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कैसे भारत बनेगा AI का केंद्र: 2030 तक लाखों लोगों को मिलेगा रोजगार

नई दिल्ली केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने राज्यसभा को बताया कि भारत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI के क्षेत्र में स्किल्स के मामले में दुनिया के सबसे अच्छे देशों में शामिल है। उन्होंने स्टैनफोर्ड AI इंडेक्स रिपोर्ट 2025 का हवाला देते हुए कहा कि भारत AI प्रतिभा को अपनी ओर खींचने में पूरी दुनिया में पहले नंबर पर है। हर साल भारत में AI से जुड़ी नौकरियों में करीब 33% की बढ़ोतरी हो रही है। साल 2016 से अब तक भारत में AI प्रतिभा की संख्या तीन गुना से ज्यादा हो गई है। सरकार का मानना है कि AI से भारत मजबूत बनेगा और हर क्षेत्र में फायदा होगा। सरकार की एआई को लेकर प्लानिंग ANI की रिपोर्ट (Ref.) के मुताबिक, मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि भारत सरकार इस बात को अच्छी तरह समझती है कि जैसे-जैसे अलग-अलग क्षेत्र में AI का इस्तेमाल होगा, वैसे-वैसे अधिक स्किल वाले लोगों की जरूरत होगी। सरकार अपनी AI योजनाओं को इसी दिशा में बना रही है। दुनिया भर की रिपोर्ट्स भी भारत के AI कर्मचारियों की तारीफ कर रही हैं। 2027 तक दोगुना होगा एआई टैलेंट बेस अनुमान है कि भारत में AI का टैलेंट बेस 2027 तक दोगुने से ज्यादा हो जाएगा। हर साल करीब 15 प्रतिशत की दर से यह बढ़ोतरी होगी। भारत के AI एक्सपर्ट्स की बढ़ती संख्या का असर दुनिया भर में दिख रहा है। गिटहब पर AI प्रोजेक्ट्स में भारत का योगदान 2024 में दूसरा सबसे बड़ा था, जो कुल प्रोजेक्ट्स का 19.9 प्रतिशत था। इससे साफ पता चलता है कि भारत के AI डेवलपर्स कितने मजबूत हैं। भारत का IndiaAI मिशन मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि ये आंकड़े भारत सरकार के बड़े स्तर पर AI कौशल, रिसर्च और नवाचार पर ध्यान देने का नतीजा हैं। IndiaAI मिशन के तहत सरकार कई बड़े कदम उठा रही है। इसमें 500 पीएचडी विद्वानों, 5,000 पोस्टग्रेजुएट और 8,000 ग्रेजुएट छात्रों को AI से जुड़े काम के लिए मदद दी जा रही है। छोटे शहरों में 27 IndiaAI डेटा और AI लैब्स बनाए गए हैं, जहां डेटा तैयार करने करने जैसे कोर्स चलाए जा रहे हैं। इसके अलावा, 174 आईटीआई और पॉलिटेक्निक में भी ऐसे लैब्स बनाए जा रहे हैं। ये सब काम दूसरे और तीसरे दर्जे के शहरों में हो रहा है ताकि हर जगह के युवाओं को मौका मिले। 2030 तक 1 करोड़ लोग एआई से जुड़े का करेंगे सरकार नासकॉम के साथ मिलकर युवाओं को AI, बिग डेटा और क्लाउड कंप्यूटिंग जैसी नई स्किल्स की ट्रेनिंग दे रही है। ये कोर्स राष्ट्रीय कौशल मानकों से जुड़े हैं। प्लेटफॉर्म पर 500 से ज्यादा कोर्स हैं। अब तक 16 लाख से ज्यादा लोग इन कोर्स में नामांकन कर चुके हैं या ट्रेनिंग ले चुके हैं। इसके अलावा एक फ्री नेशनल कोर्स 'युवा AI फॉर ऑल' शुरू किया गया है, जो हर किसी को AI की बेसिक जानकारी देता है। नासकॉम की रिपोर्ट कहती है कि भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल कौशल वाला टैलेंट पूल है। साल 2030 तक भारत 80 से 100 लाख लोगों को AI से जुड़े कामों के लिए तैयार कर सकता है।

