से तोड़ दिया। छात्रों का यह मार्च धीरे-धीरे रावलपिंडी शहर की नसों में फैलने लगा। दुकानदारों ने शटर गिरा दिए, राह चलते लोग झंडे थामने लगे, और सड़कें नारों से भर गईं। पुलिस ने पहले लाठीचार्ज किया, फिर आंसू गैस छोड़े, और आखिर में गोली चली। एक युवक मारा गया और उसी पल यह प्रदर्शन एक राष्ट्रीय आंदोलन में बदल गया। उस दिन के बाद प्रदर्शन सिर्फ छात्रों तक सीमित नहीं रहे। कराची, लाहौर, पेशावर और ढाका तक आंदोलन फैल गया। फैक्ट्री मजदूर, पत्रकार, कलाकार सबने नारे बुलंद किए। यह वो वक्त था जब पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान एक ही मांग में एकजुट हुए-"लोकतंत्र चाहिए।" इसी दौर में उर्दू के महान शायर फैज अहमद फैज के शब्दों ने आंदोलन की आत्मा को आवाज दी। उनके शब्द, "बोल कि लब आजाद हैं तेरे" हर सभा में गूंजने लगे। फैज की पंक्तियां छात्रों के झंडों पर लिखी जाने लगीं, और रावलपिंडी की सड़कों पर शायरी और क्रांति एक हो गए। राजनीतिक हलचल ने ज़ुल्फिकार अली भुट्टो को जनता का चेहरा बना दिया। वही आंदोलन जिसने अय्यूब खान के शासन को हिला दिया, आगे चलकर 1970 के चुनावों का रास्ता खोल गया। अय्यूब खान ने आंदोलन को "विद्रोह" बताया, लेकिन देश अब उनके खिलाफ खड़ा हो चुका था। फरवरी 1969 तक विरोध इतना तेज हो गया कि उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। सत्ता जनरल याह्या खान के हाथों में गई, जिन्होंने चुनाव करवाए और इन्हीं चुनावों ने शेख मुजीबुर रहमान को पूर्वी पाकिस्तान में भारी जीत दिलाई, जिसने 1971 में बांग्लादेश के निर्माण का रास्ता प्रशस्त किया।

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में टैरिफ विवाद का निर्णायक दिन, वैश्विक बाजार की नज़रें टिकीं

नई दिल्ली  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ के ऐलान के साथ वैश्विक व्यापार जगत में उथल-पुथल मच गई। ट्रंप के टैरिफ को लेकर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी रही, जिसके बाद उम्मीद की जा रही है कि इसपर आखिरी फैसला भी आज आ जाए। वहीं, दूसरी ओर पूरी दुनिया की निगाहें इस पर टिकी हुई हैं। 5 नवंबर को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में आखिरी सुनवाई शुरू हुई, जिसमें अधिकांश जजों ने अमेरिकी राष्ट्रपति के फैसले पर सवाल खड़े किए। निचली फेडरल कोर्ट ने इससे पहले टैरिफ के मामले में फैसला सुनाया था कि ट्रंप के पास अमेरिका के कई व्यापारिक साझेदारों से आयात पर टैरिफ लगाने और कनाडा, चीन और मैक्सिको के उत्पादों पर फेंटानिल टैरिफ लगाने का कानूनी अधिकार नहीं है। निचले कोर्ट के फैसले के बाद राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। बता दें, टैरिफ को लेकर करीब ढाई घंटे से ज्यादा कोर्ट में बहस चली। कोर्ट ने ट्रंप सरकार के टैरिफ के फैसले पर सवाल उठाए। जस्टिस सोनिया सोतोमयोर ने कहा, "आप कहते हैं कि टैरिफ टैक्स नहीं हैं, लेकिन वास्तव में वे टैक्स ही हैं। वे अमेरिकी नागरिकों से पैसा, राजस्व कमा रहे हैं।" इस पर सॉलिसिटर जनरल जॉन सॉयर ने कहा, "मैं इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं कह सकता, यह एक नियामक टैरिफ है, टैक्स नहीं। यह सच है कि टैरिफ से राजस्व बढ़ता है और यह केवल आकस्मिक है।" इसके अलावा जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स ने कहा, "अगर मैं सही नहीं हूं तो मुझे सुधारें, लेकिन यह तर्क