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चीनी लग्जरी कार ब्रांड DENZA की भारत में एंट्री, जल्द लॉन्च होंगी प्रीमियम कारें

 नई दिल्ली भारतीय बाजार में जल्द ही हमें एक नया कार ब्रांड देखने को मिलेगा. इस कार ब्रांड की एंट्री कन्फर्म हो गई है. वैसे ये एक मौजूदा कार ब्रांड का सब-ब्रांड होगा. हम बात कर रहे हैं डेंजा (Denza) की, जो जल्द ही भारत में अपनी पहली कार लॉन्च करेगा. ये बीवाईडी (BYD) का लग्जरी ब्रांड है।  कंपनी ने अपना पहला टीजर जारी कर भारत में एंट्री को कन्फर्म कर दिया है. वैसे कंपनी किस कार को अपनी एंट्री के लिए चुनेगी ये कन्फर्म नहीं है. लेकिन बीवाईडी डेंजा के दो मॉडल्स की चर्चा काफी ज्यादा हो रही है. इसमें से एक एमपीवी होगी, जबकि दूसरा हाई परफॉर्मेंस इलेक्ट्रिक फास्टबैक होगी।  डेंजा डी9 (Denza D9) लग्जरी इलेक्ट्रिक एमपीवी और डेंजा जेड 9 जीटी (Denza Z9 GT) को कंपनी शुरुआत में लॉन्च कर सकती है. दोनों ही कारें सीबीयू (कंप्लीट बिल्ट अप यूनिट) रूप में आएंगी और इन्हें डेंजा के एक्सक्लूसिव शोरूम से बेचा जाएगा. ये गाड़ियां बीवाईडी की मौजूदा रेंज से ज्यादा कीमत पर आएंगी और ज्यादा प्रीमियम एक्सपीरियंस ऑफर करेंगी।  डेंजा डी9 में क्या होगा खास?  टीजर में डेंजा ने अपनी किसी भी कार को टीज नहीं किया है. ना ही कंपनी ने ये बताया है कि उनकी पहली कार कब लॉन्च होगी. डेंजा डी9 की बात करें, तो ये एक प्रीमियम 7-सीटर एमपीवी होगी, जिसकी सीधा मुकाबला एमजी एम9, मर्सिडीज बेंज वी-क्लास, टोयोटा वेलफायर और लेक्सस एलएम से होगा।  कार के डायमेंशन की बात करें, तो डी9 की लंबाई 5250 एमएम, चौड़ाई 1960 एमएम और ऊंचाई 1920 एमएम होगी. कार का व्हीलबेस 3110 एमएम होगा. एक्सटीरियर की बात करें, तो ये कार मॉडर्न और एलिगेंट डिजाइन के साथ आएगी. इसमें मोशन फ्रंट ग्रिल, फुल विडथ टेल लाइट्स, पावर्ड बायडायरेक्शनल स्लाइडिंग डोर्स, सॉफ्ट क्लोजिंग डोर्स, एक बड़ा पैनोरोमिक सनरूफ और 18 इंच के एलॉय व्हील्स मिलेंगे।  इंटीरियर की बात करें, तो कार में 15.9 इंच का सेंट्रल टचस्क्रीन, 10.25 इंच का डिजिटल इंस्ट्रूमेंट क्लस्टर, पैंसेजर डिस्प्ले और ऑपरेशनल रियर एंटरटेनमेंट स्क्रीन मिलेगी. कार में 103 से 115kWh की बैटरी मिल सकती है, जो 800 किलोमीटर तक की क्लेम्ड रेंज के साथ आएगी।  डेंजा जेड9 जीटी में क्या होगा?  ये एक 5-सीटर कार होगी, जिसकी लंबाई 5195 एमएम होगी. कार की चौड़ाई 1990 एमएम और ऊंचाई 1490 एमएम होगी. इसमें 3125 एमएम का व्हीलबेस मिलेगा. ये कार वुल्फगैंग एगर डिजाइन को फॉलो करेगी. डेंजा जेड9 जीटी में 17.3 इंच का फ्लोटिंग टचस्क्रीन और 13.2 इंज का डुअल डिस्प्ले मिलेगा।  इस कार में हाई परफॉर्मेंस ट्रिपल मोटर सेटअप मिलेगा. इसमें 100 से 122.5kWh की बैटरी मिल सकती है. इसमें 850kW तक की पावर और 1100 एनएम तक का टॉर्क मिलेगा. कार की टॉप स्पीड 270 किलोमीटर प्रति घंटे की होगी, जबकि 0 से 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार पकड़ने में इसे 2.7 से 3.4 सेकंड का वक्त लगेगा। 