नया AI टोल सिस्टम क्या है? FASTag और GPS टोल से जानिए पूरा फर्क

 नई दिल्ली आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) अब टोल गेट पर भी एंट्री करने जा रहा है. अब भारत के हाइवे और टोल गेट पर टोल चार्जेस काटने का काम AI बेस्ड सिस्टम से होगा. केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने बुधवार को राज्यसभा में बताया है कि सेटेलाइट बेस्ड टोल कलेक्शन सिस्टम साल 2026 के अंत तक लागू हो जाएगा.  दरअसल, प्रश्नकाल के दौरान सवालों के जवाब देते हुए मंत्री ने कहा कि न्यू टोल बेस्ड सिस्टम टेक्नोलॉजी सेटेलाइट और AI बेस्ड होगा. इसके लिए कार या अन्य व्हीकल मालिक को टोल गेट पर रुकने की जरूरत नहीं होगी. वह 80 किलोमीटर की स्पीड से भी टोल गेट पार कर सकेंगे.  सरकारी रेवेन्यू को होगा फायदा  मंत्री ने कहा कि AI Toll सिस्टम से 1500 करोड़ रुपये के फ्यूल सेविंग होगी और सरकारी रेवेन्यू में 6,000 करोड़ शामिल होंगे. AI बेस्ड टोल कलेक्शन सिस्टम फास्टैग और जीपीएस बेस्ड टोल सिस्टम से अलग होगा.  AI टोल सिस्टम कैसे काम करेगा? AI बेस्ड टोल कलेक्शन सिस्टम, असल में MLFF (Multi-Lane Free Flow) सिस्टम है. इस सिस्टम के तहत हाइवे पर टोल बूथ नहीं होंगे. इसके लिए एक लोहे का स्ट्रक्चर तैयार होगा, जिसको गैन्ट्री कहा जाता है. गैन्ट्री पर हाई रेजोल्यूशन कैमरा और सेंसर होंगे, जो कार की नंबर प्लेट को डिटेक्ट करेंगे और एनालाइज करेंगे. यह सिस्टम एंट्री और एग्जीट दोनों पर होगा, इसके बाद टोल चार्ज वसूला जाएगा. यह पूरा काम ऑटोमैटिक होगा और कार को टोल टैक्स के लिए कहीं रोकने की जरूरत नहीं होगी.  AI बेस्ड टोल फास्टैग और GPS बेस्ड सिस्टम से कितना अलग है?  सर्विस का नाम               FASTag (मौजूदा)           GPS/GNSS (सैटेलाइट)               AI आधारित (MLFF) टेक्नोलॉजी                  RFID (रेडियो फ्रीक्वेंसी)          सैटेलाइट ट्रैकिंग                           कैमरा और AI विजन रुकने की जरूर             थोड़ा रुकना पड़ता है      नहीं रुकना पड़ेगा                               नहीं रुकना पड़ेगा  डिवाइस                        विंडशील्ड पर स्टिकर     व्हीकल में OBU (डिवाइस)                   सिर्फ नंबर प्लेट हो  टोल रेट                          फिक्स्ड रेट                     जितनी दूरी उतना चार्ज                    जितनी दूरी उतना चार्ज  बैरियर                        टोल गेट लगे होते हैं              गेट फ्री टेक्नोलॉजी                             गेट फ्री टेक्नोलॉजी  मौजूदा FASTag सिस्टम का क्या होगा?  मौजूदा टोल कलेक्शन सिस्टम FASTag बेस्ड है, जिसमें व्हीकल के विंड स्क्रीन पर एक रेडियो फ्रिक्वेंसी (RFID) टैग लगाना होता है. इस सिस्टम के तहत एक छोटी चिप होती है. यह स्टिकर चिप प्रीपेड वॉलेट या बैंक अकाउंट से लिंक होता है.  FASTag बेस्ड स्टिकर वाली कार जैसे ही टोल गेट पर पहुंचती है, गेट के ऊपर लगे सेंसर RFID चिप को डिटेक्ट करते हैं. इसके बाद गेट ओपन हो जाते हैं. हालांकि फास्टैग में बैलेंस माइनस में है तो वह ब्लैक लिस्ट हो जाता है. इसकी वजह से टोल गेट ओपन नहीं होता है. ऐसे में आपको टोल चार्ज कैश में पेमेंट करनी पड़ती है.  AI और GPS टोल अलग-अलग सिस्टम हैं.  GPS आधारित सिस्टम (GNSS) के लिए व्हीकल में एक विशेष ट्रैकिंग डिवाइस (OBU) की जरूरत होगी. वहीं, AI सिस्टम मुख्य रूप से बाहरी कैमरों और आपकी गाड़ी की मौजूदा नंबर प्लेट की मदद से काम करता है. यह AI सिस्टम उन गाड़ियों के लिए भी यूजफुल होगा, जिनके अंदर GPS नहीं लगा है. 

