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Pitru Paksha 2026: 27 सितंबर से पहले घर में कर लें ये जरूरी तैयारियां

हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का समय पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर माना जाता है. इस दौरान लोग अपने पितरों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म करते हैं. मान्यता है कि इस अवधि में पूर्वजों का स्मरण करने और जरूरतमंदों को दान देने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है. साल 2026 में पितृ पक्ष की शुरुआत 27 सितंबर से होगी. इसका समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा. हालांकि, 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध किया जाएगा. इसलिए पितृ पक्ष की तैयारियां शुरू करने का यह सही समय है. पितृ पक्ष से पहले घर की करें सफाई पितृ पक्ष शुरू होने से पहले घर की अच्छी तरह सफाई करना शुभ माना जाता है. खासकर पूजा स्थल, रसोई और घर के उन हिस्सों की सफाई करें जहां लंबे समय से सामान जमा है.बेकार और टूटी-फूटी चीजों को हटाकर घर को व्यवस्थित किया जा सकता है. धार्मिक मान्यताओं में साफ-सुथरे वातावरण को पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों के लिए महत्वपूर्ण माना गया है. पूर्वजों की तस्वीरों को करें व्यवस्थित अगर घर में दिवंगत परिजनों की तस्वीरें रखी हैं तो उन्हें साफ करके सम्मानपूर्वक व्यवस्थित कर लें. वास्तु से जुड़ी मान्यताओं में पूर्वजों की तस्वीरों के लिए दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम दिशा का उल्लेख मिलता है. हालांकि, तस्वीरें रखने के मामले में परिवार की परंपरा को प्राथमिकता देना उचित है. तस्वीरों को ऐसी जगह न रखें जहां रोजमर्रा में उनका अनादर हो या उन पर धूल जमा होती रहे. श्राद्ध की तिथि पहले से पता कर लें पितृ पक्ष में श्राद्ध सामान्य कैलेंडर की तारीख देखकर नहीं, बल्कि संबंधित तिथि के अनुसार किया जाता है. इसलिए परिवार के जिस सदस्य का श्राद्ध करना है, उनकी मृत्यु तिथि के अनुसार पहले से श्राद्ध की तिथि तय कर लें.अगर मृत्यु की तिथि मालूम नहीं है तो परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध किया जाता है. 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को है. पूजा और श्राद्ध की सामग्री पहले जुटा लें श्राद्ध के दिन किसी तरह की जल्दबाजी से बचने के लिए जरूरी सामग्री पहले से तैयार रखी जा सकती है. पूजा की सामग्री, तिल, कुश, जल, फूल और भोजन आदि की व्यवस्था परिवार की परंपरा और स्थानीय विधि के अनुसार करें. श्राद्ध की विधि अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में अलग हो सकती है, इसलिए किसी विशेष कर्मकांड को लेकर संशय हो तो जानकार पंडित या परिवार की परंपरा के अनुसार ही आगे बढ़ें. पितरों के नाम से करें दान पितृ पक्ष में दान-पुण्य का भी विशेष महत्व बताया गया है. अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन, वस्त्र या उपयोगी सामान दान कर सकते हैं. धार्मिक परंपराओं में दान को पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का एक माध्यम माना जाता है. इसलिए दिखावे के बजाय सामर्थ्य के अनुसार दान करना बेहतर माना जाता है. घर में रखें शांत और सात्विक माहौल पितृ पक्ष को पूर्वजों के स्मरण और श्रद्धा का समय माना जाता है. इसलिए इस दौरान घर में अनावश्यक विवाद और नकारात्मक माहौल से बचने की कोशिश करें. पूर्वजों को याद करें, परिवार के बड़े-बुजुर्गों का सम्मान करें, जरूरतमंदों की मदद करें. इन बातों को धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ कृतज्ञता और पारिवारिक स्मृति से भी जोड़ा जा सकता है. 2026 में कब से शुरू होगा पितृ पक्ष? 26 सितंबर 2026 को पूर्णिमा श्राद्ध होगा, जबकि 27 सितंबर से प्रतिपदा श्राद्ध के साथ मुख्य पितृ पक्ष शुरू होगा. इसका समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के दिन होगा. इसके तुरंत बाद 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि शुरू होगी.  