किसी भी देश के किसी भी उत्पाद पर, किसी भी मात्रा में, किसी भी अवधि के लिए टैरिफ लगाने की शक्ति के लिए दिया जा रहा है।" जस्टिस रॉबर्ट्स की इस टिप्पणी के बाद अमेरिकी सॉलिसिटर जनरल डी. जॉन सॉयर ने तर्क दिया कि आईईईपीए राष्ट्रपति को इमरजेंसी की स्थिति के दौरान 'आयात को विनियमित करने' की इजाजत देता है। अमेरिकी सॉलिसिटर जनरल के तर्क से जस्टिस एमी कोनी बैरेट सहमत नहीं थीं। उन्होंने सॉयर से कहा, "क्या आप संहिता में ऐसे किसी दूसरे स्थान या इतिहास में किसी दूसरे समय का जिक्र कर सकते हैं, जहां 'आयात को विनियमित करना' वाक्यांश का उपयोग टैरिफ लगाने का अधिकार देने के लिए किया गया हो?" इसके अलावा, जस्टिस बैरेट ने कहा कि अगर कांग्रेस भविष्य में आपातकालीन टैरिफ पर किसी भी सीमा को मंजूरी देना चाहती है, तो उसे राष्ट्रपति के वीटो को पार करने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी। जस्टिस बैरेट ने पूछा, "अगर कांग्रेस कहती है, 'अरे, हमें यह पसंद नहीं है, इससे राष्ट्रपति को आईईईपीए के तहत बहुत ज्यादा अधिकार मिल जाते हैं,' तो उसे आईईईपीए से उस टैरिफ शक्ति को वापस लेने में बहुत मुश्किल होगी, है ना?" हालांकि, कोर्ट की तरफ से मामले में अब तक आखिरी फैसला सामने नहीं आया है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति के टैरिफ वाले फैसले पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने सवाल खड़े किए हैं।

शहबाज सरकार की विदाई तय? युवाओं के आंदोलन से पाकिस्तान की राजनीति में भूचाल

नेपाल नेपाल की तर्ज पर अब पाकिस्तान में भी Gen Z ने सत्ता के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में कुछ सप्ताह पूर्व भड़की हिंसक प्रदर्शन के बाद एक बार फिर विद्रोह की आंधी उठ चुकी है। इस दफा कमान संभाली है युवा छात्रों (जेन जी) ने, जो शिक्षा सुधारों के बहाने बढ़ती ट्यूशन फीस और नई मूल्यांकन व्यवस्था के विरुद्ध सड़कों पर उतर आए हैं। शुरुआत में शांतिपूर्ण ढंग से फीस वृद्धि के खिलाफ शुरू हुआ यह आंदोलन तुरंत शहबाज शरीफ सरकार के खिलाफ व्यापक संघर्ष में बदल गया है। बताया जा रहा है कि छात्रों की नाराजगी नई शैक्षणिक सत्र में मैट्रिक और इंटर स्तर पर लागू ई-मार्किंग (डिजिटल मूल्यांकन) प्रणाली से है। 30 अक्टूबर को छह महीने की देरी से इंटरमीडिएट फर्स्ट ईयर के रिजल्ट घोषित हुए, लेकिन छात्रों में हाहाकार मच गया। उन्होंने अप्रत्याशित रूप से कम नंबर मिलने की शिकायत की और जिम्मेदार ठहराया ई-मार्किंग सिस्टम को। स्थानीय रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ छात्रों को उन विषयों में भी पास कर दिया गया, जिनकी परीक्षा उन्होंने दी ही नहीं थी। इसको लेकर सरकार की ओर से कोई सफाई तो नहीं आई, लेकिन मीरपुर एजुकेशन बोर्ड ने ई-मार्किंग की जांच के लिए कमिटी गठित की है। प्रदर्शनकारियों की एक बड़ी मांग है पुनर्मूल्यांकन शुल्क माफ करना, जो प्रति सब्जेक्ट 1500 रुपये है। सातों पेपरों के लिए यह 10500 रुपये तक पहुंच जाता है, जो गरीब छात्रों के लिए भारी बोझ है। यह विवाद लाहौर जैसे पाकिस्तानी शहरों तक पहुंच गया, जहां इंटर छात्रों ने पिछले महीने लाहौर प्रेस क्लब के बाहर धरना दिया। आंदोलन को मजबूती दे रही है संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी), जो अक्टूबर की हिंसक घटनाओं में सबसे आगे थी। एक महीने पहले भी पीओके में हुआ था विरोध-प्रदर्शन बता दें कि एक महीने पहले पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में जबरदस्त विरोध-प्रदर्शन हुआ था। 