भारत ने AI क्षेत्र में तीसरा स्थान हासिल किया, UK और साउथ कोरिया को पछाड़ा

 नई दिल्ली भारत ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सेक्टर में बड़ी छलांग लगाई है. Stanford University की 2025 Global AI Vibrancy Tool रिपोर्ट (2024 के डेटा पर आधारित) में भारत दुनिया में तीसरी पोजिशन पर है. रिपोर्ट की मानें, तो भारत को 21.59 स्कोर मिला है. इस लिस्ट में भारत सिर्फ अमेरिका और चीन से पीछे है.  जहां अमेरिका का स्कोर 78.6 है, जबकि चीन का स्कोर 36.95 है. एक साल पहले तक भारत 7वें स्थान पर था और महज एक साल में भारत ऊंची छलांग लगाकर तीसरे पायदान पर पहुंच गया है.  क्या है स्टैनफोर्ड का ग्लोबल AI वाइब्रेंसी टूल?  ये टूल एक ऑनलाइन डैशबोर्ड है, जो देशों को AI इकोसिस्टम में उनकी एक्टिविटी और कॉम्पिटेटिवनेस के आधार पर रैंक करता है. ये डैशबोर्ड देशों का आकलन 7 पिलर- रिसर्च, टैलेंट, इकोनॉमी, पॉलिसी, इंफ्रास्ट्रक्चर, रिस्पॉन्सिबल AI और पब्लिक ओपिनियन के आधार पर करता है.  जहां इस लिस्ट में भारत पिछले साल 7वें स्थान पर था, इस साल तीसरे स्थान पर पहुंच गया है. भारत ने साउथ कोरिया और यूनाइटेड किंगडम को पीछे छोड़ दिया है.  7वें से तीसरे नंबर पर सिर्फ एक साल में भारत कैसे पहुंचा?  भारत के तेजी से आगे बढ़ने के कई कारण हैं. रिपोर्ट की मानें, तो मजबूत पॉलिसी, तेजी से बढ़ता स्टार्टअप इकोसिस्टम और AI टैलेंट का बड़ा पूल भारत को आगे ले जाने में अहम भूमिका निभा रहा है.  इसकी वजह से भारत कई मोर्चों पर मजबूत हुआ है. रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि भारत को AI के क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए 'नई और बड़ी पहलों' का सीधा फायदा मिला है. इन्हीं कदमों के दम पर भारत ने कई विकसित देशों को पीछे छोड़ते हुए ग्लोबल AI रेस में अपनी स्थिति मजबूत की है. स्टार्टअप और प्राइवेट सेक्टर पुश कितना जरूरी है?  भारत की AI वाइब्रेंसी तेजी से आगे बढ़ते स्टार्टअप और एंटरप्राइसेस इकोसिस्टम से जुड़ी हुई है. स्टार्टअप और एंटरप्राइसेस फाइनेंस से लेकर हेल्थकेयर, एजुकेशन और लॉजिस्टिक तक विभिन्न सेक्टर्स में AI को जोड़ रहे हैं. भारत के बड़े डिजिटल बाजार और एक्टिव कंपनियां इसे उभरते मार्केट्स में सबसे अधिक कॉम्पिटेटिव AI इकोनॉमी में से एक बनाती हैं. भारत का टैलेंट एडवांटेज कितना बड़ा है?  भारत AI टैलेंट का ग्लोबल पावर हाउस है. AI हायरिंग में भारत ने दुनिया में सबसे ज्यादा ईयर-ऑन-ईयर ग्रोथ हासिल की है. साल 2024 में भारत AI से जुड़े GitHub प्रोजेक्ट्स में सबसे ज्यादा योगदान करने वाला दूसरा देश बन गया है. AI स्किल पेनिट्रेशन के मामले में भी भारत दुनिया के टॉप देशों में शामिल है. यह रैंकिंग भारत की मजबूत इंजीनियरिंग वर्कफोर्स को दिखाती है.  क्या भारत वास्तव में AI रिसर्च और इनोवेशन में मजबूत है?  भले ही भारत, अमेरिका और चीन से पीछे है, लेकिन AI पब्लिकेशन और पेटेंटिंग में भारत के सुधार साफ नजर आते हैं. ये दोनों ही फैक्टर R&D पिलर के लिए महत्वपूर्ण हैं. स्टैनफोर्ड के AI इंडेक्स के मुताबिक भारत लगातार अपनी AI आउटपुट क्षमता बढ़ा रहा है और खुद को एक स्ट्रैटेजिक AI डेवलपमेंट हब के तौर पर स्थापित कर रहा है. खासकर एकेडमिक-इंडस्ट्री के बीच बढ़ता सहयोग, भारत को मजबूत कर रहा है.  सरकार का क्या रोल है?  यहां IndiaAI Mission एक प्रमुख प्लेयर है. इस मिशन को केंद्रीय कैबिनेट ने अगले 5 सालों के लिए लगभग 10,300–10,372 करोड़ रुपये के बजट के साथ मंजूरी दी थी. इसके तहत 10 हजार से ज्यादा GPUs को कंप्यूटिंग कैपेसिटी बढ़ने के लिए लगाना, एक नेशनल नॉन-पर्सनल डेटा प्लेटफॉर्म डेवलप करना और सुरक्षित और भरोसेमंद AI के लिए फ्रेमवर्क तैयार करना है. इसका सीधा असर पॉलिसी, गवर्नेंस और इंफ्रास्ट्रक्चर पिलर्स पर पड़ा है.  हाई रैंकिंग के बाद भी भारत अभी कहां पिछड़ रहा है? एनालिस्ट को यहां कई गैप्स नजर आ रहे हैं. कटिंग-एज AI रिसर्च और ग्लोबल विजिबल फाउंडेशनल मॉडल्स, चीन और अमेरिकी के मुकाबले हाई-वैल्यू प्राइवेट इन्वेस्टमेंट फ्लो, डेटा क्वालिटी और एडवांस R&D कैपेसिटी में बॉटलनेक स्थिति बड़ी चुनौतियां हैं. भारत को प्रमुश शहरी केंद्रों के आगे रिस्पॉन्सिबल AI रेगुलेशन और एक्सेस पर काम करने की जरूरत है.  भारत के AI फ्यूचर के लिए ये रैंकिंग क्या मायने रखती है?  तीसरे स्थान पर होना ये दिखाता है कि भारत दुनिया की सबसे ज्यादा कॉम्पिटेटिव AI पावर में से एक है. साथ ही भारत लोअर और मिडिल इनकम वाले देशों के आगे खड़ा है. हालांकि, फ्रंटियर कैपेबिलिटी के मामले में अमेरिका और चीन के मुकाबले भारत काफी पीछे है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर भारत AI इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश बनाए रखता है, रिसर्च और इनोवेशन पर दोगुना जोर दे और एथिकल व इन्क्लूसिव AI गवर्नेंस को मजबूत करता है, तो आने वाले में दशक में भारत की AI ग्रोथ रेट काफी तेज हो सकती है.  

रायपुर में डीजीपी-आईजी कांफ्रेंस: AI का इस्तेमाल कर पुलिसिंग को बनाया जाएगा भविष्य तैयार