Diwali 2026: दिवाली से पहले बनेगा लक्ष्मी नारायण योग, इन राशियों पर खास असर

दिवाली का त्योहार इस साल 8 नवंबर को मनाया जाएगा, लेकिन इससे पहले ग्रहों की स्थिति में भी महत्वपूर्ण बदलाव होने जा रहे हैं. ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, बुध और शुक्र की युति से बनने वाला लक्ष्मी नारायण राजयोग धन, करियर और कारोबार के लिहाज से खास माना जाता है.  इस योग का असर दिवाली के आसपास भी देखने को मिलेगा. कैसे बनता है लक्ष्मी नारायण राजयोग? ज्योतिष में बुध को बुद्धि, वाणी, व्यापार और संचार का कारक माना जाता है, जबकि शुक्र को सुख-सुविधा, वैभव और समृद्धि से जोड़ा जाता है.  जब दोनों ग्रह एक ही राशि में साथ आते हैं तो इसे लक्ष्मी नारायण योग कहा जाता है.  इस बार बुध और शुक्र की युति तुला राशि में बनने जा रही है. ज्योतिषीय गणना के अनुसार, 26 सितंबर 2026 से यह युति बनने वाली है.  अलग-अलग ज्योतिषीय गणनाओं में योग की अवधि को लेकर अंतर मिल सकता है, इसलिए इसके प्रभाव को कुंडली में ग्रहों की स्थिति और भाव के आधार पर देखा जाता है. कुंडली के किस भाव में क्या असर? ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार, लक्ष्मी नारायण योग का फल इस बात पर भी निर्भर करता है कि जन्मकुंडली में यह किस भाव में बन रहा है. पहले भाव में यह आत्मविश्वास और व्यक्तित्व से जुड़ा लाभ दे सकता है.  दूसरे भाव में धन और वाणी से जुड़े परिणाम मिल सकते हैं.  तीसरे भाव में पराक्रम और सामाजिक संपर्क मजबूत होने की मान्यता है. चौथे भाव को सुख-सुविधा और संपत्ति से जोड़ा जाता है, जबकि पांचवें भाव का संबंध शिक्षा, बुद्धि और संतान से माना जाता है.  छठे भाव में यह कर्ज और प्रतिस्पर्धा से जुड़े मामलों में परिणाम दे सकता है. सातवें भाव में साझेदारी और वैवाहिक जीवन, आठवें भाव में अचानक लाभ, नौवें भाव में भाग्य और धर्म, जबकि दसवें भाव में करियर और प्रतिष्ठा से जुड़े परिणाम मिलने की ज्योतिषीय मान्यता है.  ग्यारहवें भाव को आय और लाभ तथा बारहवें भाव को विदेश और खर्च से जोड़ा जाता है. मिथुन राशि मिथुन राशि के जातकों के लिए यह योग करियर और आर्थिक मामलों में सकारात्मक बदलाव के संकेत दे सकता है.  काम में नए अवसर मिल सकते हैं.  वाणी और संवाद कौशल के कारण फायदा मिलने की संभावना है.  अचानक धन लाभ के मौके भी बन सकते हैं. तुला राशि तुला राशि में ही बुध-शुक्र की युति बनने से इस राशि के जातकों के लिए यह समय महत्वपूर्ण माना जा रहा है.  अटका हुआ पैसा मिलने, सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ने और करियर में सकारात्मक बदलाव के अवसर बन सकते हैं.  विदेश से जुड़े काम या यात्रा के योग भी बन सकते हैं. मकर राशि मकर राशि वालों के लिए भी लक्ष्मी नारायण योग आर्थिक मामलों में लाभकारी माना जा रहा है.  आमदनी के नए स्रोत बनने के अवसर मिल सकते हैं.  कारोबार से जुड़े लोगों को नए काम या विस्तार के मौके मिल सकते हैं.  आर्थिक स्थिति पहले की तुलना में बेहतर होने की संभावना है. दिवाली के समय क्यों खास है यह योग? दिवाली को धन और समृद्धि से जुड़ा प्रमुख पर्व माना जाता है.  ऐसे में दिवाली के आसपास बनने वाले ग्रह योगों को ज्योतिष में विशेष महत्व दिया जाता है.  इस बार बुध-शुक्र की युति का समय भी दिवाली के आसपास रहेगा, इसलिए ज्योतिषीय दृष्टि से इसे खास संयोग माना जा रहा है. हालांकि, किसी व्यक्ति पर ग्रहों का प्रभाव उसकी जन्मकुंडली में ग्रहों की स्थिति, भाव और दशा समेत कई बातों पर निर्भर माना जाता है.  इसलिए केवल राशि के आधार पर किसी निश्चित परिणाम का दावा नहीं किया जा सकता.

Pitru Paksha 2026: 27 सितंबर से शुरू होगा पितृ पक्ष, जानें श्राद्ध की पूरी तारीखें

हिंदू धर्म में पितृ पक्ष यानी श्राद्ध पक्ष का समय पूर्वजों के प्रति आदर, श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे पावन काल माना गया है. भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक चलने वाले इन 16 दिनों में पितृलोक से हमारे पूर्वज सूक्ष्म रूप में धरती पर अपने परिजनों के बीच पधारते हैं. साल 2026 में पितृ पक्ष का प्रारंभ 27 सितंबर 2026, रविवार को आश्विन प्रतिपदा श्राद्ध के साथ होने जा रहा है, जो कि 10 अक्टूबर 2026 (शनिवार) को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा. इस बार किसी भी तिथि का क्षय न होने के कारण यह पावन पर्व पूरे 16 दिनों तक श्रद्धा और विधि-विधान के साथ मनाया जाएगा. आइए जानते हैं पितृ पक्ष 2026 की शुरुआत, तर्पण के लिए शुभ मुहूर्त, क्या करना चाहिए और क्या करने से बचना चाहिए. कब है पहला श्राद्ध? प्रतिपदा श्राद्ध (प्रथम तिथि): 27 सितंबर 2026 (रविवार) सर्वपितृ अमावस्या (समापन): 10 अक्टूबर 2026 (शनिवार) 26 सितंबर को क्या है? ज्योतिषियों के मुताबिक, 26 सितंबर को भाद्रपद पूर्णिमा है, जिसे श्राद्ध पूर्णिमा के नाम से नाम से भी जाना जाता है. इस दिन भी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है. लेकिन, असल में पितृ पक्ष की शुरुआत 27 सितंबर यानी रविवार से होगी. श्राद्ध और तर्पण के लिए शुभ मुहूर्त शास्त्रों के अनुसार, पितरों के लिए तर्पण और पिंडदान हमेशा दोपहर के समय ही करना चाहिए. इसके लिए विशेष रूप से कुतप और रोहिणी काल को सर्वश्रेष्ठ माना गया है. कुतप मुहूर्त- दोपहर 11 बजकर 36 मिनट से दोपहर 12 बजकर 24 मिनट तक रोहिणी मुहूर्त- दोपहर 12 बजकर 24 मिनट से दोपहर 1 बजकर 12 मिनट तक अपराह्न काल- दोपहर 1 बजकर 12 मिनट से दोपहर 3 बजकर 36 मिनट तक प्रातः काल सूर्योदय के तुरंत बाद या संध्या काल में श्राद्ध कर्म करना सख्त मना होता है. श्राद्ध पक्ष में क्या करें? – श्राद्ध के दिन ब्राह्मण भोजन कराने से पहले भोजन का कुछ हिस्सा गाय, कुत्ता, कौआ, देव और चींटी के लिए अवश्य निकालें. मान्यता है कि इनके माध्यम से अर्पित किया गया अन्न सीधे हमारे पितरों तक पहुंचता है. – पितरों को जलांजलि देते समय तांबे के पात्र में स्वच्छ जल, थोड़ा सा कच्चा दूध, गंगाजल और काले तिल मिलाएं. तर्पण करते समय दाहिने हाथ की अनामिका उंगली में कुशा धारण करना अनिवार्य होता है. – इन दिनों में जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, जूते-चप्पल और तिल का दान करना अत्यंत फलदायी माना गया है. – तर्पण करते समय हमेशा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल अर्पित करें, क्योंकि दक्षिण दिशा को पितरों की दिशा माना जाता है. पितृ पक्ष में क्या न करें? तामसिक भोजन से दूरी पूरे 16 दिनों तक घर में लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा और बासी भोजन का सेवन न करें. मांगलिक कार्य न करें इस दौरान नए घर का गृह प्रवेश, मुंडन, सगाई या विवाह जैसे शुभ और मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं. नई खरीदारी से बचें सामान्यतः श्राद्ध पक्ष में नए कपड़े, वाहन या प्रॉपर्टी आदि की खरीदारी करने से बचना चाहिए. अतिथि का अनादर न करें द्वार पर आए किसी भी भिक्षुक, असहाय व्यक्ति या पशु-पक्षी को खाली हाथ या भूखा न लौटाएं. शारीरिक संयम पितृ पक्ष के दौरान बाल, दाढ़ी या नाखून काटने से बचना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए.