30 मांगों का एक घोषणापत्र लेकर शुरू हुआ संघर्ष ( टैक्स में छूट, आटा व बिजली पर सब्सिडी तथा विकास योजनाओं को समयबद्ध पूरा करने जैसी प्रमुख शिकायतें थीं ) 12 से अधिक निर्दोष नागरिकों की जान चली गई थी। पाकिस्तानी प्रशासन ने गोली चलाकर इसे कुचलने का प्रयास किया था, लेकिन यह सेना प्रमुख आसिम मुनीर की मनमानी व भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक व्यापक बगावत में तब्दील हो गया। अंत में शरीफ सरकार को आंदोलनकारियों से सौदेबाजी करनी पड़ी और कुछ अहम मांगें स्वीकार कर लीं, जिसके बाद ही आंदोलनकारी शांत हुए। नेपाल में ढह गई थी सत्ता हालांकि यह नया विवाद पूरी तरह अलग है। पिछला आंदोलन राजनीतिक दलों का था, लेकिन अब जेन जी ने बागडोर थाम ली है। अभी का दौर बहुत ही संवेदनशील है, क्योंकि पड़ोसी नेपाल में युवाओं के नेतृत्व में भड़के विद्रोह ने केपी शर्मा ओली की सरकार को उखाड़ दिया था। वहां सोशल मीडिया पर पाबंदी के विरोध में शुरू हुआ यह प्रदर्शन भ्रष्टाचार विरोधी एक विशाल आंधी में बदल गया। जेन जी का गुस्सा इतना तेज था कि मंत्रियों के आवासों में लूटपाट व आगजनी हुई, यहां तक कि संसद भवन को भी राख कर दिया गया। पीओके में भी इसी तरह की चिंगारी सुलगने के लक्षण दिख रहे हैं, जो शिक्षा से शुरू होकर सत्ता की चौखट तक पहुंचने वाली है।

‘देश संकट में है’— सुप्रीम कोर्ट में PM के प्रतिनिधि की बड़ी दलील, नेशनल इमरजेंसी की गुहार

नई दिल्ली  राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों और शहरों में बढ़ते प्रदूषण और दमघोंटू हवा के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है और वायु प्रदूषण के स्तर को नियंत्रित करने की मांग की गई है। इतना ही नहीं याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी में राष्ट्रीय स्तर पर "सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल" (National Health Emergency) लागू करने की भी मांग की है। ताकि ग्रामीण से लेकर शहरी स्तर तक लोगों को प्रदूषण के गंभीर परिणामों से बचाया जा सके। यह याचिका ल्यूक क्रिस्टोफर कॉउटिन्हो ने दायर की है, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फिट इंडिया मूवमेंट के वेलनेस चैंपियन यानी दूत रहे हैं। याचिका में उन्होंने तर्क दिया है कि एक व्यापक नीतिगत ढाँचे के बावजूद, ग्रामीण और शहरी भारत के बड़े हिस्से में वायु की गुणवत्ता लगातार खराब बनी हुई है और कई मामलों में यह बदतर स्तर को भी पार कर गई है। संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार का हवाला देते हुए, कोर्ट से अधिकारियों को वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के ठोस उपाय करने का निर्देश देने की माँग की है। याचिका में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु आदि प्रमुख भारतीय शहरों में PM₂.₅ और PM₁₀ जैसे प्रदूषकों का वार्षिक औसत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा अधिसूचित राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों (NAAQS), 2009 के तहत निर्धारित सीमा से लगातार अधिक बना हुआ है। मानकों का घोर उल्लंघन याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में इस बात पर जोर दिया है कि भारतीय मानक पहले से ही एक उच्च सीमा निर्धारित करते हैं, क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2021 वायु गुणवत्ता दिशानिर्देश PM₂.