शेयर मार्केट में 8 हफ्ते से गिरावट जारी, निवेशकों के ₹26 लाख करोड़ डूबे

मुंबई  भारतीय शेयर बाजार में गिरावट का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों इंडेक्स ने लगातार 8वें हफ्ते गिरावट दर्ज की है। यह करीब 25 वर्षों में सबसे लंबा गिरावट का दौर है। इस गिरावट के चलते 8 हफ्ते में निवेशकों के करीब ₹26 लाख करोड़ डूब गए। यह लगातार गिरावट 2020 में कोविड-19 क्रैश और 2008 के ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस के दौर से भी लंबी है। अकेले इस सप्ताह निफ्टी में करीब 3.1 प्रतिशत और सेंसेक्स में करीब 2.7 प्रतिशत की गिरावट आई है। सितंबर में भी सेंसेक्स-निफ्टी में करीब 6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई थी। बता दें आज 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के अवसर पर घरेलू शेयर बाजार बंद है। इससे पहले 1 अक्टूबर को सेंसेक्स 570 अंक टूटकर 71,909 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 198 अंक गिरकर 22,421 पर। बाजार में गिरावट कितनी बड़ी? आठ हफ्तों की लगातार गिरावट में निफ्टी करीब 8.7 प्रतिशत और सेंसेक्स करीब 8.4 प्रतिशत नीचे आ चुका है। अंकों के लिहाज से देखें तो सेंसेक्स पिछले आठ हफ्तों में 6,590 अंक टूटा। जबकि, निफ्टी में 2,149 अंक की गिरावट आई। इस दौरान बीएसई पर लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैप 26 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा घटा और 467 लाख करोड़ रुपये के नीचे आ गया। 4 दिन में FII ने निकाले करीब 35 हजार करोड़ बाजार पर सबसे बड़ा दबाव विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली का है। 1 अक्टूबर को विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने भारतीय शेयरों में करीब 9,484 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली की। इससे पिछले चार ट्रेडिंग सेशन में उनकी कुल बिकवाली करीब 34,965 करोड़ रुपये पहुंच गई। इसके उलट घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने 1 अक्टूबर को करीब 10,042 करोड़ रुपये की खरीदारी कर बाजार को सहारा देने की कोशिश की। सितंबर में भी विदेशी निवेशकों का रुख भारतीय बाजार के खिलाफ रहा। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक सितंबर में FPI की इक्विटी बिकवाली करीब 46 हजार करोड़ रुपये रही। क्यों बेच रहे हैं विदेशी निवेशक? अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेज उछाल: विदेशी निवेशकों की बिकवाली के पीछे एक साथ कई वैश्विक संकेत काम कर रहे हैं। पहला कारण अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेज उछाल है। अमेरिकी 10 साल के ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड 5.33-5.34 प्रतिशत के आसपास पहुंच गई है। यह 2002 के बाद का ऊंचा स्तर है। 30 साल की यील्ड भी करीब 5.68 प्रतिशत तक पहुंची। बॉन्ड यील्ड क्यों है शेयर बाजार के लिए खतरा? बॉन्ड यील्ड और बॉन्ड की कीमत उलटी दिशा में चलते हैं। यील्ड बढ़ने का मतलब है कि बॉन्ड की कीमत गिर रही है और निवेशक बॉन्ड बेच रहे हैं। जब सरकारी बॉन्ड पर ब्याज दर ऊंची हो जाती है, तो निवेशकों के लिए कम जोखिम वाला डेट मार्केट ज्यादा आकर्षक हो जाता है। इससे शेयर बाजार जैसे जोखिम वाले निवेश पर दबाव बढ़ता है। बाजार पर कच्चे तेल का भी दबाव कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भी भारतीय बाजार के लिए चिंता बढ़ा रही है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में महंगा तेल आयात बिल, महंगाई और चालू खाते पर दबाव बढ़ा सकता है। 1 अक्टूबर को ग्लेाबल मार्केट में ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर रहा। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और सप्लाई को लेकर चिंता ने कीमतों को बढ़ा दिया है। कमजोर रुपया भी कर रहा परेशान डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी ने भी बाजार की चिंता बढ़ाई है। 1 अक्टूबर को रुपया करीब 0.5 प्रतिशत कमजोर होकर 96.31 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ। यह दो महीने का निचला स्तर है। कमजोर रुपया विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय एसेट्स से मिलने वाले डॉलर रिटर्न को प्रभावित कर सकता है। साथ ही महंगे तेल और कमजोर रुपये का असर घरेलू महंगाई पर भी पड़ सकता है। अब बाजार के लिए सबसे बड़े संकेत क्या होंगे? आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर मुख्य रूप से 4 चीजों पर रहेगी। पहला, FII की बिकवाली रुकती है या नहीं। दूसरा, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड किस दिशा में जाती है? तीसरा, कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर के आसपास रहती है या घटती है और चौथा, रुपया डॉलर के मुकाबले 96 के स्तर के आसपास टिकता है या और कमजोर होता है?

Mahindra की इलेक्ट्रिक कारों का जलवा, 1 लाख EV बिक्री का आंकड़ा पार; Tata को चुनौती

मुंबई  महिंद्रा की गाड़ियों का हिसाब-किताब आया है और आंकड़े बता रहे हैं कि SUV के बाजार में कंपनी की पकड़ और मजबूत हुई है. सितंबर में जब कई कंपनियां बिक्री के आंकड़ों के साथ माथापच्ची कर रही थीं, महिंद्रा ने 64 हजार से ज्यादा SUV बेचकर सालाना बिक्री में 14 फीसदी की छलांग लगा दी. ऊपर से कुल वाहन बिक्री भी 15 फीसदी बढ़ी और इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री ने 1 लाख यूनिट का आंकड़ा पार कर लिया।   कंपनी द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, महिंद्रा ने सितंबर में घरेलू बाजार में कुल 64,092 यूटिलिटी व्हीकल यानी SUV बेचीं. पिछले साल सितंबर में कंपनी की SUV बिक्री 56,233 यूनिट रही थी. इस तरह सालाना आधार पर SUV बिक्री में 14 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. अगर एक्सपोर्ट को भी शामिल किया जाए तो सितंबर 2026 में महिंद्रा ने कुल 1,14,874 वाहन बेचे. यह आंकड़ा पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले 15 फीसदी ज्यादा है।  महिंद्रा के मुताबिक, अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच भी SUV बिक्री में अच्छी तेजी देखने को मिली है. इस 6 महीने में कंपनी ने घरेलू बाजार में 3,58,142 यूटिलिटी व्हीकल बेचे, जबकि पिछले साल इसी समय के दौरान यह आंकड़ा 2,97,570 यूनिट था. यानी साल-दर-साल बिक्री में 20 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई।  कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में भी ग्रोथ महिंद्रा के कमर्शियल व्हीकल कारोबार ने भी सितंबर में बेहतर प्रदर्शन किया. 2 टन से कम वजन वाले लाइट कमर्शियल व्हीकल की घरेलू बिक्री सितंबर 2026 में 4,044 यूनिट रही. पिछले साल सितंबर में कंपनी ने इस कैटेगरी में 3,386 यूनिट बेची थीं. इस तरह बिक्री में 19 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. वहीं, 2 टन से 3.5 टन वाले लाइट कमर्शियल व्हीकल की बिक्री 13 फीसदी बढ़कर 26,376 यूनिट हो गई. सितंबर 2025 में इस कैटेगरी में कंपनी की बिक्री 23,342 यूनिट रही थी।  थ्री-व्हीलर की बिक्री में 26% उछाल महिंद्रा के थ्री-व्हीलर्स  ने भी तगड़ी रफ्तार पकड़ी है. इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर समेत कंपनी ने कुल 16,343 यूनिट वाहनों की बिक्री की है. जो पिछले साल सितंबर में बेचे गए 13,017 यूनिट के मुकाबले 26 फीसदी ज्यादा है. अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच थ्री-व्हीलर की बिक्री 82,058 यूनिट तक पहुंच गई है. पिछले साल इन्हीं 6 महीनों के दौरान कंपनी की थ्री-व्हीलर बिक्री में 53 फीसदी का इजाफा हुआ है।  बेची 1 लाख इलेक्ट्रिक कारें महिंद्रा के ऑटोमोटिव बिजनेस के प्रेसिडेंट डॉ. वेलुसामी आर. ने सितंबर सेल्स पर कहा कि कंपनी की SUV बिक्री सालाना आधार पर 14 फीसदी बढ़ी है, जबकि कुल वाहन बिक्री में 15 फीसदी की ग्रोथ दर्ज की गई है. उन्होंने यह भी बताया कि महिंद्रा ने अपनी इलेक्ट्रिक ओरिजिन एसयूवी की बिक्री का 1 लाख यूनिट का आंकड़ा पार कर लिया है. कंपनी के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है।  डोमेस्टिक मार्केट में शानदार परफॉर्मेंस के बीच महिंद्रा के एक्सपोर्ट में सितंबर में थोड़ी गिरावट आई. कंपनी ने सितंबर 2026 में 4,019 यूनिट का एक्सपोर्ट किया, जो सितंबर 2025 में दर्ज 4,320 यूनिट के मुकाबले 7 फीसदी कम है. हालांकि, छह महीने के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर काफी अलग है. अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच महिंद्रा ने कुल 30,031 यूनिट का एक्सपोर्ट किया. पिछले साल इसी दौरान कंपनी का एक्सपोर्ट 20,303 यूनिट था. इस तरह 6 महीने में कंपनी का एक्सपोर्ट 48 फीसदी बढ़ा है।  TATA को चुनौती इलेक्ट्रिक व्हीकल सेगमेंट का लीडर टाटा मोटर्स है. लेकिन महिंद्रा की इस रफ्तार ने टाटा को कड़ी चुनौती दी है. बीते अगस्त में भी महिंद्रा ने इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री के मामले में टाटा को पछाड़ा था. धीमे-धीमे महिंद्रा भी अपना व्हीकल पोर्टफोलियो बढ़ा रहा है. फिलहाल कंपनी चार इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री कर रही है. इनमें XUV 3XO EV की कीमत ₹13.89 लाख से ₹14.96 लाख, BE 6 की कीमत ₹18.90 लाख से ₹26.90 लाख, XEV 9e की कीमत ₹21.90 लाख से ₹30.50 लाख और XEV 9S की कीमत ₹19.95 लाख से ₹29.45 लाख (सभी एक्स-शोरूम) है। 