श्राद्ध पक्ष में 60 साल बाद दुर्लभ संयोग, सर्वपितृ अमावस्या समेत बनेंगे खास योग

उज्जैन   हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व है। पितृपक्ष पितरों की आत्मा की मुक्ति और शांति के लिए भाद्र मास में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से आरम्भ होकर आश्विन मास में कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक चलता है।  इस साल श्राद्ध पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर (शनिवार) को पूर्णिमा श्राद्ध से हो रही है और इसका समापन 10 अक्टूबर  (शनिवार) को सर्वपितृ अमावस्या के दिन होगा।  इस बार पितृपक्ष का समय बहुत ही खास माना जा रहा है क्योंकि इस दौरान बहुत ही दुर्लभ संयोग का निर्माण होने जा रहा है।  16 दिन का रहेगा  श्राद्ध पक्ष इस बार श्राद्ध पक्ष 16 दिन का रहेगा, हालांकि एक दिन दो तिथियां के कारण श्राद्ध निर्धारित कालखंड में किए जाएंगे। ज्योतिष के जानकारों का मानना है कि  ग्रह गोचर और परिभ्रमण की स्थिति के आधार पर इस बार श्राद्ध पक्ष विशेष ग्रहयोग में आ रहा है। 1966 के बाद 2026 में ग्रहयोग की पुनरावृत्ति हो रही है। शनि ग्रह को ज्योतिषीय मान्यता में पितरों का समकारक माना है। इस बार पितृपक्ष की शुरुआत पूर्णिमा तिथि पर शनिवार से और समापन सर्वपितृ अमावस्या तिथि पर भी शनिवार को हो रहा है। इसके साथ बुधादित्य योग और त्रिएकादश के योग बनने की स्थिति बताई गई है। 26 सितंबर से श्राद्ध पक्ष की शुरुआत होगी। उज्जैन में सिद्धवट, रामघाट और शिप्रा नदी के अन्य घाटों पर देशभर से श्रद्धालु पितरों के तर्पण और पिंडदान के लिए पहुंचेंगे।ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस बार करीब 60 साल बाद विशेष ग्रह संयोग बन रहा है। उनका कहना है कि 1966 के बाद 2026 में सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु और शनि की विशेष स्थिति की पुनरावृत्ति हो रही है। इसी के चलते इस बार का 16 दिन का श्राद्ध पक्ष धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष माना जा रहा है। ज्योतिषाचार्य  के अनुसार महालय श्राद्ध की शुरुआत भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा यानी 26 सितंबर से होगी और आश्विन कृष्ण अमावस्या, 10 अक्टूबर तक चलेगी। इस बार श्राद्ध पक्ष की शुरुआत शनिवार से होगी और समापन भी शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या पर होगा। इस दौरान बुधादित्य योग के साथ केंद्र-त्रिकोण और एकादश से जुड़े योग बनने की बात भी ज्योतिषीय गणना में कही गई है। सर्वपितृ अमावस्या पर शनिश्चरी अमावस्या और गजछाया योग 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या होगी। ज्योतिषाचार्य के अनुसार इसी दिन शनिश्चरी अमावस्या और गजछाया योग का संयोग भी बन रहा है। इसे पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और अन्य धार्मिक कर्मों के लिए विशेष माना जा रहा है। ज्योतिषाचार्य के अनुसार सूर्य का कन्या राशि में गोचर पितृ कर्म के लिए विशेष माना जाता है। इसके साथ बुधादित्य योग और अन्य शुभ योग बनने से इस अवधि में किए जाने वाले तर्पण, श्राद्ध, पार्वण श्राद्ध, एकोद्दिष्ट श्राद्ध और तीर्थ श्राद्ध आदि को विशेष फलदायी माना गया है। सिद्धवट, रामघाट और गया कोठा पर होंगे पितृ कर्म उज्जैन में श्राद्ध पक्ष के दौरान सिद्धवट, रामघाट और गया कोठा प्रमुख पितृ तीर्थ रहेंगे। स्कंद पुराण के अवंती खंड में इन स्थानों का पितृ कर्म के संदर्भ में उल्लेख बताया जाता है। इसी मान्यता के चलते श्राद्ध पक्ष में देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु यहां तर्पण, पिंडदान और अन्य कर्मकांड के लिए पहुंचते हैं। रामघाट और सिद्धवट का धार्मिक महत्व प्राचीन धार्मिक नगरी उज्जैन में देशभर से श्रद्धालु सालभर अपने पितरों के तर्पण के लिए शिप्रा नदी के किनारे स्थित रामघाट और सिद्धवट घाट पहुंचते हैं। यहां विधि-विधान से पूजन, तर्पण, पिंडदान और हवन किया जाता है। सिद्धवट घाट पर स्थित प्राचीन वटवृक्ष को माता पार्वती द्वारा स्थापित माना जाता है। स्कंद पुराण में इस स्थान को ‘प्रेत शिला तीर्थ’ कहा गया है। मान्यता है कि यहां तर्पण करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। इसी तरह मोक्षदायिनी और उत्तरवाहिनी शिप्रा नदी के तट पर स्थित रामघाट पर आम दिनों के साथ विशेष अवसरों पर भी हजारों श्रद्धालु अपने पूर्वजों के निमित्त पिंडदान और हवन करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार यहां कर्मकांड करने से पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है। मुंडन संस्कार से होता हैश्राद्ध कर्म पितृपक्ष में हर साल बड़ी संख्या में लोग देश के कोने कोने से पिंण्ड दान के लिए संगम आते हैं। पितृ मुक्ति का प्रथम एवं मुख्य द्वार कहे जाने के कारण संगमनगरी में पिंडदान और श्राद्ध कर्म का विशेष महत्व है।  धर्म शास्त्रों में भगवान विष्णु को मोक्ष के देवता माना जाता है। प्रयाग में भगवान विष्णु बारह भिन्न रूपों में विराजमान हैं। मान्यता है कि त्रिवेणी में भगवान विष्णु बाल मुकुंद स्वरूप में वास करते हैं। प्रयाग को पितृ मुक्ति का पहला और मुख्य द्वार माना जाता है। काशी को मध्य और गया को अंतिम द्वार कहा जाता है। प्रयाग में श्राद्ध कर्म का आरंभ मुंडन संस्कार से होता है। तिथि क्षय के बावजूद 16 श्राद्ध इस बार कुछ पंचांगों में पंचमी और अष्टमी तिथि के क्षय का उल्लेख किया गया है। इसके बावजूद श्राद्ध की संख्या 16 ही रहेगी। ज्योतिषाचार्य के अनुसार धर्मशास्त्रीय परंपरा में एक दिन में समय के अंतर के अनुसार दो तिथियों के श्राद्ध किए जाने का प्रावधान माना जाता है। परंपरा के अनुसार अंतर संभव हालांकि परिवार, गोत्र और शाखा की परंपरा के अनुसार इसमें अंतर हो सकता है। पंचमी और अष्टमी के श्राद्ध को लेकर भी पंचांगों में समय का स्पष्टीकरण दिया गया है। ज्योतिषाचार्य के अनुसार पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और अन्य कर्म परिवार की परंपरा एवं संबंधित तिथि के अनुसार विधि-विधान से किए जाते हैं। इस बार उज्जैन के सिद्धवट, रामघाट और गया कोठा पर श्राद्ध पक्ष के दौरान विशेष भीड़ रहने की संभावना है। किस दिन कौन-सा श्राद्ध 26 सितंबरःपूर्णिमा श्राद्ध 27 सितंबरःप्रतिपदा श्राद्ध 28 सितंबरःद्वितीया श्राद्ध 29 सितंबर :तृतीया, भरणी श्राद्ध 30 सितंबरःचतुर्थी श्राद्ध,मध्यान्ह के बाद पंचमी 01 अक्टूबरः पंचमी श्राद्ध, दोपहर 12.30 बजे के बाद षष्ठी 02 अक्टूबरःसप्तमी श्राद्ध 03 अक्टूबरःअष्टमी श्राद्ध 04 अक्टूबरःनवमी श्राद्ध 05 अक्टूबरःदशमी श्राद्ध 06 अक्टूबरःएकादशी श्राद्ध 07 अक्टूबरःद्वादशी श्राद्ध 08 अक्टूबरःत्रयोदशी श्राद्ध 09 अक्टूबरःचतुर्दशी श्राद्ध 10 अक्टूबरःसर्वपितृ अमावस्या  