₅ के लिए 5 μg/m³ और PM₁₀ के लिए 15 μg/m³ की वार्षिक औसत सीमा निर्धारित करते हैं। उन्होंने कोर्ट को बताया है कि दिल्ली में PM₂.₅ का वास्तविक वार्षिक औसत स्तर लगभग 105 μg/m³ दर्ज किया गया है, जबकि कोलकाता में लगभग 33 μg/m³ और लखनऊ में लगभग 90 μg/m³ दर्ज किया गया है, जो भारतीय मानकों का उल्लंघन है। इस समस्या से निपटने में अधिकारियों की विफलता को उजागर करते हुए याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि 1.4 अरब से ज़्यादा नागरिक हर दिन जहरीली हवा में साँस लेने को मजबूर हैं। उन्होंने आगे कहा कि वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रमों से ग्रामीण क्षेत्रों का बहिष्करण एक बुनियादी ढाँचागत कमज़ोरी को दर्शाता है। कौन हैं क्रिस्टोफर? ल्यूक क्रिस्टोफर कॉउटिन्हो एक भारतीय जीवनशैली गुरु और एकीकृत एवं जीवनशैली चिकित्सा के क्षेत्र में थिंकर हैं, जो स्वास्थ्य के प्रति लोगों को जागरूक करते रहे हैं। वह उत्तम स्वास्थ्य के लिए पोषण, व्यायाम, नींद, इमोशनल डिटॉक्स और अध्यात्म जैसे पांच स्तंभों पर जोर देते रहे हैं। वे यू केयर वेलनेस प्रोग्राम के संस्थापक हैं और स्वास्थ्य पर बेस्टसेलिंग पुस्तकें लिखने के लिए जाने जाते हैं। वह वायु प्रदूषण जैसे सामाजिक मुद्दों के समाधान के लिए भी सक्रिय रहे हैं।

Gen-Z का बगावत मोड ऑन! पाकिस्तान में शहबाज-मुनीर की सत्ता पर उठे सवाल

इस्लामाबाद  नेपाल के बाद अब पाकिस्तान की नई पीढ़ी यानी जेन-जी में भी अपनी सरकार के खिलाफ आक्रोश उफान पर है. पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में कुछ हफ्तों पहले ही हिंसक विरोध-प्रदर्शन हुए थे और एक बार फिर विरोध की आग धधक उठी है. इस बार इसकी अगुवाई कर रही है जेनरेशन Z, यानी छात्र वर्ग, जो शिक्षा सुधारों को लेकर सड़कों पर उतर आया है. शुरुआत में यह विरोध बढ़ती फीस और मूल्यांकन प्रक्रिया के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन के रूप में शुरू हुआ था, लेकिन अब यह शहबाज शरीफ सरकार के खिलाफ एक बड़े आंदोलन में बदल गया है. यह आंदोलन कब्जे वाले क्षेत्र में पाकिस्तान के प्रति युवा पीढ़ी के गहरे असंतोष को दिखाता है. इन विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत इस महीने की शुरुआत में हुई थी और यह शुरू में शांतिपूर्ण रहे. लेकिन स्थिति तब बिगड़ गई जब एक अज्ञात बंदूकधारी ने छात्रों के एक ग्रुप पर गोली चला दी, जिसमें एक छात्र घायल हो गया. सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि मुजफ्फराबाद में एक व्यक्ति प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग कर रहा है, जिससे इलाके में अफरातफरी मच गई. हालांकि, वीडियो की पुष्टि नहीं की जा सकी है. रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घटना पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में हुई. यह घटना आंदोलन का टर्निंग पॉइंट साबित हुई- गुस्साए छात्रों ने टायर जलाए, आगजनी और तोड़फोड़ की, और पाकिस्तान सरकार के खिलाफ नारे लगाए. इन प्रदर्शनों में नेपाल और बांग्लादेश में हुए जेन जी आंदोलनों की झलक देखी जा सकती है. प्रदर्शन की शुरुआत कैसे हुई? यह आंदोलन मुजफ्फराबाद की एक प्रमुख यूनिवर्सिटी में बढ़ती फीस और बेहतर सुविधाओं की मांग को लेकर शुरू हुआ था. जैसे-जैसे