भोपाल  आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के जमाने में पुलिस भी बदलेगी। एआई की मदद से पुलिस यह पूर्वानुमान लगा सकेगी कि किस जगह, किस समय, किस तरह का अपराध घटित हो सकता है। पहले के आंकड़ों के आधार पर एआई यह अनुमान लगा सकेगा। ऐसे ही किसी समय के ट्रैफिक का वाल्यूम यानी वाहनों की संख्या के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकेगा कि सड़क दुर्घटना आशंका कहां-कहां है। इससे पुलिस घटनाएं रोकने पर ध्यान केंद्रित कर सकेगी। दरअसल, देशभर की पुलिसिंग में 'प्रेडेक्टिव पुलिसिंग' माडल अपनाने पर विचार चल रहा है। पिछले सप्ताह रायपुर में हुई डीजीपी-आईजी कान्फ्रेंस में मध्य प्रदेश के पुलिस महानिदेशक कैलाश मकवाणा ने 'फ्यूचर रेडी पुलिसिंग 2047' को लेकर विजन प्रस्तुत किया। क्राइम प्रिवेंशन एवं डिटेक्शन पर दिया प्रजेंटेंशन उन्होंने बताया कि एआई का उपयोग कर पुलिस अपराध की आशंका आदि बता सकती है। इसे लेकर उन्होंने 'क्राइम प्रिवेंशन एवं डिटेक्शन' विषय पर प्रजेंटेशन दिया। इसी में एआई मॉडल पर चर्चा हुई। कहा गया कि राज्य इस मॉडल का परीक्षण कर अपने-अपने स्तर पर लागू कर सकेंगे। कान्फ्रेंस में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी शामिल थे। डीजीपी मकवाणा ने 'फ्यूचर रेडी पुलिसिंग 2047' के अंतर्गत 'कम्युनिटी पुलिसिंग और पब्लिक ट्रस्ट' विषय पर बताया कि पुलिस आमजन से बेहतर संवाद रखकर कैसे उनका भरोसा जीत सकती है। संवाद को लेकर नवाचार किए बता दें कि डीजीपी बनने के बाद से ही उनका इस पर विशेष ध्यान रहा है। कई जिलों में पुलिस अधीक्षकों ने आमजन से संवाद को लेकर नवाचार भी किए हैं। कांफ्रेस में भी उन्होंने 'नशे से दूरी' अभियान सहित अन्य नवाचारों के बारे में बताया। कांफ्रेंस में उभरते साइबर अपराध, भीड़ प्रबंधन, वैज्ञानिक अन्वेषण, टेक्नोलाजी-इंटीग्रेशन, साइबर सुरक्षा, नागरिक-सहभागिता जैसे विषयों पर चर्चा हुई। मकवाणा ने डेटा-संचालित निर्णय प्रक्रिया, आपदा प्रबंधन प्रणालियां और युवाओं की सकारात्मक भागीदारी जैसे बिंदुओं पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आधुनिक पुलिसिंग तभी प्रभावी हो सकती है जब उसमें तकनीक और मानवीय संवेदना दोनों का संतुलित समावेश हो।

Gemini पर सैम अल्टमैन का बयान: क्या गूगल का AI चैटजीपीटी की रफ्तार का मुकाबला कर पाएगा?

नई दिल्ली सैम ऑल्टमैन ने हाल ही में एक इंटरनल मेमो में स्वीकार किया कि गूगल अभी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दौड़ में आगे दिखाई दे रहा है। Gemini 3 मॉडल की सफलता ने डेवलपर्स और क्रिएटर्स के बीच गूगल की लोकप्रियता बढ़ा दी है। हालांकि, ऑल्टमैन ने इस बढ़त को केवल “अस्थायी” बताया और दावा किया कि OpenAI बेहद तेजी से गैप को कम कर रहा है। गूगल का नया Gemini 3 मॉडल कोडिंग, डिजाइन और प्रोटोटाइप जेनरेशन में शानदार प्रदर्शन कर रहा है। यह मॉडल गूगल के सर्च, प्रोडक्टिविटी ऐप्स और क्रिएटिव टूल्स में गहराई से इंटीग्रेट किया गया है, जिससे इसे बड़े पैमाने पर यूजर विजिबिलिटी मिल रही है। क्या Gemini से पिछड़ रही ChatGPT? डेवलपर्स का कहना है कि Gemini 3 वेबसाइट डिजाइन, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और टेक्स्ट-टू-प्रोटोटाइप जैसे काम बेहद तेजी और सटीकता से कर रहा है। ये वो क्षेत्र हैं जहां पहले OpenAI का दबदबा था। ऑल्टमैन ने स्वीकार किया कि यह बड़ी चुनौती है, लेकिन साथ ही कहा कि कंपनी का असली फोकस सुपरइंटेलिजेंस बनाने पर है, जो भविष्य में गूगल समेत हर प्रतिद्वंद्वी को पीछे छोड़ देगी। Anthropic का उभरता खतरा गूगल के अलावा, ऑल्टमैन ने Anthropic का भी जिक्र किया, जिसकी Claude AI कोडिंग और डीबगिंग में तेजी से लोकप्रिय हो रही है। Claude सीधे OpenAI के Codex और Copilot जैसे सिस्टमों की टक्कर में खड़ी है। AI इंडस्ट्री में कई मोर्चों पर चुनौतियां हैं, और OpenAI को अब एक साथ कई स्तरों पर मुकाबला करना पड़ रहा है। गूगल की तगड़ी आर्थिक ताकत भी है बड़ी चुनौती तकनीकी क्षमता के साथ-साथ गूगल की आर्थिक मजबूती भी उसे इस दौड़ में बढ़त देती है। कंपनी का मार्केट वैल्यू 3.5 ट्रिलियन डॉलर है और वह हर साल 70 बिलियन डॉलर से अधिक फ्री कैश फ्लो जनरेट करती है। विडंबना यह है कि इसी क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग OpenAI और Anthropic जैसी कंपनियां भी करती हैं, यानी प्रतिस्पर्धियों पर गूगल का अप्रत्यक्ष आर्थिक लाभ भी बना रहता है। सुपरइंटेलिजेंस की ओर तेजी से कदम बढ़ा रही OpenAI ऑल्टमैन के अनुसार, OpenAI अभी मजबूत स्थिति में है और AI रेस की चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है। कंपनी इस साल लगभग 13 बिलियन डॉलर की कमाई की ओर बढ़ रही है, हालांकि रिसर्च और कंप्यूटिंग पर भारी खर्च उसकी वित्तीय रणनीति को चुनौती देते हो सकते हैं। ऑल्टमैन ने कहा कि कंपनी को एक साथ कई मुश्किल काम करने हैं। बेहतरीन रिसर्च लैब, AI इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रोडक्ट प्लेटफॉर्म बनना कंपनी के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है। ChatGPT की एंगेजमेंट घटी, पर वित्तीय स्थिति मजबूत कंपनी की सीएफओ सारा फ्रायर ने बताया कि ChatGPT की यूजर्स के बीच एंगेजमेंट भले स्थिर हो गई हो, लेकिन कंपनी आर्थिक रूप से सेफ जोन में है। यह बयान उन चिंताओं को कम करने की कोशिश है जो पिछले कुछ महीनों में OpenAI की धीमी गति को लेकर उठ रही थीं।  