आज का राशिफल 25 सितंबर: शिव कृपा से चमकेगी इन राशियों की किस्मत, पढ़ें भविष्यफल

मेष राशि- कुछ गलतफहमियों का सामना भी करना पड़ सकता है। आपको आज अपने बारे में और अपनी प्राथमिकताओं के बारे में बहुत कुछ सीखने में मदद करेगा। मेडिटेशन करें ताकि आप खुश और संतुष्ट रह सकें। वृषभ राशि- अपने पार्टनर को बेहतर तरीके से जानने के लिए साथ में कुछ अच्छा समय बिताना बेहतर होगा। अगर आप अपने रिश्ते को लेकर बहुत गंभीर हैं तो शादी के बारे में सोचने का यह समय शुभ है। मिथुन राशि- अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें। प्रॉपर्टी से जुड़ी कोई अच्छी खबर मिल सकती है। आज का दिन बेहतरीन साबित हो सकता है। बचत करने की कोशिश करें क्योंकि यह आपके वर्तमान कमाई के स्तर को बनाए रखने में मदद करेगा। कर्क राशि– बेवजह की यात्रा से बचें। आज का दिन आपके लिए सकारात्मक रहने वाला है। आपकी आय में वृद्धि होगी। कार्यक्षेत्र में सफलता मिलेगी। प्रेम-संबंधों में मधुरता आएगी साथ ही पार्टनर के साथ वैकेशन पर भी जाने की संभावना है। सिंंह राशि- आपका पार्टनर आपके लिए सरप्राइज डेट प्लान कर सकता है। वहीं, आपको स्वास्थ्य पर ध्यान देने की जरूरत है। प्रॉपर्टी के मसलों में ध्यान दें, हानि हो सकती है। छात्रों के लिए भी ये दिन अच्छा रहने वाला है। कन्या राशि- दिन नयी प्रॉपर्टी खरीदने के आसार नजर आ रहे हैं। छात्रों को मन लगाकर पढ़ाई करने की सलाह दी जाती है। जहां पारिवारिक बंधन मजबूत होंगे वहीं, जीवनसाथी की तलाश में आपको निराशा झेलनी पड़ सकती है। तुला राशि- किसी भी प्रोजेक्ट में निवेश करने से पहले सलाह जरूर लें। आज लव लाइफ में टेंशन का माहौल बन सकता है। आपको करियर में सफलता मिलेगी। साथ ही आपकी आर्थिक स्थिति भी बेहतर रहेगी। वृश्चिक राशि- दिन उतार-चढ़ाव वाला हो सकता है। कॉम्पीटीशन की कमी के चलते आपकी प्रोडक्टिविटी पर भी असर पड़ सकता है। आय में वृद्धि होगी। कार्यक्षेत्र में नए अवसर मिल सकते हैं। धनु राशि- आपको अपने पार्टनर के साथ क्वॉलिटी टाइम बिताने का मौका मिलेगा। आज का दिन उतार- चढ़ाव भरा रहने वाला है। करियर में आपको चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। मकर राशि– अपनी फैमिली मेंबर्स के साथ वक्त बिताएं। आर्थिक स्थिति कमजोर पड़ सकती है। इसलिए सूझ- बूझ के साथ ही निर्णय लें। आपके लिए समय रोमांस से भरपूर रहने वाला है। अपने मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें। कुंभ राशि- प्रॉपर्टी में इन्वेस्ट करना आपके लिए बेहतर साबित हो सकता है। आपको खुद पर ध्यान देना चाहिए। सहपाठियों के साथ मेल-जोल बढ़ाना आपकी प्रोफेशनल लाइफ के लिए बेहतर साबित हो सकता है। मीन राशि- सोच-समझकर फाइनेंशियल डिसीजन लेना आपके लिए बेहतर रहेगा। अपने प्रेम-संबंधों को मजबूत बनाने के लिए पार्टनर से खुलकर बात-चीत करें और उन्हें समय दें। स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने के लिए हेल्दी डाइट लें।