शेयर बाजार में बड़ा नुकसान, निफ्टी 13% गिरा; 102 स्टॉक्स ने गंवाई आधी से ज्यादा वैल्यू

मुंबई  शेयर मार्केट में गुरुवार यानी 01 अक्‍तूबर 2026 को फ‍िर भूचाल आया. सेंसेक्‍स एक वक्‍त 1000 पॉइंट नीचे तक ग‍िर गया था. लेकिन बाजार में इस समय सबसे बड़ा फर्क इंडेक्स और आम शेयरों के प्रदर्शन में दिखाई दे रहा है. निफ्टी 2026 में करीब 13% नीचे है. पहली नजर में यह बड़ी गिरावट जरूर है, लेकिन निफ्टी 500 के अंदर झांकेंगे तो तस्वीर और ज्यादा खराब दिखती है. 500 शेयरों में से 252 शेयर अपने ऑल टाइम हाई से 30% से ज्यादा नीचे आ चुके हैं. यानी आधे से ज्यादा शेयरों में बड़ी चोट लग चुकी है. सबसे बड़ा आंकड़ा 102 शेयरों का है. निफ्टी 500 में शामिल 102 शेयर अपने रिकॉर्ड हाई से 50% से ज्यादा नीचे हैं. जिस शेयर की कीमत कभी 100 रुपये थी, वह अब 50 रुपये से भी नीचे आ चुका है. यानी हर पांच शेयरों में करीब एक शेयर अपने सबसे ऊंचे भाव की आधी कीमत भी नहीं बचा पाया है. 167 शेयर 40% से ज्यादा और 347 शेयर 20% से ज्यादा नीचे हैं। आम तौर पर जब बाजार में बड़ी गिरावट आती है तो माना जाता है कि छोटे शेयर ज्यादा टूटते हैं. लेकिन इस बार बड़ी कंपनियां भी दबाव में हैं. निफ्टी 50 के 18 शेयर अपने 52 हफ्तों के हाई से 20% से ज्यादा नीचे आ चुके थे और इन शेयरों की कुल मार्केट वैल्यू में करीब 31.35 लाख करोड़ रुपये की कमी आई. यानी चोट सिर्फ छोटे निवेशकों के पसंदीदा शेयरों में नहीं है। अब सितंबर की कहानी समझिए सितंबर ने इस गिरावट को और तेज कर दिया. पूरे महीने विदेशी निवेशकों यानी FIIs ने भारतीय शेयरों में करीब 44,013 करोड़ रुपये की नेट बिकवाली की. 2026 में अब तक FIIs करीब 4.03 लाख करोड़ रुपये निकाल चुके हैं. सितंबर की बिकवाली खास इसलिए है क्योंकि महीने के आखिरी चार कारोबारी दिनों में ही करीब 29,175 करोड़ रुपये निकल गए. यानी महीने की करीब दो-तिहाई बिकवाली सिर्फ चार दिनों में हुई। आखिरी दिन तो जैसे बिकवाली का बांध टूट गया 30 सितंबर को FIIs ने एक ही दिन में 10,148 करोड़ रुपये के शेयर बेच दिए. यह 23 मार्च के बाद सबसे बड़ी एक दिन की विदेशी बिकवाली रही. उससे एक दिन पहले यानी 29 सितंबर को भी 9,980 करोड़ रुपये की बिकवाली हुई थी. 28 सितंबर को 5,353 करोड़ और 25 सितंबर को 3,694 करोड़ रुपये निकले. चार दिनों में लगातार बढ़ती बिकवाली ने बाजार पर अचानक दबाव बढ़ा दिया। विदेशी बेच रहे हैं, तो बाजार संभाल कौन रहा है? यहां कहानी का दूसरा पहलू है. घरेलू संस्थागत निवेशक यानी DIIs सितंबर में हर एक कारोबारी दिन खरीदार रहे. पूरे महीने उन्होंने करीब 76,030 करोड़ रुपये लगाए. 30 सितंबर को जब FIIs ने 10,148 करोड़ रुपये बेचे, उसी दिन DIIs ने 11,272 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे. यानी बाहर का पैसा निकल रहा है तो देश का संस्थागत पैसा लगातार बाजार में पैसा लगा रहा है। फिर भी शेयरों की हालत इतनी खराब क्यों? यही सबसे बड़ा सवाल है. अगर घरेलू निवेशक 76 हजार करोड़ रुपये लगा रहे हैं तो बाजार संभल क्यों नहीं रहा? वजह यह है कि पैसा बाजार में आना और हर शेयर को बचाना दो अलग बातें हैं. विदेशी बिकवाली खासकर बड़े और ज्यादा कारोबार वाले शेयरों पर दबाव डाल सकती है. दूसरी तरफ बाजार के कई शेयर पहले से महंगी कीमतों पर कारोबार कर रहे थे. कमाई उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ी तो उनकी कीमतों में तेज करेक्शन आया। 50% गिर गया मतलब सस्ता हो गया, यह सबसे बड़ा भ्रम मान लीजिए किसी शेयर का भाव 100 रुपये था और वह 50 रुपये पर आ गया. गिरावट 50% हुई. लेकिन अब वह 50 रुपये से वापस 100 रुपये पहुंचने के लिए 100% बढ़ना पड़ेगा. इसलिए सिर्फ यह देखकर कि शेयर अपने हाई से आधा रह गया है, उसे सस्ता मानना सही नहीं है. पहले यह देखना होगा कि कंपनी की कमाई, कर्ज, कारोबार और भविष्य की संभावना में क्या बदलाव आया है. कुछ शेयरों में पुरानी तेजी का हिसाब चुक रहा है कोविड के बाद बाजार में कई थीम बहुत तेजी से चलीं. रेलवे, डिफेंस, सरकारी कंपनियों और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े शेयरों में निवेशकों की भारी दिलचस्पी आई. कई शेयरों के भाव उनकी मौजूदा कमाई से काफी आगे निकल गए. अब जब कमाई उस रफ्तार से नहीं बढ़ी, तो कीमत नीचे आने लगी. इसे ऐसे समझिए. पहले उम्मीद के दम पर भाव चढ़ा, अब असली कमाई के हिसाब से भाव की दोबारा जांच हो रही है। निफ्टी बचा हुआ दिख रहा है क्योंकि बड़ी कंपनियां पूरी तस्वीर नहीं हैं निफ्टी 50 में सिर्फ 50 बड़ी कंपनियां हैं. लेकिन भारतीय शेयर बाजार में हजारों कंपनियां लिस्टेड हैं. इसलिए निफ्टी का 13% नीचे होना यह नहीं बताता कि हर कंपनी 13% नीचे है. कुछ शेयर मामूली नीचे होंगे, कुछ 20-30% नीचे और कुछ 50-60% तक टूट चुके हैं. यही वजह है कि किसी निवेशक का पोर्टफोलियो निफ्टी से दोगुना-तिगुना ज्यादा गिर सकता है। विदेशी निवेशकों की अगली चाल पर बाजार की नजर सितंबर में सिर्फ कैश मार्केट में बिकवाली नहीं हुई. विदेशी निवेशकों ने इंडेक्स फ्यूचर्स में भी करीब 3.75 अरब डॉलर की बिकवाली की. सितंबर सीरीज में उनकी इंडेक्स फ्यूचर्स की नेट शॉर्ट पोजिशन करीब 1.84 लाख कॉन्ट्रैक्ट से बढ़कर 2.67 लाख कॉन्ट्रैक्ट हो गई. इसका मतलब बाजार के डेरिवेटिव हिस्से में भी विदेशी निवेशकों की सावधानी बढ़ी है। तेल और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड ने आग में घी का काम किया बाजार पर दबाव सिर्फ विदेशी निवेशकों की बिकवाली से नहीं आया. कच्चे तेल की ऊंची कीमत और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड भी चिंता बढ़ा रही हैं. भारत तेल का बड़ा आयातक है. तेल महंगा होने पर देश का आयात बिल बढ़ता है और रुपये पर दबाव आ सकता है. वहीं अमेरिकी बॉन्ड से ज्यादा रिटर्न मिलने पर विदेशी निवेशकों के लिए अमेरिका में पैसा लगाना ज्यादा आकर्षक हो सकता है. सितंबर में दोनों चीजों ने भारतीय बाजार पर दबाव बढ़ाया । SIP वाला पैसा अभी बाजार की ढाल बना हुआ है घरेलू निवेशकों की लगातार खरीदारी इस पूरी कहानी का दूसरा मजबूत पक्ष है. अगस्त में SIP के जरिए 32,297 करोड़ रुपये का … Read more