AI और जलवायु परिवर्तन 2028 तक भारतीय व्यवसायों के लिए प्रमुख जोखिम: रिपोर्ट

नई दिल्ली   भारतीय कंपनियों ने साइबर अटैक और डेटा ब्रीच के रूप में अपने टॉप बिजनेस जोखिम की पहचान की है, जबकि 2028 तक के लिए एआई और क्लाइमेट चेंज को भविष्य का बिजनेस जोखिम बताया है। यह जानकारी बुधवार को आई एक रिपोर्ट में दी गई।  ग्लोबल प्रोफेशनल सर्विस फर्म एऑन ने कहा कि प्रतिभाओं को आकर्षित कर उन्हें बनाए रखने की चुनौतियां बनी हुई हैं, जबकि प्रॉपर्टी डैमेज और एक्सचेंज रेट फ्लक्चुएशन एशिया में किसी और जगह की तुलना में भारत में ज्यादा है। एऑन के भारत के सीईओ ऋषि मेहरा ने कहा, "भारतीय व्यवसाय डिजिटल व्यवधान, टैलेंट अडैप्टेबिलिटी और भू-राजनीतिक बदलावों के बीच उल्लेखनीय एजिलिटी का प्रदर्शन कर रहे हैं।77.8 प्रतिशत भारतीय रेस्पॉन्डेंट्स का कहना है कि उन्हें प्रॉपर्टी डैमेज से नुकसान हुआ है, 46.2 प्रतिशत बिजनेस इंटरप्शन और 63.6 प्रतिशत एक्सचेंज रेट फ्लक्चुएशन से प्रभावित हुए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि करीब आधे रेस्पॉन्डेंट्स के लिए टैलेंट से जुड़ी चुनौतियां और कैश फ्लो/लिक्विडिटी के कारण नुकसान हुआ है। जोखिम प्रबंधन का औपचारिकीकरण तेजी से हो रहा है, जिसमें 70 प्रतिशत रेस्पॉन्डेंट्स ने डेडिकेटेड रिस्क और इंश्योरेंस टीम को स्थापित किया है। 64.9 प्रतिशत रेस्पॉन्डेंट्स इंश्योरेबल रिस्क की कुल कॉस्ट को मेजर कर रहे हैं।  92.9 प्रतिशत रेस्पॉन्डेंट्स के पास साइबर अटैक के लिए योजनाएं और फॉर्मल रिव्यूज हैं। प्रॉपर्टी डैमेज के लिए 90.9 प्रतिशत रेस्पॉन्डेंट्स के पास योजनाएं हैं। वहीं, 55 प्रतिशत रेस्पॉन्डेंट्स टैलेंट रिटेंशन पर ध्यान दे रहे हैं। आईटी मंत्रालय के डेटा के अनुसार, 400 से अधिक स्टार्टअप्स और 6.5 लाख प्रोफेशनल्स का एक स्किल्ड वर्कफोर्स 20 अरब डॉलर की साइबरसिक्योरिटी इंडस्ट्री को सशक्त बना रहे हैं, जिसके साथ भारत तेजी से एक ग्लोबल साइबरसिक्योरिटी हब के रूप में उभर रहा है।  सीईआरटी-इन रिसर्च सहयोग, इंटरनेशनल फोरम में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिए एक मजबूत और विश्वसनीय साइबर डिफेंस आर्किटेक्चर बना रहा है, जो कि डिजिटल इंडिया विजन से जुड़ा है।