बच्चों का पढ़ाई में लगेगा मन! वास्तु के अनुसार स्टडी रूम में रखें ये खास बातें

बच्चे का मन पढ़ाई में लगे और उसकी एकाग्रता बनी रहे, इसके लिए घर में पढ़ाई का सही वातावरण होना बेहद जरूरी है. वास्तु शास्त्र के अनुसार, स्टडी रूम में रखी चीजें और पढ़ाई करते समय बैठने की दिशा मानसिक क्षमता, याददाश्त और पढ़ाई के परिणामों को प्रभावित कर सकती है. कड़ी मेहनत के बावजूद अगर बच्चों को सही परिणाम नहीं मिलते हैं, तो इसका एक कारण पढ़ाई के कमरे का वास्तु दोष भी हो सकता है. स्टडी टेबल को कमरे की किस दिशा में रखना चाहिए? वास्तु शास्त्र के अनुसार, स्टडी टेबल को दक्षिण-पश्चिम या उत्तर-पूर्व दिशा में रखना शुभ माना जाता है. उत्तर-पूर्व दिशा को ज्ञान और एकाग्रता से जुड़ी दिशा माना जाता है, जबकि दक्षिण-पश्चिम दिशा को स्थिरता से संबंधित माना जाता है. पढ़ाई करते समय किस दिशा में मुंह होना चाहिए? वास्तु शास्त्र के अनुसार, स्टडी टेबल को कमरे में ऐसी स्थिति में रखना चाहिए, ताकि पढ़ते समय बच्चे का मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर हो. उत्तर दिशा को बुध ग्रह से संबंधित माना जाता है. बुध को ज्ञान, बुद्धि और वाणी का कारक माना जाता है. वास्तु मान्यताओं के अनुसार, उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके पढ़ने से एकाग्रता बनाए रखने और पढ़ाई में मन लगाने में मदद मिल सकती है. कुर्सी और बैठने की व्यवस्था कैसी होनी चाहिए?     कुर्सी के पीछे हो ठोस दीवार: पढ़ाई करते समय बच्चे की कुर्सी के पीछे खिड़की या दरवाजा नहीं होना चाहिए. वास्तु के अनुसार, कुर्सी के पीछे ठोस दीवार होने से स्थिरता और आत्मविश्वास का वातावरण बना रहता है.     टेबल को दीवार से सटाकर न रखें: वास्तु मान्यताओं के अनुसार, स्टडी टेबल और दीवार के बीच थोड़ी जगह रखना बेहतर माना जाता है. इससे कमरे में खुलापन बना रहता है और पढ़ाई के लिए आरामदायक माहौल बनता है. कमरे का रंग स्टडी रूम में हल्के रंगों का इस्तेमाल करना चाहिए. आप कमरे में हरा, हल्का नीला, क्रीम या हल्का पीला रंग करवा सकते हैं. वास्तु के अनुसार, इन रंगों को शुभ माना जाता है. मान्यता है कि इन रंगों से कमरे में शांत और सकारात्मक वातावरण बना रहता है. टेबल पर सामान स्टडी टेबल पर केवल जरूरी किताबें और पढ़ाई से जुड़ी चीजें रखें. टेबल पर अनावश्यक सामान जमा न करें और इसे हमेशा साफ व व्यवस्थित रखें. इससे पढ़ाई के दौरान ध्यान भटकने की संभावना कम हो सकती है.

अनंत चतुर्दशी 2026: गणपति विसर्जन का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि जानें