Yamaha R15M पर मंडरा रहा बंद होने का खतरा, R2 की लॉन्चिंग के बाद लिया जा सकता है फैसला

नई दिल्ली यामाहा अपनी पॉपुलर बाइक को बंद कर सकती है. स्पोर्ट्स बाइक पसंद करने वालों के लिए यामाहा आर15 काफी खास है. कंपनी आर15 सीरीज में कई बाइक्स बेचती है. रिपोर्ट्स की मानें, तो यामाहा आर2 (Yamaha R2) की लॉन्चिंग के बाद कंपनी अपनी मोटरसाइकिलों की पोजिशनिंग में बदलाव कर सकती है।  इस क्रम में कंपनी यामाहा आर15 एम (Yamaha R15M) को बंद कर सकती है. इससे यामाहा आर15 वी4 (Yamaha R15 V4) और यामाहा आर2 के बीच एक बड़ा गैप क्रिएट किया जा सकेगा. हालांकि, इस पूरे मामले में यामाहा ने आधिकारिक रूप से कोई जानकारी नहीं दी है. फिलहाल आर15 एम यामाहा आर15 वी4 और आर2 के बीच में आती है।  क्या हो सकती है वजह? ये बाइक कंपनी के 155सीसी वाले इंजन के साथ आती है, लेकिन इसमें आर15 वी4 के मुकाबले ज्यादा फीचर्स और प्रीमियम फिनिश मिलती है. इस बाइक के डिस्कंटीन्यू होने से यामाहा आर सीरीज का लाइन-अप ज्यादा सिंपल हो जाएगा. जिसमें यामाहा आर15 वी4 ज्यादा एक्सेसबल और आर2 नेक्स्ट स्टेप वाली बाइक बन जाएगी।  अगर किसी को कम कीमत में एक स्पोर्ट्स बाइक वाला फील चाहिए, तो वो आर15 वी4 के लिए जा सकता है, जबकि प्रीमियम फीचर और ज्यादा परफॉर्मेंस चाहने वालों के लिए आर2 होगी।  कितनी है कीमत?  यामाहा की इन बाइक्स की कीमतों पर नजर डालें, तो यामाहा आर15 एस की कीमत 1.59 लाख रुपये है. जबकि यामाहा आर15 वी4 की कीमत 1.75 लाख रुपये से 1.79 लाख रुपये है. वहीं यामाहा आर15 एम की कीमत 1.90 लाख से 2 लाख रुपये है. जबकि हाल में लॉन्च हुई यामाहा आर2 की कीमत 2.3 लाख से 2.4 लाख रुपये और यामाहा आर2 एम की कीमत 2.53 लाख रुपये है।  अगर यामाहा आर15 एम को डिस्कंटीन्यू कर देती है, तो आर2 और आर15 सीरीज के बीच प्राइस गैप 51 हजार रुपये का हो जाएगा. फिलहाल ये गैप 30 हजार रुपये का है. अगस्त महीने में आर15 बाइक्स की 7,691 यूनिट्स बिकी हैं. इस वित्तवर्ष वर्ष में अगस्त महीने में आर15 की सेल्स सबसे कम हुई है। 