आंदोलन ने जोर पकड़ा, प्रशासन ने यूनिवर्सिटी में सभी राजनीतिक गतिविधियों पर रोक लगा दी. ऐसा ही एक विरोध जनवरी 2024 में भी हुआ था, जब छात्रों ने हर तीन–चार महीने में लाखों रुपये फीस के नाम पर वसूले जाने का आरोप लगाया था. उस समय PoK के शिक्षक और प्रशासनिक कर्मचारी भी वेतन वृद्धि की मांग को लेकर आंदोलन में शामिल हुए थे. छात्रों की मांगें क्या हैं? इस बार इंटरमीडिएट स्तर के छात्र भी प्रदर्शन में शामिल हुए हैं. उनकी मुख्य नाराजगी नई ई-मार्किंग या डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली को लेकर है, जिसे इस साल शैक्षणिक सत्र से लागू किया गया है. 30 अक्टूबर को इंटरमीडिएट फर्स्ट ईयर के रिजल्ट्स घोषित किए गए, छह महीने की देरी के बाद लेकिन रिजल्ट्स में कई छात्रों को बेहद कम मार्क्स दिए जाने पर नाराजगी भड़क उठी. कुछ छात्रों ने तो यह भी दावा किया कि उन्हें उन विषयों में पास कर दिया गया जिनकी परीक्षा उन्होंने दी ही नहीं थी. सरकार ने इस मामले पर अभी तक कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है, लेकिन मीरपुर शिक्षा बोर्ड ने ई-मार्किंग प्रक्रिया की समीक्षा के लिए एक समिति गठित की है. छात्रों ने रीचेकिंग फीस माफ करने की भी मांग की है, जो फिलहाल 1,500 रुपये प्रति विषय रखी गई है. यानी जिन छात्रों को सभी सात विषयों की कॉपियां दोबारा जांचवानी हैं, उन्हें 10,500 रुपये तक देने होंगे. यह मुद्दा अब लाहौर जैसे पाकिस्तानी शहरों तक पहुंच गया है, जहां इंटरमीडिएट छात्रों ने लाहौर प्रेस क्लब के बाहर धरना दिया. लेकिन अब छात्रों की शिकायतें केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहीं, जर्जर इंफ्रास्ट्रक्चर, खराब स्वास्थ्य सेवाएं और परिवहन की कमी ने युवा पीढ़ी की नाराजगी को और बढ़ा दिया है. JAAC का समर्थन और बढ़ती ताकत इस आंदोलन को ताकत दी है जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने, जिसने अक्टूबर में हुए हिंसक प्रदर्शनों की अगुवाई की थी. अक्टूबर में फैले विरोध प्रदर्शनों में 12 से अधिक नागरिक मारे गए थे. ये प्रदर्शन 30 मांगों वाले चार्टर को लेकर शुरू हुए थे जिनमें टैक्स राहत, आटे और बिजली पर सब्सिडी और अधूरे विकास कार्यों को पूरा करने की मांग शामिल थी. लेकिन जब पाकिस्तानी सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए गोलीबारी का सहारा लिया, तो यह गुस्सा सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़े आंदोलन में बदल गया. आंदोलन के चलते पूरा पीओके ठप हो गया. आखिरकार शहबाज शरीफ सरकार को झुकना पड़ा और सरकार ने प्रदर्शनकारियों की कई प्रमुख मांगें मान लीं. नेपाल से लेकर श्रीलंका तक, Gen-Z सड़कों पर PoK का यह नया आंदोलन अलग है, इसे अब राजनीतिक कार्यकर्ताओं नहीं, बल्कि जेनरेशन Z ने संभाला है. यह समय भी अहम है, क्योंकि पड़ोसी नेपाल में हाल ही में हुए जेन जी आंदोलन ने केपी शर्मा ओली सरकार को गिरा दिया था. वहां भी सोशल मीडिया बैन के खिलाफ शुरू हुआ विरोध जल्द ही भ्रष्टाचार-विरोधी जनआंदोलन में बदल गया था. नेपाल में गुस्सा इतना था कि लगभग सभी मंत्रियों के घरों को आग के हवाले कर दिया गया और संसद भवन तक जला दी गई. 2024 में बांग्लादेश में भी ऐसा ही युवा आंदोलन देखने को मिला, जिससे शेख हसीना सरकार गिर गई. 2022 में श्रीलंका में भी घरेलू संकटों पर जनता का गुस्सा भ्रष्टाचार विरोधी विद्रोह में बदल गया था. 