ढोल-ताशों की गूंज, हवा में उड़ता गुलाल और 'अगले बरस तू जल्दी आ' का भावुक जयकारा… दस दिनों तक हमारे घरों और दिलों में खुशियां बिखेरने के बाद हमारे प्यारे बाप्पा की विदाई का समय आ गया है. गणेश उत्सव का यह पावन सफर अनंत चतुर्दशी के दिन बाप्पा के विसर्जन के साथ पूरा होता है. यह दिन केवल विघ्नहर्ता को विदाई देने का ही नहीं, बल्कि भगवान श्री हरि विष्णु के 'अनंत' रूपों की भक्ति में लीन होने का भी महापर्व है. इस बार अनंत चतुर्दशी पर माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की असीम कृपा बरसाने वाला बेहद दुर्लभ और शुभ संयोग बन रहा है. आइए जानते हैं गणपति विसर्जन के शुभ मुहूर्त, पूजा की सही विधि और इस दिन से जुड़े खास नियम. विसर्जन और पूजन के सबसे सटीक शुभ मुहूर्त यदि आप बाप्पा का विसर्जन और अनंत भगवान की पूजा शास्त्रों के अनुसार शुभ समय पर करना चाहते हैं, तो पंचांग के अनुसार ये समय सबसे उत्तम रहेंगे. प्रातः काल का शुभ मुहूर्त: सुबह 06:12 बजे से सुबह 10:42 बजे तक अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:48 बजे से दोपहर 12:36 बजे तक चर एवं लाभ मुहूर्त: दोपहर 12:15 बजे से दोपहर 03:18 बजे तक अनंत सूत्र बांधने और मुख्य पूजा संपन्न करने के लिए सुबह 06:12 बजे से दोपहर 12:36 बजे तक का समय सर्वश्रेष्ठ फल देने वाला रहेगा. अनंत चतुर्दशी पर बन रहे हैं दुर्लभ संयोग इस वर्ष अनंत चतुर्दशी की तिथि शुक्रवार को पड़ रही है. धार्मिक दृष्टिकोण से शुक्रवार का दिन धन-वैभव की देवी मां लक्ष्मी को समर्पित है, ऐसे में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का एक साथ पूजन भक्तों के लिए अत्यंत फलदायी माना जा रहा है. इसके अलावा, इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग का एक साथ निर्माण हो रहा है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इन महायोगों में किया गया कोई भी धार्मिक कार्य, पूजा-अर्चना और व्रत अक्षय पुण्य प्रदान करता है और जीवन से दरिद्रता का नाश करता है. गणपति विसर्जन की सरल विधि बाप्पा को घर से विदा करते समय इस बात का ध्यान रखें कि जिस भक्ति और उत्साह से आप उन्हें लाए थे, उसी सम्मान के साथ उन्हें विदा भी करें. – सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें. पूजा स्थल को साफ कर बाप्पा का जल से अभिषेक करें. – गणेश जी को चंदन का तिलक लगाएं, लाल/पीले फूल और दुर्वा अर्पित करें. धूप-दीप जलाकर उनकी आरती करें और मोदक, लड्डू व फलों का भोग लगाएं. – विसर्जन से पहले हाथ जोड़कर अनजाने में हुई गलतियों के लिए बाप्पा से क्षमा मांगें और अगले साल दोबापा आने का निमंत्रण दें. – जयकारों के साथ बाप्पा की प्रतिमा को किसी पवित्र नदी, तालाब या घर में ही किसी स्वच्छ जल के पात्र में आदरपूर्वक विसर्जित करें. कैसे करें भगवान अनंत की पूजा? – सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और पीले वस्त्र धारण करें. इसके बाद व्रत का संकल्प लें. एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें. – रेशम या सूत के धागे को हल्दी या कुमकुम में रंगकर उसमें 14 गांठें लगाएं. यह 14 गांठें चौदह लोकों (जैसे भू, भुवः, स्वः, पाताल आदि) की प्रतीक मानी जाती हैं. पूजन व कथा इस रक्षा सूत्र को भगवान के चरणों में रखें. उन्हें अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और विशेष रूप से मालपुए या पंचामृत का भोग लगाएं. इसके बाद अनंत चतुर्दशी की पौराणिक व्रत कथा सुनें और आरती करें. अनंत सूत्र धारण करने के जरूरी नियम – पुरुष इस रक्षा सूत्र को अपनी दाहिनी (Right) भुजा में बांधें. – महिलाएं इसे अपनी बाईं (Left) भुजा में धारण करें.

चाणक्य नीति: ये 5 बातें भूलकर भी किसी से शेयर न करें, वरना बढ़ सकती हैं परेशानियां

: हर बात हर किसी से साझा करना हमेशा समझदारी नहीं होती. कई बार हम भरोसे में आकर अपनी निजी बातें, परिवार की परेशानियां या अपनी योजनाएं दूसरों को बता देते हैं. बाद में यही जानकारी हमारे लिए परेशानी का कारण बन सकती है. आचार्य चाणक्य ने भी अपनी नीतियों में गोपनीयता और सही समय पर बोलने के महत्व पर जोर दिया है. चाणक्य नीति के 14वें अध्याय के 17वें श्लोक में ऐसी पांच बातों का उल्लेख मिलता है जिन्हें बुद्धिमान व्यक्ति को सार्वजनिक नहीं करना चाहिए. 1. अपनी बनाई या कारगर औषधि की जानकारी चाणक्य नीति में ऐसी औषधि या उपचार के बारे में हर किसी को बताने से बचने की बात कही गई है, जिसे व्यक्ति ने स्वयं तैयार किया हो और जिससे उसे लाभ मिला हो. इसका व्यापक अर्थ अपनी उपयोगी जानकारी और अनुभव को बिना सोचे-समझे सार्वजनिक करने से भी जोड़ा जा सकता है. आज के समय में भी किसी व्यक्तिगत उपचार या नुस्खे को दूसरों पर आजमाने से पहले सावधानी जरूरी है. हर व्यक्ति की स्थिति अलग हो सकती है, इसलिए किसी भी स्वास्थ्य संबंधी उपाय को डॉक्टर की सलाह के बिना अपनाना उचित नहीं है. 2. अपने धर्म-कर्म और पुण्य का दिखावा न करें चाणक्य के अनुसार व्यक्ति को अपने धार्मिक कार्यों और पुण्य का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए. पूजा-पाठ, दान या किसी जरूरतमंद की मदद करने के बाद उसका बार-बार जिक्र करके प्रशंसा पाने की कोशिश करना उचित नहीं माना गया है. धार्मिक दृष्टि से भी दान और सेवा का महत्व निस्वार्थ भाव से किए जाने में माना जाता है. इसलिए अगर आपने किसी की मदद की है या कोई धार्मिक कार्य किया है, तो उसे हर जगह बताने के बजाय अपने तक रखना बेहतर माना गया है. 3. घर के झगड़े और पारिवारिक परेशानियां परिवार में होने वाले मतभेद और घरेलू परेशानियां निजी विषय होते हैं. चाणक्य नीति में घर के दोष और कलह को बाहरी लोगों के सामने उजागर न करने की सलाह दी गई है. हर व्यक्ति आपके परिवार की स्थिति को समझे या आपकी समस्या का सही समाधान बताए, यह जरूरी नहीं है. इसलिए परिवार से जुड़ी संवेदनशील बातों को साझा करने से पहले यह देखना जरूरी है कि सामने वाला व्यक्ति कितना भरोसेमंद है और उसे यह जानकारी देना वास्तव में जरूरी है या नहीं. 4. पति-पत्नी की निजी बातें चाणक्य नीति में दांपत्य जीवन की निजी बातों को भी दूसरों से साझा न करने की सीख मिलती है. पति-पत्नी के बीच होने वाली बातचीत, निजी मतभेद या व्यक्तिगत संबंधों की जानकारी बाहर बताने से रिश्ते की निजता प्रभावित हो सकती है. किसी रिश्ते में समस्या हो तो हर व्यक्ति से चर्चा करने के बजाय किसी भरोसेमंद और समझदार व्यक्ति या जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से सलाह लेना अधिक उचित हो सकता है. 5. खराब भोजन और दूसरों की निंदा चाणक्य नीति में खराब या ठीक से न पके भोजन और किसी व्यक्ति के बारे में सुनी गई निंदात्मक बातों को आगे फैलाने से भी बचने की बात कही गई है. किसी के बारे में सिर्फ सुनी-सुनाई बात को सच मानकर दूसरों तक पहुंचाने से विवाद बढ़ सकता है और किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान हो सकता है. इसलिए किसी बात को आगे बढ़ाने से पहले उसकी सच्चाई और जरूरत पर विचार करना चाहिए. चाणक्य की नीति में मौन का भी है महत्व चाणक्य ने सही समय पर बोलने को भी महत्वपूर्ण माना है. उनकी नीति में कोयल का उदाहरण दिया गया है, जो उचित समय आने तक शांत रहती है और मौसम आने पर ही अपनी आवाज से वातावरण को गुंजायमान करती है. इससे यह सीख ली जाती है कि हर बात तुरंत कहना जरूरी नहीं है. किसी भी बात को साझा करने से पहले यह देखना चाहिए कि सामने वाला कौन है, जानकारी कितनी निजी है और उसे बताना वास्तव में जरूरी है या नहीं. आज के समय में क्यों जरूरी है ये सीख? आज सोशल मीडिया के दौर में निजी जानकारी साझा करना पहले से कहीं आसान हो गया है. परिवार की बातें, आर्थिक स्थिति, व्यक्तिगत रिश्ते और भविष्य की योजनाएं लोग कई बार सार्वजनिक मंचों पर भी साझा कर देते हैं. ऐसे में चाणक्य की यह सीख गोपनीयता और सोच-समझकर बोलने के महत्व की याद दिलाती है. हालांकि, हर परिस्थिति अलग होती है. किसी गंभीर पारिवारिक, कानूनी या स्वास्थ्य संबंधी समस्या में जरूरी जानकारी भरोसेमंद व्यक्ति या संबंधित विशेषज्ञ से साझा करना जरूरी हो सकता है.