FD पर RBI का नया नियम, 3 करोड़ से ज्यादा की जमा पर बदलेंगे ब्याज के नियम

 नई दिल्ली अगर आप बैंक में एफडी कराने की तैयारी कर रहे हैं, तो 1 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाला नया नियम आपके लिए बेहद जरूरी है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बड़ी रकम वाली एफडी (FD) यानी बल्क एफडी के लिए ब्याज दर बताने और लागू करने के नियम बदल दिए हैं। अब बैंक को हर वर्किंग डे पर अपनी बल्क जमा पर लागू ब्याज दर वेबसाइट पर बतानी होगी। इतना ही नहीं एक ही बैंक की अलग-अलग शाखाओं में एक जैसी जमा के लिए अलग-अलग ब्याज दर देने पर भी रोक रहेगी। हर वर्किंग डे वेबसाइट पर बतानी होगी ब्याज दर 1 अक्टूबर से बैंक को हर वर्किंग डे सुबह 10 बजे तक अपनी बल्क जमा पर लागू ब्याज दर अपनी वेबसाइट पर जारी करना होगा। इसके लिए 10 मिनट की अतिरिक्त मोहलत होगी, यानी दर सुबह 10:10 बजे तक अपडेट की जा सकती है। खास बात यह है कि वेबसाइट पर जो ब्याज दर बताई गई होगी, बैंक को पात्र जमा पर ब्याज देते समय उसी दर का पालन करना होगा। इससे बड़ी रकम जमा करने वाले ग्राहकों के लिए बैंक की लागू ब्याज दर जानना आसान होगा। कौनसी एफडी पर लागू होंगे नियम? सामान्य तौर पर कमर्शियल बैंकों में 3 करोड़ रुपये या उससे ज्यादा की एफडी को बल्क जमा माना जाता है। हालांकि, अलग-अलग केटेगरी के बैंकों के लिए इसकी लिमिट अलग हो सकती है। अलग-अलग शाखाओं में नहीं मिलेगी अलग दर नए नियम का एक बड़ा बदलाव यह है कि एक ही तरह की बल्क जमा के लिए बैंक अपनी अलग-अलग शाखाओं में मनमाने तरीके से अलग ब्याज दर नहीं दे सकेंगे। एक ही दिन समान अमाउंट की जमा स्वीकार किए जाने पर सामान्य तौर पर उस पर एक जैसी ब्याज दर लागू होगी। हालांकि, इसमें एक और नियम भी महत्वपूर्ण अपवाद है। बैंक जमा पर लागू लिक्विडिटी कवरेज रेशो (LCR) के नियमों के आधार पर कुछ मामलों में अलग ब्याज दर रख सकते हैं। आम एफडी कराने वालों पर क्या असर होगा? अगर आपने बैंक में सामान्य रकम की एफडी करा रखी है, तो इन नए नियमों का मतलब यह नहीं है कि 1 अक्टूबर से आपकी मौजूदा एफडी की ब्याज दर अपने आप बदल जाएगी। ये नियम बड़ी रकम वाली जमा यानी एक बार में 3 करोड़ रुपये से ज्यादा की एफडी पर यह नियम लागू होंगे।

Gold Price Today: सोना हुआ ₹4,140 सस्ता, 24 कैरेट का भाव ₹1.48 लाख के करीब

नई दिल्ली  आज सोमवार 28 सितंबर को सोने के भाव में बड़ी गिरावट आई। एक ही दिन में सोने का दाम 1.50 लाख रुपये के नीचे आ गया। बुलियन मार्केट में आज सोने का दाम 4,140 रुपये सस्ता हो गया है। इसके अलावा सर्राफा बाजार में 22 कैरेट सोने का भाव 1.35 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम पर आ गया है। यही नहीं, घरेलू वायदा बाजार में सोने की कीमत करीब 2 फीसदी तक गिर गई, जबकि चांदी में भी तेज गिरावट देखने को मिली। इस गिरावट की बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बढ़ता तनाव माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच पिछले हफ्ते बातचीत हुई थी, लेकिन अब फिर से तनाव बढ़ने की खबरें सामने आई हैं। यही कारण है कि सोमवार को सोने के दाम में बड़ी गिरावट आ गई। आखिर क्यों सस्ता हुआ सोना? ईरान ने रविवार को कहा कि वह स्ट्रेट ऑफ होर्मूज को दोबारा खोलने के लिए अपनी शर्तों से पीछे नहीं हटेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के सात दिन के सीजफायर प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव का असर कच्चे तेल की कीमतों पर भी पड़ा है। ट्रंप के बयान से बढ़ी चिंता रिपोर्ट के मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका ईरान के साथ चल रहे संघर्ष को जल्द खत्म कर देगा। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी मिडटर्म चुनावों से पहले नए सैन्य हमले की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। आमतौर पर भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने पर निवेशक सोने को सुरक्षित निवेश मानकर इसकी तरफ रुख करते हैं। हालांकि, सोमवार को घरेलू बाजार में सोने की कीमतों में इसके उलट गिरावट देखने को मिली। आज रिटेल मार्केट में सोने का भाव इंडियन बुलियन एसोसिएशन (IBA) के आंकड़ों के मुताबिक सोमवार को देश में 24 कैरेट सोने का भाव 1,48,910 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट सोने का भाव 1,36,501 रुपये प्रति 10 ग्राम रहा। वहीं 999 फाइन सिल्वर का भाव 2,28,780 रुपये प्रति किलो दर्ज किया गया। दिनभर के कारोबार के दौरान सोने के दाम में और ज्यादा गिरावट आने लगी। बड़े शहरों में आज सोने का भाव मुंबई में सोने का भाव — 28 सितंबर 24 कैरेट सोने का भाव — 1,47,430 रुपये प्रति 10 ग्राम 22 कैरेट सोने का भाव — 1,35,100 रुपये प्रति 10 ग्राम नई दिल्ली में सोने का भाव — 28 सितंबर 24 कैरेट सोने का भाव — 1,46,960 रुपये प्रति 10 ग्राम 22 कैरेट सोने का भाव — 1,34,620 रुपये प्रति 10 ग्राम बेंगलुरु में सोने का भाव — 28 सितंबर 24 कैरेट सोने का भाव — 1,48,700 रुपये प्रति 10 ग्राम 22 कैरेट सोने का भाव — 1,36,308 रुपये प्रति 10 ग्राम कोलकाता में सोने का भाव — 28 सितंबर 24 कैरेट सोने का भाव — 1,48,380 रुपये प्रति 10 ग्राम 22 कैरेट सोने का भाव — 1,36,015 रुपये प्रति 10 ग्राम हैदराबाद में सोने का भाव — 28 सितंबर 24 कैरेट सोने का भाव — 1,48,810 रुपये प्रति 10 ग्राम 22 कैरेट सोने का भाव — 1,36,409 रुपये प्रति 10 ग्राम चेन्नई में सोने का भाव — 28 सितंबर 24 कैरेट सोने का भाव — 1,49,070 रुपये प्रति 10 ग्राम 22 कैरेट सोने का भाव — 1,36,648 रुपये प्रति 10 ग्राम शहर का नाम    22 कैरेट गोल्ड का रेट (10 ग्राम-रुपये में)    24 कैरेट गोल्ड का रेट (10 ग्राम-रुपये में) दिल्ली                    1,34,620                                           1,46,960 लखनऊ                 1,34,300                                            1,47,300 कानपुर                  1,34,300                                            1,47,300 पटना                    1,34,470                                             1,47,379 जयपुर                  1,34,499                                             1,47,377 भोपाल                    1,34,500                                           1,47,356 मुंबई                     1,35,100                                             1,47,430 चंडीगढ़                 1,34,540                                              1,47,370 सूरत                   1,35,070                                                1,47,440 MCX पर सोना और चांदी के दाम गिरे सोमवार सुबह एमसीएक्स (MCX) गोल्ड 5 अक्टूबर फ्यूचर का दाम घटकर 1,48,092 रुपये प्रति 10 ग्राम पर कारोबार कर रहा था। वहीं, एमसीएक्स सिल्वर 4 दिसंबर फ्यूचर 2.6 फीसदी गिरकर 2,28,566 रुपये प्रति किलो पर पहुंच गया। ज्वैलर्स के पास महंगा क्यों मिलती है गोल्ड ज्वैलरी? ज्वेलरी खरीदते समय इन कीमतों के ऊपर मेकिंग चार्ज, GST और दूसरे टैक्स जुड़ सकते हैं। इसलिए दुकान पर मिलने वाला अंतिम बिल इससे ज्यादा हो सकता है। सोने-चांदी ने अब तक कितना रिटर्न दिया? पिछले साल सोने में जोरदार तेजी देखने को मिली थी। इसकी कीमत में अब तक 75 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हाल के महीनों में भी वैश्विक अनिश्चितता और सुरक्षित निवेश की मांग ने सोने को सपोर्ट किया है।