भारत को सलाम, पाकिस्तान के आगे गिड़गिड़ाने वालों को सीख: ED की जमकर तारीफ

नई दिल्ली मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फाइनेंसिंग को रोकने वाली इंटरनेशनल संस्‍था फाइनेंशियल एक्‍शन टास्‍क फोर्स (FATF) ने भारतीय एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate – ED) की तारीफ की है. FATF ने कहा कि दुनिया के अन्‍य देशों को ईडी से सीखना चाहिए कि किस तरह से मनी लॉन्ड्रिंग पर रोक लगाई जाए और क्रिमिनल केस में में एसेट्स की रिकवरी की जाए. यह वही FATF है, जिसके सामने पाकिस्‍तान की हेकड़ी गुम रहती है. पाकिस्‍तान मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फाइनेंसिंग के लिए पूरी दुनिया में कुख्‍यात है. FATF ऐसे देशों को विभिन्‍न क्‍लासीफाइड कैटेगरी में डालता रहता है, जिससे संबंधित देशों की इकनॉमी पर बुरा असर पड़ता है. विदेशी निवेश प्रभावित होता है. FATF के कड़े प्रतिबंधों से बचने के लिए पाकिस्‍तान इस ग्‍लोबल ऑर्गेनाइजेशन के सामने मेमियाता रहता है. अब उसी संस्‍था ने भारत की जांच एजेंसी ईडी की तारीफ की है. अंतरराष्ट्रीय वित्तीय निगरानी संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) ने बुधवार 5 नवंबर 2025 को एक नई रिपोर्ट जारी करते हुए अपराध से अर्जित संपत्तियों की जब्ती और उन्हें पीड़ितों को वापस दिलाने में भारत के प्रयासों की सराहना की है. FATF की यह रिपोर्ट ‘Asset Recovery Guidance and Best Practices’ के नाम से प्रकाशित हुई है, जिसमें खासतौर पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की तेज और प्रभावी कार्रवाई को प्रमुख उदाहरण के रूप में शामिल किया गया है. विश्व स्तर पर मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकी वित्त पोषण पर नजर रखने वाली FATF ने कहा कि भारत ने आपराधिक मामलों में अवैध संपत्तियों का पता लगाने, उन्हें फ्रीज़ करने, जब्त करने और समाज के हित में उपयोग करने के लिए एक मजबूत व्यवस्था विकसित की है. रिपोर्ट में कहा गया है कि ED ने घरेलू, अंतरराष्ट्रीय और आर्थिक अपराधों के मामले में देश से भागे अपराधियों के खिलाफ विशेष सक्रियता दिखाई है. 340 पेज की रिपोर्ट ED की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि FATF की 340 पृष्ठों वाली इस रिपोर्ट में व्यावहारिक उपाय सुझाए गए हैं, जिनसे विभिन्न देशों को अपराध से जुड़े धन की पहचान करने, उसे ट्रैक करने और पीड़ितों को वापस संबंधित संपत्तियां लौटाने में सहायता मिलेगी. बयान के मुताबिक, यह गाइडेंस नीति निर्माताओं और प्रवर्तन एजेंसियों के लिए एक मानक है, जिससे वे अपनी राष्ट्रीय रणनीति को बेहतर बना सकें और वैश्विक बेस्ट प्रैक्टिस के अनुसार कार्य कर सकें. रिपोर्ट में कहा गया है कि ED ने क्रिप्टो करेंसी धोखाधड़ी, साइबर अपराध और पोंजी स्कीम जैसे मामलों में बेहद तेजी से कार्रवाई की है. FATF ने बताया कि कई मामलों में अपराधी विदेश भाग गए थे, लेकिन ED ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से उनकी संपत्तियों को या तो जब्त कर लिया या फ्रीज़ किया.