सितंबर में बनेंगे 2 बड़े राजयोग, इन 4 राशियों की चमकेगी किस्मत!

ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों की चाल और उनके गोचर का मानव जीवन व सभी 12 राशियों पर गहरा प्रभाव पड़ता है. सितंबर का महीना ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति के लिहाज से बेहद खास रहने वाला है. बुद्धि, वाणी, व्यापार और संचार के कारक ग्रह बुध का गोचर कई राशियों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने जा रहा है . वर्तमान में बुध अपनी उच्च राशि कन्या में विराजमान हैं, जहां 26 सितंबर तक भद्र महापुरुष राजयोग का निर्माण हो रहा है. इसके बाद बुध तुला राशि में प्रवेश करेंगे, जहां पहले से ही सुख-सुविधा, धन और ऐश्वर्य के दाता शुक्र विराजमान हैं. बुध और शुक्र की इस युति से तुला राशि में अत्यंत शुभ लक्ष्मी नारायण राजयोग का निर्माण होगा. इन दो बड़े राजयोगों के बनने से किन राशियों के दिन बहुरेंगे, किसे मिलेगा छप्परफाड़ लाभ, आइए जानते हैं विस्तार से . भद्र राजयोग और लक्ष्मी नारायण राजयोग का महत्व भद्र महापुरुष राजयोग: जब बुध ग्रह अपनी स्वराशि (मिथुन या कन्या) में जन्म कुंडली के केंद्र भाव (1, 4, 7 या 10वें घर) में स्थित होते हैं, तब भद्र राजयोग बनता है. यह योग व्यक्ति को तीव्र बुद्धि, उत्कृष्ट संवाद शैली, तेज निर्णय क्षमता और जबरदस्त व्यावसायिक सफलता प्रदान करता है . लक्ष्मी नारायण राजयोग: जब कुंडली या गोचर में बुध और शुक्र की युति होती है, तो यह योग बनता है. इसमें बुध (बुद्धि, करियर, संचार) और शुक्र (धन, सुख-सुविधा, कला और ऐशोआराम) के मिले-जुले शुभ फल प्राप्त होते हैं. यह योग आर्थिक संपन्नता और भौतिक सुखों में भारी वृद्धि करता है . किन राशियों पर बरसेगी इन राजयोगों की कृपा? 1. कन्या राशि (Kanya Rashi) कन्या राशि वालों के लिए यह समय किसी वरदान से कम नहीं है. बुध का आपकी ही राशि में रहना और भद्र राजयोग का प्रभाव आपके आत्मविश्वास को सातवें आसमान पर रखेगा . करियर और बिजनेस: व्यापार में नए और बड़े प्रोजेक्ट सफल होंगे. अटका हुआ धन प्राप्त हो सकता है . लाभ: पैतृक संपत्ति से लाभ मिलने के प्रबल योग हैं. नौकरीपेशा लोगों को कार्यस्थल पर मान-सम्मान मिलेगा . 2. कर्क राशि (Kark Rashi) कर्क राशि के जातकों के लिए ग्रहों की यह स्थिति अचानक धन लाभ के द्वार खोलेगी . आर्थिक स्थिति: आय (Incomes) में अचानक वृद्धि होने के योग हैं . बैंक बैलेंस मजबूत होगा . जीवन शैली: पर्सनल लाइफ में खुशियां आएंगी . हालांकि, इस दौरान आपका झुकाव आध्यात्मिकता (Spiritual side) की तरफ भी बढ़ सकता है, जिससे मानसिक शांति मिलेगी . 3. मकर राशि (Makar Rashi) मकर राशि के जातकों के लिए यह समय करियर और कारोबार के लिहाज से बेहद गोल्डन साबित होगा . नौकरी व प्रमोशन: यदि आप नौकरी करते हैं, तो प्रमोशन या सैलरी में बंपर इंक्रीमेंट (Salary Increment) मिलने की पूरी संभावना है . व्यापार: बिजनेस का दायरा बढ़ेगा और यदि आप कहीं निवेश (Investment) करने की सोच रहे हैं, तो भविष्य में इसके शानदार रिटर्न मिलेंगे . 4. मीन राशि (Meen Rashi) मीन राशि के जातकों के लिए आने वाला समय आर्थिक रूप से बेहद मजबूत रहने वाला है . धन लाभ: आर्थिक स्थिति में काफी सुधार देखने को मिलेगा . करियर: करियर में नई ऊंचाइयां छूने का अवसर मिलेगा . सहकर्मियों और उच्च अधिकारियों का पूरा सहयोग प्राप्त होगा .