शेयर बाजार में भारी गिरावट, Sensex 850 अंक लुढ़का; निवेशकों में मचा हड़कंप

मुंबई   घरेलू शेयर बाजार के लिए हफ्ते का पहला दिन बेहद खराब साबित हुआ. सोमवार 28 सितंबर को बाजार खुलते ही निवेशकों को तगड़ा झटका लगा. सेंसेक्स शुरुआती मिनटों में ही 850 अंक से ज्यादा नीचे लुढ़क गया. इसकी सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग मानी जा रही है. दरअसल अमेरिका ईरान के बीच चल रही तनातनी से कच्चे तेल का भाव 106 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है।  कच्चे तेल में लगी आग का असर ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार इजाफा हो रहा है. ब्रेंट फ्यूचर्स 2.1 प्रतिशत की बढ़त के साथ 106.49 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है. इस महीने में अब तक इसकी कीमतों में लगभग 18 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हो चुकी है. वहीं अमेरिकी क्रूड फ्यूचर्स भी 1.5 प्रतिशत बढ़कर 93.84 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है. कच्चे तेल के इस उबाल ने सीधे तौर पर भारतीय शेयर बाजार का सेंटीमेंट बिगाड़ दिया. सोमवार सुबह गिफ्ट निफ्टी 23,111 अंकों पर था, जिससे साफ हो गया था कि बाजार की शुरुआत बहुत सुस्त रहने वाली है. जैसे ही 9:15 बजे ट्रेडिंग शुरू हुई, हालात तेजी से बिगड़े. महज दो मिनट के भीतर 9:17 बजे सेंसेक्स 512 अंक टूटकर 73,383.70 पर आ गया. गिरावट का ये सिलसिला यहीं नहीं थमा, बल्कि 9:40 बजे तक सेंसेक्स 870 अंक का गोता लगा चुका था।  अमेरिका ईरान के बीच बढ़ा तनाव बाजार में मची इस तबाही के पीछे वैश्विक टेंशन मुख्य कारण है. अमेरिका ईरान के बीच शांति वार्ता फिलहाल पूरी तरह से अधर में लटक गई है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हरमुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के ईरानी प्रस्ताव को ठुकरा दिया है. ट्रंप का कहना है कि ईरान सिर्फ समझौता करने के लिए बेताब है. वहीं ईरान का स्पष्ट रुख है कि इस विवाद को केवल कूटनीति से सुलझाया जा सकता है. मध्य पूर्व में हालात तब से ज्यादा खराब हैं जब फरवरी के अंत में अमेरिका इजरायल ने ईरान पर संयुक्त हमले किए थे. इस युद्ध ने तेल बाजार को पूरी तरह से अनिश्चितता में धकेल दिया है।  बाजार खुलते ही Sensex-Nifty में तेज गिरावट सोमवार को कारोबार की शुरुआत कमजोर रही। BSE Sensex शुक्रवार के 73,895.74 के स्तर से 73,734 के आसपास खुला और शुरुआती कारोबार में गिरावट बढ़ गई। कुछ ही देर में सेंसेक्स 73,000 के स्तर से नीचे चला गया और करीब 850 अंक तक फिसलता दिखाई दिया। NSE Nifty 50 भी दबाव में रहा। शुक्रवार को 23,140.50 पर बंद हुआ निफ्टी सोमवार को 23,000 के नीचे चला गया। शुरुआती कारोबार में इंडेक्स करीब 22,900 के आसपास कारोबार करता नजर आया। बैंकिंग और IT शेयरों पर भी दबाव बाजार में बिकवाली का असर कई प्रमुख सेक्टरों में दिखाई दिया। बैंकिंग और आईटी शेयरों में दबाव ने प्रमुख इंडेक्स की गिरावट को और बढ़ाया। इससे पहले भी बाजार में लगातार कमजोरी के बीच विदेशी निवेशकों की बिकवाली और महंगे कच्चे तेल को प्रमुख चिंता के तौर पर देखा जा रहा था। आपके मूल ड्राफ्ट में दिए गए ₹6 लाख करोड़ से ज्यादा मार्केट-कैप घटने के आंकड़े को प्रकाशित करने से पहले उसी समय के BSE market-cap डेटा से दोबारा मिलाना बेहतर रहेगा, क्योंकि शुरुआती कारोबार में यह आंकड़ा लगातार बदलता है। क्यों गिर रहा है शेयर बाजार? बाजार की ताजा गिरावट के पीछे सबसे बड़ी वजहों में अमेरिका-ईरान तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल शामिल है। सोमवार को रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की उस पहल को खारिज कर दिया, जिसमें संघर्ष खत्म करने और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने का प्रस्ताव शामिल था। इसके बाद तेल बाजार में फिर दबाव बढ़ा। Brent crude शुरुआती कारोबार में करीब $106 प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। भारत के लिए महंगा कच्चा तेल चिंता का विषय है, क्योंकि इससे आयात बिल, महंगाई और कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी बनी चिंता भारतीय बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की लगातार बिकवाली भी सेंटीमेंट पर असर डाल रही है। 25 सितंबर को विदेशी निवेशकों ने करीब ₹3,693.93 करोड़ की बिकवाली की, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने करीब ₹2,838 करोड़ की खरीदारी की थी। सितंबर में अब तक FII की बिकवाली भी काफी ऊंचे स्तर पर पहुंच चुकी है। इससे पहले 25 सितंबर को खत्म सप्ताह में Sensex 0.54% और Nifty 0.88% नीचे रहा था। दोनों बेंचमार्क लगातार सातवें सप्ताह गिरावट के साथ बंद हुए थे। विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली बाजार को कमजोर करने में विदेशी निवेशकों (FII) का भी बड़ा हाथ है. विदेशी संस्थागत निवेशक लगातार भारतीय बाजार से अपना पैसा निकाल रहे हैं. आंकड़ों के मुताबिक शुक्रवार को विदेशी निवेशकों ने 36.94 अरब रुपये (385.54 मिलियन डॉलर) के शेयर बेचे. इस महीने अब तक उन्होंने 1.8 अरब डॉलर की निकासी कर ली है. अगर इस पूरे साल की बात करें तो ये आंकड़ा 25.86 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है. इसी भारी बिकवाली की वजह से निफ्टी 50 व बीएसई सेंसेक्स लगातार सात सत्रों तक गिरे थे, जो रिकॉर्ड पर उनकी सबसे लंबी गिरावट में से एक है।  शुक्रवार की तेजी पर फिरा पानी सोमवार की इस भारी गिरावट ने शुक्रवार की रिकवरी को पूरी तरह से धो दिया. पिछले हफ्ते शुक्रवार को बाजार में थोड़ी राहत देखने को मिली थी. तब बैंकिंग, ऑटो, गैस शेयरों में खरीदारी के दम पर सेंसेक्स 315.20 अंक चढ़कर 73,895.74 पर बंद हुआ था. उस दिन निफ्टी ने भी 77.40 अंकों की छलांग लगाई थी. शुक्रवार को एक्सिस बैंक, महिंद्रा, एशियन पेंट्स, बजाज फाइनेंस जैसे शेयरों में अच्छी तेजी दर्ज की गई थी. इनमें एक्सिस बैंक सबसे ज्यादा 2.82 प्रतिशत चढ़ा था. लेकिन सोमवार को खुलते ही इस सारी बढ़त पर पानी फिर गया. निवेशकों का भरोसा डगमगाया हुआ है, जिससे बाजार में आगे भी काफी उतार-चढ़ाव रहने की आशंका बनी हुई है। 