CJI गवई का सरकार पर बड़ा सवाल: क्या अदालत को भी रिटायरमेंट डेट तय करनी पड़े?

नई दिल्ली  ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट मामले में सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट से एक बार फिर केंद्र सरकार को फटकार पड़ी है। CJI यानी भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने स्थगन की मांग पर आपत्ति जताई है। इससे पहले भी उन्होंने मामले को बड़ी बेंच के पास भेजे जाने के अनुरोध को लेकर केंद्र पर सवाल उठाए थे और कहा था कि लगता है सरकार मौजूदा पीठ से बचना चाह रही है। बार एंड बेंच के अनुसार, अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने मामले में स्थगन की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने एएसजी ऐश्वर्या भाटी की तरफ से यह अनुरोध पेश किया गया था। इस पर सीजेआई गवई ने सवाल उठा दिया कि क्या सरकार उनके रिटायरमेंट होने का इंतजार कर रही है। उन्होंने कहा, 'हम दो बार पहले ही आपकी बात मान चुके हैं। कितनी बार और? अगर आप यह 24 नवंबर के बाद चाहते हैं, तो हमें बता दें। यह कोर्ट के साथ बहुत अन्याय है। हर बार आप मध्यस्थता के लिए सुविधा मांगते हैं। आपके कई वकील हैं और आप बड़ी बेंच की मांग को लेकर आधी रात में आवेदन दाखिल करते हैं।' उन्होंने कहा, 'जब हम हाईकोर्ट में थे, तो जो भी ब्रीफ हमें छोड़ने पड़ते थे, उसके लिए हम यहां आते थे। हम शीर्ष संवैधानिक अदालत का बहुत सम्मान करते हैं। हम कल और कोई केस नहीं लिया। हमने सोचा था कि हम कल सुनवाई करेंगे और वीकेंड पर फैसला लिख देंगे।' पहले भी भड़का था कोर्ट सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने उस अर्जी पर कड़ा रुख अपनाया, जिसमें अधिकरण सुधार (सुव्यवस्थीकरण एवं सेवा शर्तें) अधिनियम, 2021 प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं को वृहद पीठ के पास भेजने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि अंतिम सुनवाई के आखिरी चरण में सरकार से ऐसी उम्मीद नहीं थी। सीजेआई गवई और जस्टिस विनोद चंद्रन की बेंच ने इस बात को लेकर नाराजगी जताई कि केंद्र अब इस मामले को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेजना चाहता है। पीठ ने इस मामले में मुख्य याचिकाकर्ता मद्रास बार एसोसिएशन सहित विभिन्न याचिकाकर्ताओं की ओर से अंतिम दलीलें पहले ही सुन ली हैं। पीठ ने कहा, 'पिछली तारीख (सुनवाई की) पर, आपने (अटॉर्नी जनरल) ये आपत्तियां नहीं उठाईं और आपने निजी कारणों से सुनवाई टालने का अनुरोध किया। आप पूरी सुनवाई के बाद ये आपत्तियां नहीं उठा सकते… हम केंद्र सरकार से ऐसी तरकीब अपनाने की उम्मीद नहीं करते हैं।' नाराज नजर आ रहे प्रधान न्यायाधीश ने कहा, 'यह ऐसे समय हुआ है जब हमने एक पक्ष की पूरी बात सुन ली है और अटॉर्नी जनरल को निजी कारणों से छूट दी है।' सीजेआई ने कहा था कि ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार मौजूदा पीठ से बचना चाहती है। सीजेआई गवई 23 नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं।