डिग्री नहीं, स्किल की जरूरत: एआई के दौर में ये 6 हुनर बचाएंगे आपकी नौकरी

नई दिल्ली एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटेमेशन के चलते दुनिया की बड़ी कंपनियों में छंटनी का दौर तेज हो गया है। अमेजन, यूपीएस, टारगेट, माइक्रोसॉफ्ट, इंटेल और नेस्ले जैसी दिग्गज कंपनियों ने हजारों कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया है। धड़ाधड़ पिंक स्लिप पकड़ाई जा रही हैं और नई भर्तियों पर रोक लगा दी गई है। टेक से लेकर ट्रांसपोर्ट तक जैसी फलने फूलने वाली इंडस्ट्री अब रीस्ट्रक्चरिंग और एफिशिएंसी की भाषा बोल रही हैं। हर सेक्टर के विभिन्न कर्मचारियों का भविष्य अनिश्चितता से भरा है। इस उथल-पुथल के बीच अमेरिकी अर्थव्यवस्था नो हायर -नो फायर यानी न नई भर्ती, न ज्यादा छंटनी , ऐसी स्थिति में फंसी है। इसकी वजह है- जियोपॉलिटिक्स (अंतरराष्ट्रीय तनाव), ऑटोमेशन, टैक्स-टैरिफ और बदलती उपभोक्ता आदतें। अमेरिका की सत्ता में डोनाल्ड ट्रंप के लौटने के बाद से पब्लिक सेक्टर में हजारों लोगों की नौकरियां गई हैं। सरकारी शटडाउन अपने चौथे हफ्ते के करीब है, जिससे कई लोगों को सैलरी नहीं मिली और सभी के पास कोई जवाब नहीं है। भर्तियां अब सिर्फ डिग्री के दम पर नहीं टैग्ड के फाउंडिंग मेंबर और सीईओ देवाशीष शर्मा का कहना है कि भारत में कंपनियों में अब भर्तियां डिग्री के दम पर नहीं, बल्कि कैंडिडेट में जॉब के लिए दिखने वाली तैयारी से तय होगी। प्रोजेक्ट्स, इंटर्नशिप और योग्यता मूल्यांकन से स्किल्स देखी जाएगी। उन्होंने कहा, 'एम्प्लॉयर्स खासकर बड़ी कंपनियां एकेडमिक इंस्टीट्यूशन्स के साथ मिलकर स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम्स बनाकर और करिकुलम को मिलकर डिजाइन करके जॉब के लिए तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं।' कई बड़ी दिग्गजों कंपनियों खर्चों को लेकर अपना हाथ टाइट कर लिया है और कर्मचारियों की संख्या पर लगाम लगाई है, यहां देखें लिस्ट अमेजन: ने 14,000 कॉर्पोरेट कर्मचारियों (लगभग 4% ) की छंटनी की है। कंपनी इस पैसे को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में निवेश कर रही है। यूपीएस : ने इस साल 48,000 नौकरियां घटाई हैं और 93 ब्रांचों को बंद कर दिया है क्योंकि शिपिंग (सामान भेजने) की मात्रा कम हुई है। टारगेट : टारगेट ने 1800 कर्मचारियों (लगभग 8% कॉर्पोरेट कर्मी) को हटाया है। नेस्ले : बढ़ती कीमतों और टैरिफ के कारण अगले दो सालों में दुनिया भर में 16,000 छंटनियां कर रही है। लुफ्थांसा समूह : 2030 तक 4,000 पद खत्म करने की योजना बना रहा है। प्रशासनिक काम को डिजिटल और AI प्लेटफॉर्म पर शिफ्ट कर रहा है। नोवो नॉर्डिस्क : अपनी ब्लॉकबस्टर दवाओं की भारी मांग के बावजूद 9,000 कर्मचारियों (11% कार्यबल) की छंटनी की घोषणा की है। इंटेल : छंटनी और कर्मचारियों के छोड़ने से अपने मुख्य मैनफोर्स को 99,500 से घटाकर 75,000 कर रहा है। माइक्रोसॉफ्ट : माइक्रोसॉफ्ट ने इस साल 6,000 कर्मचारियों को निकालने के बाद, गेमिंग और प्रबंधन डिवीजनों में 9,000 और कर्मचारियों की छंटनी की है। एआई, ऑटोमेशन और मार्केट की बदलती जरूरतों में कैसे टिके रहें- 1- फिर से सीखें और नए सिरे से सोचें वो दिन गए जब एक ही स्किल से जिंदगी काटी जा सकती है। जिंदगी भर कमाया जा सकता था। खुद की स्किल्स को बढ़ाना और उसे अपग्रेड करना अब ऑप्शनल नहीं है; यह अनिवार्य है और जिदा रहने का तरीका है। प्रोफेशनल्स को लगातार सीखने में निवेश करना चाहिए, चाहे वह एआई साक्षरता हो, डेटा इंटरप्रिटेशन हो, या कम्युनिकेशन को बेहतर बनाना हो। कोर्सेरा, लिंक्डइन लर्निंग जैसे प्लेटफॉर्म और कंपनी-स्पॉन्सर्ड प्रोग्राम किसी के स्किलसेट को नए सिरे से समझने के लिए मजबूत रास्ते देते हैं। 2. एक पर्सनल ब्रांड बनाएं आज की दुनिया में आपकी ऑनलाइन पहचान बहुत मायने रखती है। लिंक्डिन पर नेटवर्किंग, अनुभव साझा करना और ईमानदारी से खुद को पेश करना फायदेमंद साबित हो सकता है। डिजिटल वर्ल्ड में आपकी मौजदूगी आपको भीड़ में सबसे अलग खड़ा कर देगी। 3. फाइनेंशियल दूर की सोच बढ़ाएं जॉब की असुरक्षा के माहौल में आपका बचाया हुआ पैसा बहुत काम आएगा। एक्सपर्ट्स के मुताबिक कम से कम छह महीने के खर्चों को कवर करने वाला एक इमरजेंसी फंड बनाना चाहिए। कंसल्टिंग, फ्रीलांसिंग, या पैसिव इन्वेस्टमेंट के जरिए इनकम के सोर्स को अलग-अलग करें। साइड इनकम के लिए निवेश करें। 4. जुड़े रहें, संपर्क में रहें नेटवर्किंग लेन-देन वाली नहीं, बल्कि रिश्तों को बनाए रखने वाली होती है। नौकरी से निकाले जाने और बदलाव के दौरान इमोशनल सपोर्ट अक्सर साथियों, पुराने साथ काम करने वालों या इंडस्ट्री के लोगों से मिलता है। इन कनेक्शन को बनाए रखने से अनजाने रास्ते खुल सकते हैं। 5. मानसिक संतुलन को प्राथमिकता दें नौकरी छूटने या अस्थिरता से मेंटल हेल्थ पर बुरा असर पड़ सकता है। मानसिक रूप से मजबूत बने रहने में थेरेपी, मेडिटेशन और नियमित दिनचर्या मदद करती है। 6. लगातार सीखें, खुद को बदलें अब हर व्यक्ति को अपनी स्किल्स को बढ़ाने, खुद को नया रूप देने की जरूरत है। आज का जॉब मार्केट खत्म नहीं हुआ है। यह बस बदल रहा है। इसके लिए सिर्फ टेक्निकल काबिलियत ही नहीं, बल्कि इमोशनल इंटेलिजेंस, एडजस्ट करने की क्षमता और समय के साथ बदलना जरूरी है।  