US Visa अपॉइंटमेंट में लंबा वेटिंग टाइम, हैदराबाद में 12 महीने तो मुंबई में 11.5 महीने इंतजार

नई दिल्ली अमेरिका घूमने, कारोबार या रिश्तेदारों से मिलने की योजना बना रहे भारतीय यात्रियों के लिए वीजा अपॉइंटमेंट को लेकर बड़ी चुनौती सामने आई है। US विजिटर वीजा के लिए पहली बार आवेदन करने वालों को प्रमुख भारतीय शहरों में इंटरव्यू स्लॉट के लिए कई महीनों तक इंतजार करना पड़ रहा है। अमेरिकी विदेश विभाग के ब्यूरो ऑफ कॉन्सुलर अफेयर्स (Bureau of Consular Affairs) के ताजा वेट-टाइम डाटा के अनुसार, कुछ जगहों पर अगला उपलब्ध स्लॉट करीब एक साल दूर है। ऐसे में यात्रा की योजना बनाने वालों के लिए वीजा प्रॉसेस को काफी पहले शुरू करना जरूरी हो गया है। हैदराबाद के लोगों के लिए सबसे लंबा इंतजार पहली बार आवेदन करने वालों के लिए सबसे लंबा इंतजार हैदराबाद में दर्ज किया गया है, जहां अगला उपलब्ध इंटरव्यू स्लॉट करीब 12 महीने बाद मिल रहा है। मुंबई में यह इंतजार लगभग 11.5 महीने और नई दिल्ली में करीब 10 महीने है। चेन्नई में आवेदकों को लगभग 7.5 महीने इंतजार करना पड़ रहा है, जबकि कोलकाता में करीब 6.5 महीने का वेटिंग टाइम है, यानी शहर के आधार पर US विजिटर वीजा के लिए अपॉइंटमेंट मिलने में काफी अंतर है। कहां कितना वेटिंग पीरियड? US में छुट्टी मनाने जाने वाले पर्यटक और बिजनेस विजिट पर जाने वाले लोगों के लिए सामान्यतः B1/B2 विजिटर वीजा कैटेगिरी लागू होती है। इसी वजह से कॉर्पोरेट मीटिंग, बिजनेस इवेंट या ट्रेड समिट के लिए जाने वाले लोगों और घूमने या परिवार से मिलने जाने वाले यात्रियों के लिए इंटरव्यू स्लॉट की यही साझा व्यवस्था है। अमेरिकी विदेश विभाग के रेट्रोस्पेक्टिव डाटा में भी पिछले महीने इंटरव्यू पूरा करने वाले आवेदकों के वास्तविक औसत वेटिंग पीरियड में हैदराबाद 11.5 महीने, मुंबई 11 महीने, नई दिल्ली 7.5 महीने, चेन्नई 7 महीने और कोलकाता 6 महीने रहा। स्टूडेंट और वर्क वीजा के लिए स्थिति अलग विजिटर वीजा की तुलना में स्टूडेंट और वर्क वीजा के लिए स्थिति अपेक्षाकृत अलग है। स्टूडेंट और एक्सचेंज विजिटर वीजा के लिए चेन्नई में दो सप्ताह से भी कम, हैदराबाद में करीब 1.5 महीने, नई दिल्ली और कोलकाता में लगभग दो महीने व मुंबई में करीब 2.5 महीने का इंतजार बताया गया है। पिटीशन-बेस्ड टेंपररी वर्क वीजा के मामले में हैदराबाद में लगभग 5.5 महीने का इंतजार है, जबकि नई दिल्ली में तीन महीने, चेन्नई और मुंबई में करीब 1.5 महीने और कोलकाता में लगभग एक महीने का समय है। हालांकि, ये वेटिंग टाइम किसी निश्चित अपॉइंटमेंट की गारंटी नहीं हैं। अमेरिकी दूतावास और कॉन्सुलेट समय-समय पर नए इंटरव्यू स्लॉट खोलते हैं और कैंसिल हुए अपॉइंटमेंट भी दोबारा उपलब्ध हो सकते हैं। इसलिए जिन यात्रियों को दूर की तारीख मिली है, वे नियमित रूप से वीजा पोर्टल पर स्लॉट चेक करके पहले की तारीख मिलने पर बिना अतिरिक्त शुल्क के रीशेड्यूल कर सकते हैं। यह लंबा इंतजार मुख्य रूप से उन आवेदकों के लिए है, जिन्हें इन-पर्सन इंटरव्यू देना जरूरी है। वहीं, मौजूदा वीजा को एलिजिबल एप्लीकेंट्स के लिए रिन्वेल या इंटरव्यू-वेवर प्रॉसेस के तहत रिनोवेटेड कराने वालों की स्थिति अलग है। ऐसे मामलों में पासपोर्ट वापस मिलने में लगभग दो से 6 सप्ताह लग सकते हैं। इसलिए, अमेरिका जाने की योजना बना रहे नए आवेदकों को यात्रा की तारीख तय करने से पहले अपने शहर का मौजूदा वेटिंग टाइम जरूर चेक कर लेना चाहिए।  