डोनाल्ड ट्रंप बोले, भारत-पाक संघर्ष में 8 विमान हुए ध्वस्त, 7 नहीं

मियामी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और पाकिस्तान के बीच शांति स्थापित करने के अपने दावे को दोहराया है और युद्ध के दौरान गिराए गए लड़ाकू विमानों की संख्या सात से बढ़ाकर आठ कर दी है. उन्होंने कहा कि दोनों परमाणु-सशस्त्र देशों ने मई में "शांति स्थापित" तभी की जब ट्रंप ने अपने व्यापार समझौते रद्द करने की धमकी दी थी. उन्होंने  मियामी में अमेरिका व्यापार मंच पर अपने बेतुके दावे को फिर दोहराया. अमेरिका बिजनेस फोरम पर उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच मई वाली तनाव की कहानी दोहराई. लेकिन इस बार ट्विस्ट ये कि उन्होंने लड़ाई में गिराए गए फाइटर जेट्स की संख्या 7 से बढ़ाकर 8 करके लोगों को खूब जोश में अपनी बातें कहीं.  ट्रंप ने अपनी स्पीच में बड़े ही जोश के साथ बताया कि वो भारत-पाक के साथ ट्रेड डील पर बात कर रहे थे. अचानक अखबार में पढ़ा कि दोनों के बीच युद्ध छिड़ गया. "मैंने सुना, 7 प्लेन शूट डाउन हो गए, और आठवां बुरी तरह घायल था. मतलब 8 प्लेन गिरे," ट्रंप ने कहा. उन्होंने जोर देकर कहा कि ये दो न्यूक्लियर नेशन थे, इसलिए मैंने साफ कह दिया- "ट्रेड डील भूल जाओ जब तक शांति न हो." ट्रेड की धमकी ने कैसे बदला खेल? ट्रंप ने आगे बताया कि दोनों देशों ने कहा, "ये ट्रेड से जुड़ा नहीं." लेकिन मैंने साफ ललकारा, "ये सब कुछ से जुड़ा है. तुम न्यूक्लियर पावर हो, युद्ध में रहोगे तो कोई डील नहीं." अगले ही दिन फोन आया- "हम शांति कर चुके." ट्रंप ने तालियां बजवाते हुए कहा, "थैंक यू, अब ट्रेड करते हैं. बिना टैरिफ के ये कभी न होता." उन्होंने इसे अपनी 'पीस थ्रू स्ट्रेंथ' पॉलिसी का हिस्सा बताया. ट्रंप ने ये भी जोड़ा कि उनके दूसरे टर्म में 8 महीनों में 8 युद्ध रोके जिसमें कोसोवो-सेरबिया, कांगो-रवान्डा समेत. भारत-पाक को भी इसमें गिना. लेकिन हकीकत ये है कि भारत ने कभी अमेरिकी दखल माना ही नहीं. भारत ने नकारा, ट्रंप फिर भी अलाप रहे राग भारत ने अमेरिकी राष्ट्रपति के दावे का खंडन किया है और हमेशा कहा कि 10 मई को पाकिस्तानी कमांडरों द्वारा अपने भारतीय समकक्षों से आक्रमण रोकने की विनती करने के बाद युद्धविराम हुआ था. हालांकि, इसके बाद भी ट्रंप अपने अपने दावे को दोहराने से नहीं रुक रहे. वह मई से ही अपना दावा दोहरा रहे हैं कि अमेरिका की मध्यस्थता में लंबी रात की बातचीत के बाद भारत और पाकिस्तान युद्धविराम पर सहमत हुए हैं. रिपोर्टों से पता चलता है कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के अपने दावे को कम से कम 60 बार दोहराया है, जबकि भारत ने लगातार वाशिंगटन के किसी भी हस्तक्षेप से इनकार किया है.