दुबई की सड़कों पर AI की सख्ती, ट्रैफिक उल्लंघन पर तुरंत एक्शन

दुबई  एआई यानी कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI – Artificial Intelligence) का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ रहा है। दुनियाभर में बड़ी संख्या में लोग अलग-अलग काम के लिए एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। अब एक शहर में एआई का इस्तेमाल बिल्कुल ही हटके काम के लिए किया जाने वाला है। पढ़कर मन में सवाल आना स्वाभाविक है कि कहाँ और कैसे होगा यह? आइए जानते हैं। दुबई में अब एआई रखेगा ट्रैफिक पर नज़र संयुक्त अरब अमीरात – यूएई के शहर दुबई में एआई का इस्तेमाल ट्रैफिक पर नज़र रखने के लिए किया जाएगा। दुबई में सड़क सुरक्षा और ट्रैफिक प्रबंधन प्रणाली को एक नए स्तर पर ले जाने के लिए एआई से चलने वाले इंटेलिजेंट ट्रैफिक सिस्टम की शुरुआत की गई है। दुबई पुलिस ने ट्रैफिक कंट्रोल करने के लिए AI का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. दुबई की सड़कें अब अत्याधुनिक रडार तकनीक से लैस हैं, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से छह अलग-अलग ट्रैफ़िक उल्लंघनों का पता लगाने में सक्षम हैं. KTC इंटरनेशनल नामक कंपनी ने इन रडार को बनाया है. इसकी मदद से ट्रैफिक कानूनों का सख्ती से पालन कराया जा सकेगा और सड़क सुरक्षा में सुधार होगा. KTC इंटरनेशनल के CO इयाद अल बरकावी के मुताबिक ये रडार ड्राइव करते हुए मोबाइल फोन का उपयोग करना, अचानक लेन बदलना, सीट बेल्ट न पहनना, अनुचित लेन अनुशासन और विंडशील्ड पर अवैध रंग चढ़ाना जैसे उल्लंघनों की पहचान कर सकता है. शोर करने वाले वाहनों पर लगेगी लगाम रडार के साथ एक दूसरी AI तकनीक का भी सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया है, जो व्हीकल के ज्यादा शोर का पता लगाना में सक्षम है, जिससे रडार की क्षमता और बढ़ गई है. अल बरकावी ने कहा, AI-संचालित रडार सटीकता के साथ उल्लंघनों की पहचान करता है, उदाहरण के लिए ये कम रोशनी में भी कपड़ों और सीट बेल्ट के बीच अंतर कर सकता है. कई तरह के उल्लंघनों पर लगेगी लगाम इसके अलावा ये रडार लेन डिसिप्लिन, डिस्ट्रेक्ट ड्राइविंग जैसे फोन चलाना, विंडो टिंटिंग के साथ-साथ फुटपाथ पर चलने वाले लोगों की सुरक्षा का भी ख्याल रखेगा. जिसमें पैदल यात्रियों के लिए क्रॉसिंग पर वाहनों की निगरानी करना शामिल है. दुबई के शानदार इंफ्रास्ट्रक्चर की तारीफ करते हुए, अल बरकावी ने कहा कि रडार का डिज़ाइन अमीरात के उन्नत सड़क नेटवर्क को और बेहतर करता है. उन्होंने कहा, “10 लेन तक के राजमार्गों के साथ ये सिस्टम व्यवस्था बनाए रखने और सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी हैं.” प्रभावी के साथ पॉर्टेबल भी यह रडार प्रभावी होने के साथ-साथ पॉर्टेबल भी है. इसे आसानी से बैरियर पर लगाया जा सकता है और पुलिस की जरूरत के हिसाब से कही भी ले जाया जा सकता है, जो ट्रैफिक कंट्रोल की बदलती जरूरतों के अनुकूल है. इस रडार को चार महीने के परीक्षण के बाद सड़कों पर तैनात किया है, कंपनी का दावा है कि ये सटीकता से उल्लंघनों का पता लगाता है. ये तो वक्त बताया कि ये दुबई के लिए कितना कारगर साबित होता है, अगर सब ही रहा तो ये दुनिया के अलग-अलग देशों में भी डिप्लॉय किया जा सकता है.