चीन की अपैरल हिस्सेदारी 10% घटी, बांग्लादेश-वियतनाम ने मारी बाजी; भारत के सामने बड़ा अवसर

नई दिल्ली  साल 2025 में ग्लोबल अपैरल एक्सपोर्ट में भारत की हिस्सेदारी लगभग 3 फीसदी पर जस की तस रही। वहीं, 2010 में अपने पीक (सबसे ऊंचे स्तर) से चीन की हिस्सेदारी में लगभग 10 फीसदी की गिरावट आई। इससे सोर्सिंग का एक बड़ा मौका बना है। भारत 'चाइना+1' स्ट्रैटेजी और बेहतर ट्रेड एक्सेस के जरिए इस मौके का फायदा उठा सकता है। पीएल कैपिटल की सेक्टर रिपोर्ट से इसका पता चलता है। दुनियाभर में अपैरल एक्सपोर्ट में चीन की हिस्सेदारी 2010 में 36.9 फीसदी थी। यह घटकर 2025 में 27.3 फीसदी रह गई। जबकि इसी दौरान भारत की हिस्सेदारी 3.2 फीसदी से मामूली रूप से घटकर 3 फीसदी रह गई। वहीं, बांग्लादेश और वियतनाम ने अपनी संयुक्त हिस्सेदारी को लगभग 7 फीसदी से बढ़ाकर 13 फीसदी से ज्‍यादा कर लिया। बांग्‍लादेश को अब तक सबसे ज्‍यादा फायदा पीएल कैपिटल ने अपनी टेक्सटाइल सेक्टर रिपोर्ट में कहा, 'China+1 लहर के कारण इस हिस्सेदारी में करीब 9.6% की कमी आई है। चीनी एक्सपोर्ट के दबदबे में आई इस कमी से ग्लोबल सोर्सिंग मैट्रिक्स में 50-60 अरब डॉलर का फ्लोटिंग वॉल्यूम (बाजार में उपलब्ध व्यापार का अवसर) आया है।' रिपोर्ट में कहा गया है कि कम प्रोडक्शन कॉस्ट, ट्रेड एग्रीमेंट और इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम की वजह से बांग्लादेश और वियतनाम को अब तक इस बदलाव का सबसे ज्‍यादा फायदा मिला है। भारत ने इसलिए गंवाया मौका रिपोर्ट के अनुसार, 'इसके उलट, भारत में अभी भी एक ही जगह पर फाइबर, फैब्रिक और फैशन को जोड़ने वाले इंटीग्रेटेड हब की कमी है। यहां कैपिटल की लागत भी काफी ज्‍यादा है। नतीजतन, भारत की हिस्सेदारी मोटे तौर पर स्थिर रही है।' हालांकि, पीएल कैपिटल ने कहा कि अब कई फैक्‍टर भारत की स्थिति को बेहतर बनाने में मदद कर रहे हैं। इनमें चीन से हटकर सप्लाई-चेन में विविधता लाना, PLI (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) स्कीम और PM MITRA जैसी स्कीम के तहत पॉलिसी सपोर्ट और ट्रेड एग्रीमेंट के जरिए बड़े एक्सपोर्ट बाजारों तक बेहतर पहुंच शामिल है। कंपनियों को बराबर नहीं मिलेगा फायदा वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का टेक्सटाइल और कपड़ों का एक्सपोर्ट लगभग 37 अरब डॉलर था। इसमें रेडीमेड गारमेंट्स की हिस्सेदारी सबसे ज्‍यादा 44 फीसदी थी। 2025 में दुनियाभर में टेक्सटाइल और कपड़ों के कुल एक्सपोर्ट में देश की हिस्सेदारी लगभग 4 फीसदी थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस मौके का फायदा सभी टेक्सटाइल कंपनियों को बराबर नहीं मिलेगा। कारण है कि ग्लोबल ब्रांड्स अब कम और बड़े सप्लायरों को ही ज्‍यादा ऑर्डर दे रहे हैं। PL कैपिटल ने कहा, 'खरीदार उन पार्टनर्स के साथ अपनी वेंडर लिस्ट को सीमित कर रहे हैं जो कैपेसिटी, रिलायबिलिटी, ट्रेसेबिलिटी, ESG नियमों का पालन और कई देशों से सप्लाई की मजबूती दे सकते हैं।' भारत के सामने ये हैं सबसे बड़ी चुनौतियां इसमें यह भी कहा गया है कि भारत के लिए बड़े पैमाने पर काम करना अभी भी एक बड़ी चुनौती है। कारण है कि यहां कपड़ों के उत्पादन की क्षमता बिखरी हुई है। काम पूरा होने में ज्‍यादा समय लगता है। मैन-मेड फाइबर की सीमित उपलब्धता है। चीन, वियतनाम और बांग्लादेश की तुलना में टेक्नोलॉजी को अपनाने की रफ्तार धीमी है। ब्रोकरेज फर्म का कहना है कि इसलिए ग्रोथ के अगले दौर में उन बड़े, संगठित और काम को सही ढंग से पूरा करने पर ध्यान देने वाले अपैरल मैन्‍युफैक्‍चरर्स को फायदा होने की संभावना है जो बड़े पैमाने पर उत्पादन, तेजी से डिलीवरी और इंटीग्रेटेड सप्लाई चेन की सुविधा दे सकते हैं।