पितृ पक्ष 2026: महाभरणी, मातृ नवमी और सर्वपितृ अमावस्या का खास महत्व, जानें पूरी तारीखें

 पितृ पक्ष को हिंदू धर्म में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का समय माना जाता है. इन दिनों लोग अपने दिवंगत परिजनों को याद करते हैं और उनकी आत्मिक शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान जैसे कर्म करते हैं. पितृ पक्ष की हर तिथि का अपना महत्व है, क्योंकि सामान्य तौर पर जिस तिथि को किसी पूर्वज का निधन हुआ हो, उसी तिथि पर उनका श्राद्ध किया जाता है. हालांकि इस पूरे पक्ष में तीन तिथियां ऐसी मानी जाती हैं, जिनका महत्व खास तौर पर बताया गया है. महाभरणी श्राद्ध पितृ पक्ष की खास तिथियों में भरणी श्राद्ध का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. इसे कई जगह महाभरणी श्राद्ध भी कहा जाता है. भरणी नक्षत्र से जुड़ा होने के कारण इस श्राद्ध का अपना विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है. परंपराओं के अनुसार, किसी परिजन की मृत्यु के बाद एक वर्ष पूरा होने पर भरणी श्राद्ध करने की परंपरा कई परिवारों में है. वहीं अविवाहित व्यक्ति की मृत्यु होने पर भी भरणी श्राद्ध को विशेष माना जाता है. हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में इसके नियमों में अंतरदेखने को मिल सकता है. 2026 में महाभरणी श्राद्ध 29 सितंबर को पड़ेगा. इस दिन तर्पण और श्राद्ध कर्म करने की परंपरा है. मातृ नवमी पितृ पक्ष की नवमी तिथि को मातृ नवमी कहा जाता है. यह दिन विशेष रूप से परिवार की दिवंगत महिलाओं और मातृ पक्ष के पूर्वजों को समर्पित माना जाता है. इस दिन मां, दादी, नानी या परिवार की अन्य दिवंगत महिला सदस्यों के लिए श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है. यही वजह है कि इसे मातृ श्राद्ध भी कहा जाता है. अगर किसी महिला पूर्वज की मृत्यु तिथि को लेकर परिवार में स्पष्ट जानकारी नहीं है, तो कई परंपराओं में नवमी तिथि को उनके लिए श्राद्ध करने की मान्यता मिलती है. 2026 में मातृ नवमी 4 अक्टूबर को होगी. इस दिन पूर्वज महिलाओं को याद करके उनकी स्मृति में दान-पुण्य और श्राद्ध कर्म किया जा सकता है. सर्वपितृ अमावस्या पितृ पक्ष की सभी तिथियों में सर्वपितृ अमावस्या को सबसे महत्वपूर्ण दिनों में गिना जाता है. यह पितृ पक्ष का अंतिम दिन होता है और इसे महालय अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन उन सभी पितरों के लिए श्राद्ध किया जा सकता है जिनकी मृत्यु तिथि परिवार को मालूम नहीं है. इसके अलावा यदि किसी कारण से किसी पूर्वज का निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाया हो, तो भी परंपरा के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या को उनके लिए कर्म किया जाता है. 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को पड़ेगी. इसे पितृ पक्ष का समापन दिवस माना जाता है. क्या सिर्फ इन्हीं 3 दिनों में श्राद्ध करना चाहिए? ऐसा नहीं है. पितृ पक्ष की हर तिथि महत्वपूर्ण होती है. सामान्य नियम के अनुसार जिस तिथि को किसी व्यक्ति का निधन हुआ हो, पितृ पक्ष में उसी तिथि पर उसका श्राद्ध किया जाता है. उदाहरण के लिए अगर किसी पूर्वज की मृत्यु कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुई थी, तो पितृ पक्ष की अष्टमी पर उनका श्राद्ध किया जाता है. तीन तिथियों को विशेष बताने का कारण यह है कि इनके साथ कुछ खास परंपराएं और मान्यताएं जुड़ी हुई हैं. इसलिए इनके बारे में जानकारी रखना उपयोगी माना जाता है. अगर मृत्यु की तिथि याद न हो तो क्या करें? कई परिवारों में पुरानी पीढ़ियों की मृत्यु की सही तिथि की जानकारी नहीं होती. ऐसी स्थिति में चिंता करने की जरूरत नहीं मानी जाती. धार्मिक परंपरा में सर्वपितृ अमावस्या को ज्ञात और अज्ञात पितरों के लिए श्राद्ध करने का विशेष अवसर माना गया है. इस दिन परिवार अपने उन सभी पूर्वजों को याद कर सकता है जिनकी मृत्यु तिथि उपलब्ध नहीं है. तर्पण, पिंडदान, भोजन और दान जैसे कर्म अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार किए जाते हैं. 2026 पितृपक्ष का पूरा कैलेंडर अब देख लें एक नजर में पूर्णिमा श्राद्धा- 26 सितंबर 2026, शनिवार प्रतिपदा तिथि श्राद्ध- 27 सितंबर 2026, रविवार द्वितीया श्राद्ध- 28 सितंबर 2026, सोमवार तृतीया श्राद्ध- 29 सितंबर 2026, मंगलवार चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध- 30 सितंबर 2026, बुधवार षष्ठी तिथि का श्राद्ध- 1 अक्टूबर 2026, गुरुवार सप्तमी तिथि का श्राद्ध- 2 अक्टूबर 2026, शुक्रवार अष्टमी तिथि का श्राद्ध- 3 अक्टूबर 2026, शनिवार नवमी तिथि का श्राद्ध- 4 अक्टूबर 2026, रविवार दशमी तिथि का श्राद्ध- 5 अक्टूबर 2026, सोमवार एकादशी तिथि का श्राद्ध- 6 अक्टूबर 2026, मंगलवार द्वादशी तिथि का श्राद्ध- 7 अक्टूबर 2026, बुधवार मघा तिथि का श्राद्ध- 7 अक्टूबर 2026, बुधवार त्रयोदशी तिथि का श्राद्ध- 8 अक्टूबर 2026, गुरुवार चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध- 9 अक्टूबर 2026, शुक्रवार सर्वपितृ अमावस्या-10 अक्टूबर 2026, शनिवार