टेक और सुरक्षा पर जोर: भारत-कनाडा ने किए अहम समझौते

नई दिल्ली भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और उनकी कनाडाई समकक्ष अनीता आनंद ने सोमवार को नई दिल्ली में द्विपक्षीय बैठक की। भारत-कनाडा की साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए दोनों नेताओं ने आवश्यक तंत्रों को 'पुनर्स्थापित और पुनर्जीवित' करने पर चर्चा की। इसके साथ ही एक महत्वाकांक्षी सहयोग रोडमैप पर सहमति जताई। भारत-कनाडा की ओर से जारी किए गए संयुक्त बयान में, विदेश मंत्री एस जयशंकर और अनीता आनंद ने सहयोग करने, सूचना और विशेषज्ञता का आदान-प्रदान करने और विभिन्न क्षेत्रों में अपनी-अपनी जलवायु महत्वाकांक्षाओं का समर्थन करने पर सहमति जताई। इसके तहत नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता, भारी उद्योगों का कार्बन-मुक्तिकरण, प्लास्टिक प्रदूषण में कमी, रसायनों के सुदृढ़ प्रबंधन का समर्थन और सतत उपभोग सुनिश्चित करना शामिल है। इसके अलावा, दोनों देशों ने एआई और डिजिटल अवसंरचना सहित विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में नए आयाम खोलने के लिए सहयोग बढ़ाने पर हामी भरी है। संयुक्त बयान में कहा गया है, "लोगों के बीच संबंध, आपसी समझ को बढ़ावा देने और दीर्घकालिक सहयोग के निर्माण के लिए, दोनों पक्ष शिक्षा, पर्यटन, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और व्यावसायिक गतिशीलता में सहयोग को मजबूत करने पर सहमत हुए। उभरती प्रौद्योगिकियों (जैसे एआई, साइबर सुरक्षा और फिनटेक) में अनुसंधान साझेदारी पर जोर दिया जाएगा और विदेशी परिसरों के माध्यम से भारत में कनाडाई शैक्षणिक उपस्थिति का विस्तार किया जाएगा। इसमें कनाडा-भारत शैक्षणिक नेटवर्क और संस्थागत संबंधों को विस्तारित करने के लिए उच्च शिक्षा पर संयुक्त कार्य समूह को पुनर्जीवित करना भी शामिल है।" दोनों नेताओं ने वैश्विक मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया, जिसके तहत अधिक प्रभावी और समावेशी बहुपक्षीय संस्थाओं को सुनिश्चित करने के लिए काम किया जाएगा। दोनों पक्षों के बीच बातचीत के बाद, जयशंकर ने कहा कि उन्होंने और अनीता आनंद ने वैश्विक घटनाक्रमों और साझा चुनौतियों के प्रति अपनी प्रतिक्रियाओं पर चर्चा की। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट किया, "आज नई दिल्ली में कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद का स्वागत करते हुए मुझे खुशी हुई। हमारी साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक तंत्रों को पुनर्स्थापित और पुनर्जीवित करने हेतु रचनात्मक चर्चा हुई। वैश्विक घटनाक्रमों और साझा चुनौतियों के प्रति हमारी प्रतिक्रियाओं पर भी विचारों का आदान-प्रदान हुआ। हम एक महत्वाकांक्षी सहयोग रोडमैप पर भी सहमत हुए और अपने सहयोग के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया का नेतृत्व करने पर सहमत हुए ताकि यह हमारे नेताओं की अपेक्षाओं और हमारे लोगों के हितों को पूरा कर सके।"

वॉर हीरो जिसने AI से दुश्मनों के सीक्रेट कोड किए हैं क्रैक

आजकल AI की जरूरत हर किसी को पड़ने लगी है। कुछ लोग तो दिनभर में जितना सर्च इंजन नहीं खोलते, उससे अधिक बार AI यूज करने लगे हैं। जब लोग स्मार्टफोन पर चैटबॉट से बात करते हैं या AI से तस्वीरें बनवाते हैं, तो लगता है कि यह तकनीक नई है। लेकिन क्या आप जानते हैं, AI की जड़ें दूसरे विश्व युद्ध तक जाती हैं? यह कहानी उस समय की है, जब एक जटिल कोड ने दुनिया को हिला दिया था और एक शख्स ने उस कोड को तोड़कर AI की नींव रखी। कहानी एनिग्मा कोड और एलन ट्यूरिंग की, जिन्‍होंने आज के AI को जन्म दिया। सीक्रेट कोड नहीं टूटा ​गार्जियन की रिपोर्ट बताती है कि दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी ने एनिग्मा नाम की मशीन बनाई थी। यह दिखने में टाइपराइटर जैसी थी। जब कोई अक्षर दबाया जाता, यह मशीन उसे अलग-अलग कोड में बदल देती थी। हर 24 घंटे में इसकी सेटिंग बदल दी जाती थी। इतने सारे कोड थे कि इन्हें समझ पाना बाकी लोगों के लिए नामुमकिन था। जर्मन सेना इसका इस्तेमाल सीक्रेट मैसेज भेजने के लिए करती थी, दुश्मन को इसका मतलब समझने में सालों लग जाते। एलन ट्यूरिंग ने तोड़ दिखाया कोड तब बात उठी कि एलन ट्यूरिंग इसके कोड ब्रेक कर सकते हैं। ट्यूरिंग के महान गणितज्ञ और कोडब्रेकर थे। ट्यूरिंग ने 'बम' नाम की मशीन बनाई, जो एक तरह का शुरुआती कंप्यूटर था। यह मशीन लाखों कोड की जांच करती थी। 1943 तक यह हर मिनट दो मैसेज को डिकोड करने लगी। ट्यूरिंग ने एनिग्मा की कमजोरियों का फायदा उठाया। उनकी इस मेहनत ने दूसरे वर्ल्ड वॉर को दो साल पहले खत्म किया। इस वाकये से पहले मशीन सिर्फ काम करती थी, पहली बार मशीन ने सोचने का काम शुरू किया। इसके बाद साल 1956 में एक कॉन्फ्रेंस के दौरान इसे 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' यानी 'AI' नाम दिया गया। इंटरनेट के आने के बाद AI तेजी से आगे बढ़ा, फिर जो तकनीक सोचने का काम करती थी, उसे AI कहा जाने लगा। ट्यूरिंग न होते तो AI भी नहीं होता एनिग्मा को तोड़ना उस समय एक चमत्कार था। मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी के डॉ. मुस्तफा कहते हैं कि युद्ध के दौरान इसे तोड़ना आसान नहीं था। ट्यूरिंग और उनकी टीम ने महीनों की मेहनत से असंभव को संभव किया। उनकी बनाई मशीनें और तकनीकें आज के AI की बुनियाद हैं। अगर एनिग्मा न टूटा होता, तो शायद युद्ध का नतीजा कुछ और होता। शायद AI की शुरुआत भी ना होती। अब तो मिनटों में टूट सकता है सीक्रेट कोड आज की तकनीक के सामने एनिग्मा कोड मिनटों में टूट जाता। ऑक्सफोर्ड के प्रोफेसर माइकल वूल्ड्रिज बताते हैं कि आज के कंप्यूटर और AI इतने तेज हैं कि वे बम मशीन की तुलना में हजारों गुना तेजी से कोड तोड़ सकते हैं। मसलन, चैटजीपीटी जैसा AI आसानी से 'बम' मशीन की तरह काम कर सकता है। आधुनिक डेटा सेंटर की ताकत इतनी है कि ट्यूरिंग भी हैरान रह जाते।